Thursday, November 24, 2016

जनता की तकलीफ की राजनीति-प्रेम सिंह

(पांच सौ और हजार के नोट बंद करने के बाद देश के हालात को सामान्य नहीं कहा जा सकता है। इस अदूरदर्शी फैसले से सबसे ज्यादा तकलीफ उठाने को मजबूर है आम अवाम। लेकिन सवाल ये है कि क्या देश की सियासत में आम अवाम की तकलीफ से किसी को वास्ता है। नवउदारवाद के बाद इस देश में जिस तरह के फैसले लिए जा रहे हैं, उसमें ग़रीब और मेहनतकश अवाम को जान देकर विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। डॉ प्रेम सिंह का ये लेख पढ़िए, ऐसे माहौल में ये एक जरूरी लेख है, जो बताता है कि हम किस सियासी संकट के दौर से गुजर रहे हैं।  
                पिछले दिनों लिए गए विमुद्रीकरण के फैसले पर छिड़ी बहस में फैसले से साधारण जनता को होने वाली तकलीफ का जिक्र कई रूपों में बार-बार हो रहा है। इस औचक फैसले से साधारण जनता को होने वाली तकलीफ की शिकायत उच्च एवं उच्चतम न्यायालय ने भी की है। फैसले के अनेक समर्थकों ने भी जनता की तकलीफ पर अपनी चिंता व्यक्त की है। 50 से अधिक लोगों की मौत सीधे इस फैसले के कारण हो चुकी है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों का कहना है कि फैसले से जनता को कोई तकलीफ नहीं हैबल्कि वह खुश है। वे फैसले से होने वाली तकलीफ की शिकायत करने वाले भुक्तभोगियों और पत्रकारों को धमकाते नजर आते हैं। उनका कहना है कि जनता को तकलीफ होती तो वह बैंक की कतारों में नहींफैसले के विरोध में सड़कों पर होती। पूरे देश में सुबह से शाम तक बैंक की लाइनों में लगी जनता की तकलीफ शायद कहीं न कहीं मोदी समर्थकों को भी नजर आती है। तभी वे सीमा पर तैनात सेना के जवानों द्वारा सही जाने वाली तकलीफ का वास्ता देने लगते हैं। पहले केवल चार-पांच दिनों की तकलीफ उठाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री ने देश का वास्ता देकर पचास दिनों तक तकलीफ उठाने की भावुक गुहार लगाई है।
                इस फैसले के चलते जनता की तकलीफ से सचमुच विचलित होने वाले लोगों द्वारा कहना कि गरीब की हाय लगेगी’, एक असहाय उद्गार भर है। ऐसे उद्गारों का आज की राजनीति में कोई अर्थ नहीं है। लोकतंत्र में जनता को एक दिन भी तकलीफ देने का किसी सरकार को हक नहीं हैइस तरह की बातें न चलन में रह गई हैंन पसंद की जाती हैं। लोहिया की उस स्थापना का हवाला देना भी बेकार है जिसमें वे कहते हैं कि प्रत्येक कदम/फैसले का औचित्य उस कदम/फैसले में ही निहित होना चाहिएभविष्‍य का वास्ता देकर किया गया औचित्य-प्रतिपादन सरकारों/राजनीतिक पार्टियों को जनता पर मनमाने अत्याचार की छूट देता है। विमुद्रीकरण के फैसले से भविष्‍य में स्वर्णिम भारत’ बनने के दावे बढ़-चढ़ कर किए जा रहे हैं। मैं तुम्हें स्वर्णिम भारत दूंगा’ का खर्चीला प्रचार अभियान दिल्ली में शुरू हो चुका है।
                यह गौर करने की बात है कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था लागू होने के बाद से भारतीय राजनीति में जनता की तकलीफ के प्रति शासक वर्ग का रवैया तेजी से बदलता गया है। शासक वर्ग अब जनता की वोट की ताकत से नहीं डरताकि उसकी नीतियों के कारण तकलीफ उठाने वाली जनता चुनाव में उसे परास्त कर देगी। किसी भी व्यवस्था में लोगों की तकलीफ का इंतिहाई छोर जीवन को ही समाप्त कर देना होगा। नवउदारवादी दौर में करीब तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह सिलसिला जारी है। लेकिन सरकारों और नेताओं पर इसका कोई असर नहीं है। क्योंकि चुनाव काले धन के बल पर प्रचार कंपनियोंकारपोरेट घरानोंचुनाव जिताने के विशेषज्ञों और मीडिया की मार्फत लड़ा जाता है। ये मिल कर तय करते हैं कि केंद्र में कब किस नेता और पार्टी की सरकार होगी। नवउदारवादी दौर में नेता/पार्टियां नहींलाल बुझक्कड़ विशेषज्ञ भारत की राजनीति और सरकारें चलाने लगे हैं। ऐसी स्थिति में जनता की तकलीफ पर केवल लफ्फाजी और झांसेबाजी होती है, जो सबके सामने है। 50 दिन में जनता की तकलीफ दूर करने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री और उनके विशेषज्ञों को अच्छी तरह पता है कि जनता उसके बाद भी तकलीफ में ही रहेगी।
                यह स्पष्‍ट है कि 6 महीने पहले लिए गए विमुद्रीकरण के फैसले में अन्य जो भी खयाल रखे गए होंजनता को होने वाली तकलीफ पर ध्यान नहीं दिया गया। जनता की तकलीफ कोई समस्या नहीं रह गई है। नेताओं को पता है उनका प्रचारतंत्र जनता की तकलीफ पर भारी पड़ेगा। वे अपने पक्ष में सहमति का निर्माण कर लेंगे। तकलीफ सहने वाली जनता फिर कारापोरेट के हित की राजनीति करने वालों को वोट देगी। शासक वर्ग ऐसा इंतजाम करता है कि जनता आत्महत्याविस्थापनबेरोजगारीमंहगाईबीमारी जैसी निरंतर बनी रहने वाली तकलीफों का दर्द अपने को धर्मजातिक्षेत्र आदि से जोड़ कर भुला देती है। इस प्रक्रिया में जनता का अराजनीतिकरण होता जाता है। विकल्पहीनता की स्थिति दरअसल जनता के अराजनीतिकरण के चलते बनती है। वह नवउदारवादी व्यवस्था के विकल्प की राजनीति खड़ी करने की कोशिशों में लगे नेताओं और पार्टियों के साथ खड़ी नहीं होती। स्थिति और जटिल हो जाती है जब ज्यादातर नागरिक समाज और जनांदोलनकारी बिचौलिए की भूमिका निभाते है।
                यह मान्य तथ्य है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ पूंजीवादी व्यवस्था के सेफ्टी वाल्व हैं। वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं को राजनीतिक कर्म से विरत करके अराजनीतिकरण की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं। नवउदारवाद के प्रतिष्‍ठापकों का दावा है कि नवउदारवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं हैन ही किसी विकल्प की जरूरत है। अगर नवउदारवादी व्यवस्था के तहत कतिपय समस्याएं हैं तो एनजीओ गठित करके उनका समाधान निकाल लीजिए। पिछले दिनों दो एनजीओ सरगनाओं द्वारा प्रायोजित भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन का अधिकांश नागरिक समाज और जनांदोलनकारियों ने पुरजोर समर्थन और उसमें हिस्सेदारी करके नवउदारवाद के विकल्प की राजनीति को गहरी क्षति पहुंचाई। उस आंदोलन को आरएसएस और कारपोरेट घरानों समेत रामदेवरविशंकरजनरल वीके सिंह सरीखों का खुलेआम सक्रिय समर्थन था। अन्ना हजारे ने तब भी नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी और आज भी मोदी के साथ है। इतना ही नहींसीधे कारपोरेट की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी का साथ भी सेकुलर और प्रोग्रेसिव नागरिक समाज ने दिया और आज भी दे रहा है। इसके बावजूद कि यह पार्टी घोषित रूप सेसंविधान की विचारधारा सहितविचारधाराहीनता की वकालत करती है। उनमें से बहुतों के लिए मोदी का विकल्प अगर राहुल गांधी नहीं बन पाते हैंतो केजरीवाल है।
                जाहिर है, 1991 के बाद से अराजनीतिकरण साधारण जनता का ही नहींनागरिक समाज का भी होता गया है। चुनींदा अपवादों को छोड़ दें तो देश का कौन-सा बड़ा बुद्धिजीवी है जिसने मनमोहन सिंह द्वारा लागू की गईं नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ निर्णायक स्टैंड लिया होमोदी को देश पर मूर्खों द्वारा थोपी आपदा कह कर अपने को बड़ा विचारशील जताने वाले थोड़ा रुक कर विचार करें कि जनता की तकलीफ के प्रति उनकी सहानुभूति कितनी सच्ची हैजैसा युग होता हैवैसा ही युग पुरुष निकल कर आता है। मनमोहन सिंह के बाद मोदी उस भारतीय समाज के उग्र प्रतिनिधि हैं जो नवउदारवादी दौर में बना है। यह एक झूठी तसल्ली है कि वे केवल31 प्रतिशत मतदाताओं का चुनाव हैं। विमुद्रीकरण के फैसले से जनता को होने वाली भारी तकलीफ से द्रवित कुछ लोग विरोध के लिए विपक्ष की तलाश कर रहे हैं। 1991 के बाद से भारत की राजनीति एक पक्षीय - नवउदारवादी - बनती गई है। नितीश कुमार और नवीन पटनायक विमुद्रीकरण के समर्थन में हैं। अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी दोनों नवउदारवाद के समर्थक हैं और इस मामले में मुस्लिम वोट बैंक पक्का करने की नीयत से परिचालित हैं। 
                काले धन की सारी बहस में यह नहीं बताया जाता कि वह मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई की लूट का धन हैऔर उस लूट में नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से अभूतपूर्व तेजी आई है। भारत में नवउदारवाद मेहनतकशों की अनंत और अटूट तकलीफों का नाम है। 25साल बीत जाने पर भी स्वर्णिम भविष्‍य की बातें बिना किसी शर्म और हिचक के की जाती हैं। यानी किसानों की आत्महत्याआदिवासियों का विस्थापनबेरोजगारों की निरंतर बढ़ती फौजदिन-रात बड़े बांधों-राजमार्गों-पुलों-हवाई अड्डों-इमारतों आदि के निर्माण में लगे करोड़ों मजदूरों का जीवनस्वर्णिम भविष्‍य’ की कीमत है। कमेरों को आगे भी यह कीमत चुकाते रहना होगा। उदाहरण के लिएकल्पना कीजिए पांच सौ स्मार्ट सिटी बनाने के लिए मेहनतकशों की कितनी पीढियां खपेंगीपूरे भारत को डिजिटल’ और कैशलेस करेंसी’ में तब्दील करने के लिए किनकी बलि चढ़ेगीबच्चों की परवरिशशिक्षास्वास्थ्यमनोरंजन आदि का इंतजाम हर लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व होता है। लेकिन नवउदारवादी भारत के वर्तमान और भविष्‍य में मेहनतकशों के बच्चों के लिए कोई जगह नहीं है। भारतीय राजनीति की इससे बड़ी तकलीफ क्या हो सकती है कि श्रमशील जनता ने नवउदारवादी व्यवस्था के निर्माण में मर-खप जाने को ही अपनी नियति मान लिया है!
                जनता की तकलीफ में कमी होइससे शायद ही किसी को इनकार हो सकता है। इस दिशा में शुरुआत हो सकती है। कांग्रेस-भाजपा से इतर पार्टियां एका बना कर सीधे मेहनतकश जनता से कहें कि वे उन्हें तबाह करने वाली नवउदारवादी नीतियों को अपदस्थ करके संविधान के नीति निर्देशक तत्वों की रोशनी में अपनी नीतियां चलाएंगी। अगर संकल्प सच्चा हो तो 2019 का चुनाव आसानी से जीत लिया जा सकता है। उसके लिए कारपोरेट के काले धन की आवश्‍यकता नहीं पड़ेगी। नवउदारवाद का समर्थक स्वभावतः नवसाम्राज्यवाद का समर्थक हो जाता है। नवसाम्राज्यवादी शिकंजे के तहत अनेक कुर्बानियों से हासिल की गई आजादी गुलामी में तब्दील होती जा रही है। आशा करनी चाहिए कि कांग्रेस और भाजपा के समर्थकविशेषकर युवालंबे समय तक आजादी का खोते जाना चुपचाप नहीं देखते रहेंगे। वे नवउदारवाद विरोध की राजनीति का समर्थन कर सकते हैं। या अपनी पार्टियों को इसके लिए बाध्य कर सकते हैं। 

Monday, November 7, 2016

लोहिया का जनाजा है जरा..... -प्रेम सिंह

(उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी और मुलायम के सियासी परिवार में जो कुछ भी चल रहा है, इसमें कुछ भी नया नहीं है। जिन्हें खतरे का अंदेशा है वो सालों से इस पर लिख रहे हैं। मूल मुद्दा परिवार की कलह नहीं है, मूल प्रश्न ये है कि क्या मुलायम सिंह वाकई डॉ लोहिया और समाजवादी धारा की सियासत का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या ये समाजवाद सांप्रदायिकता और नव उदारवाद के गठजोड़ को चुनौती देने वाला है। इसपर  जनवरी 2009 में डॉ प्रेम सिंह ने जनसत्ता में विस्तार से लिखा था। जिसका जिक्र स्वर्गीय प्रभाष जोशी ने अपने कागद कारे कॉलम में किया था। एक बार फिर से इस लेख को पढ़ने की जरूरत है.... समझने वालों का क्या है, वो तब भी नहीं समझे...अब भी नहीं समझ रहे....।) 
उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के तत्वावधान में जो समाजवादचल रहा है, उस पर टिप्पणी करने का हमारा कतई इरादा नहीं था। जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि हम लिख चुके हैं कि अपने को छोटे लोहिया और छोटे मधु लिमये कहलाने के शौकीन नेता वाकई काफी छोटे हो गए हैं - छोटे अमर सिंह! समाजवादी नंगे होते हैं’ - पिछले दिनों मुलायम सिंह ने मायावती को ललकारते हुए जब यह जुमला कहा था तो समाजवादी पार्टी की सच्चाई खुद ही बयान कर दी थी। उसके बाद किसी और की टिप्पणी के लिए कुछ बचता ही नहीं है।
हमें यह टिप्पणी एक विशेष स्थिति में करनी पड़ रही है। इस साल 23 मार्च से डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष शुरू होने जा रहा है। जैसा कि ऐसे अवसरों  पर होता है, पार्टियां और संगठन लोहिया की याद में कार्यक्रमों का आयोजन करेंगे। समाजवादी पार्टी भी कुछ कार्यक्रमों का आयोजन जरूर करेगी। बिना शताब्दी वर्ष के भी सपाई लखनउ की सड़कों पर लोहिया का जनाजा अक्सर निकालते रहते हैं। हाल में ि‍फल्मी हस्ती संजय दत्त और उनकी विवादास्पद पत्नी मान्यता के कंधें पर लोहिया का जनाजा निकाला गया। जाहिर है, शताब्दी वर्ष में वह कुछ ज्यादा धूमधाम से निकाला जाएगा।
हमें यह जान कर हैरानी हुई है कि ऐसे समाजवादी बुि‍द्धजीवी और कार्यकर्ता जो समाजवादी आंदोलन के पराभव और अपने को समाजवादी कहने वाले नेताओं के पतन पर चिंता व्यक्त करते रहते हैं, समाजवादी पार्टी के सहारे लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष मनाने की योजना बना रहे हैं। इसीलिए हमें यह टिप्पणी लिखनी पड़ी है। यह योजना समाजवादी पार्टी के उपाध्‍यक्ष जनेश्वर मिश्रा की अगुआई में उनके दिल्ली स्थित निवास पर बनाई जा रही है। अगर ऐसा होता है, यानी समाजवादी पार्टी के तत्वावधन में लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष मनाया जाता है, तो उसमें शामिल साथी समाजवादी पार्टी के समाजवादको वैधता प्रदान करेंगे। इस अर्थ में कि वह डॉ. लोहिया के विचारों और आदर्शों पर चलने वाली पार्टी है। सभी जानते हैं समाजवादी पार्टी को अमर सिंह चलाते हैं। तो सीधे संदेश यही जाएगा कि अमर सिंह जिन विचारोंऔर आदर्शोंपर पार्टी चला रहे हैं उनका कुछ न कुछ साझा लोहिया के विचारों और आदर्शों से है। जाहिर है, साथियों के इस काम से समाजवादी आंदोलन की जो थोड़ी-बहुत साख अन्य राजनीतिक और बौि‍द्धक समूहों में बची हुई है, वह भी दांव पर लग जाएगी।
बेहतर हो कि साथी जनेश्वर मिश्रा और मुलायम सिंह को अमर सिंह के नेतृत्व में अपना काम करने दें। लोहिया जन्मशताब्‍दी वर्ष उन्हें सदबुि‍द्ध दे, यह भी कामना करें। लेकिन उन्हें लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष मनाना है तो अपने स्तर और बल पर वह काम करें। यह सच्चाई तो साथी भी जानते हैं कि लोहिया के लोगवहां नहीं रहते जहां साथी जाकर बैठकें करते हैं। वे खेतों, कारखानों, खदानों, विश्वविद्यालयों में फैले हैं। अगर प्रतिबद्धता और लगन के साथ काम करें तो एक साल में देशव्यापी स्तर पर विचारपरक और आंदोलनपरक कार्यक्रम  आयोजित किए जा सकते हैं। गंभीर एकेडेमिक सेमिनार आयोजित करने में तो कोई कठिनाई हो ही नहीं सकती है। भारत के बाहर कम से कम एशिया के कुछ देशों में कार्यक्रम  आयोजित करने का प्रयास भी होना चाहिए। और हो सके तो दुनिया के अन्य हिस्सों में भी।  
इस उद्यम में विद्यार्थी युवजन सभा, सामयिक वार्ता, सोशलिस्ट
फ्रंट
, लोकशक्ति अभियान, राष्ट सेवा दल, साहित्य वार्ता, युवजन सांस्कृतिक मंच, समाजवादी साहित्य संस्थान, युवा संवाद और युवा भारत में काम करने वाले गांधीवादी समाजवादी  बिरादरी के साथी अन्य सहमना संगठनों और व्यक्तियों के साथ मिल कर जुट सकते हैं। दरअसल, नजर भव्यता पर नहीं, सार्थकता पर होनी चाहिए। और उसके साथ साख बचाने पर। युवा पीढ़ी में आज भी ऐसे छात्र और नौजवान हैं जो गांधी और लोहिया से प्रभावित होते हैं। लेकिन संप्रदायवाद और जातिवाद की राजनीति करने वाले तथाकथित समाजवादियों का भ्रष्ट चाल-चलन और रीति-नीति उन्हें रास्ते से विचलित और कई बार विरत करते हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण होगा अगर साथी लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष जैसा सौ साल बाद आया अवसर समाजवादी विचारधारा और आंदोलन की साख को बचाने के काम में नहीं लाते।
एक खबर यह भी आई है कि लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष की शुरुआत के उपलक्ष में 21 और 22 मार्च को सभी समाजवादियों का दिल्ली में इक्ठ्ठा होने का आह्वान किया गया है। भले ही वह किसी भी पार्टी में हों। जनता(11 जनवरी 2009 अंक) में इस बाबत सूचना प्रकाशित हुई है। लिखा गया है कि यह मिलन समाजवादी आंदोलन के आदर्शों, मूल्यों और नीतियों को याद करने के लिए आयोजित किया गया है। यह भी लिखा गया है कि मिलन के अवसर का उपयोग देश के विभिन्न भागों में पूरा साल मिलजुल कर कार्यक्रम करने की जमीन तैयार करने में किया जाएगा। सूचना के साथ किसी संस्था या व्यक्ति का नाम नहीं है। जाहिर है, वह संपादक सुरेंद्र मोहन जी की तरफ से निकाली गई है।
किसी कार्यक्रम में दो समाजवादी नेता मिल जाएं तो उनके बीच थोड़ी देर के विलाप के बाद दूसरी बात एका करने की होती है। जनवरी के पहले सप्ताह में दिल्ली में वयोवृद्ध् समाजवादी नेता कैप्टन अब्बास अली के सम्मान में एक कार्यक्रम हुआ। उसमें मुलायम सिंह यादव ने कहा कि समाजवादियों को इक्ठ्ठा होना चाहिए। पासवान ने भी इसकी जरूरत बताई। अपने अध्‍यक्षीय भाषण में सुरेंद्र मोहन ने कहा कि मुलायम सिंह की इच्छा पूरी करने का लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष से अच्छा अवसर नहीं हो सकता। सभी पार्टियों के महत्वपूर्ण समाजवादी 300 के आस-पास की संख्या में 21-22 मार्च को दिल्ली में जुटें। मुलायम सिंह ने सुरेंद्र मोहन को ही यह बड़ाकाम करने को कहा। इस तरह मिलन का संबंध पहले से बन रही योजना के साथ बैठ गया। उसी दिन से सुरेंद्र मोहन सभी पार्टियों के समाजवादियों से संपर्क कर रहे हैं।
जाहिर है, एका की इस कवायद से एका नहीं होने जा रहा है। कांग्रेस और भाजपा के पिछलग्गू नेताओं के लिए मुख्यधारा राजनीति में अपनी कीमत बढ़ाने का यह अवसर होगा। उसमें लोहिया कहीं नहीं होंगे। हां, देश को यह प्रचलित संदेश निर्णायक रूप से जरूर चला जाएगा कि समाजवादियों की कोई विचारधारा, पार्टी या नैतिकता नहीं होती। आगे साथियों को सोचना है।