Monday, April 16, 2018

आसिफा के न्यायप्रिय हत्यारे!-प्रेम सिंह

  

(आसिफा को इंसाफ़ अब तक नहीं मिला, ये उस व्यवस्था का स्वाभाविक रंग है जहां किसी भी तरह के न्याय की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन जिस तरह से आसिफा के गुनहगारों को तिरंगे और भगवे की आड़ में छिपाने की कोशिश की गई है, वो फासीवादी सत्ता का सबसे विद्रूप चेहरा है। उसे हराकर ही हम आसिफा को इंसाफ दे सकेंगे। पढ़िए डॉ प्रेम सिंह का लेख जो आईने की तरह बताता है कि हम किस कदर अन्याय की व्यवस्था के आदि हो चुके हैं।)
  'आसिफा को न्याय' (जस्टिस फॉर आसिफा) की गुहार दिल्ली से संयुक्त राष्ट्र संघ तक गूँज रही है. सामाजिक-नागरिक संगठन आसिफा की सामान्य और मृतावस्था की तस्वीर लगा कर अपने नाम के बैनर-झंडे लहराते हुए, नारे लगते हुए आसिफा को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतर पड़े हैं. कठुआ से लेकर दिल्ली और देश के अन्य कई शहरों में प्रतिरोध मार्च और कैंडल विजिल हो रहे हैं. बच्चे भी हिस्सा ले रहे हैं. दिल्ली सरकार की एक महिला अधिकारी 'महिलाओं की सुरक्षा' के सवाल पर भूख हड़ताल पर बैठी हैं. उनका कहना है कि मोदी जब एक झटके में विमुद्रीकरण कर सकते हैं तो महिलाओं की सुरक्षा क्यों नहीं कर सकते! सोशल मीडिया आसिफ़ा को न्याय दिलाने की पोस्टों से पट गया है. अखबारों के स्तंभकार, सामाजिक-राजनीतिक सरोकार रखने वाले बुद्धिजीवी 'आसिफा को न्याय' पर लेख लिख रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय मीडिया पर भी यह प्रमुख खबर बनी है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव बलात्कार मामले पर लोगों का आक्रोश जारी था कि जम्मू-कश्मीर की अपहरण, बलात्कार और हत्या की दिल दहला देने वाली यह वारदात सामने आ गई.
   
      ज़ाहिर है, बर्बरता की शिकार हुई आसिफा को पता नहीं था कि देश में न्याय देने के लिए एक न्यायपालिका होती है, जिसमें बड़े-बड़े न्यायधीश, वकील और गवाह सबूतों के आधार पर न्याय करते हैं. उसे पता नहीं था कि दुनियां में संयुक्त राष्ट्र संघ भी है जो न्याय दिलवाता है. आसिफा नहीं जानती थी कि सरकारें बर्बरतापूर्वक मार दी जाने वाली बच्चियों के माता-पिता को कुछ धनराशि देकर न्याय करती हैं. आसिफा को यह भी कहाँ पता था कि देश में 'फासीवाद' आ चुका है; लोग बताएँगे कि उसका वैसा हश्र उसी फासीवाद का नतीज़ा है; और फासीवादी ताकतों को हराना ही आसिफा को न्याय दिलाना है! उसे शायद यह भी नहीं पता चला हो कि मंदिर में उसके साथ 'हिंदू न्याय' किया जा रहा है! आसिफा तिरंगे झंडे के बारे में नहीं जानती होगी, जिसे लहरा कर अदालत से लेकर सड़कों तक 'हिंदू न्याय' का जुलूस निकला गया.
     
      पता नहीं आसिफा को कितना पता था कि वह कितनी मुसलमान है! अलबत्ता उसने छोटी-सी उम्र में यह जरूर जान लिया कि दोजख ज़मीन पर ही है - धरती का स्वर्ग कही जाने वाली ज़मीन पर! दुनिया छोड़ने से पहले उसने यह भी जान लिया कि शैतान अलग से नहीं होता. क़यामत के दिन खुदा आसिफा का क्या न्याय करेगा!    

      रूह अगर कोई चीज़ है तो आसिफा हैरत से सोचती होगी कि उसकी हत्या के तीन महीने बाद अचानक देश भर में इतने लोग और संगठन उसे न्याय दिलाने के लिए आंदोलित हो उठे हैं! अपहरण और हत्या के समय से ही उसके साथ हुए नृशंस कृत्य का प्रतिरोध करने वाले उसके गाँव के युवा वकील तालिब हुसैन अब उसे अकेले नहीं लगते होंगे. परिपूर्ण का अंश रूह पर शायद उम्र का असर नहीं रहता होगा. रूह बन कर आसिफा देख रही होगी कि हिन्दुस्तान और दुनिया कितनी बड़ी और घात-प्रतिघातों से भरी है.
           
      वह अच्छी तरह समझ रही होगी कि यह दुनिया और व्यवस्था उसे न्याय नहीं दे सकती. इस व्यवस्था में जितने भी न्याय हैं - सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, नागरिक न्याय, मानवीय न्याय, बाल न्याय - उन सबसे उसे बाहर रखा गया. तभी इतना आसान हुआ कि उसके वजूद को बर्बरतापूर्वक कुचल दिया गया और पूरे देश में तीन महीने तक कहीं पत्ता नहीं खड़का. वह समझ रही होगी कि उसे न्याय दिलाने का यह जोश जल्दी ही ठंडा हो जाएगा. अगली वारदात होने पर फिर एक उबाल आएगा और ठंडा पड़ जाएगा. अन्य रूहों के साथ वह समझ गई होगी कि उबलने, ठंडा पड़ने का यह सिलसिला चलते रहना है.
     
      आसिफा को आश्चर्य होता होगा कि ये इतने लोग क्या ढोंग करते हैं? उनकी क्या मजबूरी है? नहीं, ढोंग नहीं करते. वे अपने में सच्चे हैं. आसिफाओं का सारा हिस्सा मार कर वे खुद को न्यायप्रिय दिखाना चाहते हैं. जताना चाहते हैं कि यह सब उनके नाम पर नहीं हो रहा है. रूहों को किसी के प्रति द्वेष नहीं होता. आसिफा मुस्कुरा कर कहेगी - न्यायप्रिय हत्यारे!     
     
      तीन सामान्य सुझाव हैं, ठीक लगें तो : आसिफा को न्याय के बहाने हम यह फैसला कर सकते हैं कि राष्ट्र-ध्वज फिर से केवल राष्ट्रीय मामलों में इस्तेमाल किया जाए. सुप्रीम कोर्ट का 2004 का वह निर्णय वापस ले लिया जाए, जिसमें किसी भी भारतीय नागरिक को किसी भी अवसर पर, किसी भी स्थान पर, किसी भी समय (दिन या रात) सम्मान के साथ तिरंगा फहराने का अधिकार दिया गया था. दूसरे, हम चुप रहना सीखें और अपने से बात-चीत ज्यादा करें. शायद तब हम जान पायें कि हम सब इस व्यवस्था के ही हिस्सेदार और ताबेदार हैं. तीसरी बात, आरएसएस वाले यह समझने की कोशिश करें कि 'हिंदुत्व' का जो पिटारा वे खोले हुए हैं, उसकी समाज, सभ्यता, राष्ट्र, इंसान - किसी के लिए कोई सार्थकता नहीं है. देश की राजनीति कारपोरेट के हाथों में चली गई है. कारपोरेट पूंजीवाद की विष्ठा खाने वाला कोई भी संगठन सत्ता में आ सकता है. लेकिन जब तक मानव सभ्यता की सांस बाकी है, उसका सामाजिक और मानवीय बहिष्कार बना रहेगा.     
     
      शायद आसिफा की रूह को इससे सुकून मिले और उसके अम्मी-अब्बा, भाई-बहनों को सहने की ताकत! बाकी सरकार और कानून-व्यवस्था कुछ न कुछ करेंगी ही. उन्हें अपने होने का धर्म जो निभाना है. जम्मू और कश्मीर में दो मंत्रियों के इस्तीफे हो चुके हैं. अदालती कार्रवाई भी कुछ न कुछ होगी ही.

Friday, April 13, 2018

अलविदा भाई : संघर्ष जारी रहेगा-प्रेम सिंह

उनका पूरा नाम भालचंद्र भाई वैद्य था. लोग उन्हें भाई वैद्य के नाम से जानते और पुकारते थे. मैंने हमेशा उन्हें भाई कहा. हमारे गाँव में पिता को ज्यादातर भाई कह कर बुलाया जाता था. हम सब भाई-बहन भी अपने पिता को भाई कह कर बुलाते थे. पिता के निधन के बाद मैं भाई के व्यक्तिगत संपर्क में आया. सोशलिस्ट पार्टी की पुनर्स्थापना के पहले वे मुझे प्रोफेसर कह कर बुलाते थे और मैं उन्हें भाई. संबंध का एक अदृश्य सूत्र हम दोनों के बीच पहली बार मिलने पर ही जुड़ गया था!
      सोशलिस्ट पार्टी में सात साल साथ काम करने के दौरान पार्टी के नीतिगत मामलों में उन्होंने मेरी प्राय: हर बात का सम्मान किया. वे सभी नीतिगत फैसलों, प्रस्तावों, ज्ञापनों, प्रेस विज्ञप्तियों के विषय में राय पूछने पर सूत्र में संकेत कर देते थे. सरकार के किसी फैसले या किसी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय घटना-विशेष पर पार्टी का वक्तव्य भेजना हो या धरना-प्रदर्शन करना हो, वे पूना से फोन से एक निर्देशात्मक एसएमएस कर देते थे. भाई के पार्टी का अध्यक्ष रहते मैंने उनके साथ पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता की जिम्मेदारी निभाई थी.  
      इंडिया अगेंस्ट करप्सन (आईएसी) और आम आदमी पार्टी (आप) के खिलाफ मैंने भारत के संविधान और समाजवादी विचारधारा के आधार पर स्टैंड लिया तो भाई ने हमेशा कहा कि पार्टी मेरे पीछे मजबूती से खड़ी है. नवउदारवाद के निर्णायक बचाव में उठी उस आंधी में सोशलिस्ट पार्टी के एक भी सदस्य का विचलन नहीं हुआ, इसके पीछे भाई के व्यक्तित्व, समझदारी और वैचारिक दृढ़ता का बड़ा योगदान था.
      2 अप्रैल 2018 को भाई का निधन अग्नाशय के कैंसर से हो गया. उन्हें 26 मार्च को पूना हस्पताल में भर्ती कराया गया था. उसके करीब 20 दिन पहले ही उनकी बीमारी का पता चला था. हालाँकि मुझे इस बाबत उन्हें हस्पताल में भर्ती कराये जाने के बाद मालूम पड़ा. डॉ. अभिजीत वैद्य ने फोन पर बताया कि इस उम्र में ऑपरेशन या कीमोथेरेपी करना मुनासिब नहीं है. उन्होंने यह भी बताया कि भाई हस्पताल से घर आना चाहते हैं. लेकिन यह संभव नहीं हुआ और उन्होंने अंतिम सांस हस्पताल में ही ली. पूना और महारष्ट्र के साथी उनसे मिलने हस्पताल जाते रहे. हम बाहर के साथियों के लिए भाई की मृत्यु एक अचानक लगने वाला अघात था.
      भाई को अंतिम अलविदा कहने मैं 3 अप्रैल को पूना पहुंचा. उनका पार्थिव शरीर राष्ट्र सेवा दल (आरएसडी) के मुख्यालय साने गुरूजी स्मारक में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था. सुबह से दोपहर ढलने तक उन्हें अंतिम प्रणाम करने वालों का तांता लगा रहा. श्रद्धांजलि देने वालों में महिलाओं की बड़ी संख्या थी. राष्ट्र सेवा दल के सैनिक और सैनिकाएं पूरा दिन मुस्तैदी से सभी की सहायता और सहूलियत का काम करते रहे. 4 बजे पुलिस प्रशासन के लोग आ गए और भाई के पार्थिव शरीर को राष्ट्रीय ध्वज में लपेट दिया. शमशान स्थल पहुँचने पर पुलिस टीम ने बैंड-धुन बजाई और बंदूकों से फायर किये. तत्पश्चात पार्थिव शरीर को विद्युत् शवदाह गृह में ले जाया गया और अंत्येष्टि की गई. यह राजकीय सम्मान उन्हें महारष्ट्र का पूर्व गृह राज्यमंत्री (1978 -1980) और पूना का पूर्व महापौर (1974-75) होने के नाते दिया गया.
      मेरे लिए आश्चर्य यही था कि पिछले तीन दशक से सत्ता के गलियारों से दूर नवसाम्राज्यवादी गुलामी लाने वाली सरकारों के खिलाफ शहरों-देहातों में अनाम संघर्ष करने वाले नेता की अंतिम यात्रा में हज़ारों की संख्या लोग शामिल हुए! शवयात्रा में शामिल लोग करीब अढ़ाई किलोमीटर दूर स्थित शमशान स्थल तक पैदल चले. उनमें 'भाई वैद्य अमर रहें' 'भाई तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचाएंगे', 'लोकशाही समाजवाद - जिंदाबाद जिंदाबाद', 'भाई वैद्य को लाल सलाम' 'लड़ेंगे जीतेंगे', 'समाजवाद लाना है - भूलो मत भूलो मत' जैसे क्रान्तिकारी नारे लगाने वाले सोशलिस्ट पार्टी/सोशलिस्ट युवजन सभा के कार्यकर्ता मुठ्ठी भर ही थे. ज्यादातर लोग सामान्य नागरिक समाज से थे. ज़ाहिर है, वे प्रेम, सेवा और करुणा के अद्भुत मेल से बने भाई के विरल व्यक्तित्व से प्रभावित रहे थे. मराठी और अंग्रेजी के लगभग सभी अखबारों ने उनके निधन पर स्टोरी छापी. एक अखबार ने लिखा कि उनकी ईमानदारी दंतकथा बन गई थी. नेताओं में मैंने किशन जी के बाद भाई में ही पाया कि उनमें किसी के प्रति कटुता और द्वेष का भाव नहीं था. मध्यकालीन संतों ने सहजता को विरल गुण माना है. लेकिन साथ ही स्वीकार किया है कि सहज होना बड़ी कठिन तपस्या से हासिल होता है. भाई ने जीवन की साधना में सहजता हासिल कर ली थी.      
      भाई ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया. जब कुछ लोग साम्राज्यवादियों की मुखबरी कर रहे थे, तब 14 साल की उम्र में भाई स्वतंत्रता आंदोलन की निर्णायक लड़ाई में हिस्सा ले रहे थे. भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान गाँधी ने किया था, लेकिन उसका नेतृत्व युवा समाजवादी नेताओं ने किया. यह स्वाभाविक है कि 1946 में भाई 18 साल की उम्र में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) के सदस्य हो गए और फिर 1948 में सोशलिस्ट पार्टी की मार्फ़त अपना लम्बा राजनीतिक संघर्ष करते रहे, जिसमें गोवा मुक्ति संघर्ष (1955-1961), जेपी आंदोलन (1974-74) प्रमुखता से शामिल हैं. 1975 से 1977 तक वे मीसा में जेल में बंद रहे. राष्ट्र सेवा दल में भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी जिसके वे 2001 में अध्यक्ष बने. भाई की इच्छा थी कि राष्ट्र सेवा दल सोशलिस्ट पार्टी के लिए काडर निर्माण का काम करे ताकि युवाओं को साम्प्रदायिक राजनीति की चपेट से बचाया जा सके.      
      भाई समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र में एमए थे. वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी और अध्ययनशील व्यक्ति थे. लेकिन उनकी शख्सियत मूलत: राजनीतिक थी. समाजवादी आंदोलन की कोख में पले भाई पर गाँधी के साथ फुले और आम्बेडकर के विचारों का गहरा प्रभाव था.  उनका वैश्विक स्तर पर पूंजीवाद और साम्यवाद की विचारधाराओं/व्यवस्थाओं का अच्छा अध्ययन था. वे सभी विषयों पर प्रकाशित अद्यतन लेख और पुस्तकें पढ़ते रहते थे.   
      मेरी राय में भाई की 1991 के बाद शुरु होने वाली राजनीतिक पारी ज्यादा महत्वपूर्ण है. इस साल संविधानिक मूल्यों और प्रावधानों के बरखिलाफ कांग्रेस ने नई आर्थिक नीतियों को देश पर थोप दिया. उस समय भाजपा के वरिष्ठ नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा था कि 'अब कांग्रेस ने उनका (भाजपा का) का काम हाथ में ले लिया है'. इस अवैध फैसले के समाज और राष्ट्र निर्माण के लिए आपदायी नतीजे निकालने ही थे, जिन्हें यह समाज और राष्ट्र झेल रहा है. यह सही है कि समाजवादियों ने उस नवसाम्राज्यवादी हमले का राजनीतिक मुकाबला करने बजाय सत्ता को ही राजनीति का ध्येय बना लिया. ऐसा करते हुए उन्होंने पूरे आंदोलन को न केवल तहस-नहस, बल्कि बदनाम भी कर दिया. लेकिन यह भी सही है कि नवसाम्राज्यवाद को मुकम्मल और निर्णायक विचारधारात्मक चुनौती भी समाजवादियों की ओर से ही मिली. किशन पटनायक, सच्चिदानंद सिन्हा, विनोदप्रसाद सिंह, सुरेंद्र मोहन, भाई वैद्य, जस्टिस राजिंदर सच्चर, पन्नालाल सुराणा, डॉ. जीजी पारिख, सुनील सरीखे समाजवादी नेताओं/विचारकों ने नवसाम्राज्यवाद के मुकम्मल विकल्प में एक लघु किन्तु नवीन राजनीतिक धारा पैदा करने का बड़ा उद्यम किया. यह भी उल्लेखनीय है कि मुख्यधारा राजनीति में समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने नई आर्थिक नीतियों का शुरु से सतत विरोध किया.   
      भाई 1995 में गठित समाजवादी जन परिषद के महामंत्री बने. 2011 में सोशलिस्ट पार्टी की पुनर्स्थापना होने पर उन्हें उसका अध्यक्ष बनाया गया. उस समय उनकी उम्र अस्सी के पार थी. वे यह जिम्मेदारी लेना नहीं चाहते थे. लेकिन जस्टिस सच्चर और युवा समाजवादियों की जिद पर उन्होंने अध्यक्ष बनना मंज़ूर किया. पूरी सक्रियता के साथ उन्होंने उस जिम्मेदारी का निर्वाह किया. 1991 के बाद भाई का जीवन नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ लगातार संघर्ष करने में बीता. उन्होंने खास तौर पर शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ लम्बा संघर्ष किया.
      ऐसा नहीं है कि नवसाम्राज्यवाद के विरोध में अन्य नेता अथवा राजनीतिक संगठन सक्रिय नहीं रहे हैं. लेकिन वे सब विकास की अवधारणा को लेकर या तो भ्रमित हैं या विकास का रास्ता साम्राज्यवाद के हमजाद पूंजीवाद को ही स्वीकार करते हैं. भाई ने सोशलिस्ट पार्टी के नीतिपत्र और अपने वक्तव्यों में यह स्पष्ट तौर पर कहा है कि कम्युनिस्ट विकास के पूंजीवादी विचार और मॉडल को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. वे उद्योगवाद को ही विकास का पैमाना मानते हैं. भाई लोकशाही समाजवादी विचारधारा को पूंजीवाद का विकल्प मानते थे. पूंजीवाद की आसन्न पराजय में उनका दृढ़ विश्वास था. इसी विश्वास की ज़मीन से वे सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं को निरंतर प्रेरणा देते थे. वह प्रेरणा भाई के बाद भी जीवित है.  
      अलविदा भाई! आपको शांतिमय रहीं. नवसाम्राज्यवादी मंसूबों के खिलाफ समता और स्वतंत्रता का संघर्ष जारी रहेगा!

Sunday, December 17, 2017

Exit Polls: The Blaze of Superstition-Prem singh

                                     
At the outset I must admit I never entertained any intention to comment on the Gujarat election or its possible outcome. However, this election, which was fought directly under the leadership of Prime Minister Narendra Modi, fell significantly below the levels of decency in the strategy and the speeches of the BJP. The second largest party Congress also remained where it was 22 years ago - on the path of soft communalism. Rahul Gandhi sprouted a tilak on his forehead and went around the temples of Gujarat with  Congressmen vying to tell one and all that he was a true 'janeudhari' Brahmin. With more or less similar 'highs and lows' both opponents appeared on the same side in this election battle field of corporate politics of this neo-liberal era with no real opposition in sight.

The BJP  now no longer needs to remember the karsevaks who were burnt in a train compartment in 2002. Under Modi's leadership, it has gone much beyond that with its communal politics. Not only the Congress, other secular intellectuals have also not even dared to raise questions about justice following the assassination of thousands of Muslim citizens in the riots, the raped women and the plundered and destroyed properties in its wake. At least the Gujarat elections this time have become 'Muslims-free'. This is a big victory for the RSS.

The Gujarat elections have also made it clear that the Congress does not have much concern for secularism, as Sonia's or self-proclaimed secular soldiers keep tom-tomming relentlessly. The Congress does not have any sympathy for the hardships which the farmers, laborers, small entrepreneurs, unemployed, students have been facing due to neo-liberal policies. The crisis through which the largest minority is passing cannot be a problem too for the Congress. The Congress has not organized any resistance against the continuing mob-lynching of minority citizens. Rather the Congress wants the Muslims to become so scared that they will become its permanent vote bank in the future.

Prior to Amit Shah, Rahul Gandhi had tried to regain the lost state of the Congress by going to the Dalits' houses. Rahul Gandhi did not get any success there because the Dalits have been politicized. They deal with the RSS by dealing with their political power, but do not look at the Congress. If Muslims too get politicized, then Congress politics will never be able to stand independently like before.

It is also true that the victims of the suppression of neo-liberalism might someday bring ‘Tilak’ and ‘Janeudhari’ Congress to power due to its countrywide organizational network but it will not be any sustainable settlement.

Meanwhile, the RSS-BJP will continue working on the communal agenda and BJP will again come back to power with full force. For instance, despite the secular governments in Uttar Pradesh for nearly two decades, the BJP had a clear sweep in the Lok Sabha and Assembly elections. The secular governments and their intellectual supporters could not stop the BJP juggernaut. Those who insist on debating or opposing the separation of communalism from neo-liberalism, are responsible for pushing the country and society into deep sectarian trenches.

Even if Congress wins in Gujarat it will not make a difference to the ongoing nexus of neo-liberalism and communalism. The chief minister will not be able to get along with RSS-BJP and the  example of  Nitish Kumar exemplifies that there is no guarantee of the situation stabilising for long. What is the guarantee that tomorrow Lalu Prasad Yadav's son will not go with BJP to become the chief minister? Secular stalwarts like Mulayam Singh Yadav have formed the government in collaboration with Kalyan Singh. Those secular intellectuals who do not tire of giving secularism certificates to Congress, bypass the 1984 riots, in which thousands of Sikh civilians were murdered in the country's capital; and till today no one person is punished.

Shankar Singh Baghela has rightly said that Congress has taken the 'supari' of winning the elections for the BJP. Otherwise it should have started preparing for the elections six months earlier. Only then it would have got some workers who can become the backbone of the assembly elections. But Congress does not need party workers -  it is only interested in making Rahul Gandhi the prime minister of the country. Such an election is a comment in itself. Little else can be said about it.

After the last phase of elections, the hue and cry of exit polls compelled me to make this comment. Exit polls were also introduced in 1991 with the introduction of new economic policies (liberalization). Liberalization soon morphed into neo- liberalization and  made rapid progress in corporate politics as well. The exit polls  also excel during this period and has thus become an integral part of the elections of corporate politics today.

In rural India there is a saying 'Oh barber, how many hairs?' The answer is, 'Dear customer just coming out before you!' In the neo-liberal period, nobody is satisfied for more than a moment. Every next moment should be something more and the lust for more satiation continues relentlessly. This hankering is true for religious-social identities, for political parties as well as for individuals. From market politics to politics of market- this sentiment pervades in every sphere at every level. This new trend has developed and grown stronger under neo-liberalism. Something should keep happening in life - even if it is a lie! The exit polls have become an extremely popular and enthusiastic medium to appease that trend.

There can be different ways to present something new and to create  new buzzwords. But there is a common truth - all this happen within the purview of corporate politics that carries forward neo-liberalism. It is considered to be a sign of backwardness to even  discuss the Constitution of India in this overwhelming new liberal narrative. Why would anyone wish to stay behind? All want the first and foremost share of the left-over that is falling from the neo-liberal loot of country's resources and the labor. In the society of India divided in many castes for centuries, neo-liberalism has created this new fraternity!

It is not that there is no discussion of alternatives in this world of neo-liberalism. It is very much there. However, the revolutions are sporadic and momentary and do not discuss alternatives to the neo-liberalism. That is considered to be unreasonable. They have coined the term TINA - there is no alternative. In order to destroy genuine alternative ideas and struggles against neo-liberalism and its motivating force of corporate politics beginning just after 1991, the bugle of  'alternatives' and 'revolutions' was blown time to time. That exercise still goes on.

Modern industrial civilization has its own superstitions. In the modern myths of ‘progress’ and ‘development’, many millions of people have been sacrificed due to these superstitions. This destruction and damage goes on uninterrupted and million lives are being destroyed every day and an unprecedented crisis of environment is baring its teeth.

 Exit polls are also a superstition. To spend four days, the two opposing sides (who are really one) are living in that superstition. Those who doubt the scientific basis of the exit polls as well as those who swear by it - all are living in a dream world. Those who say there is no scientific basis for the exit polls, they are also blindly dreaming despite the prediction of exit polls BJP's victory that the Congress sweeps in the real results! Despite the good news of the exit polls for the BJP, 'bakhts' too blindly wish Modi's magic to keep on!

The situation of the 'bhakts' apart, this numbing superstition is also reflected in the bad state of  secular civil society. It clearly lacks the determination and resolve to meet the challenges head-on. This inability is not without a reason. Civil society, unfortunately, is not ready to rein in its class interests, inherent selfishness and temper the accompanying haughty commentary such an attitude germinates. It is totally blind to the fact that with its indifference and callousness, it too has a hand in the damage to the secular, democratic and socialist fabric of modern Indian civilization, howsoever good or bad it may be.

Saturday, December 16, 2017

एग्जिट पोल : अंधविश्वास का उत्साह- प्रेम सिंह

गुजरात चुनाव या उसके संभावित नतीजों पर टिप्पणी करने का हमारा इरादा नहीं था. सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लड़ा गया यह चुनाव भाजपा की ओर से रणनीति और भाषणों के स्तर पर काफी नीचे गिरा हुआ था. दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस 22 साल बाद भी वहीँ थी जहाँ पहले - नरम साम्प्रदायिकता के रास्ते पर. 

राहुल गाँधी तिलक लगा कर मंदिर-मंदिर चक्कर लगाते रहे और कांग्रेसी उन्हें पक्का जनेऊधारी ब्राह्मण बताते रहे. दोनों पक्ष कमोबेश 'ऊंच-नीच' के साथ नवउदारवादी दौर की कार्पोरेट राजनीति के मैदान में एक साथ थे. विपक्ष कहीं नहीं था.  
      भाजपा को अब 2002 में ट्रेन के डिब्बे में जला कर मारे गए कारसेवकों को याद करने की ज़रुरत नहीं रह गयी है. वह मोदी के नेतृत्व में साम्प्रदायिक राजनीति की डगर पर काफी आगे निकल आई है. कांग्रेस ही नहीं, सेकुलर बुद्धिजीवियों ने भी कारसेवकों और उनकी हत्या के बाद हज़ारों की संख्या में मारे गए मुस्लिम नागरिकों, बेईज्ज़त की गयी महिलाओं, लूटी व नष्ट की गयी संपत्तियों के बारे में अभी तक कितना न्याय हो पाया है, यह पूछने की हिम्मत नहीं दिखाई. कम से कम गुजरात का चुनाव 'मुसलमान-मुक्त' हो गया. यह आरएसएस की बड़ी जीत है.
      गुजरात चुनाव ने भी यह साफ़ कर दिया है कि कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता की वैसी चिंता नहीं है, जैसी सोनिया के अथवा स्व-घोषित सेकुलर सिपाहियों को सताती रहती है. क्योंकि कांग्रेस को उन समस्यायों के प्रति कोई संवेदना नहीं है, जिनकी मार से किसान-मजदूर, छोटे उद्यमी, बेरोजगार, छात्र मारे-मारे फिर रहे हैं. कांग्रेस को देश की सबसे बड़ी अकलियत पर जो संकट आया हुआ है, उससे भी परेशानी नहीं हो सकती. अकलियत के खिलाफ जो भीड़तंत्र जारी है, उसके प्रति कांग्रेस ने आज तक कोई प्रतिरोध नहीं किया है. बल्कि कांग्रेस चाहती है मुसलमान इतना डर जाएं कि भविष्य में पूरी तरह उसका वोट बैंक बन कर रहें.
      अमित शाह से बहुत पहले राहुल गाँधी ने दलितों के घरों में जाकर कांग्रेस का खोया जनाधार फिर से हासिल करने की कोशिश की थी. लेकिन कामयाबी नहीं मिली, क्योंकि दलितों का राजनीतिकरण हो चुका है. अपनी राजनीतिक शक्ति का सौदा करके वे आरएसएस के साथ चले जाते हैं, लेकिन कांग्रेस की तरफ मुड़ कर नहीं देखते. अगर मुसलामानों का राजनीतिकरण होता है, तो कांग्रेस की राजनीति कभी पहले की तरह स्वतंत्र रूप में खड़ी नहीं हो सकती.
      यह सही है कि नवउदारवाद के दमन की शिकार मेहनतकश आबादी तिलक और जनेऊधारी कांग्रेस को उसके देशव्यापी नेटवर्क के चलते फिर सत्ता में ला सकती है. लेकिन वह कोई टिकाऊ बन्दोबस्त नहीं होगा. उस बीच आरएसएस-भाजपा साम्प्रदायिक अजेंडा पर जम कर काम करते रहेंगे और भाजपा फिर पूरी ताक़त से सत्ता में लौटेगी. उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में करीब दो दशकों तक सेकुलर सरकारें रहने के बावजूद भाजपा ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों में विपक्ष का सूपड़ा साफ़ कर दिया. यह उसकी थी जिसे सेकुलर सरकारें और उनके समर्थक बुद्धिजीवी रोक नहीं सकते. लिहाज़ा, जो लोग बहस अथवा विरोध को नवउदारवाद से अलग साम्प्रदायिकता पर केन्द्रित करने की जिद ठाने रहते हैं, वे देश और समाज को और गहरी साम्प्रदायिक खायी में धकेलने के जिम्मेदार हैं.
      गुजरात में कांग्रेस जीत भी जाती है तो उससे नवउदारवाद-साम्प्रदायिकता के गठजोड़ पर फर्क नहीं पड़ेगा. जो मुख्यमंत्री बनेगा वह नीतीश कुमार की तरह आरएसएस-भाजपा के साथ जाकर नहीं मिल जाएगा, इसकी क्या गारंटी है? या कल को लालू प्रसाद यादव का लड़का मुख्यमंत्री बनने के लिए भाजपा के साथ नहीं चला जाएगा, इसकी भी क्या गारंटी है? मुलायम सिंह जैसे सेकुलर सूरमा कल्याण सिंह के साथ मिल कर सरकार बना चुके हैं. जो सेकुलर बुद्धिजीवी कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता का सर्टिफिकेट देते नहीं थकते, वे 1984 के दंगों को दरकिनार कर देते हैं, जिनमें देश की राजधानी में हज़ारों सिख नागरिकों का क़त्ल हुआ; और आज तक एक भी व्यक्ति को सजा नहीं हुई है.
      शंकर सिंह बाघेला ने सही कहा है कि कांग्रेस ने भाजपा को जिताने की सुपारी ली है. वरना उसे 6 महीने पहले चुनाव की तैयारी शुरू करनी चाहिए थी. तभी उसके कुछ कार्यकर्त्ता बन पाते जो विधानसभा चुनाव की रीढ़ होते हैं. लेकिन कांग्रेस को कार्यकर्त्ता नहीं बनाने, राहुल गाँधी को देश का प्रधानमन्त्री बनाना है. ऐसा चुनाव अपने में खुद एक टिप्पणी है. उस पर अलग से क्या कहा जा सकता था?    
      लेकिन अंतिम दौर के चुनाव के बाद से एग्जिट पोल का कोहराम सुन कर यह टिप्पणी करने की विवशता बनी. 1991 में नई आर्थिक नीतियों (उदारीकरण) के आने के साथ एग्जिट पोल भी आ गए थे. उदारीकरण जल्द ही नवउदारीकरण बन गया और उसने अपनी बढ़त के लिए जन राजनीति की जगह कार्पोरेट राजनीति का तेज़ी से सूत्रपात कर दिया. कार्पोरेट राजनीति के परवान चढ़ने के साथ-साथ एग्जिट पोल भी निखरते चले गए और आज कार्पोरेट राजनीति के चुनावों का अविभाज्य हिस्सा बन चुके हैं.  
      देहात में कहावत है 'नाई रे नाई कितने बाल?' ज़वाब होता है 'जजमान अभी सामने आये जाते हैं!' नवउदारवादी दौर में किसी को दो पल के लिए भी तसल्ली नहीं है. हर पल कुछ न कुछ होते रहना चाहिए और उसका पता भी चलते रहना चाहिए. यह धार्मिक-सामाजिक अस्मिताओं के लिए भी सत्य है, राजनीतिक पार्टियों के लिए भी और व्यक्तियों के लिए भी. बाज़ार की राजनीति से लेकर राजनीति के बाज़ार तक यह देखा जा सकता है. नवउदारवाद के तहत यह नयी प्रवृत्ति विकसित हुई है. जीवन में कुछ न कुछ होते रहना चाहिए - भले ही झूठ-मूठ! एग्जिट पोल उस प्रवृत्ति को तुष्ट करने का अत्यंत लोकप्रिय और उत्साही माध्यम बन चुका है.    
      कुछ न कुछ नया होने और करने के अपने-अपने दावे और तरीके होते हैं. लेकिन उनमें एक सच्चाई समान होती है - वे सब नवउदारवाद और उसकी वाहक कार्पोरेट राजनीति के दायरे में ही घटित होते हैं. उसके बाहर कोई भी बात या चर्चा करना, यहाँ तक कि भारत के संविधान की चर्चा करना तक पिछड़ेपन की निशानी माना जाता है. कोई भी पीछे भला क्यों रहना चाहेगा? देश के संसाधनों और श्रम की नवउदारवादी लूट से जो जूठन गिर रही है, उसमें सबको सबसे पहले और सबसे ज्यादा हिस्सा चाहिए. सदियों से अनेक जातियों में विभाजित भारत के समाज में नवउदारवाद ने यह एक नई बिरादरी बनायी है!
      ऐसा नहीं है इस दुनियां में विकल्प की चर्चा नहीं होती है. खूब होती है. (क्रांति तो यहाँ पल-पल पग-पग पर होती चलती है.) लेकिन वह नवउदारवाद के विकल्प की चर्चा नहीं होती. उसे विकल्हीन मन जाता है.  बल्कि नवउदारवाद और उसकी संचालक शक्ति कार्पोरेट राजनीति के विकल्प की जो चर्चाएँ 1991 के बाद चलीं और संघर्ष हुए उन्हें नष्ट करने के लिए 'विकल्प' और 'क्रांति के बिगुल फूंके गए; और अभी भी फूंके जाते हैं.  
      आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के अपने अंधविश्वास हैं. यहाँ इस विस्तार में नहीं जाया जा सकता कि उन अंधविश्वासों के चलते कितने करोड़ लोगों की बलि ली जा चुकी है, कितने करोड़ तबाह किये जा चुके हैं, कितने करोड़ प्रतिदिन तबाह किये जा रहे हैं, और पर्यावरण का अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है. एग्जिट पोल भी एक अन्धविश्वास है. चार दिन काटने के लिए दोनों पक्ष (जो वस्तुत: एक हैं) अंधविश्वास में जी रहे हैं. जो लोग कहते हैं एग्जिट पोल का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता, वे भी एग्जिट पोल की भाजपा के जीतने की भविष्यवाणी के बावजूद आँख बंद करके मनोकामना कर रहे हैं कि वास्तविक नतीजों में भाजपा का सूपड़ा साफ़ हो जाए! एग्जिट पोल की खुशखबरी के बावजूद 'भक्त' आँख बंद करके मोदी का जादू चलते रहने की मन्नत मान रहे हैं!
      भक्तों का जो हॉल है सो है, यह स्थिति सेकुलर नागरिक समाज की बुरी दशा को दर्शाती है. वहां उस समझ और संकल्प का अभाव दिखता है जो संकट का समग्रता में मुकाबला और समाधान कर सके. ऐसा अकारण नहीं है. नागरिक समाज अपने (वर्ग) स्वार्थ और बड़बोलेपन को थोड़ा भी लगाम लगाने को तैयार नहीं है. उसे अपने पर अंधा विश्वास है कि देश में समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र, यानी आधुनिक भारतीय सभ्यता (जैसी भली-बुरी वह बन पाई) के साथ जो दुर्घटना घटी है, उसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है.

Tuesday, December 5, 2017

आम आदमी पार्टी और कवि कुमार का आपत्तिजनक बयान-राजेश कुमार

(कुमार विश्वास की सफाई उनके पहले के बयान से ज्यादा आपत्तिजनक है, पहले वीडियो में तो उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था लेकिन दूसरे वीडियो में वो बेशर्मी से विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम ले रहे हैं। जिस वीपी सिंह ने एक बड़े तबके को आरक्षण से जोड़कर पिछड़ी जातियों को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की कोशिश की, उनका नाम लेकर पार्टी प्रवक्ता का इतना बेशर्मी दिखाना बग़ैर केजरीवाल के शह के नहीं हो सकता। )

बाबा साहेब अंबेडकर और पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कुमार विश्वास ने जो कुछ भी कहा है, दरअसल वो आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल/मनीष सिसोदिया की घोषित लाइन है। कुमार कवि की ओछी टिप्पणी इंडिया अंगेस्ट करप्शन (आईएसी) नामकी संस्था का मूल उद्देश्य है, जिसकी शुरुआत यूथ फॉर इक्वलिटी को फंड और नेतृत्व उपलब्ध कराने से हुई थी। आपको याद होगा जे एन यू  जैसे विश्वविद्यालयों और कई मेडिकल कोलेजों में मुहिम चलाने के बाद संवैधानिक आरक्षण के विरोध में जंतर-मंतर पर यूथ फॉर इक्वलिटी का प्रदर्शन किया गया था। लिहाज़ा कुमार विश्वास ने जो कहा है वो अचानक आया हुआ बयान नहीं है, बल्कि समय-समय पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल और अन्ना हजारे की कोर टीम के लोग इस तरह की बयानबाजी करते रहते हैं। ग़ौरतलब है कि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी मंच से भी कई बार आरक्षण विरोधी बयानबाजी की है। ये लोग राजनीति में किसी भी तरह की विचारधारा का विरोध करते हैं। ज़बकि भारत का संविधान, जैसा भी वह है, एक विचारधारा ना नाम है। प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव जैसे लोग आम आदमी पार्टी की विचारधारा हीनता को स्वीकार करके ही उसमें शामिल हुए थे।      

तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद जब आम आदमी पार्टी का गठन किया जा रहा था। उसी वक्त डॉ प्रेम सिंह ने अपने लेखों और वक्तव्यों के जरिये बार-बार अगाह किया था कि नवउदारवाद की कोख से निकली ये पार्टी ना केवल सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्ष और लोकतान्त्रिक राजनीतिक मूल्यों को कमजोर करेगी बल्कि नवउदारवाद के खिलाफ संघर्षों को भी निर्णायक क्षति पहुंचाएगी। यही वजह है कि जब देश में कोई भी पार्टी बाबा साहेब और आरक्षण की खुलकर मुखालफत नहीं कर पाती, तब आम आदमी पार्टी के बैनर तले एक स्वयंभू कवि देश के सबसे बड़े नेताओं पर जातीय उन्माद की राजनीति करने का आरोप लगा रहा है। आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास जातिवाद का ज़हर फैलाने का आरोप उन नेताओं पर लगा रहे हैं जिन्होंने जातिवाद की खाई को पाटने में सबसे ज्यादा योगदान दिया था। कुमार विश्वास और उनके मेंटर अरविंद केजरीवाल दरअसल सोशल जस्टिस विरोधी राजनीति के विस्तार का प्रतिनिधित्व करते हैं जो कॉर्पोरेट के हाथ का खिलौना है।  

विवादित वीडियो मे कुमार विश्वास ना केवल वर्णवादी व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं, बल्कि खुलकर स्त्री विरोधी बातें भी कर रहे हैं। इस तरह का बयान कुमार विश्वास ने कोई पहली बार नहीं दिया है। कवि कुमार का नरेंद्र मोदी का गुणगाण और रंगभेदी बयान देने वाला वीडियो पहले भी सामने आ चुका है। लेकिन बावजूद इसके वे ना केवल आम आदमी पार्टी में बने रहे, उन्हें पार्टी ने बड़ी जिम्मेदारी भी दी गई। अभी भी यही लगता है कि पार्टी सुप्रीमों उन्हें भाजपा का रास्ता नहीं दिखने जा रहे हैं, जबकि कुमार विश्वास पर संघी होने और भाजपा में जाने की तैयारी का आरोप लगता रहता है। ये दोनों एक ही राह के हमसफ़र हैं। 

आप के संस्थापक सदस्य कुमार विश्वास का बयान भले ही कुछ लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है। लेकिन सामाजिक न्याय के संघर्षों को कुंद करने की कोशिश आम आदमी पार्टी पहले दिन से कर रही है। और कुमार विश्वास जैसे लोग अपनी भूमिका बखूबी निभा भी रहे हैं। आम आदमी पार्टी की 'क्रांतिकारिता' को लेकर बुद्धिजीवियों के आगे धुंध की भले ही अभी तक साफ नहीं हो सकी हो, लेकिन भ्रष्ट्राचार विरोधी आंदोलन की आड़ में कॉर्पोरेट राजनीति को साधते इन खिलाड़ियों की असलीयत अब जनता के सामने आ चुकी है।  

इस पूरे मामले में आप के एक और नेता संजय सिंह का बयान महज राजनीतिक लीपा-पोती केअलावा कुछ नहीं है। कुमार विश्वास द्वारा निकाले गए नेताओं प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को वापस बुलाने की बात की है। इस पर प्रशांत भूषण का यह बयान कि आप में दोबारा शामिल नहीं होंगे, आश्वस्त करने वाला नहीं लगता। क्योंकि दोनों धडों में फिर से मिलने की बातचीत के संकेत समय-समय पर मिलते रहते हैं। बात कुमार विश्वास की और से दी गई सफाई की करें तो उनकी सफाई पहले के बयान से भी ज्यादा आपत्तिजनक है। पहले वीडियो में उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था लेकिन दूसरे वीडियो में वो बेशर्मी से विश्वनाथ प्रताप सिंह का नाम ले रहे हैं। जिस वीपी सिंह ने एक बड़े तबके को आरक्षण से जोड़कर पिछड़ी जातियों को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की कोशिश की, उनका नाम लेकर पार्टी प्रवक्ता का इतना बेशर्मी दिखाना बग़ैर केजरीवाल के शह के नहीं हो सकता। 
राजेश कुमार

Wednesday, November 29, 2017

A New Specimen of Corporate Politics- Dr Prem Singh


Tuesday 12 November 2013, by Prem Singh

The economy that serves the interests of Indian and foreign corporate houses can hope to exist permanently only if politics too adheres to the same goal. It is with this in view that the new economic policies implemented in the early 1990s have been focused to reinvent the mainstream political character as corporate savvy. No ideology or principle, other than corporate capitalism, seems to be working in the current scenario. Surely, the ideology of corporate capitalism has taken communalism, casteism, regionalism, lingualism, dynastic politics and individualism in its embrace infiltrating rapidly into every area and strata of life. A significant role is being played by the media that flourishes on big capital and high technology. The middle class, whose activism is generally in news these days, and which benefited optimally from the mixed economy earlier and then, later, from the neo-liberal economic policies for about 25 years, has now become a supporter of corporate capitalism.
In this situation the ideology underlying the Indian Constitution, based on democratic, socialistic and secular values, is no longer the goal of Indian politics. It follows directives from the World Bank, International Monetary Fund, World Trade Organisation and the American power establishment that stands over and above these bodies. This is the era of corporate politics and a new specimen of this has emerged in the form of the Aam Aadmi Party (AAP).
The AAP is all over the mainstream media. But a serious analysis of its character, possible only in small magazines, is absent. In the column ‘Samay Samvad’ which publishes in the monthly Hindi magazine Yuva Samvad, I had briefly investigated the character of this party. Like the other articles written on this subject, it could not have been published in any mainstream newspaper/magazine in Hindi or English. The Hinduand Jansatta have a different identity from the mainstream media in English and Hindi respectively, but they are at the forefront in their support of the AAP. This intimate friendship between the mainstream media and AAP is based on their common kin, that is, corporate capitalism.
The inceptors and operators of the AAP were the main leaders of the team called ‘India Against Corruption’ (IAC). IAC was substantially populated with communalists, reactionaries, status-quoists, mail chauvinists, religious and spiritual traders, superstition-mongers and NGO operators. World Bank award winner Anna Hazare, who by virtue of an NGO transformed his village into a ‘heaven’, was made the head of this team. Arvind Kejriwal, who crowned Anna as the chief of this team, was one of the prime ringleaders of the NGO network that has wiped out political activism in India. The difference between the two can be alluded to by the fact that Anna is a product of the 1970s while Kejriwal is a child of the neo-liberal era, straightaway.
Born under the aegis of IAC, the anti-corruption movement was primarily administered by the RSS and advertised by the mainstream media. All Indian corporate houses and their institutes were in its complete support. For the campaign-workers, corruption is a sound that requires only one hand to clap; whereas corporate houses, who bribe political leaders to steal away national resources and the safety-valves of corporate capitalism (that is, the NGOs), are considered righteous. The AAP, ‘emerging from the ashes of the anti-corruption movement’, cannot have a character different from IAC and the anti-corruption movement. Hence it should be viewed as a new specimen of corporate politics.
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The efforts of alternative politics have been heavily damaged by the anti-corruption movement and AAP. In this context, they are more dangerous than the mainstream political parties. Mainstream politics following neo-liberalism is bent upon defeating alternative politics. But this party has undertaken the task of destroying the political option of neo-liberalism. It has dealt the deepest injury to the stream of alternate politics launched by political philosophers and activists like Kishan Patnayak. This time, the socialists of the Kishan Patnayak stream have deceived the legacy. Out of the democratic progressive camp only these few socialists have played a role in establishing this party.
If we look back a little, we find prominent members of this party engaged in work dealing with the Congress and BJP-RSS. Therefore nobody from the neo-liberal and corporate houses will counter such people. In other words, the leaders of the Aam Admi Party are maternal and paternal cousins of the Congress and BJP respectively and the real brothers of the corporates. There is a continuous competition amongst people working for the Congress to land into the National Advisory Committee (NAC) chaired by Sonia Gandhi. It has been said that had Kejriwal been offered a place in the NAC and Prashant Bhushan in the Cabinet, there would have been no mess. For Shanti Bhushan, the Congress’ ‘unfairness’ is clear in not accommodating his lawyer son, while lawyers like Chidambaram, Sibal and Singhvi have been given big posts. From the very inception of the Aam Admi Party, he is known to have been informing all and sundry that beginning with Delhi, the entire country will be won over by in 2014! That is his idea of retribution, retribution for the oversight by the Congress.
Till date, none of the political parties of this country have entertained the sole motive of immediately winning in elections, by hook or by crook. A party, which considers politics to be only about the business of winning or losing elections, whether successful or unsuccessful, can slip down immensely. Recently, I got an opportunity to visit a Rashtra Sewa Dal (RSD) camp for the youth in Kandikhal village of Uttarakhand. There I asked Dr G.G. Parikh, editor of the English weekly Janata, about the enthusiasm level of fellow socialists from Maharashtra who had joined the AAP. Dr Parikh replied that all eyes are on the Delhi Vidhan Sabha elections. If the AAP succeeds in forming the government in Delhi, they will stay in the party, if not, then they will think of something else. Even a child can say that no party other than the Congress or BJP can form the government in Delhi. If both parties fall short of a majority by a few seats, then without doubt, following the footsteps of the Congress-BJP and winning a few seats, the AAP’s leaders can go with either of them.
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The character of this party can be understood very well if we pay attention to some of the latest activities of this new specimen of corporate politics. Most of the Indian political parties consider Muslims to be their vote-bank. In the eyes of the AAP too Muslims are merely a vote-bank, not citizens of India. Recently there was a news in the media that some ‘special Muslims’ have been inducted into the AAP. In present times, one can say that the media is the kingmaker. Like Modi’s candidature for the post of the Prime Minister is more due to the media’s contribution (than that of the RSS), so is Kejriwal a media creation. Not only is the media an AAP news supplier, the media also presents the news in the form desired by the AAP’s media cell. The leaders of the AAP have wished to project the news that the AAP has won the support of the Muslim community, the country’s largest minority group.
Here it is imperative to pay attention to the issue of the ‘special’ Muslims. Political parties turn the entire Muslim community into “vote-bank” by virtue of these ‘special’ Muslims. ‘Special’ Muslims are available not just for secular parties; the BJP has bagged some as well. For the last two decades, Indian politics is tied to the pivot of the USA and Israel wherein these ‘special’ Muslims play a substantial role. The ‘special’ Muslims in the AAP must have assumed that if the AAP comes to power, the party will lift them to crucial posts. These days this is the new avatar of secularism.
 That leaders from parties like the BJP, Congress, SP, BSP etc. are joining the AAP, makes it newsworthy for the media. At this moment, the ‘leftovers’ of these parties are joining the AAP. By the time the elections begin, established leaders, disgruntled at being denied a ticket, can also join the AAP. The logical end to the inclusion of such politicians obviously and predictably implies set patterns, that is, distribution of alcohol and cash in slums, resettlement colonies and villages. If the money-power of the AAP sustains to challenge the Congress-BJP, then the distributors of alcohol and cash will, on their own, fulfil this job. Politics sans ideology and values cannot aspire for anything other than making a beeline for the blind alley to power.
These days one hears a lot about the expenses of the AAP and its cash inflow. Even the amount to be given to each candidate for election expense is being advertised. A figure of about thirty to thirtyfive lakh rupees is the estimate, which in reality will touch a crore. It’s a huge temptation for the candidates. The massive dimensions that this money-game of the AAP will take, as the general elections close in, can be guessed. The recent political activities of the AAP clearly show that its leaders, like other mainstream political parties, believe politics to be, first and foremost, a game of money-power. That is, they are agreed to have expensive elections in a poor country, which will get even more expensive while emulating corporate politics.
Some information detailing news about some leaders of the AAP getting foreign currency from certain countries was published in Samyantar (a monthly Hindi journal published from Delhi) during the anti-corruption movement. Now, with the work expansion, a cash flood is needed. Actually, the only eligibility the AAP leaders have displayed till today is that of minting and hoarding money. In the coming days, the ability to extract as much money as possible from organisations like the Ford Foundation, supposed to be propagator of neo-imperialism, and corporate houses will be apparent. That people from India and abroad are voluntarily giving money is no excuse. Everyone knows that money attracts money.
Like the other mainstream political parties, the AAP is disconnected from the farmers, tribals, Dalits, labourers, artisans, small shopkeepers/business-men, students, and the unemployed. It’s a party of the middle class, made by the middle class, for the middle class. A middle class, that snatches its share from the neo-imperialist loot and then props itself as ethical/moral. It jumped (on a huge scale) into the anti-corruption movement to show that despite its collusion in the displacements and suicides in the last 25 years, the middle class conscience is alive. The facade enacted by the middle class was so potent that several genuine thinkers and people’s movements’ activists came under its sway.
Recently, an episode of an AAP leader being shunted out of a UGC committee created uproar in the media. Private universities have mush-roomed in India. The country’s President himself is advertising for private universities. There is eager preparation to bring in foreign universities. The governments have initiated the process of sabotaging/dismantling State and Central universities. The latest example is the forcing of the Four Year Undergraduate Programme (FYUP) in the Delhi University. In this crucial time it is essential to boycott government committees and to courageously fight against the neo-liberal attack on education. Many organisations and individuals are working to this end throughout the country. The AAP leader should have resigned from the UGC committee without replying to the show-cause notice and engaged in protesting against the privatisation and commercialisation of education at his party level.
But it was turned into a media event and the question asked if the government would have raised objection to the UGC committee member-ship had he joined the Congress. Although, if he had to question the government then he should have asked as to why he cannot continue being in the committee as a member of the AAP when he could be in the committee as a member of the Samajwadi Jan Parishad (SJP)? It’s a known fact that membership of government organi-sations these days is an outcome of closeness to the government; scholarship is rarely a criterion for it. If a scholar loses the membership of a committee, there is little to worry about. The worrisome issue is that despite the presence of scholars in different committees, governments are waving green flag to privatisation. In these circumstances, which concerned scholar can stay in a committee?
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It is said that narcissists make garlands which they themselves wear in their own necks. The leaders of the AAP, who conducted surveys earlier on diverse channels for different governments, now conduct surveys and predict their victory. Crossing all boundaries of political civility, they label leaders from other political parties as corrupt and portray themselves as honest. They have also defaced election symbols of the opposite parties, for which a complaint has been lodged with the Election Commission of India. Not just this, they have made the Indian Flag a means to fulfil their political ambitions. Hired workers wave the flag, then discard it and walk away. Actually, they are self-enamoured people who consider their existence as miraculous, and believe that any sin committed by them is also holy. They are their own connoisseurs and, even after descending to bottomless pits, display a noble demeanour. Having relished the best things the world has to offer, they portray themselves as its victims. One can find a long list of narcissist heroes in Indian and world literature. In reality, they are mental patients due to innumerous complex reasons, but nurse and propagate a delusion of being the doctor for all ailments. IAC, the anti-corruption movement and AAP boast of such a list of narcissist ‘heroes’. At this juncture, we can only say that the road to dictatorship and fascism begins from here. The trend of rumour-mongering started by these leaders by virtue of the media is also the point from where Narendra Modi is coming.
Gandhi’s name was often invoked during the anti-corruption movement. Anna Hazare, who at Jantar Mantar had at first praised Gujarat Chief Minister Narendra Modi (responsible for slaughtering thousands of innocent citizens in a state-sponsored genocide in Gujarat), is frequently referred to as a Gandhian. So, till date, nothing has ever been spoken or written by him about ‘Gujarat’s lion’ transformed into ‘Mother India’s Lion’ Narendra Modi. There was an attack on Prashant Bushan made by the followers of Anna Hazare and Ram Dev against his statement on Kashmir. The AAP workers were also amongst the hoodlums who did not let a press conference proceed in the Press Club of Delhi. The press conference was orgainsed on the demand to give the dead body of Afzal Guru to the women who had come from Srinagar. There is an abundance of reactionaries in the AAP. If the leaders of the AAP want to win the elections, they must keep on appeasing them.
Gandhi did not look at the means and the goal separately. The leaders of this party are propelled by the intention of doing anything to win the elections. In reality, both the creation and aim of this party are infested with deceitfulness. During the anti-corruption move-ment there was a widespread propagation of deep hatred against politics and politicians, although the intention was always to create a political party, and despite Anna Hazare’s wishes against it, it was formed. It was also said that Kejriwal was not in favour of Anna breaking his fast at Ramlila Maidan, because in the event of Anna’s death due to his fast, Kejriwal could have usurped Anna’s position and taken his political flight. He was already fearful of Baba Ramdev leaving him behind in the race towards politics. The entire point of these manipulations was propelling the poor Indian populace, reeling under the oppression of neo-liberalism, in favour of the richer faction of India that has benefited from it.
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The campaign strategy of the AAP is akin to that of the Congress. Emulating the way in which the entire Congress is acting as an agent to establish Rahul Gandhi’s leadership, the AAP leaders-workers are functioning as Kejriwal’s agents. In a party where individualism dominates so much, coming to power will further cement it. The AAP party has suffered a division due to this individualism. If the party progresses further, there can be more divisions. Individualism is a capitalist value. In Indian politics, the former colludes with feudalism to manifest in regionalism, family rule and dynastic politics. Following the footsteps of big parties who blindfold the voters with the name of their leader through indiscriminate propaganda, a similar road is being envisaged by the strategists of the AAP. Only one man’s name is being publicised on posters, banners, hoardings, mobiles and internet. That too as a Chief Minister! You are sitting at home or in the office, participating in some function or driving your car, your mobile will receive a written or voice-recorded message of Anna’s pupil Arvind Kejriwal. Indiscriminate publicity cannot be attained without indiscri-minate cash flow. That is, these ‘good’ and ‘honest’ people are saying that if you wish to practice politics, learn from the Congress and BJP. This kind of propaganda in a democracy bears a fascist tendency, wherein the image of a leader is imposed on the voters day and night.
A Hindi proverb says that a man who goes blind during spring sees everything in a green hue. The AAP leaders, blind in their pursuit of power, are in a similar situation. They look at all people and events through the lenses of power politics. When IAS officer Durga Shakti Nagpal was suspended, without even meeting her, she was offered the opportunity of fighting elections from the AAP. An announcement for fighting the Delhi Assembly elections was made even prior to the registration of the party. Since then, a Muslim candidate is being searched for somewhere, a Dalit somewhere, a Jat somewhere, a Punjabi somewhere, and a Sikh somewhere. Promoters are being searched for as well. If the whole story, of how and which people are being approached to fight election from the AAP, is exposed, it will produce a great political farce.
A friend told us that in Prakash Jha’s Satyagrah, there were many people shown wearing the AAP’s common man’s cap with ‘main aam aadmi hun’ written on it. We also came to know that many AAP workers wearing the cap were seen outside the theatres. It’s quite possible that to show this, some money was exchanged. Or may be Prakash Jha was impressed, like many other good people, that persons wearing ‘main aam aadmi hun’caps would direct their energies towards the betterment of the ordinary public. The way the leaders of the AAP demonstrate their caps, it is worth a thought. Wearing the cap on special political occasions of the party can be understood. Even then if the cap is not worn it shouldn’t matter. Dr Lohia was against party workers wearing red caps. He believed that the thought of revolution should be in the mind of the workers. Politics that begins in showmanship will end in complete fraudulence.
When people earning in lakhs and crores put on the ‘main aam aadmi hun’ cap, its first and last meaning is to ridicule the poor of this country. There is a need to reflect seriously on the thought process behind the AAP strategy. During the struggle for independence and after that, the common man has been at the centre of many debates in political, intellectual circles and also literary discussions. The Hindi ‘individualistic’ litterateur Agyeya, irritated at the excessive insistence on ‘aam admi’ in literature by the progressives, had said, ‘Aam Aadmi, Aam Admi.... Aam Admi kya hota hai?’ (Common man, common man...what is common man?). His point was that for a litterateur all people are special. When the discussion about the common man extended from politics to literature, the meaning of the common man was also stereotyped. In this definition, the last man of Gandhi was nowhere to be seen. The reference to the importance and special status of the common man were not meant for the impoverished people engaged in ‘mehnat-mazduri’.
The middle class fitted itself into this image of the common man, made all efforts to defend and fortify it, and is continuing to do so even now. The common man is a middle class concept which has no link with either the poor or poverty because the modern industrial civilisation which has the middle class at its core waves the assurance that it will not let anybody stay poor. In other words, the poor will be brushed under the carpet in more than one way. This neo-imperialist ‘great’ Indian middle class, fattened in the last 25 years of neo-liberalism, wants to strengthen its position in the name of the common man. It wants everything for itself, but doesn’t want to give up its role of being the leader of the poor. This classic pretence has heaped immense disrespect and pain on the poor and the hard-working masses of India.
The middle class of India contains mainly the upper-caste members. This is the reason why the anti-corruption movement, and the party that emerged from it, is largely based on upper castes, which are supported by the ‘dominant’ backward castes. This is the basis and claim on which the leaders of the AAP have called upon the youth to come forward and join this ‘new caste’, namely, the middle class, discarding the casteist politicians. The youth are further suggested that here their caste too will be strengthened and their class-interest realised.
It is astonishing that some friends have expectations from the AAP. After the Congress and BJP, they see only a few-month-old AAP in the image of a political saviour. It’s not as if, like the ‘common man’, they are unaware of the existence of Left and democratic movements and political parties having a long standing legacy of struggle. Amongst them are people’s movement activists, teachers and journalists. About the people who expect the AAP to win and do something, even after the collapse of the anti-corruption movement, the only thing to be said is that the political mind has disappeared from most members of the civil society. This is the reason behind the rapid growth of the politics that favours corporate capitalism with no foothold left for the political endeavours that oppose it. 
Dr Prem Singh, a former Fellow, IIAS, Shimla, teaches Hindi at the Delhi University.