Thursday, June 14, 2018

लोकसभा चुनाव 2019 : विपक्षी एकता के लिए एक नज़रिया-प्रेम सिंह


विपक्षी एकता के जटिल विषय पर चर्चा करने से पहले कुछ स्पष्ट तथ्यों को देख लेना मुनासिब होगा. पहला, पिछले करीब तीन दशकों से जारी नवउदारवादी नीतियों का कोई विपक्ष देश में नहीं है. न मुख्यधारा राजनैतिक पार्टियों के स्तर पर, न बौद्धिक वर्ग के स्तर पर. लिहाज़ा, देश के संसाधनों, श्रम और सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों/प्रतिष्ठानों को कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेचने का सिलसिला इसी तरह चलते रहना है; किसानों, असंगठित और संगठित क्षेत्र के मज़दूरों, कारीगरों, छोटे उद्यमियों, बेरोजगारों की जो बुरी हालत है, उसमें बदलाव की संभावना नहीं है; और आर्थिक विषमता की खाई इसी तरह बढ़ती जाएगी. नतीज़तन, समाज में तनाव, अलगाव, आत्महत्या, अपराध, अंधविश्वास, झूठ, फरेब जैसी प्रवृत्तियां जड़ जमाती जायेंगी. दूसरा, 2019 के लोकसभा चुनाव में वर्तमान सरकार की पराजय के बावजूद साम्प्रदायिक कट्टरता का उन्मूलन नहीं होगा. मौजूदा साम्प्रदायिक कट्टरता का चरित्र नवउदारवादी व्यवस्था के साथ गहराई से सम्बद्ध है. विपक्षी पार्टियाँ और सेक्युलर बुद्धिजीवी इस सच्चाई से आँख चुरा कर धर्मनिरपेक्षता बचाने की गुहार लगाते हैं. वे यह समझने को तैयार नहीं हैं कि संविधान के मूलभूत मूल्यों में से समाजवाद को त्याग देने के बाद धर्मनिरपेक्षता को नहीं बचाया जा सकता. बल्कि कहा जा सकता है कि साम्प्रदायिक कट्टरता बढ़ती जायेगी और समाज पर उसका कहर ज्यादा तेज़ी से टूटेगा. तीसरा, संविधान और संस्थाओं का अवमूल्यन नहीं रुकेगा, क्योंकि यह संविधान और उस पर आधारित संस्थाएं कारपोरेट उपनिवेशवाद अथवा नवसाम्राज्यवाद के तहत नवउदारवादी भारत (जिसे कभी 'शाइनिंग इंडिया' और कभी 'न्यू इंडिया' कहा जाता है) बनाने के लिए तैयार नहीं किये गए थे. चौथा, व्यक्तिवाद, परिवारवाद, साम्प्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, धन-बल, बाहु-बल आदि नकारात्मक प्रवृत्तियों के सम्मिश्रण से बनी राजनीति देश में आगे भी बदस्तूर चलती रहेगी. चौथा, संसाधनों की बिकवाली और सार्वजनिक उद्यमों के विनिवेश की प्रक्रिया में राजनीतिक पार्टियों/नेताओं को जो अवैध और कानूनन चंदे के रूप में अकूत धन मिलता है, उसके बल पर राजनीति धन का खेल बनी रहेगी.
      आशावादी इसे निराशावाद न समझें, यह हकीक़त है. इस हकीक़त के मद्देनज़र 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता का अर्थ चुनावी एकता ही हो सकता है. यह एकता चुनाव-पूर्व होनीं चाहिए और उसे यथार्थवादी नज़रिए, यानी चुनावी जीत के नज़रिए से अंजाम देना चाहिए. मोदी-शाह ने लोकतंत्र को चुनाव जीतने की हविस में तब्दील कर दिया है. लोकतान्त्रिक मर्यादा उनके लिए कोई मायने नहीं रखती. मोदी-शाह के नेतृत्व में 2019 का लोकसभा चुनाव एक ऐसा मर्यादा विहीन घमासान होगा कि लोकतंत्र पनाह मांगता घूमेगा! विपक्ष को चुनावी दौड़ में मोदी-शाह की शिकार-वृत्ति का शिकार नहीं होना चाहिए. उस रास्ते पर जीत मोदी-शाह की ही होगी. विपक्ष को देश के संविधान का सम्मान और नागरिकों पर भरोसा करते हुए लोकतंत्र की मर्यादा के दायरे में चुनाव लड़ना चाहिए.
      यह सही है कि चुनाव लोकतंत्र का सबसे अहम पक्ष है. लेकिन साथ में यह भी सही है कि लोकतंत्र है तो चुनाव हैं. लोकतंत्र चलता रहेगा तो नवउदारवाद/नवसाम्राज्यवाद से लड़ने वाली राजनीति के लिए कुछ न कुछ संभावना बनी रहेगी. डॉ. लोहिया ने कहा है कि राजनीति बुराई से लड़ने का काम करती है. भारत के नेता और बुद्धिजीवी हालाँकि ऐसा नहीं मानते प्रतीत होते, लेकिन भारत की मौजूदा नवउदारवाद/नवसाम्राज्यवाद की मातहत राजनीति अपने आप में एक बुराई बन गई है. राजनीति स्थायी रूप से बुराई की वाहक बन कर न रह जाए, इसके लिए चुनावों में सरकारों का उलट-फेर होते रहना ज़रूरी है. यह लोकतंत्र के रहते ही संभव है. लिहाज़ा, विपक्षी पार्टियों की चुनावी एकता लोकतंत्र के सार्थक बने रहने की दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकती है.
      भाजपा के साथ एनडीए में छोटे-बड़े 35 से ऊपर दल शामिल हैं. लोकसभा चुनावों में एक साल से कम समय रह गया है. चुनावों तक इस गठबंधन में टूट-फूट की संभावना कम ही लगती है. लोकजन शक्ति पार्टी, अपना दल, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी आदि का जो असंतोष दिखाई देता है, वह सरकार की नीतियों या असफलता को लेकर नहीं, 2019 में ज्यादा से ज्यादा सीटें पाने के लिए है. मोदी-शाह यह अच्छी तरह समझते हैं.     
      इधर विपक्ष की फुटकर गठबंधनों की रणनीति से कुछ संसदीय और विधानसभा सीटों पर भाजपा को हराया गया है. लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में यह फुटकर गठबंधन की रणनीति कारगर नहीं हो सकती. राष्ट्रीय स्तर का चुनाव राष्ट्रीय स्तर की रणनीति से लड़ा जाना चाहिए. उसके लिए राष्ट्रीय समझ पर आधारित राष्ट्रीय स्तर का गठबंधन जरूरी है. सवाल है कि एनडीए के बरक्स बनने वाला बाकी दलों का गठबंधन कांग्रेस के साथ बने या कांग्रेस से अलग. नेताओं और बुद्धिजीवियों की तरफ से दोनों तरह के विचार और प्रयास सामने आ रहे हैं. यहाँ विचारणीय है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों दो-दलीय संसदीय लोकतंत्र के पक्ष में हैं. मनमोहन सिंह और लालकृष्ण अडवाणी कह चुके हैं कि देश में दो ही पार्टियां होनी चाहिए. बाकी दलों को इन्हीं दो पार्टियों में विलय कर लेना चाहिए. भाजपा अमेरिका के पैटर्न पर अध्यक्षीय प्रणाली के भी पक्ष में है. दरअसल, कारपोरेट पॉलिटिक्स की यही ज़रुरत है कि भारत में अमेरिका की तरह केवल दो पार्टियां हों.
      ऐसी स्थिति में कांग्रेस से अलग गठबंधन बनेगा तो बहु-दलीय संसदीय लोकतंत्र की संविधान-सम्मत प्रणाली को वैधता और मज़बूती मिलेगी. संविधान भारतीय राज्य के संघीय ढाँचे को स्वीकृति देता है. लेकिन आज़ादी के बाद से ही केंदवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता रहा है, जिसे वर्तमान सरकार ने चरम पर पहुंचा दिया है. राज्य के संघीय ढाँचे का सत्ता, संसाधन और गवर्नेंस के विकेंद्रीकरण से अविभाज्य संबंध है. भाजपा और कांग्रेस से अलग चुनाव-पूर्व गठबंधन बनने पर संघीय ढांचे और विकेंद्रीकरण का थोड़ा-बहुत बचाव ज़रूर होगा. प्रधानमंत्री मोदी कितना भी कांग्रेस-मुक्त भारत की बात करते हों, वे कांग्रेस को ही अपना विपक्ष मानते हैं. इसका मायना है कि वे कंग्रेसेतर विपक्ष की अवधारणा को ख़त्म कर देना चाहते हैं. यह कांग्रेस के भी हित में है कि 2019 नहीं तो 2024 में मतदाता उसे बहुमत से जिताएं, ताकि राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री बनने में कोई बाधा न रहे.
      कांग्रेस पिछले चार सालों में किसान-मज़दूरों-बेरोजगारों के हक़ की बात छोडिये, गहरे संकट में पड़ी देश की सबसे बड़ी अकलियत के बचाव में एक बार भी सड़क पर नहीं उतरी है. इसका मुख्य कारण उसका सत्ता-भोगी चरित्र है. लेकिन यह रणनीति भी है. कांग्रेस शायद चाहती है कि मुसलमान इतना डर जाएं कि भविष्य में आँख बंद करके केवल कांग्रेस को वोट दें. दलित और पिछड़े समुदायों के राजनीतिकरण के बाद कांग्रेस की एकमुश्त वोट बैंक के रूप में मुलसमानों पर ही नज़र है. कांग्रेस से छिटकने के बाद मुसलमानों का ज्यादातर वोट राजनीति की तीसरी ताकत कही जाने वाली पार्टियों को मिलता है.
      मोदी की जुमलेबाजी लोगों को हमेशा बेवकूफ नहीं बनाये रख सकती. न ही येन-केन प्रकारेण चुनाव जीतने और सरकार बनाने की शाह की 'चाणक्य-नीति' हमेशा कारगर बनी रह सकती है. मोदी ने सरकार को कारपोरेट घरानों के मुनाफे का औज़ार बना दिया है. यह सबसे अमीर आदमी को सबसे पहले फायदा पहुँचाने वाली सरकार बन गई गई है. सरकार की इस अंधेरगर्दी से तबाह किसान-मज़दूर-कारीगर-उद्यमी-बेरोजगार आज नहीं तो कल भाजपा के खिलाफ वोट डालेंगे. कारपोरेट घरानों का धन और खरीदा हुआ मीडिया उसकी सत्ता नहीं बचा पाएंगे. कांग्रेस उसी घड़ी के इंतजार में बैठी लगती है. अगर राजनीति की तीसरी कही जाने वाली शक्ति की अवधारणा राष्ट्रीय स्तर पर ख़त्म हो जाती है, तो वह वोट कांग्रेस को ही मिलेगा. और कांग्रेस के पांच या दस साल राज करने के बाद फिर से भाजपा को. अगर कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर केंद्र में सरकार बन भी जाती है, तो कांग्रेस उसे कार्यकाल पूरा नहीं करने देगी. मध्यावधि चुनाव होने की स्थिति में फिर मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच होगा.    
      कांग्रेस से अलग राष्ट्रीय मोर्चा बनाने का अर्थ एक राजनीतिक पार्टी के रूप में कांग्रेस का विरोध नहीं है. कांग्रेस अपने में समर्थ पार्टी है. उसका संगठन राष्ट्रीय स्तर पर है. पिछले लोकसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद भी संसद में भाजपा के बाद उसका दूसरा स्थान है. जिन राज्यों में उसकी मज़बूती है, वहां वह पूरी ताकत से चुनाव लड़े. अगर राष्ट्रीय मोर्चा को चुनावों में पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाता है, तो कांग्रेस बाहर से राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को समर्थन दे सकती है. हालाँकि वैसी स्थति में एनडीए के कुछ घटक दल भी भाजपा का साथ छोड़ कर राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के साथ जुड़ सकते हैं.      
      भाजपा और कांग्रेस से इतर गबंधन को सामाजिक न्यायवादी राष्ट्रीय मोर्चा (नेशनल फ्रंट फॉर सोशल जस्टिस) नाम दिया जा सकता है. इसमें कम्युनिस्ट पार्टियों सहित वे सभी दल शामिल हो सकते हैं जो भाजपा और कांग्रेस के साथ मिल कर लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहते. राष्ट्रीय मोर्चा के निर्माण का काम बिना देरी किये शुरू किया जाना चाहिए. इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए एक संयोजन समिति, जिसका एक संयोजक हो, बनाने से सहूलियत होगी. संयोजक के पद के लिए एक नाम शरद यादव का हो सकता है. प्रस्तावित मोर्चा के चार-पांच प्रवक्ता बनाए जाएं जो सीधे और मीडिया की मार्फत मोर्चा के स्वरूप, नीतियों और प्रगति पर लगातार रोशनी डालें. एक समिति चुनाव प्रचार की रणनीति और चुनाव सामग्री तैयार करने के लिए बनाई जाये.
      राष्ट्रीय मोर्चा में छोटे विचारधारात्मक दलों की भूमिका का भी सवाल महत्वपूर्ण है. उनके सहयोग का रास्ता निकाला जाना चाहिए. बेहतर होगा कि विचाधाराहीनता (संविधान की विचारधारा सहित) की वकालत करने वाले दलों और व्यक्तियों को राष्ट्रीय मोर्चा से अलग रखा जाए. क्योंकि वे सीधे नवउदारवादी विचारधारा की पैदाइश, लिहाज़ा, समर्थक होते हैं. राजनीतिक समझदारी से काम करने वाले नागरिक संगठनों और व्यक्तियों को भी राष्ट्रीय मोर्चा से जोड़ने का काम होना चाहिए. इनमें कल-कारखानों, खदानों, कृषि, वाणिज्य-व्यापार, साहित्य, कला, अध्ययन, खेल आदि से जुड़े संगठन और व्यक्ति हो सकते हैं. राजनीतिक रूचि रखने वाले अप्रवासी भारतीयों, जो देश के बिगड़ते हालत पर चिंतित हैं, को भी राष्ट्रीय मोर्चा से जोड़ा जा सकता है. ऐसा प्रयास होने से देश में व्यापक सहमती का माहौल बनेगा और राष्ट्रीय मोर्चा भविष्य की राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा.       
      राष्ट्रीय मोर्चा की जीत की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, यदि साझा न्यूनतम कार्यक्रम इस वायदे के साथ बनाया जाए कि नई सरकार किसानों, मज़दूरों, छोटे-मंझोले व्यापारियों/उद्यमियों, बेरोजगारों के पक्ष में नवउदारवादी आर्थिक नीतियों की समीक्षा करेगी. भाजपा और कांग्रेस यह वादा नहीं कर सकतीं. इसके अलावा, राष्ट्रीय मोर्चा का नेतृत्व अपने सामाजिक आधार के चलते विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, विश्व आर्थिक मंच आदि के आदेशों को कांग्रेस और भाजपा जैसी तत्परता और तेज़ी से लागू नहीं कर सकता. ऐसा होने से कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लूट में कुछ न कुछ कमी आएगी. राष्ट्रीय मोर्चा की जीत से सरकारों द्वारा संविधान में उल्लिखित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' के अनुसार आर्थिक नीतियां बनाने की पुनर्संभावना को बल मिलेगा.  
      राष्ट्रीय मोर्चा के प्रधान नेता, जो प्रधानमंत्री का उम्मीदवार भी हो, का फैसला बहुत जटिल काम है. लेकिन 2019 का चुनाव जीतने के लिए विपक्षी नेताओं को यह फैसला समझदारी से करना ही होगा. मैंने 2014 के लोकसभा चुनाव के अवसर पर 'तीसरे मोर्चे की प्रासंगिकता' शीर्षक लेख लिखा था. उसमें कांग्रेस और भाजपा से अलग राजनीतिक दलों के चुनाव-पूर्व गठबंधन बनाने की वकालत की थी. गठबंधन के नेता के रूप में एक नाम सीपीआई के वरिष्ठ नेता एबी बर्धन का सुझाया था. उस समय चुनाव के बाद गठबंधन बनाने का आग्रह लेकर चलने वाले नेताओं की वजह से तीसरे मोर्चे का निर्माण नहीं हो पाया.  
      भाजपा और कांग्रेस से अलग विपक्षी गठबंधन की नेता के रूप में ममता बनर्जी और मायावती के नामों की चर्चा होती है. ममता बनर्जी साधारण पृष्ठभूमि से आती हैं. हालांकि कांग्रेस में रहते हुए उन्हें एक सत्तारूढ़ और साधन-संपन्न राजनीतिक पार्टी का आधार मिला हुआ था. लेकिन कांग्रेस से अलग होने के बाद उन्होंने कड़ी मेहनत से तृणमूल कांग्रेस को खड़ा किया. उन्होंने संघर्ष करके अपनी राजनीतिक हैसियत हासिल की है. उसीके चलते वे लगातार दूसरी बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं. उनकी सरकार किसी अन्य दल पर निर्भर नहीं है. हाल के पंचायत चुनावों से पता चलता है कि मतदाताओं पर उनकी मज़बूत पकड़ बनी हुई है. बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की सुप्रीमो मायावती दलित समाज से आती हैं. आज की राजनीति में वे अकेली सेल्फ-मेड नेता हैं. उनकी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज़ा हासिल है. ज्यादातर प्रांतों में उनकी पार्टी की इकाइयां हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती को तीसरे मोर्चे का प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की बात की गई थी. मायावती के नेतृत्व में बनने वाली सरकार की राजनीतिक अर्थव्यवस्था (पोलिटिकल इकॉनमी) नवउदारवादी अर्थव्यवस्था से कुछ न कुछ अलग हो सकती है. वे फिलहाल विधायक या सांसद नहीं हैं. लिहाज़ा, राष्ट्रीय मोर्चा के निर्माण और चुनावों की तैयारी में अभी से पूरा समय दे सकती हैं.  
      यहाँ उपर्युक्त दो नाम इसलिए विचारार्थ रखे गए हैं क्योंकि इन दो नेताओं के अलावा अभी अन्य किसी नेता का नाम फिलहाल चर्चा में नहीं है. एम. करूणानिधि की उम्र करीब 95 साल हो गई है. मुलायम सिंह की उम्र 78 साल है, लेकिन उनका स्वास्थ्य ऐसा नहीं है कि वे राष्ट्रीय मोर्चा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हो सकें. अलबत्ता, सलाहकार की भूमिका वे बखूबी निभा सकते हैं. वे उत्तर प्रदेश के बाहर चुनाव प्रचार के लिए निकालें तो बड़ी उपलब्धि होगी. नीतीश कुमार का नाम पहले काफी चलता था, लेकिन वे महागठबंधन को तोड़ कर भाजपा के साथ जा चुके हैं. वे अब लौटें भी तो उनकी साख नहीं बन पाएगी. चंद्रबाबू नायडू हाल में एनडीए से निकले हैं. उनका भरोसा नहीं है कि वे वापस एनडीए में नहीं लौट जायेंगे. नवीन पटनायक चौथी बार उड़ीसा के मुख्यमंत्री हैं. 2009 में उन्होंने भाजपा नीत एनडीए छोड़ कर वामपंथी पार्टियों के साथ गठजोड़ किया था. वे मुखर नेता नहीं हैं और उड़ीसा के बाहर ज्यादा नहीं निकलते. 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर जो राजनीतिक गहमा-गहमी है, उसमें वे अभी शामिल नहीं हैं. हाल में कर्णाटक में कांग्रेस के समर्थन से बनी जनता दल (एस) की सरकार के शपथ-ग्रहण कार्यक्रम में भी वे नहीं थे. अभी तक वे अप्रतिबद्ध (नॉन कमीटल) हैं. वे राष्ट्रीय मोर्चा में रहें, इसकी कोशिश की जानी चाहिए. कहने की ज़रुरत नहीं कि भाजपा और कांग्रेस से अलग गठबंधन के नेता के रूप में जिस नाम पर सहमति बनती है उसे अपनी सोच का धरातल ऊंचा उठाना होगा.  
      पूर्व वाणिज्य और वित्त सचिव एसपी शुक्ला ने नई आर्थिक नीतियों के दुष्परिणामों पर शुरूआती दौर में ही गंभीर विचार और प्रतिरोध किया था. विपक्षी एकता के सवाल पर उनके साथ हाल में पूना में चर्चा हुई. मैंने उनके सामने ममता अथवा मायावती के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा बनाने का विचार रखा. उन्होंने कहा यदि ममता अथवा/और मायावती के नेतृत्व में अगला चुनाव लड़ा जाता है, तो यह राजनीति में 1989 में हुए सबाल्टर्न प्रवेश के बाद जेंडर प्रवेश का अगला चरण होगा. देश के सभी बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट, जो संविधान के आधारभूत मूल्यों - समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र - और संवैधानिक संस्थाओं के क्षरण को लेकर चिंतित हैं, उन्हें राष्ट्रीय मोर्चा के निर्माण और स्वीकृति की दिशा में सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए. भारत में अक्सर नेताओं ने बुद्धिजीवियों-कलाकारों को प्रेरणा देने का काम किया है. आज की जरूरत है कि बुद्धिजीवी, कलाकार और नागरिक समाज के सचेत नुमाइंदे नेताओं का मार्गदर्शन करें.   

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक और सोशलिस्ट पार्टी (भारत) के अध्यक्ष हैं)   

Thursday, May 3, 2018

लोहिया, भारतरत्न और सौदेबाज़ समाजवादी- प्रेम सिंह


      किसी क्षेत्र में विशिष्ट भूमिका निभाने वाले व्यक्ति के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए अक्सर कहा जाता है कि वह अपने विचारों और कार्यों के रूप में दुनिया में जीवित रहेगा. यह भी कहा जाता है कि उसके विचारों और कार्यों को समझ कर उन्हें आगे बढ़ाना उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी. कहने में यह भली बात लगती है. लेकिन, विशेषकर सक्रिय राजनीति में, दिवंगत व्यक्ति का अक्सर सत्ता-स्वार्थ के लिए इस्तेमाल होता है. अनुयायी प्रतिमा-पूजा करते हुए और और विरोधी प्रतिमा-ध्वंस करते हुए दिवंगत नेता के विचारों और कार्यों को अनेकश: विकृत करते हैं. यह भी होता है कि विचारधारा में बिल्कुल उलट प्रतीक-पुरुषों को सत्ता-स्वार्थ के लिए बंधक बना लिया जाता है. प्रतीक-पुरुषों की चोर-बाज़ारी भी चलती है. इस तरह प्रतीक-पुरुषों के अवमूल्यन की एक लंबी परंपरा देखने को मिलती है, जो बाजारवाद के दौर में परवान चढ़ी हुई है. अफसोस की बात है कि दिवंगत व्यक्ति अपना इस्तेमाल किये जाने, विकृत किये जाने, बंधक बनाए जाने या चोर-बाजारी की कवायदों को लेकर कुछ नहीं कर सकता. शयद यही समझ कर डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि किसी नेता के निधन के 100 साल तक उसकी प्रतिमा नहीं बनाई जानी चाहिए. ज़ाहिर है, लोहिया की इस मान्यता में प्रतिमा प्रतीकार्थक है.   
      डॉ. राममनोहर लोहिया को गुजरे अभी 50 साल हुए हैं. ऊपर जिन प्रवृत्तियों का ज़िक्र किया गया है, कमोबेस लोहिया भी उनका शिकार हैं. इधर उन्हें भारतरत्न देने की मांग बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की है. 2011-12 में लोहिया के जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर भी कुछ लोगों ने उन्हें भारतरत्न देने की मांग रखी थी. लोहिया के विचारों, संघर्ष और व्यक्तित्व का ज़रा भी लिहाज़ किया जाए तो उनके लिए सरकारों से किसी पुरस्कार की मांग करना, या उनके नाम पर पुरस्कार देना पूरी तरह अनुचित है. लोहिया आजीवन राजनीति में रहते हुए भी 'राज-पुरुष' नहीं थे. दो जोड़ी कपड़ा और कुछ किताबों के अलावा उनका कोई सरमाया नहीं था. कहने की ज़रुरत नहीं कि उनका चिंतन और संघर्ष किसी पद या पुरस्कार के लिए नहीं था. सौदेबाज़ समाजवादी नवसाम्राज्यवाद की गुलाम सरकार से लोहिया को भारतरत्न देने की मांग करके मृत्योपरांत उनका अपमान कर रहे हैं.
      देश में बहुतायत में सौदेबाज़ समाजवादी हैं. ये लोग भारतीय समाजवाद के प्रतीक-पुरुषों का जहां -तहां सौदा करते हैं. एनजीओ से लेकर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों और सरकारों तक इनकी आवा-जाही रहती है. नीतीश कुमार उनमें से एक हैं. पिछले दिनों वे मध्यप्रदेश के ग्वालियर शहर में एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी में लोहिया स्मृति व्याख्यान में शामिल हुए थे. यह स्मृति व्याख्यान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दिया था. पिछले साल गृहमंत्री राजनाथ सिंह यह व्याख्यान दे चुके थे. हो सकता है नीतीश कुमार ने उस अवसर पर राष्ट्रपति महोदय से लोहिया को भारतरत्न दिलवाने के बारे चर्चा की हो. और हो सकता है राष्ट्रपति महोदय ने उन्हें यह मांग प्रधानमंत्री से करने की सलाह दी हो.

      गाँधी और आम्बेडकर के विचारों और कार्यों से आरएसएस/भाजपा का कोई जुड़ाव नहीं है. लेकिन नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार सत्ता के लिए उनका निरंतर इस्तेमाल कर रहे हैं. लोहिया ने आरएसएस को भारतीय संस्कृति के पिछवाड़े पड़े घूरे पर पलने वाला कीड़ा कहा है. लोहिया आम्बेडकर को गाँधी के बाद भारत का सबसे बड़ा आदमी मानते थे. आगामी 12 अक्तूबर को संभव है भारतरत्न देकर लोहिया को नई साम्राज्यशाही की ताबेदारी में 'बड़ा आदमी' बना दिया जाए! सौदेबाज़ समाजवादी इसे अपनी बड़ी उपलब्धि बताएँगे. गाँधी और आम्बेडकर अगर नरेंद्र मोदी के महल में बंधक पड़े हैं, तो इसमें सौदेबाज़ गांधीवादियों और सौदेबाज़ आम्बेडकरवादियों की कम भूमिका नहीं है.    
      कई बार लगता है इंसान साधारण जीवन जीकर ही दुनिया से विदा ले तो बेहतर है. मानवता के लिए जीने वाले लोग अक्सर दुर्भाग्यशाली साबित हुए हैं. वे जीवनपर्यंत कष्ट पाते हैं, और मृत्यु के बाद भी उनकी मिटटी खराब होती है! बाजारवाद के इस भयानक दौर में पुरखों की खाक के सौदागर गली-गली घूमते है! वे पुरखों की खाक के साथ राष्ट्रीय धरोहरों का सौदा भी कर रहे हैं!   

Saturday, April 28, 2018

आधुनिक भारतीयता के प्रतीक पुरुष का जाना- राजेश कुमार


सच्चर साहब हमारे बीच नहीं रहेअब हम केवल कल्पना कर सकते हैं कि उनका मौजूद रहना सियासी और समाजी गिरावट के इस दौर में कितना जरूरी था। उम्र के आखिरी पड़ाव तक सच्चर साहब आम लोगों के लिए लड़ते रहे। जिस किसी ने भी इंसाफ के लिए आवाज दी, झुकी कमर के बावजूद कोर्ट सी लेकर गली-कूचों तक उस आवाज़ के साथ खड़े हो गए । अपनी आखिरी सांस तक वे अमनपसंद और बराबरी के समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाते रहे । सच्चर साहब के दिल में पीड़ितों के लिए कितनी तड़प थी यह हम 1984 के दंगों से लेकर डेरा सच्चा सौदा के राम रहीम के मामले तक देख सकते हैं । सच्चर साहब ने 1984 के दंगों में मरे गए सिखों के परिवारों को दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया। जब पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के सीबीआई जांच के फैसले को डेरा सच्चा सौदा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौत दी तो राजेंद्र सच्चर ही पीड़िता के पक्ष में खड़े हुए। उसके बाद ही सीबीआई जांच शुरू हो पाई। 
सच्चर साहब बड़े राजनैतिक परिवार से थे। उनके पिता भीमसेन सच्चर स्वाधीनता सेनानी थे जो बाद में संयुक्त पंजाब के मुख्यमंत्री बने और राज्यपाल भी रहे थे। बचपन से ही सच्चर साहब ने कांग्रेस के बड़े नेताओं को अपने घर में आते-जाते देखा था। लेकिन फिर भी उन्होंने विपक्ष की मुश्किल राह चुनी। सोशलिस्ट पार्टी से अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया और आजीवन सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े रहे। 
सच्चर साहब से जुड़ी कई बातें याद आती हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 और लोकसभा चुनाव 2014के दौरान मैंने सच्चर साहब की सक्रियता देखी थी। सच्चर साहब सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के संस्थापक सदस्यों में से थे और उनका मानना था कि केवल सोशलिस्ट पार्टी ही धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील भारत की लड़ाई लड़ सकती है। लोकसभा चुनाव के दौरान सच्चर साहब को मैंने खराब सेहत के बावजूद पार्टी उम्मीदवार प्रेम सिंह के पक्ष में पर्चा बांटते देखा। उम्मीदवार के पक्ष में पर्चे बांटते हुए सच्चर साहब एक ज्वैलरी की दुकान में पहुंचे। वहां उन्होंने दुकानदार से कहा कि 'जितना खरा आपका कारोबार है (सोने का) उतना ही खरा हमारा उम्मीदवार है'। इसके बाद एक सभा में जस्टिस सच्चर ने कहा था कि बीजेपी की सांप्रदायिक और नवउदारवादी राजनीति का मुक़ाबला केवल डॉ. प्रेम सिंह जैसे लोग ही कर सकते हैं। साथी अब्दुल कयूम ओखला विधानसभा से सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे। उनके लिए सच्चर साहब ने छोटी-छोटी नुक्कड़ सभाओं में शिरकत की और वोट माँगा. यह अलग बात है कि इस मुस्लिम-बहुल सीट पर सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार को 145 वोट मिले!     

सच्चर साहब को लोग कई वजहों से जानते थे। सबसे पहले दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और भारत में कानून के एक बड़े जानकार के तौर पर । सच्चर साहब दुनिया में एक मजबूत मानवाधिकार कार्यकर्ता की भी पहचान रखते थे। हाल के दिनों में सच्चर साहब की सबसे बड़ी पहचान उनकी अगुवाई में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति की जाकारी के लिए बनाई गई सच्चर कमेटी की रिपोर्ट और सिफारिशों के चलते थी। इस रिपोर्ट ने इस देश के सामाजिक और राजनीतिक हलकों में तीखी बहस कड़ी कर दी। सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय, जो आजादी के बाद से ही लगातार तुष्टिकरण के आरोप झेल रहा था,सच्चर साहब की रिपोर्ट ने उन आरोपों को तथ्यों के आधार पर गलत साबित किया। रिपोर्ट में सारे आंकड़े केंद्र और राज्य सरकारों के रिकॉर्ड से लिए हैं। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट ने न केवल अल्पसंख्यक समुदाय को अपनी आवाज़ उठाने के लिए एक आधार प्रदान किया, बल्कि उनकी व्यवस्था में समुचित भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक शुरुआत भी की है। उम्मीद है कारपोरेट परस्त सियासी दलों की सत्ता बदलेगीऔर मंडल कमीशन की तरह सच्चर कमेटी की रिपोर्ट भी लागू होगी।
जो भी हो, सच्चर साहब ने एक समाजावादी कार्यकर्ता के तौर पर अपना सफ़र शुरु किया और समाजावादी कार्यकर्ता के रूप में ही इस दुनिया से विदा ली। सच्चर साहब ने देश को दिशा देने वाले डॉ लोहिया जैसे बड़े लोगों के साथ काम किया था, हमारी खुशकिस्मती है हमें उनके साथ काम करने का मौका मिला!  मेरे जैसे युवाओं के लिए लिए सच्चर साहब आधुनिक भारतीयता के प्रतीक पुरुष थे। वे लोहिया की तरह भारत की समृद्ध परंपरा में निहित प्रगतिशील धाराओं को आत्मसात करके आधुनिक विचारों का स्वागत और निर्माण करने वाले व्यक्ति थे। उनसे प्रेरणा लेकर हम समाजवादी विचारधारा और आंदोलन का काम करते रहेंगे। उनको हमारी यही श्रद्धांजलि है।      
राजेश कुमार
टीवी पत्रकार

Wednesday, April 25, 2018

समाजवादी विज़न से प्रेरित थे सच्चर साहब-प्रेम सिंह

हम लोगों को उन्हें जस्टिस सच्चर कह कर पुकारने की मनाही थी. इसलिए मैं उन्हें हमेशा सच्चर साहब कह कर बुलाता था. उनके निधन के चार दिन बाद यह श्रद्धांजलि लिख रहा हूँ. सच्चर साहब की शख्सियत एक महाकाव्यात्मक कृति की तरह थी. इस बेहूदा दौर में एक बेहद खूबसूरत और सुसंस्कृत इंसान! मीडिया के लिए लिखी श्रद्धांजलि में उनकी शख्सियत को उस उदात्त रूप में स्मरण करने का अवसर नहीं है. यहाँ उनके विचारों, कार्यों, सरोकारों, चिंताओं को एक यथार्थ परिप्रेक्ष्य में समझने की कोशश है.  
      सच्चर साहब का निधन 20 अप्रैल 2018 को हुआ. इस 22 दिसंबर को वे 95 साल के हो जाते. पीयूसीएल के अध्यक्ष साथी रविकिरण जैन कहते थे कि वे 100 वर्ष जियेंगे. उनकी जिजीविषा को देख कर यह लगता भी था. इसके पहले बीमार पड़ने पर वे खुद इलाज़ की पहल कर स्वास्थ्य लाभ करते थे. इस बार पिछले तीन महीने से लग रहा था कि उन्होंने देह-त्याग का मानस बना लिया है. अब वे स्मृतियों, विचारों और कार्यों के रूप में हमारे बीच रहेंगे.
      अखबारों-पत्रिकाओं-पोर्टलों और शोकसभाओं में उन्हें श्रद्धांजलि देने का सिलसिला चल रहा है. श्रद्धांजलियों में उनके काबिल और सफल न्यायविद होने, दिल्ली उच्च न्यायालय का मुख्य न्याधीश होने, नागरिक अधिकारों, मानवाधिकारों, समाज के वंचित और उत्पीड़ित तबकों के हितों, संवैधानिक व लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती आदि के लिए किये गए उनके अनथक प्रयासों एवं संघर्षों का बखूबी ज़िक्र किया जा रहा है. सच्चर साहब की ख्याति पिछले 10-12 सालों में सच्चर समिति की रपट और उसमें की गईं सिफारिशों के चलते ज्यादा हुई. उन्हें श्रद्धांजलि देते वक्त सभी लोग सच्चर साहब के इस बेजोड़ काम का ज़िक्र और तारीफ जरूर करते हैं.
      मेरी जानकारी में सच्चर साहब को लिखित या मौखिक श्रद्धांजलि देने वाले किसी व्यक्ति ने उनके राजनीतिक विचारों और राजनीतिक सक्रियता का उल्लेख नहीं किया है. ('द वायर' पर प्रकाशित तनवीर फैज़ल की श्रद्धांजलि इसका अपवाद है.) ऐसा नहीं माना जा सकता कि सच्चर साहब की राजनीतिक विचारधारा और राजनीतिक सक्रियता के बारे में उन्हें श्रद्धांजलि देने वाले पत्रकार और विद्वान् नहीं जानते हैं. फिर क्या कारण हो सकता है कि लोग सच्चर साहब के कार्यों की अतिशय प्रशंसा कर रहे हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक सम्बद्धता का ज़िक्र नहीं करते हैं? इस दुराव-छिपाव का कारण क्या है?
      अंतिम बीमारी की अवस्था में सच्चर साहब ने अपना अंतिम लेख 'इंडिया नीड्स द्रौपदी एंड नॉट सावित्री' लिखा, जो अंग्रेजी साप्ताहिक जनता के 1 अप्रैल 2018 के अंक में छपा है. इसके कुछ ही दिन पहले उन्होंने 'नो कनफ्लिक्ट बिटवीन हिंदी एंड स्टेट रीजनल लैंग्वेजेज' 3 मार्च को लिखा था. इन दोनों लेखों के विषय डॉ. लोहिया के चिंतन से जुड़े हैं. ज़ाहिर है, सच्चर साहब अंतिम सांस तक डॉ. लोहिया के चिंतन और संघर्ष को अपने लेखन और कार्यों का आधार बनाए रहे. यहाँ यह बताना मुनासिब होगा कि अपने ज्यादातर लेखों और वक्तव्यों में सच्चर साहब अक्सर समाजवादी नेताओं, खास कर अपने हीरो डॉ. लोहिया, और उनके विचारों/सिद्धांतों का उल्लेख करते थे. पीयूसीएल में उनकी गहरी रूचि का कारण था कि नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए जेपी ने यह संस्था स्थापित की थी.   
      सच्चर साहब 1948 में गठन के साथ ही सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य हो गए थे. वे दिल्ली प्रदेश के सचिव भी थे. पार्टी द्वारा किये जाने वाले आंदोलनों में वे सक्रिय भूमिका निभाते थे. मई 1949 में दिल्ली में नेपाली दूतावास के सामने किया गए प्रदर्शन में वे डॉ. लोहिया के साथ गिरफ्तार हुए थे और डेढ़ महीने जेल में रहे थे. वे बताते थे कि जजी के दौरान उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी से छुट्टी ली थी और अवकाश प्राप्ति पर फिर पार्टी के सदस्य हो गए थे. 2008-09 में सच्चर साहब, सुरेंद्र मोहन, भाई वैद्य, पन्नालाल सुराणा, प्रोफेसर केशवराव जाधव, बलवंत सिंह खेड़ा सहित पूरे देश से कई वरिष्ठ और युवा समाजवादी नेताओं/कार्यकर्ताओं ने सोशलिस्ट पार्टी की पुनर्स्थापना के लिए अलग-अलग शहरों में बैठकों का आयोजन शुरु किया. नतीज़तन, 2011 में हैदराबाद में सोशलिस्ट पार्टी की सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के नाम से पुनर्स्थापना की गई जिसमें देश के 21 प्रांतों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे. समाजवादी जन परिषद (सजप) के तत्कालीन अध्यक्ष लिंगराज ने सम्मलेन को संबोधित किया था. तब से लेकर मृत्युपर्यंत सच्चर साहब सोशलिस्ट पार्टी के काम में लगे रहे. वे इस उम्र में पार्टी के वरिष्ठतम सदस्यों भाई वैद्य और पन्नालाल सुराणा के साथ मिल कर दिनरात पार्टी का काम करते थे.
                धूप, बारिश, आंधी, ठंड में कार्यकर्ताओं के साथ सड़कों पर निकलते थे, पार्टी द्वारा आयोजित धरना-प्रदर्शनों, बैठकों-सम्मेलनों में शामिल होते थे. वे पूरे देश के कार्यकर्ताओं को लगातार फोन करके पार्टी संबंधी गतिविधियों की जानकारी लेते थे. उनसे घर पर कोई भी पार्टी कार्यकर्ता बिना पहले बताये किसी भी समय मिल सकता था. दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनावों में सोशलिस्ट पार्टी ने ओखला से उम्मीदवार खड़ा किया था. सच्चर साहब का घर उसी इलाके में पड़ता है. उन्होंने उस उम्मीदवार के लिए नुक्कड़ सभाएं कीं और भीड़ भरी गलियों में निकल कर परचे बांटे. पूर्वी दिल्ली से मेरे अपने चुनाव में भी वे परचा भरने से लेकर चुनाव अभियान के अंतिम दिन तक सक्रिय रहे. जीवन की तरह राजनीति में भी सच्चर साहब सहज विश्वासी व्यक्ति थे. हालांकि, समाजवादियों समेत, राजनीति के नाम पर ज्यादातर लोग उनके साथ फरेब करते थे. किशन पटनायक की तरह उनमें भी एक भोला विश्वास था कि एनजीओ चलाने वाले बदलाव की राजनीति में हिस्सेदार हो सकते हैं!         
      सच्चर साहब का समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों, व्यक्ति-स्वातंत्र्य और अन्याय के प्रतिकार की अहिंसक कार्यप्रणाली में अटूट विश्वास था. सच्चर साहब की बहुआयामी भूमिका की सार्थकता के मूल में उनकी लोकतांत्रिक समाजवाद और सोशलिस्ट विज़न में गहरी आस्था थी. सच्चर समिति की रपट और सिफारिशों को भी इसी दृष्टि से समझा जाना चाहिए. उनकी भूमिका के इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखे बगैर उनकी शख्सियत की प्रशंसा का कोई ख़ास मायना नहीं है.  
      क्या कारण है कि श्रद्धांजलि देने वाले पत्रकार और विद्वान् सच्चर साहब की राजनीति या राजनीतिक सच्चर साहब का उल्लेख नहीं करते? इसका मुख्य कारण यही प्रतीत होता है कि सच्चर साहब सरकारों की मौजूदा नवउदारवादी नीतियों, जिन पर ज्यादातर नागरिक समाज औत मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों/नेताओं की सहमती बन चुकी है, के खिलाफ थे. सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया), जिसके वे संस्थापक सदस्य थे, ने अपने नीतिपत्र और प्रस्तावों के माध्यम से बार-बार यह कहा है कि अगर सार्वजनिक क्षेत्र को नष्ट कर प्राइवेट क्षेत्र को स्थापित किया जाएगा तो संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक संस्थाओं का नष्ट होना तय है; संविधान में निहित समाजवाद के मूल्य को त्याग कर धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के मूल्यों को बचाए नहीं रखा जा सकता; नवउदारवादी नीतियों का अंधानुकरण एक तरफ साम्प्रदायिकता, अंधविश्वास और पोंगापंथ को बढ़ावा देता है, दूसरी तरफ अंधराष्ट्रवाद को. सोशलिस्ट पार्टी की वर्तमान राजनीतिक यथार्थ की यह समझ और विश्लेषण ज्यादातर सेक्युलर बुद्धिजीवियों और नेताओं के लिए असुविधाजनक है. वे 'फासीवाद' की सारी जिम्मेदारी आरएसएस पर डाल कर निश्चिंत हो जाते हैं. और इस तरह नवउदारवाद/नवसाम्राज्यवाद को देश की मेहनतकश जनता और रोजगार के लिए निष्फल भटकते नौजवानों पर कहर ढाने के लिए खुला छोड़ देते हैं.      
      पहले भाई और अब सच्चर साहब. एक पखवाड़े के भीतर समाजवाद के दो दिग्गज दुनिया से चले गए! यह केवल सोशलिस्ट पार्टी की क्षति नहीं है. स्वतंत्रता आंदोलन, भारत के संविधान और समाजवादी आंदोलन में निहित मूल्यों की राजनीति के लिए यह अपूरणीय क्षति है. संघर्ष जारी रहेगा, इस संकल्प के साथ सोशलिस्ट पार्टी अपने क्रांतिकारी नेता को सलाम करती है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के अध्यक्ष हैं.)  

Monday, April 16, 2018

आसिफा के न्यायप्रिय हत्यारे!-प्रेम सिंह

  

(आसिफा को इंसाफ़ अब तक नहीं मिला, ये उस व्यवस्था का स्वाभाविक रंग है जहां किसी भी तरह के न्याय की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन जिस तरह से आसिफा के गुनहगारों को तिरंगे और भगवे की आड़ में छिपाने की कोशिश की गई है, वो फासीवादी सत्ता का सबसे विद्रूप चेहरा है। उसे हराकर ही हम आसिफा को इंसाफ दे सकेंगे। पढ़िए डॉ प्रेम सिंह का लेख जो आईने की तरह बताता है कि हम किस कदर अन्याय की व्यवस्था के आदि हो चुके हैं।)
  'आसिफा को न्याय' (जस्टिस फॉर आसिफा) की गुहार दिल्ली से संयुक्त राष्ट्र संघ तक गूँज रही है. सामाजिक-नागरिक संगठन आसिफा की सामान्य और मृतावस्था की तस्वीर लगा कर अपने नाम के बैनर-झंडे लहराते हुए, नारे लगते हुए आसिफा को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतर पड़े हैं. कठुआ से लेकर दिल्ली और देश के अन्य कई शहरों में प्रतिरोध मार्च और कैंडल विजिल हो रहे हैं. बच्चे भी हिस्सा ले रहे हैं. दिल्ली सरकार की एक महिला अधिकारी 'महिलाओं की सुरक्षा' के सवाल पर भूख हड़ताल पर बैठी हैं. उनका कहना है कि मोदी जब एक झटके में विमुद्रीकरण कर सकते हैं तो महिलाओं की सुरक्षा क्यों नहीं कर सकते! सोशल मीडिया आसिफ़ा को न्याय दिलाने की पोस्टों से पट गया है. अखबारों के स्तंभकार, सामाजिक-राजनीतिक सरोकार रखने वाले बुद्धिजीवी 'आसिफा को न्याय' पर लेख लिख रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय मीडिया पर भी यह प्रमुख खबर बनी है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव बलात्कार मामले पर लोगों का आक्रोश जारी था कि जम्मू-कश्मीर की अपहरण, बलात्कार और हत्या की दिल दहला देने वाली यह वारदात सामने आ गई.
   
      ज़ाहिर है, बर्बरता की शिकार हुई आसिफा को पता नहीं था कि देश में न्याय देने के लिए एक न्यायपालिका होती है, जिसमें बड़े-बड़े न्यायधीश, वकील और गवाह सबूतों के आधार पर न्याय करते हैं. उसे पता नहीं था कि दुनियां में संयुक्त राष्ट्र संघ भी है जो न्याय दिलवाता है. आसिफा नहीं जानती थी कि सरकारें बर्बरतापूर्वक मार दी जाने वाली बच्चियों के माता-पिता को कुछ धनराशि देकर न्याय करती हैं. आसिफा को यह भी कहाँ पता था कि देश में 'फासीवाद' आ चुका है; लोग बताएँगे कि उसका वैसा हश्र उसी फासीवाद का नतीज़ा है; और फासीवादी ताकतों को हराना ही आसिफा को न्याय दिलाना है! उसे शायद यह भी नहीं पता चला हो कि मंदिर में उसके साथ 'हिंदू न्याय' किया जा रहा है! आसिफा तिरंगे झंडे के बारे में नहीं जानती होगी, जिसे लहरा कर अदालत से लेकर सड़कों तक 'हिंदू न्याय' का जुलूस निकला गया.
     
      पता नहीं आसिफा को कितना पता था कि वह कितनी मुसलमान है! अलबत्ता उसने छोटी-सी उम्र में यह जरूर जान लिया कि दोजख ज़मीन पर ही है - धरती का स्वर्ग कही जाने वाली ज़मीन पर! दुनिया छोड़ने से पहले उसने यह भी जान लिया कि शैतान अलग से नहीं होता. क़यामत के दिन खुदा आसिफा का क्या न्याय करेगा!    

      रूह अगर कोई चीज़ है तो आसिफा हैरत से सोचती होगी कि उसकी हत्या के तीन महीने बाद अचानक देश भर में इतने लोग और संगठन उसे न्याय दिलाने के लिए आंदोलित हो उठे हैं! अपहरण और हत्या के समय से ही उसके साथ हुए नृशंस कृत्य का प्रतिरोध करने वाले उसके गाँव के युवा वकील तालिब हुसैन अब उसे अकेले नहीं लगते होंगे. परिपूर्ण का अंश रूह पर शायद उम्र का असर नहीं रहता होगा. रूह बन कर आसिफा देख रही होगी कि हिन्दुस्तान और दुनिया कितनी बड़ी और घात-प्रतिघातों से भरी है.
           
      वह अच्छी तरह समझ रही होगी कि यह दुनिया और व्यवस्था उसे न्याय नहीं दे सकती. इस व्यवस्था में जितने भी न्याय हैं - सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, नागरिक न्याय, मानवीय न्याय, बाल न्याय - उन सबसे उसे बाहर रखा गया. तभी इतना आसान हुआ कि उसके वजूद को बर्बरतापूर्वक कुचल दिया गया और पूरे देश में तीन महीने तक कहीं पत्ता नहीं खड़का. वह समझ रही होगी कि उसे न्याय दिलाने का यह जोश जल्दी ही ठंडा हो जाएगा. अगली वारदात होने पर फिर एक उबाल आएगा और ठंडा पड़ जाएगा. अन्य रूहों के साथ वह समझ गई होगी कि उबलने, ठंडा पड़ने का यह सिलसिला चलते रहना है.
     
      आसिफा को आश्चर्य होता होगा कि ये इतने लोग क्या ढोंग करते हैं? उनकी क्या मजबूरी है? नहीं, ढोंग नहीं करते. वे अपने में सच्चे हैं. आसिफाओं का सारा हिस्सा मार कर वे खुद को न्यायप्रिय दिखाना चाहते हैं. जताना चाहते हैं कि यह सब उनके नाम पर नहीं हो रहा है. रूहों को किसी के प्रति द्वेष नहीं होता. आसिफा मुस्कुरा कर कहेगी - न्यायप्रिय हत्यारे!     
     
      तीन सामान्य सुझाव हैं, ठीक लगें तो : आसिफा को न्याय के बहाने हम यह फैसला कर सकते हैं कि राष्ट्र-ध्वज फिर से केवल राष्ट्रीय मामलों में इस्तेमाल किया जाए. सुप्रीम कोर्ट का 2004 का वह निर्णय वापस ले लिया जाए, जिसमें किसी भी भारतीय नागरिक को किसी भी अवसर पर, किसी भी स्थान पर, किसी भी समय (दिन या रात) सम्मान के साथ तिरंगा फहराने का अधिकार दिया गया था. दूसरे, हम चुप रहना सीखें और अपने से बात-चीत ज्यादा करें. शायद तब हम जान पायें कि हम सब इस व्यवस्था के ही हिस्सेदार और ताबेदार हैं. तीसरी बात, आरएसएस वाले यह समझने की कोशिश करें कि 'हिंदुत्व' का जो पिटारा वे खोले हुए हैं, उसकी समाज, सभ्यता, राष्ट्र, इंसान - किसी के लिए कोई सार्थकता नहीं है. देश की राजनीति कारपोरेट के हाथों में चली गई है. कारपोरेट पूंजीवाद की विष्ठा खाने वाला कोई भी संगठन सत्ता में आ सकता है. लेकिन जब तक मानव सभ्यता की सांस बाकी है, उसका सामाजिक और मानवीय बहिष्कार बना रहेगा.     
     
      शायद आसिफा की रूह को इससे सुकून मिले और उसके अम्मी-अब्बा, भाई-बहनों को सहने की ताकत! बाकी सरकार और कानून-व्यवस्था कुछ न कुछ करेंगी ही. उन्हें अपने होने का धर्म जो निभाना है. जम्मू और कश्मीर में दो मंत्रियों के इस्तीफे हो चुके हैं. अदालती कार्रवाई भी कुछ न कुछ होगी ही.

Friday, April 13, 2018

अलविदा भाई : संघर्ष जारी रहेगा-प्रेम सिंह

उनका पूरा नाम भालचंद्र भाई वैद्य था. लोग उन्हें भाई वैद्य के नाम से जानते और पुकारते थे. मैंने हमेशा उन्हें भाई कहा. हमारे गाँव में पिता को ज्यादातर भाई कह कर बुलाया जाता था. हम सब भाई-बहन भी अपने पिता को भाई कह कर बुलाते थे. पिता के निधन के बाद मैं भाई के व्यक्तिगत संपर्क में आया. सोशलिस्ट पार्टी की पुनर्स्थापना के पहले वे मुझे प्रोफेसर कह कर बुलाते थे और मैं उन्हें भाई. संबंध का एक अदृश्य सूत्र हम दोनों के बीच पहली बार मिलने पर ही जुड़ गया था!
      सोशलिस्ट पार्टी में सात साल साथ काम करने के दौरान पार्टी के नीतिगत मामलों में उन्होंने मेरी प्राय: हर बात का सम्मान किया. वे सभी नीतिगत फैसलों, प्रस्तावों, ज्ञापनों, प्रेस विज्ञप्तियों के विषय में राय पूछने पर सूत्र में संकेत कर देते थे. सरकार के किसी फैसले या किसी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय घटना-विशेष पर पार्टी का वक्तव्य भेजना हो या धरना-प्रदर्शन करना हो, वे पूना से फोन से एक निर्देशात्मक एसएमएस कर देते थे. भाई के पार्टी का अध्यक्ष रहते मैंने उनके साथ पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता की जिम्मेदारी निभाई थी.  
      इंडिया अगेंस्ट करप्सन (आईएसी) और आम आदमी पार्टी (आप) के खिलाफ मैंने भारत के संविधान और समाजवादी विचारधारा के आधार पर स्टैंड लिया तो भाई ने हमेशा कहा कि पार्टी मेरे पीछे मजबूती से खड़ी है. नवउदारवाद के निर्णायक बचाव में उठी उस आंधी में सोशलिस्ट पार्टी के एक भी सदस्य का विचलन नहीं हुआ, इसके पीछे भाई के व्यक्तित्व, समझदारी और वैचारिक दृढ़ता का बड़ा योगदान था.
      2 अप्रैल 2018 को भाई का निधन अग्नाशय के कैंसर से हो गया. उन्हें 26 मार्च को पूना हस्पताल में भर्ती कराया गया था. उसके करीब 20 दिन पहले ही उनकी बीमारी का पता चला था. हालाँकि मुझे इस बाबत उन्हें हस्पताल में भर्ती कराये जाने के बाद मालूम पड़ा. डॉ. अभिजीत वैद्य ने फोन पर बताया कि इस उम्र में ऑपरेशन या कीमोथेरेपी करना मुनासिब नहीं है. उन्होंने यह भी बताया कि भाई हस्पताल से घर आना चाहते हैं. लेकिन यह संभव नहीं हुआ और उन्होंने अंतिम सांस हस्पताल में ही ली. पूना और महारष्ट्र के साथी उनसे मिलने हस्पताल जाते रहे. हम बाहर के साथियों के लिए भाई की मृत्यु एक अचानक लगने वाला अघात था.
      भाई को अंतिम अलविदा कहने मैं 3 अप्रैल को पूना पहुंचा. उनका पार्थिव शरीर राष्ट्र सेवा दल (आरएसडी) के मुख्यालय साने गुरूजी स्मारक में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था. सुबह से दोपहर ढलने तक उन्हें अंतिम प्रणाम करने वालों का तांता लगा रहा. श्रद्धांजलि देने वालों में महिलाओं की बड़ी संख्या थी. राष्ट्र सेवा दल के सैनिक और सैनिकाएं पूरा दिन मुस्तैदी से सभी की सहायता और सहूलियत का काम करते रहे. 4 बजे पुलिस प्रशासन के लोग आ गए और भाई के पार्थिव शरीर को राष्ट्रीय ध्वज में लपेट दिया. शमशान स्थल पहुँचने पर पुलिस टीम ने बैंड-धुन बजाई और बंदूकों से फायर किये. तत्पश्चात पार्थिव शरीर को विद्युत् शवदाह गृह में ले जाया गया और अंत्येष्टि की गई. यह राजकीय सम्मान उन्हें महारष्ट्र का पूर्व गृह राज्यमंत्री (1978 -1980) और पूना का पूर्व महापौर (1974-75) होने के नाते दिया गया.
      मेरे लिए आश्चर्य यही था कि पिछले तीन दशक से सत्ता के गलियारों से दूर नवसाम्राज्यवादी गुलामी लाने वाली सरकारों के खिलाफ शहरों-देहातों में अनाम संघर्ष करने वाले नेता की अंतिम यात्रा में हज़ारों की संख्या लोग शामिल हुए! शवयात्रा में शामिल लोग करीब अढ़ाई किलोमीटर दूर स्थित शमशान स्थल तक पैदल चले. उनमें 'भाई वैद्य अमर रहें' 'भाई तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचाएंगे', 'लोकशाही समाजवाद - जिंदाबाद जिंदाबाद', 'भाई वैद्य को लाल सलाम' 'लड़ेंगे जीतेंगे', 'समाजवाद लाना है - भूलो मत भूलो मत' जैसे क्रान्तिकारी नारे लगाने वाले सोशलिस्ट पार्टी/सोशलिस्ट युवजन सभा के कार्यकर्ता मुठ्ठी भर ही थे. ज्यादातर लोग सामान्य नागरिक समाज से थे. ज़ाहिर है, वे प्रेम, सेवा और करुणा के अद्भुत मेल से बने भाई के विरल व्यक्तित्व से प्रभावित रहे थे. मराठी और अंग्रेजी के लगभग सभी अखबारों ने उनके निधन पर स्टोरी छापी. एक अखबार ने लिखा कि उनकी ईमानदारी दंतकथा बन गई थी. नेताओं में मैंने किशन जी के बाद भाई में ही पाया कि उनमें किसी के प्रति कटुता और द्वेष का भाव नहीं था. मध्यकालीन संतों ने सहजता को विरल गुण माना है. लेकिन साथ ही स्वीकार किया है कि सहज होना बड़ी कठिन तपस्या से हासिल होता है. भाई ने जीवन की साधना में सहजता हासिल कर ली थी.      
      भाई ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया. जब कुछ लोग साम्राज्यवादियों की मुखबरी कर रहे थे, तब 14 साल की उम्र में भाई स्वतंत्रता आंदोलन की निर्णायक लड़ाई में हिस्सा ले रहे थे. भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान गाँधी ने किया था, लेकिन उसका नेतृत्व युवा समाजवादी नेताओं ने किया. यह स्वाभाविक है कि 1946 में भाई 18 साल की उम्र में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) के सदस्य हो गए और फिर 1948 में सोशलिस्ट पार्टी की मार्फ़त अपना लम्बा राजनीतिक संघर्ष करते रहे, जिसमें गोवा मुक्ति संघर्ष (1955-1961), जेपी आंदोलन (1974-74) प्रमुखता से शामिल हैं. 1975 से 1977 तक वे मीसा में जेल में बंद रहे. राष्ट्र सेवा दल में भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी जिसके वे 2001 में अध्यक्ष बने. भाई की इच्छा थी कि राष्ट्र सेवा दल सोशलिस्ट पार्टी के लिए काडर निर्माण का काम करे ताकि युवाओं को साम्प्रदायिक राजनीति की चपेट से बचाया जा सके.      
      भाई समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र में एमए थे. वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी और अध्ययनशील व्यक्ति थे. लेकिन उनकी शख्सियत मूलत: राजनीतिक थी. समाजवादी आंदोलन की कोख में पले भाई पर गाँधी के साथ फुले और आम्बेडकर के विचारों का गहरा प्रभाव था.  उनका वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद और साम्यवाद की विचारधाराओं/व्यवस्थाओं का अच्छा अध्ययन था. वे सभी विषयों पर प्रकाशित अद्यतन लेख और पुस्तकें पढ़ते रहते थे.   
      मेरी राय में भाई की 1991 के बाद शुरु होने वाली राजनीतिक पारी ज्यादा महत्वपूर्ण है. इस साल संविधानिक मूल्यों और प्रावधानों के बरखिलाफ कांग्रेस ने नई आर्थिक नीतियों को देश पर थोप दिया. उस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि 'अब कांग्रेस ने उनका (भाजपा का) का काम हाथ में ले लिया है'. इस अवैध फैसले के समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए आपदायी नतीजे निकालने ही थे, जिन्हें यह समाज और राष्ट्र झेल रहा है. यह सही है कि समाजवादियों ने उस नवसाम्राज्यवादी हमले का राजनीतिक मुकाबला करने बजाय सत्ता को ही राजनीति का ध्येय बना लिया. ऐसा करते हुए उन्होंने पूरे आंदोलन को न केवल तहस-नहस, बल्कि बदनाम भी कर दिया. लेकिन यह भी सही है कि नवसाम्राज्यवाद को मुकम्मल और निर्णायक विचारधारात्मक चुनौती भी समाजवादियों की ओर से ही मिली. किशन पटनायक, सच्चिदानंद सिन्हा, विनोदप्रसाद सिंह, सुरेंद्र मोहन, भाई वैद्य, जस्टिस राजिंदर सच्चर, पन्नालाल सुराणा, डॉ. जीजी पारिख, सुनील सरीखे समाजवादी नेताओं/विचारकों ने नवसाम्राज्यवाद के मुकम्मल विकल्प में एक लघु किन्तु नवीन राजनीतिक धारा पैदा करने का बड़ा उद्यम किया. यह भी उल्लेखनीय है कि मुख्यधारा राजनीति में समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने नई आर्थिक नीतियों का शुरु से सतत विरोध किया.   
      भाई 1995 में गठित समाजवादी जन परिषद के महामंत्री बने. 2011 में सोशलिस्ट पार्टी की पुनर्स्थापना होने पर उन्हें उसका अध्यक्ष बनाया गया. उस समय उनकी उम्र अस्सी के पार थी. वे यह जिम्मेदारी लेना नहीं चाहते थे. लेकिन जस्टिस सच्चर और युवा समाजवादियों की जिद पर उन्होंने अध्यक्ष बनना मंज़ूर किया. पूरी सक्रियता के साथ उन्होंने उस जिम्मेदारी का निर्वाह किया. 1991 के बाद भाई का जीवन नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष करने में बीता. उन्होंने खास तौर पर शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ लम्बा संघर्ष किया.
      ऐसा नहीं है कि नवसाम्राज्यवाद के विरोध में अन्य नेता अथवा राजनीतिक संगठन सक्रिय नहीं रहे हैं. लेकिन वे सब विकास की अवधारणा को लेकर या तो भ्रमित हैं या विकास का रास्ता साम्राज्यवाद के हमजाद पूंजीवाद को ही स्वीकार करते हैं. भाई ने सोशलिस्ट पार्टी के नीतिपत्र और अपने वक्तव्यों में यह स्पष्ट तौर पर कहा है कि कम्युनिस्ट विकास के पूंजीवादी विचार और मॉडल को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. वे उद्योगवाद को ही विकास का पैमाना मानते हैं. भाई लोकशाही समाजवादी विचारधारा को पूंजीवाद का विकल्प मानते थे. पूंजीवाद की आसन्न पराजय में उनका दृढ़ विश्वास था. इसी विश्वास की ज़मीन से वे सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं को निरंतर प्रेरणा देते थे. वह प्रेरणा भाई के बाद भी जीवित है.  
      अलविदा भाई! आपको शांतिमय रहीं. नवसाम्राज्यवादी मंसूबों के खिलाफ समता और स्वतंत्रता का संघर्ष जारी रहेगा!

Sunday, December 17, 2017

Exit Polls: The Blaze of Superstition-Prem singh

                                     
At the outset I must admit I never entertained any intention to comment on the Gujarat election or its possible outcome. However, this election, which was fought directly under the leadership of Prime Minister Narendra Modi, fell significantly below the levels of decency in the strategy and the speeches of the BJP. The second largest party Congress also remained where it was 22 years ago - on the path of soft communalism. Rahul Gandhi sprouted a tilak on his forehead and went around the temples of Gujarat with  Congressmen vying to tell one and all that he was a true 'janeudhari' Brahmin. With more or less similar 'highs and lows' both opponents appeared on the same side in this election battle field of corporate politics of this neo-liberal era with no real opposition in sight.

The BJP  now no longer needs to remember the karsevaks who were burnt in a train compartment in 2002. Under Modi's leadership, it has gone much beyond that with its communal politics. Not only the Congress, other secular intellectuals have also not even dared to raise questions about justice following the assassination of thousands of Muslim citizens in the riots, the raped women and the plundered and destroyed properties in its wake. At least the Gujarat elections this time have become 'Muslims-free'. This is a big victory for the RSS.

The Gujarat elections have also made it clear that the Congress does not have much concern for secularism, as Sonia's or self-proclaimed secular soldiers keep tom-tomming relentlessly. The Congress does not have any sympathy for the hardships which the farmers, laborers, small entrepreneurs, unemployed, students have been facing due to neo-liberal policies. The crisis through which the largest minority is passing cannot be a problem too for the Congress. The Congress has not organized any resistance against the continuing mob-lynching of minority citizens. Rather the Congress wants the Muslims to become so scared that they will become its permanent vote bank in the future.

Prior to Amit Shah, Rahul Gandhi had tried to regain the lost state of the Congress by going to the Dalits' houses. Rahul Gandhi did not get any success there because the Dalits have been politicized. They deal with the RSS by dealing with their political power, but do not look at the Congress. If Muslims too get politicized, then Congress politics will never be able to stand independently like before.

It is also true that the victims of the suppression of neo-liberalism might someday bring ‘Tilak’ and ‘Janeudhari’ Congress to power due to its countrywide organizational network but it will not be any sustainable settlement.

Meanwhile, the RSS-BJP will continue working on the communal agenda and BJP will again come back to power with full force. For instance, despite the secular governments in Uttar Pradesh for nearly two decades, the BJP had a clear sweep in the Lok Sabha and Assembly elections. The secular governments and their intellectual supporters could not stop the BJP juggernaut. Those who insist on debating or opposing the separation of communalism from neo-liberalism, are responsible for pushing the country and society into deep sectarian trenches.

Even if Congress wins in Gujarat it will not make a difference to the ongoing nexus of neo-liberalism and communalism. The chief minister will not be able to get along with RSS-BJP and the  example of  Nitish Kumar exemplifies that there is no guarantee of the situation stabilising for long. What is the guarantee that tomorrow Lalu Prasad Yadav's son will not go with BJP to become the chief minister? Secular stalwarts like Mulayam Singh Yadav have formed the government in collaboration with Kalyan Singh. Those secular intellectuals who do not tire of giving secularism certificates to Congress, bypass the 1984 riots, in which thousands of Sikh civilians were murdered in the country's capital; and till today no one person is punished.

Shankar Singh Baghela has rightly said that Congress has taken the 'supari' of winning the elections for the BJP. Otherwise it should have started preparing for the elections six months earlier. Only then it would have got some workers who can become the backbone of the assembly elections. But Congress does not need party workers -  it is only interested in making Rahul Gandhi the prime minister of the country. Such an election is a comment in itself. Little else can be said about it.

After the last phase of elections, the hue and cry of exit polls compelled me to make this comment. Exit polls were also introduced in 1991 with the introduction of new economic policies (liberalization). Liberalization soon morphed into neo- liberalization and  made rapid progress in corporate politics as well. The exit polls  also excel during this period and has thus become an integral part of the elections of corporate politics today.

In rural India there is a saying 'Oh barber, how many hairs?' The answer is, 'Dear customer just coming out before you!' In the neo-liberal period, nobody is satisfied for more than a moment. Every next moment should be something more and the lust for more satiation continues relentlessly. This hankering is true for religious-social identities, for political parties as well as for individuals. From market politics to politics of market- this sentiment pervades in every sphere at every level. This new trend has developed and grown stronger under neo-liberalism. Something should keep happening in life - even if it is a lie! The exit polls have become an extremely popular and enthusiastic medium to appease that trend.

There can be different ways to present something new and to create  new buzzwords. But there is a common truth - all this happen within the purview of corporate politics that carries forward neo-liberalism. It is considered to be a sign of backwardness to even  discuss the Constitution of India in this overwhelming new liberal narrative. Why would anyone wish to stay behind? All want the first and foremost share of the left-over that is falling from the neo-liberal loot of country's resources and the labor. In the society of India divided in many castes for centuries, neo-liberalism has created this new fraternity!

It is not that there is no discussion of alternatives in this world of neo-liberalism. It is very much there. However, the revolutions are sporadic and momentary and do not discuss alternatives to the neo-liberalism. That is considered to be unreasonable. They have coined the term TINA - there is no alternative. In order to destroy genuine alternative ideas and struggles against neo-liberalism and its motivating force of corporate politics beginning just after 1991, the bugle of  'alternatives' and 'revolutions' was blown time to time. That exercise still goes on.

Modern industrial civilization has its own superstitions. In the modern myths of ‘progress’ and ‘development’, many millions of people have been sacrificed due to these superstitions. This destruction and damage goes on uninterrupted and million lives are being destroyed every day and an unprecedented crisis of environment is baring its teeth.

 Exit polls are also a superstition. To spend four days, the two opposing sides (who are really one) are living in that superstition. Those who doubt the scientific basis of the exit polls as well as those who swear by it - all are living in a dream world. Those who say there is no scientific basis for the exit polls, they are also blindly dreaming despite the prediction of exit polls BJP's victory that the Congress sweeps in the real results! Despite the good news of the exit polls for the BJP, 'bakhts' too blindly wish Modi's magic to keep on!

The situation of the 'bhakts' apart, this numbing superstition is also reflected in the bad state of  secular civil society. It clearly lacks the determination and resolve to meet the challenges head-on. This inability is not without a reason. Civil society, unfortunately, is not ready to rein in its class interests, inherent selfishness and temper the accompanying haughty commentary such an attitude germinates. It is totally blind to the fact that with its indifference and callousness, it too has a hand in the damage to the secular, democratic and socialist fabric of modern Indian civilization, howsoever good or bad it may be.