Wednesday, July 31, 2013

नवउदारवाद के हमाम में - प्रेम सिंह

सोनिया के सलाहकारों की हकीकत 

‘‘सांप्रदायिकता का नंगा नाच जनभावना विरोधी है और उदारीकरण की नीतियां अर्थव्यवस्था की बरबादी हैं - ये दो सीख चुनाव नतीजों से उभर कर आई हैं और आगे के लिए चेतावनी का काम करेंगी। सचेत नागरिकों को देखना होगा कि राजग के काल में प्रचलित सामाजिक-आर्थिक नीतियों के स्थान पर नई नीतियां आ रही हैं या नहीं। आर्थिक नीति संबंधी सीख को मिटा देने का प्रयास मीडिया कर रहा है।’’ समाजवादी चिंतक किशन पटनायक

किशन जी का यह कथन 2004 के आम चुनाव में भाजपा नीत एनडीए की पराजय और कांग्रेस नीत यूपीए की जीत के बाद का है। इस कथन के कुछ ही दिनों बाद (27 सितंबर 2004 को) किशन जी हम लोगों के बीच नहीं रहे। वे ऐसे नेता और विचारक थे जिन्होंने नई आर्थिक नीतियों अथवा नवउदारवाद का सबसे पहले, सतत, सुचिंतित और मुकम्मल विरोध किया था। साथ ही उन्होंने उसका राजनीतिक व विचारधारात्मक विकल्प निर्मित करने का भी गहन प्रयास किया। किशन जी का कहना है कि राजनीति में उनकी कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। लेकिन वे अकेले ऐसे नेता व विचारक हैं जो आजादी के दौरान और प्राप्ति के बाद चले समाजवादी संघर्ष की चेतना और विचारधारा को नवउदारवाद के विकल्प में नई सोच, भाषा व रणनीति के साथ मजबूती से खड़ा करते हैं। बहुत ही मुश्किल दौर में उन्होंने देश के संविधान और समाजवाद को नए राजनीतिक विमर्शों के साथ जोड़े रखा।     
किशन पटनायक ने अपने उपर्युक्त कथन में इस बात पर जोर दिया है कि मीडिया चुनाव नतीजों से निकली आर्थिक नीतियों संबंधी सीख को मिटाने की कोशिश कर रहा है। जाहिर है, उनका सरोकार नवउदारीकरण के विरोध का ज्यादा है। क्योंकि जनभावना के विरुद्ध होने के चलते सांप्रदायिकता का नंगा नाच ज्यादा देर नहीं चल सकता। भारतीय और विश्व के इतिहास में यह देखा जा सकता है। जबकि नई आर्थिक नीतियां हमेशा के लिए लादी जा रही हैं@लादी जा सकती सकती हैं।  
इस कथन में एक और अर्थ पढ़ा जा सकता है। नवउदारवाद की मार से उसके विरुद्ध सन्नद्ध होने वाली जनता के प्रतिरोध का सरकारें कारपोरेट घरानों के साथ मिल कर कड़ाई से दमन करती हैं। पिछले बीस सालों से देश में यह दमन-चक्र चैतरफा चला हुआ है। इसके चलते अपने संवैधानिक हकों की मांग करने वाले अनेक लोगों को मौत से लेकर कारावास तक का दंड झेलना पड़ रहा है। नवउदारवाद के विरोधियों के लिए देश पुलिस राज्य में तब्दील हो गया। लिहाजा, सचेत नागरिको का पहले से ही कमजोर हालत में पड़ी जनता और जनभावना के साथ जुटना जरूरी है। हालांकि उसकी सार्थकता तभी है, जब सचेत नागरिक खुद भी नवउदारवाद का मुकम्मल विरोध करें। 
नवउदारवादी सत्ताप्रतिष्ठान मेहनतकश जनता को पराया और गुलाम मानता है। उसके संवैधानिक अधिकारों को वह नहीं मानता; क्योंकि वह संविधान को ही नहीं मानता है। उसे केवल ‘रूल’ करने के लिए संविधान चाहिए। ‘भारत उदय’ अथवा ‘भारत निर्माण’ के लिए उसके पास विश्व बैंक, आईएमएफ, डब्ल्यूटीओ, कारपोरेट घरानों और अमेरिका का ‘आदेशपत्र’ मौजूद है। किशन जी की समझ थी कि नवउदारवाद के खिलाफ जो जनभावना बन रही है, दमन और असहायता के चलते उसकी उठान गिरनी नहीं चाहिए। मूल प्रतिरोधी शक्ति वे उसे ही मानते थे। लेकिन सचेत नागरिकों की ईमानदार एकजुटता  की भी जरूरत देखते थे, ताकि एक दिन जनभावना की शक्ति नवउदारवाद को परास्त कर सके। यह उनका निर्णायक राजनीतिक ध्येय था।
आप समझ सकते हैं उनके कथन में देश के सचेत नागरिकों की भूमिका के बारे में एक भोली आशा झलकती है कि वे करीब 15 साल से जारी नवउदारवादी नीतियों को अब और आगे नहीं चलने देंगे। जाहिर है, सचेत नागरिकों, जिन्हें प्रचलित शब्दावली में नागरिक समाज एक्टिविस्ट कहा जाता है, ने उनकी बात पर कान नहीं दिया। भारत का नागरिक समाज, नागरिक समाज एक्टिविस्ट जिसके अगुआ हैं, उलटे नई आर्थिक नीतियों के तहत संसाधनों और मेहनतकश जनता के श्रम की खुली लूट से मिलने वाले लाभ को ज्यादा से ज्यादा अपने लिए लूटने की नीयत से परिचालित है।   
सचेत नागरिक कई रूपों में कई तरह से नवउदारवाद के संचालन में मददगार होते हैं। नवउदारवादी व्यवस्था चलती रहे, इसके लिए कई सचेत लोग सरकार के सलाहकार बन कर बिचैलिए की भूमिका निभाते हैं। सोनिया गांधी द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय सलाहकार समिति इस मामले में मशहूर है। उसमें स्थान पाने के लिए नागरिक समाज एक्टिविस्ट आतुर रहते हैं और आपस में झगड़ते भी हैं। नवउदारवाद के कुछ झंडाबरदार कहते हैं कि सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति के कतिपय सदस्यों को छोड़ कर देश में नवउदारवाद पर लगभग सर्वानुमति है। उनकी यह गलत धारणा है। सोनिया के सलाहाकार नवउदारवाद के कहीं ज्यादा काम के सिद्ध होते हैं। इस हकीकत को स्वीकार करके ही नवउदारवाद विरोध और समाजवाद की स्थापना का संघर्ष आगे बढ़ाया जा सकता है।  
सरकार के साथ होकर भी ये सचेत नागरिक जनता के साथ होने का भ्रम पालते और फैलाते हैं। आप अपनी पीठ ठोंकते हैं। कहते हैं जब से उन्होंने एनजीओ वर्क शुरू किया है तभी से लोग जागरूक हुए हैं और सवाल पूछते हैं। सोनिया की सलाहकार समिति में रह कर या बिना रहे वे जो योजनाएं और कानून बनवाते हैं, वही जनता का असली संघर्ष है। उनकी नजर में जनता के नाम पर राजनीति करने वालों से ज्यादा बुरा कोई नहीं होता। वे चाहते हैं लोग राजनीतिक पार्टी नहीं, एनजीओ बनाए। जबकि सरकारी सलाहकार समितियां हों या एनजीओ, नवउदारवाद का अभिन्न हिस्सा हैं। जिसे जनता का काम बताया जाता है वह अंदरखाने सरकार का काम होता है। नवउदारवादी सरकार की नीतियों का विरोध करके कोई सरकार की समितियों में रह ही नहीं सकता। यूपीए सरकार ने पूंजीवाद की पींगें बढ़ाने में ऐसे लोगों का बखूबी इस्तेमाल किया है। 
उदाहरण के लिए महात्मा गांधी राट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) को लिया जा सकता है। हमने शुरू से इस योजना का विरोध किया है। इस तरह की योजनाएं नवउदारवाद के सेफ्टी वाल्व के रूप में काम करती हैं। नवउदारवाद के कुछ झंडाबरदार कहते हैं कि सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति के कतिपय सदस्यों को छोड़ कर देश में नवउदारवाद पर लगभग सर्वानुमति है। उनकी यह गलत धारणा है। सोनिया के सलाहाकार नवउदारवाद के कहीं ज्यादा काम के सिद्ध होते हैं। वे अपने कांग्रेसी आकाओं के साथ सोनिया गांधी, मनमेाहन सिंह और राहुल गांधी की ढाल बन कर खड़े होते हैं। वे उन्हीं के आदमी हैं। (इस हकीकत को स्वीकार करके ही नवउदारवाद विरोध और समाजवाद की स्थापना का संघर्ष आगे बढ़ाया जा सकता है।)  
आइए इस चर्चा को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं। यह अकारण नहीं है ऐसी योजनाओं का सुझाव देने वाले या तो पहले से एनजीओ वाले होते हैं या योजना बनने के बाद उसके कार्यान्वयन आदि में संलग्न होते हैं। ऐसी योजनाओं के समर्थन में वे कहते हैं कि गरीबों को कुछ तो मिला है। जबकि ऐसा कह कर वे अमीरों के सब कुछ हथियाने के ‘अधिकार’ की हिमायत कर रहे होते हैं। यह सब करने से नवउदारवादी व्यवस्था और उसके लाभों में उनका अपना हिस्सा सुरक्षित बना रहता है। समितियों की बैठकों में उपस्थित होने के लिए उन्हें मिलने वाले हवाई जहाज और टैक्सी के किराये, दैनिक भत्ते, आवास व भोजन के खर्च का हिसाब अलग, एक व्यक्ति का नाश्ता ही मनरेगा में मिलने वाली राशि की कीमत से ज्यादा का होता है। 
मामला केवल अपनी भूमिका और हित सुरक्षित करने तक ही सीमित नहीं है। इस तरह की योजनाओं की सरसरी पड़ताल से उनका समता और लोकतंत्र विरोधी चरित्र स्पष्ट हो जाता है। ऐसी योजनाओं से, एक तरफ, विषमता को व्यवस्थित रूप दिया जाता है और, दूसरी तरफ, जनता को सामंती दौर की तरह प्रजा बनाए रखने की व्यवस्था की जाती है। कहना न होगा कि विषमता कायम करने में समाजवाद का खुला उल्लंघन है और जनता को (नागरिक नहीं) प्रजा बनाए रखने में लोकतंत्र का। 
समाजवाद और लोकतंत्र संविधान के तीन मूलभूत मूल्यों में से दो हैं। कांग्रेस के साथ जुटने वाले सचेत नागरिक सांप्रदायिक शक्तियों के बरक्स धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की बात करते वक्त संविधान का वास्ता देते हैं। खास कर तब जब सांप्रदायिक शक्तियां अपना नंगा नाच दिखाती हैं। लेकिन संविधान के दो मूल्यों को गंवा कर तीसरे को बचाने की दुहाई देना पाखंड बन जाता है। यही कारण है कि वे धर्मनिरपेक्षता की नहीं, कांग्रेस की रक्षा करते नजर आते हैं। ऐसे पाखंड से समाज में सांप्रदायिकता और बढ़ती है। कहने का आशय है कि नवउदारवाद के पक्ष में संविधान का उल्लंघन केवल सरकारें ही नहीं करतीं, उनके सलाहकार सचेत नागरिक भी करते हैं।   
किशन पटनायक की आशा के विपरीत सचेत नागरिकों ने 2004 के चुनाव के नतीजों से उदारीकरण को बचाने की सीख ली और कांग्रेस को 2009 में फिर से जिता कर ले आए। कांग्रेसियों के साथ संगत करते हुए उन्होंने चुनाव के बाद ही यह ‘सिद्ध’ करना शुरू कर दिया था कि 2004 का परिणाम नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ जनादेश नहीं, ‘त्याग की मूर्ति’ सोनिया गांधी के करिश्मे का कमाल है। हालांकि 2004 के आम चुनाव के बाद होने वाले मध्यावधि व विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पराजित होती रही, लेकिन सचेत नागरिक सोनिया गांधी के करिश्मे का मिथक गढ़ते रहे। इतना ही नहीं, सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाने का ‘करिश्माई’ कारनामा करने में वे आज तक जुटे हैं। 
पिछले दो सालों में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के तहत नागरिक समाज और उसके कुछ खास एक्टिवस्टिों ने कांग्रेस पर हमला बोला। लेकिन उस हमले में नवउदारवाद के खिलाफ कुछ नहीं कहा गया। जो भारतीय और वैश्विक पूंजीवादी आर्थिक संस्थाएं और कारपोरेट घराने कांग्रेस (और भाजपा) के साथ हैं, उन्होंने भ्रष्टाचार हटाने और विदेशों से काला धन वापस लाने का हल्ला मचाने वालों का भी पूरा साथ दिया। यह अकारण नहीं है कि ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की राख से पैदा’ होने वाली आम आदमी पार्टी का भ्रष्टाचार और काले धन को लेकर कारपोरेट पूंजीवाद के अभिन्न अंग एनजीओ और कारपोरेट घरानों से कोई सवाल या शिकायत नहीं हैं। गोया भ्रष्टाचार और काला धन ऐसी ताली है जो एक ही हाथ से बजती हो!    ष्   

नवउदारवाद का नंगा नाच

2002 में गुजरात में सांप्रदायिकता का नंगा नाच चला। गुजरात में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सांप्रदायिकता की लहर पर सवार होकर चुनाव जीते। सांप्रदायिकता की लहर को गुजराती गौरव की भावना में ढाल कर वे उसके अगले दो चुनाव जीत चुके हैं। लेकिन 2004 में राष्ट्रीय स्तर पर जो जनादेश आया उसमें भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। जैसा कि किशन जी ने कहा है, वह जनादेश नई आर्थिक नीतियों के भी खिलाफ था। लेकिन सोनिया गांधी और उनके सलाहकारों की सरपरस्ती में उस जनादेश के विरुद्ध पिछले दस सालों से नवउदारवाद का नंगा नाच देश में चल रहा है। एक तरफ किसानों, आदिवासियों, मजदूरों, कारीगरों, दुकानदारों, छोटे व्यापारियों व कर्मचारियों से लेकर बेरोजगार नौजवानों तक नवउदारवाद की ध्वंसलीला और दूसरी तरफ देश के संसाधनों की लूट से मालामाल कारपोरेट हाउस, नेता, नौकरशाह और मध्यवर्ग की छोटी-बड़ी सोने की लंकाएं नवउदारवाद के नाच का स्वयं प्रमाण हैं। शिक्षा जैसा गंभीर और संवेदनशील विषय भी नवउदारवाद की भेंट चढ़ चुका है। हर शहर में कुकुरमुत्तों की तरह उगे प्राईवेट कॉलिज, और विश्वविद्यालय देखे जा सकते हैं। विदेशी विश्वविद्यालय आने वाले हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के विश्वविद्यालयों को नकलची लोग नष्ट करने में लगे हैं।
शिक्षा में नवउदारवादी पैठ की एक बानगी देखी जा सकती है। पिछले दिनों हम सड़क के रास्ते पंजाब के जालंधर शहर जा रहे थे। शहर के पास लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के गेट पर एक बड़ा चमकदार होर्डिंग देखा, जिस पर देश के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी का चित्र उकेरा गया था और साथ में उनका संदेश लिखा गया था। सवारी में होने के कारण हम राष्ट्रपति महोदय का संदेश नहीं पढ़ पाए। यूनिवर्सिटी के गेट और मुख्य सड़क के पास लगा वह बोर्ड देख कर हमारे नागरिक बोध को अलबत्ता गहरा धक्का लगा। देश के राष्ट्रपति एक प्राईवेट यूनिवर्सिटी का खुलेआम विज्ञापन कर रहे हैं! शहर जाने पर पता चला कि एक बड़े हलवाई ने 2005 में वह यूनिवर्सिटी बनाई है। राष्ट्रपति महोदय उस यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में उपाधियां बांटने आए थे। 
श्री प्रणब मुखर्जी जब से राष्ट्रपति बने हैं शिक्षा की मात्रा के बजाय गुणवत्ता बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। इस संदर्भ में वे बार-बार विदेशी विश्वविद्यालयों का हवाला देते हैं। लेकिन उच्च शिक्षा की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी सरीखी दुकानों में कौन-सी गुणवत्ता उन्हें दिखाई देती है कि वे उनके विज्ञापन तक के लिए अपना इस्तेमाल होने दे रहे हैं? हमारे संवैधानिक प्रमुख की यह कैसी भूमिका है? आजकल हर प्राईवेट यूनिवर्सिटी का मालिक समारोह के बहाने राष्ट्रपति को बुलाने की जुगत में लगा रहता है। स्थानीय और केंद्रीय नेताओं व मंत्रियों को तो बुलाया ही जाता है। इसके लिए पूरा लॉबिंग तंत्र विकसित हो गया है। जल्दी ही जो विदेशी विश्वविद्यालय आने वाले हैं, उनके समारोहों में तो राष्ट्रपति महोदय जाएंगे ही। देशभक्त लोग हमें माफ करें। ऐसे राष्ट्राध्यक्ष को लेकर हमारे भीतर आदर का भाव नहीं रह पाता। 
आपको याद होगा गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ (1957) को लेकर विवाद हुआ था कि मजबूर तवायफ के नृत्य पर नाचने वाले एक शख्स में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की छवि प्रक्ष्ेपित की गई है। उस फिल्म में साहिर लुधियानवी का गीत ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं’ भी नेहरू के नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। नेहरू-प्रेमियों ने फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। बताते हैं नेहरू जी ने खुद फिल्म देखी और प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया था। यह सही है कि उस दृश्य में नेहरू की छवि आई थी। फिल्म की संरचना में उसका गहन प्रभाव पड़ता है। वहां व्यक्ति नेहरू का नहीं, नेता@प्रधानमंत्री नेहरू से फिल्मकार का आशय था। 
ध्यान दें, उसी दौर में ‘अंधेरे में’ कविता लिखी गई जो हमारे अंतर्बाह्य यथार्थ की बुरी और भयानक खबरें लेकर आती है। अगर ‘अंधेरे में’ कविता को चाक्षुस माध्यम में प्रस्तुत किया जाए तो फिल्म बनाने वाला उस दौर के बड़े नेताओं की झलक दिखा सकता है। ‘प्यासा’ और ‘अंधेरे में’ कविता में प्रस्तुत किया गया यथार्थ अंधेरे के आवरण में लिपटा है। लेकिन नवउदारवाद के हमाम में कुछ भी पोशीदा नहीं रहा है। राष्ट्राध्यक्ष के चित्र और संदेश शिक्षा को मुनाफे का सौदा बनाने वाली सरकार और मुनाफा कमाने वाले शिक्षा के व्यापारियों के विज्ञापन में इस्तेमाल हो रहे हैं। ‘अंधेरे में’ कविता में कहीं आग लगने और कहीं गोली चलने का जिक्र है। अब ऐसी खबरें आम हो गई हैं। शिक्षा संस्थानों तक में बाऊंसर और पुलिस बल तैनात कर दिए गए हैं। कोई छात्र, कर्मचारी, शिक्षक अगर जरा भी शिक्षा के बाजारीकरण का विरोध करता है तो बाऊंसर और पुलिस वाले उन पर टूट पड़ते हैं। देश की राजधानी में स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय में इस तरह की घटनाएं अक्सर होती हैं।

बच्चों के भोजन में जहर

हाल में बिहार के छपरा जिले में धर्मसती गंदमान स्कूल में विषाक्त भोजन खाने से हुई 23 बच्चों की दर्दनाक मौत पर काफी चिंता व्यक्त की गई। लाशों पर भी राजनीति की जाती है, सो वह बच्चों की लाशों पर भी की गई। मामले की जांच हुई और स्कूल के प्रिसिपल को दोषी ठहरा कर गिरफ्तार कर लिया गया है। मध्यान्ह भोजन योजना को सुधारने और सुचारू रूप से चलाने की बाबत अलग-अलग कोनों से कई सुझाव दिए गए। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि देश के नौनिहाल घर से मनपसंद पौष्टिक नाश्ता करके और दोपहर का खाना लेकर स्कूल जाएं। उसी तरह जैसे नागरिक समाज के बच्चे जाते हैं। एक उम्र तक खाने और मस्ताने की छूट देश के सभी बच्चों को होनी चाहिए। 
हम मध्यान्ह भोजन योजना के भी शुरू से खिलाफ रहे हैं। बच्चे स्कूल शिक्षा हासिल करने के लिए जाने चाहिए, भोजन करने के लिए नहीं। अगर भूख है, कुपोषण है, बच्चे स्कूल नहंी जाते हैं, उनमें सामाजिक सामरस्य बढ़ाना है, तो इसका इलाज स्कूलों में कच्चा-पक्का घटिया भोजन देना नहीं, उनके समग्र शारीरिक-मानसिक विकास के लिए समतामूलक सामजिक-आर्थिक व्यवस्था कायम करना है। 12 लाख स्कूलों में 11 करोड़ बच्चे इस योजना के तहत दोपहर का खाना पाते हैं। पहली से पांचवी कक्षा तक के बच्चों को प्रति भोजन 100 ग्राम खाद्यान्न और 6 से 8 कक्षा तक के बच्चों को 150 ग्राम खाद्यान्न प्रतिभोजन दिया जाता है। यूपीए प्रथम के साझा न्यूनतम कार्यक्रम के तहत शुरू हुई इस योजना को दस साल हो गए हैं। लेकिन बच्चों की भूख और कुपोषण की समस्या में कमी नहीं आई है। सरकारी आंकड़ों से ही इस सच्चाई की पुष्टि होती है। 
यह योजना सुप्रीम कोर्ट के 28 नवंबर 2001 के ऐतिहासिक बताए गए निर्देश पर लागू की गई थी जो उसने पीयूसीएल राजस्थान की एक याचिका पर दिया था। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश उसकी बच्चों की भूख और स्वास्थ्य के प्रति चिंता को दर्शाता है। उस समाज में यह यह बड़ी अच्छी बात है जहां बच्चों पर सबसे कम ध्यान दिया जाता हो। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि सरकारें संविधान के नीति निर्देशक तत्वों का अनुपालन कर रही हैं या नहीं। यह सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्र भी है और फर्ज भी। अगर सरकारें संविधान के नीति निर्देशों का अनुपालन करती होतीं तो इस निर्देश की जरूरत नहीं पड़ती। सुप्रीम कोर्ट को यह पता ही होगा कि उसके निर्देश के पालन से भूख और कुपोषण की गंभीर समस्या स्थायी रूप से कभी भी दूर नहीं हो पाएगी। 
इस मामले में भी सचेत नागरिक कहेंगे कि भूखे बच्चों को कुछ तो मिल रहा है; कोर्ट के निर्देश के दबाव में सरकारें कुछ तो गरीब बच्चों का भला कर रही हैं। मनरेगा के समर्थन में दिए जाने वाले तर्क से यह अलग नहीं है। कुछ लोग कह सकते हैं कि कतिपय विकसित देशों में भी कहीं-कहीं बच्चों को स्कूलों में भोजन दिया जाता है। यह तर्क भी सही नहीं है। विकसित देशों में बच्चों के पेट की भूख और कुपोषण मिटाने अथवा उन्हें स्कूल आने का लालच देने के लिए भोजन नहीं दिया जाता। भारत में भी ऐसे कुछ स्कूलों में बच्चों को भोजन दिया जाता है जहां अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं। 
जिस नवउदारवादी व्यवस्था को देश के नेता, बुद्धिजीवी और नागरिक समाज एक्टिविस्ट एकजुटता से चला रहे हैं, उसके तहत बच्चों के बीच भी विभाजन और विषमता की गहरी खाइयां खोद दी गई हैं। डॉ. लोहिया का प्रस्ताव है कि दो नागरिकों के बीच की आय@आमदनी का फर्क 10 गुना से ज्यादा नहीं होना चाहिए। अगर हमारा नागरिक समाज बच्चों के प्रति जिम्मेदार और संवेदनशील होता तो कम से कम बच्चों के बीच का अंतर न्यूनतम रखता। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश भी बच्चों के बीच समानता कायम करने के मकसद से नहीं, भूखे और कुपोषित बच्चों के प्रति दया भावना से प्रेरित है। जिस देश में कई करोड़ बच्चे कृपा पर पलें, उस देश के नेता और नौजवान महाशक्ति होने या बनने का दावा करते हों तो उसे बेशर्मी ही कहा जा सकता है।      
विभाजन और विषमता से यह सुनिश्चित होता है कि देश का वर्तमान और भविष्य उन्हीं बच्चाों का रहेगा जो भूखे ओर कुपोषित बच्चों की कीमत पर जरूरत से कई गुना ज्यादा खाते हैं। अगर हम अपने बच्चों को उनकी जरूरत और पसंद का खाना सही जगह और सही समय पर नहीं दे सकते तो इस देश को बंद कर देना चाहिए। ऐसे देश को चलाने की कोई जरूरत नहीं है जहां करोड़ों बच्चे भूख, कुपोषण और इसके चलते होने वाली बीमारियों से मर जाते हों; करोड़ों अशिक्षित रह जाते हों; करोड़ों बालमजदूर बनने के लिए अभिशप्त हों; करोड़ों अपराधी बन जाते हों; करोड़ों का यौनशोषण होता हो और लाखों हर साल गुम हो जाते हों।       

सांप्रदायिकता के हमसफर

2004 की चुनावी जीत के बाद सोनिया के सलाहकारों और सेकुलर सिपाहियों ने उन्हें त्याग के अलावा धर्मनिरपेक्षता की देवी भी घोषित कर दिया था; जिनके रहते कभी सांप्रदायिकता सिर नहीं उठाएगी। लेकिन सामने जो मंजर है, उसमें सांप्रदायिकता का नंगा नाच फिर से शुरू हो सकता है। बल्कि उसे शुरू ही मानना चाहिए। सांप्रदायिकता के नंगे नाच का ‘नायक’ मीडिया और नागरिक समाज का भी नायक है। याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरोध में किए गए अपने पहले धरने में सबसे पहले नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। उनका प्रशंसा-प्रमाणपत्र पाकर आरएसएस और मोदी उनके दिल से शुक्रगुजार हुए थे। आजकल ‘आप’ पार्टी के जो एसएमएस ‘आम लोगों’ को आ रहे हैं, उनमें ‘अन्ना हजारे के साथी अरविंद केजरीवाल’ लिखा आता है। रामदेव ने हरिद्वार में मोदी के सम्मान में संत समागम करके खुद ही कह दिया दिया कि प्रधानमंत्री के लिए उनकी पहली और अंतिम पसंद नरेंद्र मोदी हैं। अरविंद केजरीवाल इन दोनों महानुभावों का ‘इस्तेमाल’ करके@करते हुए नेता बनने चले हैं। मोदी के उभार से त्रस्त अन्ना के समर्थक धर्मनिरपेक्षतावादियों ने उनसे कहलवाया है कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को क्लिीन चिट नहीं दी है। गोया नरेंद्र मोदी अन्ना हजारे जैसों की क्लिीन चिट का भूखा बैठा है। दो साल पहले के नरेंद्र मोदी को अन्ना की प्रशंसा की जरूरत थी। अब उसका वार्तालाप अमेरिका और यूरोप से चल रहा है। अमेरिका ने कह दिया हे वे ‘अमेरिकी अभय’ के आवेदन करें। कहने का आशय है कि सांप्रदायिकता के नंगे नाच की अगली प्रस्तुति में इन सभी की संलिप्तता होगी। 
नरेंद्र मोदी के उभार पर धर्मनिरपेक्षतावादी परेशान हैं। कहते हैं मोदी का मिथक गढ़ा जा रहा है। अरे भाई अगर सोनिया गांधी को त्याग की देवी, मनमोहन सिंह को ईमानदारी का देवता और राहुल गांधी को होनहार बिरवान बताने के मिथक जनता पर थोपे जा सकते हैं तो मोदी का मिथक क्यों नहीं चलेगा? कहते हैं मोदी बिना समझे-बूझे हर मुद्दे पर बोलते-बबकारते हैं। मोदी की बोलती से शिकायत करने वालों को सोचना चाहिए कि वाचालता को जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से प्रमाणपत्र मिल चुका है। प्रत्येक नागरिक समाज एक्टिविस्ट और अपने फन का माहिर शख्स वहां जाकर जबान साफ करने के लिए उतावला था। वहां थोक में हुई अनर्गल वाचालता को इलैकट्रॉनिक मीडिया ने अपना ‘स्वर’ मिला कर कई गुणा कर दिया। वरना बबकारते तो बाल ठाकरे टाइप नेता भी रहते थे। 
हम यह कहना चाहते हैं कि मोदी इस आंदोलन की राह से होकर राष्ट्रीय सीन पर आया है। उसे रोकने की ताकत सोनिया के सलाहकारों और सेकुलर सिपाहियों में नहीं है। आज की कांग्रेस में भी नहीं है। रोकने से हमारा आशय मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने से नहीं है। न ही वे प्रधानमंत्री बन सकते हैं। ‘हिंदू राष्ट्रवादी’, ‘कुत्ते का पप्पी’, ‘धर्मनिरपेक्षता का बुरका’ जैसी जुमलेबाजी के बावजूद गुजरात के बाहर सांसद का चुनाव जीतना अभी उनके बूते का नहीं है। हमारा आशय मोदी मार्का सांप्रदायिकता को रोकने से है। बुरका वाली बात को ही ले लीजिए। 
जैसे-जैसे आम चुनाव नजदीक आते जाएंगे कांग्रेस और भाजपा के बीच  तू-तू-मैं-मैं और तेज होती जाएगी। शुरूआत को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि पहले से ही काफी नीचे गिर चुका राजनीतिक बहस का स्तर और नीचे गिर सकता है। यह भी अभी से देखा जा सकता है कि दोनों पार्टियों में कारपोरेट पूंजीवाद के समर्थन पर कोई मतभेद नहीं है। अमेरिका के सामने दोनों नतमस्तक हैं। झगड़ा वोटों का है। भाजपा को लगता है कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के आच्छद्द में मुसलमानों के वोट मार ले जाती है। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बना कर कांग्रेस को कड़ी चुनौती दे दी है। मोदी के मुकाबले कांग्रेस की तरफ से लफ्फाजी की कमान कौन सम्हालेगा, अभी तय नहीं हुआ है। वहां अभी फुटकर व्यवस्था चल रही है। कभी कोई, कभी कोई नेता-प्रवक्ता नरेंद्र मोदी के हमलों का जवाब देते हैं। कांग्रेस को शायद लगता है कि ऐसे शख्स का मिल-जुल कर ही मुकाबला किया जा सकता है। नरेंद्र मोदी गजब के लफ्फाज हैं। उनके लिए ईजाद किया गया ‘फेंकू’ शब्द उनकी ‘प्रतिभा’ के सामने कमजोर ठहरता है। आशा करनी चाहिए कि लफ्फाजी का दौर-दौरा जैसे परवान चढ़ेगा, उनके कद का कोई सही शब्द किसी कोने से निकल कर आएगा। 
संघ में सांप्रदायिक तो हर नेता होता है। लेकिन उनमें सांप्रदायिक फासीवादी कोई-कोई हो पाता है। निकट अतीत में लालकृष्ण अडवाणी के बाद नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक फासीवादी के रूप मेंं स्थापित हुए हैं। वैसे भाजपा की धार्मिक शाखा विहिप और उसकी युवा शाखा बजरंग दल के अखड़े में छोटे-छोटे कई सांप्रदायिक फासीवादी जोर करते देखे जा सकते हैं। बड़ा सांप्रदायिक फासीवादी होने के लिए कारनामा भी बड़ा करना होता है। जैसे अडवाणी ने ‘राममंदिर आंदोलन’ चला कर एक 500 साल पुरानी मस्जिद का ध्वंस कराया और उसके आगे-पीछे भड़के दंगों में हजारों निर्दोष लोगों को मरवाया। उसी तरह नरेंद्र मोदी ने ‘गुजरात कांड’ कराया। अडवाणी आज भी राममंदिर आंदोलन की याद करके भावुक हो उठते हैं। उन्हें वह आजादी के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन लगता है। उसी तरह नरेंद्र मोदी गुजरात कांड को अपने सीने पर तमगे-सा पहन कर घूमते हैं। 
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए यह सब करना जरूरी होता है। गुजरात कांड में नरेंद्र मोदी का एक-एक कारनामा अपने पक्ष में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नीयत से परिचालित रहा है। संभावना यही है कि आरएसएस ऐन मौके पर अडवाणी को ही आगे करे। लेकिन नरेंद्र मोदी के कारनामों से वह चकित और काफी खुश हुआ है। जैसे हिटलर के लाखों यहूदियों के सफाए पर गुरुजी (गोलवलकर) स्तंभित और आनंदित हुए थे! बतौर सांप्रदायिक फासीवादी नरेंद्र मोदी की प्रतिभा का कायल होने के चलते ही उसने अडवाणी के विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाने का फैसला लिया है। आरएसएस को लग गया है कि नवउदारवाद के हमाम में हिंदू राष्ट्र का सपना अभूतपूर्व रूप से जवान हो उठा है। अन्यथा वे युवक जो खाकी निक्कर खुद पहनना तो दूर, घर में वरिष्ठों के पहनने पर नाक-भौं सिकोड़ते हों, मोदी के दीवाने बने हुए हैं। 
धर्मनिरपेक्षता का आवरण ओढ़ कर बच निकलने वाली कांग्रेस को सांप्रदायिक फासीवादी नरेंद्र मोदी ने ठिकाने लगाने की मुहिम छेड़ दी है। उनका पिछले दिनों बहुचर्चित पूना का भाषण उसी मुहिम का हिस्सा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने सलाह दी है कि सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की बहस चला कर भाजपा कांग्रेस के जाल में न फंसे। लेकिन उल्टे कांग्रेस भाजपा के जाल में फंसी नजर आती है। वह खुद कह रही है कि कांग्रेस पोशीदा तौर पर सांप्रदायिक करती है, जो भाजपा की खुली सांप्रदायिकता से बेहतर है। इसे नरेंद्र मोदी का कमाल कहना चाहिए कि उसने कांग्रेस से सच उगलवा लिया।    
नरेंद्र मोदी के बयान पर यह कह कर कि ‘नंगी सांप्रदायिकता से धर्मनिरपेक्षता का बुर्का बेहतर है’, कांग्रेस ने खुद ही अपने को भाजपा की बी टीम स्वीकार कर लिया है। कांग्रेस का बयान बताता है कि धर्मनिरपेक्षता उसके लिए एक आवरण है। यानी भाजपा खुले तौर पर सांप्रदायिकता करती है और कांग्रेस उस पर धर्मनिरपेक्षता का परदा डाले रखती है। इस स्वीकारोक्ति का सीधा अर्थ है कि कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य में सच्ची आस्था नहीं है। नेहरूयुगीन कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टी थी। लेकिन उनके बाद की कांग्रेस ने सत्ता के लिए कई बार सांप्रदायिक कार्ड खेला है। उसीका नतीजा है कि आज कांग्रेस के नेता खुद कह रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस के लिए महज आवरण है। वे इस आवरण के चलते कांग्रेस को भाजपा से बेहतर बता रहे हैं। 
आरएसएस एक सांप्रदायिक संगठन है और भाजपा उसका राजनीतिक मंच है। भाजपा की विचारधारा और नेता आरएसएस से आते हैं। लिहाजा, सांप्रदायिकता भाजपा की राजनीति का मूल आधार है। नरेंद्र मोदी ने ‘धर्मनिरपेक्षता का बुर्का’ कह कर धर्मनिरपेक्ष संविधान के प्रति गहरी हिकारत व्यक्त की है। साथ ही अल्पसंख्यक मुसलमानों के प्रति भी, क्योंकि बुर्का मुस्लिम महिलाओं का लिबास है। कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता क आवरण को ही पर्याप्त बता रही है और उस नाते भाजपा से बेहतर होने का दावा कर रही है। बहस में पड़ी ये दोनों पार्टियां यह भूल रही हैं कि धर्मनिरपेक्षता संविधान का एक मूलभूत मूल्य है और देश की प्रत्येक राजनीतिक पार्टी की उसमें संपूर्ण निष्ठा अनिवार्य है। देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों की निष्ठा धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य में नहीं है, यह समाज और भारतीय राष्ट्र के लिए गंभीर समस्या है। लेकिन न मीडिया, न सुप्रीम कोर्ट, न निर्वाचन आयोग और न ही देश के जागरूक नागरिक इस संवैधानिक विचलन का संज्ञान ले रहे हैं। कुछ महीने पहले नरेंद्र मोदी द्वारा हरिद्वार स्थित बाबा रामदेव के आश्रम में धर्म की राजनीति करने पर हमने सोशलिस्ट पार्टी की ओर निर्वाचन आयोग को एक पत्र लिख कर उसका संज्ञान लेने का निवेदन किया था। लेकिन आज तक उस पत्र का कोई जवाब निर्वाचन आयोग ने नहीं दिया है।
सांप्रदायिकता और नवउदारवाद के कीटाणु एक-दूसरे पर पलते हैं। आपने देखा ही कि सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की बहस के बीच कई क्षेत्रों में एफडीआई का प्रवेश हो गया है। खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश के पहले से हुए निर्णय में ‘कड़े’ प्रावधानों को खत्म कर दिया गया है। नागरिक समाज से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक किसी ने  कहीं से कोई विरोध नहीं किया। यह नवउदारवाद (कांग्रेस) और सांप्रदायिकता (भाजपा) और उलटे (वाइसवरसा) दोनों की जीत है। मुख्यधारा राजनीति और नागरिक समाज का समवेत नवउदारवाद का नाच आगे जारी रहना है। उसमें बीच-बीच में सांप्रदायिकता भी अपना प्रदर्शन करती है तो उनमें किसी को ऐतराज नहीं है।     
कहां किशन पटनायक को आशा थी कि जनादेश की रोशनी में सचेत नागरिक नवउदारवादी शक्तियों को पीछे धकेलते, कहां जनादेश को पीछे धकेल कर नवउदारवाद का वर्चस्व कायम हो चुका है। सांप्रदायिकता के नंगे नाच को जनता रोक देगी, लेकिन पिछले दस सालों से जारी नवउदारवाद के नंगे नाच का वह क्या करे? किशन जी होते तो बुद्धिजीवियों की तरह सचेत नागरिकों से भी निराश होकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को कसते कि वे अपनी भूमिका ज्यादा गहराई और मुस्तैदी से निभाएं।


Wednesday, July 3, 2013

दिल्ली विश्वविद्याल - पतन की पड़ताल : प्रेम सिंह


(यूं तो भूमंडलीकरण के लगातार हमलों का सबसे ज्यादा असर हमारी शिक्षा व्यवस्था पर ही हुआ है, और सत्ता प्रतिष्ठानों ने हर उस फैसले को अमली जामा पहनाया है, जो छात्रों के हितों की अनदेखी करता रहा है। लेकिन बावजूद इसके समाज के हर तबके से निकलकर कुछ संघर्षशील युवा अपनी साधारण हैसियत में भी विश्वविद्यालय की रौनक बरक़रार रखे हुए थे। इन छात्रों को ना तो दिल्ली की चकाचौंध रोक पाई थी। ना ही केन्द्र सरकार के ग़रीब विरोधी फैसले। अब इन छात्रों की संख्या को कम करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय ने चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम शुरू किया है। जो ना केवल छात्र विरोधी है बल्कि संविधान के मूल्यों के भी खिलाफ है। इस ज्वलंत विषय पर डॉ प्रेम सिंह ने इस लेख के जरिए ना केवल अपनी पीड़ा का इज़हार किया है , बल्कि हमारे जैसे युवाओँ को इस तंत्र से लोहा लेने का संबल भी दिया है। )


संकट में संस्थान

दिल्ली विश्वविद्यालय भारत के बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है। इसकी स्थापना 1922 में हुई थी। स्थापना के वक्त इसके तहत केवल तीन कॉलिज - सेंट स्टीफेंस कॉलिज (स्थापना 1881), हिंदू कॉलिज (स्थापना 1899) और रामजस कॉलिज (स्थापना 1917 ), दो संकाय - कला और विज्ञान - तथा 750 छात्र थे। तब से अब तक दिविवि ने लंबी यात्रा तय करते हुए देश के अग्रणी विश्वविद्यालय का मुकाम हासिल किया है। आज दिविवि के तहत करीब 80 कॉलिज, 16 संकाय, 86 विभाग हैं, जिनमें करीब डेढ़ लाख नियमित छात्र स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते हैं। दिविवि स्कूल आॅफ ओपन लर्र्निंग (एसओल), जिसे पहले स्कूल आॅफ कोरेसपोंडेस कहा जाता था, के माध्यम से करीब तीन लाख छात्रों को पत्राचार से स्नातक और स्नाताकोत्तर की शिक्षा प्रदान करता है। अनौपचारिक शिक्षा ग्रहण करने वाले इन सब छात्रों के लिए पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराए जाने के अलावा अध्यापन की भी व्यवस्था है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह अकेला विश्वविद्यालय है जो अपने पाठ्यक्रम, अध्यापन और परीक्षा की गुणवत्ता के चलते पूरे देश के छात्रों के आकर्षण का केंद्र है। दिविवि से स्नातक करना सम्मान की बात मानी जाती है और यहां से हासिल की गई डिग्री की देश-विदेश में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा है।  
पिछले कुछ सालों से दिल्ली विश्वविद्यालय दोहरे संकट का सामना कर रहा है। पहला, खुद दिविवि का आंतरिक संकट है, जिसके तहत न केवल उसकी महत्वपूर्ण संस्थाएं (अकादमिक मामलों में सर्वोच्च विद्वत परिषद और निर्णयों के लिए सर्वोच्च कार्यकारी परिषद) अपनी निर्धारित भूमिका और महत्व खोते जा रहे हैं। इसका असर विभागीय परिषदों, विभिन्न संकायों की बैठकों और कॉलिजों की स्टाफ काउंसिलों पर भी पड़ा है। कुलपतियों द्वारा अहम फैसले अलोकतांत्रिक ढंग से, जल्दबाजी में, असहमति का निरादर करते हुए लिए जाते हैं। शिक्षक संगठन डूटा और छात्र संगठन डूसू का दिविवि में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। शिक्षकों और छात्रों के हितों के लिए संघर्ष करने वाले इन संगठनों का भी अवमूल्यन हुआ है। जब समाज के अन्य क्षेत्रों में स्वतंत्र सोच और असहमति के लिए जगह सिकुड़ती है तो लोग विश्वविद्यालयों की तरफ देखते हैं और वहां से प्रेरणा पाते हैं। दिविवि में ऐसा माहौल बन चुका है कि कुलपति ही नहीं, बहुत-से शिक्षक भी विश्वविद्यालय के अर्थ और अवधारणा के प्रति जागरूक प्रतीत नहीं होते। 
दिविवि के इस आंतरिक संकट को न तो नवउदारवादी दुष्प्रभावों के मत्थे मढ़ा जा सकता है, न नेताओं और नौकरशाही के हस्तक्षेप के। यह कहना तसल्ली की बात नहीं मानी जा सकती कि राजनीतिक हस्तक्षेप करके नेता कमजोर लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठा देते हैं; मंत्रालय व यूजीसी के नौकरशाह बेजा दखलंदाजी करते हैं; कई बार उन्हें कुलपति बना कर थोप दिया जाता है; और ऊपर से थोपे गए लोग विश्वविद्यालय की संस्थाओं और नियम-कायदों को धता बता कर मनमाने ढंग से सरकार का एजेंडा लागू करते हैं। सीधी बात यह है कि अगर दिविवि का निर्धारित आंतरिक ढांचा हर स्तर पर मजबूत हो तो ऊपर से थोपे गए किसी व्यक्ति की मनमानी ज्यादा देर नहीं चल सकती। शिक्षकों की भूमिका विश्वविद्यालय के आंतरिक ढांचे के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण होती है। सभी संस्थाओं और गतिविधियों में वे शामिल होते हैं। अगर शिक्षक मजबूत और अपनी भूमिका के प्रति गंभीर होंगे तो आंतरिक ढांचा कमजोर नहीं हो सकता और ऊपर से थोपे गए कमजोर या अवांछित लोग समय काट कर या समय से पहले विदा हो जा सकते हैं। शिक्षकों की मजबूती से सबक लेकर नेता और नौकरशाह अपना रवैया बदलने के लिए बाध्य भी हो सकते हैं। यह तर्क कि कुलपतियों व नौकरशाहों का विरोध करने से शिक्षकों के काम रुक जाते हैं, कतई वाजिब नहीं कहा जा सकता। शिक्षकों का मूलभूत काम अध्यापन है, अगर वही बिगड़ रहा हो तो उनकी अपनी तरक्की और परियोजनाएं लेने का काम आगे बढ़ता भी रहे तो छात्रों को उससे कोई फायदा नहीं होता। यह चर्चा हमने इसलिए की है कि राजनीतिक और नौकरशाही के हस्तक्षेप से पैदा होने वाली विश्वविद्यालय के नियमन संबंधी समस्याओं को ही कुछ विद्वान उच्च शिक्षा का संकट बता देते हैं। 
दिविवि का दूसरा संकट उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और उपलब्धता को लेकर है। अभी तक दिविवि में राष्ट्रीय स्तर पर लागू 10़2़3 के तहत बीए, बीएससी, बीकॉम के आॅनर्स और प्रोग्राम की पढ़ाई होती है। पाठ्यक्रम का स्वरूप ऐसा है कि उत्तीर्ण छात्र विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग सकते हैं अथवा@और स्नातकोत्तर@शोध के लिए आगे पढ़ाई जारी रख सकते हैं। इनमें से कोई न कोई कोर्स पढ़ने के लिए बहुत-से विदेशी छात्र भी दिविवि आते हैं। दिविवि के कुछ कॉलिज मेडिकल, इंजीनियरी (दिविवि के इंजीनियरिंग कॉलिज को कुछ वर्ष पहले अलग कर दिया गया), नर्र्सिंग, होम साइंस, एप्लाइड सांइस, बीएड व बीएलएड, पत्रकारिता आदि व्यावसायिक कोर्स कराते हैं। अलग संकायों में प्रबंधन और लॉ भी पढ़ाए जाते हैं। स्नातक अथवा स्नातकोत्तर पढ़ाई करते हुए भारतीय और विदेशी भाषाओं के सर्टिफिकेट व डिप्लोमा कोर्स भी उपलब्ध हैं। इच्छुक छात्र कुछ भाषाओं में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री भी कर सकते हैं। 
इन कोर्सों की गुणवत्ता और उपलब्धता निरंतर बढ़ती रहे, इसके प्रयास होते रहना जरूरी है। वैसे प्रयासों को ही उच्च शिक्षा में सही सुधार कहा जाएगा। लेकिन नवउदारवादी नीतियों के तहत ‘सुधार’ की वकालत करने वाले उच्च शिक्षा के हर कोर्स को राजगारोन्मुख@बाजारोन्मुख बनाने पर तुले रहते हैं। दूसरे, उनका आग्रह होता है कि दिविवि का पाठ्यक्रम और परीक्षा व्यवस्था ऐसी हो कि यहां के छात्र पढ़ाई के दौरान और पढ़ाई के बाद विदेश, विशेषकर अमेरिका में अपनी पढ़ाई सुभीते से जारी रख सकें। दूसरे शब्दों में, वे नकल को सुधार का नाम देते हैं। दिविवि में तीन साल पहले थोपे गए समेस्टर सिस्टम और इस अकादमिक सत्र से थोपे गए चार साला स्नातक प्रोग्राम (एफवाईयूपी) की यही सच्चाई है। और यही दिविवि में उच्च शिक्षा का असली संकट है।
सेमेस्टर प्रणाली और एफवाईयूपी के तहत उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को ही चोट नहीं पहुंचाई गई है, शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों के बीच व्यवस्थित तरीके से भेदभाव की नींव डाली गई है। एक वाक्य में, यह प्रोग्राम पूरी तरह से छात्र विरोधी है। विशेष तौर पर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को दो साल बाद डिप्लोमा लेकर विश्वविद्यालय से बाहर निकलना होगा। जिस तरह से स्कूल में अलग-अलग स्ट्रीम लेने वाले सभी छात्रों को 11 फाउंडेशन कोर्स अनिवार्य रूप से पढ़ने हैं, हो सकता है उनमें बहुत-से बिना डिप्लोमा के ही बाहर हो जाएं। इस प्रोग्राम के तहत शारीरिक तौर पर विकलांग छात्रों की पढ़ाई बुरी तरह बाधित होगी। कोर्ट ने भी इस बाबत दिविवि को आगाह किया है। उच्च शिक्षा की प्राप्ति के रास्ते में पहले से ही कई तरह की बाधाओं से घिरी विशेष तौर पर गांव-कस्बों की लड़कियों और मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काफी पिछड़ा है, के लिए उच्च शिक्षा का रास्ता और दुर्गम हो जाएगा। आॅनर्स की डिग्री हासिल करने के इच्छुक छात्रों का एक साल अतिरिक्त लगेगा, जिसका उनके अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। हालांकि उन्हें भी जो ज्ञान मिलेगा वह तीन साला आॅनर्स कोर्स से कमतर होगा। यह प्रोग्राम भेदभाव की नींव पर स्थित है, यह इसीसे स्पष्ट हो जाता है कि एसओएल में पढ़ने वाले करीब 3 लाख छात्रों को इसके लायक नहीं समझा गया है। विद्वत परिषद के पूर्व सदस्य और एसओएल के शिक्षक रहे वीपी जैन ने ठीक ही इन लाखों छात्रों को आधुनिक एकलव्यों की संज्ञा दी है। 
कुलपति का यह कहना कि पहले या दूसरे साल में पढ़ाई छोड़ देने वाले 30 प्रतिशत छात्रों पर रोक लगेगी गैर-जिम्मेदाराना और भ्रामक है। अब दो साल बाद उन्हें अनिवार्य रूप से कॉलिजों से बाहर कर देने की व्यवस्था कर दी गई है। जबकि जरूरत इस बात की है कि दाखिला लेने वाला एक भी छात्र न पढ़ाई छोड़े, न फेल हो।  क्योंकि फेल छात्र नहीं, शिक्षक और संस्थान होते हैं। दरअसल, इस प्रोग्राम का संदेश साफ है - जो कमजोर हैं, वे डिप्लोमा लेकर छोटी नौकरी की तलाश करें ताकि बड़ी नौकरियां बड़े लोगों के बच्चों को मिलती रहें। इस प्रोग्राम से सबसे ज्यादा अन्याय इस साल दाखिला लेने वाले साधारण हैसियत के छात्रों के साथ हुआ है। उनमें और उनके अभिभावकों में असमंजस और अनिश्चितता की स्थिति है कि दिविवि की डिग्री का उनका सपना पूरा होगा या नहीं? 
यह छात्रों के प्रति हद दर्जे की गैरजिम्मेदारी है कि एफवाईयूपी 24 दिसंबर 2012 को विद्वत परिषद की तीन दिन के नोटिस पर बुलाई गई विशेष बैठक में पहली बार रखा गया और पारित हो गया। अगले दिन कार्यकारी परिषद में भी यह औपचारिकता पूरी कर ली गई। विरोध का कोई मूल्य था ही नहीं। विद्वत परिषद और कार्यकारी परिषद के जिन चुने गए सदस्यों ने इस प्रोग्राम का समर्थन किया, वे अगर वैसा न भी करते तब भी वह पारित होता। सूचना के अनुसार उसके कुछ दिन पहले नवंबर में ‘उत्सवप्रिय’ कुलपति ने एफवाईयूपी पर चर्चा करने के लिए विशेष तौर पर बुलाए गए 10 हजार छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों का एक मेला लगाया था! 5 मार्च 2013 को विभिन्न विभागों को 15 दिनों में नया पाठ्यक्रम तैयार करके देने के लिए कहा गया जिसे एक महीना और बढ़ाया गया। उसी तरह से आनन-फाानन में समाज विज्ञान और विज्ञान संकायों की बैठकें आयोजित की गईं और कोर्स कमेटी वगैरह की औपचारिकताएं निभाई गईं। 
इस मामले में सबसे ज्यादा चिंता की बात है कि पाठ्यक्रम आधा-अधूरा है और छात्रों के लिए पाठ्य सामग्री नहीं है; न शिक्षक। पिछले करीब 4 साल से दिविवि में शिक्षकों की नियुक्तियां बंद हैं, जबकि 4 हजार पद खाली पड़े हैं। गोया सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षकों की नियुक्तियां रोके रखना जरूरी हो! नए पाठ्यक्रम को पढ़ाने के लिए शिक्षकों को कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। कुलपति और उनके समर्थकों की बस एक ही टेक है - ‘अमेरिका में ऐसा होता है’। वे यह भी सुनने और सोचने के लिए तैयार नहीं हैं कि अमेरिका सहित किसी भी पूंजीवादी देश में शिक्षा संबंधी बदलाव जैसा गंभीर काम इस फूहड़ ढंग से करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।   
ऐसे में यह स्वाभाविक है कि विवादास्पद एफवाईयूपी को लेकर पिछले कुछ महीनों से लगातार बहस चल रही है। बहस एकतरफा है, जो इस प्रोग्राम का विरोध करने वाले शिक्षकों, छात्रों, शिक्षाविदों, विद्वानों और नागरिक समाज के गणमान्य व्यक्तियों की तरफ से चलाई जा रही है। प्रोग्राम को लागू करने वाले - दिविवि के कुलपति व उनकी टास्क फोर्स और दोनों मानव संसाधन मंत्री - किसी भी तर्क का जवाब न देकर महज ताकत के ‘तर्क’ से अपने फैसले पर अडिग हैं। राष्ट्रपति, जो दिविवि के विजिटर हैं, और प्रधानमंत्री, जो संसद के सर्वोच्च नेता हैं, पूरे प्रकरण में चुप्पी साधे हुए हैं। जबकि देश के कई प्रतिष्ठित विद्वान उन्हें पत्र लिख चुके हैं और मिल कर यह प्रोग्राम कम से कम इस साल स्थगित करने की प्रार्थना कर चुके हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का यह रुख दर्शाता है कि यूपीए सरकार उच्च शिक्षा में नवउदारवादी एजेंडा लागू करने का निर्णायक फैसला कर चुकी है। सरकार का फैसला यह है कि नवउदारवादी एजेंडे के तहत जिस तरह अर्थव्यवस्था पहले से आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को और मजबूत बनाने के लिए बनाई जाती है, शिक्षा व्यवस्था को भी उसी तरह बनाना है। पिछले दो दशकों में यह काम स्कूली और व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था में काफी तेजी से किया गया है। अब सार्वजनिक क्षेत्र के उच्च शिक्षा संस्थानों की बारी है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में यह एजेंडा अच्छी तरह से रखा गया है। इस प्रोग्राम के हिमायती मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर ने खुद कहा है कि चार साला स्नातक प्रोग्राम नहीं होने के चलते यहां के छात्रों को अमेरिका में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। बताने की जरूरत नहीं कि यहां के कौन-से और  कितने छात्र आगे पढ़ने अमेरिका जाते हैं? 
एफवाईयूपी उच्च शिक्षा के नवउदारवादीकरण की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है। जाहिर है, दिल्ली विश्वविद्यालय के बाद इसे अन्य विश्वविद्यालयों में लागू किया जाएगा। कुलपति सरकार का यह काम करा ले गए तो इसमें दिविवि की आंतरिक कमजोरी सबसे बड़ा कारण रही है, जिसका हमने ऊपर जिक्र किया है। जो शिक्षक सोचते  हैं कि वे कुलपति का साथ देकर कांग्रेस और भाजपा को बचा रहे हैं, वे किंचित गंभीरता से सोचेंगे तो पाएंगे कि वास्तव में वे अपने स्वत्व और पेशे की गरिमा को गंवा रहे हैं। हम यह भी कहना चाहेंगे कि इस मामले में अमेरिका का हव्वा ज्यादा नहीं खड़ा करना चाहिए, न ही उसे दोष देना चाहिए। भारत के ज्यादातर मध्य और उच्च मध्यवर्ग के भीतर बैठा अमेरिका सरकारों को यह सब करने की छूट और सहयोग देता है। देश में धड़ल्ले से चल रहा नवसामंतवाद और नवसाम्राज्यवाद का गठजोड़ शून्य में नहीं स्थित है। नवउदारवाद के खिलाफ संघर्ष को कामयाब बनाना है तो भीतर बैठे अमेरिका को विदा करना होगा।

कुल डुबाने वाले कुलपति

एक तरफ, खासकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों के बारे में, स्वायत्तता का तर्क दिया जाता है। लेकिन उसके समानांतर यह धारणा भी चलती है कि कुलपति वही करते हैं जो सरकारें चाहती हैं। किसी विषय पर निर्णय लेने के लिए बनी विश्वविद्यालय की अधिकृत संस्थाओं और निर्धारित प्रावधानों की अनदेखी करना अथवा उनका उल्लंघन करना कुलपतियों के लिए इसीलिए संभव होता है। आम धारणा है कि राज्य विश्वविद्यालयों से लेकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों तक कुलपतियों के चयन में राजनीतिक पैरवी अथवा@और मोटी रकम चलती है। इस तरह से नियुक्त होने वाले कुलपति अपनी ‘सत्ता’ दिखाने और ऊपर के आकाओं को खुश रखने के लिए पद से जुड़ी गरिमा और जिम्मेदारी की परवाह न करते हुए नियम-कायदों का दुरुपयोग करते हैं। 
हम यहां थोड़ी चर्चा इस बात पर करना चाहते हैं कि मंत्री और सरकार के आदेश पर काम करने वाले कुलपतियों में पहले से ही कुछ खास ‘गुण’ विद्यमान होते हैं। बल्कि उनके चयन में वैसे गुणों का निर्णायक योगदान होता है। यह नवउदारवाद का दौर है। भारत के शासक वर्ग की खूबी यह है कि वह संविधान की शपथ खाकर उसकी संकल्पना और विचारधारा के पूरी तरह उलट नवउदारवादी नीतियों को हर क्षेत्र में लागू करता जा रहा है। नवउदारवादी नीतियों को उच्च शिक्षा में लागू करने के लिए सरकारें कोशिश करती हैं कि नवउदारवादी विचारधारा के गुलाम लोग कुलपति नियुक्त किए जाएं। पिछले कुछ वर्षों से तो उनके सामने शर्त रख दी जाती है कि उन्हें नवउदारवादी एजेंडा लागू करना है। 
ऐसे कुलपतियों, जिनके पास अपना कोई सोच और सपना नहीं होता, की कार्यशैली और व्यवहार की विचित्रता देखने लायक होती है। दिविवि के इसके पहले कुलपति, जिन्होंने सेमेस्टर सिस्टम थोपा था, बीज बेच कर किसानों की जान खरीदने वाली मोंसेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ हेलमेल रखने वाले हैं। उन्हें एप्लाइड सांइस, मैनेजमेंट और वित्तीय अध्ययन से जुड़े विषयों को छोड़ कर, विशेषकर मानविकी और सोशल सांइस के विषय निरर्थक लगते हैं। कुलपति की हैसियत से वे सरेआम कहते थे कि जो विषय बाजार में खड़ा नहीं हो सकता, उसे विश्वविद्यालय में पड़े रहने का अधिकार नहीं है। विद्वत परिषद, कार्यकारी परिषद व यूजीसी को गलत सूचना देने अथवा गुमराह करने में उन्हें कोई नैतिक बाधा नहीं होती थी। उनके अपने शोध पर पाइरेसी का आरोप लगा तो उन्होंने ‘घर की’ जांच समिति बना कर अपने को पाक-साफ सिद्ध कर लिया। आपको याद होगा दिविवि के फिजिक्स विभाग की तरफ से कबाड़ में परमाणु की छड़ें बेची गई थीं जिससे हुई दुर्घटना में एक-दो लोग मारे गए थे और कुछ बुरी तरह घायल हुए थे। सारा मामला सामने आने के बावजूद कुलपति ने काफी दिनों तक पुलिस को यह नहीं बताया कि परमाणुयुक्त कबाड़ बेचने का काम दिविवि ने किया था। पुलिस ने खुद ही कबाड़ के स्रोत का पता लगाया। कबाड़ बेचने के लिए बनी फिजिक्स विभाग की कमेटी और कुलपति उस जानलेवा दुर्घटना के लिए सीधे जिम्मेदार थे। लेकिन नवउदारवादी ‘कवच’ के चलते कुलपति का बाल भी बांका नहीं हुआ।   
अपने कार्यकाल में उन्होंने हिंदी विभाग के दो प्रोफेसरों को यौन उत्पीड़न के आरोप से इसलिए पूरा बचा लिया क्योंकि उन्होंने सेमेस्टर सिस्टम लागू करने में उनका और सरकार का पूरा साथ दिया था। जबकि उसी मामले में आरोपित एक प्रोफेसर को उन्होंने जांच समिति की रपट के परे जाकर बर्खास्त करने का फैसला लिया था। उनके द्वारा बचाए गए दोनों प्रोफेसरों पर दिल्ली हाई कोर्ट में पीड़िता की तरफ से मुकदमा दायर है। वर्तमान कुलपति को पीड़िता ने स्वयं मिल कर यह बताया कि पिछले कुलपति द्वारा बचाए गए प्रोफेसरों पर उसने हाई कोर्ट में केस दायर किया है जो स्वीकृत हो गया है। उसने कुलपति से यह भी प्रार्थना की कि वे आरोपित प्रोफेसरों को नई बनने वाली टीम में न रखें। लेकिन कुलपति ने बिना किसी नैतिक हिचक के दोनों को अपनी टीम में रखा और आज भी दोनों उनके सबसे ज्यादा विश्वास भाजन हैं। यह उल्लेख हमने इसलिए किया है कि जो नवउदारवादी एजेंडा को थोपने में आंख मूंद कर सरकार का सहयोग करते हैं, उन पर नियम-कायदे और नैतिकता के बंधन लागू नहीं होते। बल्कि कपिल सिब्बल जैसे मंत्रियों के वे रातोंरात अत्यंत चहेते हो जाते हैं। 
विचित्रता में वर्तमान कुलपति पिछले कुलपति से काफी आगे हैं। वे कभी ‘मॉडर्न डे विक्रमादित्य’ बन कर दफ्तरों और विभागों में छापामारी करते हैं, कभी दिविवि के चिन्ह हाथी को साक्षात घुमाते हैं, कभी छात्रों और अभिभावकों को इक्ठ्ठा करके रंगारंग शो करते हैं, बाकायदा दरबार लगा कर  तरह-तरह के पद, पदवियां, पुरस्कार, परियोजनाएं आदि बांटते हैं, विश्वविद्यालय के संचालन के लिए बनी निश्चित संस्थाओं के बावजूद अलग से ‘टास्क फोर्स’ रखते हैं, वे डूटा को न मानते हैं न उसके प्रतिनिधियों से मिलते हैं और, मजेदारी यह है, मौका बेमौका अपने भाषणों में गांधी का बेतुका उल्लेख करते हैं। हमें कई विदेशी विश्वविद्यालय के कुलपतियों को सुनने का मौका मिला है। अपने संबोधन में वे हमेशा यथातथ्य बात रखते हैं और किसी चिंतक का सामान्य संबोधन अथवा साक्षात्कार में कभी उल्लेख नहीं करते। पिछले कुलपति की तरह उच्च शिक्षा पर वर्तमान कुलपति के भी ‘मौलिक’ विचार हैं, जो कुलपति बनने से पहले कहीं पढ़ने-सुनने को नहीं मिलते। पिछले कुलपति की तरह ही इनकी अमेरिकापरस्त ‘आधुनिकता’ का एक छोर घोर जातिवाद से बंधा होता है। 
फ्रायड की दमित कुंठाओं के विस्फोट और युंग की अहम प्रतिस्थापन की बलवती चेष्टा के सिद्धांतों के आधार पर इन जैसे महोदयों का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन काफी रोचक हो सकता है। यहां उसका अवसर नहीं है। हालांकि इतना कहा जा सकता है कि सत्तर के दशक के अंत तक भारतीय राजनीति और समाज में समता और स्वतंत्रता के संवैधानिक मूल्य केंद्र में बने रहे। स्वाभाविक है, उस माहौल में विषमता और गुलामी के पक्षधरों की इच्छाएं दमित रह जाती थीं। वे झींकते थे, लेकिन माहौल के दबाव में चुप रहना पड़ता था। समता और स्वतंत्रता की जगह विषमता और गुलामी के दर्शन को केंद्र में ले आने वाले पिछले दो दशकों के नवउदारवादी दौर में ऐसे लोगों की दमित इच्छाएं खुल कर सामने आ गई हैं। उन्हें कोई पद मिल जाए तो अपनी नजरों में बड़े से बड़े विद्वान से महान बन बैठते हैं। उनके साथ जुटने वाले बिलो मीडियोकर लोग भी अपने कुछ न कुछ महान होने का गुमान पाल लेते हैं। यह बड़ी विचित्र टीम बनती है, जो कहती है प्रोफेसर यशपाल, अनिल सदगोपाल, रोमिला थापर आदि कहां के विद्वान हैं?          

बजारवाद का पाठ

अंग्रेजी विभाग के अवकाश प्राप्त शिक्षक प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी ने एफवाईयूपी के समर्थन में ‘टाईम्स आॅफ इंडिया’ में ‘इज डेल्ही यूनिवर्सिटी डाईंग?’ शीर्षक लेख लिख कर  अपने को इस टीम के साथ जोड़ा तो हमें आश्चर्य और अफसोस हुआ। लेख में उनके पास कोई वाजिब तर्क नहीं है। शायद वे भी जानते हैं कि उन्होंने एक भर्ती का लेख लिखा है। फिर भी हम उनके लेख के बहाने कुछ चर्चा करना चाहते हैं। यह प्रोग्राम लागू करने के लिए दिविवि के कुलपति ने धक्काशाई और लॉबिंग का रास्ता अपनाया है। उनकी धक्काशाई और लॉबिंग इसलिए कामयाब हो गई क्योंकि कांग्रेस सरकार, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा और सेंट स्टीफेंस कॉलिज से पढ़े अथवा वहां पढ़ाने वाले बड़े लोगों की जमात उसमें शामिल है। कुलपति ने अपने समर्थकों की एक टास्क फोर्स भी बनाई हुई है, जिसके सदस्य खुद को इस निर्णय का कर्ता@समर्थक मान कर खुश हैं। वे कुलपति और एफवाईयूपी के बचाव में कहते हैं कि विचारधारा-विशेष के लोग ही इस बदलाव का विरोध कर रहे हैं। यह बात बहुत जोर देकर फैलाई गई। गोया समर्थन करने वालों की कोई विचारधारा नहीं है! एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारधाराएं अलग-अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन संविधान हम सबकी विचारधारा है, जिसमें समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता तीन मूलभूत मूल्य निहित हैं। यह ठीक है कि एफवाईयूपी के समर्थक वामपंथी विचारधारा को नहीं मानते, लेकिन क्या वे संविधान की विचारधारा को भी नहीं मानते? शिक्षा से लेकर सुरक्षा तक, हर क्षेत्र को नवसाम्राजयवादी गुलामी के शिकंजे में डालने वाले इस तरह के फैसले क्या संविधानसम्मत हैं? गांधी और टैगोर जैसे शिक्षा के मौलिक चिंतकों के देश में क्या नवाचार के नाम पर अमेरिका की छिछली नकल करना नौनिहालों के साथ न्याय करना है? शिक्षा जैसे गंभीर व संवेदनशील विषय को लेकर धक्काशाई और लॉबिंग क्या हमारी गिरावट को नहीं दर्शाता है? इन सवालों पर कुलपति के समर्थक नहीं सोचेंगे, लेकिन क्या हरीश त्रिवेदी भी नहीं सोचेंगे?  
हरीश त्रिवेदी अपने लेख में यह तर्क देते हैं कि सेमेस्टर प्रणाली लागू किये जाते वक्त भी इसी तरह का विरोध हुआ था, लेकिन आज सेमेस्टर प्रणाली लागू है और चल रही है। बेहतर होता कि यह तर्क देते वक्त हरीश त्रिवेदी यह भी बताते कि सेमेस्टर प्रणाली लागू होने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम निर्माण, अध्यापन और परीक्षा प्रक्रिया की क्या स्थिति बन गई है? वे हाल में रिटायर हुए हैं और उन्हें सारी हकीकत मालूम है। जैसा कि एफवाईयूूपी लागू करने के लिए किया गया है, सेमेस्टर प्रणाली लागू करते वक्त भी फास्टफूड की तरह पाठ्यक्रम तैयार किए गए थे। उसमें स्नातकोत्तर  पाठ्यक्रम भी शामिल थे जहां पहले सेमेस्टर सिस्टम लागू किया गया। पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया में वरीयता और विषय की विशेषज्ञता को पूरी तरह से दरकिनार करके सारा काम किया गया। छात्रों तक समय से पाठ्यक्रम पहुंचे ही नहीं, न ही वे पुस्तकें जुटा पाए। आज तक स्नातक से लेकर स्नातकोत्तर तक छपा हुआ पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं है, जैसा पहले होता था। (अगर किसी विभाग के पास हो तो कृपया अवश्य बताएं) स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र बनाने में भी वही रवैया रहता है। परीक्षा विभाग से हटा कर सारा काम विभागों को सौंप दिया गया है। इसके चलते दिल्ली विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रक्रिया की कोई साख नहीं बची है।  
सेमेस्टर प्रणाली लागू होने के बाद से दिविवि में शिक्षण कार्य अंतिम पायदान पर चला गया है। शिक्षकों का ज्यादातर समय कक्षाएं पढ़ाने से इतर कामों में बीतता है। शिक्षकों, जिनके अध्यापन के बल पर दिविवि भारत का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय कहलाया है, पिछले दो कुलपतियों के कार्यकाल में उन्हें नीचा दिखाने की लगातार कोशिशें की जाती रही हैं। इसे अफसोसनाक ही कहा जाएगा कि एफवाईयूपी पर दिविवि के लगभग सभी प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष, डीन, प्रिंसिपल, कॉलिजों के ज्यादातर शिक्षक या तो चुप हैं या उदासीन। डूटा में कांग्रेस और भाजपा के शिक्षक नेता कुलपति के साथ हैं। ऐसा लगता है दिविवि का शिक्षक समुदाय कुलपति की दाब में आकर अपने को मीडियोकर मोड में ढालने को तैयार हो गया है। आशा की जानी चाहिए कि यह स्थिति ज्यादा देर तक नहीं रहेगी।
परीक्षा की हालत यह है कि एक सप्ताह किसी कॉलिज में अतिथि शिक्षक के तौर पर कुछ कक्षाएं पढ़ाने वाले ‘शिक्षक’ बड़ी संख्या में उत्तर-पुस्तिकाएं जांचते हैं। तदर्थ शिक्षक तो जांचते ही हैं। छात्रों को संतुष्ट रखने के लिए विश्वविद्यालय के निर्देश हैं कि सबको खूब अंक दिए जाएं। पिछले तीन-चार सालों से यह हो रहा है। एफवाईयूपी लागू होने के बाद छात्रों के तुष्टिकरण का यह काम और तेजी से होगा। पतन की पड़ताल में अगर और नीचे उतरा जाएगा तो पाठकों को विश्वास करना मुश्किल होगा कि देश के मूद्र्धन्य विश्वविद्यालय का नवउदारवादी नवाचारियों ने क्या हाल बना दिया है? 
दिल्ली विश्वविद्यालय पूरे देश के छात्रों और अभिावकों के आकर्षण का केंद्र इन्हीं तीन प्रमुख कारणों - पाठ्यक्रम, शिक्षण और परीक्षा - से रहता है। सेमेस्टर प्रणाली ने इन तीनों का विध्वंस कर दिया गया है। बचा-खुचा काम एफवाईयूपी कर देगा। यह दरअसल दिविवि को नष्ट करने की मुहिम है। उसके बाद देश के बाकी राजकीय विश्वविद्यालय नष्ट किए जाएंगे ताकि विदेशी विश्वविद्यालय यहां अपनी पैठ बना सकें। बाजारोन्मुख शिक्षा से शुरू होकर यह रास्ता शिक्षा के बाजार तक जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि जो छात्र और अभिभावक आज ज्यादा अंक पाकर खुश होते हैं, उन्हें आगे निश्चित ही पछताना पड़ेगा। यह मेहनती और मेधावी छात्रों के साथ भी खुला अन्याय है।    
हरीश त्रिवेदी ने सेमेस्टर प्रणाली के लागू होने का तर्क देते वक्त यह नहीं बताया कि इस प्रणाली के तहत काम दोगुना हो जाने के बावजूद न प्रशासन में, न ही शिक्षण में कोई नियुक्तियां हुई हैं। बल्कि पिछले तीन सालों से दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों और विभागों में नियुक्तियां बंद हैं। ज्यादातर शिक्षण कार्य तदर्थ अध्यापकों द्वारा किया जा रहा है, जिनका बुरी तरह शोषण होता है और शिक्षक नेता उन्हें लेकर अपनी राजनीति चमकाते हैं। हरीश त्रिवेदी ने यह भी नहीं बताया कि उनका अपना विभाग सेमेस्टर प्रणाली का अंत तक विरोध करता रहा। तब वे भी विभाग में थे। लेकिन वे एकाएक रजामंद हो गए और अंग्रेजी विभाग में सेमेस्टर प्रणाली लागू हो गई। नवउदारवादी शब्दावली में इस तरह की पल्टी को ‘एजुकेट’ होना कहा जाता है। 
कोई भी विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम, शिक्षण और परीक्षा तक सीमित नहीं होता। उसका एक खास माहौल होता है जिसमें स्वाभाविक खुलापन, बहस मुबाहिसा, रचनात्मक गतिविधियां, खेलकूद, एनसीसी, एनएसएस आदि होते हैं। दिविवि में यह सब खत्म किया जा रहा है। छात्रों और शिक्षकों को जो संगोष्ठी कक्ष आसानी से बिना शुल्क के मिल जाते थे, अब नहीं मिल पाते। साउथ कैंपस में कोई पत्रिकाओं@पुस्तकों की दुकान नहीं है। नॉर्थ कैंपस में एक्टिविटी सेंटर में एक थी, उसे बंद कर दिया गया है। साउथ कैंपस की अपनी चारदीवारी है लेकिन फिर भी वहां चप्पे-चप्पे पर प्राईवेट एजेंसियों के गार्ड तैनात रहते हैं। गेट पर पुलिस चैकी होने के बावजूद एक पुलिस वैन हमेशा अंर खड़ी रहती है। 
शिक्षकों की गाड़ियों को नाके के नीचे से गुजरना होता है। आपसे कोई मिलने आ जाए तो उसे सुरक्षा गार्ड इतना परेशान कर देंगे कि दोबारा मिलने आने का नाम नहीं लेगा। यहां तक कि किसी प्रैस वाले का किसी शिक्षक से मिलने आना भी मना है। गोया कैंपस नहीं, छावनी हो। इस बंदिश पर हमने साउथ कैंपस के डिप्टी रजिस्ट्रार से कुछ दिन पहले लिखित तौर पूछा था। लेकिन उन्होंने उत्तर देना मुनासिब नहीं समझा। अलबत्ता इस बार के आम बजट के वक्त हमसे राय पूछने आने वाले एक टीवी चैनल के पत्रकारों को उन्होंने हमसे मिलने के लिए कैंपस में नहीं आने दिया। कहा कि रजिस्ट्रार साहब के आॅर्डर हैं कि कैंपस में किसी शिक्षक से प्रैस वालों को नहीं मिलने दिया जाए।          
याद किया जा सकता है कि सेमेस्टर प्रणाली के खिलाफ शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्रों का एकजुट विरोध हुआ था। उसमें सभी विचारधाराओं के शिक्षक और छात्र सम्मिलित थे। यूपीए सरकार और मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की ताकत के आगे विरोध सफल नहीं हो पाया। बताया जाता है कि उसी समय एफवाईयूपी लागू करने का फैसला भी कपिल सिब्बल ने कर लिया था और उसे तत्काल लागू करने के लिए वर्तमान कुलपति को नियुक्त किया गया। नए कुलपति ने पहले शिक्षक संगठन डूटा को तोड़ने और निष्प्रभावी बनाने का काम किया। दुर्भाग्य से कुछ शिक्षक नेताओं ने इसमें भूमिका निभाई जिसकी सामान्य शिक्षकों को देर तक तकलीफ उठानी पड़ेगी। 
कुछ दिनों पहले एक वरिष्ठ डूटा एक्टिविस्ट के साथ उन्हीं के कॉलिज में कुलपति की उपस्थिति में धक्कामुक्की हुई। आगे बाउंसरों द्वारा शिक्षकों और छात्रों के साथ बदसलूकी की घटनाएं बढ़ सकती हैं। क्योंकि विश्वविद्यालय के दो-चार कर्मचारियों को छोड़ कर, जो विश्वविद्यालय समुदाय का हिस्सा होने के नाते शिक्षकों और छात्रों को अपना सहयोगी मानते हैं, सारी सिक्योरिटी प्राइवेट कंपनियों के हवाले कर दी गई है। 
एफवाईयूपी विवाद में शिक्षक समुदाय में परस्पर संदेह और विरोध का अस्वस्थ माहौल बना है जिससे उनकी एकजुटता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। छात्र शक्ति के एकजुट विरोध को रोका जा सके, इसके लिए हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड़्डा के सांसद बेटे ने वीसी आॅफिस में बैठ कर लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों की धज्जियां उड़ाते हुए एनएसयूआई को डूसू का चुनाव जिताया।  
दिविवि अपने करीब 80 कॉलेजों के लिए जाना जाता है। इन कॉलिजों की विभिन्न आधारों पर अलग-अलग रेंकिंग हो सकती है लेकिन टीचिंग स्टाफ सभी में कमोबेस अच्छी कोटि का है। इन कॉलिजों के प्रिंसिपलों की विश्वविद्यालय की समस्त गतिविधियों में महत्वपूर्ण  भूमिका होती है। सेमेस्टर लागू करने के वक्त जरूर कुछ प्रिंसिपलों ने कुछ न कुछ विरोध जताया था लेकिन इस मामले में वे सभी कुलपति का अंधानुकरण कर रहे हैं। वे यह ध्यान नहीं रखना चाहते कि ‘आॅल पावरफुल’ कुलपति की गाज कभी उन पर भी गिर सकती है। स्कूल आॅफ ओपन लर्र्निंग (एसओएल) दिविवि का प्रमुख अंग है जिसमें कई लाख छात्रों को पत्राचार से शिक्षा दी जाती है। कुलपति ने पिछले दिनों एक वक्तव्य में एसओएल को ‘भारी रेकेट’ करार दिया। लेकिन वहां के शिक्षकों ने उसका लिखित या मौखिक विरोध नहीं किया। किसी ने यह भी नहीं पूछा कि आप पांच साल साउथ कैंपस के निदेशक रहे, पिछले दो साल से कुलपति हैं तो यह रेकेट आपने क्यों चलने दिया? बहरहाल, अपनी रणनीति में कुलपति हर स्तर पर सफल रहे हैं। उन्हें कांग्रेस के अलावा भाजपा का भी स्वाभाविक समर्थन है। सोचना यहां के शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों को है।   
पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने प्राईमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक की नीति बनाने के लिए अंबानी-बिड़ला कमेटी बनाई थी। वह दुनिया में अपने ढंग का प्रयोग था कि बिना किसी शिक्षाविद को रखे केवल उद्योगपतियों को शिक्षा नीति बनाने का काम दिया गया था। हमने उस समिति की रपट पर ‘शिक्षा के बाजारीकरण की रपट’ शीर्षक से एक विस्तृत समीक्षा लिखी थी। समाजवादी शिक्षक मंच की ओर से वह जनहित में जारी भी की गई थी। तब हमें अंदेशा भी नहीं था कि अगले एक दशक में दिविवि में ही शिक्षा को बाजारीकरण की सूली पर चढ़ा दिया जाएगा। इसके लिए भी दिविवि के शिक्षकों को आत्मालोचन करना होगा। 

एफवाईयूपी और सामाजिक न्याय की राजनीति

एफवाईयूपी पर चलने वाली बहस के कई आयाम हैं। लेकिन यह तथ्य सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है कि यह प्रोग्राम सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा से बाहर करने वाला है। सभी के लिए अनिवार्य फाउंडेशन कोर्स और मल्टीपल एग्जिट - यानी दो साल पर डिप्लोमा, तीन साल पर डिग्री और चार साल पर आॅनर्स की डिग्री देने की व्यवस्था - इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियां और उनके नेता इस प्रोग्राम का सबसे पहले और निर्णायक विरोध करते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यूपीए सरकार सपा और बसपा के समर्थन पर टिकी है। उनमें सपा समाजवादी चिंतक डॉ. लोहिया का नाम लेती है और बसपा सामाजिक न्याय के पुरोधा डॉ. भीमराव अंबेडकर का। दोनों के वोट का आधार क्रमशः पिछड़ा और दलित समाज है, जिस पर खड़े होकर इनके नेता मुसलमानों के वोटों पर धावा बोलते हैं। यह आधार न हो तो अगड़े सवर्ण समाज के वोट, जिन्हें जाति-सम्मेलन आयोजित करके रिझाया जाता है, उनके काम नहीं आ सकते। अगर सपा और बसपा चार साला स्नातक प्रोग्राम का डट कर विरोध कर दें तो हो सकता है यूपीए सरकार इस पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हो जाए।   
अन्य कई क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो सामाजिक न्याय को अपनी राजनीति का आधार घोषित करती हैं। बिहार में राजद और जद (यू) तथा तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टियां भी सामाजिक न्याय की राजनीति करती हैं। उनमें प्रमुख राजनीतिक पार्टी डीएमके अब यूपीए सरकार में शामिल भी नहीं है। लेकिन बिहार और तमिलनाडु से भी इस प्रोग्राम के विरोध में आवाज नहीं उठ रही है। एफवाईयूपी के विरोध के लिए गठित जोइंट एक्शन फ्रंट फॉर डेमोक्रेटिक एजुकेशन और डूटा नेतृत्व की तरफ से सभी पार्टियों के नेताओं@सांसदों से इस मुद्दे पर संपर्क करने की कोशिश की गई जो अभी जारी है। सीताराम येचुरी की पहल पर राज्यसभा के 11 और लोकसभा के 26 सांसदों ने प्रधानमंत्री को भेजी गई पेटीशन पर हस्ताक्षर किए। जद (यू) के अध्यक्ष शरद यादव ने एक साझा प्रैस वार्ता में उपस्थित होकर एफवाईयूपी का विरोध करने वाले संगठनों के प्रति अपना समर्थन जाहिर किया। हालांकि उनके लिए यह कोई गंभीर मुद्दा नहीं है, क्योंकि उसके बाद उन्होंने पलट कर नहीं देखा।
लोजपा नेता रामविलास पासवान ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और अस्वस्थ होने के बावजूद 22 जून 2013 को जंतर-मंतर पर आयोजित प्रतिरोध में शिरकत की। उन्होंने यह घोषणा की कि संसद का सत्र शुरू होने पर वे यह मुद्दा मजबूती से उठाएंगे। पासवान से डूटा के उपाध्यक्ष डॉ. हरीश खन्ना और जोइं्रट एक्शन फ्रंट फॉर डेमोक्रेटिक एजुकेशन के तत्वावधान में यह प्रोग्राम रद्द करवाने की मुहिम में लगे जस्टिस पार्टी के नेता डॉ. उदितराज ने मिल कर समर्थन करने का आग्रह किया था। बहरहाल, मुख्यधारा राजनीति के केवल एक सामाजिक न्यायवादी नेता ने दलित, आदिवासी, पिछड़े छात्र-छात्राओं के कैरियर पर एफवाईयूपी के नकारात्मक प्रभाव को गंभीरता से लिया है। 
कांग्रेस और भाजपा दोनों नवउदारवादी नीतियों को लेकर एकमत हैं। जैसा कि ऊपर बताया गया है, दिविवि में भाजपा के शिक्षक मंच एनडीटीएफ और छात्र मंच एबीवीपी ने कांगेस के साथ मिल कर एफवाईयूपी का समर्थन किया है। भाजपा के दिल्ली प्रदेशाध्यक्ष ने प्रैस को बयान जारी करके अपना समर्थन जाहिर किया। डॉ. उदितराज ने भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेतली से मुलाकात कर एफवाईयूपी के सामाजिक न्याय विरोधी चरित्र के बारे में समझाया कि इसका समर्थन करने से वोट की राजनीति में भाजपा को मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है। शायद वोट की राजनीति की खातिर अरुण जेतली ने एफवाईयूपी को एक साल स्थगित करने के अनुरोध का पत्र मानव संसाधन मंत्री पल्लम राजू को लिखा। हालांकि उसके बाद मुख्य विपक्षी पार्टी ने आगे कोई कार्रवाई नहीं की। जबकि एफवाईयूपी के विरोध का दायरा तब से काफी बढ़ गया है। 
अरुण जेतली ने, भले ही वोटों की खातिर, मंत्री को पत्र लिख दिया लेकिन अधिकांश सामाजिक न्याय की राजनीति के दावेदारों ने उतना भी नहीं किया है। इन पार्टियों के नेताओं से शिक्षा जैसे गंभीर विषय पर किसी गंभीर समीक्षा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। न ही उनसे नवउदारवाद के विरोध की अपेक्षा की जा सकती है। लेकिन क्या उन्हें अपने आधार वोटों की भी फिक्र नहीं है? दरअसल, उनके लिए सामाजिक न्याय का अर्थ जातिवाद और धर्मनिरपेक्षता का कार्ड खेलना है। मनमोहन सिंह जानते हैं कि जातिवाद और धर्मनिरपेक्षता का कार्ड ये नेता एफवाईयूपी लागू होने के बाद भी बखूबी खेलेंगे और केंद्र में कांग्रेस या भाजपा का समर्थन करेंगे। यह लगता नहीं कि कैसे भी दबाव से राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री दखल देकर एफवाईयूपी को रोक देंगे। वे हो सकता है इसे पूरे देश में थोपने के लिए संसद में उसी तरह से पारित करें जैसे भारत-अमेरिका परमाणु करार किया गया था।