Wednesday, December 22, 2010

एक चिनगारी और।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने ये कविता कभी लोहिया जी के न रहने पर छाए घोर अंधकार और निराशा के वातावरण को देखते हुए...उम्मीद के नए नारे के साथ लिखी थी। ठीक वही कविता आज भी प्रासंगिक है...जब सुरेन्द्र मोहन हमारे बीच नहीं हैं....

लो , और तेज हो गया
उनका
रोजगार

जो
कहते आ रहे हैं

पैसे
लेकर उतार देंगे पार।


बर्फ
में पड़ी गीली लकड़ियां

अपना
तिल-तिल जला कर

वह
गरमाता रहा

और
जब आग पकड़ने ही वाली थी

खत्म हो गया उसका दौर
मेरे देशवासियों

एक
चिनगारी और।


उसने थूका था इस
सड़ी
गली व्यवस्था पर

उलट
कर दिखा दिया था

कालीनों
के नीचे छिपा टूटा हुआ फर्श,

पहचानता था वह उन्हें
जो
रंगे चुने कूड़े के कनस्तरों से

सभी
के बीच खड़े रहते थे।


एक
चिनगारी और

जो
खाक कर दे

दुर्नीति को,ढोंगी व्यवस्था को
कायर
गति को

मूढ़
मति को

जो
मिटा दे दैन्य,शोक,व्याधि,

मेरे देशवासियों

यही
है उसकी समाधि।

मैं
साधारण...

मुझे
नहीं दीखती कोई राह और,

जिधर वह गया है
उधर उसके नाम पर
एक
चिनगारी और।

Tuesday, December 21, 2010

एक उम्र कम है यहां से प्रेरणा लेने के लिए....

दिल्ली की भीड़ भाड़ वाली एक सुबह, वक्त तकरीबन दिन के दो बजे, स्थान दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले का प्रांगण। समाजवादी चिंतक डॉ प्रेम सिंह की पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम में प्रसिद्ध आलोचक डॉ नामवर सिंह को शिरकत करना था। लेकिन सारी तैयारी पूरी होने के बावजूद भी वे किसी दूसरे स्टॉल में और कार्यक्रम में व्यस्त थे। तभी एक बुजुर्ग ने मेरे कांधे पर हाथ रखकर धीरे से कहा नामवर जी अमुक के साथ हैं उनका मोबाइल नंबर मिलाओ। मैँने तुरंत उनसे पूछा कि नंबर क्या है। उन्होंने नंबर बताया। मैंने डॉयल किया। तभी बुजुर्ग सज्जन ने मोबाइल पर नामवर जी से बात की..और कहा नामवर जी कहां व्यस्त हैं अब भी जाओ..अब तो कई नामवर हो गए.. बात सीधी थी लेकिन कई मतलब रखती थी। नामवर जी ने कहा कि वे और नामवरों को तैयार करने ही आए हैं और तुरंत स्टॉल में हाजिर हो गए। ये बुजुर्ग सज्जन और कोई नहीं प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक सुरेन्द्र मोहन थे। मैंने अपने तमाम मित्रों को बड़े गर्व के साथ कहा कि आज सुरेन्द्र मोहन ने मेरे मोबाइल से नामवर सिंह से बात की। कोई चिंता कोई मलाल कोई गिला कोई शिकवा .. बिल्कुल ही धवल चरित्र था सुरेन्द्र मोहन का। हैदराबाद में जैसे ही ख़बर आई कि सुरेन्द्र मोहन नहीं रहे। लगा सिर से अभिभावक का साया उठ गया। एक झटके में समाजवादी आंदोलन का सारथी चला गया। अपनी उन तमाम उम्मीदों को छोड़कर जिसे पूरा करने के लिए पूरी जिंदगी गुजार दी। आज के भ्रष्ट माहौल में एक ऐसी शख्शियत हमारे बीच से उठ गई , जिसे दिखाकर हम ईमानदारी की मिसाल दिया करते थे। कहा करते थे देखो ये वही शख्श है जिसने अपने सारे सपने महज इसलिए लुटा दिए कि हिन्दुस्तान में कुछ लोग सपने देख सकें। वो आंखें जो सालों साल से व्यवस्था की बोझ तले दबाई जा रही हैं। उन्हें आवाज देने के लिए ही सुरेन्द्र मोहन ने जिंदगी गुजार दी। कुर्बान अली ने बीबीसी में सटीक लिखा है...तुने न्यूनत्तम लिया ... अधिकत्तम दिया..तुम्हारे जैसा कौन जीया ... एक बड़े शायर ने कहा है कि यूं चलकर नहीं ये तर्जे सुखन आया है.. पांव दाबे हैं बुजुर्गों के तो फन आया है ... वादा भी है और भरोसा भी कि सुरेन्द्र मोहन की लड़ाई कमजोर नहीं होगी ....
राजेश कुमार

Tuesday, April 13, 2010

नाम गांव का अनाम कवि

बिहार के ऑफिसियल मानचित्र पर बांका ज़िले के बीचों बीच भितिया गांव साफ दिखाई देता है।अपनी आदिवासी पृष्ठभूमि साफ सुथरा रहन सहन,वन्य संपदा और जागरुक लोगों की वजह से पूरे इलाके में अपनी खास पैठ रखता है...। तमाम लोग ऐसे हैं जिनकी वजह से इस गांव की अलग ही पहचान है..।लेकिन यहां मैं एक सख्स से खासा प्रभावित हूं..। जिन्होंने अपनी कलम को लोकप्रियता का हथियार न बनाते हुए...उसे अपना धर्म मान लिया..। इस कलम के सिपाही ने कभी भी वो हथकंडे नहीं अपनाए, जिनका आज के साहित्य में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है..। जिस राही की कहानी मैं बताने जा रहा हूं उन्होंने अपनी ज़िंदगी का सफर इस कहावत से शुरू किया था कि ..

लीक लीक सब चले...लीक पे चले कपूत..

बिना लीक के तीन चले...शायर शेर सपूत...

और बस फिर क्या था नियति को चाहे जो मंजूर हो , शायर ने कह दिया कि मैं न तो ज़माने की नपी नपाई लीक पर चलूंगा..। और नही उस धंधे में फिट हो जाउंगा जिसे पूर्वजों ने हमारे लिए चुना है..। जब किताबों में खोए रहने की उम्र थी.. तब हाथों में बंदूक थाम ली..वजह भी कोई खास नहीं ..बस यूं ही वीरानों में बेवजह धमाके करने का मन बना लिया था...। हां राह--शौक में कुछ और चीजें थी..मसलन जुर्म के ख़िलाफ क़लम चलाने का जुनून..। लेकिन वहां तो बंदूक का नाम लेना तक गंवारा नहीं था ...। लिहाजा होनी को कुछ और ही मंजूर था...। तभी तो हाथों में असलहे और होठों पर गीत...। यहीं से शुरु होता है हमारे प्रिय अप्रकाशित कवि भूप नारायण मिश्र का...। अब ये अलग बात है कि आने वाले कुछ सालों में बंदूक की जगह धीरे- धीरे बांसुरी ने ले ली...। लेकिन उधेड़बुन अपनी जगह क़ायम रहा..। बस प्रेरणा इतनी सी कि...

ओ पिंजरे के पंछी कवि मन...खिड़की भर आकाश न कम है...

दिया मौत ने जितना तुमके...उतना भी अवकाश न कम है...

और सपने बस इतने कि...

मेहनत से जो मिल जाए..

पका-अधपका फल बड़ा मीठा लगा...

इस बीच जब भी व्यवस्था की आहट हुई... दुनिया ने अपने सांचे में कवि को फिट करना चाहा , तो कवि ने हमेशा की तरह साफ कह दिया कि तेरी दुनिया की नेमतें तुझे मुबारक..मैं तो अपनी धुन का राही हूं...मुझे तेरे ज़माने के रिवाज न तो समझ में आए..और न ही मैं तुम्हारे सांचो में फिट होने के लिए लिखता हूं...। लेकिन हद तो तब हो गई जब शाश्वत बागी की तर्ज पर कवि ने बंधे बंधाए कविता के अनुबंधों और साहित्यिक दुनिया के रिवाजों को भी मानने से इंकार कर दिया..। कविताएं लिखकर कागज पर सजाते चले गए..। स्वयमेव भाव से कविता का मानस उद्धृत होता चला गया और कवि के शब्द चारदिवारी में ही रह गए...। कविताओं की नदियों में अविरल पानी बहता रहा। और कवि गाता रहा कि...

जीवित रह मेरे एक गीत...

संकलन जिए यह चाह नहीं...

हो एक गीत की वाह वाह...

बस कवि की थोड़ी सी चाह यही...। इस बार जब गांव गया तो अपने प्रिय कवि से उनकी कविताओं की मांग की..कहा कि आपकी कविता का बड़ा प्रशंसक हूं और चाहता हूं कि इसे मूर्त रुप मिले...और ये जल्दी कहीं छप जाए..बातों बातों में एक बात मुंह से निकल गई कि ... मैं चाहता हूं आपको उचित सम्मान मिले...। लेकिन पता नहीं दुनिया भर की बातों को चहक-चहक कर सुनने वाले कवि ने कभी मेरी इस बात को गंभीरता से क्यों नहीं लिया...। बोल बैठे... अब और कुछ दिन की है तन्हाई हमारी... बुलाए जा रहे हैं हम इशारे हो रहे हैं... ऐसा भी नहीं है कि इस कवि ने कभी कविता मंचों और पत्र पत्रिकाओं में अपनी आजमाइश नहीं की...। जहां भी गया हाथों हाथ लिया गया...लेकिन अपनी कविता छपवाने की बात जैसे ही कही कवि बिफर पड़े...

पैर निकट भी सांप देखकर ऐसे कभी न उछले थे..

देख आपको इस महफिल में ऐसे उछल गए सब लोग...

ज्यादा कुछ न कहते हुए उनकी साहित्यिक सरिता पर किसी बड़े शायर के ये शब्द जरुर कहना चाहूंगा...कि

जब उनकी मलाहत के किस्से लिखूंगा ग़ज़ल के शेरों में ..

हर रुखे-सूखे मिसरे में तासीर--नमक आ जाएगी...

आज जब हर काम और हर रचना बस अवॉर्ड के लिए ही लिखी जा रही है...बावजूद इसके साहित्य के इस छोटे से संसार में कुछ लोग ऐसे हैं जो लिखने को अपना धर्म समझते हैं...। यहीं नहीं लिखते भी इसीलिए हैं कि रचनाओं की सुंदरता पर कोई सवाल न उठा दे..। जब भी ये पूछिए कि भाई आपने तो जो भी लिखा वो तो अपने पास ही रख लिया .. तो जवाब मिलेगा कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं है ..बात वहां तक पहुंच गई है...जहां तक पहुंचाने के लिए मुंह में जबान मिली थी...


- राजेश कुमार


comment....


aahsas said...

लेख के माध्यम से गाँव के अनाम कवि की जानकारी मिली है निश्चित रूप से उनके सृजनशीलता पर शक नहीं है लेकिन उनका नेपथ्य में रहना खलल डालता है.हर बात पे असहमत रहने वाले भी इस बात पे सहमत होंगे की न जाने ऐसे कई प्रतिभाशाली भूपनारायण मुख्या धारा में नहीं आ सके या ऐसा कहे की `वंचित`रह गए.मैंने वंचित शब्द का प्रयोग करके आरक्षण की मांग नहीं उठाई है बल्कि प्रोत्साहन की बात पर जोर देना चाहता हूँ.हमारे सामाजिक ढांचे में प्रोत्साहक तत्व कि कमी है जो लीक से हटकर सोचने वाले को हतोत्साहित करता है जिसका परिणाम है ये अनाम कलाकार...!

फिर सोचता हूँ कि कला किसी मंच का मोहताज नहीं होती.असली सुख तो सृजन में है पुब्लिसिटी हो या न हो फर्क नहीं परता.शायद इसी सोच के कारण ऐसे कवि लिखते जा रहे है....``विह्वलता गर आए मन में रच-रच रचकर रचना कहना !! धन्य हो चिट्टा जगत का जहाँ किसी नामवर के यहाँ अर्जी दिए बगैर जगह मिल जाती है !अब हमारा यह उत्तर दायित्वा बनता है है कि हम इन नेपथ्य के सितारों को सामने लाये.

April 1, 2010 4:47 AM


Saturday, January 30, 2010

चले गए जनेश्वरजन


बात मेरे जन्म से क़रीब पांच साल पहले की है। सन १९७७ के उपचुनाव, सीट समाजवादियों का गढ़ रही बिहार की बांका लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र . सीधा मुक़ाबला कांग्रेस और समाजवादियों के बीच। चन्द्रिका प्रसाद सिंह के असामयिक निधन पर खाली हुई सीट से कांग्रेस ने शंकुतला सिंह पर दांव आजमाया था। बांका की ऊपजाउ सियासी ज़मीन पर या यूं कहे पूरे पूरे अंगभाषी इलाक़े में दिग्गज और तेज तर्रार कांग्रेसी के रुप में चन्द्र्शेखर सिंह चर्चित हो चुके थे। पटना से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में उनकी साख थी। और इसी वक्त समाजवादी आंदोलन में बिखराव शुरू हो चुका था। जॉर्ज फर्नांडिज और मधुलिमये का खेमा अलग हो चुका था। और राजनारायण और जनेश्वर आदि संयुक्त् सो्शलिस्ट पार्टी का गठन कर चुके थे।बांका से मधुलिमये ने सांसद के लिए पर्चा भरा। बतौर समाजवादी उनकी जीत के पूरे समीकरण मौजूद थे। लेकिन संयुक्त सोशलिस्ट् पार्टी की तरफ से राजनारायण ने ताल ठोंकी और बांका में समाजवादी तेवर दिखने लगे। ख़ैर समाजवादी विचारों की बात करें तो लोहिया और जयप्रकाश के साथ-साथ कर्पूरी और नरेन्द्र् देव का नामलेवा मैं खानदान में पहला व्यक्ति हूं। लिहाजा मेरा पूरा परिवार अपनी पूरी ताक़त से कांग्रेसी उम्मीदवार को जीताने में लगा था। लेकिन सियासत ने तब इतनी ओछापन और मलिनता नहीं थी। तभी तो फूलपूर के सांसद जनेश्वर मिश्र जब भितिया पहुंचे तो एक कांग्रेसी विधायक के घर ठहरे। गरमी अपने चरम पर थी।लिहाजा जनेश्वर ने धूप काटने का मन बनाया। बाबा शकुन्तला देवी के प्रचार को निकले थे। पापा ने पेड़ा मंगाया और गांव के कुंए का ठंडा पानी पीकर आराम से चौड़ी सी बेंच पर सो गए। मानो कोई गवई मजदूर हो जो दोपहर काटने के लिए सुस्ता गया हो। दोहरे बदन वाले उस निडर और धवल चरित्र के आदमी को देखकर शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह आदमी भारत की सर्वोच्च पंचायत का निर्वाचित सदस्य है और सिर्फ समाजवादी आंदोलन के लोग ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान की सियासत में इनका नाम इज्जत के साथ लिया जाता है। और यह बस केवल अपने विचारों के आधीन होकर फूलपूर से हजारों किलोमीटर दूर बांका के भितिया में बेंच पर सोकर दोपहरी काट रहा है।
लिहाजा पापा के मुंह से सुनी इतनी कहानी ही जनेश्वर का पहला परिचय थी। फिर जब दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ परिषर में पत्रकारिता की क्लास में नामांकन हुआ। और सिद्धु कान्हू मुर्मु विवि से सीधा देश के ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले दिल्ली विवि में पहुंच गया था पहले क्लास में प्रभाष जी का व्याख्यान होना था। मुझे सिर्फ समाजवाद की सनक भर लगी थी। उसका असली स्वाद नहीं चखा था। गणेश नगर से खुलने वाली ७४० नंबर की बस पर सवार होकर जैसे ही कनॉ़ट प्लेस पंहुचा और गांड़ी ने ज्यों ही टर्न लिया एक एमपी आवास में बड़े बढ़े लाल रंग के शब्द दिखाई दिए लोहिया के लोग। मानो तन बदन में झंकार की लय गई। मैंने सोचा किसने कहा समाजवाद अब अप्रासंगिक है। एक जनेश्वर है जो देश के दिल दिल्ली के धड़कन कनॉट प्लेस के लगभग बीचों बीच चीख चीखकर कह रहा है हम हैं लोहिया के लोग और हमारे जैसे लोग जब तक रहेंगे समावाद जिंदा रहेगा।
अब भी दिल्ली जाऊंगा सोचता हूं कनॉट प्लेस कैसा लगेगा बिना लोहिया का कनॉट प्लेस बिना जनेश्वर का कनॉट प्लेस बस सोचता हूं किसी तरह वो बोर्ड बच पाता। लोगों ने तो अपने विचारों को बनाए रखने के लिए पूरे शहर को सार्वजनिक पार्क बना दिया लेकिन हमें सिऱ्फ एक बोर्ड चाहिए जनेश्वर की याद के लिए...उनकी संघर्षों की याद के लिए.....

Tuesday, January 26, 2010

साथ छोड़ गए प्रभाष जी


पत्रकारिता के युगपुरुष को नमन