Saturday, December 28, 2013

कारपोरेट कपट का बढ़ता कारोबार- प्रेम सिंह

 (राही मासूम रजा की अंतिम कृति नीम का पेड़ में एक संवाद है, कि राजनीति में तत्काल लाभ के लिए जो फैसले लिए जाते हैं, उनके उनके दूरगामी नतीजे बड़े भयावह होते हैं ..जनपक्षधर नजरिये से सियासत की जो तस्वीर फिलहाल नज़र नहीं आ रही ... सिस्टम के उन सवालों को बड़े सटीक ढंग से उठा रहे हैं डॉ प्रेम सिंह। )

वर्ग-स्वार्थ की प्रबलता
नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के बीस साल होने पर हमने कहा था कि इस दौरान उसके खिलाफ जो संघर्ष चला उसमें बाजी नवउदारवाद समर्थकों के हाथ रही है। पांच साल बाद भी वही स्थिति है। पिछले पांच सालों में वामपंथी और सामाजिक न्याय की पक्षधर समेत मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों, बुद्धिजीवियों, नागरिक समाज और मुख्यधारा मीडिया में नवउदारवादी व्यवस्था का समर्थन और स्वीकृति बढ़ी है। यह ध्यान देने और समझने की जरूरत है कि इस अरसे में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की परिघटना ने एक बड़ा फर्क डाला है। वह यह कि अब नवउदारवाद विरोध का पक्ष, जो अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग मुद्दों को लेकर अलग-अलग संगठनों@व्यक्तियों द्वारा संचालित जनांदोलनों के रूप में उभरा था और ज्यादातर नागरिक समाज व मुख्यधारा मीडिया की उपेक्षा के बावजूद लगातार अपनी ताकत बना रहा था, नवउदारवाद समर्थकों ने काफी पीछे धकेल दिया है। इसके साथ ही पिछले करीब दो दशकों में उभर कर आई वैकल्पिक राजनीति की विचारधारा और उस पर आधारित संघर्ष को मिटाने का काम भी तेज हुआ है। नवउदारवाद को मजबूत बनाने और गति प्रदान करने वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के पुरोधाओं ने राजनीतिक पार्टी बना कर पूंजीवाद के किसी भी विकल्प को पूरी तरह समाप्त करने का गहरा दांव चल दिया है। संविधान की विचारधारा पहले ही नवउदारवाद की एजेंट मुख्यधारा राजनीति द्वारा लगभग ध्वस्त की जा चुकी है। अब सीधे नवउदारवाद विरोधी संघर्ष की कोख से पैदा विकल्प की राजनीति को, सीधे नवउदारवाद की कोख से पैदा राजनीति ने धूमिल कर दिया है। 
आजादी के संघर्ष की सीख से हम जानते हैं पूंजीवादी साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के दौर में उतार-चढ़ाव आते हैं। अब हम यह भी जान गए हैं कि 1947 में हासिल की गई जीत निर्णायक नहीं थी। आजादी को अधूरी माना भी गया था और उसे पूरा करने के कई दावेदार प्रयास हुए थे। उस विस्तार में जाने का यह मौका नहीं है। हकीकत यह है कि समस्त दावेदारों और प्रयासों के बावजूद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में ‘दूसरी आजादी’, ‘तीसरी आजादी’ ‘दूसरी क्रांति’, ‘तीसरी क्रांति’ का शोर करते हुए पूंजीवादी साम्राज्यवाद शायद पहले से ज्यादा मजबूती के साथ देश में स्थापित हो गया है। वैश्विक परिस्थितिजन्य कई जटिल कारण इसके लिए जिम्मेदार हैं। उपनिवेशवादी दौर में जो साम्राज्यवादी बीज पड़ा था, वह नवउदारवाद के प्रभावस्वरूप फल-फूल उठा। उसने देश की राजनीति पर कब्जा जमा लिया। वह कमोबेश कारपोरेट की एजेंट बना दी गई। उसीका नतीजा है कि बहुत-से सच्चे जनांदोलनों और लोगों के संघर्ष के बावजूद नवउदारवाद की जीत उत्तरोत्तर पक्की होती गई है। वह आगे भी पक्की रहे; उसके विरोध की मुख्यधारा राजनीति में निहित कतिपय संभावनाएं भी निरस्त हो जाएं, इसके लिए नवउदारवाद ने अपनी राजनीति तैयार कर ली है। आम आदमी पार्टी (आप) के नाम से इस राजनीति के तहत गांधी के आखरी आदमी को पीछे धकेल कर करोड़पति ‘आम आदमी’ को राजनीति के केंद्र में स्थापित करने की मुहिम चलाई जा रही है। उम्मीद करनी चाहिए कि 1947 में मिली अधूरी आजादी को पूरा करने के दावेदार इस परिघटना पर गंभीरता से सोचने का काम करेंगे; नवउदारवाद के लाभार्थियों की नहीं, वंचितों के पक्ष की राजनीति स्थापित करने का उद्यम करेंगे। तभी नवउदारवाद की जीत और वैकल्पिक राजनीति की पराजय की इस परिघटना को उलटने आशा की जा सकती है।
लेकिन इसमें रोड़े बहुत हैं। चिंता का विषय कारपोरेट राजनीति के नए उभार का होना नहीं है। सरकारों का एनजीओकरण होगा तो एक दिन राजनीति का भी होगा, यह हम पहले से जानते थे। यह गुबारा अपने अंतविर्रोधों के चलते जल्दी ही फूट भी सकता है। बल्कि उसके फूटने की आशा में मुख्यधारा राजनीतिक दल और आशंका में खुद नई पार्टी के नेता परेशान रहते हैं। लेकिन यह उनका घरेलू मामला है। गुबारा फूटने पर भी विकल्प की राजनीति के लिए कुछ रास्ता नहीं बनने जा रहा है। नवउदारवादी पेटे में ऐसे ज्वार आगे भी आते रहेंगे। चिंता का विषय यह है कि अपने को वाम, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बताने वाले लोग इस राजनीति की न केवल प्रशंसा कर रहे हैं, उससे सीख लेने का पाठ पढ़ और पढ़ा रहे हैं। राहुल गांधी से लेकर करमरेड करात तक ने इस नई राजनीति से सबक सीखने की बात की है। हमें राहुल गांधी से कुछ नहीं कहना है। कामरेड करात कहीं असका असली सबक न सीख लें, यह चिंता होती है। वह सबक है - नवउदारवाद विरोध की राजनीति नहीं चलनी है, लिहाजा, वह करनी भी नहीं चाहिए।
दिल्ली के चुनाव में ‘आप’ नेताओं के धन के लेन-देन संबंधी स्टिंग आॅपरेशन की सच्चाई शक के दायरे में हो सकती है, लेकिन वाम, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मानी जाने वाली समझ का ‘स्टिंग आॅपरेशन’ शक के परे है।यह थोड़ा अजीब है कि सीपीआई और सीपीएम के मुकाबले सीपीआई (एमएल) के सदस्य@समर्थक ‘आप’ की प्रशंसा और जीत के जश्न में ज्यादा बढ़-चढ़ कर बोल रहे हैं। उनमें से एक साथी ने हमसे कहा कि ‘आप’ को उम्मीदवार मिलने में कठिनाई हो रही थी। वामपंथी पार्टियों को अपने उम्मीदवार ‘आप’ के उम्मीदवार बनाने चाहिए थे। हम उनकी बात सुन कर स्तब्ध रह गए। आगे यह नहीं पूछा कि वाम पार्टियों के उम्मीदवारों को सीधे ‘आप’ के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहिए था या गठबंधन बना कर? और, क्या ‘आप’ की तरफ से वैसा कोई प्रस्ताव उनके पास आया था?
सामान्य नागरिक समाज कारपोरेट पूंजीवाद के डिजाइन को नहीं समझ पाता और उसके पक्ष में स्ट्रेटेजी बनाने वालों की मंशा को भी। दिन-रात दो जून की रोटी और बच्चों की शिक्षा नौकरी के लिए हलकान आबादी तो भला क्या समझ पाएगी। नागरिक समाज में जो सीधे कारपोरेट पूंजीवाद के समर्थक हैं उनका कारपोरेट राजनीति के साथ होना स्वाभाविक है। लेकिन अपने को राजनीतिक समझ से लैस मानने वाले परिवर्तन की राजनीति के पक्षधर बुद्धिजीवी और राजनीतिक-सामाजिक नेता-कार्यकर्ता भी ‘आप’ को  विकल्प मान रहे हैं। हमने कहा था कि दिल्ली में कांग्रेस या बीजेपी की सरकार बनेगी। इस चुनावी नतीजे से हम अपनी गलतफहमी दूर करते हैं। हमने ऐसा केवल इसलिए नहीं कहा था कि दिल्ली में ये दोनों दावेदार पार्टियां हैं, बल्कि यह सोच कर कहा था कि कारपोरेट कपट के जाल को दिल्ली में बैठे समाजवादी तथा धर्मनिरपेक्ष सोच और पृष्ठभूमि के लोग कारपोरेट कपट के जाल को जरूर काट देंगे। उसका फायदा समाजवाद की पक्षधर पार्टियों और कथनी में पूंजीवाद का विरोध करने वाली बसपा-सपा जैसी सामाजिक न्याय की पक्षधर पार्टियों को मिल सकेगा। जाहिर है, फिर भी सरकार कांग्रेस या भाजपा की ही बनती, लेकिन नवउदारवाद विरोध की राजनीति की जगह भी बढ़ती।
‘आप’ के रणनीतिकार खुश हो सकते हैं कि उन्होंने राजनीति और संस्कृति का केंद्र मानी जाने वाली दिल्ली में वहां के प्रबुद्ध नागरिक समाज को पूरी तरह अपने पक्ष में लामबंद करके विजय हासिल की है। हम आगे देखेंगे कि जो भाजपा के साथ रहे, वे ‘आप’ के साथ भी थे और जो सीधे ‘आप’ के साथ थे, वे भाजपा के साथ भी हैं। ‘बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास@किराए के विचारों का उद्भास’ और ‘रक्तपायी वर्ग के साथ नाभिनाल-बद्ध से सब लोग’ - मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ के काव्यनायक की इन पंक्तियों को दिल्ली के विद्वत व सुसंस्कृत समाज ने निर्णायक रूप से चरितार्थ किया है। उसने दिखा दिखा दिया है कि समाजवाद में उसका विश्वास दिखावे का और सामान्य मध्यवर्ग के साथ जुड़ा स्वार्थ असली है।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान ही उसने अपना वर्गस्वार्थी चरित्र प्रकट कर दिया था। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की हमने सतत समानांतर समीक्षा की है। उसमें हमने यह बताया कि भारत के नागरिक समाज ने अपने वर्ग-स्वार्थ से परिचालित होकर उसे और मजबूत करने के लिए यह आंदोलन खड़ा किया। साथ ही नवउदारवादी नीतियों के दुष्परिणाम स्वरूप तबाही का शिकार होने वाली मेहनतकश जनता को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने की स्ट्रेटेजी के तहत आम आदमी पार्टी बनाई गई। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में उसकी स्ट्रेटी को काफी हद तक सफलता मिली है। दिल्ली में उसकी जीत का जश्न दरअसल भारत के ‘महान’ मध्यवर्ग के वर्ग-स्वार्थ की जीत का जश्न है। यह स्वार्थ केवल आर्थिक और सामाजिक मजबूती का ही नहीं है, अपने को ईमानदार और नैतिक जताने का भी है। उसे ‘शुचिता’, ‘ईमानदारी’, और ‘नैतिकता’ का ऐसा ‘फील गुड’ हुआ है कि ‘आप’ सुप्रीमो केजरीवाल और उसने जो भानुमति का कुनबा जोड़ा है, उसके बारे में जरा भी आलोचना सुनने को तैयार नहीं है।
किसी आंदोलन की एक खासियत यह होती है कि उससे समाज का नैतिक स्तर कितना ऊपर उठा है। आपके पास कोई ज्यादा वाजिब कसौटी हो तो जरूर बताएं, हमारी कसौटी है कि इस आंदोलन, जिसे राजनीति का विरोधी और समाज की शक्ति का द्योतक कहा गया, से कम से कम नागरिक समाज की सामाजिकता पुष्ट होती। यानी समाज का संपन्न तबका विपन्नों के बारे में विचार और संवेदना से कुछ जुड़ता। वह पूरे आंदोलन को विपन्नता पैदा करने वाले उस नवसाम्राज्यवाद की ओर मोड़ देता, जिसके खिलाफ पिछले 25 सालों से हमारे दौर की कई बेहतरीन शख्सियतें संघर्षरत रही हैं। इस संघर्ष में उन्होंने एक तरह से अपनी आहुति दी है। हम बहुत ही स्पष्टता से कहना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने नागरिक समाज के पिछले दो दशकों में गिरते नैतिक स्तर को और नीचे गिराया है। बल्कि जिनका कुछ न कुछ ईमान बना हुआ था, वे भी एकबारगी उसमें बह गए।
‘आप’ की जीत के जश्न में ऐसा जताया जा रहा है कि भ्रष्ट नेताओं और राजनीति का इस घोर ईमानदार और नैतिक नागरिक समाज से कोई वास्ता नहीं है। उसकी पैदाइश और मजबूती में उसकी कोई भूमिका नहीं है। जैसे भ्रष्टाचार कोई ऊपरी बला है, वैसे ही भ्रष्ट नेता और राजनीति कहीं ऊपर से आन टपके हैं! ध्यान दीजिए, कल तक मनमोहन सिंह इनके लिए ईमानदारी के पुतले थे और सोनिया गांधी बहुतों के लिए त्याग की देवी। नब्बे के दशक के शुरू में लागू की गईं नई आर्थिक नीतियां भ्रष्टाचार का स्रोत ही नहीं बनने वाली थीं, अपने में खुला भ्रष्टाचार थीं। इसी नागरिक समाज ने न केवल मनमोहन सिंह जैसे गैर-राजनीतिक व्यक्ति और विश्व बैंक के नौकरशाह को 1991 में सिर-आंखों पर बिठाया, दो बार देश का प्रधानमंत्री भी बनाया। तब मनमोहन सिंह और कांग्रेस बुरे नहीं थे क्योंकि वेतन-भत्ते खूब बढ़ रहे थे, बेटा-बेटी विदेशों में पढ़ने और बड़े पैकेज पर नौकरियां करने जा रहे थे, बैठे ठाले देश-दुनिया घूमने के लिए एनजीओ बनाए रहे थे, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को बिगाड़ा जा रहा था, वल्र्ड सोशल फोरम जैसे अंतराष्ट्रीय मजमे लगाए जा रहे थे। उस समय जो दिन-रात नागरिक समाज और पुलिस की प्रताड़नाएं सह कर नवसाम्राज्यवादी हमले का मुकाबला कर रहे थे, उन पर निर्लज्जतापूर्वक अव्यावहारिक, आदर्शवादी, असफल यहां तक कि देशद्रोही होने की तोहमत लगा रहे थे! एक के बाद एक घोटालों के बावजूद मनमोहन सिंह और कांग्रेस की नवउदारवादी नीतियों को बिना विराम दिए चलाने की हिम्मत के पीछे इसी ‘पाक दामन’ नागरिक समाज का बल रहा है, जो आज कांग्रेस को भ्रष्टाचार के लिए पानी पी-पी कर कोस रहा है।   
कारपोरेट राजनीति की नई बानगी का नयापन यही है कि उसने कारपोरेट लूट का शिकार जनता की सीधी स्वीकृति लेने का जाल बुन कर उस पर फेंका है। कारपोरेट और नागरिक समाज की मिलीभगत से जो कपटजाल तैयार किया गया, उसमें दिल्ली की झुग्गी-झोंपड़ियों और गंदी बस्तियों में रहने वाली अधपेट, कुपोषित, अशिक्षित मेहनतकश जनता फंस गई तो उसे दोष नहीं दिया जा सकता। बल्कि उसे अभी और फंसना है। ‘आप’ के स्ट्रेटेजिस्ट जाल को पूरे देश पर फैलाने की मुहिम में लग गए हैं। वे वहां भी पहुंचेंगे जहां कारपोरेट की लूट के खिलाफ विस्थापन, उत्पीड़न, हत्याओं और आत्महत्या के बावजूद लोग सीधा लोहा ले रहे हैं। हालांकि अब उनके साथ जुटने वाले लोगों में से कुछ साथ नहीं रह जाएंगे। वे ‘आप’ के एजेंट बनने को तैयार हो गए हैं।
मान लिया कि व्यवस्था परिवर्तन न हो सकता है, न उसकी राजनीति चल सकती है। यह लक्ष्य लेकर चलने वाली राजनीति परास्त होने के लिए अभिशप्त है। शुचिता, ईमानदारी और नैतिकता से लबालब कारपोरेट क्रांति के सिपाहियों से दिल्ली में बहुत छोटी-सी बात हम कहना चाहते हैं। वह उतनी बड़ी भी नहीं है, जितनी हमने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान कही थी कि कारपोरेट घरानों से लेकर नागरिक समाज तक जितने लोग भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के साथ जुटे हैं, वे खुद भ्रष्टाचार करना छोड़ दें तो देश की गरीब जनता को बहुत हद तक राहत मिल जाएगी। दिल्ली में गरीबों ने मंहगाई से राहत के वादे पर वोट दिया। कांग्रेस के पराजय का यही एक तात्कालिक कारण बना।
दिल्ली के ईमानदार ‘आप’ के समर्थक नागरिक समाज से हमारा बस इतना निवेदन है कि वे अपने यहां काम वाली, दूध वाले, धोबी, पलंबर, बिजली वाले, सब्जी वाले के श्रम के दाम थोड़े बढ़ा दें। अब ‘स्वराज’ आ ही गया है या आने वाला है तो उन्हें कुर्सी-सोफा पर बिठा कर अपने कप में चाय पिलाना शुरू कर दें, जब घर में जन्मदिन या कोई और उत्सव हो तो कम से कम उनके बच्चों को अपने साथ ही केक-खाना दे दें। दिहाड़ी पर काम करने वाले मिस्त्रियों-मजदूरों का थोड़ा नैतिक साहस बढ़ाने के लिए उन्हें यह कहना छोड़ दें कि उन्होंने लूट मचा रखी है, दिहाड़ी ज्यादा लेते हैं और काम कुछ नहीं करके देते।
ईमानदारी और नैतिकता का जैसा जोश दिखाया जा रहा है उससे उत्साहित होकर कुछ और भी पहल करने की फरमाइश भी की जा सकती है, जिससे गरीबों-बेरोजगारों को राहत मिलेगी। भ्रष्ट और बेईमान कांग्रेस सरकार ने सातवें वेतन आयोग की जो घोषणा की है या बीच-बीच में जो डीए-टीए घोषित किए हैं, उनका विरोध कर दें। सातवें वेतन आयोग की घोषणा को वापस लेने के लिए सरकार पर दबाव डालें। नहीं लेती है तो आंदोलन करें। क्योंकि आंदोलन करने में उन्हें महारत हासिल है।
ये लोग ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे। दिल्ली में ‘आप’ की सरकार के बावजूद गरीबों के लिए मंहगाई की समस्या रहनी है। मनमोहन सिंह का यह सार्वभौम और शाश्वत सत्य स्थापित हो जाएगा कि मंहगाई को तो रहना ही है। इसे मंहगाई पर मोहर का चुनाव कह सकते हैं, जो मनमोहन सिंह के बच्चों ने लगाई है। मंहगाई रहेगी तो ऊपरी कमाई करनी ही होगी। यानी भ्रष्टाचार पर भी मोहर। जाहिर है, ऊपरी कमाई झुग्गी-झोंपड़ी वाले तो कर नहीं सकते। वही करेंगे जो तीन बार कांग्रेस का समर्थन कर चुके हैं। इस बार भी विकास पर उसकी राय कांग्रेस के पक्ष में थी। लेकिन उन्हें लगा अगर इस विकास के साथ बिजली-पानी मुफ्त मिल जाए तो क्या बुराई है?
‘आप’ द्वारा जुटाए गए कोष की पारदर्शिता की बड़ी बातें की गई हैं, गोया बाकी पार्टियां अपना हिसाब नहीं देती हों। यह भी तो कहा जा सकता है कि जो 20 करोड़ रुपया, जिसका एक-तिहाई विदेशों से आया है, दिखाया गया है वह दिखाने के दांत हैं। दिखाया इसलिए गया है कि विदेशी धन बैंक की मार्फत ही आ सकता है। उसे छिपाया नहीं जा सकता। दिल्ली की सभी 70 सीटों के 1483 वर्गकिलोमीटर के एरिया के लिए 20 करोड़ जुटाए तो पूरे देश के लिए कितना जुटाना होगा, इसका कुछ हिसाब अनुराग मोदी ने अपने एक लेख में दिया है। विदेश में बैठे लोगों ने न केवल धन दिया, चुनाव क्षेत्रों को गोद लिया, उम्मीदवारों को जिताने की स्ट्रेटेजी बनाई, मतदाताओं को फोन किए। उनका क्या मकसद हो सकता है? सिवाय इसके कि जिस व्यवस्था ने उन्हें देश और विदेश में प्रिविलेज्ड हैसियत में पहुचाया है, उस पर आंच नहीं आए!
‘आप’ के नेता जहां शुरू से अंत तक कपट-क्रीड़ा में लिप्त हैं, नवउदारवाद के सवाल पर कांग्रेस ने कभी कपट नहीं किया। कुछ दिनों तक मनमोहन सिंह ने उसे मानवीय चेहरा प्रदान करने की गफलत भरी बातें जरूर कीं, लेकिन जल्दी ही उन्होंने कह दिया कि नवउदारवादी विकास में मंहगाई से लेकर भ्रष्टाचार तक और विस्थापन से लेकर आत्महत्याओं तक सब चलेगा। आज ईमानदार और नैतिक बने नागरिक समाज ने उनका समर्थन किया। कांग्रेसी यह भी साफ कहते हैं कि वे नेहरू परिवार की पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि उसी वजह से पार्टी में एकता रहती है। भाजपा सांप्रदायिकता के मामले में जो भी छल-कपट करती हो, नवउदारवाद के एजेंट की भूमिका में पूरी तरह पारदर्शी और ईमानदार है। आरएसएस ने ‘स्वदेशी’ का राग अलापना छोड़ दिया है। मोदी के नेतृत्व में, जो कहते हैं भारत में पांच सौ बड़े शहर बना दिए जाएं तो सारी समस्याएं हल हो जाएंगी, नवउदारवाद कांग्रेसी राज से ज्यादा तेजी से चलेगा। ‘आप’ और उसका नेता सीधे कारपोरेट का उत्पाद हैं, इसलिए ज्यादा ईमानदारी से नवउदारवाद का काम करेंगे; अमेरिका को भ्रष्टाचार रहित नवउदारवाद का दान ये लोग ही दे सकते हैं - इस सच्चाई को छिपाना नहीं चाहिए।
केजरीवाल की ईमानदारी का बाजार भाव कुछ ज्यादा ही बढ़ा हुआ है। उनके गुरु अण्णा ने कहा कि आंदोलन के दौरान मिले धन का हिसाब नहीं दिया गया है तो केजरीवाल ने जवाब देने के बजाय कहा कि जीवन में उन्होंने ईमानदारी के अलावा कुछ नहीं कमाया है। नागरिक समाज यह भावना भावित उद्गार सुन कर भाव विह्वल हो गया और कल तक ईमानदारी और नैतिकता के प्रतीक अण्णा के खिलाफ केजरीवाल के साथ एकजुट हो गया। आंदोलन के दौरान जब सूचना आई कि केजरीवाल सरकारी खर्चे पर विदेश गए थे। लौटने के बाद उन्हें नियमतः तीन साल नौकरी करनी थी। वरना 9 लाख रुपया जमा कराना था। उन्होंने उन्हीं के शब्दों में ‘करोड़ों कमाने का मौका प्रदान करने वाली नौकरी’ और करोड़ों का चंदा दिलाने वाली एनजीओ ‘पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन’ की मार्फत ‘देशसेवा’ का काम पूरा करके सीधे राजनीति की मार्फत वह काम करने के लिए नौकरी से इस्तीफा दिया। लेकिन देय राशि नहीं लौटाई। आंदोलन के दौरान यह बात सामने आई तो नागरिक समाज को उसमें कांग्रेस का ‘हाथ’ नजर आ गया। उनके विभाग के साथियों ने पत्र लिख कर केजरीवाल की गलत और बचकाना बयानबाजी पर एतराज जताया। नागरिक समाज को शायद वह चिठ्ठी भी कांग्रेसी हाथ से लिखी नजर आई! ‘आप’ के तीन प्रमुख सदस्यों प्रशांत भूषण, मयंक गांधी, अंजलि दमनिया, पर संपत्ति संबंधी भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो जांच के लिए खुद पार्टी नेता ने ‘आंतरिक लोकपाल’ की नियुक्ति कर दी। शायद अंतरात्मा की आवाज पर! उस ‘स्वराजी’ जांच मेंं क्या निकला, आज तक पता नहीं चला है। ईमानदारों ने उन आरोपों को भी भ्रष्ट कांग्रेस की करतूत माना होगा। ‘आप’ से टूट कर बनी ‘बाप’ के कार्यकर्ता परचा निकाल कर अरविंद केजरीवाल के धोखों और बेईमानियों की ‘कहानी’ बताते घूमते हैं, लेकिन नागरिक समाज ने उधर कान देना मुनासिब नहीं समझा। ईमानदारों पर झूठे आरोप लगाने वाले असंतुष्ट तत्व कहां नहीं होते, जरूर उन्हें कांग्रेस ने उकसाया होगा, जैसे दिल्ली चुनाव के दौरान ‘आप’ नेताओं के धन के लेन-देन का स्टिंग आॅपरेशन करवा दिया!
दरअसल, मनमोहन सिंह के ये बच्चे यह सब अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। नवसाम्राज्यवाद के पुरोधा अमेरिकी प्रतिष्ठान की संस्थाओं से लेकर अप्रवासी भारतीयों और देश के कारपोरेट घरानों से धन लेने में उन्हें वाकई कोई नैतिक बाधा नहीं होती है। इस मामले में वे कानून को भी कुछ नहीं मानते हैं। नैतिकता और कानून को लेकर बैठेंगे तो देश का काम कैसे करेंगे? लोगों को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए कि वे अपने सौ काम छोड़ कर देश का काम करते हैं! ईमानदारी का अर्थ है नेता और सरकारें ईमानदारी से कारपोरेट का काम करें। ‘कारपोरेट ही सरकार हैं’, नवसाम्राज्यवाद के इस सूत्र को भारत और विदेशों में बसे मध्यवर्ग से पहले से ज्यादा व्यापक और पुख्ता स्वीकृति मिली है। इस पर कारपोरेट घरानों की भूमिका और खुशी स्वाभाविक है।
नागरिक समाज को ये बेईमानियां इसलिए बुरी नहीं लगतीं क्योंकि वह पूरा कैरियर यह करता रहा है। ऐसा नहीं करने वालों को वह पहले भी पागल करार देता था अब भी देता है। भारत माता की छाती पर जो भ्रष्टाचार का पहाड़ खड़ा हुआ है, वह इन्हीं बेईमानियों के सहारे खड़ा है। जो धन देता है वह अपना हित साधता है। अभी तक देश का यह कानून है कि चुनाव के लिए विदेशी धन नहीं लिया जा सकता। उस कानून में ऐसा प्रावधान नहीं है कि बाहर बसे भारतीयों या भारत में कारोबार करने वाली विदेशी कपनियों से धन लिया जा सकता है। इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने जनहित याचिका स्वीकार की। हमने खुद चुनाव आयोग को कांग्रेस, भाजपा और ‘आप’ को विदेशी स्रोत से मिले चुनावी चंदे की चुनाव के पूर्व जांच कराने का विस्तृत प्रतिवेदन दिया। नागरिक समाज या मीडिया ने उसका नोटिस लेना मुनासिब नहीं समझा। अलबत्ता गृह मंत्रालय ने जांच के आदेश जारी किए, जिसके बारे में अभी तक कोई जानकारी हासिल नहीं हुई है। बहरहाल, आगे काफी समय तक यह नागरिक समाज ‘आप’ बेईमानियों का ही नहीं, संविधान और कानून विरोधी कदमों का भी बचाव करेगा।   
हमारे एक मित्र ने हमें सलाह दी कि ‘आप’ ने सादगी से शासन चलाने की जो घोषणाएं की हैं, वे स्वागत योग्य हैं। कारपोरेट पूंजीवाद सादगी से चल सकता है, यह बड़ी मौलिक और रोचक कल्पना है! भारत में और भी ज्यादा, जहां पूंजीवाद में सामंतवाद नेहरू जी के जमाने से ही घुस कर बैठा हुआ है। चुनाव में घोषित 20 करोड़ रुपया खर्च करके दिल्ली में ‘आप’ की सरकार बनने जा रही है। शपथ ग्रहण समारोह के लिए रामलीला मैदान में इंतजाम किया जा रहा है। सारा अमला वहां लगेगा। इस कवायद में अतिरिक्त खर्चा होना ही है। यह एक बानगी है। देश में ऐसे कई नेता हुए हैं जिन्होंने नौटंकी के लिए नहीं, वास्तविकता में सादगी का निर्वाह किया। वे लोग एक छोटे राज्य में चुनाव के लिए 20 करोड़ रुपया बटोरने और खर्चने की बात सोच भी नहीं सकते थे। ‘आप’ ने शुचिता, ईमानदारी, नैतिकता की तरह सादगी को भी नया अर्थ दे दिया है!  
राजनीति की इस नई चाल से गरीबों के लिए संघर्ष करने की राजनीति खत्म होती चली जाएगी। कांग्रेस फिर उठ खड़ी होगी। भाजपा बढ़ती पर है ही। क्षेत्रीय पार्टियां भी आसानी से अपनी जमीन छोड़ने वाली नहीं हैं। जाति और क्षेत्र को आधार बना कर मजबूत हुईं पार्टियां भी हटने वाली नहीं हैं। क्योंकि ये सब कमोबेश नवउदारवाद की समर्थक हैं। तो नुकसान उन्हीं पार्टियों को पहुंचाने की कोशिश है जो नवउदारवाद विरोधी हैं। राजनीति धन और भीड़ इक्ठ्ठा करने से चलती, विचारधारा और संघर्ष से नहीं, यह संदेश इन लोगों ने दिया है। आजादी के संघर्ष के दौर से ही अनेक लोग और संगठन सामाजिक स्तर पर काम करने वाले रहे हैं। उन्हें दोहरा धक्का लगा है। एक तो लोग उन्हें शक की निगाह से देखेंगे कि ‘आप’ वाले भी पहले राजनीति को बुरा बताते थे, बल्कि सारी  समस्याओं की जड़ मानते थे, और फिर खुद राजनीति करने लगे। तो ये लोग भी अपनी राजनीतिक जमीन बना रहे हैं। दूसरा यह कि उनके काम को निरर्थक बताया जाएगा। ऐसे साथी चाहे तो गांधी से सीख सकते हैं जिन्होंने सक्रिय राजनीति के भीतर ही रचनात्मक काम की जगह निकाली थी।
गांधी की बात चली है तो चर्चा को थोड़ा और बढ़ाया जा सकता है। कपट का जाल में बड़ी कही जाने वाली विभूतियों को भी फांसा गया है। गांधी उनमें से एक हैं। गांधी को कांग्रेस ने अपने मतलब से आॅल परपज बनाया हुआ है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में गांधी को कारपोरेट हित में आॅल परपज बना दिया गया है। लोहिया और बाबा साहब को कारपोरेट के हमाम में खींचने की कोशिशें लगातार हो रही हैं। आपको याद होगा जब ‘गांधी’ कुछ ज्यादा हो गया तो कुछ लोगों ने अण्णा हजारे से डॉ. अंबेडकर का नाम लिवाया था। अब सुना है कुछ लोग केजरीवाल से उनका नाम लिवा रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले लोगों को अपनी मान्यताओं का खुद जिम्मेदार होना चाहिए। किसी चिंतक के विचार आप नहीं मानते हैं तो झूठा नाम लेकर उनका अपमान करने का किसी को अधिकार नहीं है। खास कर तब जग आप आने को दूसरों को भ्रष्ट व अनैतिक और अपने को ईमानदार और नैतिक जता रहे हों। सभी जानते हैं केजरीवाल आरक्षण के विरोधी है। मंडल कमीशन की सिफारिशों के विरोध में भड़के आंदोलन से लेकर यूथ फॉर इक्वेलिटी तक उनकी भूमिका देखी जा सकती है। दिल्ली में सरकार बनाने के मामले में उनका बर्ताव संसदीय लोकतंत्र की अवहेलना करने वाला है। कारपोरेट सहित सांप्रदायिक तत्वों से सांठ-गांठ करने में कोई गुरेज नहीं है। तब बाबा साहब का नाम लेने की क्या जरूरत है?
अनुसूचित जाति@जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ और जस्टिस पार्टी के अध्यक्ष उदितराज ने दिल्ली में 16 दिसंबर 2013 को आयोजित रैली में केजरीवाल को आरक्षण पर अपना पक्ष रखने के लिए बुलावा दिया। एक विद्वान नेता के रूप में पहचान रखने वाले उदितराज पिछले करीब डेढ़ दशक से राजनीति में सक्रिय हैं। वे शुरू से ही नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के भी विरोधी रहे हैं, जिनका आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों के साथ विरोध है। यह हैरानी की बात है कि उदितराज को अभी तक अरविंद केजरीवाल का आरक्षण पर पक्ष पता नहीं है। यह आम जानकारी की बात है कि केजरीवाल और उनके सिपहसालार मनीष सिसोदिया आरक्षण विरोधी, दक्षिणपंथी और सवर्णवादी हैं। इसके प्रमाणस्वरूप इन दोनों लोगों के एनजीओ, इनके द्वारा बनाई ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की टीम और अब आम आदमी पार्टी के भागीदारों, विचारों और गतिविधियों को देखा जा सकता है। 2006 में केंद्रीय विश्वविद्यालयों, आईआईटी, मेडिकल कॉलिज और प्रबंधन संस्थानों में पिछड़ा वर्ग के छात्रों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के सरकार के फैसले का विरोध करने के लिए बने संगठन ‘यूथ फॉर इक्वेलिटी’ के गठन, फंडिंग और नेतृत्व में इन दोनों की संलिप्तता जगजाहिर है। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने पर फैली आरक्षण विरोधी आग के दौरान उनका क्या पक्ष था, यह पता लगाया जाना चाहिए।
उदितराज कारपोरेट पूंजीवाद के चरित्र की गहरी परख रखते हैं। केजरीवाल और उनकी पार्टी कारपोरेट पूंजीवाद की सीधी उपज हैं और कारपोरेट पूंजीवाद में आरक्षण का सिद्धांत मान्य नहीं होता। केजरीवाल पिछड़ा वर्ग के ही नहीं, दलित वर्ग के आरक्षण के भी विरोधी हैं। उन्हें कारपोरेट घरानों और देश-विदेश के अगड़े सवर्णों का आर्थिक और राजनीतिक समर्थन इसीलिए मिला है। उस समर्थन के बल पर वे सत्ता के लालची कुछ दलितों और पिछड़ों को साथ लेकर कारपोरेट और सवर्ण हितों की राजनीति करना चाहते हैं। बाबा साहेब अंबेडकर के शब्दों में यह ‘राजनीतिक डाकाजनी’ है। रैली में केजरीवाल आए नहीं। आते तो हो सकता है एससी-एसटी के आरक्षण का समर्थन कर देते। लेकिन वह उनका राजनीतिक पैंतरा भर होता। सांप्रदायिक राजनीति के रास्ते एक हद तक चुनावी कामयाबी हासिल करके नरेंद्र मोदी भी अपने को आगे चल कर धर्मनिरपेक्ष नेता बता सकते हैं। अटलबिहारी वाजपेयी और अडवाणी पहले यह कर चुके हैं।
25 साल बाद निर्णायक रूप से कह सकते हैं कि नवउदारवाद महज आर्थिक परिघटना नहीं है। उसने आर्थिक संसाधनों और श्रम पर ही कब्जा नहीं जमाया है, राजनीति के साथ विचार-शक्ति और अनुसंधान-शक्ति को भी अपनी गिरफ्त में लिया है। बल्कि कह सकते हैं कि कुदरती जीवनी-शक्ति और मानवीय जिजीविषा पर भी उसका कब्जा होता जा रहा है। तीसरी दुनिया के संदर्भ में नवउदारीकरण का यह विशिष्ट नवसाम्राजयवादी पहलू है, जिसके चलते उसके मुकाबले में न राजनीतिक नेतृत्व खड़ा हो पाता है, न बौद्धिक। 
समाजवादियों की नई शादी
जिन समाजवादियों ने (वाया अन्ना-रामदेव) केजरीवाल की चूड़ियां पहनी हैं, यह उनका पहला वरण नहीं है। वे भ्रष्ट किंतु सफल समाजवादियों से लेकर ईमानदार किंतु असफल समाजवादियों तक, और कांग्रेस से लेकर भाजपा तक सत्तर घाटों का पानी पी चुके हैं। दिल्ली में हमने देखा है समाजवादी पार्टी के खाते की एक राज्यसभा सीट खाली होने पर खाली बैठे कई समाजवादी सक्रिय हो जाते हैं। सुनते है सामंती दौर में बूढ़ी होती रानियां इस डर से कि उनके रनिवास वृद्धा-आश्रम न बन जाएं, अपने कुल की युवतियों को रानी-सुख भोगने का लालच देकर राजा से शादी करा देती थीं। रनिवास पर कब्जा राजा पर कब्जा होता था। जिसका राजा पर कब्जा वही पटरानी। केजरीवाल की नजरों में चढ़े रहने के लिए बुढ़ाते समाजवादी एक तरफ दिन-रात मेहनत करके दिखाने में लगे हैं कि वे थके नहीं हैं; दूसरी तरफ समाजवादी युवाओं को केजरीवाल की ‘रानी’ बनाने का झांसा देकर फांसने में लगे हैं। उन्हें फुसलाते हैं उनके साथ आने पर सम्मान मिलेगा और सत्ता भी। अपना सम्मान गंवा चुके लोग दूसरों को सम्मान की गारंटी दे रहे हैं!
दिल्ली की जीत और सरकार बनने की संभावना के बाद कई समाजवादी वृद्धात्माएं युवाओं को पीछे धकेल कर आगे आने की धक्का-मुक्की कर रही हैं। कहते हैं आत्मा कभी बूढ़ी नहीं होती। अपने संघर्ष और अनुभव का वास्ता देते हैं कि केजरीवाल को समाजवादी बनाने में उनकी विशेषज्ञता सबसे ज्यादा काम आएगी। समाजवाद का कुछ ज्यादा ही दम भरने वाले एक पुराने समाजवादी ने बड़े नखरे के साथ केजरीवाल की चूड़ियां पहनी हैं। उन्हें सावधानी बरतनी चाहिए। बूढ़ी रानियों का नखरा ज्यादा नहीं सहा जाता है। हमें डर है सारे समाजवादी उधर टूट पड़े तो राशनिंग करनी पड़ेगी। कंप्युटर में लिस्ट बनेगी, टोपी देकर कहा जाएगा आप ‘वार रूम’ की उस खिड़की पर जाइए, अपना बायोडाटा लिखाइए, पहले आने वाले पहले पाएंगे, आते रहिए, टोपी उतारनी नहीं है, कुछ ज्यादा ले जाइए, घर वालों को भी पहनाइए! ये वही समाजवादी हैं जिनमें कोई कहता था ‘समाजवादियों पर किसी की सत्ता का रौब गालिब नहीं होता’ और कोई अपने को परम पवित्र समाजवादी मान कर दूसरों को हिकारत की नजर से देखते थे।
कारपोरेट पूंजीवाद की विचारधारा उत्तर आधुनिकता में इतिहास के अंत की काफी पहले घोषणा हो चुकी है। अब अकेला पूंजीवादी इतिहास ही नए-नए रूपों में नई देहरियां पार करता हुआ आगे बढ़ता है। एक साथी को ‘आप’ की जीत में इतिहास की ऐसी ही नई देहरी दिखाई दी है जिस पर खड़े होकर उन्होंने इस ‘नवेली’ राजनीति को ‘पालागन’ किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने नवेली के संभावनाओं से भरपूर गर्भ में भी झांक कर देख लिया है। बेहतर होता वे उस गर्भ पर भी नजर डाल लेते जिससे यह पार्टी पैदा हुई है। तब शायद उन्हें पता चलता कि नवउदारवाद की कोख से पैदा और उसीकी दाइयों द्वारा पोषित पार्टी में नवउदारवाद के खात्मे की नहीं, मजबूती की पूरी संभावनाएं निहित हैं।
एक अन्य समाजवादी साथी ने हमारे लेख ‘कारपोरेट राजनीति की नई बानगी’ पर हमें पत्र लिखा। उस पत्र में उन्होंने एक अजीब बात लिखी कि जिस पत्रिका (समयांतर, अक्तूबर 2013) में लेख छपा है, वह लोहियावादी नहीं है। हालांकि पत्र लेख का अंग्रेजी संस्करण (मेनस्ट्रीम, 9 नवंबर 2013) आने के बाद लिखा गया है। हम ‘मेनस्ट्रीम’ के संपादक सुमित चक्रवर्ती जी का लेख प्रकाशित करने के लिए हृदय से आभार व्यक्त करते हैं। वरना कुछ ‘बदनाम’ हिंदी पत्रिकाओं के अलावा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उस पार्टी, जिसके लिए वह आंदोलन खड़ा किया गया था, की समीक्षा करने वाला लेख कहीं भी छप नहीं सकता। जाहिर है, साथी ने हिंदी में लिखे लेख का नोटिस लेना मुनासिब नहीं समझा। उसी तरह जैसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, उसकी टीम और अंत में बनाई गई राजनीतिक पार्टी के बारे में हिंदी में लिखे हमारे कई लेखों का नोटिस उन्होंने नहीं लिया जो ‘युवा संवाद’ में छपते रहे हैं। ‘युवा संवाद’ को लोहिया-विरोधी पत्रिका शायद ही कोई माने। नवउदारवादी दौर ने भारतीय भाषाओं को काफी पीछे धकेला है। ‘सामयिक वार्ता’ जैसी पत्रिका में एक साथी का लेख अंग्रेजी के पक्ष में छपा। उसका जवाब डॉ. मस्तराम कपूर ने दिया था। इस प्रकरण में हम आदरणीय साथी से इतना निवेदन करना चाहते हैं कि वे भले ‘लोकशक्ति’ पत्रिका में केजरीवाल के विचार-साक्षात्कार प्रकाशित करके उसे सच्ची लोहियावादी पत्रिका के रूप में प्रचारित-स्थापित करें; हमें लोहिया पर बहस करने लायक न समझें।
पत्र में यह भी लिखा था कि हम अगला लेख दिल्ली चुनाव के परिणाम आने के बाद लिखें। उन्हें इंतजार रहेगा। यानी जब पार्टी जीत कर आ जाएगी तब हम क्या कहेंगे? क्या कह पाएंगे? जीत सारी आलोचनाओं का मुंह बंद कर देती है। ‘आप’ की और भाजपा की जीत साझा है। कांग्रेस की हार कारपोरेट की हार नहीं है। मोदी ने इंग्लैंड और यूरोपियन यूनियन की हिमायत भी जीत ली है, कल को अमेरिका की हिमायत भी जीत ली जाएगी। तो क्या मोदी का समर्थन कर देना चाहिए? क्या कांग्रेस की जीत पर उसका विरोध बंद कर देना चाहिए था? 
किशन पटनायक ने ‘गुलाम दिमाग का छेद’ शीर्षक से एक बहुचर्चित लेख लिखा है जिसमें भारतीय बुद्धिजीवियों की दिमागी गुलामी का विश्लेषण है। वे होते तो देख पाते कि समाजवादियों में दिमाग की जगह खाली छेद ही रह गया है। लगातार पराजयों के बीच राजनीतिक सरोकार और सक्रियता बनाए रखने के लिए जिजीविषा की जरूरत होती है। लोहिया लगातार हारते रहे। गरीब उनकी जिजीविषा का स्रोत थे। वे कहते थे कि मेरे लिए इतना बहुत है कि इस देश के गरीब लोग मुझे अपना आदमी मानते हैं। आज गरीबों के साथ कपट करके कारपोरेट का कारोबार बढ़ाने वाले नेता और पार्टी के साथ समाजवादी जुट गए हैं।
प्रायः सभी आंदोलनों और विचारधारात्मक समूहों में समय-समय पर विचलन होता है। विचलन सत्ता की फिसलन न मानी जाए, इसके लिए नेता उसे सैद्धांतिक अथवा रणनीतिक जामा पहनाने की कोशिश करते हैं। भारत की राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण है जिनकी अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग परिप्रेक्ष्य से व्याख्या करते हुए अक्सर मिसाल दी जाती है। समाजवादी जो कर रहे हैं वह विचलन नहीं, विचारधारात्मक व्यभिचार है। एक समय के महान आंदोलन की अभी तक की सबसे नीच टेªजेडी!
सांप्रदायिकता का सवाल और मुसलमानों की भूमिका
नवउदारवादी व्यवस्था आगे बढ़ेगी तो सांप्रदायिकता भी आगे बढ़ेगी, उपनिवेशवादी दौर से यह सबक मिला हमें मिला है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की अपनी समीक्षा (‘भ्रष्टाचार विरोध ः विभ्रम और यथार्थ’ शीर्षक से राजकमल प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य) में हमने यह विशेष जोर देकर और बार-बार कहा है कि नवउदारवाद, सांप्रदायिकता और सामाजिक न्याय-विरोध के घोल से तैयार भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सबसे पहले और सबसे ज्यादा आरएसएस को फला है। इस परिघटना पर पर्दा डालने की कोशिश केवल खांटी नवउदारवादी और मुख्यधारा मीडिया ही नहीं कर रहे हैं, खुद सेकुलर खेमे के बुद्धिजीवी भी कर रहे हैं। वे प्रचारित करने में लगे हैं कि इस आंदोलन के प्रणेता केजरीवाल ने नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ने से रोक दिया है। धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के इस प्रचार पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
मान लिया जाए कि जीतने वाला ही सिंकदर होता है और उसका गुणगान जैसे राजतंत्र में होता था, उसी तरह लोकतंत्र में भी किया जाना जरूरी है। चुनाव जीतना ही कसौटी है तो फिर भाजपा, जिसने तीन राज्यों में भ्रष्ट कांग्रेस को परास्त करके सरकार बनाई है और दिल्ली में सबसे ज्यादा सीटें लेकर पहले नंबर की पार्टी है, का स्वागत भी होना चाहिए। उसे भी दिल्ली की जनता ने ही यह मेंडेट दिया है। भाजपा के सांप्रदायिक होने का तर्क नहीं चलेगा। सांप्रदायिक होने के बावजूद वह उस पूरे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल थी, जिसने नागरिक समाज, खास कर धर्मनिरपेक्षतावादियों को नया ‘देवता’ प्रदान किया है। केजरीवाल ने आज तक नरेंद्र मोदी, उनके द्वारा गुजरात में तैयार की गई हिंदुत्व की प्रयोगशाला, फरवरी 2002 में मुसलमानों का राज्य-प्रायोजित नरसंहार, उसे छिपाने के लिए किए गए षड़यंत्रों और बहुप्रचारित विकास के गुजरात मॉडल पर कभी कुछ नहीं बोला है। अपने मुंह से यह भी नहीं कहा है कि वह मोदी को रोकने निकले हैं।
कल तक सोनिया के सेकुलर सिपाही बने लोग यह सब कह रहे हैं। गुजरात का तीसरा विधासभा चुनाव मोदी ने आसानी से जीत लिया। नरसंहार के समय से ही बहुत-से लोग और संगठन वहां पीड़ितों को न्याय दिलाने की जद्दोजहद में लगे हैं। देश बचाने का दिन-रात ढोल पीटने वाले केजरीवाल और उनके कारिंदे वहां एक शब्द नहीं बोले। उनके गुरु अण्णा हजारे और उनकी खुद की बाबरी मस्जिद ध्वंस के संविधान और सभ्यता विरोधी कृत्य पर कोई टिप्पणी कम से कम हमें नहीं मिलती। जगजाहिर है कि दिल्ली में झुग्गी-झोंपड़ी वालों को छोड़ कर भाजपा और ‘आप’ का साझा वोट बैंक था। उन्होंने साफ कहा है कि केजरीवाल के ऊपर वे मोदी को वोट देंगे। तो केजरीवाल उनके ‘छोटे मोदी’ हैं। जिस प्रशांत भूषण पर धर्मििनरपेक्षतावादी दम भरते हैं, उन्होंने सबसे पहले कहा कि ‘आप’ को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस से नहीं, भाजपा से मुद्दा आधारित समर्थन लेना चाहिए। मोदी का वीटो नहीं होता तो ‘आप’ के विधायक खुद ही भाजपा की सरकार बनवा देते। केजरीवाल को ‘छोटे गांधी’ का खिताब अता करने वाली किरण बेदी ने कहा है कि ‘आप’ और भाजपा की विचारधारा एक है। शांति भूषण और अडवाणी की जोड़ी पुरानी है जो ‘आप’ तक कायम है।
जैसे आधुनिकता और विज्ञान का साम्राज्यवादी पहलू होता है, वैसे ही साम्राज्यवादी आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी काम करता है। हिंदुत्ववादियों के साथ मोदी को केवल अंधविश्वासी, प्रतिक्रियावादी और राजनीतिक अवसरवादी तत्व ही बढ़ावा नहीं दे रहे हैं, आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का दावा करने वाले भी दे रहे हैं। थोड़ा गहराई से देखें तो केजरीवाल को मोदी की काट बताने वाले ये लोग मोदी को ही बढ़ावा दे रहे हैं।   मजेदारी यह है कि मोदी के मामले में इनकी आपस में लाइन तय नहीं हुई है। बात-बात में गांधी का नाम लेने वाले एक ‘आप’ समर्थक साथी को देश की विदेशों तक फैली युवा शक्ति की तरह ‘आप’ और केजरीवाल की मजबूती में नरेंद्र मोदी का रास्ता साफ होता नजर आता है। ‘आप’ के चुनाव प्रचार में शामिल होने वाले ये साथी खुल कर कहते हैं कि मोदी जैसा दमदार नेता और कोई नहीं है। मजबूरी की धर्मनिरपेक्षता के बोझ तले दबी उनकी विकास के गुजरात मॉडल की प्रशंसा अवसर पाकर फूट निकली है।
दूसरी ओर माक्र्सवादियों, समाजवादियों और नवउदारवादियों की लाइन है जो केजरीवाल को मोदी को रोकने वाला ‘अवतार’ बता रहे हैं। दरअसल, सांप्रदायिकता का साइड बिजनेस करके कोई दूसरा शख्स सोनिया@कांग्रेस की जगह लेता है तो उसका सेकुलर सिपाही बनना होगा। वरना देश के संसाधनों की बिकवाली से नागरिक समाज का जो चोखा धंधा चल रहा है, उसे अकेले संघी हड़प जाएंगे। आजकल बड़े शहरों के अधिकांश वाम, लोकतांत्रिक और सेकुलर बुद्धिजीवियों के लिए धर्मनिरपेक्षता का यही मायना रह गया है। हमने सोचा था कि कारपोरेट कपट में साथ देने वाले ये लोग कम से कम धर्मनिरपेक्षता जैसे संगीन  सवाल पर जनता के साथ धोखा नहीं करेंगे। लेकिन, मुक्तिबोध के काव्यनायक के शब्दों में ‘पूंजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता’!
सवाल है कि मोदी क्या एक नाम भर है? आरएसएस की कट्टर धारा किसी न किसी नेता में मूर्तिमान होती है। मोदी उसके सबसे बड़े प्रतिनिधि बन कर उभरे हैं। लेकिन इस कट्टर धारा के सार पर ध्यान देने की जरूरत है। वह वही है जो अभी लघु रूप में केजरीवाल में है। केजरीवाल के गुरु अण्णा हजारे ने पहली प्रशंसा मोदी की की थी। उनके आंदोलन के सहयोगी रामदेव ने मोदी को अपने आश्रम में बुला कर हिंदुओं का नेता घोषित किया। हमने चुनाव आयोग को पत्र लिख कर निवेदन किया था कि यह धर्म का राजनीति के लिए सीधे इस्तेमाल का मामला है, लिहाजा, इसकी जांच हो और रामदेव और नरेंद्र मोदी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो। धर्मनिरपेक्षता के इन झंडाबरदारों में से किसी ने साथ नहीं दिया। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के एक महत्वपूर्ण सदस्य चेतन भगत आरएसएस के मोदी के पक्ष में किए गए फैसले से काफी पहले से देश-विदेश में उनके प्रचार में जुटे थे। पूरा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन आरएसएस के इंतजाम में हुआ। प्रशांत भूषण को उनके चेंबर में घुस कर पीटने वालों और अफजल गुरु का शव मांगने दिल्ली आई कश्मीर घाटी की महिलाओं की मांग के पक्ष में प्रेसवार्ता को नहीं होने देने वालों की देशभक्ति आरएसएस मार्का थी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में जुटे ज्यादातर ‘आदर्शवादी’ युवा मोदी के भक्त हैं। आरएसएस केवल संघ की शाखाओं और कार्यालयों के रजिस्टरों में ही नहीं चलता। वह वर्गस्वार्थ में अंधे नागरिक समाज की रगों में भी चलता है। आपने देखा ही घुर वामपंथियों से लेकर जनांदोलनकारियों तक अण्णा-रामदेव के आंदोलन में कूद पड़े थे।
मजेदारी देखिए इंडिया अगेंस्ट करप्शन की टीम के अण्णा हजारे, किरण बेदी, रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, अग्निवेश जैसे ‘तत्वों’ से केजरीवाल को अलग निकाल लिया है। बाकियों की निंदा तथा केजरीवाल की प्रशंसा की जा रही है। हमारा कहना रहा है कि इंडिया अगेंस्ट करप्शन, कांग्रेस-भाजपा समेत ये सब एक ही टीम है। अण्णा हजारे तब बुरा नहीं था, जब उसने जंतर-मंतर से पहली प्रशंसा नरेंद्र मोदी की थी। केजरीवाल से चंदे का हिसाब मांग लिया तो बुरे बन गए। यह निश्चित रूप से धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य के लिए संकट का समय है। जो शख्स मोदी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलता, उसे मोदी की काट बताया जा रहा है। कुछ उत्साही धर्मनिरपेक्षतावादी केजरीवाल से मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का आह्वान तक कर रहे हैं।                         
इस कठिन दौर में मुस्लिम अवाम बड़ी भूमिका निभा सकता है। सांप्रदायिकता का जहर उस पर दोहरी मार करता है। दंगों में तबाही और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप नौजवानों में अतिवादी भटकाव। अंतर्राष्ट्रीय हालातों के चलते उनमें से कुछ आतंकवादी बन जाते हैं। सेकुलर खेमे की पार्टियां उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती हैं। उससे कुछ मुसलमानों को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी जरूर मिलती है, लेकिन बाकी समाज का अलगाव बढ़ता जाता है। हाल में हुए मुजफ्फर नगर दंगों के बाद वहां चल रहे राहत शिविर देखे जा सकते हैं। अलगावग्रस्त मुसलमान मुह देखी बातें करते हैं और कुछ भी खुल कर स्पष्ट नहीं कह पाते। सच्चर समिति की रपट ने यह बताया है कि यह अलगाव शिक्षा, रोजगार और व्यापार में उनकी बहुत कम हिस्सेदारी के चलते है। वे बिना राष्ट्रीय धारा में शामिल किए गए राष्ट्रवादी होने का बोझ ढोते हैं।
शिक्षित और तरक्की पसंद मुसलमानों से भी उनका अलगाव रहता है। उस अलगाव का शिक्षित और तरक्की पसंदों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन अपने दीन और हुनर में जीने वाले मुसलमानों पर पड़ता है। छोटे स्तर से लेकर बड़े स्तर तक धार्मिक हस्तियों पर उनकी निर्भरता बढ़ जाती है। अपने को टिकाए रहने के लिए उन्हें दीन को कुछ ज्यादा ही पकड़ कर रहना होता है। कई बार कट्टर धारा वाले मुल्ला-मौलवी इसका बेजा फायदा उठाते हैं।
हम यह नहीं कहते कि सच्चर कमेटी की सिफारिशें अंतिम हैं और उन पर बहस नहीं होनी चाहिए। लेकिन उनकी रोशनी में देश की सबसे बड़ी अकलियत को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने का काम जल्दी और तेजी से करना हर राजनीतिक पार्टी और सरकार का ध्येय होना चाहिए। जैसे हिंदू कट्टरता के कारण हैं, वैसे ही मुस्लिम कट्टरता के कारण हैं। उन कारणों को दूर करने की जरूरत है, न कि तौकीर रजा खान जैसी शख्सियतों से मुलाकात करके इस धारणा को पुष्ट करने की कि मुसलमानों का वोट लेने के लिए कट्टरता को सहलाना जरूरी है।
हमें एक आधुनिक, तर्क प्रधान, शिक्षित, समतापूर्ण और स्वावलंबी राष्ट्र बनना है, पिछले करीब तीन दशकों में यह लक्ष्य लगभग भुला ही दिया गया है। ऐसे हालात में रोज कुआं खोदा जाता है और रोज पानी पिया जाता है। कम से कम मुसलमानों को यह कवायद बंद कर देनी चाहिए। हर बार धर्मनिरपेक्षता का कोई न कोई दावेदार खड़ा हो जाता है और उसका वोट पक्का मान लेता है। बीजेपी को हराने की जिम्मेदारी अकेले मुसलमानों पर डाल दी गई है। उनका वोट लेकर नेता भले ही भाजपा के साथ मिल कर सरकार बना लें। हमने कहा है कि एक बार मुसलमान इस प्रवृत्ति के खिलाफ सत्याग्रह स्वरूप अपना वोट रोक लें। संभव हो तो उम्मीदवार भी न बनें।
इसके लिए बहुत काम करने की जरूरत होगी। सारे समाजी, धार्मिक और सियासी इदारे इस दिशा में काम करें। अलग-अलग पार्टियों के मुस्लिम नेता इससे जुड़ें। आधुनिक और प्रगतिशील सोच के साथ राष्ट्रीय स्तर पर यह कार्यक्रम चले। जहां भी संविधान के साथ छेड़छाड़ हुई है अथवा होती है, उसका सत्याग्रही प्रतिकार हो और पार्टियों को संवैधानिक शासन के लिए बाध्य किया जाए। मुसलमान, जैसा कि सच्चर कमेटी की रपट से सबको पता चल गया है, खुद में एक वंचित अवाम है। वह देश की बाकी वंचित अवाम के साथ मिल कर समाजवाद की दिशा में काम करे। लोहिया ने इसका सूत्र दिया है - दलित, आदिवासी, पिछड़े, महिलाएं और गरीब मुसलमान। लेकिन यह चुनावी गणित नहीं होना चाहिए। नवउदारवाद के लिए वही असली चुनौती होगी। नवउदारवादियों को आपस में निपटने दो। तब शायद इस देश का शासक वर्ग गंभीरता से सांप्रदायिकता की समस्या और उसे खत्म करने के उपायों पर गौर करेगा। कड़े कानून बनाने से सांप्रदायिकता नहीं रोकी जा सकती।
एक रास्ता और हो सकता है। नवउदारवाद के साथ सांप्रदायिकता नत्थी है और बढ़ती है। मुसलमान सेकुलर पार्टियों के पास जाना छोड़ दें। उन पार्टियों का साथ दें जो नवउदारवाद का मुकम्मल विरोध करती हैं और सेकुलर हैं। इससे उन पार्टियों को राजनीतिक जमीन मिलेगी जिसके चलते संविधान सम्मत सरकार चलाने का काम आगे बढ़ेगा। भाजपा कई राज्यों में सत्ता में रहती है और 6 साल केंद्र में भी सरकार का नेतृत्व कर चुकी है। सेकुलर के नाम पर मुसलमानों के वोट लेने वाली लगभग सभी पार्टियां भाजपा के साथ राज्यों और केंद्र में रह चुकी हैं। ‘टेक्टिकल वोटिंग’ का फार्मूला पुराना पड़ चुका है। मुसलमानों के समर्थन का इस्तेमाल पार्टियां धर्मनिरपेक्षता कायम करने के लिए नहीं, नवउदारवादी एजेंडा आगे बढ़ाने के लिए करती हैं। मुसलमान वोटों को लूटने के लिए निकले नए ‘ईमानदारों’ के ‘पुराने बेईमान’ खाते निकाल कर देख लीजिए। ये अमेरिका-इजरायल की धुरी से बंधे हैं और राजनीति में उसी धुरी की मजबूती करेंगे।
राजनीतिक मानस के निर्माण की चुनौती 
देश के श्रम और संसाधनों की लूट के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी-सड़क जैसी नागरिक सुविधाओं के निजीकरण में तेजी आई है। ग्रामीण और कस्बाई भारत सहित बड़े नगरों में अधिकांश आबादी न्यूनतम नागरिक सुविधाओं के अभाव में जीवन यापन करने को अभिशप्त है। गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में फैलाया जा रहा पूंजीवादी विकास का मॉडल उन्हें गंदी बस्तियों में तब्दील कर रहा है। इस सबके बीच तरह-तरह के सौदर्यीकृत आलीशान भवन, होटल, रिजोर्ट, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, हवाई अड्डे, हाई वे, मैट्रो रेल, पार्क, स्टेडियम आदि बन रहे हैं। दिल्ली में स्थित विभिन्न राज्यों के भवन-सदन अपनी नई छटा में होटलों को मात करने वाले हैं। देश की संसद को भी नया बनाने का प्रस्ताव है। कल राष्ट्रपति भवन भी नया बनाया जाएगा। देश के समस्त संसाधन और श्रम इस विकास कार्य में खप रहे हैं। श्रम वंचितों का है, संसाधन प्रकृति के और मौज-मजा शासक वर्ग का। मजेदारी यह है कि इस पूंजीवादी विकास से तबाह जनता से ही विकास की पुकार कराई जाती है।
विकास का यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है।  दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही उसे रोका जा सकता है। राजनीतिक इच्छाशक्ति राजनीतिक मानस से ही पैदा हो सकती है। राजनीतिक मानस के निर्माण की चुनौती नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से कठिन से कठिनतर होती गई है। एनजीओ आधारित जनांदेालनों ने न केवल अपने को अराजनीतिक रखने की जिद ठानी हुई है, राजनीति को बुरा बताने का भी बड़ा प्रचार किया है। उनके इस अड़ंगे से नवउदारवाद के विकल्प की राजनीति तो नहीं ही खड़ी हो पाती, मुख्यधारा राजनीति में जो नवउदारवाद विरोध की गुंजाइश होती है, वह भी ताकत नहीं पकड़ पाती। ये जनांदोलनकारी उल्टा सरकारों से संपर्क बना कर कुछ कानून बनाने की अपील करते हैं। विदेशी और कारपोरेट घरानों का धन लेने वाले एनजीओ आधारित जनांदोलनों का आधा बल सामने पड़ते ही सरकार के शरीर में चला जाता है। काफी जद्दोजहद के बाद नवउदारवाद से तबाह जनता की दिखावे की भलाई के कुछ कानून बन जाते हैं। लेकिन इसी बीच परमाणु करार, खुदरा में विदेशी निवेश, शिक्षा के कंपनीकरण, स्वास्थ्य समेत सभी नागरिक सुविधाओं के निजीकरण के कानून भी पास हो जाते हैं। इस तरह नवउदारवाद और उसकी समर्थक की राजनीति मजबूत होती चली जाती है और विरोध की राजनीति खड़ी ही नहीं हो पाती।
किशन पटनायक ने जनांदोलनों के राजनीतिकरण का सिद्धांत ही नहीं दिया, उस दिशा में सक्रिय प्रयास भी किए। 1995 में समाजवादी जन परिषद के गठन में समता संगठन के साथ इक्का-दुक्का जनांदोलनकारी समूह शामिल हुए। बाद में लगातार कोशिश की गई कि वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों का विरोध करने वाले ज्यादा से ज्यादा समूह जनपरिषद में शामिल होकर संघर्ष को राजनीतिक बनाएं। जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) को राजनीतिक बनाने के लिए किशन जी ने काफी प्रयास किया। ऐसा नहीं हो पाया और हालात बदतर होते चले गए। इसके दो प्रमुख कारण समझ में आते हैं। जनांदोलनकारियों की व्यक्तिवादिता और विदेशी फंडिंग। आज मेधा पाटकर ज्यादा जोर से नारा लगवाती हैं - ‘राजनीति धोखा है, धक्का मारो मौका है’। लेकिन केजरीवाल की राजनीति से उन्हें परहेज नहीं है।
कारपोरेट के पेट से पैदा पार्टी का रातों-रात तामझाम खड़ा हो गया है और उसके सााि भारत का नागरिक समाज भी। इस पार्टी ने स्थापना दी है कि राजनीतिक संघर्ष नहीं, सीधे चुनाव जीतने की स्ट्रेटेजी होनी चाहिए। इस राजनीति में किसी भी मोर्चे पर संघर्ष करने की जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि सत्ता मिलने पर काम तो कारपोरेट का करना है। मोदी ने यह काम बखूबी कर दिखाया है। मोदी और केजरीवाल की राजनीति से अराजनीतिकरण की प्रक्रिया और तेज होगी। कारपोरेट और नौकरशाही हलकों में पिछले दिनों यह चर्चा चली चुकी है कि देश में नेताओं की जरूरत नहीं है। कंपनियों के सीईओ को सब तय करने की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए। राजनीति का स्वरूप बदलने के साथ नेता की परिभाषा और छवि बदलना स्वाभाविक है। कुछ लोगों ने कहना शुरू भी कर दिया है कि मुकाबला केजरीवाल और नीलकरणी के बीच है।
अब रास्ता सीधे स्वतंत्रता और समाजवादी आंदोलन की विरासत और संविधान में प्रस्थापित समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के आधार पर राजनीतिक विकल्प बनाने की जरूरत है। अभी तक की राजनीति से यह स्पष्ट हो गया है कि भारत में प्रगतिशील-परिवर्तकारी पार्टियों के लिए लोकतांत्रिक समाजवाद की स्थापना ही लक्ष्य हो सकता है। और, जैसा कि रविकिरण जैन कहते हैं, वह बिना सत्ता के विकेंद्रकरण के संभव ही नहीं है जिसका प्रावधान संविधान में ही है।
देश में गरीब रहेंगे तो उनके हितों को लेकर संघर्ष करने वाले कुछ लोग हमेशा बने रहेंगे। लेकिन नागरिक समाज उन्हें नेता नहीं मानेगा। कारपोरेट की गोद में बैठ कर भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके मजमा जमाने वाले नेता माने जाते हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर अपना पहला लेख हमने लोहिया के इस कथन से शुरू किया था ः ‘‘भारतीय समाज के पास अभी तक कोई राजनीतिक मानस नहीं है। जातियों, राजनैतिक परिवर्तनों से अक्षुण्ण जीवनयापन आदि का लंबा अतीत उस पर मजबूती से हावी है।’’ (राममनोहर लोहिया, ‘एंड पावर्टी’, 1950) अराजनीतिकरण की इस चुनौती का सामना करना ही होगा। गरीब हमेशा पिटते और सहते ही जाएंगे, यह ध्रुव सत्य नहीं है। वर्ग-स्वार्थ की प्रबलता में जो एका शासक वर्ग ने किया है, उससे सबक लेकर हो सकता है मेहनतकश वर्ग भी संगठित हो जाए और सत्ता पर अपना कब्जा जमा ले। किसान मजदूरों के बुद्धिजीवी बेटे, जिनके बारे में हमने एक ‘समय संवाद’ में किशन पटनायक के हवाले से बताया था, शासक वर्ग का साथ छोड़ कर अपने स्वाभाविक वर्ग के साथ आ जाएं तो उन्हें रोकने का माद्दा किसमें होगा?
26 दिसंबर 2013

Sunday, September 29, 2013

कारपोरेट पॉलिटिक्स की नई बानगी-प्रेम सिंह

(वोट हमारा है तो ज़ाहिर है हमारे मन में कुछ सवाल भी होंगे ।  नीतियों की बात होगी , विचारों की बात होगी . उन वंचित तबके के लोगों की बात होगी जिनके लिए कोई  सरकार कुछ भी नहीं करती । लेकिन दावे बड़े बड़े होते हैं । कितना दम है सबके दावों में इस लेख के जरिए पड़ताल कर रहे हैं डॉ प्रेम सिंह । )
देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों की हित-पोषक अर्थव्यवस्था स्थायी रूप से तभी चल सकती है जब राजनीति भी कारपोरेट घरानों की हित-पोषक बन जाए। नब्बे के दशक के शुरू में नई आर्थिक नीतियां लागू किए जाने के बाद से भारत की मुख्यधारा राजनीति का चरित्र कमोबेश कारपोरेट-सेवी बनता गया है। कारपोरेट पूंजीवाद के अलावा कोई अन्य विचारधारा और सिद्धांत वहां काम करते नजर नहीं आते। अलबत्ता, कारपोरेट पूंजीवाद की विचारधारा सांप्रदायिकता, जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, वंशवाद, परिवारवाद, व्यक्तिवाद आदि को अपने आगोश में लेकर जीवन के हर क्षेत्र और तबके में तेजी से घुसपैठ बनाती जा रही है। बड़ी पूंजी और बड़ी टेक्नोलॉजी से चलने वाला मीडिया इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभा रहा है। पहले मिश्रित अर्थव्यवस्था और पिछले करीब 25 सालों में नवउदारवादी आर्थिक नीतियों का लाभ उठाने वाला ज्यादातर मध्यवर्ग, जिसे आजकल नागरिक समाज कहा जाता है और जिसके एक्टिविज्म की खासी चर्चा होती है, कारपोरेट पूंजीवाद का समर्थक बन गया है। ऐसे में, संविधान में प्रस्थापित लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों पर आधारित संविधान की विचारधारा भारत की राजनीति का निर्देश-बिंदु नहीं रह गई है। वह विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन और उनके ऊपर अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के निर्देशों का पालन करती है। यह कारपोरेट पॉलिटिक्स का दौर है, आम आदमी पार्टी (आप) के रूप में जिसकी एक नई बानगी सामने आई है। 
आम आदमी पार्टी मुख्यधारा मीडिया में काफी छाई रहती है। लेकिन इसके चरित्र को लेकर गंभीर विश्लेषण, जो लघु पत्रिकाओं में ही संभव है, देखने में नहीं आता। हमने ‘युवा संवाद’ के अपने मासिक कॉलम ‘समय संवाद’ में इस पार्टी के चरित्र की कुछ पड़ताल की है। यह लेख उसी कड़ी में लिखा गया है। इस विषय पर लिखे गए पहले के लेखों की तरह यह हिंदी अथवा अंग्रेजी के किसी अखबार में प्रकाशित नहीं हो सकता था। अंग्रेजी के ‘दि हिंदू’ और हिंदी के ‘जनसत्ता’ मुख्यधारा मीडिया में कुछ अलग पहचान वाले अखबार हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी के समर्थन में वे सबसे आगे नजर आते हैं। मुख्यधारा मीडिया के साथ आम आदमी पार्टी की गहरी यारी का कारण यही है कि दोनों का घराना - कारपोरेट पूंजीवाद - एक है।   
आम आदमी पार्टी बनाने और चलाने वाले इंडिया अंगेस्ट करप्शन (आईएसी) के नाम से बनी टीम के प्रमुख नेता थे। आईएसी में सांप्रदायिक, प्रतिक्रियावादी, यथास्थितिवादी, स्त्री-विरोधी, धर्म व अध्यात्म का धंधा करने, अंधविश्वास फैलाने और एनजीओ चलाने वालों की खासी तादाद थी। विश्व बैंक से पुरस्कार प्राप्त अन्ना हजारे इस टीम के प्रमुख बनाए गए, जिन्होंने अपने गांव को एनजीओ की मार्फत ‘स्वर्ग’ बना दिया था। उन्हें प्रमुख बनाने वाले अरविंद केजरीवाल भारत से राजनीतिक एक्टिविज्म को खत्म करने वाले प्रमुख एनजीओ सरगनाओं में से एक थे। दोनों में जो अंतर दिखाई देता है, वह इसलिए कि अन्ना हजारे 70 के दशक की उपज हैं और केजरीवाल सीधे नवउदारवादी दौर की संतान हैं। आईएसी के तत्वावधान में शुरू हुए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के संचालन में आरएसएस ने और फैलाने में मुख्यधारा मीडिया ने केंद्रीय भूमिका निभाई। भारत के सभी कारपोरेट घराने और उनकी संस्थाएं उसके पूर्ण समर्थन में थीं। इस आंदोलन के कर्ताओं के लिए भ्रष्टाचार ऐसी ताली है जो एक हाथ से बजती है; जिसमें नेताओं को घूस देकर राष्ट्र की संपत्ति को लूटने वाले कारपोरेट घरानों और कारपोरेट पूंजीवाद के सेफ्टी वाल्व एनजीओ को सच्चा सदाचारी माना जाता है। ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की राख से पैदा’ हुई आम आदमी पार्टी का चरित्र आईएसी और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चरित्र से अलग नहीं हो सकता। अतः उसे भारत में पिछले 25 सालों से बन रही कारपोरेट पॉलिटिक्स की एक नई बानगी के रूप में देखा जाना चाहिए। 
नवउदारवाद की शुरूआत के साथ उसका प्रतिरोध भी शुरू हो गया था। नवउदारवाद के बरक्स वैकल्पिक राजनीति के निर्माण की भी शुरूआत हो गई थी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और आम आदमी पार्टी ने वैकल्पिक राजनीति के प्रयासों को भारी नुकसान पहुंचाया है। इस मायने में वह मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों से ज्यादा खतरनाक है। नवउदारवाद की अनुगामी मुख्यधारा राजनीति वैकल्पिक राजनीति को परास्त कर देती है। लेकिन इस पार्टी ने नवउदारवाद के विकल्प की राजनीति को खत्म करने का बीड़ा उठाया हुआ है। उसने सबसे गहरी चोट वैकल्पिक राजनीति की किशन पटनायक द्वारा प्रवर्तित धारा को दी है। इस बार, अपने को किशन पटनायक की धारा का समाजवादी कहने वालों ने विरासत के प्रति द्रोह किया है। लोकतांत्रिक प्रगतिशील खेमे से केवल कुछ समाजवादी ही इस पार्टी के स्थापनाकार और पैरोकार बने हैं।  
थोड़ा पीछे लौटें तो पाएंगे कि इस पार्टी के प्रमुख लोगों में कुछ कांग्रेस और कुछ भाजपा-आरएसएस का काम करते थे। नवउदारवाद और कारपोरेट घरानों से ऐसे लोगों का कोई विरोध हो ही नहीं सकता। एक सूत्र में कहें तो ‘आम आदमी पार्टी के नेता कांग्रेस के मौसेरे, भाजपा के चचेरे और कारपोरेट के सगे भाई हैंं।’ कांग्रेस का काम करने वालों के बीच सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार समिति (नैक) में जगह पाने की प्रतिस्पद्र्धा चलती रहती है। जानकार बताते हैं कि केजरीवाल को नैक में और प्रशांत भूषण को केबिनेट में ससम्मान रख लिया जाता तो यह सब बखेड़ा खड़ा नहीं होता। शांति भूषण कांग्रेस की इस ‘नाइंसाफी’ को लेकर खासे आक्रोश में रहते थे कि चिदंबरम, सिबल, सिंघवी जैसे वकीलों को बड़े ओहदे देने वाली कांग्रेस ने उनके बड़े वकील बेटे को बाहर रखा हुआ है। जब से आम आदमी पार्टी बनी है, वे चर-अचर से  कहते पाए जाते हैं कि पहले दिल्ली और 2014 में देश फतह कर लिया जाएगा! यानी कांग्रेस से उनकी अनदेखी करने का बदला ले लिया जाएगा। 
आज तक देश में जितनी राजनीतिक पार्टियां बनी हैं, उनमें किसी का भी एकमात्र लक्ष्य आम आदमी पार्टी की तरह तत्काल और येन-केन-प्रकारेण चुनाव लूटना नहीं रहा है। केवल चुनाव लड़ने और जीतने को ही राजनीति मानने वाली पार्टी, असफलता और सफलता दोनों में, मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों से ज्यादा नीचे फिसल सकती है। पिछले दिनों हमें उत्तराखंड के गांव कांडीखाल में युवाओं के लिए आयोजित राष्ट्र सेवा दल के शिविर में जाने का अवसर मिला। वहां आए अंग्रेजी साप्ताहिक ‘जनता’ के संपादक डॉ. जीजी पारीख से हमने पूछा कि महाराष्ट्र में जो समाजवादी साथी आप में शामिल हुए हैं उनका उत्साह कैसा है? डॉ. पारीख ने बताया कि वे सभी दिल्ली विधानसभा के चुनाव पर आंख गड़ाए हुए हैं। अगर दिल्ली में आप की सरकार बन जाती है तो वे पार्टी में रहेंगे, अन्यथा कुछ और सोचेंगे। यह बच्चा भी बता सकता है कि दिल्ली में कांग्रेस-भाजपा के अलावा किसी अन्य पार्टी की सरकार नहीं बन सकती। अलबत्ता, दोनों को बहुमत में कुछ सीटें कम पड़ जाएं और आप को कांग्रेस-भाजपा के नक्शेकदम पर चलते हुए कुछ सीटें मिल जाएं तो उसके नेता दोनों के साथ जा सकते हैं। 
कारपोरेट पॉलिटिक्स की नई बानगी पेश करने वाली इस पार्टी की कुछ हाल की गतिविधियों पर गौर करें तो उसके चरित्र को अच्छी तरह समझा जा सकता है। भारत की ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों को वोट बैंक मानती हैं। आम आदमी पार्टी के नेताओं की नजर में भी मुसलमान, भारत के नागरिक नहीं, वोट बैंक हैं। पिछले दिनों मीडिया में खबर थी कि कुछ खास मुसलमानों को आप में शामिल किया गया। वर्तमान दौर में कह सकते हैं, ‘मीडिया मेहरबान तो गधा पहलवान’। जैसे मोदी का प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में अवतार मीडिया की देन है (आरएसएस की उतनी नहीं), उसी तरह केजरीवाल भी मीडिया की रचना है। मीडिया आम आदमी पार्टी की खबरें ही नहीं देता, बल्कि उस रूप में देता है जैसा पार्टी का मीडिया प्रकोष्ठ चाहता है। आप के नेताओं ने चाहा कि खबर इस तरह प्रसारित हो कि लोगों में यह संदेश जाए कि देश के सबसे बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय मुसलमानों में आम आदमी पार्टी की घुसपैठ हो गई है। 
यहां ‘खास मुसलमान’ वाली बात पर भी गौर करने की जरूरत है। राजनीतिक पार्टियां खास मुसलमानों की मार्फत पूरे मुस्लिम समुदाय को वोट बैंक बनाती हैं। खास मुसलमान केवल सेकुलर पार्टियों को ही नहीं, कुछ न कुछ भाजपा को भी उपलब्ध हो जाते हैं। भारत की राजनीति पिछले दो दशकों में अमेरिका-इजरायल की धुरी से बंध गई है तो उसमें इन खास मुसलमानों की भी खासी भूमिका है। आप में शामिल होने वाले खास मुसलमानों को लगा होगा कि सत्ता में आने पर पार्टी उन्हें बड़े ओहदे देगी। आजकल इसे ही धर्मनिरपेक्षता कहा जाता है।     
आप में भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा जैसी पार्टियों के नेताओं के शामिल होने की खबरें मीडिया में छपती हैं। अभी इन पार्टियों की छंटोड़ (काने-गले होने के चलते ढेर से अलग निकाल दिए जाने वाले फल-सब्जियां) आप में शामिल हो रही है। चुनाव नजदीक आते-आते टिकट न मिलने पर असंंतुष्ट होने वाले कुछ स्थापित नेता भी आप में शामिल हो सकते हैं। इस राजनीति की तार्किक परिणति झुग्गियों, पुनर्वास कॉलोनियों और गांवों में शराब और नोट बांटने में होगी। आप का कांग्रेस-भाजपा को टक्कर देने लायक धनबल चुनाव आने तक बना रहेगा तो शराब व नोट बांटने वाले स्वयं यह काम संभाल लेंगे। विचारधारा और सिद्धांत विहीन राजनीति की मंजिल सत्ता की अंधी गली के अलावा कुछ नहीं हो सकती।   
आजकल आप द्वारा किए जाने वाले खर्च और उसे मिलने वाले धन की खासी चर्चा सुनने को मिलती है। यह भी प्रचारित किया जा रहा है प्रत्येक उम्मीदवार को चुनाव खर्च के लिए पार्टी की ओर से कितने लाख रुपये दिए जाएंगे। तीस-पैंतीस लाख का आंकड़ा बताया जाता है जो वास्तविकता में एक करोड़ पहुंच ही जाएगा। उम्मीदवारों के लिए यह बहुत बड़ा लालच है। आप द्वारा खेला जाने वाला पैसे का यह खेल आम चुनाव आने तक किस कदर बढ़ जाएगा, इसका अंदाजा अभी से लगाया जा सकता है। आप की अभी तक की राजनीतिक गतिविधियों से यह स्पष्ट हो गया है कि उसके नेता, अन्य मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों की तरह, राजनीति को सबसे पहले पैसे का खेल मानते हैं। यानी वे गरीब देश में मंहगे चुनावों के हामी हैं, जिन्हें भविष्य में कारपोरेट राजनीति के रास्ते पर और मंहगे होते जाना है। 
आप पार्टी के प्रमुख नेताओं को किस स्रोत से कितना विदेशी धन मिलता है, इसका कुछ ब्यौरा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान ‘समयांतर’ में प्रकाशित हुआ था। अब तो काम काफी बढ़ गया है। धन की बाढ़ भी चाहिए। दरअसल, आप नेताओं की अभी तक की कुल योग्यता पैसा बनाने और झींटने की रही है। आगे फोर्ड फाउंडेशन जैसी नवसाम्राज्यवाद की पुरोधा संस्थाओं और कारपोरेट घरानों से ज्यादा से ज्यादा धन झींटने में इस योग्यता का उत्कर्ष देखने को मिलेगा। देश-विदेश के लोग खुद पैसा दे रहे हैं, यह कोई बचाव नहीं है। सब जानते हैं, पैसा ही पैसे को खींचता है।
मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों की तरह आप का भी किसानों, आदिवासियों, दलितों, मजदूरों, कारीगरों, छोटे दुकानदारों@व्यापारियों, छात्रों, बेरोजगारों से सरोकार नहीं है। यह मध्यवर्ग द्वारा मध्यवर्ग की मध्यवर्ग के लिए बनी पार्टी है। ऐसा मध्यवर्ग जो नवसाम्राज्यवादी लूट में हिस्सा पाता है और अपने को नैतिक भी जताना चाहता है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में वह इतने बड़े पैमाने पर यह जताने के लिए कूदा था कि पिछले 25 सालों से जो विस्थापन और आत्महत्याओं का दौर उसकी आंखों के सामने चला, उसमें सहभागिता के बावजूद उसकी नैतिक चेतना मरी नहीं है। मध्यवर्ग द्वारा खड़ा किया गया वह तमाशा इतना जबरदस्त था कि कई जेनुइन विचारक व जनांदोलनकारी भी उसकी चपेट में आ गए।  
हाल में आप पार्टी के एक नेता को यूजीसी की समिति से निकाले जाने का प्रकरण मीडिया में काफी चर्चित रहा। भारत में कुकुरमुत्तों की तरह निजी विश्वविद्यालय खुल गए हैं। खुद देश के राष्ट्रपति प्राईवेट विश्वविद्यालयों का विज्ञापन करते हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों को लाने की पूरी तैयारी है। भारत के राज्य और केंद्रीय विश्वविद्यालयों को बरबाद करने की मुहिम सरकारों ने छेड़ी हुई है। इसका नवीनतम उदाहरण दिल्ली विश्वविद्यालय में चार साला बीए प्रोग्राम (एफवाईयूपी) को थोपना है। ऐसे में सरकार की समितियों से बाहर आकर शिक्षा पर होने वाले नवउदारवादी हमले का डट कर मुकाबला करने की जरूरत है। कई संगठन और व्यक्ति पूरे देश में यह काम कर रहे हैं। आप नेता को कारण बताओ नोटिस मिलने पर बिना जवाब दिए यूजीसी की समिति की सदस्यता से इस्तीफा देना चाहिए था और अपनी पार्टी स्तर पर शिक्षा के निजीकरण व बाजारीकरण के विरोध में जुट जाना चाहिए था। 
लेकिन उन्होंने इसे मीडिया इवेंट बना दिया और सवाल उठाया कि अगर वे कांग्रेस की सदस्यता लेते तो क्या सरकार तब भी उनकी यूजीसी समिति की सदस्यता पर सवाल उठाती? हालांकि उन्हें सरकार से पूछना ही था तो यह पूछते कि समाजवादी जन परिषद (सजप) का सदस्य रहते वे समिति में रह सकते थे, तो आप पार्टी का सदस्य रहते क्यों नहीं रह सकते? समिति का सदस्य बनाए जाते समय वे जिस राजनीतिक पार्टी के सदस्य थे, उसका नाम छिपा ले जाने का यही अर्थ हो सकता है कि वे करीब दो दशक पुरानी सजप की सदस्यता को गंभीरता से नहीं लेते थे। दरअसल, सरकारी संस्थाओं की सदस्यता, सभी जानते हैं, सरकारी नजदीकियों से मिलती है। विद्वता हमेशा उसकी कसौटी नहीं होती। खुद विद्वता की कसौटी आजकल एक-दूसरे को ऊपर उठाना और नीचे गिराना हो गई है। अगर किसी विद्वान की किसी समिति की सदस्यता चली जाती है तो उसमें बहुत परेशान होने की बात नहीं है। परेशानी की बात यह है कि विभिन्न समितियों में विद्वानों की उपस्थिति के बावजूद सरकारें निजीकरण को हरी झंडी दिखा रही हैं। ऐसे में कोई सरोकारधर्मी विद्वान किसी समिति में कैसे रह सकता है?
 कहा जाता है कि अपने पर रीझे रहने वाले लोग खुद माला बनाते हैं और खुद ही अपने गले में डाल लेते हैं। आप के नेता, जो पहले अलग-अलग चैनलों और सरकारों के लिए सर्वे करते थे, अपने लिए सर्वे करके जीत के दावे कर रहे हैं। राजनीतिक शालीनता की सारी सीमाएं उलांघते हुए विरोधी पार्टियों के नेताओं को बेईमान और अपने को ईमानदार प्रचारित कर रहे हैं। उन्होंने विरोधी पार्टियों के चुनाव चिन्हों को भी विरूपित किया है, जिसकी शिकायत एक पार्टी ने चुनाव आयोग से की है। इतना ही नहीं, राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को उन्होंने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का जरिया बना लिया है। किराए के कार्यर्ता तिरंगा लहराते हैं और फेंक कर चल देते हैं। दरअसल, ये आत्ममुग्ध लोग हैं। आत्ममुग्धता - ‘हम सबसे अच्छे हैं’ - से ग्रस्त लोगों का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन बड़ा रोचक हो सकता है। आत्ममुग्ध लोग अपने होने को चमत्कार की तरह लेते हैं, और मानते हैं कि उनका किया हर पाप भी पवित्र होता है। वे अपने गुणग्राहक आप होते हैं और पतन की अतल गहराइयों में गिरने के बावजूद उदात्तता की भंगिमा बनाए रहते हैं। दुनिया की सारी दूध-मलाई मारने के बावजूद वे अपने को सारी दुनिया द्वारा सताया हुआ जताते हैं। दुनिया और भारत के साहित्य में आत्ममुग्ध (नारसिसिस्ट) नायकों की लंबी फेहरिस्त मिलती है। वास्तविकता में वे कई जटिल कारणों से मानसिक रोगी  होते हैं, लेकिन भ्रम समस्त रोगों का डॉक्टर होने का पालते और फैलाते हैं। आईएसी, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और आप में आत्मव्यामोहित ‘नायकों’ की फेहरिस्त देखी जा सकती है। हम परिघटना पर हम केवल इतना कहना चाहते हैं कि तानाशाही और फासीवाद का रास्ता यहीं से शुरू होता है। मीडिया की मार्फत अफवाहबाजी का जो सिलसिला इन महाशयों ने शुरू किया, नरेंद्र मोदी उसीमें से निकल कर आया है।      
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान गांधी का काफी नाम लिया गया। अन्ना हजारे को, जिन्होंने जंतर-मंतर से पहली प्रशंसा हजारों नागरिकों का राज्य-प्रायोजित नरसंहार करने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की की, लगातार गांधीवादी कहा और लिखा जाता रहा। अरविंद केजरीवाल अपने को उन्हीं का शिष्य कहते हैं। इसीलिए ‘गुजरात का शेर’ से ‘भारत माता का शेर’ बने नरेंद्र मोदी के खिलाफ आज तक कुछ नहीं लिखा या बोला है। कश्मीर पर दिए गए बयान की प्रतिक्रिया में प्रशांत भूषण पर हमला अन्ना हजारे और रामदेव के भक्तों ने ही किया था। अफजल गुरु के पार्थिव शरीर को श्रीनगर से आई महिलाओं को सौंपने की मांग को लेकर प्रैस क्लब में निश्चित की गई प्रैस वार्ता नहीं होने देने वाले हुड़दंगियों में आप के कार्यकर्ता भी शामिल थे। आप में प्रतिक्रियावादी लोगों की भरमार है। आप के नेताओं को चुनाव जीतना है तो उन्हें पुचकार कर रखना होगा। 
गांधी साधन और साध्य को अलग करके नहीं देखते थे। इस पार्टी के नेता चुनाव जीतने के लिए कुछ भी करने की नीयत से परिचालित हैं। वास्तव में इस पार्टी के निर्माण और लक्ष्य दोनों में कपट समाया हुआ है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान राजनीति और नेताओं के प्रति गहरी घृणा का प्रचार किया गया। हालांकि नीयत पहले से ही राजनीतिक पार्टी बनाने की थी, जो अन्ना हजारे की अनिच्छा के बावजूद बना ली गई। यह भी सुना गया कि केजरीवाल रामलीला मैदान में अन्ना का अनशन खत्म करने के पक्ष में नहीं थे। क्योंकि अनशन पर अन्ना की मृत्यु हो जाने की स्थिति में केजरीवाल अन्ना की जगह लेकर राजनीति की उड़ान भर सकते थे। वे पहले ही डरे हुए थे कि बाबा रामदेव राजनीति की दौड़ में आगे न निकल जाएं। इस सारे दंद-फंद का लक्ष्य भी कपट से भरा था - नवउदारवाद की मार से बदहाल गरीब भारत की आबादी को उससे लाभान्वित होने वाले अमीर भारत के पक्ष में हांका जा सके।  
आप के प्रचार की शैली कांग्रेस जैसी है। जिस तरह पूरी कांग्रेस राहुल गांधी की नेतागीरी जमाने के लिए कारिंदे की भूमिका निभाती है, आप के नेता-कार्यकर्ता केजरीवाल के कारिंदे बने हुए हैं। जिस पार्टी के शुरू में ही इस कदर व्यक्तिवाद हावी हो, सत्ता मिलने पर वह और मजबूत ही होगा। आप पार्टी में व्यक्तिवाद के चलते एक टूट हो चुकी है। पार्टी आगे चली तो और टूटें भी हो सकती हैं। व्यक्तिवाद पूंजीवादी मूल्य है। भारत की राजनीति में यह सामंतवाद के साथ मिलकर परिवारवाद, वंशवाद, क्षेत्रवाद जैसे गुल खिलता है। जैसे बड़ी पार्टियां अंधाधुंध प्रचार करके अपने नेता के नाम की पट्टी मतदाताओं की आंखों पर बांध देना चाहती हैं, वही रास्ता आप पार्टी के रणनीतिकारों ने अपनाया है। पोस्टर, बैनर, होर्डिंग के अलावा मोबाइल और नेट पर एक ही आदमी के नाम का प्रचार किया जा रहा है। वह भी सीधे मुख्यमंत्री के रूप में। आप घर-दफ्तर में बैठे हैं, किसी कार्यक्रम में शिरकत कर रहे हैं, गाड़ी चला रहे हैं, आपके मोबाइल पर लिखित या रिकार्ड की गई आवाज में अन्ना हजारे के शिष्य अरविंद केजरीवाल का मैसेज आ जाएगा। अंधाधुंध प्रचार अंधाधुंध धन के बिना नहीं हो सकता। यानी ये ‘अच्छे’ और ‘ईमानदार’ लोग सीख दे रहे हैं कि राजनीति करनी है तो कांग्रेस और भाजपा से सीख लो! लोकतंत्र में प्रचार का यह तरीका फासिस्ट रुझान लिए है, जिसमें केवल एक नेता की छवि मतदाताओं के ऊपर दिन-रात थोपी जाती है। 
कहा जाता है सावन के अंधे को सब हरा हरा-हरा नजर आता है। सत्ता के अंधे आप के नेताओं का भी यही हाल है। वे हर इंसान और घटना को चुनाव के चश्मे से देखते हैं। दुर्गाशक्ति नागपाल का निलंबन हुआ तो बिना उनसे मिले उन्हें आप से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव कर दिया। पार्टी के पंजीकरण से पहले ही दिल्ली विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी गई। तभी से कहीं मुसलमान उम्मीदवार तलाशा जा रहा है, कहीं दलित, कहीं जाट, कहीं पंजाबी, कहीं सिख। दान-दाता तो तलाशे जा ही रहे हैं। दिल्ली में आप से चुनाव लड़ने के लिए कैसे-कैसे लोगों को किस-किस तरह से एप्रोच किया गया है और किया जा रहा है, उसकी पूरी कहानी छप जाए तो वह एक अच्छा राजनीतिक प्रहसन होगा।  
हमें एक साथी ने बताया कि प्रकाश झा की फिल्म ‘सत्याग्रह’ में आम आदमी पार्टी की टोपी, जिस पर ‘मैं आम आदमी हूं’ लिखा होता है, पहने लोग दिखाए गए हैं। यह भी पता चला कि थियेटर के बाहर आप के कार्यकर्ता टोपी लगा कर खड़े थे। हो सकता है यह दिखाने के लिए केजरीवाल और प्रकाश झा के बीच कुछ धन का लेन-देन हुआ हो। या प्रकाश झा बहुत-से भले लोगों की तरह कायल हों कि ‘मैं आम आदमी हूं’ की टोपी पहनने वाले लोग वाकई आम आदमी की भलाई का काम करने वाले हैं। जिस तरह से आप के नेता सब जगह टोपी का प्रदर्शन करते हैं, वह विचारणीय है। राजनीतिक पार्टी के विशेष कार्यक्रमों में टोपी लगाना समझ में आता है। हालांकि, तब भी टोपी न लगाई जाए तो उससे कुछ फर्क नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि टोपी जिस विचार का प्रतीक है, उसके प्रति आंतरिक दृढ़ता है तो टोपी यानी दिखावे की जरूरत नहीं रह जाती। डॉ. लोहिया पार्टी कार्यकर्ताओं के लाल टोपी पहनने के खिलाफ थे। उनका मानना था कि क्रांति का विचार नेता-कार्यकर्ता के मन में होना चाहिए। दिखावे से शुरू होने वाली राजनीति का अंत अंततः पूर्ण पाखंड में होगा। 
लाखों-करोड़ों में खेलने वाले लोग जब ‘मैं आम आदमी हूं’ की टोपी लगाते हैं, तो उसका पहला और सीधा अर्थ गरीबों का उपहास उड़ाना है। ‘आम आदमी’ की अवधारणा पर थोड़ा गंभीरता से सोचने की जरूरत है। आजादी के संघर्ष के दौर में और आजादी के बाद आम आदमी को लेकर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में काफी चर्चा रही है, जिसका साहित्य और कला की बहसों पर भी असर पड़ा है। साहित्य में आम आदमी की पक्षधरता के प्रगतिवादियों के अतिशय आग्रह से खीज कर एक बार हिंदी के ‘व्यक्तिवादी’ साहित्यकार अज्ञेय ने कहा कि ‘आम आदमी आम आदमी ... आम आदमी क्या होता है?’ उनका तर्क था कि साहित्यकार के लिए सभी लोग विशिष्ट होते हैं। राजनीति से लेकर साहित्य तक जब आम आदमी की जोरों पर चर्चा शुरू हुई थी, उसी वक्त आम आदमी का अर्थ भी तय हो गया था। उस अर्थ में गांधी का आखिरी आदमी कहीं नहीं था। आम आदमी की पक्षधरता और महत्ता की जो बातें हुईं, वे शुरू से ही ‘मेहनत-मजदूरी’ करने वाले गरीब लोगों के लिए नहीं थीं। 
मध्यवर्ग ने आम आदमी की अवधारणा में अपने को ही फिट करके उसकी वकालत और मजबूती में सारे प्रयास किए हैं और आज भी वही करता है। आम आदमी मध्यवर्गीय अवधारणा है। उसका गरीब अथवा गरीबी से संबंध हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मध्यवर्ग को अपने केंद्र में लेकर चलने वाली आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का यह वायदा रहा है कि वह किसी को भी गरीब नहीं रहने देगी। दूसरे शब्दों में, जो गरीब हैं, उन्हें दुनिया में नहीं होना चाहिए। भारत का यह ‘महान’ मध्यवर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह सब कुछ अपने लिए चाहता हैं, लेकिन गरीबों का नेता होने की अपनी भूमिका को छोड़ना नहीं चाहता। इस पाखंड ने भारत की गरीब और आधुनिकता में पिछड़ी मेहनतकश जनता को अपार जिल्लत और दुख दिया है। भारत का मध्यवर्ग मुख्यतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनता है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और उससे निकली पार्टी का वर्णाधार अगड़ी सवर्ण जातियां हैं, जिनका साथ दबंग पिछड़ी जातियां देती हैं। इसी आधार पर आप के नेता युवकों का आह्वान करते हैं कि वे जातिवादी नेताओं को छोड़ कर आगे आएं और मध्यवर्ग नाम की नई जाति में शामिल हों। यहां उनकी जाति भी ऊंची होगी और वर्ग-स्वार्थ भी बराबर सधेगा। 
यह देख कर काफी हैरानी होती है कि कई साथी आम आदमी पार्टी से आशाएं पाले हैं। उन्हें कांग्रेस और भाजपा के बाद आप ही नजर आती है। ऐसा भी नहीं है कि उनमें सभी ‘आम आदमी’ की तरह देश के लोकतांत्रिक वामपंथी आंदोलन और पार्टियों से अनभिज्ञ हों। उनमें शिक्षक और पत्रकार भी शामिल हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, जिसे यही लोग चला रहे थे, की पूरी हवा निकल जाने के बावजूद आप पार्टी के जीतने और उससे कुछ होने की उम्मीद रखने वालों के बारे में यही कहा जा सकता है कि ज्यादातर नागरिक समाज में राजनीतिक मानस का लोप हो गया है। यही कारण है कि कारपोरेट पूंजीवाद की पक्षधर राजनीति की जगह तेजी से बढ़ती जा रही है और उसका विरोध करने वाली पार्टियों को पैर टेकने तक की जगह मुश्किल से मिल पाती है।    
   
         

Monday, August 26, 2013

स्वतंत्रता दिवस के कर्तव्य - प्रेम सिंह


आत्मालोचन का दिन 

पिछले स्वतंत्रता दिवस के ‘समय संवाद’ और उसके आगे-पीछे हमने जो लिखा, इस स्वतंत्रता दिवस पर उससे अलग कुछ कहने के लिए नहीं है। कहना एक ही बार ठीक रहता है। भले ही वह स्वतंत्रता जैसे मानव जीवन और मानव सभ्यता के संभवतः सर्वोपरि मूल्य के बारे में हो। दोहराव के भय से इस बार का ‘समय संवाद’ हम नहीं लिखना चाहते थे। फिर सोचा कि शासक वर्ग और उसका प्रस्तोता मीडिया दिन-रात दोहरावों की झड़ी लगाए रहते हैं तो हमें भी किंचित दोहराव के बावजूद अपनी बात कहनी चाहिए। आइए, भारी सुरक्षा घेरे में गांधी के आखिरी आदमी से बहुत दूर और ऊंचे आयोजित, छियासठवें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश की आजादी के बारे में कुछ चर्चा और सवाल करें। इस आशा के साथ कि सड़सठवें साल में देश की आजादी पर आए संकट को समझा जाएगा और उसका मुकाबला हो पाएगा।  
जिस आजादी पर हासिल होने के दिन से ही अधूरी होने का ठप्पा लगा हो, हर स्वतंत्रता दिवस पर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वह उत्तरोत्तर पूर्णता और मजबूती की ओर अग्रसर है। अगर किसी वर्ष कोई ऐसी घटना या फैसला सरकार, राजनीति अथवा नागरिक समाज के स्तर पर हो गया हो, जिससे आजादी का अवमूल्यन हुआ हो और वह खतरे में पड़ी हो, तो स्वतंत्रता दिवस के मौके पर यह सुनिश्चित किया जाए कि वह गलती स्वीकार करके उसे ठीक कर लिया गया गया है। स्वतंत्रता दिवस यह देखने का भी मौका होता है कि वैचारिक और नीतिगत मतभेदों के बावजूद आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने के दायित्व पर सभी राजनीतिक पार्टियां, संगठन और नागरिक समाज एकमत हैं। भारत जैसे विशाल और बहुलताधर्मी देश में अलग-अलग समूहों की अपने हितों की चिंता वाजिब है, लेकिन इस मौके पर हम यह देखें कि समग्रता में उससे देश की आजादी की काट न हो। यह सुनिश्चित करें कि बुद्धिजीवी खास तौर पर सावधान हैं, ताकि नई पीढ़ी आजादी का मूल्य भली-भांति समझ कर अपना कर्तव्य निर्धारित करती और निभाती चले। स्वतंत्रता दिवस और उसके आगे-पीछे आजादी के तराने गाने, तिरंगा लहराने और शहीदों के गुणगान का तभी कोई अर्थ है। स्वतंत्रता दिवस पर हम यह सुनिश्चित करें कि देश की आजादी को सच्चा प्यार करके ही उसके लिए कुर्बानी देने वालों का सच्चा सम्मान किया जा सकता है।    
सवाल है कि क्या प्रत्येक आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर देश की आजादी पूर्णता और मजबूती की तरफ बढ़ती है? गलतियां अगर होती हैं तो क्या उनसे सीख लेने की कोई नजीर सामने आती है? आजादी के प्रति सभी सरकारों, राजनीतिक पार्टियों और नागरिक समाज का साझा संकल्प है? अपने हितों की चिंता करने वाले समूह समग्रतः आजादी की रक्षा का ध्यान करके चलते हैं? क्या देश के बुद्धिजीवी अपनी भूमिका में मुस्तैद हैं? क्या नई पीढ़ी आजादी के प्रति अपना कर्तव्य समझती है? क्या हम शहीदों का सच्चा सम्मान करते हैं? 
बिना गहरी जांच-पड़ताल के पता चल जाता है कि ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं होने की चिंता भी ज्यादातर नेताओं से लेकर नागरिक समाज तक नहीं दिखाई देती। बल्कि कह सकते हैं कि पिछले 25 स्वतंत्रता दिवसों पर लाल किले से नवसाम्राज्यवादी गुलामी का परचम फहराया जाता रहा है। लाल किले के भाषण में बच्चों से लेकर नौजवानों तक आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने का संदेश नहीं दिया जाता। ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियां, नागरिक समाज और बुद्धिजीवी आजादी के इस अवमूल्यन में बेहिचक शामिल हैं। 
15 अगस्त 1947 को मिली राजनीतिक आजादी को अधूरा माना गया था। कहा गया था कि अभी आर्थिक आजादी हासिल करना है। पिछले करीब तीन दशकों में आर्थिक गुलामी का तौक गले में डाल कर राजनीतिक आजादी को भी लगभग गंवा दिया गया है। हर साल शानोशौकत से स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाने और देशभक्ति का भारी-भरकम प्रदर्शन करने के बावजूद, लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गई आजादी नहीं, नवसाम्राज्यवादी गुलामी पूर्णता और मजबूती की ओर बढ़ती जाती है। नवसाम्राज्यवादी गुलामी का गहरा रंग देखना हो तो कोई भारत आए। यहां कारपारेट पूंजीवाद की गुलामी में पगे नेताओं, खिलाड़ियों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का  उत्साह और उमंग देख कर लगता है मानो वे विज्ञापन की दुनिया के मॉडल हों! मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी मंडली ही नहीं, एपीजे अब्दुल कलाम और लालकृष्ण अडवाणी भारत के महाशक्ति बनने के गीत गाते नहीं थकते हैं। अधूरी आजादी का पूरा फायदा उठा कर भारत का शासक वर्ग कंपनियों के मुनाफे की वस्तु बन गया है। 
इस उमंग भरे माहौल का दबदबा इतना ज्यादा है कि नवउदारवाद-विरोध की लघुधारा के कतिपय वरिष्ठ आंदोलनकारी और बुद्धिजीवी भी उसकी चपेट में आ जाते हैं। दोबारा पटरी पर आना उनके लिए कठिन हो जाता है। ऐसे में, नवउदारवादी नीतियों के चलते उच्छिष्ट का ढेर बना दी गई विशाल आबादी की दशा समझी सकती है। वह खटती और मरती भी है, और नकल भी करती है। इस तरह पूंजीवाद शासक वर्ग के साथ-साथ अपनी (गुलाम) जनता भी तैयार करता चलता है।
इस बीच आरएसएस से लेकर गांधीवादी, समाजवादी, माक्र्सवादी आदि सभी राजनीतिक-वैचारिक समूह आजादी पर आने वाले संकट और उसे बचाने की चिंता जता चुके हैं। लेकिन नवसाम्राज्यवाद की ताकत कहिए या आजादी की सच्ची चेतना का अभाव या दोनों, उस चिंता का खोखलापन अथवा कमजोरी जगजाहिर होते देर नहीं लगती। आजादी बचाने की पुकार उठती है और बुलबुले की तरह फूट जाती है। ऐसा नहीं है कि आजादी को बचाने के सच्चे प्रयास नहीं हुए या अभी नहीं हो रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इस मामले में शोर ज्यादा मचाया गया है। आजादी को बचाने के लिए ठोस विचार और रणनीति के तहत दीर्घावधि आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया है। आज की हकीकत यह है कि आजादी बचाने की वास्तविक चिंता करने वाले लोग अब बहुत थोड़े और उपेक्षित हैं। 
ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता दिवस पर सर्वाधिक गंभीरता और प्राथमिकता से देश के पराधीन होते जाने की परिघटना पर विचार होना चाहिए। उसके बगैर न केवल नवउदारीकरण के दौर में भिखारी बना दी गई जनता के लिए हमारी चिंता का कोई हासिल नहीं है, हमारे प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बौ़िद्धक कर्म का भी स्वतंत्र अर्थ नहीं रह जाता है। क्रांति के दावों की दयनीयता तो स्वयंसिद्ध है ही। 
नवउदारवादी दौर में बने कारपोरेट इंडिया की सत्ता पर आरएसएस जब-जब धावा बोलता है, तब-तब सेकुलर खेमे के बुद्धिजीवी उसके ‘देशद्रोही’ चरित्र को उद्घाटित करने में लग जाते हैं। ऐसा करते वक्त वे अपने को देशभक्ति और आजादी का पक्का पैरोकार होने का प्रमाणपत्र देते ही हैं, सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह और कांग्रेस को भी वह थमा देते हैं। बार-बार दोहराई जाने वाली इस कवायद का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलता। न सांप्रदायिकता कम होती है, न नवउदारवाद थोड़ा भी पीछे हटता है। बल्कि दोनों कट्टर होते और एक-दूसरे में समाते जाते हैं। उस सम्मिलित कट्टरता के प्रहार से समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की जमीन धसकती चली जाती है। भारत के संविधान में निहित समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और संकल्प की रक्षा ही आजादी की रक्षा है। हमारी राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिकता की यही कसौटी हो सकती है।    
यह सही है कि आरएसएस पूंजीपतियों से सांठ-गांठ रखता है। उसका नया जमूरा नरेंद्र मोदी पूंजीपतियों के आगे नाच रहा है। लेकिन, कांग्रेस पूंजीपतियों की सबसे बड़ी करुणानिधान पार्टी है, इस सच्चाई को सेकुलर खेमा जोर देकर कभी नहीं कहता। वह आरएसएस के ‘रहस्मय चरित्र’ की गहराइयों में काफी नीचे तक धंसता है, लेकिन कांग्रेस के ‘खुला खेल पूंजीवादी’ की तरफ से आंख फेरे रहता है। वह नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस का भी सेवक बना रहा और अब सोनिया गांधी की कांग्रेस का सेवक है। नरेंद्र मोदी बुरा है, क्योंकि कारपोरेट घरानों को रिझाने में लगा है। सेकुलर खेमे की शिकायत वाजिब है कि मीडिया उसे पूंजीवाद का नया ब्रांड बना कर समाज के सामने परोस रहा है। लेकिन यही मीडिया नरेंद्र मोदी के पहले मनमोहन सिंह को कारपोरेट पूंजीवाद का पुरोधा बना कर जमा चुका है। सेकुलरवादियों समेत नागरिक समाज की स्वीकृति दिला चुका है। अटल बिहारी वाजपेयी अपना अलग से पूंजीवाद लेकर नहीं आए थे। उन्होंने अपने ‘स्वदेशी’ पैर मनमोहन सिंह के ‘अमेरिकी’ जूते में ही डाले थे। नरेंद्र मोदी को भी मनमोहन सिंह लेकर आए हैं। उनका सत्ता का आपसी झगड़ा है। अमेरिका और कारपोरेट घराने जिस की तरफ रहेंगे वह जीत जाएगा।  
ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी से मनमोहन सिंह किस मायने में बेहतर हैं? सिवाय इसके कि नवउदारवाद को भारत में लाने और जमाने वालों में वे अव्वल नंबर पर हैं। उसी हैसियत के चलते वे तीसरी बार प्रधानमंत्री होने के दावेदार हैं। सांप्रदायिक ताकतों को ठिकाने लगाने की कुछ ताकत अभी भारतीय जनता में बची है। लेकिन नवसाम्राज्यवाद के सामने वह लाचार बना दी गई है। जनता की यह लाचारी आगे बढ़ती जानी है। इसकी सीधी जिम्मेदारी मनमोहन सिंह और उनके सिपहसालारों की है। 
पिछले दो सालों से मनमोहन सिंह पर नागरिक समाज का काफी तेज गुस्सा देखने को मिला। यह गुस्सा तभी आना चाहिए था जब उन्होंने देश के संविधान को दरकिनार कर विश्व बैंक के आदेश पर नई आर्थिक नीतियां लागू की थीं और देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया था। वे राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, न आज हैं। वे ऐसा कर पाए और उस दम पर दो बार देश के प्रधानमंत्री बन गए, यह नागरिक समाज की सहमति के बिना संभव ही था। नागरिक समाज को अब भी जो गुस्सा आ रहा है, वह देश के स्वावलंबन और संप्रभुता को चट कर जाने वाली उन नीतियों के खिलाफ नहीं है। वह नवउदारवाद का साफ-सुथरा चेहरा और अपने लिए और जयादा फायदा चाहता है। ऐसे गुस्से का कोई परिणाम देश की आजादी के पक्ष में नहीं निकलना है। भाजपा के पक्ष में भले ही निकले, जिसका स्टार प्रचारक नागरिक समाज की समस्त लालसाओं को चुटकियों में पूरा करने का ढोल पीट रहा है।  
कुमार प्रशांत ने ‘जनसत्ता’ के अपने एक लेख में मनमोहन सिंह को संजीदा इंसान बताया है। यह भी कहा है कि बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने हमेशा शालीनता का आचरण किया है, जिससे विदेशों में भारत का मान बढ़ा है। मनमोहन सिंह की यह प्रशंसा उन्होंने नरेंद्र मोदी से तुलना करते हुए की है, जिन्होंने एलान करके 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के लालकिले से दिए गए भाषण के मुकाबले अपना भाषण किया। स्वतंत्रता दिवस नेताओं के व्यक्तित्वों की तुलना करने का अवसर नहीं होता। नरेंद्र मोदी और आरएसएस खुद ही एक्सपोज हो गए कि उनकी नजर में स्वतंत्रता दिवस का सम्मान नहीं है। अडवाणी ने दबी जबान से मोदी के इस कृत्य की आलोचना भी की।    
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘जनसत्ता’ के पन्ने मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की तुलना में रंगने का औचित्य नहीं था। तुलना का तूमार बांधने के लिए खबरी चैनलों की भरमार है। उन्होंने वह काम बखूबी किया भी। हमने दोनों का भाषण नहीं सुना। न ही टीवी चैनलों पर होने वाली वे बहसें सुनी, जिनका जिक्र नाराजगी के साथ कुछ टिप्पणीकारों ने अगले दिन अखबारों में किया। चैनल यह नहीं कर सकते थे, अगर स्वतंत्रता दिवस की गरिमा, संवैधानिक दायित्व, लोकतांत्रिक मूल्य, संघीय ढांचा और देश की अखंडता का हवाला देने वाले ‘विशेषज्ञ’ वहां नहीं जाते। इधर विशेषज्ञ कुछ ज्यादा ही हो गए हैं और उनमें ज्यादातर ने अपने को ऐसे एंकरों के हाथ बेच दिया है जो कूपमंडूक और नवउदारवाद व सांप्रदायकिता के निःसंकोच गुण गाने वाले हैं। 
गंभीर समझे जाने वाले बुद्धिजीवियों को यह बताना चाहिए था कि प्रधानमंत्री के भाषण में स्वतंत्रता की पूर्णता और मजबूती के लिए क्या कहा गया है। उस लिहाजा से दोनों के भाषणों में कोई फर्क नहीं था। दोनों नवउदारवाद की प्रतिष्ठा को स्वाभाविक कर्म मान कर बोले। संविधान की कसौटी पर दोनों के भाषण अवैध थे। दोनों में अंतर यही है कि मनमोहन सिंह नवउदारवाद की ब्रांडेड मशीन हैं, जो सीधे विश्व बैंक से खिंच कर आई है और मोदी आरएसएस के कारखाने में ढल कर निकली ‘देसी’ मशीन है। दोनों में बाकी सब समान है। मोदी को मुसलमान ‘पिल्ले’ नजर आते हैं तो मनमोहन को किसान निठल्ले। वे हैरानी से पूछते हैं कि किसान खेती (यानी आत्महत्या) क्यों करते हैं! कोई और काम क्यों नहीं कर लेते? पहले से ही कई करोड़ नौजवानों और अधेड़ों की बेरोजगार सेना जमा होने के बावजूद एक मशीन ही ऐसा कह सकती है, जिसमें संदेश पहले से फीड किया गया हो? 
मोदी की भत्र्सना का खास मतलब नहीं है। मोदी को लाने वालों में सबसे पहला नाम मनमोहन सिंह का है। आरएसएस बाद में आता है। मोदी जिस संगठन से आते हैं, उसने आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया। मौका पड़ने पर अंग्रेजों का साथ दिया। वह पुराना किस्सा है। लेकिन मनमेाहन का नया कमाल देखने के लायक है। उन्होंने और सोनिया गांधी ने मिल कर आजादी के संघर्ष की पार्टी को नवसाम्राज्यवादी गुलामी की पार्टी में तब्दील कर दिया है। बेहतर होता कि स्वतंत्रता दिवस पर बुद्धिजीवी यह सच्चाई जनता को बताते। 
हमने एक ‘समय संवाद’ में लिखा था, ‘‘मिश्रित अर्थव्यवस्था के करीब तीस सालों के दौर में जो साम्राज्यवादी बीज दब गया था उसने अस्सी के दशक में राजीव गांधी की छाया पाकर फूलना शुरू किया। नब्बे के दशक में उसने एक बार फिर से जड़ पकड़ ली और इक्कीसवीं सदी का जयघोष करते हुए उसकी कोपलें खिल उठीं। आज साम्राज्यवाद की संतानें ऐसा जता रही हैं मानो वे सदियों पुराना वटवृक्ष हैं। जैसे 1857 और 1947 हुआ ही नहीं था। अगले पचास साल भी नहीं लगेंगे जब साम्राज्यवाद की संतानें कहेंगी कि 1947 होना ही नहीं चाहिए था। अगर उसका 1857 की तरह दमन कर दिया जाता तो भारत को महाशक्ति बनने के लिए 2020 का इंतजार नहीं करना पड़ता। जी हां, मनमोहन सिंह उसी साम्राज्यवादी बीज से उत्पन्न हुई संतान हैं। साम्राज्यवाद के सांचे में जो भी समाए हुए हैं, वे मनमोहन सिंह के बच्चे हैं। उनमें छोटे बच्चे भी हैं और बड़े भी।’’ (‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’, 2009) नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह का ही छोटा बच्चा है, जो अब बड़ा बनने के लिए मचल उठा है।
हमने गुजरात कांड पर ‘गुजरात के सबक’ (2002) और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विचारधारा और शैली पर ‘जानिए योग्य प्रधानमंत्री को’ (2002) पुस्तिकाएं प्रकाशित की थीं। सेकुलर साथियों, जिनमें सोनिया के सेकुलर सिपाही भी शामिल थे, ने काफी उत्साह से उन पुस्तिकाओं का स्वागत और प्रचार किया था। पहुंच वाले साथियों ने उन्हें कांग्रेस के प्रचार प्रकोष्ठ और प्रवक्ताओं तक पहुंचाया था। 2004 में राजग की हार हुई और यूपीए की सरकार बनी। लेकिन 2009 के चुनाव के पहले प्रकाशित हमारी पुस्तिका ‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ के प्रकाशन पर उन सब ने चुप्पी साध ली। उसमें मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की, विशेष तौर पर भारत-अमेरिका परमाणु करार के हवाले से, साम्राज्यवादपरस्ती का उद्घाटन है। साथियों ने उस पुस्तिका का न स्वागत किया, न प्रचार। इससे स्पष्ट पता चलता है कि सेकुलर खेमे की चिंता केवल सांप्रदायिकता को लेकर है, नवउदारवाद के खिलाफ वह नहीं है।   
भारतीय राज्य के खिलाफ हिंसक संघर्ष चलाने वाले अतिवामपंथी समूह कहते हैं कि वे भारत के संविधान को नहीं मानते। उन्हें देखना चाहिए कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नेतृत्व में भारत का शासक वर्ग भी भारत के संविधान को नहीं मानता है। यह ठीक है कि भारत का शासक वर्ग कारपोरेट पूंजीवाद की पुरोधा वैश्विक संस्थाओं के आदेश पर काम करता है। लेकिन अपने को माओवादी बताने वाले भी जिन आदेशों को मानते और लागू करना चाहते हैं, वे भारत की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की धारा से नहीं निकले हैं, जिसका कुछ आधार लेकर भारत का संविधान बनाया गया था। बल्कि आजादी के संघर्ष को वे मान्यता ही नहीं देते। उनकी पूर्वज पार्टी सीपीआई ने देश की आजादी को अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का परिणाम माना था, न कि जनता के संघर्ष और बलिदान का। आजादी की पूर्व संध्या पर उसने भारत छोड़ो आंदोलन और उसके  क्रांतिकारियों के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन किया था।  
आजादी अधूरी है, यह अंबेडकर ने भी स्वीकार किया था। लेकिन उनके स्वीकार में अवमानना का भाव नहीं था। उनका संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर उसे पूर्ण करने का सपना था। कांग्रेस के भरोसे वे भी नहीं थे। समता का लक्ष्य हासिल करने का रास्ता लोकतंत्र को मानते थे। लोकतांत्रिक अहिंसक संघर्ष में अंत तक उनकी आस्था रही। इसका अर्थ यह भी बनता है कि आजादी के बाद, गांधी की तरह, अंबेडकर भी कांग्रेस की उपयोगिता नहीं देखते थे। उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और सोशलिस्ट पार्टी के साथ चुनाव लड़ा। भविष्य की राजनीति के लिए सोशलिस्ट पार्टी के साथ तालमेल का प्रयास भी उनके दिवंगत होने के पहले हुआ। 
लेकिन कम्युनिस्टों ने अधूरी आजादी का ठीकरा कांग्रेस और उसके नेताओं के सिर  फोड़ा। अधूरी आजादी से भी ज्यादा उनकी बड़ी शिकायत यह है कि साम्यवादी क्रांति क्यों नहीं की गई? उनकी नजर में भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और उनके साथ जुटने वाली जनता का यह दोष था। आजादी के अधूरेपन में उन्होंने न अपना कोई साझा या दायित्व स्वीकार किया, और, जाहिर है, न उसे पूरा करने के लिए संविधान का रास्ता स्वीकार किया। कम्युनिस्टों की अंतर्राष्ट्रीयता में ‘पिछड़े, दकियानूसी, सामंती, सांप्रदायिक, जातिवादी भारत’ को छोड़ कर सब कुछ हो सकता था। आज के आधिकारिक माक्र्सवादियों के लिए भी संविधान और संसदीय लोकतंत्र मजबूरी का सौदा है।  
भारतीय राज्य बुरा है, कम्युनिस्टों के लिए बात यहीं तक सीमित नहीं रहती। वह अगर उनके कब्जे में नहीं है, तो उनकी मंशा होती है कि उसे दुनिया में होना ही नहीं चाहिए। भारतीय राज्य पर कब्जा नहीं हो पाने पर उन्होंने कांग्रेस की सरपस्ती में संस्थाओं पर कब्जे की रणनीति अपनाई। इस रणनीति के निष्ठापूर्वक निर्वाह का नतीजा यह है कि वे उस रणनीति के बंदी बन कर रह गए हैं। यह सही है कि इस तरह से कम्युनिस्टों ने काफी ताकत हासिल की, लेकिन नवसाम्राज्यवाद विरोध के लिए उस ताकत का कोई उपयोग नहीं है। 
दरअसल, उन्होंने सारी ताकत इस बात में लगा दी कि भारत बेशक कांग्रेस के कब्जे में रहे, भारतीय संदर्भों से जुड़ी समाजवाद या सामाजिक न्याय की कोई धारा जगह नहीं बना पाए। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और शोध संस्थाओं के शीर्ष पर रह कर उन्होंने अपने से अलग विचारों@विचारकों के प्रति संकीर्णता का बर्ताव किया। ऐसे में, जाहिर है, जगह आरएसएस की ही बननी थी, जो अपने स्थापना काल से ‘भारत माता भारत माता’ चिल्लाता चला आ रहा था और कम्युनिस्टों की तरह कांग्रेस में गहरी घुसपैठ रखता था। दरअसल, अधूरी आजादी से असंतुष्ट हो पूर्णता हासिल करने के लिए आरएसएस अगर समय में सुदूर स्थित स्वर्णलोक की तरफ भागा, तो कम्युनिस्ट स्थान में सुदूर स्थित स्वर्णलोक की तरफ। दोनों की आज तक भी कमोबेस वही स्थिति बनी हुई है। 
यह स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यह समीक्षा वाद-विवाद के लिए नहीं की जा रही है। बल्कि आजादी का बचाव हो, वह पूर्ण, मजबूत और उच्चतर हो, इस उद्देश्य से की जा रही है। देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया था। आरएसएस को ठीक करने के पहले अगर अपने को ठीक नहीं किया जाता, तो नवउदारवाद के खिलाफ मोर्चा कभी नहीं जीता जा सकता।      

पूंजीवाद के बीमार  

वैश्विक परिदृश्य पर मचे हिंसा और मौत के तांडव के बावजूद पूंजीवाद की क्रांतिकारी भूमिका के सिद्धांतकार और पैरोकार आज भी अपनी स्थापना वापस लेने को तैयार नहीं होंगे। तीन-चैथाई दुनिया का उपनिवेशीकरण, संसाधनों की लूट, समूचे समुदायों का सफाया करके उनके भूभागों पर कब्जा, युद्धों, गृहयुद्धों, महायुद्धों के वर्तमान तक जारी अनवरत सिलसिले के समानांतर जीवधारियों और वनस्पतियों की असंख्य प्रजातियों का विनाश करते हुए दुनिया को संकट के मुहाने पर ले आने वाला पूंजीवाद आज भी क्रांतिकारी है। पूंजीवादी व्यवस्था की सर्वाधिक यथार्थपरक (रियलिस्टिक) और तर्कपूर्ण (रेशनल) समीक्षा करने वाला गांधी आज भी भारत में मानव प्रगति का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है। पूंजीवाद के बीमार दिमाग की इस समझ के साथ यह समझ लें कि आगे मनमोहन सिंह और मोदी ही आएंगे। गांधी, नेहरू, जेपी, लोहिया या अंबेडकर नहीं आने जा रहे हैं। 
पूंजीवाद का बीमार दिमाग आज भी भारत की स्वतंत्र हस्ती नहीं स्वीकार कर पाता। इस बीमारी का बीज उपनिवेशवादी दौर में पड़ गया था। इसीके चलते उसके लिए अंग्रेज हमेशा सही और भारतीय लड़ाके, चाहे वे रजवाड़े हों, किसान हों, आदिवासी हों, हमेशा गलत थे। किसी भारतीय शासक ने भारत की जनता पर अंग्रेजों जैसा कहर नहीं बरपाया। 1857 भारत के लोगों ने पहला स्वतंत्रता संग्राम लड़ा। उसके दमन में अंग्रेजों ने जो नृशंसता की, दुनिया के इतिहास में उसका उदाहरण नहीं मिलता। किसी भारतीय शासक के राज्य में वैसे भयंकर अकाल नहीं पड़े, जैसे अंग्रेजों के काल में पड़े। जब भारत में अकाल के चलते एक साथ कई लाख लोग एड़ियां रगड़ कर मरते थे, तो भारत या इंग्लैंड में अंग्रेज का एक निवाला भी कम नहीं होता था। जो अंग्रेज, सिपाही हो या नौकरशाह, भारत आ गया, मालामाल होकर गया। भारत में उसका वैभव और रौब-दाब यहां के किसी भी शासक से ज्यादा था। उनकी अय्याशी के किस्से कम नहीं हैं। लेकिन अंग्रेजी राज यहां के शासकों से अच्छा था, पूंजीवाद के बीमार दिमाग में यह मान्यता घुट्टी की तरह गई हुई है।
उपनिवेशवादी शोषण ने भारत को आर्थिक रूप से जर्जर कर दिया था। सबसे ज्यादा शोषण किसानों, आदिवासियों, कारीगरों और मजदूरों का हुआ था। गांधी ने उस यथार्थ के मद्देनजर देश की स्वावलंबी श्रम आधारित विकेंद्रित अर्थव्यवस्था बनाने की बात की। अगर अपनी अर्थव्यवस्था नहीं है, तो आप स्वतंत्र भी नहीं हो सकते। उपनिवेशवादी शोषण की प्रक्रिया में पैदा हुए छोटे मध्यवर्ग ने गांधी का यह विचार स्वीकार नहीं किया। केवल राजनीतिक आजादी के आकांक्षी मध्यवर्ग ने गांधी की इस धारणा को न केवल अस्वीकार किया, पिछड़ा भी बताया। विकास के बने-बनाए पूंजीवादी मॉडल के भरोसे आर्थिक आजादी को वह हथेली पर धरी चीज मानता था। उसके मुताबिक पूरे भारत को मध्यवर्ग में तब्दील होना था। यानी किसानों, आदिवासियों, कारीगरों, मजदूरों, छोटे-मोटे दुकानदारों को उस विकसित भारत में नहीं रहना था। इसके साथ जो अन्य धारणाएं परोसी गईं, उन्हें फैंटेसी ही कहा जा सकता है। मसलन, इस विकास के साथ वर्ण, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि की बाधाएं टूट कर दूर हो जाएंगी। फैंटेसी का इंतिहाई सिरा यह था कि पूरा भारत अंग्रेजी पढ़ेगा, समझेगा और बोलेगा।      
मिश्रित अर्थव्यवस्था और नेहरूवादी समाजवादी लक्ष्य की बाधाओं को पूंजीवादी दिमाग ने पार कर लिया है। उसका नया मरकज अमेरिका है। ‘मैं गुलाम मोहि बेच गुसांई’ की तर्ज पर वह उसके पैरों में बिछा हुआ है। उसके लिए अमेरिका सही ही सही और अमेरिकी गुलामी का विरोध करने वाले गलत ही गलत हैं। पूंजीवाद के बीमार दिमाग से अगर कहें कि अंग्रेजों की अगुआई में कुछ अन्य यूरोपीयों ने अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियनों का सफाया करके, उनका प्रकृति प्रदत्त भूभाग व संसाधन लूट कर; अश्वेतों को जानवरों की तरह खटा कर यह सोने की लंका बसाई है, तो वे कहेंगे, तो क्या हुआ? जैसा कि वे आदिवासियों, किसानों और खुदरा व्यापारियों की तबाही पर कहते हैं। अगर उनसे कहें कि अमेरिका अन्य देशों की संप्रभुता और नागरिक स्वतंत्रता का किंचित भी सम्मान नहीं करता, बल्कि उनके खिलाफ षड़यंत्र करता है, तख्ता पलट करता है, तो भी वे कहेंगे, तो क्या हुआ?  अमेरिका का अंधभक्त यह वही दिमाग है जो उपनिवेशवादी दौर में अंग्रेजों की सराहना में लगा था।  
हमारे मित्र संदीप सपकाले ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर फेसबुक पर नेहरू-अंबेडकर की प्रशंसा की है, जिनके विकास के मॉडल के तहत उनका सशक्तिकरण हुआ है। उनका यह विचार अच्छा है। हालांकि पूंजीवाद के साथ मिल कर सामंती शक्तियों का जो सशक्तिकरण हुआ है, उसके मुकाबले समग्र समाज के रूप में दलितों का सशक्तिकरण नगण्य ही कहा जाएगा। जिन थोड़े-से दलितों का सशक्तिकरण हुआ है, वे भी सामंती तौर-तरीके अपनाते हैं। हमें साथी श्यौराज सिंह बेचैन ने हाल में एक दिन बताया कि दलित समाज में अफसर होना ही कुछ होना माना जाता है। हम लेखक- विचारक अपने में कुछ भी बने रहें, दलित समाज में सम्मान नहीं मिलता। दलित राजनीति में भी अफसरों की ही पूछ है। मायावती के करीब कई दलित लेखकों-विचारकों ने पहुंचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली।   
सपकाले के विचार के साथ दिक्कत यह है कि उन्होंने नेहरू-अंबेडकर की प्रशंसा करने के साथ, समाजवाद की बात करने वालों की भत्र्सना भी की है। यानी वे नवउदारवाद, उनके मुताबिक जिसके विरोध में कुछ लोग समाजवाद की वकालत करते हैं, को नेहरू और अंबेडकर की विचारधारा की परिणति मानते हैं। और उस परिणति को सही भी मानते हैं। नेहरू आजादी के संघर्ष के दौर से समाजवादी विचारों के लिए जाने जाते थे। आजादी के बाद सोशलिस्टों के कांग्रेस से बाहर आ जाने के बाद और उनकी तीखी आलोचना के जवाब में उन्होंने कांग्रेस पार्टी का लक्ष्य समाजवाद निर्धारित किया था। अंबेडकर नेहरू से अलग कुछ और भी सोच रहे थे, तभी उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई थी। उनका लक्ष्य भी लोकतांत्रिक रास्ते से समाजवाद लाना था। सपकाले नेहरू और अंबेडकर को पूंजीवाद के समर्थन में खींचते हैं। इस तरह की खींचतान करके पूंजीवाद का समर्थन करने वाले दलित विचारकों की कमी नहीं है।  
पूंजीवाद अगर दलितों को सामाजिक-आर्थिक मुक्ति दिला दे तो उसके स्वागत का कम से कम भारत में पूरा औचित्य बनता है। लेकिन ऐसा संभव नहीं है। पूंजीवाद चाहता तो कुछ निर्णायक प्रयास कंपनी राज के दौर में ही कर सकता था। मसलन, अंग्रेज चाहता तो जमींदारी प्रथा लागू करते वक्त कुछ जमींदार दलित समाज से भी बना देता। आदिवासियों के जंगल पर धावा बोलने वाले अंग्रेज को जमींदारी बड़ी बात लगती थी, तो दलितों को खेती अथवा बागवानी के लिए कुछ जमीन दे देता। चाहे चर्म उद्योग का ही, एकमात्र अधिकार दलितों को दे देता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसका सहोदराना सामंती शक्तियों के था - भारत में भी और इंग्लैंड में भी। हमें हैरानी होती है कि अश्वेतों के साथ अमेरिकी गोरों ने जो किया, उसके बावजूद दलित विचारक अमेरिका का गुणगान करते हैं।    
दलित विमर्श, दलित अस्मिता, दलित चेतना की बात करते वक्त यह ध्यान रखना जरूरी है कि दलित समाज केवल आरक्षण के तहत अथवा अपनी मेधा से संगठित क्षेत्र में आ जाने वाले लोगों तक सीमित नहीं है। दलित समाज में सम्मान अगर केवल अफसरी से मिलता है, तो पूंजीवाद से लाभान्वित दलित समाज का दायरा और भी सिकुड़ जाता है। (हालांकि हम संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण को पूंजीवादी व्यवस्था की देन नहीं मानते। अलबत्ता अब जो निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग की जा रही है, वह पूंजीवादी व्यवस्था की देन होगा।) ध्यान दिया जा सकता है कि आगे बढ़े हुए दलित कभी भी दलितोत्थान के ऐसे प्रयास यानी रचनात्मक कार्य नहीं करते, जिनके चलते बाहर छूटे दलितों में शिक्षा और चेतना का प्रसार हो; उन्हें रोजगार के बारे में जानकारी, उचित निर्देशन और प्रशिक्षण मिल सके। यह रचनात्मक काम बड़े पैमाने पर करके वे खुद पहल कर सकते हैं कि आरक्षण का लाभ लेकर कुछ हद तक सशक्त बन चुके परिवारों के पहले अब बाहर छूटे परिवारों को आरक्षण मिले। लेकिन वे रचनात्मक काम नहीं करते। एनजीओ बनाते हैं, जो पूंजीवादी तंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। 
यह सच्चाई जानने के लिए बहुत गहराई में जाने की जरूरत नहीं है कि दलित पूंजीवाद की बात करने वाले पूंजीवाद के पहलवानों के प्यादे ही रह सकते हैं। पूंजीवाद ने कितनी गहरी पैठ बनाई है और सवर्ण भारत के कितने लोग यूरोप-अमेरिका तक जमे हैं, उनमें टूटी-फूटी अंग्रेजी और गांठ में चवन्नी लेकर शामिल नहीं हुआ जा सकता। जाति को लेकर जाने पर बड़ी जाति वहां पहले से मौजूद है। जिस जाति को सदियों से छोटा बनाया गया हो, उसे सदियों से बड़ी जाति के मुकाबले कभी भी खड़ा नहीं किया जा सकता। अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित जाति निर्मूलन ही उसका उपाय है।  
सशक्त दलितों द्वारा पूंजीवाद की पूजा, दरअसल, दलित समाज के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ की साधना है। यह प्रवृत्ति बाकी जाति समूहों में भी देखी जा सकती है और यह पूंजीवाद की देन है। समता विरोधी ब्राह्मणवाद की जितनी निंदा की जाए, कम है। लेकिन उसके साथ दलित समाज में ही विषमता बढ़ रही हो तो समझ लेना चाहिए खोट कहीं और भी है। सत्ता पाकर मद में आ जाना केवल सामंतवाद-ब्राह्मणवाद की मूल विशेषता नहीं है। जैसे भारत के अगड़े समाज को हजारों साल गुलाम रहने के कुछ कारण अपने चरित्र में खोजने चाहिए, उसी तरह वर्ण व्यवस्था के गुलाम बनाए गए पिछड़े और दलित समाज को भी आत्मालोचन करने की जरूरत स्वीकार करनी चाहिए। 
हम फुले-अंबेडकर से लेकर आज तक के दलित विचारकों की ‘अंग्रेज-भक्ति’ का बुरा नहीं मानते। जो मानते हैं उन्हें देख लेना चाहिए कि यह अंग्रेजभक्त सवर्ण समाज ही था, जिसने 200 साल तक उन्हें यहां काबिज बनाए रखा। कई लाख भारतीयों की हत्या के बाद उन्हें अपनी ‘प्रजा’ का दर्जा देने आईं इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की शान में पढ़े गए कसीदे देख लेने चाहिए। अंग्रेजों के भारत में आने और उपनिवेश कायम करने में दलितों की कोई भूमिका नहीं थी। लेकिन अगर दलित विचारक पूंजीवाद के पक्के पक्षधर बनते हैं, तो उसके साथ अंबेडकर का नाम ज्यादा दिन नहीं चल सकता है। अंबेडकर पूंजीवाद के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने निजी क्षेत्र में आरक्षण की न बात की, न संविधान में प्रावधान किया। वे चाहते थे कि जल्दी ही समता मूलक आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था बने और आरक्षण की जरूरत न रहे। 
गांधी का कहना था कि अंग्रेजों ने हमें गुलाम नहीं बनाया, हम खुद उनके गुलाम बन गए। आज हम देखते हैं कि गांधी ने जिस समाज को आजादी की होड़ में लगाया था और आजादी हासिल भी की थी, वह गुलामी की होड़ में दौड़ रहा है। गोया उसे पूर्णता में हासिल करके रहेगा! इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है कि गांधी को अब सबसे ज्यादा गाली दलित विचारकों की ओर से पड़ती हैं। लेकिन दलितों द्वारा गांधी को गाली देने का व्यापार भी ज्यादा दिन नहीं चलने वाला नहीं है। गांधी को उनका सबसे ज्यादा नाम लेने वाली कांग्रेस ने खत्म कर दिया है। 
नरसिम्हा राव से लेकर मनमोहन सिंह तक उन्हें कई बार नवउदारवाद के हमाम में खींच चुके हैं। आपने सुना ही है कि बराक ओबामा भी गांधी का भक्त है! पूंजीवाद के बीमार दिमाग को गांधी की जरूरत क्यों पड़ती है, इस पर हमने अन्यत्र विस्तार से लिखा है। वह दूसरों को धोखा देने से ज्यादा अपने को धोखे में रखने के लिए गांधी का नाम लेता है। वह जानता है उसने इंसानियत के ऊपर बाजार और हथियार का पहाड़ खड़ा किया हुआ है। वह यह भी जानता है कि उसे आगे यही करते जाना है। इस उपक्रम में वह कई करोड़ लोगों सहित असंख्य जीवधारियों की हत्या कर चुका है। गांधी के नाम में वह अपने इंसान होने की तसल्ली पाता है। पूंजीवादी दिमाग अपनी बीमारी की दवा के रूप में भी गांधी को रखता है, तो आने वाली दलित पीढ़ियों को उन्हें गाली देने की जरूरत नहीं रह जाएगी।  
स्वदेशी का राग अलापने वाला आरएसएस पूंजीवाद का सबसे बड़ा बीमार है। रोग असाध्य न हो जाए, इसके पहले आरएसएस को गंभीरता से आत्मालोचन करना चाहिए। उसे सचमुच सोचना चाहिए कि इतने लंबे समय में एक भी चिंतक, कलाकार, साहित्यकार वह पैदा नहीं कर पाया है। सत्ता और सुविधाओं के लालच में भले ही कुछ रचनाकार और विचारक उसके साथ नाता बना लेते हों। संघ के बाहर स्वयंसेवक पराया और नकलची बन कर रह जाता है। विचार और कला की दुनिया से बहिष्कृत आरएसएस को अपने अलग ‘बौद्धिक’ और ‘सांस्कृतिक’ चलाने की नहीं, सोच और दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है। वरना एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में उसकी पहचान आगे भी कभी खड़ी नहीं हो पाएगी। उसके हिंदुत्व की सार्थकता केवल भाजपा को राजनीतिक सत्ता दिलाने तक ही सीमित रही है और आगे भी रहेगी। सत्ता हथियाने का हथकंडा जीवन दर्शन नहीं हो सकता।  

इतिहास की सीख 

आजादी अगर खोती है तो उसे दोबारा पाना बहुत कठिन होगा। उससे आसान है कि हम पूंजीवाद के बारे में अपनी धारणाओं को निर्णायक रूप से बदलें। भारत और तीसरी दुनिया के लिए आजदी के क्या मायने हैं और क्यों उपनिवेशवादी वर्चस्व से आजादी हासिल करने के बावजूद गुलामी फिर से कायम हो रही है, इस पर लोहिया के बाद सबसे प्रखर राजनीतिक चिंतन किशन पटनायक ने किया है। नब्बे के दशक से नई आर्थिक नीतियों के रूप में शुरू हुए नवसाम्राज्यवादी हमले के मुकाबले की ठोस राजनीति खड़ी करने की लगातर कोशिश भी उन्होंने की। एक माहौल बना भी कि नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ सन्नद्ध हुए छोटे, एक मुद्दे पर स्थानीय स्तर पर होने वाले जनांदोलनों को जोड़ कर नवउदारवाद के खिलाफ वैकल्पिक राजनीति का निर्माण किया जाए। दलित, आदिवासी और शूद्र नेतृत्व आगे आए और उसकी अगुआई करे। लेकिन विदेशी धन पर पलने वाले एनजीओपरस्तों, जिनमें कई प्रमुख जनांदोलनकारी भी शामिल हैं, ने उनके प्रयासों को फलीभूत नहीं होने दिया।  
चर्चा को समाप्त करने से पहले किशन पटनायक के महत्वपूर्ण और चर्चित निबंध ‘गुलाम दिमाग का छेद’ से एक उद्धरण द्रष्टव्य है, ‘‘हमारे जितने राष्ट्रीय बुद्धिजीवी हैं (जिस तरह से कुछ अंगरेजी अखबारों को राष्ट्रीय अखबार कहा जाता है, उसी तरह कुछ अंगरेजी वाले बुद्धिजीवियों को राष्ट्रीय बुद्धिजीवी कहा जा सकता है) उनमें कुछ अपवादों को छोड़ कर किसी ने यह नहीं माना है कि 1757 के प्लासी-युद्ध में पराजय के कारण भारत बरबाद हो गया, उसकी अपूरणीय क्षति हुई। ‘आजादी खोना बुरी बात तो है ही, लेकिन ... ’। ‘लेकिन’ के लहजे में हमारा बुद्धिजीवी ऐसी बातें कहने लगेगा मानो आजादी खोना कोई पछतावे की बात नहीं है, उसकी कीमत पर हमने इतना सारा फायदा हासिल किया है कि हमें अंगरेजों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने हमें दास बनाया। 
‘‘भारत के कितने अंगरेजी लिखने-बोलने वाले बुद्धिजीवी हैं जो भारत के आधुनिकीकरण के लिए अंगरेजी हुकूमत को श्रेय नहीं देत? जो यह नहीं मानते कि अगर भारत पर ब्रिटिश हुकूमत नहीं होती तो भारत आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ओर अंगरेजी भाषा का उतना फायदा नहीं उठा पाता, जितना वह आज उठा रहा है? अपवाद के तौर पर ही ऐसे लोग मिलेंगे। 1857 की असफल क्रांति के बारे में हमारे कुछ प्रसिद्ध इतिहासकारों ने लिख दिया है कि जो हुआ, वह अच्छा ही हुआ। अगर 1857 की क्रांति सफल हो जाती तो भारत अज्ञान के अंधकार और अंधविश्वास के गर्त में डूबा रह जाता ऐसा मानने वालों के मस्तिष्क् के बारे में सोचना पड़ेगा। प्रश्न यह है कि कहीं उनके मस्तिष्क् में कोई देइ तो नहीं हो गया है, अन्यथा सामने पड़े हुए तथ्यों को वे कैसे जनरअंदाज कर देते हैं। उनके सामने यह तथ्य है कि कि जापान और चीन यूरोपीय हुकूमत के अधीन नहीं रहे। क्या चीन और जापान का आधुनिकीकरण भारत से कम हुआ है?’’ (‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’, पृ. 22) 
जहिर है, हमारी आधुनिकता और आधुनिकीकरण की समझ इस तरह की बनी है कि भारत की स्वतंत्रता या स्वतंत्र भारत की जगह उसमें नहीं बन पाती। यह जटिल समस्या है जिसके समाधान के लिए सभी बौद्धिक समूहों और राजनीतिक पार्टियों के समग्र और गंभीर उद्यम की जरूरत है। इतिहास में हो चुकी गलतियों को अनहुआ नहीं किया जा सकता। लेकिन उनसे शिक्षा कभी भी ली जा सकती है। प्रसिद्ध कथन है, जो इतिहास से सबक नहीं सीखते, वे उसे दोहराने को अभिशप्त होते हैं। हमें इतिहास से यह सबक लेना होगा कि उपनिवेशवाद का विरोध किए बगैर नवसाम्राज्यवाद का विरोध नहीं किया जा सकता।  

25 अगस्त 2013