Saturday, September 1, 2012

बांग्लादेशी...मुसलमान...बिहारी..और अन्त में देश


मेरे पसंदीदा किताबों में से एक, 'नीम का पेड़' में लिखा है कि.. सियासत में तत्कालीन लाभ के लिए जो फैसले लिए जाते है, उसके दूरगामी नतीजे बड़े गंभीर होते हैं। संयोग है कि, इन पंक्तियों के लेखक राही मासूम रजा का आज जन्मदिन है। आजीवन कट्टरता से लड़ने वाले राही की इन पंक्तियों को उलटकर अगर यूं कहें, कि कांग्रेस ने तत्कालीन लाभ के लिए मनसे सुप्रीमो को जिस तरह की ढील दी हुई है, इस देश को उसके गंभीर नतीजे भुगतने पड़ेंगे। तो इस देश के सियासी हालात पर ये पंक्तियां सटीक बैठती है। केवल कांग्रेस ही नहीं राष्ट्र तोड़ने वाली शक्तियों को बढ़ावा देने की ज़िम्मेदारी उन लोगों पर भी है, जो बांग्लादेशियों के खिलाफ राज के बयान की दिल खोलकर सराहना कर रहे थे। बौद्धिक गलियारों और मीडिया में बैठे तमाम भगवा ध्वजवाहकों ने राज के बांग्लादेशियों और मुसलमानों के खिलाफ दिए गए बयान की आलोचना तो नहीं ही की, जहां तक हो सका उसकी सराहना ही की। कई चैनलों ने राज ठाकरे को हिन्दु ह्मदय सम्राट भी लिखने में देर नहीं लगाई।  बिना ये जाने कि इस तरह की उपमाएं चाहे जिस राजनेता को दी जाती हो, अन्त में वो एक बड़े तबके के लिए असुरक्षा की वजह बनती है। बिना भय के माहौल और कत्ले-आम के कोई भी धर्म विशेष का ह्मदय सम्राट नहीं हुआ, फिर चाहे वो आडवाणी हों, बाल ठाकरे हों , नरेन्द्र मोदी हो या नव अंकुरित राज ठाकरे हों। ज़ाहिर है देश तोड़ने की इस राजनीति में अगर कांग्रेस आंख मूंदकर धृतराष्ट्र की भूमिका निभा रही है, तो भगवा ताकतें इस मामले में शकुनी की भूमिका में हैं।
फेसबुक पर जब बांग्लादेशियों के मामले में बहस चल रही थी तो हमने एक कंमेट के जवाब में लिखा था कि, बांग्लादेशियों के खिलाफ साम्प्रदायिक ताक़ते जिस तरह की राजनीति में लगी हुई है, दरअसल वो राज ठाकरे की राजनीति का विस्तारीकरण है। आज ये बात सटीक साबित हो रही है। हम ये भी कहते हैं कि विस्थापितों का दर्द हमसे बेहतर और कोई नहीं समझ सकता। क्योंकि बांग्लादेशी तो फिर भी बाहर के हैं, हम तो अपने देश में ही भीतरी और बाहरी का भेद झेल रहे हैं। हमें परेशानी राज ठाकरे से नहीं है, क्योंकि राज जैसी ताक़ते हमारी राह में एक कंकर की भी हैसियत नहीं रखती , लेकिन रहबरों से शिकायत ज़रूर है जिन्होंने रहजनों से समझौता कर लिया है।
दरअसल ये लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी से कहीं आगे कट्टरता बनाम उदारता की लड़ाई है। और इस तरह की राजनीति में जो भी कट्टरता के खिलाफ बोलने के लिए खड़ा होगा उसे शुरुआती तौर पर एक हारी हुई लड़ाई का सामना करना पड़ेगा। लेकिन आखिरी जीत उदारता की ही होगी ये तय है।