Monday, August 14, 2017

स्वतंत्रता दिवस के कर्तव्य-प्रेम सिंह

डाॅ. प्रेम सिंह का यह लेख ‘समय संवाद‘ स्तंभ के 

अंतर्गत मासिक पत्रिका ‘युवा संवाद‘ के सितंबर 2013 अंक में प्रकाशित हुआ था। यह लेख प्रेम सिंह के चिंतन में निहित नवसाम्राज्यवाद के बरक्स समग्र नेरेटिव को सामने लाता है। आपके पढ़ने के लिए इसे स्वतंत्रता दिवस पर फिर जारी किया गया है। कुछ समय निकाल कर इसे जरूर पढ़ना चाहिए। विशेषकर सरोकारधर्मी युवाओं को। )

आत्मालोचन का दिन


पिछले स्वतंत्रता दिवस के ‘समय संवाद’ और उसके आगे-पीछे हमने जो लिखा] इस स्वतंत्रता दिवस पर उससे अलग कुछ कहने के लिए नहीं है। कहना एक ही बार ठीक रहता है। भले ही वह स्वतंत्रता जैसे मानव जीवन और मानव सभ्यता के संभवतः सर्वोपरि मूल्य के बारे में हो। दोहराव के भय से इस बार का ‘समय संवाद’ हम नहीं लिखना चाहते थे। फिर सोचा कि शासक वर्ग और उसका प्रस्तोता मीडिया दिन-रात दोहरावों की झड़ी लगाए रहते हैं तो हमें भी किंचित दोहराव के बावजूद अपनी बात कहनी चाहिए। आइए] भारी सुरक्षा घेरे में गांधी के आखिरी आदमी से बहुत दूर और ऊंचे आयोजितछियासठवें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश की आजादी के बारे में कुछ चर्चा और सवाल करें। इस आशा के साथ कि सड़सठवें साल में देश की आजादी पर आए संकट को समझा जाएगा और उसका मुकाबला हो पाएगा। 


जिस आजादी पर हासिल होने के दिन से ही अधूरी होने का ठप्पा लगा हो] हर स्वतंत्रता दिवस पर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वह उत्तरोत्तर पूर्णता और मजबूती की ओर अग्रसर है। अगर किसी वर्ष कोई ऐसी घटना या फैसला सरकार] राजनीति अथवा नागरिक समाज के स्तर पर हो गया हो] जिससे आजादी का अवमूल्यन हुआ हो और वह खतरे में पड़ी हो] तो स्वतंत्रता दिवस के मौके पर यह सुनिश्चित किया जाए कि वह गलती स्वीकार करके उसे ठीक कर लिया गया गया है। स्वतंत्रता दिवस यह देखने का भी मौका होता है कि वैचारिक और नीतिगत मतभेदों के बावजूद आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने के दायित्व पर सभी राजनीतिक पार्टियां] संगठन और नागरिक समाज एकमत हैं। भारत जैसे विशाल और बहुलताधर्मी देश में अलग-अलग समूहों की अपने हितों की चिंता वाजिब है] लेकिन इस मौके पर हम यह देखें कि समग्रता में उससे देश की आजादी की काट न हो। यह सुनिश्चित करें कि बुद्धिजीवी खास तौर पर सावधान हैं] ताकि नई पीढ़ी आजादी का मूल्य भली-भांति समझ कर अपना कर्तव्य निर्धारित करती और निभाती चले। स्वतंत्रता दिवस और उसके आगे-पीछे आजादी के तराने गाने] तिरंगा लहराने और शहीदों के गुणगान का तभी कोई अर्थ है। स्वतंत्रता दिवस पर हम यह सुनिश्चित करें कि देश की आजादी को सच्चा प्यार करके ही उसके लिए कुर्बानी देने वालों का सच्चा सम्मान किया जा सकता है। 


सवाल है कि क्या प्रत्येक आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर देश की आजादी पूर्णता और मजबूती की तरफ बढ़ती है(गलतियां अगर होती हैं तो क्या उनसे सीख लेने की कोई नजीर सामने आती है( आजादी के प्रति सभी सरकारों] राजनीतिक पार्टियों और नागरिक समाज का साझा संकल्प है( अपने हितों की चिंता करने वाले समूह समग्रतः आजादी की रक्षा का ध्यान करके चलते हैं क्या देश के बुद्धिजीवी अपनी भूमिका में मुस्तैद हैं( क्या नई पीढ़ी आजादी के प्रति अपना कर्तव्य समझती है( क्या हम शहीदों का सच्चा सम्मान करते हैं?


बिना गहरी जांच-पड़ताल के पता चल जाता है कि ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं होने की चिंता भी ज्यादातर नेताओं से लेकर नागरिक समाज तक नहीं दिखाई देती। बल्कि कह सकते हैं कि पिछले 25 स्वतंत्रता दिवसों पर लाल किले से नवसाम्राज्यवादी गुलामी का परचम फहराया जाता रहा है। लाल किले के भाषण में बच्चों से लेकर नौजवानों तक आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने का संदेश नहीं दिया जाता। ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियां] नागरिक समाज और बुद्धिजीवी आजादी के इस अवमूल्यन में बेहिचक शामिल हैं।


15 अगस्त 1947 को मिली राजनीतिक आजादी को अधूरा माना गया था। कहा गया था कि अभी आर्थिक आजादी हासिल करना है। पिछले करीब तीन दशकों में आर्थिक गुलामी का तौक गले में डाल कर राजनीतिक आजादी को भी लगभग गंवा दिया गया है। हर साल शानोशौकत से स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाने और देशभक्ति का भारी-भरकम प्रदर्शन करने के बावजूद] लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गई आजादी नहीं] नवसाम्राज्यवादी गुलामी पूर्णता और मजबूती की ओर बढ़ती जाती है। नवसाम्राज्यवादी गुलामी का गहरा रंग देखना हो तो कोई भारत आए। यहां कारपारेट पूंजीवाद की गुलामी में पगे नेताओं] खिलाडि़यों] कलाकारों] बुद्धिजीवियों] सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का उत्साह और उमंग देख कर लगता है मानो वे विज्ञापन की दुनिया के माॅडल हों! मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी मंडली ही नहीं] एपीजे अब्दुल कलाम और लालकृष्ण अडवाणी भारत के महाशक्ति बनने के गीत गाते नहीं थकते हैं। अधूरी आजादी का पूरा फायदा उठा कर भारत का शासक वर्ग कंपनियों के मुनाफे की वस्तु बन गया है।


इस उमंग भरे माहौल का दबदबा इतना ज्यादा है कि नवउदारवाद-विरोध की लघुधारा के कतिपय वरिष्ठ आंदोलनकारी और बुद्धिजीवी भी उसकी चपेट में आ जाते हैं। दोबारा पटरी पर आना उनके लिए कठिन हो जाता है। ऐसे में]नवउदारवादी नीतियों के चलते उच्छिष्ट का ढेर बना दी गई विशाल आबादी की दशा समझी सकती है। वह खटती और मरती भी है] और नकल भी करती है। इस तरह पूंजीवाद अपने शासक वर्ग के साथ-साथ अपनी (गुलाम) जनता भी तैयार करता चलता है।


इस बीच आरएसएस से लेकर गांधीवादी] समाजवादी] मार्क्‍सवादी आदि सभी राजनीतिक-वैचारिक समूह आजादी पर आने वाले संकट और उसे बचाने की चिंता जता चुके हैं। लेकिन नवसाम्राज्यवाद की ताकत कहिए या आजादी की सच्ची चेतना का अभाव या दोनों] उस चिंता का खोखलापन अथवा कमजोरी जगजाहिर होते देर नहीं लगती। आजादी बचाने की पुकार उठती है और बुलबुले की तरह फूट जाती है। ऐसा नहीं है कि आजादी को बचाने के सच्चे प्रयास नहीं हुए या अभी नहीं हो रहे हैं] लेकिन सच्चाई यही है कि इस मामले में शोर ज्यादा मचाया गया है। आजादी को बचाने के लिए ठोस विचार और रणनीति के तहत दीर्घावधि आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया है। आज की हकीकत यह है कि आजादी बचाने की वास्तविक चिंता करने वाले लोग अब बहुत थोड़े और उपेक्षित हैं।


ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता दिवस पर सर्वाधिक गंभीरता और प्राथमिकता से देश के पराधीन होते जाने की परिघटना पर विचार होना चाहिए। उसके बगैर न केवल नवउदारीकरण के दौर में भिखारी बना दी गई जनता के लिए हमारी चिंता का कोई हासिल नहीं है( हमारे प्रगतिशील] लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बौ़िद्धक कर्म का भी स्वतंत्र अर्थ नहीं रह जाता है। क्रांति के दावों की दयनीयता तो स्वयंसिद्ध है ही।


नवउदारवादी दौर में बने कारपोरेट इंडिया की सत्ता पर आरएसएस जब-जब धावा बोलता है] तब-तब सेकुलर खेमे के बुद्धिजीवी उसके ‘देशद्रोही’ चरित्र को उद्घाटित करने में लग जाते हैं। ऐसा करते वक्त वे अपने को देशभक्ति और आजादी का पक्का पैरोकार होने का प्रमाणपत्र देते ही हैं] सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह और कांग्रेस को भी वह थमा देते हैं। बार-बार दोहराई जाने वाली इस कवायद का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलता। न सांप्रदायिकता कम होती है] न नवउदारवाद थोड़ा भी पीछे हटता है। बल्कि दोनों कट्टर होते और एक-दूसरे में समाते जाते हैं। उस सम्मिलित कट्टरता के प्रहार से समाजवाद] लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की जमीन धसकती चली जाती है। भारत के संविधान में निहित समाजवाद] लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और संकल्प की रक्षा ही आजादी की रक्षा है। हमारी राजनीति] अर्थव्यवस्था और सामाजिकता की यही कसौटी हो सकती है। 


यह सही है कि आरएसएस पूंजीपतियों से सांठ-गांठ रखता है। उसका नया जमूरा नरेंद्र मोदी पूंजीपतियों के आगे नाच रहा है। लेकिन] कांग्रेस पूंजीपतियों की सबसे बड़ी करुणानिधान पार्टी है] इस सच्चाई को सेकुलर खेमा जोर देकर कभी नहीं कहता। वह आरएसएस के ‘रहस्मय चरित्र’ की गहराइयों में काफी नीचे तक धंसता है] लेकिन कांग्रेस के ‘खुला खेल पूंजीवादी’की तरफ से आंख फेरे रहता है। वह नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस का भी सेवक बना रहा और अब सोनिया गांधी की कांग्रेस का सेवक है। नरेंद्र मोदी बुरा है] क्योंकि कारपोरेट घरानों को रिझाने में लगा है। सेकुलर खेमे की शिकायत वाजिब है कि मीडिया उसे पूंजीवाद का नया ब्रांड बना कर समाज के सामने परोस रहा है। लेकिन यही मीडिया नरेंद्र मोदी के पहले मनमोहन सिंह को कारपोरेट पूंजीवाद का पुरोधा बना कर जमा चुका है। सेकुलरवादियों समेत नागरिक समाज की स्वीकृति दिला चुका है। अटल बिहारी वाजपेयी अपना अलग से पूंजीवाद लेकर नहीं आए थे। उन्होंने अपने ‘स्वदेशी’ पैर मनमोहन सिंह के ‘अमेरिकी’जूते में ही डाले थे। नरेंद्र मोदी को भी मनमोहन सिंह लेकर आए हैं। उनका सत्ता का आपसी झगड़ा है। अमेरिका और कारपोरेट घराने जिस की तरफ रहेंगे वह जीत जाएगा। 


ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी से मनमोहन सिंह किस मायने में बेहतर हैं; सिवाय इसके कि नवउदारवाद को भारत में लाने और जमाने वालों में वे अव्वल नंबर पर हैं। उसी हैसियत के चलते वे तीसरी बार प्रधानमंत्री होने के दावेदार हैं। सांप्रदायिक ताकतों को ठिकाने लगाने की कुछ ताकत अभी भारतीय जनता में बची है। लेकिन नवसाम्राज्यवाद के सामने वह लाचार बना दी गई है। जनता की यह लाचारी आगे बढ़ती जानी है। इसकी सीधी जिम्मेदारी मनमोहन सिंह और उनके सिपहसालारों की है।


पिछले दो सालों से मनमोहन सिंह पर नागरिक समाज का काफी तेज गुस्सा देखने को मिला। यह गुस्सा तभी आना चाहिए था जब उन्होंने देश के संविधान को दरकिनार कर विश्‍व बैंक के आदेश पर नई आर्थिक नीतियां लागू की थीं और देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया था। वे राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, न आज हैं। वे ऐसा कर पाए और उस दम पर दो बार देश के प्रधानमंत्री बन गए, यह नागरिक समाज की सहमति के बिना संभव ही नहीं था। नागरिक समाज को अब भी जो गुस्सा आ रहा है, वह देश के स्वावलंबन और संप्रभुता को चट कर जाने वाली उन नीतियों के खिलाफ नहीं है। वह नवउदारवाद का साफ-सुथरा चेहरा और अपने लिए और ज्यादा फायदा चाहता है। ऐसे गुस्से का कोई परिणाम देश की आजादी के पक्ष में नहीं निकलना है। भाजपा के पक्ष में भले ही निकले, जिसका स्टार प्रचारक नागरिक समाज की समस्त लालसाओं को चुटकियों में पूरा करने का ढोल पीट रहा है। 


कुमार प्रशांत ने ‘जनसत्ता’ के अपने एक लेख में मनमोहन सिंह को संजीदा इंसान बताया है। यह भी कहा है कि बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने हमेशा शालीनता का आचरण किया है, जिससे विदेशों में भारत का मान बढ़ा है। मनमोहन सिंह की यह प्रशंसा उन्होंने नरेंद्र मोदी से तुलना करते हुए की है, जिन्होंने एलान करके 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के लालकिले से दिए गए भाषण के मुकाबले अपना भाषण किया। स्वतंत्रता दिवस नेताओं के व्यक्तित्वों की तुलना करने का अवसर नहीं होता। नरेंद्र मोदी और आरएसएस खुद ही एक्सपोज हो गए कि उनकी नजर में स्वतंत्रता दिवस का सम्मान नहीं है। अडवाणी ने दबी जबान से मोदी के इस कृत्य की आलोचना भी की। 


स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘जनसत्ता’ के पन्ने मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की तुलना में रंगने का औचित्य नहीं था। तुलना का तूमार बांधने के लिए खबरी चैनलों की भरमार है। उन्होंने वह काम बखूबी किया भी। हमने दोनों का भाषण नहीं सुना। न ही टीवी चैनलों पर होने वाली वे बहसें सुनी, जिनका जिक्र नाराजगी के साथ कुछ टिप्पणीकारों ने अगले दिन अखबारों में किया। चैनल यह नहीं कर सकते थे, अगर स्वतंत्रता दिवस की गरिमा, संवैधानिक दायित्व, लोकतांत्रिक मूल्य, संघीय ढांचा और देश की अखंडता का हवाला देने वाले ‘विषेषज्ञ’ वहां नहीं जाते। इधर विषेषज्ञ कुछ ज्यादा ही हो गए हैं और उनमें ज्यादातर ने अपने को ऐसे एंकरों के हाथ बेच दिया है, जो कूपमंडूक और नवउदारवाद व सांप्रदायकिता के निःसंकोच गुण गाने वाले हैं।


गंभीर समझे जाने वाले बुद्धिजीवियों को यह बताना चाहिए था कि प्रधानमंत्री के भाषण में स्वतंत्रता की पूर्णता और मजबूती के लिए क्या कहा गया है; उस लिहाजा से दोनों के भाषणों में कोई फर्क नहीं था। दोनों नवउदारवाद की प्रतिष्ठा को स्वाभाविक कर्म मान कर बोले। संविधान की कसौटी पर दोनों के भाषण अवैध थे। दोनों में अंतर यही है कि मनमोहन सिंह नवउदारवाद की ब्रांडेड मशीन हैं, जो सीधे विश्‍व बैंक से खिंच कर आई है और मोदी आरएसएस के कारखाने में ढल कर निकली ‘देसी’ मशीन है। दोनों में बाकी सब समान है। मोदी को मुसलमान ‘पिल्ले’ नजर आते हैं तो मनमोहन को किसान निठल्ले। वे हैरानी से पूछते हैं कि किसान खेती (यानी आत्महत्या) क्यों करते हैं! कोई और काम क्यों नहीं कर लेते; पहले से ही कई करोड़ नौजवानों और अधेड़ों की बेरोजगार सेना जमा होने के बावजूद एक मशीन ही ऐसा कह सकती है, जिसमें संदेश पहले से फीड किया गया हो!


मोदी की भर्त्‍सना का खास मतलब नहीं है। मोदी को लाने वालों में सबसे पहला नाम मनमोहन सिंह का है। आरएसएस बाद में आता है। मोदी जिस संगठन से आते हैं, उसने आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया। मौका पड़ने पर अंग्रेजों का साथ दिया। वह पुराना किस्सा है। लेकिन मनमेाहन का नया कमाल देखने के लायक है। उन्होंने और सोनिया गांधी ने मिल कर आजादी के संघर्ष की पार्टी को नवसाम्राज्यवादी गुलामी की पार्टी में तब्दील कर दिया है। बेहतर होता कि स्वतंत्रता दिवस पर बुद्धिजीवी यह सच्चाई जनता को बताते।


हमने एक ‘समय संवाद’ में लिखा था, ‘‘मिश्रित अर्थव्यवस्था के करीब तीस सालों के दौर में जो साम्राज्यवादी बीज दब गया था उसने अस्सी के दशक में राजीव गांधी की छाया पाकर फूलना शुरू किया। नब्बे के दशक में उसने एक बार फिर से जड़ पकड़ ली और इक्कीसवीं सदी का जयघोष करते हुए उसकी कोपलें खिल उठीं। आज साम्राज्यवाद की संतानें ऐसा जता रही हैं मानो वे सदियों पुराना वटवृक्ष हैं। जैसे 1857 और 1947 हुआ ही नहीं था। अगले पचास साल भी नहीं लगेंगे जब साम्राज्यवाद की संतानें कहेंगी कि 1947 होना ही नहीं चाहिए था। अगर उसका 1857 की तरह दमन कर दिया जाता तो भारत को महाशक्ति बनने के लिए 2020 का इंतजार नहीं करना पड़ता। जी हां, मनमोहन सिंह उसी साम्राज्यवादी बीज से उत्पन्न हुई संतान हैं। साम्राज्यवाद के सांचे में जो भी समाए हुए हैं, वे मनमोहन सिंह के बच्चे हैं। उनमें छोटे बच्चे भी हैं और बड़े भी। (‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’, 2009) नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह का ही छोटा बच्चा है, जो अब बड़ा बनने के लिए मचल उठा है।


हमने गुजरात कांड पर ‘गुजरात के सबक’, 2002) और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विचारधारा और शैkSली पर ‘जानिए योग्य प्रधानमंत्री को’, 2002) पुस्तिकाएं प्रकाशित की थीं। सेकुलर साथियों, जिनमें सोनिया के सेकुलर सिपाही भी शामिल थे, ने काफी उत्साह से उन पुस्तिकाओं का स्वागत और प्रचार किया था। पहुंच वाले साथियों ने उन्हें कांग्रेस के प्रचार प्रकोष्ठ और प्रवक्ताओं तक पहुंचाया था। 2004 में राजग की हार हुई और यूपीए की सरकार बनी। लेकिन 2009 के चुनाव के पहले प्रकाशित हमारी पुस्तिका ‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ के प्रकाशन पर उन सब ने चुप्पी साध ली। उसमें मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की, विशेष तौर पर भारत-अमेरिका परमाणु करार के हवाले से, साम्राज्यवादपरस्ती का उद्घाटन है। साथियों ने उस पुस्तिका का न स्वागत किया, न प्रचार। इससे स्पष्ट पता चलता है कि सेकुलर खेमे की चिंता केवल सांप्रदायिकता को लेकर है, नवउदारवाद के खिलाफ वह नहीं है। जबकि सांप्रदायिकता की आड़ में नवउदारवाद फलता-फूलता है। 


भारतीय राज्य के खिलाफ हिंसक संघर्ष चलाने वाले अतिवामपंथी समूह कहते हैं कि वे भारत के संविधान को नहीं मानते। उन्हें देखना चाहिए कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नेतृत्व में भारत का शासक वर्ग भी भारत के संविधान को नहीं मानता है। यह ठीक है कि भारत का शासक वर्ग कारपोरेट पूंजीवाद की पुरोधा वैश्विक संस्थाओं के आदेश पर काम करता है। लेकिन अपने को माओवादी बताने वाले भी जिन आदेशों को मानते और लागू करना चाहते हैं, वे भारत की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की धारा से नहीं निकले हैं; जिसका कुछ आधार लेकर भारत का संविधान बनाया गया था। बल्कि आजादी के संघर्ष को वे मान्यता ही नहीं देते। उनकी पूर्वज पार्टी सीपीआई ने देश की आजादी को अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का परिणाम माना था, न कि जनता के संघर्ष और बलिदान का। आजादी की पूर्व संध्या पर उसने भारत छोड़ो आंदोलन और उसके क्रांतिकारियों के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन किया था। 


आजादी अधूरी है, यह अंबेडकर ने भी स्वीकार किया था। लेकिन उनके स्वीकार में अवमानना का भाव नहीं था। उनका संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर उसे पूर्ण करने का सपना था। कांग्रेस के भरोसे वे भी नहीं थे। समता का लक्ष्य हासिल करने का रास्ता लोकतंत्र को मानते थे। लोकतांत्रिक अहिंसक संघर्ष में अंत तक उनकी आस्था रही। इसका अर्थ यह भी बनता है कि आजादी के बाद, गांधी की तरह, अंबेडकर भी कांग्रेस की उपयोगिता नहीं देखते थे। उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और सोशलिस्ट पार्टी के साथ चुनाव लड़ा। भविष्य की राजनीति के लिए सोशलिस्ट पार्टी के साथ तालमेल का प्रयास भी उनके दिवंगत होने के पहले हुआ।


लेकिन कम्युनिस्टों ने अधूरी आजादी का ठीकरा कांग्रेस और उसके नेताओं के सिर फोड़ा। अधूरी आजादी से भी ज्यादा उनकी बड़ी शिकायत यह है कि साम्यवादी क्रांति क्यों नहीं की गई; उनकी नजर में भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और उनके साथ जुटने वाली जनता का यह दोष था। आजादी के अधूरेपन में उन्होंने न अपना कोई साझा या दायित्व स्वीकार किया, औरअ जाहिर है, न उसे पूरा करने के लिए संविधान का रास्ता स्वीकार किया। कम्युनिस्टों की अंतर्राष्ट्रीयता में ‘पिछड़े,दकियानूसी, सामंती, सांप्रदायिक, जातिवादी भारत’ को छोड़ कर सब कुछ हो सकता था। आज के आधिकारिक मार्क्‍सवादियों के लिए भी संविधान और संसदीय लोकतंत्र मजबूरी का सौदा है। 


भारतीय राज्य बुरा है, कम्युनिस्टों के लिए बात यहीं तक सीमित नहीं रहती। वह अगर उनके कब्जे में नहीं है, तो उनकी मंशा होती है कि उसे दुनिया में होना ही नहीं चाहिए। भारतीय राज्य पर कब्जा नहीं हो पाने पर उन्होंने कांग्रेस की सरपस्ती में संस्थाओं पर कब्जे की रणनीति अपनाई। इस रणनीति के निष्ठापूर्वक निर्वाह का नतीजा यह है कि वे उस रणनीति के बंदी बन कर रह गए हैं। यह सही है कि इस तरह से कम्युनिस्टों ने काफी ताकत हासिल की, लेकिन नवसाम्राज्यवाद विरोध के लिए उस ताकत का कोई उपयोग नहीं है।


दरअसल, उन्होंने सारी ताकत इस बात में लगा दी कि भारत बेशक कांग्रेस के कब्जे में रहे, भारतीय संदर्भों से जुड़ी समाजवाद या सामाजिक न्याय की कोई धारा जगह नहीं बना पाए। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और शोध संस्थाओं के शीर्ष पर रह कर उन्होंने अपने से अलग विचारों/विचारकों के प्रति संकीर्णता का बर्ताव किया। ऐसे में, जाहिर है, जगह आरएसएस की ही बननी थी, जो अपने स्थापना काल से ‘भारत माता भारत माता’ चिल्लाता चला आ रहा था और कम्युनिस्टों की तरह कांग्रेस में गहरी घुसपैठ रखता था। दरअसल, अधूरी आजादी से असंतुष्ट हो पूर्णता हासिल करने के लिए आरएसएस अगर समय में सुदूर स्थित ‘स्वर्णलोक’ की तरफ भागा, तो कम्युनिस्ट स्थान में सुदूर स्थित ‘स्वर्णलोक’ की तरफ। दोनों की आज तक भी कमोबेस वही स्थिति बनी हुई है।


यह स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यह समीक्षा वाद-विवाद के लिए नहीं की जा रही है। बल्कि आजादी का बचाव हो; वह पूर्ण, मजबूत और उच्चतर हो, इस उद्देश्‍य से की जा रही है। देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया गया है। ऐसे में आरएसएस को ठीक करने के पहले अगर अपने को ठीक नहीं किया जाता, तो नवउदारवाद के खिलाफ मोर्चा कभी नहीं जीता जा सकता। 






पूंजीवाद के बीमार 






वैश्विक परिदृश्‍य पर मचे हिंसा और मौत के तांडव के बावजूद पूंजीवाद की क्रांतिकारी भूमिका के सिद्धांतकार और पैरोकार आज भी अपनी स्थापना वापस लेने को तैयार नहीं होंगे। तीन-चैथाई दुनिया का उपनिवेशीकरण, संसाधनों की लूट,समूचे समुदायों का सफाया करके उनके भूभागों पर कब्जा, युद्धों, गृहयुद्धों, महायुद्धों के वर्तमान तक जारी अनवरत सिलसिले के समानांतर जीवधारियों और वनस्पतियों की असंख्य प्रजातियों का विनाश करते हुए दुनिया को संकट के मुहाने पर ले आने वाला पूंजीवाद आज भी ‘क्रांतिकारी‘ है। पूंजीवादी व्यवस्था की सर्वाधिक यथार्थपरक (रियलिस्टिक) और तर्कपूर्ण (रेशनल) समीक्षा करने वाला गांधी आज भी भारत में मानव प्रगति का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है। पूंजीवाद के बीमार दिमाग की इस समझ के साथ यह समझ लें कि आगे मनमोहन सिंह और मोदी ही आएंगे। गांधीए नेहरू, जेपी, लोहिया या अंबेडकर नहीं आने जा रहे हैं।


पूंजीवाद का बीमार दिमाग आज भी भारत की स्वतंत्र हस्ती नहीं स्वीकार कर पाता। इस बीमारी का बीज उपनिवेशवादी दौर में पड़ गया था। इसीके चलते उसके लिए अंग्रेज हमेशा सही और भारतीय लड़ाके, चाहे वे रजवाड़े हों,किसान हों, आदिवासी हों, हमेशा गलत थे। किसी भारतीय शासक ने भारत की जनता पर अंग्रेजों जैसा कहर नहीं बरपाया।1857 भारत के लोगों ने पहला स्वतंत्रता संग्राम लड़ा। उसके दमन में अंग्रेजों ने जो नृशंसता की, दुनिया के इतिहास में उसका उदाहरण नहीं मिलता। किसी भारतीय शासक के राज्य में वैसे भयंकर अकाल नहीं पड़े, जैसे अंग्रेजों के काल में पड़े। जब भारत में अकाल के चलते एक साथ कई लाख लोग एडि़यां रगड़ कर मरते थे, तो भारत या इंग्लैंड में अंग्रेज का एक निवाला भी कम नहीं होता था। जो अंग्रेज, सिपाही हो या नौकरशाह, भारत आ गया, मालामाल होकर गया। भारत में उसका वैभव और रौब-दाब यहां के किसी भी शासक से ज्यादा था। उनकी अय्याशी के किस्से कम नहीं हैं। लेकिन अंग्रेजी राज यहां के शासकों से अच्छा थाए पूंजीवाद के बीमार दिमाग में यह मान्यता घुट्टी की तरह गई हुई है।


उपनिवेशवादी शोषण ने भारत को आर्थिक रूप से जर्जर कर दिया था। सबसे ज्यादा शोषण किसानों, आदिवासियों,कारीगरों और मजदूरों का हुआ था। गांधी ने उस यथार्थ के मद्देनजर देश की स्वावलंबी श्रम आधारित विकेंद्रित अर्थव्यवस्था बनाने की बात की। अगर अपनी अर्थव्यवस्था नहीं है, तो आप स्वतंत्र भी नहीं हो सकते। उपनिवेशवादी शोषण की प्रक्रिया में पैदा हुए छोटे मध्यवर्ग ने गांधी का यह विचार स्वीकार नहीं किया। केवल राजनीतिक आजादी के आकांक्षी मध्यवर्ग ने गांधी की इस धारणा को न केवल अस्वीकार किया, पिछड़ा भी बताया। विकास के बने-बनाए पूंजीवादी माॅडल के भरोसे आर्थिक आजादी को वह हथेली पर धरी चीज मानता था। उसके मुताबिक पूरे भारत को मध्यवर्ग में तब्दील होना था। यानी किसानों,आदिवासियों, कारीगरों, मजदूरों, छोटे-मोटे दुकानदारों को उस विकसित भारत में नहीं रहना था। इसके साथ जो अन्य धारणाएं परोसी गईं,

Sunday, July 30, 2017

नीतीश कुमार और शरद यादव : क्या बिछड़ेगी जोड़ी!-प्रेम सिंह

(इस वक्त बिहार के साथ-साथ देश की राजनीति की निगाहें शरद यादव की तरफ लगी हैं। शरद के सामने ऐतिहासिक और निर्णायक घड़ी है। कुछ शरद समर्थक उन्हें समाजवादी मसीहा बताकर उनसे लड़ने की अपेक्षा रख रहे हैं, तो कुछ नीतीश समर्थक उन्हें खारिज कर रहे हैं। ऐसे में सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ प्रेम सिंह का ये बयान सामने आया है।)

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रातोंरात पाला-बदल कर जद (यू) के वरिष्ठ नेता शरद यादव को असमंजस में डाल दिया। जद (यू) के कई अन्य नेताओं को भी उनके इस फैसले पर आश्चर्य हुआ और उनके लिए भी असमंजस की स्थिति बन गई। ज़ाहिर है, नीतीश कुमार ने मोदी-शाह की जोड़ी (मोदी-शाह की जोड़ी इसलिए लिखा है कि भाजपा में वह आंतरिक लोकतंत्र नहीं बचा है, जिसके लिए वह कांग्रेस के बरक्स जानी जाती थी) के साथ जो भी डील की, उसका उनकी पार्टी के कतिपय सांसद-विधायक नेताओं तक को नहीं पता था। पार्टी पदाधिकारियों और सामान्य कार्यकर्ताओं की बात ही छोडिये. इससे पता चलता है कि जद (यू) आंतरिक लोकतंत्र वाली पार्टी नहीं है. यह भी एक व्यक्ति के सत्ता-स्वार्थ वाली पार्टी है. राजद से इस पार्टी का फर्क इतना है कि नीतीश का 'परिवार' सत्ता-स्वार्थ के लिए एकजुट उनके 'छवि निर्माता' समर्थकों से लेकर संघ परिवार तक फैला है. छवि निर्माताओं की टीम के साथ राजनीति करने का यह 'गुण' मोदी के साथ नीतीश की निकटता का एक महत्वपूर्ण पहलू है. वर्तमान राजनीति की मोदी-शैली अमेरिका से उधार ली गई है. कांग्रेस समेत मुख्यधारा राजनीति के ज्यादातर नेताओं ने यह शैली अपनाई हुई है. छवि-निर्माण के लिए कंपनियों से लेकर विशेषज्ञ व्यक्तियों तक एक बड़ा बाज़ार उपलब्ध है. कार्पोरेट राजनीति इसी बाज़ार के दम पर सफलतापूर्वक चल रही हैनीतीश कुमार के इस्तीफे और फिर भाजपा के साथ मिल कर अगले ही दिन मुख्यमंत्री की शपथ लेने की कार्रवाई इसीलिए की गई ताकि शरद यादव और उनकी तरह असमंजस में पड़ने वाले नेताओं के सामने साथ आने के अलावा कोई रास्ता न बचे. यह फिर मोदी की शैली का लघु विस्तार है. बड़े स्तर पर मोदी ने भाजपा के दिग्गज नेताओं को अपने पीछे चलने को बाध्य किया हुआ है.

शरद यादव के एक समर्थक ने घटना वाले दिन सोशल मीडिया पर लिखा कि 'उन्हें मंत्री और महान बनने के बीच फैसला करना है'. सुना है लालू प्रसाद यादव ने भी उन्हें नेता कबूला है और विपक्ष को रास्ता दिखाने को कहा है. कुछ धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की विचारधारा को मानने वाले युवा साथी उन्हें घेरे हुए हैं कि वे प्रलोभन में न आयें. हमारा कहना है शरद यादव महान तो क्या बनेंगे, लेकिन अगर वास्तव में भाजपा के साथ नहीं जाने का फैसला करते हैं तो समाजवादी आंदोलन के साथ उन्होंने जो लम्बा द्रोह किया है, उस 'पाप' को थोड़ा जरूर धो पायेंगे

Wednesday, July 5, 2017

रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के निहितार्थ-प्रेम सिंह


राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का अगला राष्ट्रपति बनना तय है. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर होने वाली चर्चा मुख्यत: भाजपा द्वारा जाति-कार्ड खेलने के इर्द-गिर्द सिमटी है. भाजपा के जाति-कार्ड की काट में कांग्रेस की तरफ से मीरा कुमार को उम्मीदवार बनाये जाने पर चर्चा का रुख इतना ही बदला कि किसका दलित उम्मीदवार ज्यादा अच्छा/असली दलित है? एक नुक्ता यह निकला गया है कि रामनाथ कोविंद आरएसएस के समर्पित स्वयंसेवक हैं. यह आपत्ति बेमानी है. भाजपा का कौन-सा नेता है, या हो सकता है, जो समर्पित स्वयंसेवक न हो?

चर्चा में आरएसएस/भाजपा द्वार रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाने के वास्तविक लक्ष्य की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है. इस टिप्पणी में हमने उसी पर कुछ रोशनी डालने की कोशिश की है. आरएसएस ने अम्बेडकर को हस्तगत करने का फैसला सोची-समझी रणनीति के तहत किया था. याद किया जा सकता है कि 'उदार' वाजपेयी तक पल्ली टोपी क्या, पूरा हरा साफा बांध कर वोट के लिए मुसलमानों को रिझाने का काम किया जाता था. भले ही फिर उन्हें धमकाया भी जाता था कि भाजपा मुसलामानों के वोट के बगैर भी सरकार बना सकती है. कट्टर अडवाणी ने भी डर कर वही रास्ता अपनाना मुनासिब समझा और पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर फूल चढ़ा आए. आरएसएस ने आडवाणी को भारत लौटते ही बाहर का रास्ता दिखा दिया. तब से वे आज तक वनवास झेल रहे हैं.
उसके बाद आरएसएस ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अपना काम तेजी से शुरु कर दिया. वह नरेन्द्र मोदी जिसने गुजरात की प्रयोगशाला में वह कारनामा कर दिखाया जिसकी आशंका वाजपेयी को उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने के फैसले पर हुई थी. नवउदारवादी नीतियों ने वह ज़रखेज ज़मीन पहले से तैयार कर दी थी, जिस पर गोधरा और उसके बाद पूरा गुजरात-कांड हुआ; नरेन्द्र मोदी राज्य सत्ता के बूते पर सारे सबूत मिटाने में कामयाब हुए; और अब, जो कतिपय आरोपी सजा पा गए थे, उन्हें रिहा किया जा रहा है.
अगर भागवत-मोदी-शाह की भाजपा को चुनाव जीतने के लिए मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए, तो ज़ाहिर है, उसकी पूर्ति के लिए भारतीय समाज के एक बड़े समुदाय का वोट सुनिश्चित करना अनिवार्य है. वह समुदाय दलित ही हो सकता है. भागवत-मोदी-अमिताशाह के अति-संक्षिप्त काल में आरएसएस-भाजपा को इस दिशा में अच्छी कामयाबी मिली है. उसने अन्य पिछड़ी जातियों, यहाँ तक की आदिवासियों को अपने पक्ष में गोलबंद कर लिया है. कालांतर में उसे इसमें और कामयाबी मिलती जाएगी. चुनाव जीतने का स्थायी इंतज़ाम तो होगा ही; संविधान को तोड़ने-मरोड़ने में सुविधा होगी. 2019 की जीत के बाद जब संविधान से धर्मनिरपेक्षता की मौजूदा संकल्पना को आरएसएस की परिकल्पना के हिंदू-राष्ट्र की संकल्पना से प्रतिस्थापित किया जायेगा तो उस पर हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति भवन में एक दलित राष्ट्रपति तत्परता से मौजूद रहेंगे. अडवाणी शायद वह काम नहीं कर पाते. मोहन भागवत को राष्ट्रपति भवन में लाकर यह काम कराने की सांप्रदायिक सीनाजोरी की हिम्मत मोदी-शाह की जोड़ी को पता नहीं किस अंदेशे के चलते नहीं हुई. वह काम आगे के लिए छोड़ दिया गया है.
एक दलित वह काम करेगा तो कहा जा सकता है कि मोदी के 'नए भारत' के दलित ने बाबा साहब का ही काम आगे बढ़ाया है, जिसे कांग्रेस पिछले 70 सालों से रोके बैठी थी! इस तरह आरएसएस/भाजपा बाबा साहब के हिंदू धर्म को छोड़ने के 'गलत' फैसले को दुरुस्त करेगें. इसके साथ दलित अस्मिता विमर्श के तहत हिंदू धर्म के खिलाफ बोलने वालों को भी सबक सिखाया जा सकेगा. वैसे भी, दलित और पिछड़े 'ज्ञानियों' से निपटने में आरएसएस/भाजपा को ज्यादा कठिनाई नहीं होने जा रही है, क्योंकि जिस तरह हिंदू-राष्ट्र नवउदारवाद के पेट में फलता-फूलता है, ज्यादातर दलित और पिछड़े बुद्धिजीवी नवउदारवादी व्यवस्था के भीतर ही अपनी सत्ता कायम करने का संघर्ष करते हैं.
यह योजना परवान चढ़ती है तो लोकतंत्र से बेदखल मुसलमानों को देश से बेदखल करने के आरएसएस/भाजपा के लंबे समय से प्रतीक्षित एजेंडे की तरफ बढ़ा जाएगा. इसकी एक रिहर्सल चार साल पहले उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फर नगर इलाके में देखने को मिली. त्रिपुरा के राज्यपाल ने हाल में ट्वीट किया है कि श्यामाप्रसाद मुख़र्जी ने हिंदू-मुस्लिम समस्या का समाधान गृहयुद्ध बताया है. मुसलमान-मुक्त भारत बनाने के लिए गृहयुद्ध अभी असंभव लग सकता है. लेकिन एशिया में ही अफगानिस्तान, इराक और सीरिया में कई सालों से गृहयुद्ध चल रहा है. लाखों लोग मारे जा रहे हैं. ड्रोन से लेकर मदर बम तक - हमलों में लाखों बच्चों का जीवन तबाह हो चुका है. मानव इतिहास के भीषणतम गृहयुद्धों के फुटेज देख कर एक पीढ़ी तैयार हो रही है. जिस तरह से पढ़े-लिखे संभ्रांत हिंदू मुसलमानों के खिलाफ घृणा के उन्माद का शिकार हैं, लगता नहीं उन्होंने विभाजन की त्रासदी से कोई सबक सीखा है. गृहयुद्ध के विपक्ष में बाल-बच्चों और परिजनों की चिंता जैसी भावुक बातें नहीं चल पाएंगी. 'हिंदू-राष्ट्र' के लिए क्या मोदी ने अपने परिवार, यहाँ तक कि अपनी पत्नी को नहीं छोड़ दिया?
नवसाम्राज्यवादी गुलामी का शिकंजा जैसे-जैसे कसता जाएगा, मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ घृणा का उन्माद बढ़ता जायेगा. अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय भी उस घृणा का शिकार होंगे. आधुनिक भारतीय तथा विश्व नागरिक नहीं हो पाने के खोखलेपन को आरएसएस/भाजपा के 'हिंदू-राष्ट्र' में हिंदू राष्ट्रपति, हिंदू प्रधानमंत्री, हिंदू सरकार, हिंदू विकास, हिंदू टेक्नोलोजी, हिंदू ज्ञान आदि से भरा जाएगा.
इस गहरे संकट की स्थति में नीतीश कुमार जैसे नेताओं का राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को समर्थन देने का फैसला कोई ख़ास मायना नहीं रखता है. नीतीश कुमार शुरू से ही परजीवी और अवसरवादी नेता रहे हैं. पहले से ही उनके आदर्श प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी हैं. वे कांग्रेस को दोष दे रहे हैं, क्योंकि समर्थन के पहले खुद को 2019 के लिए प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करवाना चाहते थे. वे बिहार के मुख्यमंत्री का पद तभी छोड़ना चाहते हैं, जब विपक्ष उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाए. वरना वे भाजपा के साथ अपना सम्बन्ध बना कर रखेंगे, ताकि लालू प्रसाद यादव के समर्थन वापस लेने की स्थिति में भाजपा की मदद से मुख्यमंत्री रहें या केंद्र में मंत्री रहें. केवल अपनी चलने की उनकी धर्मनिरपेक्ष सीनाजोरी पिछले दो दशकों से बदस्तूर चल रही है.
लेकिन नीतीश कुमार के आलोचकों की स्थिति उनसे बेहतर नहीं है. उदाहरण के लिए, अगर कांग्रेस राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने में कामयाब नहीं होती, तो सरकारी कम्युनिस्टों का आदर्श प्रधानमंत्री केजरीवाल है. यह धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और प्रगतिशीलता की राजनीति का काला कोलाज़ है. भारतीय समाज को इस कोलाज़ से बहार निकालने की अभी की युवा पीढ़ी की कितनी भारी जिम्मेदारी है!

पुनश्च:
इस माहौल से घबरा कर मुस्लिम सहित किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय का धार्मिक पहचान को मज़बूत बनाने का प्रयास सकारात्मक नतीज़ा नहीं दे सकता. आधुनिक नागरिक बोध को मज़बूत करना ज्यादा जरूरी है.


Tuesday, June 20, 2017

संविधान नहीं नवउदारवाद का अभिरक्षक राष्ट्रपति- डॉ प्रेम सिंह

     
 एक बार फिर नवउदारवाद  
      पिछली बार की तरह इस बार भी राष्ट्रपति चुनाव लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधनिक प्रमुख के चुनाव के अवसर पर चर्चा होना अच्छी बात है। इस अवसर पर चर्चा के कई बिंदु हो सकते है। मसलनचर्चा में पिछले राष्ट्रपतियों के चुनावसमझदारी और विशेष कार्यों का आलोचनात्मक स्मरण किया जाए। यहां हम याद दिलाना चाहेंगे कि देश के दो बार राष्ट्रपति रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद की डॉ. लोहिया ने इस बात के लिए कड़ी आलोचना की थी कि उन्होंने राष्ट्रपति रहते बनारस के पंडितों के पैर पखारे थे। संविधान निर्माण के समय की राष्ट्रपति संबंधी बहसों का स्मरण भी किया जा सकता है। संसदीय प्रणाली की जगह राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की जो बात अक्सर होती है - अक्सर यह मान कर कि अमेरिका की तरह भारत में भी राष्ट्रपति प्रणाली अपना ली जाए तो सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी - उस पर गंभीर बहस चलाई जाए। राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल महानुभावों से देश और दुनिया के सामने दरपेश समस्याओं पर गंभीर वार्तालाप आयोजित किया जाए। उनसे संविधन के बारे में भी बात की जाए और वे संविधन को कितना समझते और महत्व देते हैंयह जाना जाए। सीधे राजनीति से इतर जीवन के विभिन्न आयामों पर उनसे उनका अध्ययन और राय पूछी जाए। राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के पीछे उनकी प्रेरणा और जीतने के बाद रुटीन भूमिका के अलावा करने के लिए सोचे गए कामों की जानकारी ली जाए।
      चर्चा के और भी विषय और मुद्दे हो सकते हैं। हालांकि पूरी चर्चा का मुख्य बिंदु यही हो कि मौजूदा दौर में राष्ट्रपति से भारतीय राष्ट्र यानी देश के समस्त नागरिकों की क्या अपेक्षाएं हो सकती हैं और उम्मीदवार उन्हें कितना समझते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि संविधान का अभिरक्षक (कस्टोडियन) होने के नाते राष्ट्रपति के व्यक्तित्वपद और भूमिका को लेकर पूरी चर्चा भारत के संविधान की संगति में होन कि उससे स्वतंत्र। इस तरह राष्ट्रपति चुनाव का अवसर हमारे संवैधानिक नागरिक बोध को पुष्ट करने में सहायक हो सकता है।
      लेकिन जो चर्चा चल रही है उससे लगता है कि हमारे लिए राष्ट्रपति चुनाव कोई महत्व का अवसर नहीं है। मीडिया और राजनीतिक पार्टियां दोनों का संदेश यही है कि महत्व की बात केवल यह है कि कौन राजनीतिक पार्टी या नेता अपना आदमी राष्ट्रपति बना कर राष्ट्रपति भवन पर कब्जा करता है। (आगे देखेंगे कि यह जरूरी नहीं कि राजनीति से बाहर का सर्वसम्मति से चुना गया व्यक्ति राजनेता के मुकाबले संविधान की कसौटी और अन्य अपेक्षाओं पर ज्यादा खरा उतरता हो।) इस बार के चुनाव में राजनीतिक पार्टियां और नेता दांव-पेच में कुछ ज्यादा ही उलझे हैं। किसी ने गुगली फेंकी है तो कोई पांसा फेंक रहा है! प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाने का सुझाव फेंका गया तो यह पूरा प्रकरण एक एब्सर्ड ड्रामा जैसा लगने लगा। जो दांव-पेच हुए और आगे होने की संभावना हैउनका पूरा ब्यौरा देने लगें तो कॉलम उसी में सर्फ हो जाएगा। एक वाक्य में कहें तो यह पूरा प्रकरण भारतीय राजनीति की दिशाहीनता दर्शाता है। कई बार दिशाहीनता का संकट सही दिशा के संधान में सहायक हो सकता है। बशर्ते उसके पीछे एक वाजिब दिशा की तलाश की प्रेरणा निहित हो। लेकिन मुख्यधारा भारतीय राजनीति की दिशाहीनता की एक ही दिशा है - नवउदारवाद की तरफ अंधी दौड़।
      राष्ट्रपति का चुनाव भी उसी अंधी दौड़ की भेंट चढ़ चुका है। राष्ट्रपति संविधान का अभिरक्षक कहलाता हैलेकिन पूरी चर्चा में - चाहे वह विद्वानों की ओर से होनेताओं या उम्मीदवारों की ओर से - वह नवउदारवाद के अभिरक्षक के रूप में सामने आ रहा है। किसी कोने से यह चर्चा नहीं आई है कि राष्ट्रपति को पिछले 25 सालों में ज्यादातर अध्यादेशों के जरिए नवउदारवाद के हक में बदल डाले गए संविधान की खबरदारी और निष्ठा के साथ निगरानी करनी है; कि ऐसा राष्ट्रपति होना चाहिए जो संविधान को पहुंचाई गई चौतरफा क्षति को समझ कर उसे दुरुस्त करने की प्रेरणा से परिचालित हो; और जो संविधान के समाजवादी लक्ष्य से बंधा हो।
      जाहिर हैनवउदारवाद को अपना चुकी कांग्रेस और भाजपा की तरफ से ऐसा उम्मीदवार नहीं आएगा। क्षेत्रीय पार्टियां भी कांग्रेस-भाजपा के साथ नवउदारवादी नीतियों पर चलती हैं। उनमें कई अपने को समाजवादी भी कहती हैं। उनमें एक जनता दल (यू) है जिसके प्रवक्ता ने कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के समर्थन में कहा है कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियां अटल हैं। उनके मुताबिक भाजपा के प्रवक्ता रविप्रसाद वित्तमंत्री बन जाएं तो वे भी वही करेंगे जो प्रणव मुखर्जी ने किया है। सीधे  समाजवादी नाम वाली समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह की भूमिका को देख कर लगता नहीं कि जिस लोहिया को वे मायावती के अंबेडकर की काट में इस्तेमाल करते हैंउस महान समाजवादी चिंतक की एक पंक्ति भी उन्होंने पढ़ी है। बीजू जनता दल और अन्ना द्रमुक पीए संगमा की उम्मीदवारी के प्राथमिक प्रस्तावक हैं। संगमा ने प्रणब मुखर्जी को बहस की चुनौती दी है। इसलिए नहीं कि बतौर वित्तमंत्री उन्होंने नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करके संविधान विरोधी कार्य किया है; बल्कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियां तेजी से लागू करने में उनकी विफलता उद्घाटित करने के लिए वे प्रणव मुखर्जी से शास्त्रार्थ’ करना चाहते हैं। वे अपने को नवउदारवादी नीतियों का प्रणव मुखर्जी से बड़ा विशेषज्ञ और समर्थक मानते हैं।
      प्रणब मुखर्जी के समर्थन पर जिस तरह से राजग में विभाजन हुआ हैउसी तरह वाम मोर्चा भी विभाजित है। हालांकि वाम मोर्चा का विभाजन ज्यादा महत्व रखता हैक्योंकि वह समाजवाद के लक्ष्य से परिचालित एक विचारधारात्मक मोर्चा है जो पिछले करीब चार दशकों से कायम चला आ रहा है। वाम मोर्चा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया है, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का मतदान में हिस्सा नहीं लेने का फैसला है। माकपा के साथ फारवर्ड ब्लॉक है और सीपीआई के साथ आरएसपी। माकपा ने पिछली बार भी प्रतिभा पाटिल की जगह प्रणब मुखर्जी का नाम कांग्रेस अध्यक्ष के सामने रखा था। तब वाम मोर्चा की ताकत ज्यादा थी और पश्चिम बंगाल में माकपा नीत वाम मोर्चा की सरकार थी।
      समर्थन का माकपा का तर्क अजीब और खुद की पार्टी की लाइन के विपरीत है। जैसा कि प्रकाश  करात ने कहा हैराष्ट्रपति का चुनाव विचारधारा के बाहर कैसे हो गयाअगर मार्क्सवादी विचारधारा के बाहर मान भी लेंतो क्या वह संविधान की विचारधारा के भी बाहर माना जाएगाराष्ट्रपति संविधान का अभिरक्षक होता हैफिर इसके क्या मायने रह जाते हैंभारत में मार्क्सवादी विमर्श और पार्टी अथवा संगठन तंत्र की अपनी दुनिया है। उसका अपना शास्त्र एवं शब्दावली और उसके आधार पर आपसी सहयोग और टकराहटें हैं। माकपा के इस फैसले पर कम्युनिस्ट सर्किल में बहस चल रही है और उसे सही नहीं माना जा रहा है। खुद माकपा के शोध प्रकोष्ठ के एक युवा नेता ने फैसले को सिरे से गलत और पार्टी लाइन के विपरीत बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया है। माकपा ने उसे पार्टी से ही बाहर कर दिया है। माकपा का कहना है कि प्रणव मुखर्जी की व्यापक स्वीकृति है और माकपा की ताकत विरोध करने की नहीं है। सवाल है कि क्या व्यापक स्वीकृति नवउदारवाद की नहीं हैतो क्या उसका विरोध न करके उसके साथ हो जाना चाहिएस्पष्ट है कि माकपा का फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति से संबद्ध है। अपनी प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी द्वारा प्रणब मुखर्जी के विरोध के चलते माकपा बंगाली मानुष’ को रिझाने के लिए मुखर्जी का समर्थन कर रही है।
      लेकिन इसमें विचारधारात्मक उलझन भी शामिल है। संकट में घिरी माकपा भारतीय समाजवाद की बात करने के बावजूद पूंजीवाद के बगैर समाजवाद की परिकल्पना नहीं कर पाती है। उसके सामने दो ही रास्ते हैं - या तो वह पूंजीवाद का मोह छोड़े या एकबारगी पूंजीवाद के पक्ष में खुल कर मैदान में आए। एक दूसरी उलझन भी है। मार्क्सवादियों के लिए भारत का संविधान (और उसके तहत चलने वाला संसदीय लोकतंत्र) समाजवादी क्रांति में बाधा है। उन्होंने मजबूरी में उसे स्वीकार किया हुआ है। इसलिए संविधान के प्रति सच्ची प्रेरणा उनकी नहीं बन पाती। तीसरी उलझन यह है कि आज भी वे राजनीति की ताकत के पहले पार्टी की ताकत पर भरोसा करते हैं। संगठन से बाहर - चाहे वह पार्टी का होलेखकों का,या सरकार का - मार्क्सवादी असहज और असुरक्षित महसूस करते हैं। लिहाजाबाहर की दुनिया उनके लिए ज्यादातर सिद्धांत बन कर रह जाती है। इसके चलते राजनीतिक ताकत का विस्तार नहीं हो पाता।
      अच्छा यह होता कि वाम मोर्चा अपना उम्मीदवार खड़ा करता। चुनावी गणित में वह कमजोर होतालेकिन जब तक जनता तक यह संदेश नहीं जाएगा कि उसकी पक्षधर राजनीति कमजोर हैतब तक वह उसे ताकत कैसे देगीअभी तो यह हो रहा है कि खुद जनता की पक्षधर राजनीति के दावेदार यह कह कर मुख्यधारा के साथ हो जा रहे हैं कि उनकी चुनाव लड़ने की ताकत नहीं है। अकेली आवाजअगर सच्ची हैतो उसे अपना दावा पेश करना चाहिए। नवउदारवादी साम्राज्यवाद के इस दौर में समाजवादी राजनैतिक चेतना के निर्माण का यही एक रास्ता है जो संविधान ने दिखाया है। जरूरी नहीं है कि नवउदारवाद की पैरोकार राजनीतिक पार्टियों के सभी नेता और कार्यकर्ता नवउदारवाद के समर्थक हों। वे भी उठ खड़े हो सकते हैं और अपनी पार्टियों में बहस चला सकते हैं। कहने का आशय यह है कि नवउदारवाद समर्थक प्रणब मुखर्जी और पीए संगमा के मुकाबले में वाम मोर्चा की तरफ से एक संविधान समर्थक उम्मीदवार दिया जाना चाहिए था।
      वह उम्मीदवार राजनीतिक पार्टियों के बाहर से भी हो सकता था। जैसे कि जस्टिस राजेंद्र सच्चर का नाम सामने आया था। लेकिन उस दिशा में आगे कुछ नहीं हो पाया। जबकि नागरिक समाज संविधान के प्रति निष्ठावान किसी एक व्यक्ति को चुन कर नवउदारवादी हमले के खिलाफ एक अच्छी बहस इस बहाने चला सकता था। ऐसे व्यक्ति का नामांकन नहीं भी होतातब भी उद्देश्य पूरा हो जाता। लेकिन भारत के नागरिक समाज की समस्या वही है जो मुख्यधारा राजनीति में बनी हुई है। वहां समाजवादी आस्था वाले लोग बहुत कम हैं। ज्यादातर आर्थिक सुधारों की तेज रफ्तार के सवार हैं। यही कारण है कि जस्टिस सच्चर अथवा किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में नागरिक समाज की ओर से मजबूत प्रयास नहीं हो पाया।
      कह सकते हैं कि राष्ट्रपति का यह चुनाव संकट के समाधन की दिशा में कोई रोशनी नहीं दिखाता। बल्कि संकट को और गहरा करता है। प्रणब मुखर्जी की राष्ट्रपति के रूप में जीत को मनमोहन सिंह और मंटोक सिंह आहलुवालिया आर्थिक सुधारों को तेज करने का अवसर बनाएंगे। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति चुनाव जीतते ही सबसे पहले संभवतः खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश के स्थगित फैसले को लागू कर दिया जाएगा।
      यह भी कह सकते हैं कि इस संकट से जूझा जा सकता थाबशर्ते नागरिक समाज संविधान की टेक पर टिका होता। हम नक्सलवादियों को बुरा बताते हैं और उन पर देशद्रोह का अपराध जड़ते हैंक्योंकि वे भारत के संविधान को स्वीकार नहीं करते। लेकिन नक्सलवादियों को देशद्रोही बताने वाले राजनेताओं और नागरिक समाज एक्टिविस्टों की संविधान के प्रति अपनी निष्ठा सच्ची नहीं हैं - पिछले 25 सालों में यह उत्तरोत्तर सिद्ध होता गया है। इस चुनाव से भी यही सबक मिलता है।  
      टीम अन्ना ने प्रधनमंत्री समेत उनकी केबिनेट के जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं उनमें प्रणव मुखर्जी भी हैं। वे राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि टीम अन्ना की लड़ाई भ्रष्टाचार से उतनी नहीं,जितनी कांग्रेस से ठन गई है। प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति बनना कांग्रेस की जीत है। भाजपा कांग्रेसी उम्मीदवार को रोकने कीया कम से कम उसे मजबूत टक्कर देने की रणनीति नहीं बना पाई। उसके वरिष्ठतम नेता अडवाणी दयनीयता से कह रहे हैं कि कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार के नाम पर सर्वसम्मति बनाने के लिए भाजपा से बात नहीं की। ममता बनर्जी अभी यूपीए से निकली नहीं हैं और मुलायम सिंह झोली में गिरने को तैयार बैठे हैं। भाई रामगोपाल यादव को उपराष्ट्रपति का पद मिल जाएदूसरे भाई शिवपाल यादव और बहू डिंपल केंद्र में मंत्री बन जाएं तो परिवार के मुखिया का कर्तव्य संपूर्ण हो जाएगा! आरएसएस हालांकि मोदी पर अड़ेगा नहींलेकिन विनाश काले विपरीत बुद्धि’ हो जाए तो राजग के घटक दल ही नहींदेर-सबेर भाजपा में भी विग्रह तेज होगा। ऐसी स्थिति में 2014 में कांग्रेस की पक्की हार मानने वाले टीम अन्ना के कुछ सदस्य अभी से अलग लाइन पकड़ सकते हैं। वैसे भी राजनीति से दूर रहने की बात केवल कहने की है। केजरीवाल और प्रशांत भूषण चुनाव लड़ने की संभावनाएं तलाशते घूम रहे हैं। रामदेव गडकरी से लेकर बर्धन तक नेता-मिलाप करते घूम रहे हैं। ये सब एक ही टीम है - नवउदारवाद की पक्षधर और पोषक। इनके पास सारा धन इसी भ्रष्ट व्यवस्था से आता है। अपने नाम और नामे के फिक्रमंद ये सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट भला किसी सही व्यक्ति के नाम पर अड़ कर अपनी ऊर्जा क्यों बरबाद करते?     
      बहरहालकई नाम चर्चा में आने के बाद दो उम्मीदवार तय हो गए हैं। यूपीए की तरफ से प्रणब मुखर्जी और एनडीए की तरफ से पीए संगमा। कांग्रेस में राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस प्रत्याशी का चुनाव सोनिया गांधी ने किया। पार्टी के नेताओं ने इसके लिए बाकायदा उनसे गुहार लगाई। जैसे संसद में सब कुछ तय करने का अधिकार सोनिया गांधी का है और विधानसभा में एमएलए प्रत्याशी से लेकर मुख्यमंत्री तक तय करने का अधिकार हैउसी तरह राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार भी वे स्वयं ही तय करती हैं। पिछली बार भी उन्होंने यही किया था। इससे कांग्रेस पर तो क्या फर्क पड़ना है,राष्ट्रपति पद की गरिमा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
      जैसा कि कहा जा रहा हैप्रणब मुखर्जी बहुत हद तक सर्वस्वीकार्य हैं। लेकिन सोनिया गांधी ने उस वजह से उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया है। सोनिया गांधी के प्रति व्यक्तिगत और नवउदारवाद के प्रति विचारधारागत समर्पण की लंबी तपस्या के बाद उन्हें रायसीना हिल पर आराम फरमाने का पुरस्कार दिया गया है। हालांकि तपस्यारत प्रणब मुखर्जी को,कहते हैंप्रधनमंत्री पद की आशा थी। लेकिन सोनिया गांधी किसी राजनीतिक व्यक्ति को इस पद के आस-पास नहीं फटकने दे सकतीं। नवउदारवादी प्रतिष्ठान सोनिया गांधी को स्वाभाविक तौर पर अपना मानता है। सोनिया गांधी की ताकत का स्रोत केवल कांग्रेसियों द्वारा की जाने वाली उनकी भक्ति नहीं है। केवल उतना होता तो अब तक तंबू गिर चुका होता। वैश्विक पूंजीवादी ताकतें उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बनाए हुए हैं। जिस दिन चाहेंगी, हटा देंगी।   
      जाहिर हैसर्वस्वीकार्यअनुभवी और योग्यतम प्रणब मुखर्जी किसी गंभीर दायित्व-बोध के तहत राष्ट्रपति के चुनाव में नहीं हैं। बल्कि यह चुनाव उनका अपना है ही नहीं। वे चुनाव जीतेंगे और संविधान की एक बार फिर हार होगी। पार्टी और सरकार से विदाई के बिल्कुल पहले तक आर्थिक सुधारों की रफ्तार तेज करने की जरूरत बताने वाले प्रणब मुखर्जी की डोर राष्ट्रपति भवन में भी सुधारों के साथ बंधी रहेगी।
      दूसरे उम्मीदवार संगमा भी किसी गंभीर दायित्व-बोध के तहत चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। बल्कि अपने अब तक के राजनैतिक कैरियर का उत्कर्ष हासिल करने के लिए मैदान में हैं। वे सत्ता के सुख में मगन रहने वाले नेता हैं जो 1977से अब तक आठ बार लोकसभा के सदस्य चुने गए हैं। वे केंद्र में मंत्री रहे हैंमेघालय के मुख्यमंत्री रहे हैं और सर्वसम्मति से लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी बेटी केंद्र में मंत्री है और बेटा मेघालय में। कांग्रेस से राकांपाराकांपा से तृणमूल कांग्रेसफिर राकांपा और अपनी उम्मीदवारी न छोड़ने के चलते अब राकांपा से बाहर हैं। इस पद पर उनकी पहले से नजर थी। कोई आदिवासी अभी तक राष्ट्रपति नहीं बना हैयह तर्क उन्होंने अपने पक्ष में निकाला और पांच-छह लोगों का ट्राइबल फॉरम ऑफ इंडिया बना कर खुद को उस फॉरम का उम्मीदवार घोषित कर दिया। यह कहते हुए कि वे देश के करोड़ों आदिवासियों के प्रतिनिधि हैं।
      संयोग से हमें एक टीवी चैनल पर संगमा का इंटरव्यू सुनने को मिल गया। तब तक भाजपा ने उन्हें अपना उम्मीदवार स्वीकार नहीं किया था। इंटरव्यू के अंत का भाग ही हम सुन पाए। उनके जवाब कहीं से भी राष्ट्रपति के पद की गरिमा के अनुरूप नहीं थे। जिस सर्वोच्च पद के लिए वे खड़े हैंअपने को उसके के लिए उन्होंने कतई तैयार नहीं किया है। वे राजनीति का मतलब अपने और अपने बच्चों के लिए बड़े-बड़े पदों की प्राप्ति मानते हैं। यह सब उन्हें मिला हैइसके लिए उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद  दिया। लेकिन राजनीतिक सत्ता की उनकी भूख किंचित भी कम नहीं हुई है। वे अपनी और अपने बच्चों की और बढ़ती देखना चाहते हैं। जब एंकर ने पूछा कि अभी तो वे काफी स्वस्थ हैं और आगे की बढ़ती देख पाएंगे तो उन्होंने कहा कि राजेश पायलट कहां देख पाए अपने बेटे को मंत्री बनेयानी जिंदगी का कोई भरोसा नहीं कब दगा दे जाएइसलिए जो पाना है जल्दी से जल्दी पाना चाहिए। उन्होंने अंत में यह संकेत भी छोड़ा कि इस बार न सहीअगली बार उन्हें राष्ट्रपति बनाया जाए।
      उपनिवेशवादी दौर रहा होआजादी के बाद मिश्रित अर्थव्यवस्था का दौर रहा हो या पिछला 25 सालों का नवउदारवादी दौर - विकास के पूंजीवादी मॉडल की सबसे ज्यादा तबाही आदिवासियों ने झेली है। संगमा उत्तर-पूर्व से हैं। वहां के आदिवासियों और शेष भारत के आदिवासियों की स्थितियों में ऐतिहासिकभौगोलिक व सांस्कृतिक कारकों के चलते फर्क रहा है। पूंजीवाद का कहर बाकी भारत के आदिवासियों पर ज्यादा टूटा है। संगमा आदिवासियों की तबाही करने वाली राजनीति और विकास के 1977 से अग्रणी नेता रहे हैं। उन्होंने कभी आदिवासियों के लिए आवाज नहीं उठाई। आदिवासियों को उजाड़ने वाली राजनीति के सफल नेता रहे संगमा अब उनके नाम पर राष्ट्रपति बनना चाहते हैं। सत्ता की उनकी भूख इतनी सहज’ है कि वे किसी भी समझौते के तहत मैदान से हट कर उपराष्ट्रपति बनने को तैयार हो सकते हैं। ताकि आगे चल कर राष्ट्रपति बन सकें। 
      हवाई सपनों के सौदागर डॉ. कलाम
      पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम भी देर तक चलता रहा। ममता बनर्जी ने उन्हें उम्मीदवार बनाना चाहा और भाजपा ने। मुलायम सिंह ने जो तीन नाम उछाले थे उनमें डॉ. कलाम का नाम भी था। जिस तरह पिछली बार डॉ. कलाम ने दूसरा कार्यकाल पाने के लिए कोशिश की थीइस बार भी सक्रिय नजर आए। पिछली बार की तरह इस बार भी फेसबुक पर उनके लिए लॉबिंग की गई। उन्हें शायद आशा रही होगी कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की दाब में कांग्रेस उन्हें समर्थन दे देगी और वे एक बार फिर सर्वसम्मत उम्मीदवार बन जाएंगे। लेकिन प्रणब मुखर्जी का नाम तय होने और उन्हें व्यापक समर्थन मिलने के बाद जब देखा कि जीत नहींफजीहत होने वाली हैअपनी उम्मीदवारी से इनकार कर दिया।
      याद करें प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति बनने पर काफी नाक-भौं सिकोड़ी गई थी। इसलिए नहीं कि वे बतौर राष्ट्रपति अपेक्षाएं पूरा नहीं कर सकती थींया उन्होंने चुनाव के पहले ही अपने दिवंगत गुरु से वार्तालाप संबंधी रहस्य’ का उद्घाटन कर दिया था। या इसलिए कि सोनिया गांधी ने उन्हें थोप दिया था। बल्कि इसलिए कि उनका अपीयरेंस एक ग्रामीण महिला जैसा हैवे विदेश में भारत की बेइज्जती कराएंगी। हमने यह खास तौर पर गौर किया था कि निम्न मध्यवर्ग से आने वाले हमारे छात्रजिनके अपने माता-पिता प्रतिभा पाटिल जैसे लगते होंगेदेश की बेइज्जती कराने का तर्क ज्यादा दे रहे थे। उनमें भी खास कर लड़कियां। उन्हें यह भी शिकायत थी कि प्रतिभा पाटिल फर्राटे से अंग्रेजी नहीं बोलती। उन्हें डॉ. कलाम जैसा हाईफाई राष्ट्रपति चाहिए था। 
      प्रतिभा पाटिल अपना कार्यकाल ठीक-ठाक निभा ले गईं। उन्होंने कुछ भी खास नहीं किया। संविधान पर जो कुठाराघात हो रहा हैउस तरफ उन्होंने इशारा तक नहीं किया। स्त्री सशक्तिकरण का तर्क सोनिया गांधी ने दिया था। उस दिशा में उन्होंने कुछ भी विशेष नहीं किया। लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि उन्होंने डॉ. कलाम जैसी हवाई बातें कभी नहीं कीं। हम इसे उनका एक बड़ा गुण मानते हैं। अपनी छवि चमकाने के लिए जिस तरह से डॉ. कलाम ने राष्ट्रपति के ओहदे से हवाई बातें कीवह गलत परंपरा थीजिसे प्रतिभा पाटिल ने तोड़ा। डॉ. कलाम की हाई-हवाई बातों में युवा ही नहींकई वरिष्ठ लोग भी आ गए थे। उसीका सरमाया खाने के लिए वे दो बार फिर से राष्ट्रपति बनने के लिए उद्यत दिखे। उनकी अवकाश-प्राप्ती के अवसर पर हमने युवा संवाद’ (अगस्त 2007) में हवाई सपनों के सौदागर डॉ. कलामशीर्षक से लेख लिखा था जो इस प्रकार है :
      ‘‘जिन कलाम साहब के बारे में यह कहा गया कि उन्होंने अपने कार्यकाल में प्रेसीडेंसी’ के मायने बदल दिएमैं कभी उनका प्रशंसक नहीं हो सका। मैंने काफी कोशिष की उनकी सराहना कर सकूंलेकिन वैसा नहीं हुआ। यह मेरी सीमा हो सकती है और उस सीमा के कई कारण। मुझे उनके विचारों में न कभी मौलिक चिंतन की कौंध प्रतीत हुईन इस देश की विशाल वंचित आबादी के प्रति करुणा का संस्पर्श। जिस तरह की हाई-हवाई बातें वे करते रहे और उनके गुणग्राहक उनका बढ़ा-चढ़ा कर प्रचार करते रहेउसके बाद यह सोचना मुश्किल है कि अपनी ऊंची उड़ान में कलाम साहब कभी इसअपराधबोध’ का शिकार होते हों कि आदर्शवादियों’ नेमुक्तिबोध के शब्दों मेंदेश को मार कर अपने आप को जिंदा रखा है। राष्ट्राध्यक्षों का प्रेरणादायी भाषण देनासपने दिखाना आम रिवाज है। लेकिन निराधार प्रेरणा और सपने का कोई अर्थ नहीं होता। उनके नीचे ठोस जमीन होनी चाहिए।
      यह लेख मैं नहीं लिखता, अगर सुरेंद्र मोहन और कुलदीप नैयर जैसे समाजवाद और ध निरपेक्षता की विचारधारा में विश्वास रखने वाले दो वरिष्ठतम विद्वान अवकाश ग्रहण करने के अवसर पर राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की अतिरंजनापूर्ण बड़ाई नहीं करते। सुरेंद्र मोहन जी तो अपनी प्रशंसात्मक अभिव्यक्ति को न भूतोन भविष्यति’ तक खींच लाए। वे लिखते हैं : सपनों को जगाने वालाआशाओं  और उमंगों को हर दिल में बसाने वाला और नई दृष्टियों का संवाहक डॉ. अब्दुल कलाम जैसा राष्ट्रपति फिर कभी भारत को मिल पाएगा, यह कहना कठिन ही है। राष्ट्र को ऐसा विज्ञानवेत्ता और यांत्रिकी का विषेषज्ञ राष्ट्रपति अब तक नहीं मिला था। न वे भाषणकला के धनी थे और न ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद या वेंकटरमण की तरह संविधानवेत्ता ही थे। डॉ. जाकिर हुसैन और डॉ. शंकरदयाल शर्मा राजनीतिप्रशासन और शिक्षा के क्षेत्रों के सम्मानित विद्वान थेइन गुणों से भी डॉ. कलाम का संबंध नहीं था। इसके बावजूद जो अपार लोकप्रियताखास कर नई नस्लों का असीम प्यार डॉ. कलाम को मिलावह शायद अन्य किसी पूर्व राष्ट्रपति को नहीं मिला। सपनोंकल्पनाओंउमंगों और अरमानों से सभी दिलों को भरने वाला ऐसा प्रेरणादायक शिक्षक न तो कभी इस गौरवपूर्ण पद पर बैठा हैन बैठेगा - 'न भूतोन भविष्यति।’ (‘दैनिक भास्कर’, 22 जुलाई 2007)
      इस तरह सुरेंद्र जी ने सपनों के सौदागर’ कलाम साहब को शीशे में उतार दिया हैजो अर्थशास्त्रियों से कहते रहे हैं कि मनुष्य सिर्फ पेट की भूख से ही नहीं तड़पताउसे ज्ञान का प्रकाश भी चाहिए।’ (वही) यह अफसोस की बात है कि सुरेंद्र जी की पैनी नजर सतह पर तैरती यह सच्चाई नहीं देख पाती कि कलाम साहब जैसों की दुनिया में ज्ञान का प्रकाश पाए लोगों का पेट कभी नहीं भरता। कलाम साहब के कार्यकाल में उन्हीं के हस्ताक्षर से स्वीकृत हुआ सांसदों और विधायकों के लाभ के पद से संबंधित विधेयक इसका एक छोटा-सा उदाहरण है। यह कहना कि कलाम साहब खुद सादगी पसंद हैंकोई मायने नहीं रखता। जिस देश में सरकार के अनुसार देश की आधी से ज्यादा आबादी - नौनिहालोंनौजवानों,महिलाओंबुजुर्गों समेत - हर तरह और हर तरफ से असुक्षिरत हैवहां कलाम साहब और मनमोहन सिंह जैसों की सादगीशाही’ कही जाएगी। उस तंत्र का हिस्सा होना जो ऐश्वर्य और ऐशोआराम में मध्यकालीन शासकों को लज्जित करने वाला हैसादगी के अर्थ को शून्य कर देता है।
      उपर्युक्त कथन के पूर्व सुरेंद्र जी ने लिखा है : डॉ. कलाम देश को उस अंधी दौड़ से ऊपर उठाना चाहते हैंजो हमें अमेरिका की राह पर ले जाती हैजहां अमीरी और गरीबी में बहुत अंतर है और एक सैंकड़ा लोग देश के पचीस सैंकड़ा गरीबों की समूची संपत्ति से भी अधि संपत्ति के स्वामी हैं।’ (वही) हमें याद नहीं पड़ता कि कलाम साहब ने देश की अर्थनीति से लेकर राजनीति तक को अमरीकी पटरी पर डालने वाली मौजूदा या पिछली सरकार को कभी इसके प्रति आगाह किया हो। हमें यह भी नहीं लगता कि देश के अमरीकीकरण का विरोध करने वाले आंदोलनों और उनके नेताओं-विचारकों के बारे में कलाम साहब को कोई जानकारी या सहानुभूति हो। वे देश में दो राजनीतिक पार्टियां होने के समर्थक हैं। वे दो पार्टियां कांग्रेस और भाजपा ही हो सकती हैं। ये दोनों देश को अमरीका के रास्ते पर चलाने वाली हैं। इनके अलावा कलाम साहब वामपंथीसामाजिक न्यायवादी या क्षेत्रीय पार्टियों को देश के विकास में बाधा  मानते हैंजिनके चलते कांग्रेस और भाजपा को गठबंधन सरकार चलाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कलाम साहब की जिस लोकप्रियता का विरुद गाया जाता हैवह उसी जनता के बीच है जो विशाल भारत के भीतर बनने वाले मिनी अमेरिका की निवासी है। मिनी अमेरिका के बाहर की जनता पर उनकी लोकप्रियता लादी गई है।
      नैयर साहब को मलाल है कि कलाम साहब के रहते राष्ट्रपति पद के लिए किसी दूसरे उम्मीदवार के बारे में सोचा गया। अवकाश-प्राप्त करने की बेला में उन्होंने कलाम साहब से मुलाकात की और उनसे कोई खास खबर निकालने की कोशिश की। लेकिन कलाम साहब का कमाल कि वे उनके विजन 2020’, जिसके तहत सन 2020 तक भारत दुनिया का महानतम देश हो जाएगाके गंभीर रूप से कायल होकर बाहर निकले। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं और बहसों पर गहरी पकड़ रखने वाले नैयर साहब ने मिसाइल मैन’ के समक्ष यह सवाल नहीं उठाया कि अगर सभी देश विकसित,महाशक्ति और महानतम बनेंगे तो किसकी कीमत परभारत 2020 तक विकसित महाशक्ति और महानतम हो जाएगा तो किस विचारधारा और रास्ते के तहतनैयर साहब की खुशी और बढ़ गई होगी जब कलाम साहब ने अपने विदाई भाषण में यह घोषणा की कि 2020 से पहले भी भारत दुनिया का महानतम राष्ट्र बन सकता है। यह शीशे की तरह साफ है कि कलाम साहब उसी राष्ट्र के विकास और महानता की बात कर रहे हैं जिसे नवउदारवादी पिछले डेढ़ दशक से बनाने में लगे हैं। कलाम साहब का आह्वान पूरी तरह से अमरीकावादियों-नवसाम्राज्यवादियों की संगति में है। वरना कोई बताए कि एक अरब 20 करोड़ की आबादी का देश आधुनिक विज्ञान और तकनीकीजिसके कलाम साहब विशेषज्ञ हैंपर आधारित पूंजीवादी विकास के मॉडल के मुताबिक 2020 तक कैसे विकसित हो सकता हैक्या कहा जा सकता है कि अपने कार्यकाल में कलाम साहब ने सपने नहींअंधविश्वास परोसे हैं!
      सरकारी तंत्र और मीडिया में कलाम साहब की गुणगाथा पूरे पांच साल सतत चलती रही। वह अगले पांच साल और चलती रहे इसके लिए कलाम साहब के गुणगायकों ने एसएमएस के जरिए जोरदार प्रयास किया। लेकिन जब लगा कि राष्ट्रपति का पदजिसे उनकी नजर में कलाम साहब ने अभूतपूर्व महानता और पवित्रता से मंडित कर दिया था,राजनीति के गंदे कीचड़ में लथेड़ा जा रहा हैतो गुणग्राहक दुखी हो गए। राजनीति कलाम साहब को बुरी लगती है तो उनके गुणगायकों को कैसे अच्छी लग सकती है! गठन के समय से ही कलाम साहब के गुणगायक तीसरे मोर्चे का उपहास उड़ाने और उन पर लानत भेजने में अग्रणी थे। लेकिन जैसे ही मोर्चे ने अपनी तरफ से कलाम साहब का नाम चलाया,गुणगायक और खुद कलाम साहब मोर्चे के मुरीद हो गए। काश कि मोर्चा उनकी जीत सुनिश्चित कर पाता और गुणगायकों को कलाम साहब को आखिरी सलाम नहीं करना पड़ता! कमाल के कलाम साहब’ का आखिरी सलाम का कार्यक्रम एक ग्रांड फिनाले’ रहना ही था। हैरत यही है कि उसमें सबसे ऊंचा स्वर हमारे आदरणीय सुरेंद्र मोहन जी और कुलदीप नैयर साहब का रहा।
      कहना न होगा कि कलाम साहब के कमाल का मिथक उनके गुणगायकों और मीडिया का रचा हुआ था। उनके पद से हटने के बाद अब वह कहीं नजर नहीं आएगा। (ये गुणगायक और मीडिया अब किसी और बड़ी हस्ती को पकड़ेंगे जो उनके मिशन अमेरिका’ को वैधता प्रदान करे।) अंत की घोषणाओं के बावजूद इतिहास चल रहा है। वहां ठोस विचार अथवा कार्य करने वाले लोगों की जगह बनती है। इसलिए इतिहास में कलाम साहब की जगह गिनती भर के लिए होगीजो पदासीन हो जाने के नाते किसी की भी होती है। ऐसे में ज्ञान और अनुभव में पगे दो वरिष्ठतम विद्वानों की कलाम साहब के बारे में इस कदर ऊंची धारणा का औचित्य किसी भी दृष्टिकोण से समझ में नहीं आता। अगर अवकाश-प्राप्ति के अवसर की औपचारिकता मानें तो वह वंदना के सुरों में एक सुर और मिलाने जितनी ही होनी चाहिए थी। लेकिन दोनों का सुर भानुप्रताप मेहता सरीखों को भी पार कर गयाजिन्होंने वंदना में व्याजनिंदा का भी थोड़ा अवसर निकाल लिया। (देखें, ‘इंडियन एक्सप्रैस’ 25 जुलाई 2007 में प्रकाशित उनका लेख प्राइम मिनिस्टर कलाम?’)
      धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में भी कलाम साहब के राष्ट्रपतित्व पर कुछ चर्चा की जा सकती है। राष्ट्रपति के पद के लिए कलाम साहब का नाम भले ही मुसलमानों को रिझाने के लिए समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह ने चलाया होउनके नाम पर सहमति बनने का वास्तविक कारण गुजरात में सांप्रदायिक फासीवादी नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा हजारों मुसलमानों की हत्या और बरबादी था। अगर गुजरात में राज्य-प्रायोजित हिंसा में मुसलमानों का नरसंहार न हुआ होता तो कलाम के नाम पर भाजपा तो तैयार नहीं ही होतीउस सांप्रदायिक हिंसा और उसके कर्ता को रोकने में खोटा सिक्का साबित हुई कांग्रेस भी कदापि तैयार नहीं होती। यह कहने में अच्छा नहीं लगेगालेकिन वास्तविकता यही है कि कलाम साहब को राष्ट्रपति का पद एक मुसलमान होने के नाते गुजरात में मुसलमानों की हत्याओं के बदले तोहफे में मिला था। अगर कोई संजीदा इंसान होता तो वह विनम्रतापूर्वक उस सांप्रदायिक’ आम सहमति से इनकार कर देता और वैसा करके धर्मनिरपेक्षता के साथ ही मानवता की नींव भी मजबूत करता। हमारी यह मान्यता अनुबोध (after thought) पर आधारित नहीं है। गुजरात के कांड के बाद उनके नाम पर बनी सहमति के वक्त हमने अपनी भावना एक कविता लिख कर अभिव्यक्त की थी जो सामयिक वार्ता’ में प्रकाशित हुई थी। अपने लेख की शुरुआत में सुरेंद्र मोहन जी ने भी इस वास्तविकता का जिक्र किया है : जब इस पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने उनका नाम प्रस्तावित किया थातब उसे अपनी छवि सुधारने के लिए एक मुस्लिम नाम की जरूरत थीक्योंकि गुजरात के घटनाक्रम के कारण उसका चेहरा दागदार बन गया था। लेकिन इन पांच वर्षों में किसी नागरिक को यह पहचान याद नहीं आई। वे ऐसी सांप्रदायिकजातिगत या क्षेत्रीय गणनाओं से कहीं ऊपर उठे हुए थे और पूरे देश में यह सहमति थी कि वे उसी पद पर दोबारा आसीन हों।’ यह सही है कि कलाम साहब सांप्रदायिकजातिगत और क्षेत्रीय गणनाओं से ऊपर रहे। यह बड़ी बात है और अभी तक देश के हर राष्ट्रपति ने इसका निर्वाह किया है। लेकिन इससे यह वास्तविकता निरस्त नहीं होती कि कलाम साहब का चयनजैसा कि खुद श्री सुरेंद्र मोहन जी ने कहा हैसांप्रदायिक आधार पर हुआ था। अगर वे सांप्रदायिक आधार पर होने वाले अपने चयन को नकार देते तो उनका बड़प्पन हमारे जैसे लोग भी मानते और उन्हें बगैर राष्ट्रपति बने भी सलाम करते।’’ (युवा संवाद’ (अगस्त 2007)
      जाहिर हैराष्ट्रपति चुनाव के संदर्भ में कलाम साहब का व्यवहार भी गरिमापूर्ण नहीं कहा जा सकता। वे पिछली बार भी राष्ट्रपति बनना चाहते थे और इस बार भी ऐन चुनाव के मौके पर सक्रिय हो गए। सवाल सर्वानुमति का नहीं,जीत का था। अगर जीत की संभावना होती तो वे कंटेस्ट भी कर सकते थे। पहले की तरह उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन-सी पार्टियां उनका समर्थन कर रही हैं। जैसे उनकी भारत के महाशक्ति होने की धारणा पर अढ़ाई लाख किसानों की आत्महत्याओं से कोई फर्क नहीं पड़ता!
     
      धर्मनिरपेक्षता के दावेदार : कितने गाफिल कितने खबरदार
      राष्ट्रपति के उम्मीदवारों की चर्चा में भाजपा के भावी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार पर भी चर्चा चल निकली। आरएसएस ने नरेंद्र मोदी का नाम आगे किया तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने को धर्मनिरपेक्षता का बड़ा दावेदार सिद्ध करने के लिए आगे आ गए। क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव पर 2014 में होने वाले आम चुनाव की छाया है। लिहाजानीतीश-नरेंद्र मोदी प्रकरण पर भी थोड़ी चर्चा वाजिब होगी।  
      गुड़ खाना परंतु गुलगुलों से परहेज करना’ - बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर इस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। 2004 के पहले केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग की सरकार बनी थी तो उसका समर्थन करने और उसमें शामिल होने वाले नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने कहा था कि भाजपा की तरफ से उदार’ वाजपेयी की जगह अगर कट्टर’ अडवाणी प्रधानमंत्री बनाए जाते तो वे राजग सरकार का न समर्थन करतेन उसमें शामिल होते। धर्मनिरपेक्षता की दावेदारी जताते हुए अपनी इस शर्त का उन्होंने काफी ढिंढोरा पीटा था। हालांकि कुछ समय बाद उसी सरकार में अडवाणी उपप्रधानमंत्री बनाए गए और मंत्री बने नीतीश कुमार ने कोई आपत्ति नहीं उठाई थी। वे पूरे समय राजग सरकार में मंत्री रहे और बिहार में भाजपा के साथ मिल कर बतौर मुख्यमंत्री दूसरी बार सरकार चला रहे हैं। गुजरात कांड उनके लिए घटना से लेकर आज तक कोई मुद्दा नहीं रहा। लेकिन बीच-बीच में नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत विरोध का शगल करते रहते हैं। गोया नरेंद्र मोदी अपने संगठन से अलग कोई बला है!
      राजनीतिक सफलता ने नीतीश कुमार को आश्वस्त कर दिया है कि आरएसएस-भाजपा के साथ लंबे समय तक राजनीति करके भी वे धर्मनिरपेक्ष बने रह सकते हैं। यह स्थिति नीतीश कुमार से ज्यादा धर्मनिरपेक्षता के अर्थ पर एक गंभीर टिप्पणी है। मुख्यधारा राजनीति में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ भाजपा के साथ रह कर या भाजपा का भय दिखा कर मुसलमानों के वोट हासिल कर लेना है। जाहिर हैधर्मनिरपेक्षता का यह अर्थ संविधान में प्रस्थापित धर्मनिरपेक्षता के मूल्य के पूरी तरह विपरीत और विरोध में है। भाजपा, आरएसएस का राजनैतिक मंच होने के नाते स्वाभाविक रूप से सांप्रदायिक है। भारतीय संविधान के तहत राजनीति करने की मजबूरी में उसे अपनी सांप्रदायिकता को ही सच्ची धर्मनिरपेक्षता प्रचारित करना होता है। दूसरे शब्दों मेंएक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा संविधान के साथ धेखाधड़ी करती है। लेकिन भाजपा के साथ या उसका भय दिखा कर मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले दल और नेता भी संविधान के साथ वही सलूक करते हैं।    
      कहने का आशय है कि पिछले 25 साल की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को जो लगातार ठोकरें खानी पड़ रही हैंउसके लिए अकेले सांप्रदायिक ताकतों को दोष नहीं दिया जा सकता। सांप्रदायिकता उनका धर्म’ है। इसमें धर्मनिरपेक्ष ताकतों का दोष ज्यादा हैक्योंकि वे धर्मनिरपेक्षता की दावेदार बन कर उसका अवमूल्यन करती हैं। यह परिघटना राजनीति से लेकर नागरिक समाज तक देखी जा सकती है। और असली खतरा यही है।      
      नरेंद्र मोदी का विरोध करने पर आरएसएस ने भले ही नीतीश कुमार को धता बताई होलेकिन नीतीश कुमार आरएसएस की बढ़ती का ही काम कर रहे हैं। आरएसएस शायद यह जानता भी है। उसने सेकुलर नेताओं और बुद्धिजीवियों को अपने आंतरिक झगड़े’ में उलझा लिया है। वह नरेंद्र मोदी पर दांव लगा कर अडवाणी के प्रधनमंत्री बनने का रास्ता साफ कर रहा है। जैसे अडवाणी के सामने वाजपेयी उदार’ हुआ करते थेवैसे अब नरेंद्र मोदी के मुकाबले अडवाणी उदार बन जाएंगे। आगे चल कर जब गुजरात का शेर’ अडवाणी जैसा नखदंतहीन बूढ़ा हो जाएगा तो उसके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता भी साफ होगा। क्योंकि तब तक हिंदुत्व का कोई और नया शेर आरएसएस में पैदा हो चुका होगा। खुद मोदी उस तरह के कई शेरों के साथ प्रतियोगता करके अव्वल आए हैं। जब मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था तो उनसे पहले उस समय कट्टरता के मामले में उनसे कहीं ज्यादा प्रख्यात प्रवीण तोगड़िया का नाम था। मोदी ने उन्हें पछाड़ कर मुख्यमंत्री का पद हासिल किया था। यह जानकारी अक्सर दोहराई जाती है कि मोदी की कट्टरता से वाकिफ उदार’ वाजेपयी ने आरएसएस-भाजपा को आगाह किया था। साथ ही यह कि गुजरात कांड के मौके पर वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी। लेकिन होने वही दिया जो हुआ। आरएसएस की उदारता’ की बस इतनी ही सिफत है।   
      आरएसएस यह जानता है कि मनमोहन सिंह के बाद देश के पूंजीपतियों की पहली पसंद नरेंद्र मोदी हैं। खुद मनमोहन सिंह के वे चहेते हैं। नरेंद्र मोदी को भी अपनी हिंदुत्ववादी हुंकार के साथ सबसे ज्यादा भरोसा पूंजीपतियों का है। वे पूंजीपतियों के बल पर इठलाते हैं। पूंजी के पैरोकार इधर लगातार कह रहे हैं कि गुजरात-कांड को अब भुला देना चाहिए। उनका तर्क है इससे देश के विकास में बाधा पैदा हो रही है। यानी मोदी ने गुजरात को विकास का मरकज बना दिया है। अब उन्हें देश के विकास की बागडोर सौंप देनी चाहिए। विदेशी पूंजी को मुनाफे से मतलब होता है। वह मुनाफा मनमोहन सिंह कराएं या मोदीइससे विदेशी पूंजी को सरोकार नहीं है। इसलिए हो सकता है मोदी को अडवाणी जैसा लंबा इंतजार न करना पड़े। दरअसलयह खुद नरेंद्र मोदी के हक में है कि वे इस बार अडवाणी को प्रधानमंत्री  के उम्मीदवार के रूप में आगे रहने दें। वे रहने भी देंगे। फिलहाल जो फूं-फां वे कर रहे हैंवह भविष्य के कतिपय दूसरे दावेदारों को दूर रखने के लिए है।(हम यहाँ स्वीकारते हैं कि उस समय आरएसएस की तरफ से अडवाणी की उम्मीदवारी को लेकर हमारा आकलन गलत निकला। मोदी के लिए कारपोरेट घरानों का पूर्ण समर्थन को देख कर उसने अडवाणी को तुरंत ड्राप कर दिया।)