Saturday, September 17, 2016

'साम्राज्‍यवाद से बडा कोई फासीवाद नहीं है'



सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के प्रधान महासचिव व प्रवक्‍ता और दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक डॉ प्रेम सिंह फरवरी 2015 से बुल्गारिया की सोफिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ इस्टर्न लेंग्वेज एंड कल्चर के अंतर्गत भारत विद्या विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। डॉ सिंह की समाजवादी विचारक, नेता और राजनीतिक विश्‍लेषक के तौर पर विशिष्‍ट पहचान है। उन्‍होंने पिछले तीन दशकों में कायम हुए नवउदारवादी-सांप्रदायिक गठजोड की सटीक पहचान, समीक्षा और सक्रिय विरोध किया है। डॉ सिंह की पहचान इस तौर पर भी होती है कि उन्‍होंने अन्ना आंदोलन, अरविंद केजरीवाल गैंग, आम आदमी पार्टी के सियासी इरादों का शुरू में ही खुलासा कर दिया था। इसके चलते उन्‍हें राजनीतिक भविष्यवाणी कर्ता कहा जाने लगा है। वे इसी 30 सितंबर को बुल्गारिया से वापस वतन लौट रहे हैं। क़रीब डेढ़ साल तक देश से बाहर रहते हुए भी वे देश की सियासत पर पैनी नजर रखते रहे और और समय-समय पर राजनीतिक टिप्पणी लिखते रहे। डॉ प्रेम सिंह से ई मेल और फोन के जरिए टीवी पत्रकार राजेश कुमार ने ऑनलाइन साक्षात्कार लिया। 

  1. आप करीब डेढ साल से यूरोप में रह रहे हैं। वहां पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस  अब किस रूप में होती है? डॉ लोहिया अंतरराष्ट्रीय समाजवादी एका की बात करते थे, तब वो नहीं हो पाया आज के दौर में  आप इसकी क्‍या संभावना देखते हैं?
प्रेम सिंह- आम तौर पर यूरोप में अब यह बहस नहीं है। क्‍योंकि यूरोप कुल मिला कर अमेरिका के पीछे चलता है। लिहाजा, यूरोप का लोकतांत्रिक समाजवाद पूंजीवाद का विकल्‍प नहीं है। इसीलिए लोहिया ने पहले तीसरी दुनिया के समाजवाद की बात की।
पूंजीवाद के दुष्‍परिणामों पर चिंता करने वाले लोग और समूह यूरोप में हैं लेकिन वह विरोध विचारधारात्‍मक यानी राजनीतिक नहीं है। पूंजीवादी उपभोक्‍तावाद से अलग विकास के वैकल्पिक मॉडल की ठोस विचारणा नहीं है। लगभग हर देश में सोशलिस्‍ट पार्टियां हैं जो डेमोक्रेटिक सोशलिज्‍म के तहत कायम की गई थीं और जिनका सोलिस्‍ट इंटरनेशल से संबंध था। उनमें कई सीधे या गठबंधन में सत्‍ता में भी हैं। पूर्व कम्‍युनिस्‍ट ब्‍लॉक के देशों में ज्‍यादातर पार्टियों ने अपने को सोशलिस्‍ट पार्टी में रूपांतरित कर लिया है। उदाहरण के लिए बल्‍गारियन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ही नाम बदल कर बल्‍गारियन सोशलिस्‍ट पार्टी है। यूरोप के सभी देशों की सोशलिस्‍ट पार्टियों के मंच पार्टी ऑफ यूरोपियन सोशलिस्‍ट्स (पीईएस) का यूरोपियन कौंसिल में नेतृत्‍व बल्‍गारिया के पूर्व प्रधानमंत्री सेरगी स्‍तानिशेव करते हैं। रूस और कम्‍युनिस्‍ट ब्‍लॉक के देशों में कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों के नेता अपनी नई पार्टियां बना कर राजनीति कर रहे हैं। उदाहरण के लिए रूस के राष्‍ट्रपति पुतिन सोवियत संघ की कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के एक महत्‍वपूर्ण पूर्व नेता रहे हैं। यूरोक की ये सभी पार्टियां वैश्विक पूंजीवादी आर्थिक संस्‍थाओं - विश्‍व बैंक, आईएमएफ, विश्‍व व्‍यापार संगठन, विश्‍व आर्थिक फोरम - की आर्थिक नीतियों को मानतीं हैं ज्‍यादातर यूरोपीय देश, जिनमें पूर्व सोवियत यूनियन में रहे देश भी शामिल हैं, नेटो के सदस्‍य हैं और पूंजीवाद के आदर्श अमेरिका की समर्थक हैं। जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट पर भी वे पूंजीवादी विकास के मॉडल के दायरे में विचार करती हैं। जब महाराष्‍ट्र के जैतापुर परमाणु संयत्र के खिलाफ आंदोलन चल रहा था तब सोशलिस्‍ट युवजन सभा के अध्‍यक्ष डॉ अभिजीत वैद्य ने फ्रांस के समाजवादी राष्‍ट्रपति ओलेंदो को पत्र लिख कर निवेदन किया था कि फ्रांस रियेक्‍टरों की सप्‍लाई का करार रद्द कर दे। उनका जवाब आया कि सोशलिस्‍ट पार्टी को जैतापुर परमाणु संयत्र का विरोध नहीं करना चाहिए। हालांकि यूरोप में कल्याणकारी राज्‍य की अवधारणा अभी भी काम करती है। सोशलिस्‍ट पार्टियों में ज्‍यादा।

2 जब से मोदी जी प्रधानमंत्री हुए हैं, उन्होंने सत्ता संभाली है,  उनके लगातार विदेशों में दौरे हो रहे हैं। केंद्र सरकार और बीजेपी के नेता देश में इस तरीके से पेश करती है कि इन दौरों के बाद भारतीय विदेश नीति मजबूत हुई है। यूरोप में भारत की विदेश नीति को आपने किस तरीके से देखा?

प्रेम सिंह- बिना अपनी आर्थिक नीति के विदेश नीति नहीं हो सकती। भारत जैसा विशाल देश यह अफोर्ड नहीं कर सकता कि नवउदारवाद की संचालक वैश्विक आर्थिक संस्‍थाओं के डिक्‍टेट पर विकसित देशों के फायदे के लिए अपनी आर्थिक नीतियां चलाए। ऐसा होने पर विदेश नीति भी उन्‍हीं के डिक्‍टेट पर चलती है। नवउदारवादी शक्तियां भारत को पूंजीवादी विकास के नाम पर संसाधनों की लूट और उत्‍पादों की बिक्री के विशाल बाजार के रूप में इस्‍तेमाल कर रहीं है। इसी रूप में भारत की छवि को मोदी मजबूती प्रदान कर रहे हैं। वे हिंदुत्‍ववाद की चूल नवउदारवाद के साथ बिठाने में लगे हैं। भारत की पूंजीवादी विकास के मॉडल की नीतियां भी अपनी नहीं हैं, जैसा कि चीन में है। आदेश बजाने और नकल करने वाले देश की विदेश नीति नहीं होती। नेताओं और कारपोरेट घरानों के दौरों को विदेश नीति नहीं कहते।

3 हाल के दिनों में देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगातार हमले के मामले देखने को मिले। दलित उत्पीड़न के भी मामले सामने आए, जिसकी चर्चा विदेशी मीडिया में भी हुई। ऐसी घटनाओं के बाद विदेश में देश की छवि पर किस तरीके का असर देखते हैं?

प्रेम सिंह- अभिव्‍यक्ति की आजादी का संकट है। जीने की आजादी का भी संकट है। नवउदारवादी नीतियों से एक असहिष्‍णु समाज ही बनता है। इसके लिए अकेली भाजपा जिम्‍मेदार नहीं है। कांग्रेस समेत बाकी राजनीतिक पार्टियां भी बराबर की जिम्‍मेदार हैं। यह तानाशाही की तरफ ले जाने वाला रास्‍ता है। विदेश में छवि से मतलब हमारे यहां अमेरिका और विकसित यूरोप में छवि से होता है। वे इसे महज पूंजी निवेश की स्थितियों से जोड कर देखते हैं। मैंने कहा कि इस सब के लिए अकेला संघ संप्रदाय जिम्‍मेदार नहीं है, जैसा कि कहा जा रहा है। दलित उत्‍पीडन, महिला उत्‍पीडन, आदिवासी उत्‍पीडन करने वाले लोग हमारे आस-पास ही रहते हैं। यही स्थिति उन लोगों की है जो सांप्रदायिक उन्‍माद फैलाते हैं। ये सब आरएसएस तक सीमित और अमूर्त ‘तत्‍व’ नहीं हैं। जीते-जागते लोग हैं।

4 जनता परिवार ने निर्णय लिया था एकजुट होने का, लेकिन ये एका हो नहीं पाया। बावजूद इसके बिहार  चुनाव में बीजेपी को करारी हार झेलनी पड़ी। आगे उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे बड़े राज्यों में चुनाव है। ऐसे में  समाजवादी धारा की पार्टियों और समाजवादी नीतियों को मानने वाले दलों को आप कहां पाते हैं?

प्रेम सिंह- मुख्‍यधारा राजनीति में समाजवाद के नाम पर कई क्षेत्रीय पार्टियां हैं लेकिन समाजवादी विचारधारा और आंदोलन से उनका रिश्‍ता नहीं है। वे सभी नवउदारवाद की समर्थक हैं। अलबत्‍ता सत्‍ता के लिए जाति और क्षेत्र की राजनीति करने वाली तथाकथित समाजवादी पार्टियों का चुनावी महत्‍व है। जनता परिवार के एका को मुलायम सिंह ने तोड दिया था जबकि वे ही उसके अध्‍यक्ष थे। उत्‍तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी का एका लालू प्रसाद यादव के राजद और नितीश कुमार की जदयू से हो भी तो उससे समाजवादी पार्टी को कोई चुनावी फायदा नहीं होगा। फायदा तभी हो सकता है जब सपा और बसपा का गठबंधन हो। पंजाब में जनता परिवार से जुडी कोई पार्टी नहीं है।      

5. नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार आने के बाद भी क्या देश की सियासत में सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा पहले की तरह केंद्र में आ पाएगा ? अगर आएगा भी तो धर्मनिरपेक्ष होने का जो दल दावा करते हैं, उनके सामने क्या चुनौती है?

प्रेम सिंह- इस मुद्दे मैं कई बार बोल और लिख चुका हूं। मूल समस्‍या सांप्रदायिकता नहीं, नवसाम्राज्‍यवादी गुलामी है। जैसे उपनिवेशवादी दौर में अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता पैदा की, जिसके चलते देश का विभाजन तक हो गया, उसी तरह मौजूदा नवसाम्राज्यवादी निजाम सांप्रदायिकता की समस्‍या को ज्‍यादा गंभीर बनाता जा रहा है। संविधान की कसौटी पर कोई भी दल धर्मनिरपेक्ष नहीं है। गुजरात नरसंहार के बाद नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार करने वाली और भाजपा के समर्थन से तीन बार मुख्‍यमंत्री बनने वाली मायावती कैसे धर्मनिरपेक्ष हैं? कल्‍याण सिंह के साथ मिल कर सरकार बनाने वाले मुलायम सिंह कैसे धर्मनिरपेक्ष हैं? इन दोनों की राजनीतिक ताकत बाबरी मस्जिद के ध्‍वंस से बनी। दोनों पार्टियों में ज्‍यादातर मुस्लिम नेता, जो एक-दूसरी पार्टी में आवाजाही करते रहते हैं, बाबरी मस्जिद ध्‍वंस की देन हैं। विडंबना देखिए कि मुख्‍यमंत्री होने के नाते ध्‍वंस के लिए सीधे जिम्‍मेदार सांप्रदायिक कल्‍याण सिंह आज कहीं नहीं हैं जबकि धर्मनिरपेक्ष मुलायम सिंह और मायावती न केवल यूपी में राजनीति पर कब्‍जा किए हुए हैं, देश का प्रधानमंत्री बनने की महत्‍वाकांक्षा रखते हैं। कमोबेश पूरे देश में धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और नेताओं का यह हाल है। ऐसे में आरएसएस-भाजपा की सांप्रदायिकता को मजबूत होते जाना है। राजनीतिक ऐषणाएं रखने वाले सिविल सोसायटी एक्‍टीविस्‍ट धर्मनिरपेक्षता कायम नहीं कर सकते। आपने देखा ही कि नामी वकील प्रशांत भूषण ने आम आदमी पार्टी के नेता के बतौर साफ तौर पर कहा था कि दिल्‍ली में सरकार भाजपा के साथ मिल कर बनानी चाहिए, न कि कांग्रेस के। आम आदमी पार्टी के एक और नेता योगेंद्र यादव ने अपने सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल का बचाव करते हुए कहा था कि उनकी डुबकी से बनारस की गंगा कुछ पवित्र ही हुई है। धर्मनिरपेक्षता का संवैधानिक मूल्‍य नवउदारवाद के हमाम में इधर से उधर ठोकरें खाने को अभिशप्‍त बना दिया गया है। एका नवउदारवाद के खिलाफ बनना चाहिए। सांप्रदायिकता की जड पर अपने आप चोट हो जाएगी।

6.1991 में उदारीकरण की शुरुआत हुई, बाजारवाद फैला, उदारवाद को नवउदारवाद कहा जाने लगा, अब पूर्ण बहुमत के साथ बीजेपी के सत्ता में है। उदारवाद-बाजारवाद की बहस को अब आप किस रूप में देखते हैं? अब लगता है इस पर तकनीकी तौर पर होने वाली बहस भी दम तोडती नजर आती है जब प्रधानमंत्री खुद एक निजी कंपनी का विज्ञापन करते नज़र आ रहे हैं।

प्रेम सिंह- यह अब सीधे कारपोरेट पालिटिक्‍स का दौर है। हालांकि भारत में उसका स्‍तर बहुत ही घटिया है। घटियापन और बढेगा इसका आगाज तभी हो गया था जब नरेंद्र मोदी के समर्थन में एक महिला नग्‍नावस्‍था में फूलों के ढेर में लेट गई थी। उसी क्रम में भारत के प्रधानमंत्री को एक धनिक द्वारा कई लाख का सूट पहनाया गया। नवउदारवादी नग्‍नता अपने को इसी तरह ढंकती है! ‘महान राष्‍ट्रवादी’ नेताओं की यह राजनीति है, जिस पर देश के सभी नागरिकों को गौर करना चाहिए।
संविधान, संस्थानों और महत्‍वपूर्ण पदों की गरिमा गिराने में यह सरकार पहले से काफी आगे निकल गई है। खुद पूर्व की भाजपा नीत राजग सरकार से भी। लेकिन समस्‍या का गंभीरतम पहलू यह कि अपने को किसी भी तरह का समाजवादी अथवा सामाजिक न्‍यायवादी कहने वाले ज्‍यादातर बुदि़्धजीवी प्रछन्‍न नवउदारवादी हैं। नवउदारीकरण, न कि सांप्रदायिकता, भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ सत्‍ता में लेकर आया है। पहले की वाजपेयी सरकार भी नवउदारीकरण की देन थी। नवउदारवाद से निजात स्‍वतंत्र और स्‍वावलंबी आर्थिक नीतियों से ही पाई जा सकती है।

7 आपने पहले ही कहा था कि अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल का आंदोलन दरअसल देश की केंद्रीय सत्ता में नवउदारवादी और सांप्रदायिक ताकतों के गठजोड़ को स्थापित करने के लिए चलाया जा रहा है। ऐसे में जो जनवादी राजनीति में यक़ीन करते हैं उनके सामने क्या चुनौतिया हैं

प्रेम सिंह- यह तो उन्‍हें देखना है कि सीधे कारपोरेट की कोख से पैदा आंदोलन, नेता और पार्टी का अंध समर्थन करते हुए वे कितने जनवादी रह जाते हैं और कितने धर्मनिरपेक्ष? पूरा कम्‍युनिस्‍ट खेमा केजरीवाल और उस आम आदमी पार्टी का समर्थक है जिसमें सांप्रदायिक और लुपेंन तत्‍वों की शुरू से भरमार है। 

8 लोकसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन देश की राजनीति का केंद्रीय विषय इस वक्त क्‍या है?

प्रेम सिंह- सरकार का केंद्रीय विषय तो साफ ही है – कारपोरेट की ताबेदारी और सांप्रदायिक-प्रतिक्रियावादी तत्‍वों को उकसा कर देश के सामाजिक-सांस्‍कृतिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाना। जो विपक्ष है वह धर्मनिरपेक्ष तो नहीं ही है, भाजपा से अलग आर्थिक नीतियां भी उसके पास नहीं हैं। वह जानबूझ कर सांप्रदायिकता को केंद्रीय मुद्दा बता और बना रहा है। कांग्रेसी खैरात पर पलने वाले बु‍दि्धीजीवी भी यह कर रहे हैं। हमारे लिए केंद्रीय विषय इस वक्‍त भी और चुनाव के वक्‍त भी नवसाम्राज्‍यवाद को उखाड फेंकना है। साम्राज्‍यवाद से बडा कोई फासीवाद नहीं है। 

9 सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) का आने वाले दिनों में क्या लक्ष्‍य है?

प्रेम सिंह-  नवसाम्राज्‍यवाद को उखाड फेंकने के लिए मुकम्‍मल और निर्णायक जंग। यह हमारे उपर विरासत का सौंपा हुआ कार्यभार है। अगले आम चुनाव तक हम पूरी ताकत से तैयारी करेंगे ताकि सत्‍ता पर दावेदारी ठोंकी जा सके। अगला आम चुनाव हम सही केंद्रीय विषय पर लडेंगे – नवसाम्राजयवादी दायरे में आपस में लडने वाले देशद्रोही और नवसाम्राज्‍यवाद से सीधे भिडने वाले देशभक्‍त।  

10. आपकी अपनी क्‍या भूमिका होने जा रही है्?

प्रेम सिंह- सोशलिस्‍ट पार्टी का पूरे देश में संगठनात्‍मक और सदस्‍यात्‍मक आधार काफी मजबूत हुआ है। कई मोर्चों पर हम काम कर रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले कई महत्‍वपूर्ण साथियों और संगठनों ने पार्टी के साथ एकजुटता दिखाई है। पीयूसीएल, अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच, रिहाई मंच, खुदाई खिदमतगार जैसे महत्‍वपूर्ण नागरिक संगठनों के साथ मिल कर हम काम कर रहे हैं। मैं नौजवानों में अपना काम और ज्‍यादा मजबूती से जारी रखूंगा। बडे शहरों से बाहर छोटे शहरों, कस्‍बों और गांवों में ज्‍यादा काम करेंगे। मुख्‍यधारा मीडिया हमें बाहर रखता है। सोशल मीडिया का ज्‍यादा से ज्‍यादा उपयोग करेंगे। सीमित साधनों में समग्र प्रभाव बनाने की कोशिश की जाएगी। वीडियो उसमें सहायक होंगे। लिहाजा, राजनीति, समाज, शिक्षा, भाषा, संस्‍कृति, धर्म, जाति जैसे ज्‍वलंत मुद्दों को समझने और उन्‍हें सुलझाने पर ऑडियों कैसेट तैयार करके जारी करेंगे। उनमें दी जाने वाली सामग्री तथ्‍यात्‍मक के साथ संवादधर्मी होगी। किसी भी व्‍यक्ति या संगठन पर आरोप या कटाक्ष का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। अपने को सही जताने का भी कोई अर्थ अब नहीं बचा है। सभी विषयों पर सकारात्‍मक सार्थक राजनीतिक विमर्श चलाएंगे।

11 आप लोगों से क्‍या कहेंगे उनका समर्थन हासिल करने के लिए?

प्रेम सिंह- यह करते हुए लोगों से पूछा जाएगा कि क्‍या वे देश की राजनीति को इसी ढर्रे पर चलने देना चाहते हैं या इसमें वास्‍तविक बदलाव की इच्‍छा रखते हैं? बदलाव की इच्‍छा रखते हैं तो वे किस राजनीतिक पार्टी को बदलाव का माध्‍यम बनाना चाहते हैं? अगर सोशलिस्‍ट पार्टी उनका चुनाव हो सकती है तो क्‍या वे चाहते हैं कि सोशलिस्‍ट पार्टी पहले प्रचलित तरीकों से ताकत हासिल करे, तब वे साथ देंगे? या वे साथ देकर सोशलिस्‍ट पार्टी को ताकतवर बनाएंगे? हमारी अपील होगी कि वे सोशलिस्‍ट पार्टी का साथ देकर उसे मजबूत बनाएं। हमें यह विश्‍वास बना कर चलना होगा कि सोशलिस्‍ट पार्टी की विरासत, स्‍वतंत्रता संघर्ष के मूल्‍यों और संविधान की मूल संकल्‍पना के प्रति अडिगता का लोग सम्‍मान करेंगे।

12 आप शिक्षक आंदोलन से संबद्ध रहे हैं। शिक्षा के स्‍वरूप पर सुझाव देने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा गठित अंबानी-बिड़ला कमेटी की रपट की समीक्षा आपने ‘शिक्षा के बाजारीकरण की अंबानी-बिडला कमेटी की रपट’ लिख कर की थी। वह पुस्तिका बहुत पढी और सराही गई थी। शिक्षा पर नवउदारवादी हमले को आप कैसे समझते हैं?

प्रेम सिंह- शिक्षा का भट्टा ही बैठ गया है। मेरा मानना है कि जब देश की पूरी राजनीति नवउदारीकरण की वाहक बन चुकी है तब हमें कुछ क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर तय करके नवउदारीकरण की इस चौतरफा मुहिम को पीछे धकेलना चाहिए। ये क्षेत्र शिक्षा, संसाधन (जल, जंगल, जमीन) और सुरक्षा (डिफेंस) हैं। शिक्षा को पहले नंबर पर रखने का कारण है कि शिक्षा स्‍वतंत्र सोच और चेतना का सर्वप्रमुख स्रोत है। पूरे शिक्षा तंत्र को नवउदारीकरण का तौक पहना कर नवसाम्राज्‍यवादी गुलामी को हमेशा के लिए आजादी देने की कोशिश की जा रही है। इसमें कांग्रेस की भूमिका भाजपा से ज्‍यादा रही है।

13 आम आदमी पार्टी से निकले कुछ नेता स्‍वराज अभियान चला रहे हैं। नई राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला भी किया है। आपका क्‍या कहना है?

प्रेम सिंह- मैं क्‍या कह सकता हूं। अभी तो इसे अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की स्‍वराज पाठशाला का ही एक विस्‍तार मानना चाहिए। स्‍वराज अभियान और प्रस्‍तावित नई पार्टी के बूते कुछ ताकत बना कर अपनी असली पार्टी में वापसी कर सकते हैं।

14 आप असली समाजवादी किसे मानते हैं? स्‍वराज अभियान चलाने वाले समाजवादियों के बारे में आपकी राय?

प्रेम सिंह-  मैं कैसे कह सकता हूं कि कौन असली समाजवादी है और कौन नकली। हां, यह चुटकी जरूर ले सकता हूं कि जो आदमी ही नकली हैं, वे असली समाजवादी या कोई अन्‍य राजनीतिक वादी कैसे हो सकते हैं?

15 सर आपका धन्‍यवाद इतना समय देने के लिए। भारत लौटने पर आपसे मुलाकात करूंगा।

प्रेम सिंह-  जरूर मिलेंगे। तुम्‍हारा भी धन्‍यवाद एक अच्‍छी प्रश्‍नावली तैयार करने के लिए।

         (राजेश कुमार, टीवी पत्रकार)


Sunday, September 11, 2016

विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा -प्रेम सिंह

(ये लेख 26 नवंबर 2012 को लिखा गया था। जब मनमोहन सिंह की अगुवाई में देश में नवउदारवाद के हाथों को मजबूद किया जा रहा था। लेकिन अब ये बहस बेमानी हो गई है। क्योंकि मोदी सरकार में सबकुछ खुल्लमखुल्ला हो रहा है। और जो तथाकथित बुद्धिजीवी हैं वो कॉर्पोरेट के एक और ध्वज वाहक आम आदमी पार्टी की ढपली बजा रहे हैं। )
मनमोहन सिंह के बच्चे
ऐसा माना जा रहा था कि बेतहाशा बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी तथा 2014 में होने वाले आमचुनाव के डर से नवउदारवाद के रास्ते पर यूपीए सरकार के कदम कुछ ठिठकेंगे। चौतरफा लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों से भी सरकार डरेगी। व्यक्तिगत तौर पर मनमोहन सिंह की ईमानदारी का मिथक टूटने का भी सरकार पर कुछ दबाव बनेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पिछले दिनों उनकी सरकार ने बहादुराना अंदाज में, खुद अपनी पीठ ठोंकते हुए, नवउदारवादी सुधारों की रफ्तार तेज कर दी और इस तरह चुनाव के एक-दो साल पहले नवउदारवादी सुधारों को स्थगित रखने की अभी तक बनी रही बाधा को पार कर लिया। पिछले साल नवंबर में संसद में किए गए अपने वादे को तोड़ते हुए खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साल भर से स्थगित फैसले को लागू करने की एकतरफा घोषणा के साथ सरकार ने बीमा, पेंशन और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में भी विदेशी निवेश को स्वीकृति प्रदान की।
पैट्रोल और गैस के दामों में भारी वृद्धि के साथ इन घोषणाओं से सरकार ने कारपोरेट जगत और नवउदारवादी सुधारों के पैरोकारों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह अमीरोन्मुख ग्रोथ की अपनी टेक पर पूरी तरह कायम है। वह गरीबों द्वारा बनाई गई अमीरों की अमीरों के लिए सरकार है। उसने यह भी एक बार फिर से घोषित किया है कि ग्रोथ बढ़ाने के लिए विदेशी निवेश ही एकमात्र संजीवनी है। हर संदेश का एक प्रतिसंदेश होता है। वह नवउदारवादी नीतियों से बदहाल जनता के लिए है कि सरकार अब उसकी चुनावी परवाह भी नहीं करने जा रही है। नवउदारवादी निजाम के पिछले दो दशकों में यह सरकार का निस्संदेह बड़ा जनता विरोधी हौसला है जो उसने दिखाया है। देश में 4 करोड़ खुदरा व्यापारी हैं जिन पर उनके 20 से 25 करोड़ परिवारजनों का भार है। हर हौसले के पीछे अंदरूनी या बाहरी ताकत होती है। सरकार का बढ़ा हुआ हौसला वैश्विक पूंजीवादी ताकतों की देन है।
मनमोहन सिंह जब कहते हैं कि अब कदम पीछे नहीं हटाए जा सकते। यह उनकी मजबूरी का इजहार नहीं है कि रास्ते का चुनाव एक बार हो गया तो उस पर चलना ही होगा। ऐसा नहीं है कि वे चुनाव की गलती से नवउदारवादी रास्ते पर चले गए थे और अब उस पर चलना मजबूरी बन गया है; मजबूरी में उन्हें ये सब निर्णय लेने पड़े हैं। ऐसा होता तो आगे कभी नवउदारवादी नीतियों में बदलाव की आशा बनती। मनमोहन सिंह शुरू से नवउदारवादी रास्ते को ही विकास और सब कुछ का एकमात्र और स्वाभाविक रास्ता मानते हैं। तभी उन्होंने एक बार फिर कहा है कि अगर उन्हें जाना है तो इस रास्ते पर अडिग रह कर लड़ते हुए जाएंगे। अन्यथा रोबो की तरह लगने वाले मनमोहन सिंह नवउदारवाद के बचाव में अत्यंत संजीदा हो जाते है - कुर्बान हो जाएंगे, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे!
मनमोहन सिंह की इस प्रतिभा और जज्बे की पहचान सोनिया गांधी ने बखूबी की है। उन्हें यह साफ पता लग गया कि यही बंदा काम का है जो इस रास्ते पर लाखों के बोल सह कर और लाखों को गारत करके भी पीछे नहीं हट सकता। क्योंकि उनकी खुद की तरह वह कोई और रास्ता जानता ही नहीं है। मामला केवल मनमोहन सिंह को आगे रख कर राहुल गांधी के लिए रास्ता बनाने भर का नहीं है। इस काम के लिए कांग्रेस में चाटुकार नेताओं की कमी नहीं है। लेकिन कांग्रेस का अन्य कोई भी नेता वह नहीं कर सकता था जो मनमोहन सिंह ने किया। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सम्मिलित प्रतिभा ने कांग्रेस के इतिहास और विचारधारा को धो-पोंछ कर उसे एक कारपोरेट पार्टीमें तब्दील कर दिया है। इसीलिए मनमोहन सिंह के बाद राहुल गांधी चाहिए, जिसके जिस्म में मनमोहन सिंह का दिमाग पैदा करने की कवायद लंबे समय से की जा रही है।
लेकिन मनमोहन सिंह का कमाल कांग्रेस के कायापलट तक सीमित ही नहीं है; उन्होंने भारत की पूरी राजनीति को कारपोरेट रास्ते पर डाल दिया है। मनमोहन सिंह ने जो नवउदारवादी ब्रह्मफांसफेंका है, उसमें सब फंसे हैं। उसकी काट आज किसी के पास नहीं है ताकि मानव सभ्यता को पूंजीवादी बर्बरता से मुक्त किया जा सके। मनमोहन सिंह ललकार कर पूछते हैं किसी के पास है तो बताओ? ऐसा नहीं है कि लोग लड़ नहीं रहे हैं या आगे नहीं लड़ेंगे। लेकिन हर बार जीत मनमोहन सिंह की ही होती है। किसी भी तरह साइनिंग इंडियाकी चकाचैंध में पलने वाले इस अंधे युग में पलीता नहीं लग पाता। नरेंद्र मोदी हों या राहुल गांधी या बीच में कुछ समय के लिए कोई क्षेत्रीय क्षत्रप, अभी जीत मनमोहन सिंह की ही होनी है।
जो कहते हैं मनमोहन सिंह अभी तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं, उन्हें अपनी धारणा पर फिर से विचार करना चाहिए। भारत की राजनीति की धुरी को संविधान से उखाड़ कर पूंजीवाद की वैश्विक शक्तियों की उन संस्थाओं, जिन्होंने पूरी दुनिया पर शिकंजा कसा हुआ है, के आदेशें/मूल्यों पर जमा देने में उनकी युगांतरकारी भूमिका है। मुख्यधारा राजनीति में उनकी आलोचना करने वाले नेता दरअसल उन्हीं के आज्ञाकारी बच्चे हैं। उन्हें अभी तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री कहते न थकने वाले अडवाणी और हमेशा उनकी मेंटरको निशाना बनाने वाले नरेंद्र मोदी समेत।
उनकी यह युगांतरकारी भूमिका तभी सफलीभूत हो सकती थी जब वे भारत की कांग्रेसेतर राजनीति को भी अपने पीछे लामबंद करने के साथ बुद्धिजीवियों को भी काबू में कर पाते। ऐसा उन्होंने किया है। मनमोहन सिंह के राज में बुद्धिजीवियों की हालत का क्या कहिए! जिधर देखो मनमोहन सिंह का दिमाग ही चलता नजर आता है। किसी भी समाज के सबसे प्रखर बौद्धिक शिक्षा और शोध के संस्थानों में होते हैं। भारत के विद्यालयों से लेकर विश्‍वविद्यालयों और शोध संस्थनों तक मनमोहन सिंह की खुली हवा चल रही है। भारत के बुद्धिजीवियों के संदर्भ में किशन पटनायक ने जिसे गुलाम दिमाग का छेदकहा था, वह बढ़ कर बड़ा गड्ढा बन गया है।
नवउदारवादी और प्रच्छन्न नवउदारवादी बुद्धिजीवी तो मनमोहन सिंह के सच्चे बच्चे ठहरे, अपने को नवउदारवाद विरोधी कहने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग का दिवाला निकलता जा रहा है। घूम-फिर कर उनका विश्‍लेषण पूंजीवाद का विश्‍लेषण होता है और तर्क भी पूंजीवाद के समर्थन में होते हैं। कारपोरेट पूंजीवाद की हर शै में विकास का दर्शन करने वाले मार्क्‍सवादियों, गांधीवादियों और समाजवादियों की कमी नहीं है। ज्योति बसु यह पुराना मंत्र देकर गए कि पूंजीवाद के बिना समाजवाद नहीं लाया जा सकता। उनके उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अमेरिकी कूटनीतिज्ञों के सामने अपनी पीड़ा का इजहार किया कि कई तरह के दबावों के कारण वे ऊंची पूंजीवादी उड़ान नहीं भर पाते हैं। सिंदूर-नंदीग्राम प्रकरण के वक्त प्रकाश करात ने विरोधियों को विकास विरोधी कह कर लताड़ लगाई थी।
भाजपाई मनमोहन सिंह के मनभाए साथी बने हुए हैं। शाइनिंग इंडियाकी पुकार सबसे पहले उन्होंने ही दी थी। पिछले दिनों इंडियन एक्सप्रैसके स्तंभ लेखक सुधींद्र कुलकर्णी ने एक मोबाइल के विज्ञापन-गीत - जो मेरा है वो तेरा है- को समाजवाद के विचार का सुंदर वाहक बताया। वे वहीं नहीं रुके। उन्होंने उसे गांधी से भी जोड़ा। आप कहेंगे संघी और गांधी ... ? नवउदारवाद का यही कमाल है। उन्हीं दिनों उनकी म्युजिक आॅफ दि स्पीनिंग व्हील: महात्मा गांधीज मेनीफेस्टो फाॅर दि इंटरनेट एजकिताब आई जिसका दिल्ली और बंगलुरू में भव्य विमोचन समारोह हुआ। समारोह में परमाणु ऊर्जा के पैरोकार पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम सहित उद्योग, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और राजनीति जगत की कई हस्तियों ने हिस्सा लिया। नवउदारवाद की बड़ी विभूतियों आजकल बढ़चढ़ कर गांधी-प्रेम का प्रदर्शन करती हैं। ध्यान दिला दें कुलकर्णी साहब भाजपा के सिद्धांतकारों में से एक हैं, जिसके कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में पट्टी पढ़ाई जाती है कि वे ऋषियों-मुनियों की धरोहर के वारिस हैं। गुलाम दिमाग कितनी तरह के पाखंड करता है!
भारत के नागरिक समाज में मनमोहन सिंह के बच्चों की भरमार है। खुद मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की धूम है। लेकिन उन्हें रत्ती भर परवाह नहीं है। वे जानते हैं आरोप लगाने वाले उनके ही दूध पीते बच्चे हैं। भारत माता के स्तनों में तो पूंजीवाद ने दूध की बूंद छोड़ी नहीं है। भारत माता के बच्चे बिलखते हैं और ये चिल्लाते हैं। भारत के नागरिक समाज को गुस्सा बहुत आता है लेकिन उसे कभी ग्लानि नहीं होती। मनमोहन सिंह से ज्यादा कौन जानता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सारी फूफां के बावजूद उसमें शामिल होने वालों ने रत्ती भर भ्रष्टाचार करना बंद नहीं किया है। वे जानते हैं केवल नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, दलाल और माफिया नहीं, हर दफ्तर के बाबू और चपरासी तक भ्रष्टाचार का बाजार पहले की तरह गरम है। पहले की तरह सरकार की गरीबों के लिए बनाई योजनाओं का ज्यादातर पैसा अफसर और बाबू खा जाते हैं।
मनमोहन सिंह जानते हैं उनसे कोई मुक्त होना नहीं चाहता। सब उनके मोहताज हैं। वरना जिस देश में पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोध की भावनाएं हिलोरें ले रही हों, जन लोकपाल कानून जब बनेगा तब बनेगा, आंदोलन में शामिल नागरिक समाज को कम से कम अपना भ्रष्टाचार बंद कर देना चाहिए था। उससे गरीब जनता को निश्चित ही राहत मिलती। आप कहेंगे कि भावना की क्या बात? जब जन लोकपाल कानून बन जाएगा, अपने आप भ्रष्टाचार होना बंद हो जाएगा। नागरिक समाज भी बंद कर देगा। यह भ्रष्ट सरकार कानून बनाए तो!
लेकिन भावना उतनी बुरी नहीं होती। राष्ट्रीय भावना भी नहीं। भावना में निस्संदेह एक ताकत होती है। किशन पटनायक ने अपने प्रबल आर्थिक राष्ट्रवाद का समाधानलेख में कहा है कि अपनी खदानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देना सही है या गलत, इस पर बहस करने वाला उनकी रक्षा नहीं कर पाएगा। सवाल यह उठाया जा रहा था कि केवल भावनाओं में बह कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करना ठीक नहीं है। अभी लोग समझ नहीं रहे हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बहुत गहराई में जाकर नुकसान किया है। अपने वर्ग-स्वार्थ के लिए इसने भावना की ताकत को नष्ट कर दिया है। यह सही है कि इस आंदोलन के केंद्र में खाया-पिया और कुछ हद तक अघाया मध्य वर्ग है। लेकिन शुरू से ही वह जन-भावना का शिकार करने की नीयत से परिचालित है। उसके वर्ग-स्वार्थ की सिद्धि में नवउदारवाद की मार से तबाह जन-सामान्य शामिल हो जाए तो उसका काम पूरा हो जाएगा। इसके लिए अब उसने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली है जिस पर हम थोड़ा आगे विचार करेंगे।
चाहते मनमोहन सिंह भी हैं कि पूंजीवाद का काम बिना भ्रष्टाचार के चले। लेकिन पिछली तीन-चार शताब्दियों का उसका इतिहास बेईमानी और भ्रष्टाचार का इतिहास रहा है। जब अमेरिका में लीमैन ब्रदर्स और गोल्डमैन फैक्स बैंक दिवालिया हुए तो पता चला कि उसके बड़े अफसर किस कदर भ्रष्टाचार में डूबे थे। उपनिवेशवादी दौर के प्रमाण हैं कि उपनिवेशों में आने वाले यूरोपीय मालामाल होकर अपने देश वापस जाते थे। उपनिवेशवादियों ने भ्रष्टाचार की चाट साहब लोगों ने स्थानीय अमले को भी अच्छी तरह लगा दी थी। भारतेंदु ने कहा था ‘‘चूरन साहब लोग जो खाता पूरा हिंद हजम कर जाता।’’ अंग्रेज बहादुर के वारिस अगर हिंद हजम कर रहे हैं तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है। यह व्यवस्था छोटे और मेहनत करने वाले लोगों के शोषण और बड़े और मेहनत नहीं करने वाले वाले लोगों की बेईमानी पर चलती और पलती है। सभी जानते हैं देश में कानूनों की कमी नहीं है और न ही जन लोकपाल कानून बनने से भ्रष्टाचार खत्म होने वाला है। इस व्यवस्था के समर्थक ही कह सकते हैं कि इसे मिटाए बिना भ्रष्टाचार मिटाना है।
यह सही है कि सरकार के नवउदारवादी सुधार तेज करने के निर्णय के पीछे मुख्यतः कारपोरेट पूंजीवाद की वैश्विक शक्तियां हैं। मनमोहन सिंह भारत में उन शक्तियों के स्वाभाविक और सफल एजेंट हैं। इसलिए उन्हें अमेरिकी दबाव और खुदरा व्यापारियों की तबाही के आरोप सनसनी फैलाने वाले लगते हैं। लोग समझते नहीं, लेकिन वे यही कहना चाहते हैं कि अमेरिकी दबाव कब नहीं रहा और पिछले 25 सालों में गरीबों की तबाही कब नहीं हुई? वे कहते हैं कि उनके आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने से लेकर आज तक ये आरोप लगाए जाते रहे हैं। न वे पहले रुके, न अब रुकेंगे। हाय-तौबा करने की जरूरत नहीं है। उससे कुछ नहीं होने वाला है। अमीरोन्मुख ग्रोथ बढ़ाने के लिए गरीबों को मंहगाई और बेरोजगारी की मार झेलनी होगी। उन्हें प्रतिरोध करना छोड़ कर मंहगाई और बेरोजगारी में जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। मनमोहन सिंह को आश्‍चर्य होता है कि 20 साल से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद लोगों को यह आदत नहीं पड़ी है। उन्हें यह आदत डालनी ही होगी। कम से कम तब तक जब तक उनका सफाया नहीं हो जाता!
मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की प्राथमिकता मंहगाई और बेरोजगारी रोकना नहीं, उसके चलते होने वाले प्रतिरोध का दमन करना बन गई है। संसाधनों की मिल्कियत कंपनियों को सौंपने और खुदरा समेत विभिन्न क्षेत्रों में कंपनियों को न्यौतने के फैसलों के विरोध का दंड कड़ा होता है। मनमोहन सिंह जब कहते हैं, उन्हें जाना है तो लड़ते हुए जाएंगे, तो उनकी लड़ाई को कोरा लोकतांत्रिक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उनके दिमाग में अपनी लड़ाई में सुरक्षा बलों को शामिल रखने की बात होती है। देश के कई हिस्सों में जो हालात बने हुए हैं वे बताते हैं कि देश को पुलिस स्टेट बनाने में उन्हें कोई हिचक नहीं है।
सरकार के खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले की समीक्षा हम यहां नहीं करने जा रहे हैं। उसके लिए हमारा खुदरा में विदेशी निवेश: नवउदारवाद के बढ़ते कदम(‘युवा संवाद, फरवरी 2012) ‘समय संवाददेखा जा सकता है। हम यह कहना चाहते हैं कि खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सीनाजोरी फैसले के पीछे भले ही और निश्चित ही वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था और उसे चलाने वाली संस्थाओं/शक्तियों का हाथ है, लेकिन उसका एक बड़ा कारण घरेलू भी है। यह फैसला मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ने इसलिए बेधड़क होकर लिया है, क्योंकि पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने नवउदारवाद के वास्तविक विरोध के समस्त प्रयासों को पीछे धकेल दिया या धूमिल कर दिया है।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नेता अब राजनीतिक पार्टी बना रहे हैं। वह पार्टी, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, चुनावों में कांग्रेस और भाजपा का नहीं, बल्कि नवउदारवाद की वास्तविक विरोधी और समाजवाद की समर्थक छोटी पार्टियों, जनांदोलनकारी संगठनों/समूहों और लोगों का विरोध करेगी। महज संयोग नहीं है कि कांग्रेस का हाथ भी आम आदमी के साथ है और नई पार्टी बनाने वाले भी मैं आम आदमी हूं’’ लिखी टोपी पहनते हैं। चलते-चलते पता चला है कि उन्होंने पार्टी का नाम भी आम आदमी पार्टी रखा है। मनमोहन सिंह के ये बच्चे उनकी उनकी सहूलियत के लिए उनकी जमात को ही नहीं, एजेंडे को भी आगे बढ़ाएंगे।
कौन है आम आदमी?
हम हर बार सोचते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर नहीं लिखेंगे। लेकिन ऐसी बाध्यता महसूस होती है कि इस परिघटना का साथ-साथ कुछ न कुछ विश्‍लेषण होना चाहिए। गंभीर विश्‍लेषण और मूल्यांकन बाद में विद्वान करेंगे ही। आम आदमी पार्टी के बारे में पांच-सात सूत्रात्मक बातों के अलावा हमें कुछ नहीं कहना है। पहली यह कि नवगठित पार्टी छोटी पार्टियों, मसलन समाजवादी जन परिषद (सजप) और जनांदोलनों, मसलन जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) में तोड़-फोड़ करने में कामयाब हुई है। जाहिर है, इस दिशा में आगे भी काम जारी रहेगा। दूसरी यह कि अन्ना हजारे से इस पार्टी का अलगाव नहीं है। पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने उन्हें अपना गुरु बताया है और अन्ना ने पार्टी के अच्छेउम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने का भरोसा दिया है। पूरे आंदोलन में सक्रिय रहने वाली मेधा पाटकर कहती हैं कि आरोप लगाने से कुछ नहीं होगा, भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने की जरूरत है। यानी वे यह बता रही हैं कि अलग पार्टी बनाने का फैसला करने वाले महज आरोप लगाने वाले हैं और उसमें शामिल नहीं होने वाले भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने वाले। लेकिन वह काम बिना राजनीति के और पूंजीवादी व्यवस्था को बदले बगैर नहीं हो सकता। इस काम के लिए उनसे बार-बार कहा गया लेकिन उन्हें वह रास्ता पसंद नहीं है। उन्हें देखना चाहिए कि वे वाया अन्ना, केजरीवाल की पार्टी में शामिल हो गई हैं। जो लोग अपने को अन्ना के साथ मान कर पार्टी से अलग मान रहे हैं, वे खुद अपने को मुगालते में रखने की कोशिश करते हैं। पार्टी न अन्ना से अलग है, न रामदेव से और न दोनों की मानसिकता से। मनमोहन सिंह से अलग तो है ही नहीं।
तीसरी बात हम यह कहना चाहते हैं कि इस पार्टी के निर्माण की पूरी रणनीति कपट से भरी रही है। संप्रदायवादियों और आरक्षण विरोधियों को पूरा भरोसा दिलाने के बाद अब धर्मनिरपेक्षतावादियों और सामाजिक न्यायवादियों को अपने लपेटे में लेने की कोशिश की जाएगी। चुनावी जीत के लिए जरूरी मुसलमानों को वोट बैंक बनाने की भी कोई जुगत रची जाएगी। कहने की जरूरत नहीं कि कपटपूर्ण रणनीति से निकली पार्टी का नाम भी कपट से भरा है, जिस पर हम आगे विचार करेंगे। यहां यह बताना चाहते हैं कि इस पूरे खेल में कपट-क्रीड़ा के साथ एक-दूसरे को इस्तेमाल करने का खेल भी चल रहा है। बानगी के लिए अन्ना और केजरीवाल के बीच की लप्प-झप्प देखी जा सकती है। अन्ना ने केजरीवाल से अपना और आईएसी का नाम इस्तेमाल करने से मना किया है। यह बात उन्हें तब ख्याल नहीं आई जब केजरीवाल उन्हें मसीहाबना रहे थे।
अन्ना भी एनजीओ की पैदावार हैं और केजरीवाल भी। बाकी जीवन व्यापारों की तरह एनजीओ व्यापार भी स्थैतिक यानी ठहरा हुआ नहीं होता। लिहाजा, अन्ना के एनजीओ व व्यक्तित्व और केजरीवालों के एनजीओ व व्यक्तित्व में समय के अंतराल के चलते काफी फर्क है। लोहिया का शब्द लें तो नए एनजीओबाज लोमड़ वृत्ति के हैं। उसके सामने अन्ना जैसा कच्छप गति वाला व्यक्ति इस्तेमाल होने को अभिशप्त है। अन्ना के समय में मीडिया क्रांति नहीं हुई थी। लोग बताते हैं कि उन्हें फोटो वगैरह खिंचवाने के लिए मीडिया वालों का काफी इंतजार करना पड़ता था। कई बार निराशा भी हाथ लगती थी। मीडिया में प्रसिद्धि की उनकी भूख का केजरीवाल ने बखूबी इस्तेमाल किया है। अभी दोनों में और टीम के बाकी प्रमुख लोगों में एक-दूसरे को इस्तेमाल करने के दावपेंच देखने मिलेंगे। एक-दूसरे को इस्तेमाल करने का खेल इसकी जरा भी शर्म किए बगैर चलेगा कि ये सभी महाशय पूंजीवादी साम्राज्यवाद के समग्र खेल में इस्तेमाल हो रहे हैं। आप कह सकते हैं फिर भला मनमोहन सिंह को ही क्यों शर्म आनी चाहिए!
चौथी बात यह कि यूथ फाॅर इक्वैलिटीमें विश्‍वास करने वाली पार्टी यह भली-भांति जानती है कि भारत में युवा शक्ति का मतलब अगड़ी सवर्ण जातियों के युवा होते हैं। इस पार्टी का दारोमदार उन्हीं पर है और रहेगा। सुना है पार्टी की स्थापना के मौके पर तलवार वगैरह भांजी गई हैं। पांचवी बात यह कि समाजवादियों ने एक बार फिर अपनी जातदिखा दी है। अभी तक वे संघियों और कांग्रेसियों के पिछलग्गू थे, अब एनजीओबाजों के भी हो गए हैं। किशन पटनायक को गुरु धारण करने वाले केजरीवाल के शिष्य बन गए हैं। मामला यहीं नहीं रुकता। जो वरिष्ठ समाजवादी लोहिया को ही पहला, अकेला और अंतिम गुरु मानते रहे और दूसरों को चरका देते रहे, उन्होंने भी केजरीवाल को राजनीतिक गुरु मानने में परेशानी नहीं हुई। मेधा पाटकर ने अन्ना को गुरु कबूल किया है तो वे केजरीवाल की गुरुबहन हो गईं। आजकल के गुरु लोग अपनी सुरक्षा का निजी इंतजाम रखते हैं। भारतीय किसान यूनियन ने खुद आगे बढ़ कर यह जिम्मेदारी उठा ली है।
छठी बात यह है कि इस पार्टी के बनाने में वे सभी शामिल हैं जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल और उसके समर्थक थे। क्योंकि यह पार्टी, जैसा कि कुलदीप नैयर ने उसकी तारीफ में कहा है, ‘आंदोलन की राख से उठी है। अति वामपंथियों से लेकर अति गांधीवादियों तक ने अन्ना की टोपी पहन ली थी। उनमें सामान्य कार्यकर्ता, बड़े नेता और बुद्धिजीवी शामिल थे। आज भी अपने को अल्ट्रा मार्क्‍सवादी जताने वाले कई साथी केजरीवाल के पोल खोलकार्यक्रम पर उन्हें सलाम बजाते और उनके आंदोलन में नैतिक आभा कम न हो जाए, इस पर चिंतित होते देखे जा सकते हैं। यहां हम थोड़ा बताना चाहेंगे कि हमने बिल्कुल शुरू में आगाह किया था कि कम से कम ऐसे राजनीतिक संगठनों और लोगों को इस आंदोलन का हिस्सा नहीं होना चाहिए जो समाजवादी विचारधारा और व्यवस्था में विश्‍वास करते हों। लेकिन जब एबी बर्द्धन और वृंदा करात जैसे अनुभवी नेता रामलीला मैदान जा पहुंचे तो बाकी की क्या बिसात थी। राजनैतिक डर उन्हें उस आंदोलन में खींच ले गया जिसमें उमा भारती से लेकर गडकरी तक, चैटाला से लेकर शरद यादव तक शिरकत करने पहुंचे। बाद में तो सबके लिए खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया।
उनमें यह डर नहीं पैदा होता अगर उन्होंने समाजवाद की किताबी से ज्यादा जमीनी राजनीति की होती। वे विवेकानंद से लेकर अंबेडकर तक को अपने शास्त्र में फिट करने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके शास्त्र से कोई स्वतंत्र संवाद किया जा सकता है, जैसा कि भारत में आचार्य नरेंद्र देव, जेपी और लोहिया ने किया, यह उन्हें बरदाश्‍त नहीं है। उन्हें चीन का मार्केट सोशलिज्ममंजूर है, लेकिन देशी समाजवादकी बात करने के बावजूद भारतीय समाजवादी चिंतकों को बाहर रखते हैं। दरअसल, यह डर हमेशा बने रहना है; उसी तरह जैसे शास्त्र को प्रमाण मानने वाला ब्राह्मण हमेशा डरा रहता है और रक्षा के लिए बार-बार देवताओं के पास भागता है।
सातवीं बात यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में नवउदारवाद के खिलाफ वास्तवकि संघर्ष को निरस्त करने की राजनीति पहले से निहित थी। उसे ही तेज करने के लिए नई पार्टी बनाई गई है। लिहाजा, कुछ भले लोगों का यह अफसोस जताना वाजिब नहीं है कि राजनीति जैसी गंदी चीज में इन अच्छे लोगों को नहीं पड़ना चाहिए। आठवीं बात यह कि एनजीओ वालों को धन देकर काम कराने की आदत होती है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में यह काम खूब हुआ है। पार्टी में भी होगा। एक वाकया बताते हैं। हम लोग सितंबर के अंतिम सप्ताह में जंतर मंतर पर एफडीआई के खिलाफ क्रमिक भूख हड़ताल पर थे। 23 सितंबर को वहां केजरीवाल का कार्यक्रम था। सुबह दस बजे से कुछ युवक और अधेड़ तिरंगा लेकर एक कोने से दूसरे कोने तक चक्कर लगाने लगे। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे इक्कीस सौ रुपया की दिहाड़ी पर हरियाणा से आए हैं।
जैसा कि अक्सर होता है, जंतर मंतर पर पूरा दिन और कुछ देर के लिए होने वाले कई कार्यक्रम थे। केजरीवाल के समर्थकों द्वारा बजाए गए डीजे की तेज आवाज ने सभी को परेशान करके रख दिया था। देशभक्ति के फिल्मी गीत बार-बार बजाए जा रहे थे। पुलिस का एक वरिष्ठ कांस्टेबल हमारे पास आया कि हम उन्हें तेज आवाज में डीजे बजाने से रोकें, क्योंकि वे उसके कहने से नहीं मान रहे हैं। डीजे पूरा दिन लगातार बजता रहा। शाम के वक्त केजरीवाल आए और उनका भाषण शुरू हुआ तो उनके समर्थकों ने हमसे आदेश के स्वर में माइक व भाषण बंद करने को कहा। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें डपटा तो वे आंखें दिखाने लगे। हमने खुद उन्हें समझा कर वहां से हटाया।
नौवीं बात है कि कांग्रेस और भाजपा का चेहरा काफी बिगड़ गया है। क्षेत्रीय दलों के नेताओं में एक भी अंतरराष्ट्रीयकेंडे का नहीं है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद के नेटवर्क से जुड़े अपने अधीनस्थ देशों में साफ-सुथरे चेहरों की पार्टी, जो लोकतंत्र की सबसे ज्यादा बात करे, अमेरिका की अभिलाषा होती है। जो देश उसके नेटवर्क में फंसने से इनकार करते हैं वहां वह खुद हमला करके अपने माफिक नेता बिठा देता है। पार्टी का पंजीकरण हुए बिना ही अगले आम चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार लड़ाने की घोषणा बताती है कि नई पार्टी के लिए धन की कोई समस्या नहीं होगी।
दसवीं और अंतिम बात यह कि यह सब प्रदर्शन - मैं अन्ना हूं, ‘मैं केजरीवाल हूं, ‘मैं आम आदमी हूं- हद दरजे का बचकानापन है। मुक्तिबोध ने भारत के मध्यवर्ग की इस प्रवृत्ति को दुखों के दागों को तमगे-सा पहनाकह कर अभिव्यक्त किया है। कपट, इस्तेमाल-वृत्ति और लफ्फाजी से भरे आंदोलन से कोई जेनुइन राजनीतिक पार्टी नहीं निकल सकती है।
पार्टी को एक तरफ छोड़ कर आम आदमीपर थोड़ी चर्चा करते हैं जिसकी दावेदारी में कांग्रेस और भाजपा नई पार्टी के साथ उलझे हैं। लाखों-करोड़ों में खेलने वाले लोग जब मैं आम आदमी हूंकी टोपी लगाते हैं तो उसका पहला और सीधा अर्थ गरीबों के उपहास में निकलता है। अगर लाखों की मासिक तनख्वा और फोर्ड फाउंडेशन जैसी पूंजीवाद की जमी हुई संस्थाओं से करोड़ों का फंड पाने वाले लोग अपने को आम आदमी कहें, तो यह गरीबों के सिवाय अपमान के कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर जो अकूत खर्चा किया गया है, वह दरअसल इस पार्टी के निर्माण पर किया गया खर्च है। आम आदमी से अगर मुराद गरीबों से है, जैसे कि दावे हो रहे हैं, तो कोई उन्हें इतना धन देने वाला नहीं है कि वे अपनी पार्टी धन की धुरी पर खड़ी कर सकें। गरीबों की किसी भी पार्टी को याराना पूंजीवाद का यार याराना मीडिया दिन-रात तो क्या, कुछ सेकेंड तक नहीं देगा। लिहाजा, यह स्पष्ट है कि आम आदमी का अर्थ गरीब आदमी नहीं है - न कांग्रेस के लिए, न आम आदमी की टोपी पहनने वालों के लिए।
आम आदमीकी अवधारणा पर थोड़ा गंभीरता से सोचने की जरूरत है। आजादी के संघर्ष के दौर में और आजादी के बाद आम आदमी को लेकर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में काफी चर्चा रही है जिसका साहित्य और कला की बहसों पर भी असर पड़ा है। साहित्य में आम आदमी की पक्षधरता के प्रगतिवादियों के अतिशय आग्रह से खीज कर एक बार हिंदी के व्यक्तिवादीसाहित्यकार अज्ञेय ने कहा कि आम आदमी आम आदमी ... आम आदमी क्या होता है?’ उनका तर्क था कि साहित्यकार के लिए सभी लोग विशिष्ट होते हैं। राजनीति से लेकर साहित्य तक जब आम आदमी की जोरों पर चर्चा शुरू हुई थी, उसी वक्त आम आदमी का अर्थ भी तय हो गया था। उस अर्थ में गांधी का आखिरी आदमी कहीं नहीं था। आम आदमी की पक्षधरता और महत्ता की जो बातें हुईं, वे शुरू से ही मेहनत-मजदूरीकरने वाले गरीब लोगों के लिए नहीं थीं।
सब टीवी पर एक सीरियल आरके लक्ष्मण की दुनियाआता है। उसका उपशीर्षक होता है आम आदमी के खट्टे मीठे अनुभव। यह सीरियल उस आम आदमी की तस्वीर पेश करता है जो आम आदमी की अवधारणा में निहित रही है। ये आम आदमी ज्यादातर नौकरीपेशा हैं, साफ-सुथरी और सुरक्षित हाउसिंग सोसायटी के फ्लैट में रहते हैं, मोटे-ताजे सजे-धजे होते हैं, स्कूटर-कार आदि वाहन रखते हैं, आमदनी बहुत नहीं होती लेकिन खाने-पीने, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, सैर-सपाटा-पिकनिक, बच्चों का कैरियर आदि ठीक से संपन्न हो जाते हैं। मध्य वर्ग ने आम आदमी की अवधारणा में अपने को ही फिट करके उसकी वकालत और मजबूती में सारे प्रयास किए हैं और आज भी वही करता है। आम आदमी मध्यवर्गीय अवधारणा है। उसका गरीब अथवा गरीबी से संबंध हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मध्यवर्ग को अपने केंद्र में लेकर चलने वाली आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का यह वायदा रहा है कि वह किसी को भी गरीब नहीं रहने देगी। दूसरे शब्दों में, जो गरीब हैं, उन्हें होना ही नहीं चाहिए। भारत का यह महानमध्यवर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह सब कुछ अपने लिए चाहता हैं, लेकिन गरीबों का नेता होने की अपनी भूमिका को छोड़ना नहीं चाहता। इस पाखंड ने भारत की गरीब और आधुनिकता में पिछड़ी जनता को अपार जिल्लत और दुख दिया है।
भारत का मध्यवर्ग मुख्यतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनता है। यही कारण है कि इस आंदोलन और उससे निकली पार्टी का वर्णाधार अगड़ी सवर्ण जातियां हैं, जिनका साथ दबंग पिछड़ी जातियां देती हैं। इसी आधार पर पार्टी के नेताओं ने युवकों का आह्वान किया है कि वे जातिवादी नेताओं को छोड़ कर आगे आएं और मध्यवर्ग नाम की नई जाति में शामिल हों। यहां उनकी जात भी ऊंची होगी और वर्ग-स्वार्थ भी बराबर सधेगा।

राजनीति में विदेशी निवेश 
आम आदमी पार्टी का बनना अचानक या अस्वाभाविक घटना नहीं है। किशन पटनायक ने एक जगह आक्रोश में कहा है कि जब देश में विदेशी धन से सब हो रहा है, पेड़ तक विदेशी धन से लग रहे हैं, तो अमुक क्षेत्र में विदेशी निवेश क्यों नहीं होगा? आज वे होते तो कहते कि विदेशी धन से चलने वाले एनजीओ जब समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, मानवाधिकार, नागरिक अधिकार, लोकतंत्र सुधार/संवर्द्धन आदि का काम बड़े पैमाने पर करते हैं तो राजनीति क्यों नहीं करेंगे? एनजीओ पूंजीवादी व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं जो उसके विरोध की राजनीतिक संभावनाओं को खत्म करते हैं। वे बताते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था अपने में पूर्ण और अंतिम हैं। अगर किसी समाज में समस्याएं हैं तो वहां के निवासी एनजीओ बना कर धन ले सकते हैं और उन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। उसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध करने की जरूरत नहीं है।
देश में जब सब क्षेत्रों में धड़ाधड़ एनजीओ काम कर रहे हैं तो राजनीति भी अपने हाथ में लेने की कोशिश करेंगे ही। आखिर सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (नैक) में कितने एनजीओ वालों को खपाया जा सकता है? सुनते हैं, केजरीवाल नैक में शामिल होना चाहते थे, लेकिन वहां जमे उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उनका रास्ता रोक दिया। आखिर आदमी केवल प्रवृत्ति नहीं होता; उसकी अपनी भी कुछ फितरत होती है। मनमोहन सिंह का यह बच्चा रूठ कर कुछ उच्छ्रंखल हो गया है। उच्छ्रंखलता ज्यादा न बढ़े, इसके लिए कतिपय पालतू बच्चे पार्टी में शामिल हो गए हैं। यह उनका अपना निर्णय है या खुद मनमोहन सिंह मंडली ने उन्हें वहां भेजा है, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है।
एनजीओ द्वारा कार्यकर्ताओं को हड़पने की समस्या पहले भी रही है। फर्क इतना आया है कि एनजीओं के जाल में पुराने लोग भी फंसने लगे हैं। यह स्थिति नवउदारवादी व्यवस्था की मजबूती की दिशा में एक और बढ़ा हुआ कदम है। इस बीच घटित एक वाकये को रुपक के रूप में पढ़ा जा सकता है। 1995 में बनी राजनीतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) के वरिष्ठ नेता सुनील एक प्रखर विचारक और प्रतिबद्ध समाजवादी कार्यकर्ता हैं। जेएनयू से अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद से वे पूर्णकालिक राजनीतिक काम कर रहे हैं। किशन पटनायक द्वारा शुरू की गई सामयिक वार्ताका समता संगठन और बाद में सजप के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। किशन जी के रहते ही यह पत्रिका अनियमित होने लगी थी जिसकी उन्हें सर्वोपरि चिंता थी।
उनके बाद पत्रिका के संपादक बने साथी ने उसे अपना प्राथमिक काम नहीं बनाया। जबकि संपादकी की जिम्मेदारी लेने वाले किसी भी साथी को उसे अपना प्राथमिक काम स्वीकार करके ही वैसा करना चाहिए था। इस दौरान पत्रिका की नियमितता पूरी तरह भंग हो गई। अब पिछले दो-तीन महीने से सुनील उसे केसला-इटारसी से निकालने और फिर से जमाने की कोशिश कर रहे हैं। सुनील राजनीति करने वाले थे और संपादक बने साथी फोर्ड फाउंडेशन से संबद्ध हैं। अब सुनील पत्रिका निकाल रहे हैं और राजनीति करने का काम किशन जी के बाद संपादक बने साथी ने सम्हाल लिया है। सजप के भीतर यह फेर-बदल होता तो उतनी परेशानी की बात नहीं थी। उनका मन बड़ा है! वे केजरीवाल की नई पार्टी की राजनीति कर रहे हैं। कह सकते हैं, जो जहां का होता है, अंततः वहीं जाता है। लेकिन इस नाटक में बड़ी मशक्कत से खड़े किए गए एक संगठन और उससे जुड़े नवउदारवाद विरोधी संघर्ष का काफी नुकसान हुआ है। कहना न होगा कि इससे किशन पटनायक की प्रतिष्ठा को भी धक्का लगा है। आप समझ गए होंगे हम साथी योगेंद्र यादव की बात कर रहे हैं। हमने इस प्रसंग को रूपक के बतौर रखा है, जिसमें सुनील और योगेंद्र व्यक्ति नहीं, दो प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं।
साम्राज्यवाद की सगुणता के कई रूप हैं। विदेशी धन उनमें शायद मूलभूत है। पूरी दुनिया में बिछा बहुराष्ट्रीय कंपनियों और एनजीओ का फंदा उसीसे मजबूती से जुड़ा है। विदेशी धन, चाहे कर्ज में आया हो चाहे खैरात में, वह खलनायक है जो हमारे संसाधनों, श्रम और रोजगार को ही नहीं लूटता, स्वावलंबन और स्वाभिमान का खजाना भी लूट लेता है। उसके बाद कितना भी तिरंगा लहराया जाए, देशभक्ति के गीत गाए जाएं, न स्वावलंबन बहाल होता है न स्वाभिमान। केवल एक झूठी तसल्ली रह जाती है। सोवियत संघ के विघटित होने के बाद यह प्रकाश में आया कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को वहां से कितना धन मिलता था। उस समय गुरुवर विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने हमें बगैर पूछे ही कहा कि क्या हुआ, धन क्रांति करने के लिए लिया था।सवाल है कि अगर लिया था तो क्रांति का क्या हुआ? एक दौर के प्रचंड समाजवादी जाॅर्ज फर्नांडीज पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने सोशलिस्ट इंटरनेशनल से धन लिया। वे भी सोचते होंगे कि उन्होंने धन समाजवादी क्रांति करने के पवित्र उद्देष्य के लिए लिया है। आज वे कहां हैं बताने की जरूरत नहीं। विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा।
नई पार्टी ने स्वराज लाने की बात कही है। लेकिन वह झांसा ही है। एनजीओ वाले कैसे और कैसा स्वराज लाते हैं उसका जिक्र हमने भ्रष्टाचार विरोध: विभ्रम और यथार्थशीर्षक समय संवादमें किया है जो अब इसी नाम से प्रकाशित पुस्तिका में उपलब्ध है। अब दोनों ही बातें हैं। नुकसान की भी और फायदे की भी। फायदे की बात पर ध्यान देना चाहिए। जो इस नवउदारवादी प्रवाह में शामिल नहीं हुए, उनकी समझ और रास्ता अब ज्यादा साफ होंगे। जो शामिल हुए, लेकिन लौट आए, यह अफसोस करना छोड़ दें कि कितनी बड़ी ऊर्जा बेकार चली गई! ऊर्जा कभी बेकार नहीं जाती। वह जिस काम के लिए पैदा हुई थी, वह काम काफी कुछ कर चुकी है और आगे करेगी। साथी अपना काम इस बार ज्यादा ध्यान से करें। उनके पास यह ताकत कम नहीं है कि वे बदलाव नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम देश की बदहाल आबादी के साथ धोखाधड़ी नहीं कर रहे हैं।
लोग राजनीति को कहते हैं, हमारा मानना है कि मानव जीवन ही संभावनाओं का खेल है। यह भी हो सकता है मोहभंग हो और नई पार्टी से कुछ लोग बाहर आएं। जीवन में सीख की बड़ी भूमिका होती है। उससे नवउदारवाद विरोधी आंदोलन को निश्चित ही ज्यादा बल मिलेगा।


26 नवंबर 2012