Monday, April 30, 2012

गुजरात दंगों की टाट में पैबंद

हिन्दुस्तान में शायद ही कोई हो जो कलाम को बतौर राष्ट्रपति याद रखता हो। सभी के मन में कलाम की छवि एक साहसिक वैज्ञानिक की है, जो भारतीय परंपरा की जीती जागती मिसाल हैं। कलाम साहब का चयन ही ग़लत था, भाजपा ने उन्हें गुजरात दंगों की टाट में पैबंद की तरह इस्तेमाल किया था। और कलाम साहब खुशी खुशी राजी हो गए। पहले कहते रहे दौड़ में नहीं हैं, लेकिन जब अवधि पूरी हुई तो फिर रेस में आ गए। पिछली दफा तर्क ये दिया था कि उन्हें दोबारा राष्ट्रपति बनने के समर्थन में देश भर से इतने ई मेल आए कि उनका मेल आई डी ही हैंग हो गया। जवाब में प्रभाष जी ने जनसत्ता में लिखा था कि .. कलाम साहब जितने मेल से एक ई मेल आई डी हैंग होता है उतने में हिन्दुस्तान जैसे देश में नगर निगम का भी चुनाव नहीं जीता जाता। हम कुछ नहीं कहते बस इतना कहते हैं कि कलाम साहब पिछले कार्यकाल की पांच उपलब्धि बताकर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ें
कलाम साहब हर भारतीय की तरह मेरे भी दिल में बसते हैं। लेकिन एक राष्ट्रपति के रूप में नहीं। मैं उनके राष्ट्पति बनने का विरोध इसलिए कर रहा हूं क्योंकि हमारे जैसे लोगों को ये लगता है कि उस पद के लिए जितनी सार्वजनिक जीवन और संविधान की जानकारी चाहिए उतनी डॉ कलाम में नहीं है। इसका उदाहरण हमने तब देखा जब विदेश दौरे पर होते हुए भी कालम साहब ने रातों रात बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने वाली बूटा सिंह की फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए। जबकि वे कैबिनेट की सिफारिश को लौटा सकते थे। अतित में उनसे पूर्व के कई राष्ट्रपतियों ने कई बार ऐसा किया है। कलाम साहब का क्षेत्र अलग है और वे उनके सूरमा रहे हैं। और हमने उन्हें राष्ट्रपति बनने से पहले ही इस काम के लिए भारत रत्न से नवाजा भी है जो देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। लब्बोलुआब ये है कि कलाम साहब जब राष्ट्रपति बने तब भी एक मोहरे मात्र थे , और अगर अब वे चुनाव लड़ते हैं तो भी वे एक मोहरे मात्र होंगे।
रही बात भारतीय जनता पार्टी की तो मेरा विरोध केवल उससे नहीं है और ऐसा हो भी नहीं सकता क्योंकि ये तो उस राजनीतिक विचार और धारा की एक प्रतिनिधि संस्था मात्र है जिससे हमारा विरोध है। और हां आज़ाद भारत में इस धारा का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कांग्रेस का । ये वही धारा है जिसने इस देश में विभाजन की त्रास्दी के बाद कभी भी हिन्दु मुस्लिम एकता की दीवार खड़ी नहीं होने दी। ये वही धारा है जिसने गांधी को गोली मारी और बाबरी मस्जिद गिराकर इस देश के करोड़ों मुस्लमानों में अवि·ाास का माहौल खड़ा कर दिया। ये वही धारा है जिसने गुजरात में कत्ले आम कराए और स्वदेशी के नाम पर वोट मांगकर जब सत्ता में आए तो दुनिया में पहली बार विनिवेश मंत्रालय बनाया । यहां तक कि इस धारा की मातृ संगठन को तिरंगे पर भी एतबार नहीं है। ख़ैर गुनाह गिनने से कोई फायदा नहीं नहीं, अगर मान भी लिया जाए कि कांग्रेस सांप्रदायिक है तो इससे बीजेपी कैसे धर्मनिरपेक्ष हो सकती है। 
-राजेश कुमार