Wednesday, November 28, 2012

विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा - प्रेम सिंह


(नव उदारवाद और सांप्रदायिकता के खतरे से जो लोग लगातार आगाह कर रहे हैं उनमें डॉ प्रेम सिंह का नाम अग्रणी हैं। डॉ प्रेम सिंह का ये लेख आम आदमी पार्टी को लेकर गहराए धुंध साफ करता है। जिसमें समाजवादी से लेकर वामपंथी बुद्धिजीवी भी भ्रमित हो गए हैं।  भ्रष्टाचार हटाओ की गंगा में डुबकी लगाकर जिन्होंने पूरे देश के जन आंदोलनों को दिग्भ्रमित किया है। प्रेम सिंह की कलम उनसे कुछ वाजिब सवाल कर रही है। हमारा मानना है कि, अब जब एनजीओबाजों ने राजनीतिक चोला पहन लिया है तो ये हमारी राजनीति पर अब तक का सबसे गंभीर हमला है। )

ऐसा माना जा रहा था कि बेतहाशा बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी तथा 2014 में होने वाले आमचुनाव के डर से नवउदारवाद के रास्ते पर यूपीए सरकार के कदम कुछ ठिठकेंगे। चैतरफा लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों से भी सरकार डरेगी। व्यक्तिगत तौर मनमोहन सिंह की ईमानदारी का मिथक टूटने का भी सरकार पर कुछ दबाव बनेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पिछले दिनों उनकी सरकार ने बहादुराना अंदाज में, खुद अपनी पीठ ठोंकते हुए, नवउदारवादी सुधारों की रफ्तार तेज कर दी और इस तरह चुनाव के एक-दो साल पहले नवउदारवादी सुधारों को स्थगित रखने की अभी तक बनी रही बाधा को पार कर लिया। पिछले साल नवंबर में संसद में किए गए अपने वादे को तोड़ते हुए खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साल भर से स्थगित फैसले को लागू करने की एकतरफा घोषणा के साथ सरकार ने बीमा, पेंशन और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में भी विदेशी निवेश को स्वीकृति प्रदान की।

पैट्रोल और गैस के दामों में भारी वृद्धि के साथ इन घोषणाओं से सरकार ने कारपोरेट जगत और नवउदारवादी सुधारों के पैरोकारों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह अमीरोन्मुख ग्रोथ की अपनी टेक पर पूरी तरह कायम है। वह गरीबों द्वारा बनाई गई अमीरों की अमीरों के लिए सरकार है। उसने यह भी एक बार फिर से घोषित किया है कि ग्रोथ बढ़ाने के लिए विदेशी निवेश ही एकमात्र संजीवनी है। हर संदेश का एक प्रतिसंदेश होता है। वह नवउदारवादी नीतियों से बदहाल जनता के लिए है कि सरकार अब उसकी चुनावी परवाह भी नहीं करने जा रही है। नवउदारवादी निजाम के पिछले दो दशकों में यह सरकार का निस्संदेह बड़ा जनता विरोधी हौसला है जो उसने दिखाया है। देश में 4 करोड़ खुदरा व्यापारी हैं जिन पर उनके 20 से 25 करोड़ परिवारजनों का भार है। हर हौसले के पीछे अंदरूनी या बाहरी ताकत होती है। सरकार का बढ़ा हुआ हौसला वैश्विक पूंजीवादी ताकतों की देन है।

मनमोहन सिंह जब कहते हैं कि अब कदम पीछे नहीं हटाए जा सकते। यह उनकी मजबूरी का इजहार नहीं है कि रास्ते का चुनाव एक बार हो गया तो उस पर चलना ही होगा। ऐसा नहीं है कि वे चुनाव की गलती से नवउदारवादी रास्ते पर चले गए थे और अब उस पर चलना मजबूरी बन गया है; मजबूरी में उन्हें ये सब निर्णय लेने पड़े हैं। ऐसा होता तो आगे कभी नवउदारवादी नीतियों में बदलाव की आशा बनती। मनमोहन सिंह शुरू से नवउदारवादी रास्ते को ही विकास और सब कुछ का एकमात्र और स्वाभाविक रास्ता मानते हैं। तभी उन्होंने एक बार फिर कहा है कि अगर उन्हें जाना है तो इस रास्ते पर अडिग रह कर लड़ते हुए जाएंगे। अन्यथा रोबो की तरह लगने वाले मनमोहन सिंह नवउदारवाद के बचाव में अत्यंत संजीदा हो जाते है - ‘कुर्बान हो जाएंगे, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे!’

मनमोहन सिंह की इस प्रतिभा और जज्बे की पहचान सोनिया गांधी ने बखूबी की है। उन्हें यह साफ पता लग गया कि यही बंदा काम का है जो इस रास्ते पर लाखों के बोल सह कर और लाखों को गारत करके भी पीछे नहीं हट सकता। क्योंकि उनकी खुद की तरह वह कोई और रास्ता जानता ही नहीं है। मामला केवल मनमोहन सिंह को आगे रख कर राहुल गांधी के लिए रास्ता बनाने भर का नहीं है। इस काम के लिए कांग्रेस में चाटुकार नेताओं की कमी नहीं है। लेकिन कांग्रेस का अन्य कोई भी नेता वह नहीं कर सकता था जो मनमोहन सिंह ने किया। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सम्मिलित प्रतिभा ने कांग्रेस के इतिहास और विचारधारा को धो-पोंछ कर उसे एक ‘कारपोरेट पार्टी’ में तब्दील कर दिया है। इसीलिए मनमोहन सिंह के बाद राहुल गांधी चाहिए, जिसके जिस्म में मनमोहन सिंह का दिमाग पैदा करने की कवायद लंबे समय से की जा रही है।

लेकिन मनमोहन सिंह का कमाल कांग्रेस के कायापलट तक सीमित ही नहीं है; उन्होंने भारत की पूरी राजनीति को कारपोरेट रास्ते पर डाल दिया है। मनमोहन सिंह ने जो नवउदारवादी ‘ब्रह्मफांस’ फेंका है, उसमें सब फंसे हैं। उसकी काट आज किसी के पास नहीं है ताकि मानव सभ्यता को पूंजीवादी बर्बरता से मुक्त किया जा सके। मनमोहन सिंह ललकार कर पूछते हैं किसी के पास है तो बताओ? ऐसा नहीं है कि लोग लड़ नहीं रहे हैं या आगे नहीं लड़ेंगे। लेकिन हर बार जीत मनमोहन सिंह की ही होती है। किसी भी तरह ‘साइनिंग इंडिया’ की चकाचैंध में पलने वाले इस अंधे युग में पलीता नहीं नहीं लग पाता। नरेंद्र मोदी हों या राहुल गांधी या बीच में कुछ समय के लिए कोई क्षेत्रीय क्षत्रप, अभी जीत मनमोहन सिंह की ही होनी है।

जो कहते हैं मनमोहन सिंह अभी तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं, उन्हें अपनी धारणा पर फिर से विचार करना चाहिए। भारत की राजनीति की धुरी को संविधान से उखाड़ कर पूंजीवाद की वैश्विक शक्तियों की उन संस्थाओं, जिन्होंने पूरी दुनिया पर शिकंजा कसा हुआ है, के आदेशों@मूल्यों पर जमा देने में उनकी युगांतरकारी भूमिका है। मुख्यधारा राजनीति में उनकी आलोचना करने वाले नेता दरअसल उन्हीं के आज्ञाकारी बच्चे हैं। उन्हें अभी तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री कहते न थकने वाले अडवाणी और हमेशा उनकी ‘मेंटर’ को निशाना बनाने वाले नरेंद्र मोदी समेत।

उनकी यह युगांतरकारी भूमिका तभी सफलीभूत हो सकती थी जब वे भारत की कांग्रेसेतर राजनीति को भी अपने पीछे लामबंद करने के साथ बुद्धिजीवियों को भी काबू में कर पाते। ऐसा उन्होंने किया है। मनमोहन सिंह के राज में बुद्धिजीवियों की हालत का क्या कहिए! जिधर देखो मनमोहन सिंह का दिमाग ही चलता नजर आता है। किसी भी समाज के सबसे प्रखर बौद्धिक शिक्षा और शोध के संस्थानों में होते हैं। भारत के विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों और शोध संस्थनों तक मनमोहन सिंह की खुली हवा चल रही है। भारत के बुद्धिजीवियों के संदर्भ में किशन पटनायक ने जिसे ‘गुलाम दिमाग का छेद’ कहा था, वह बढ़ कर बड़ा गड्ढा बन गया है।

नवउदारवादी और प्रच्छन्न नवउदारवादी बुद्धिजीवी तो मनमोहन सिंह के सच्चे बच्चे ठहरे, अपने को नवउदारवाद विरोधी कहने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग का दिवाला निकलता जा रहा है। घूम-फिर कर उनका विश्लेषण पूंजीवाद का विश्लेषण होता है और तर्क भी पूंजीवाद के समर्थन में होते हैं। कारपोरेट पूंजीवाद की हर शै में विकास का दर्शन करने वाले माक्र्सवादियों, गांधीवादियों और समाजवादियों की कमी नहीं है। ज्योति बसु यह पुराना मंत्र देकर गए कि पूंजीवाद के बिना समाजवाद नहीं लाया जा सकता। उनके उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अमेरिकी कूटनीतिज्ञों के सामने अपनी पीड़ा का इजहार किया कि कई तरह के दबावों के कारण वे ऊंची पूंजीवादी उड़ान नहीं भर पाते हैं। सिंदूर-नंदीग्राम प्रकरण के वक्त प्रकाश करात ने विरोधियों को विकास विरोधी कह कर लताड़ लगाई थी।

भाजपाई मनमोहन सिंह के मनभाए साथी बने हुए हैं। ‘शाइनिंग इंडिया’ की पुकार सबसे पहले उन्होंने ही दी थी। पिछले दिनों ‘इंडियन एक्सप्रैस’ के स्तंभ लेखक सुधींद्र कुलकर्णी ने एक मोबाइल के विज्ञापन-गीत - ‘जो मेरा है वो तेरा है’ - को समाजवाद के विचार का सुंदर वाहक बताया। वे वहीं नहीं रुके। उन्होंने उसे गांधी से भी जोड़ा। आप कहेंगे संघी और गांधी ... ? नवउदारवाद का यही कमाल है। उन्हीं दिनों उनकी ‘म्युजिक आॅफ दि स्पीनिंग व्हील ः महात्मा गांधीज मेनीफेस्टो फॉर दि इंटरनेट एज’ किताब आई जिसका दिल्ली और बंगलुरू में भव्य विमोचन समारोह हुआ। समारोह में परमाणु ऊर्जा के पैरोकार पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम सहित उद्योग, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और राजनीति जगत की कई हस्तियों ने हिस्सा लिया। नवउदारवाद की बड़ी विभूतियों आजकल बढ़चढ़ कर गांधी-प्रेम का प्रदर्शन करती हैं। ध्यान दिला दें कुलकर्णी साहब भाजपा के सिद्धांतकारों में से एक हैं, जिसके कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में पट्टी पढ़ाई जाती है कि वे ऋषियों-मुनियों की धरोहर के वारिस हैं। गुलाम दिमाग कितनी तरह के पाखंड करता है!

भारत के नागरिक समाज में मनमोहन सिंह के बच्चों की भरमार है। खुद मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की धूम है। लेकिन उन्हें रत्ती भर परवाह नहीं है। वे जानते हैं आरोप लगाने वाले उनके ही दूध पीते बच्चे हैं। भारत माता के स्तनों में तो पूंजीवाद ने दूध की बूंद छोड़ी नहीं है। भारत माता के बच्चे बिलखते हैं और ये चिल्लाते हैं। भारत के नागरिक समाज को गुस्सा बहुत आता है लेकिन उसे कभी ग्लानि नहीं होती। मनमोहन सिंह से ज्यादा कौन जानता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सारी फूफां के बावजूद उसमें शामिल होने वालों ने रत्ती भर भ्रष्टाचार करना बंद नहीं किया है। वे जानते हैं केवल नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, दलाल और माफिया नहीं, हर दफ्तर के बाबू और चपरासी तक भ्रष्टाचार का बाजार पहले की तरह गरम है। पहले की तरह सरकार की गरीबों के लिए बनाई योजनाओं का ज्यादातर पैसा अफसर और बाबू खा जाते हैं।

मनमोहन सिंह जानते हैं उनसे कोई मुक्त होना नहीं चाहता। सब उनके मोहताज हैं। वरना जिस देश में पिछले पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोध की भावनाएं हिलोरें ले रही हों, जन लोकपाल कानून जब बनेगा तब बनेगा, आंदोलन में शामिल नागरिक समाज को कम से कम अपना भ्रष्टाचार बंद कर देना चाहिए था। उससे गरीब जनता को निश्चित ही राहत मिलती। आप कहेंगे कि भावना की क्या बात? जब जन लोकपाल कानून बन जाएगा, अपने आप भ्रष्टाचार होना बंद हो जाएगा। नागरिक समाज भी बंद कर देगा। यह भ्रष्ट सरकार कानून बनाए तो!

लेकिन भावना उतनी बुरी नहीं होती। राष्ट्रीय भावना भी नहीं। भावना में निस्संदेह एक ताकत होती है। किशन पटनायक ने अपने ‘प्रबल आर्थिक राष्ट्रवाद का समाधान’ लेख में कहा है कि अपनी खदानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देना सही है या गलत, इस पर बहस करने वाला उनकी रक्षा नहीं कर पाएगा। सवाल यह उठाया जा रहा था कि केवल भावनाओं में बह कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करना ठीक नहीं है। अभी लोग समझ नहीं रहे हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बहुत गहराई में जाकर नुकसान किया है। अपने वर्ग-स्वार्थ के लिए इसने भावना की ताकत को नष्ट कर दिया है। यह सही है कि इस आंदोलन के केंद्र में खाया-पिया और कुछ हद तक अघाया मध्य वर्ग है। लेकिन शुरू से ही वह जन-भावना का शिकार करने की नीयत से परिचालित है। उसके वर्ग-स्वार्थ की सिद्धि में नवउदारवाद की मार से तबाह जन-सामान्य शामिल हो जाए तो उसका काम पूरा हो जाएगा। इसके लिए अब उसने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली है जिस पर हम थोड़ा आगे विचार करेंगे।

चाहते मनमोहन सिंह भी हैं कि पूंजीवाद का काम बिना भ्रष्टाचार के चले। लेकिन पिछली तीन-चार शताब्दियों का उसका इतिहास बेईमानी और भ्रष्टाचार का इतिहास रहा है। जब अमेरिका में लीमैन ब्रदर्स और गोल्डमैन फैक्स बैंक दिवालिया हुए तो पता चला कि उसके बड़े अफसर किस कदर भ्रष्टाचार में डूबे थे। उपनिवेशवादी दौर के प्रमाण हैं कि उपनिवेशों में आने वाले यूरोपीय मालामाल होकर अपने देश वापस जाते थे। उपनिवेशवादियों ने भ्रष्टाचार की चाट साहब लोगों ने स्थानीय अमले को भी अच्छी तरह लगा दी थी। भारतेंदु ने कहा था ‘‘चूरन साहब लोग जो खाता पूरा हिंद हजम कर जाता।’’ अंग्रेज बहादुर के वारिस अगर हिंद हजम कर रहे हैं तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है। यह व्यवस्था छोटे और मेहनत करने वाले लोगों के शोषण और बड़े और मेहनत नहीं करने वाले वाले लोगों की बेईमानी पर चलती और पलती है। सभी जानते हैं देश में कानूनों की कमी नहीं है और न ही जन लोकपाल कानून बनने से भ्रष्टाचार खत्म होने वाला है। इस व्यवस्था के समर्थक ही कह सकते हैं कि इसे मिटाए बिना भ्रष्टाचार मिटाना है।

यह सही है कि सरकार के नवउदारवादी सुधार तेज करने के निर्णय के पीछे मुख्यतः कारपोरेट पूंजीवाद की वैश्विक शक्तियां हैं। मनमोहन सिंह भारत में उन शक्तियों के स्वाभाविक और सफल एजेंट हैं। इसलिए उन्हें अमेरिकी दबाव और खुदरा व्यापारियों की तबाही के आरोप सनसनी फैलाने वाले लगते हैं। लोग समझते नहीं, लेकिन वे यही कहना चाहते हैं कि अमेरिकी दबाव कब नहीं रहा और पिछले 25 सालों में गरीबों की तबाही कब नहीं हुई? वे कहते हैं कि उनके आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने से लेकर आज तक ये आरोप लगाए जाते रहे हैं। न वे पहले रुके, न अब रुकेंगे। हाय-तौबा करने की जरूरत नहीं है। उससे कुछ नहीं होने वाला है। अमीरोन्मुख ग्रोथ बढ़ाने के लिए गरीबों को मंहगाई और बेरोजगारी की मार झेलनी होगी। उन्हें प्रतिरोध करना छोड़ कर मंहगाई और बेरोजगारी में जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। मनमोहन सिंह को आश्चर्य होता है कि 20 साल से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद लोगों को यह आदत नहीं पड़ी है। उन्हें यह आदत डालनी ही होगी। कम से कम तब जब तक उनका सफाया नहीं हो जाता!

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की प्राथमिकता मंहगाई और बेरोजगारी रोकना नहीं, उसके चलते होने वाले प्रतिरोध का दमन करना बन गई है। संसाधनों की मिल्कियत कंपनियों को सौंपने और खुदरा समेत विभिन्न क्षेत्रों में कंपनियों को न्यौतने के फैसलों के विरोध का दंड कड़ा होता है। मनमोहन सिंह जब कहते हैं, उन्हें जाना है तो लड़ते हुए जाएंगे, तो उनकी लड़ाई को कोरा लोकतांत्रिक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उनके दिमाग में अपनी लड़ाई में सुरक्षा बलों को शामिल रखने की बात होती है। देश के कई हिस्सों में जो हालात बने हुए हैं वे बताते हैं कि देश को पुलिस स्टेट बनाने में उन्हें कोई हिचक नहीं है।

सरकार के खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले की समीक्षा हम यहां नहीं करने जा रहे हैं। उसके लिए हमारा ‘खुदरा में विदेशी निवेश ः नवउदारवाद के बढ़ते कदम’ (‘युवा संवाद’, फरवरी 2012) ‘समय संवाद’ देखा जा सकता है। हम यह कहना चाहते हैं कि खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सीनाजोरी फैसले के पीछे भले ही और निश्चित ही वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था और उसे चलाने वाली संस्थाओं@शक्तियों का हाथ है, लेकिन उसका एक बड़ा कारण घरेलू भी है। यह फैसला मनमोहन सिांह और उनकी सरकार ने इसलिए बेधड़क होकर लिया है, क्योंकि पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने नवउदारवाद के वास्तविक विरोध के समस्त प्रयासों को पीछे धकेल दिया या धूमिल कर दिया है।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नेता अब राजनीतिक पार्टी बना रहे हैं। वह पार्टी, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, चुनावों में कांग्रेस और भाजपा का नहीं, बल्कि नवउदारवाद की वास्तविक विरोधी और समाजवाद की समर्थक छोटी पार्टियों, जनांदोलनकारी संगठनों@समूहों और लोगों का विरोध करेगी। महज संयोग नहीं है कि कांग्रेस का हाथ भी आम आदमी के साथ है और नई पार्टी बनाने वाले भी ‘मैं आम आदमी हूं’’ लिखी टोपी पहनते हैं। चलते-चलते पता चला है कि उन्होंने पार्टी का नाम भी आम आदमी पार्टी रखा है। मनमोहन सिंह के ये बच्चे उनकी उनकी सहूलियत के लिए उनकी जमात को ही नहीं, एजेंडे को भी आगे बढ़ाएंगे। 

कौन है आम आदमी?

हम हर बार सोचते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर नहीं लिखेंगे। लेकिन ऐसी बाध्यता महसूस होती है कि इस परिघटना का साथ-साथ कुछ न कुछ विश्लेषण होना चाहिए। गंभीर विश्लेषण और मूल्यांकन बाद में विद्वान करेंगे ही। आम आदमी पार्टी के बारे में पांच-सात सूत्रात्मक बातों के अलावा हमें कुछ नहीं कहना है। पहली यह कि नवगठित पार्टी छोटी पार्टियों, मसलन समाजवादी जन परिषद (सजप) और जनांदोलनों, मसलन जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) में तोड़-फोड़ करने में कामयाब हुई है। जाहिर है, इस दिशा में आगे भी काम जारी रहेगा। दूसरी यह कि अन्ना हजारे से इस पार्टी का अलगाव नहीं है। पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने उन्हें अपना गुरु बताया है और अन्ना ने पार्टी के ‘अच्छे’ उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने का भरोसा दिया है। पूरे आंदोलन में सक्रिय रहने वाली मेधा पाटकर कहती हैं कि आरोप लगाने से कुछ नहीं होगा, भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने की जरूरत है। यानी वे यह बता रही हैं कि अलग पार्टी बनाने का फैसला करने वाले महज आरोप लगाने वाले हैं और उसमें शामिल नहीं होने वाले भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने वाले। लेकिन वह काम बिना राजनीति के और पूंजीवादी व्यवस्था को बदले बगैर नहीं हो सकता। इस काम के लिए उनसे बार-बार कहा गया लेकिन उन्हें वह रास्ता पसंद नहीं है। उन्हें देखना चाहिए कि वे वाया अन्ना, केजरीवाल की पार्टी में शामिल हो गई हैं।

जो लोग अपने को अन्ना के साथ मान कर पार्टी से अलग मान रहे हैं, वे खुद अपने को मुगालते में रखने की कोशिश करते हैं। पार्टी न अन्ना से अलग है, न रामदेव से और न दोनों की मानसिकता से। मनमोहन सिंह से अलग तो है ही नहीं।

तीसरी बात हम यह कहना चाहते हैं कि इस पार्टी के निर्माण की पूरी रणनीति कपट से भरी रही है। संप्रदायवादियों और आरक्षण विरोधियों को पूरा भरोसा दिलाने के बाद अब धर्मनिरपेक्षतावादियों और सामाजिक न्यायवादियों को अपने लपेटे में लेने की कोशिश की जाएगी। चुनावी जीत के लिए जरूरी मुसलमानों को वोट बैंक बनाने की भी कोई जुगत रची जाएगी। कहने की जरूरत नहीं कि कपटपूर्ण रणनीति से निकली पार्टी का नाम  भी कपट से भरा है, जिस पर हम आगे विचार करेंगे। यहांं यह बताना चाहते हैं कि इस पूरे खेल में कपट-क्रीड़ा के साथ एक-दूसरे को इस्तेमाल करने का खेल भी चल रहा है। बानगी के लिए अन्ना और केजरीवाल के बीच की लप्प-झप्प देखी जा सकती है। अन्ना ने केजरीवाल से अपना और आईएसी का नाम इस्तेमाल करने से मना किया है। यह बात उन्हें तब ख्याल नहीं आई जब केजरीवाल उन्हें ‘मसीहा’ बना रहे थे।

अन्ना भी एनजीओ की पैदावार हैं और केजरीवाल भी। बाकी जीवन व्यापारों की तरह एनजीओ व्यापार भी स्थैतिक यानी ठहरा हुआ नहीं होता। लिहाजा, अन्ना के एनजीओ व व्यक्तित्व और केजरीवालों के एनजीओ व व्यक्तित्व में समय के अंतराल के चलते काफी फर्क है। लोहिया का शब्द लें तो नए एनजीओबाज लोमड़ वृत्ति के हैं। उसके सामने अन्ना जैसा कच्छप गति वाला व्यक्ति इस्तेमाल होने को अभिशप्त है। अन्ना के समय में मीडिया क्रांति नहीं हुई थी। लोग बताते हैं कि उन्हें फोटो वगैरह खिंचवाने के लिए मीडिया वालों का काफी इंतजार करना पड़ता था। कई बार निराशा भी हाथ लगती थी। मीडिया में प्रसिद्धि की उनकी भूख का केजरीवाल ने बखूबी इस्तेमाल किया है। अभी दोनों में और टीम के बाकी प्रमुख लोगों में एक-दूसरे को इस्तेमाल करने के दावपेंच देखने मिलेंगे। एक-दूसरे को इस्तेमाल करने का खेल इसकी जरा भी शर्म किए बगैर चलेगा कि ये सभी महाशय पूंजीवादी साम्राज्यवाद के समग्र खेल में इस्तेमाल हो रहे हैं। आप कह सकते हैं फिर भला मनमोहन सिंह को ही क्यों शर्म आनी चाहिए!

चैथी बात यह कि ‘यूथ फॉर इक्वैलिटी’ में विश्वास करने वाली पार्टी यह भली-भांति जानती है कि भारत में युवा शक्ति का मतलब अगड़ी सवर्ण जातियों के युवा होते हैं। इस पार्टी का दारोमदार उन्हीं पर है और रहेगा। सुना है पार्टी की स्थापना के मौके पर तलवार वगैरह भांजी गई हैं। पांचवी बात यह कि समाजवादियों ने एक बार फिर अपनी ‘जात’ दिखा दी है। अभी तक वे संघियों और कांग्रेसियों के पिछलग्गू थे, अब एनजीओबाजों के भी हो गए हैं। किशन पटनायक को गुरु धारण करने वाले केजरीवाल के शिष्य बन गए हैं। मामला यहीं नहीं रुकता। जो वरिष्ठ समाजवादी लोहिया को ही पहला, अकेला और अंतिम गुरु मानते रहे और दूसरों को चरका देते रहे, उन्होंने भी केजरीवाल को राजनीतिक गुरु मानने में परेशानी नहीं हुई। मेधा पाटकर ने अन्ना को गुरु कबूल किया है तो वे केजरीवाल की गुरुबहन हो गईं। आजकल के गुरु लोग अपनी सुरक्षा का निजी इंतजाम रखते हैं। भारतीय किसान यूनियन ने खुद आगे बढ़ कर यह जिम्मेदारी उठा ली है।

छठी बात यह है कि इस पार्टी के बनाने में वे सभी शामिल हैं जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल और उसके समर्थक थे। क्योंकि यह पार्टी, जैसा कि कुलदीप नैयर ने उसकी तारीफ में कहा है, ‘आंदोलन की राख से उठी है’। अति वामपंथियों से लेकर अति गांधीवादियों तक ने अन्ना की टोपी पहन ली थी। उनमें सामान्य कार्यकर्ता, बड़े नेता और बुद्धिजीवी शामिल थे। आज भी अपने को अल्ट्रा माक्र्सवादी जताने वाले कई साथी केजरीवाल के ‘पोल खोल’ कार्यक्रम पर उन्हें सलाम बजाते और उनके आंदोलन में नैतिक आभा कम न हो जाए, इस पर चिंतित होते देखे जा सकते हैं। यहां हम थोड़ा बताना चाहेंगे कि हमने बिल्कुल शुरू में आगाह किया था कि कम से कम ऐसे राजनीतिक संगठनों और लोगों को इस आंदोलन का हिस्सा नहीं होना चाहिए जो समाजवादी विचारधारा और व्यवस्था में विश्वास करते हों। लेकिन जब एबी बद्र्धन और वृंदा करात जैसे अनुभवी नेता रामलीला मैदान जा पहुंचे तो बाकी की क्या बिसात थी। राजनैतिक डर उन्हें उस आंदोलन में खींच ले गया जिसमें उमा भारती से लेकर गडकरी तक, चैटाला से लेकर शरद यादव तक शिरकत करने पहुंचे। बाद में तो सबके लिए खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया।

उनमें यह डर नहीं पैदा होता अगर उन्होंने समाजवाद की किताबी से ज्यादा जमीनी राजनीति की होती। वे विवेकानंद से लेकर अंबेडकर तक को अपने शास्त्र में फिट करने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके शास्त्र से कोई स्वतंत्र संवाद किया जा सकता है, जैसा कि भारत में आचार्य नरेंद्र देव, जेपी और लोहिया ने किया, यह उन्हें बरदाश्त नहीं है। उन्हें चीन का ‘मार्केट सोशलिज्म’ मंजूर है, लेकिन ‘देशी समाजवाद’ की बात करने के बावजूद भारतीय समाजवादी चिंतकों को बाहर रखते हैं। दरअसल, यह डर हमेशा बने रहना है; उसी तरह जैसे शास्त्र को प्रमाण मानने वाला ब्राह्मण हमेशा डरा रहता है और रक्षा के लिए बार-बार देवताओं के पास भागता है।

सातवीं बात यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में नवउदारवाद के खिलाफ वास्तवकि संघर्ष को निरस्त करने की राजनीति पहले से निहित थी। उसे ही तेज करने के लिए नई पार्टी बनाई गई है। लिहाजा, कुछ भले लोगों का यह अफसोस जताना वाजिब नहीं है कि राजनीति जैसी गंदी चीज में इन अच्छे लोगों को नहीं पड़ना चाहिए। आठवीं बात यह कि एनजीओ वालों को धन देकर काम कराने की आदत होती है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में यह काम खूब हुआ है। पार्टी में भी होगा। एक वाकया बताते हैं। हम लोग सितंबर के अंतिम सप्ताह में जंतर मंतर पर एफडीआई के खिलाफ क्रमिक भूख हड़ताल पर थे। 23 सितंबर को वहां केजरीवाल का कार्यक्रम था। सुबह दस बजे से कुछ युवक और अधेड़ तिरंगा लेकर एक कोने से दूसरे कोने तक चक्कर लगाने लगे। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे इक्कीस सौ रुपया की दिहाड़ी पर हरियाणा से आए हैं।

जैसा कि अक्सर होता है, जंतर मंतर पर पूरा दिन और कुछ देर के लिए होने वाले कई कार्यक्रम थे। केजरीवाल के समर्थकों द्वारा बजाए गए डीजे की तेज आवाज ने सभी को परेशान करके रख दिया था। देशभक्ति के फिल्मी गीत बार-बार बजाए जा रहे थे। पुलिस का एक वरिष्ठ कांस्टेबल हमारे पास आया कि हम उन्हें तेज आवाज में डीजे बजाने से रोकें, क्योंकि वे उसके कहने से नहीं मान रहे हैं। डीजे पूरा दिन लगातार बजता रहा। शाम के वक्त केजरीवाल आए और उनका भाषण शुरू हुआ तो उनके समर्थकों ने हमसे आदेश के स्वर में माइक व भाषण बंद करने को कहा। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें डपटा तो वे आंखें दिखाने लगे। हमने खुद उन्हें समझा कर वहां से हटाया।

नौवीं बात है कि कांग्रेस और भाजपा का चेहरा काफी बिगड़ गया है। क्षेत्रीय दलों के नेताओं में एक भी ‘अंतरराष्ट्रीय’ केंडे का नहीं है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद के नेटवर्क से जुड़े अपने अधीनस्थ देशों में साफ-सुथरे चेहरों की पार्टी, जो लोकतंत्र की सबसे ज्यादा बात करे, अमेरिका की अभिलाषा होती है। जो देश उसके नेटवर्क में फंसने से इनकार करते हैं वहां वह खुद हमला करके अपने माफिक नेता बिठा देता है। पार्टी का पंजीकरण हुए बिना ही अगले आम चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार लड़ाने की घोषणा बताती है कि नई पार्टी के लिए धन की कोई समस्या नहीं होगी।

दसवीं और अंतिम बात यह कि यह सब प्रदर्शन - ‘मैं अन्ना हूं’, ‘मैं केजरीवाल हूं’, ‘मैं आम आदमी हूं’ - हद दरजे का बचकानापन है। मुक्तिबोध ने भारत के मध्य वर्ग की इस प्रवृत्ति को ‘दुखों के दागों को तमगे-सा पहना’ कह कर अभिव्यक्त किया है। कपट, इस्तेमाल-वृत्ति और लफ्फाजी से भरे आंदोलन से कोई जेनुइन राजनीतिक पार्टी नहीं निकल सकती है।

पार्टी को एक तरफ छोड़ कर ‘आम आदमी’ पर थोड़ी चर्चा करते हैं जिसकी दावेदारी में कांग्रेस और भाजपा नई पार्टी के साथ उलझे हैं। लाखों-करोड़ों में खेलने वाले लोग जब ‘मैं आम आदमी हूं’ की टोपी लगाते हैं तो उसका पहला और सीधा अर्थ गरीबों के उपहास में निकलता है। अगर लाखों की मासिक तनख्वा और फोर्ड फाउंडेशन जैसी पूंजीवाद की जमी हुई संस्थाओं से करोड़ों का फंड पाने वाले लोग अपने को आम आदमी कहें, तो यह गरीबों के सिवाय अपमान के कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर जो अकूत खर्चा किया गया है, वह दरअसल इस पार्टी के निर्माण पर किया गया खर्च है। आम आदमी से अगर मुराद गरीबों से है, जैसे कि दावे हो रहे हैं, तो कोई उन्हें इतना धन देने वाला नहीं है कि वे अपनी पार्टी धन की धुरी पर खड़ी कर सकें। गरीबों की किसी भी पार्टी को याराना पूंजीवाद का यार याराना मीडिया दिन-रात तो क्या, कुछ सेकेंड तक नहीं देगा। लिहाजा, यह स्पष्ट है कि आम आदमी का अर्थ गरीब आदमी नहीं है - न कांग्रेस के लिए, न आम आदमी की टोपी पहनने वालों के लिए।

‘आम आदमी’ की अवधारणा पर थोड़ा गंभीरता से सोचने की जरूरत है। आजादी के संघर्ष के दौर में और आजादी के बाद आम आदमी को लेकर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में काफी चर्चा रही है जिसका साहित्य और कला की बहसों पर भी असर पड़ा है। साहित्य में आम आदमी की पक्षधरता के प्रगतिवादियों के अतिशय आग्रह से खीज कर एक बार हिंदी के ‘व्यक्तिवादी’ साहित्यकार अज्ञेय ने कहा कि ‘आम आदमी आम आदमी ... आम आदमी क्या होता है?’ उनका तर्क था कि साहित्यकार के लिए सभी लोग विशिष्ट होते हैं। राजनीति से लेकर साहित्य तक जब आम आदमी की जोरों पर चर्चा शुरू हुई थी, उसी वक्त आम आदमी का अर्थ भी तय हो गया था। उस अर्थ में गांधी का आखिरी आदमी कहीं नहीं था। आम आदमी की पक्षधरता और महत्ता की जो बातें हुईं, वे शुरू से ही ‘मेहनत-मजदूरी’ करने वाले गरीब लोगों के लिए नहीं थीं।

सब टीवी पर एक सीरियल ‘आरके लक्ष्मण की दुनिया’ आता है। उसका उपशीर्षक होता है ‘आम आदमी के खट्टे मीठे अनुभव’। यह सीरियल उस आम आदमी की तस्वीर पेश करता है जो आम आदमी की अवधारणा में निहित रही है। ये आम आदमी ज्यादातर नौकरीपेशा हैं, साफ-सुथरी और सुरक्षित हाउसिंग सोसायटी के फ्लैट में रहते हैं, मोटे-ताजे सजे-धजे होते हैं, स्कूटर-कार आदि वाहन रखते हैं, आमदनी बहुत नहीं होती लेकिन खाने-पीने, बच्चों की पढ़ाई लिखाई, सैर-सपाटा-पिकनिक, बच्चों का कैरियर आदि ठीक से संपन्न हो जाते हैं।

मध्य वर्ग ने आम आदमी की अवधारणा में अपने को ही फिट करके उसकी वकालत और मजबूती में सारे प्रयास किए हैं और आज भी वही करता है। आम आदमी मध्यवर्गीय अवधारणा है। उसका गरीब अथवा गरीबी से संबंध हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मध्य वर्ग को अपने केंद्र में लेकर चलने वाली आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का यह वायदा रहा है कि वह किसी को भी गरीब नहीं रहने देगी। दूसरे शब्दों में, जो गरीब हैं, उन्हें होना ही नहीं चाहिए। भारत का यह ‘महान’ मध्य वर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह सब कुछ अपने लिए चाहता हैं, लेकिन गरीबों का नेता होने की अपनी भूमिका को छोड़ना नहीं चाहता। इस पाखंड ने भारत की गरीब और आधुनिकता में पिछड़ी जनता को अपार जिल्लत और दुख दिया है।

भारत का मध्य वर्ग मुख्यतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनता है। यही कारण है कि इस आंदोलन और उससे निकली पार्टी का वर्णाधार अगड़ी सवर्ण जातियां हैं, जिनका साथ दबंग पिछड़ी जातियां देती हैं। इसी आधार पर पार्टी के नेताओं ने युवकों का आह्वान किया है कि वे जातिवादी नेताओं को छोड़ कर आगे आएं और मध्य वर्ग नाम की नई जाति में शामिल हों। यहां उनकी जात भी ऊंची होगी और वर्ग-स्वार्थ भी बराबर सधेगा।

राजनीति में विदेशी निवेश

आम आदमी पार्टी का बनना अचानक या अस्वाभाविक घटना नहीं है। किशन पटनायक ने एक जगह आक्रोश में कहा है कि जब देश मेंं विदेशी धन से सब हो रहा है, पेड़ तक विदेशी धन से लग रहे हैं, तो अमुक क्षेत्र में विदेशी निवेश क्यों नहीं होगा? आज वे होते तो कहते कि विदेशी धन से चलने वाले एनजीओ जब समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, मानवाधिकार, नागरिक अधिकार, लोकतंत्र सुधार@संवद्र्धन आदि का काम बड़े पैमाने पर करते हैं तो राजनीति क्यों नहीं करेंगे? एनजीओ पूंजीवादी व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं जो उसके विरोध की राजनीतिक संभावनाओं को खत्म करते हैं। वे बताते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था अपने में पूर्ण और अंतिम हैं। अगर किसी समाज में समस्याएं हैं तो वहां के निवासी एनजीओ बना कर धन ले सकते हैं और उन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। उसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध करने की जरूरत नहीं है।

देश में जब सब क्षेत्रों में धड़ाधड़ एनजीओ काम कर रहे हैं तो राजनीति भी अपने हाथ में लेने की कोशिश करेंगे ही। आखिर सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (नैक) में कितने एनजीओ वालों को खपाया जा सकता है? सुनते हैं, केजरीवाल नैक में शामिल होना चाहते थे, लेकिन वहां जमे उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उनका रास्ता रोक दिया। आखिर आदमी केवल प्रवृत्ति नहीं होता; उसकी अपनी भी कुछ फितरत होती है। मनमोहन सिंह का यह बच्चा रूठ कर कुछ उच्छ्रंखल हो गया है। उच्छ्रंखलता ज्यादा न बढ़े, इसके लिए कतिपय पालतू बच्चे पार्टी में शामिल हो गए हैं। यह उनका अपना निर्णय है या खुद मनमोहन सिंह मंडली ने उन्हें वहां भेजा है, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है।

एनजीओ द्वारा कार्यकर्ताओं को हड़पने की समस्या पहले भी रही है। फर्क इतना आया है कि एनजीओं के जाल में पुराने लोग भी फंसने लगे हैं। यह स्थिति नवउदारवादी व्यवस्था की मजबूती की दिशा में एक और बढ़ा हुआ कदम है। इस बीच घटित एक वाकये को रुपक के रूप में पढ़ा जा सकता है। 1995 में बनी राजनीतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) के वरिष्ठ नेता सुनील एक प्रखर विचारक और प्रतिबद्ध समाजवादी कार्यकर्ता हैं। जेएनयू से अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद से वे पूर्णकालिक राजनीतिक काम कर रहे हैं। किशन पटनायक द्वारा शुरू की गई ‘सामयिक वार्ता’ का समता संगठन और बाद में सजप के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। किशन जी के रहते ही यह पत्रिका अनियमित होने लगी थी जिसकी उन्हें सर्वोपरि चिंता थी।

उनके बाद पत्रिका के संपादक बने साथी ने उसे अपना प्राथमिक काम नहीं बनाया। जबकि संपादकी की जिम्मेदारी लेने वाले किसी भी साथी को उसे अपना प्राथमिक काम स्वीकार करके ही वैसा करना चाहिए था। इस दौरान पत्रिका की नियमितता पूरी तरह भंग हो गई। अब पिछले दो-तीन महीने से सुनील उसे केसला-इटारसी से निकालने और फिर से जमाने की कोशिश कर रहे हैं। सुनील राजनीति करने वाले थे और संपादक बने साथी फोर्ड फाउंडेशन से संबद्ध हैं। अब सुनील पत्रिका निकाल रहे हैं और राजनीति करने का काम किशन जी के बाद संपादक बने साथी ने सम्हाल लिया है। सजप के भीतर यह फेर-बदल होता तो उतनी परेशानी की बात नहीं थी। उनका मन बड़ा है! वे  केजरीवाल की नई पार्टी की राजनीति कर रहे हैं। कह सकते हैं, जो जहां का होता है, अंततः वहीं जाता है। लेकिन इस नाटक में बड़ी मशक्कत से खड़े किए गए एक संगठन और उससे जुड़े नवउदारवाद विरोधी संघर्ष का काफी नुकसान हुआ है। कहना न होगा कि इससे किशन पटनायक की प्रतिष्ठा को भी धक्का लगा है। आप समझ गए होंगे हम साथी योगेंद्र यादव की बात कर रहे हैं। हमने इस प्रसंग को रूपक के बतौर रखा है, जिसमें सुनील और योगेंद्र व्यक्ति नहीं, दो प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं।

साम्राज्यवाद की सगुणता के कई रूप हैं। विदेशी धन उनमें शायद मूलभूत है। पूरी दुनिया में बिछा बहुराष्ट्रीय कंपनियों और एनजीओ का फंदा उसीसे मजबूती से जुड़ा है।  विदेशी धन, चाहे कर्ज में आया हो चाहे खैरात में, वह खलनायक है जो हमारे संसाधनों, श्रम और राजगार को ही नहीं लूटता, स्वावलंबन और स्वाभिमान का खजाना भी लूट लेता है। उसके बाद कितना भी तिरंगा लहराया जाए, देशभक्ति के गीत गाए जाएं, न स्वावलंबन बहाल होता है न स्वाभिमान। केवल एक झूठी तसल्ली रह जाती है। सोवियत संघ के विघटित होने के बाद यह प्रकाश में आया कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को वहां से कितना धन मिलता था। उस समय गुरुवर विश्वनाथ त्रिपाठी ने हमें बगैर पूछे ही कहा कि ‘क्या हुआ, धन क्रांति करने के लिए लिया था।’ सवाल है कि अगर लिया था तो क्रांति का क्या हुआ? एक दौर के प्रचंड समाजवादी जॉर्ज फर्नांडीज पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने सोशलिस्ट इंटरनेशनल से धन लिया। वे भी सोचते होंगे कि उन्होंने धन समाजवादी क्रांति करने के पवित्र उद्देश्य के लिए लिया है। आज वे कहां हैं बताने की जरूरत नहीं। विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा।   

नई पार्टी ने स्वराज लाने की बात कही है। लेकिन वह झांसा ही है। एनजीओ वाले कैसे और कैसा स्वराज लाते हैं उसका जिक्र हमने ‘भ्रष्टाचार विरोध ः विभ्रम और यथार्थ’ शीर्षक ‘समय संवाद’ में किया है जो अब इसी नाम से प्रकाशित पुस्तिका में उपलब्ध है। अब दोनों ही बातें हैं। नुकसान की भी और फायदे की भी। फायदे की बात पर ध्यान देना चाहिए। जो इस नवउदारवादी प्रवाह में शामिल नहीं हुए, उनकी समझ और रास्ता अब ज्यादा साफ होंगे। जो शामिल हुए, लेकिन लौट आए, यह अफसोस करना छोड़ दें कि कितनी बड़ी ऊर्जा बेकार चली गई! ऊर्जा कभी बेकार नहीं जाती। वह जिस काम के लिए पैदा हुई थी, वह काम काफी कुछ कर चुकी है और आगे करेगी। साथी अपना काम इस बार ज्यादा ध्यान से करें। उनके पास यह ताकत कम नहीं है कि वे बदलाव नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम देश की बदहाल आबादी के साथ धोखाधड़ी नहीं कर रहे हैं।

लोग राजनीति को कहते हैं, हमारा मानना है कि मानव जीवन ही संभावनाओं का खेल है। यह भी हो सकता है मोहभंग हो और नई पार्टी से कुछ लोग बाहर आएं। जीवन में सीख की बड़ी भूमिका होती है। उससे नवउदारवाद विरोधी आंदोलन को निश्चित ही ज्यादा बल मिलेगा।



26 नवंबर 2012

Saturday, September 1, 2012

बांग्लादेशी...मुसलमान...बिहारी..और अन्त में देश


मेरे पसंदीदा किताबों में से एक, 'नीम का पेड़' में लिखा है कि.. सियासत में तत्कालीन लाभ के लिए जो फैसले लिए जाते है, उसके दूरगामी नतीजे बड़े गंभीर होते हैं। संयोग है कि, इन पंक्तियों के लेखक राही मासूम रजा का आज जन्मदिन है। आजीवन कट्टरता से लड़ने वाले राही की इन पंक्तियों को उलटकर अगर यूं कहें, कि कांग्रेस ने तत्कालीन लाभ के लिए मनसे सुप्रीमो को जिस तरह की ढील दी हुई है, इस देश को उसके गंभीर नतीजे भुगतने पड़ेंगे। तो इस देश के सियासी हालात पर ये पंक्तियां सटीक बैठती है। केवल कांग्रेस ही नहीं राष्ट्र तोड़ने वाली शक्तियों को बढ़ावा देने की ज़िम्मेदारी उन लोगों पर भी है, जो बांग्लादेशियों के खिलाफ राज के बयान की दिल खोलकर सराहना कर रहे थे। बौद्धिक गलियारों और मीडिया में बैठे तमाम भगवा ध्वजवाहकों ने राज के बांग्लादेशियों और मुसलमानों के खिलाफ दिए गए बयान की आलोचना तो नहीं ही की, जहां तक हो सका उसकी सराहना ही की। कई चैनलों ने राज ठाकरे को हिन्दु ह्मदय सम्राट भी लिखने में देर नहीं लगाई।  बिना ये जाने कि इस तरह की उपमाएं चाहे जिस राजनेता को दी जाती हो, अन्त में वो एक बड़े तबके के लिए असुरक्षा की वजह बनती है। बिना भय के माहौल और कत्ले-आम के कोई भी धर्म विशेष का ह्मदय सम्राट नहीं हुआ, फिर चाहे वो आडवाणी हों, बाल ठाकरे हों , नरेन्द्र मोदी हो या नव अंकुरित राज ठाकरे हों। ज़ाहिर है देश तोड़ने की इस राजनीति में अगर कांग्रेस आंख मूंदकर धृतराष्ट्र की भूमिका निभा रही है, तो भगवा ताकतें इस मामले में शकुनी की भूमिका में हैं।
फेसबुक पर जब बांग्लादेशियों के मामले में बहस चल रही थी तो हमने एक कंमेट के जवाब में लिखा था कि, बांग्लादेशियों के खिलाफ साम्प्रदायिक ताक़ते जिस तरह की राजनीति में लगी हुई है, दरअसल वो राज ठाकरे की राजनीति का विस्तारीकरण है। आज ये बात सटीक साबित हो रही है। हम ये भी कहते हैं कि विस्थापितों का दर्द हमसे बेहतर और कोई नहीं समझ सकता। क्योंकि बांग्लादेशी तो फिर भी बाहर के हैं, हम तो अपने देश में ही भीतरी और बाहरी का भेद झेल रहे हैं। हमें परेशानी राज ठाकरे से नहीं है, क्योंकि राज जैसी ताक़ते हमारी राह में एक कंकर की भी हैसियत नहीं रखती , लेकिन रहबरों से शिकायत ज़रूर है जिन्होंने रहजनों से समझौता कर लिया है।
दरअसल ये लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी से कहीं आगे कट्टरता बनाम उदारता की लड़ाई है। और इस तरह की राजनीति में जो भी कट्टरता के खिलाफ बोलने के लिए खड़ा होगा उसे शुरुआती तौर पर एक हारी हुई लड़ाई का सामना करना पड़ेगा। लेकिन आखिरी जीत उदारता की ही होगी ये तय है।              

Monday, August 27, 2012

पूंजीवाद के पहलवान

(आज शुद्ध राजनीतिक चिंतन का जो घोर अभाव हो चला है उसकी कमी को पूरा करने वाला डॉ प्रेम सिंह का आलेख . में इसे अँधेरी रात में जुगनू की चमक मानता हूँ .)


पूंजीवाद विचारधारा और व्यवस्था दोनों स्तरों पर अपना पक्ष मजबूत करने का निरंतर और मुकम्मल उद्यम करता है। यूं तो हर व्यवस्था यह करती है, लेकिन पूंजीवाद इस मामले में बहुत चाक-चैबंद साबित हुआ है। अपने सामने उसने किसी भी विकल्प को खड़ा नहीं होने दिया। कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट नाम से जो व्यवस्थाएं यूरोप में या एशिया, लैटिन अमेरिका आदि में बनी, पूंजीवाद उनमें घुस कर बैठा हुआ था। मिश्रित अर्थव्यवस्थाओं, राजशाहियों और तानाशाहियों में भी उसकी मौजूदगी बराबर बनी रही है। आज, जबकि उसके एक और संकट का समय चल रहा है, उसने अपने को विकल्पहीन घोषित किया हुआ है । अपनी सीमाओं और संभावनाओं के साथ पूंजीवाद हर देश की सरकार के भीतर मौजूद है। लेकिन उसकी दुर्निवार उपस्थिति सरकारों और व्यवस्थाओं तक सीमित नहीं है। प्रकृति उसके कब्जे में है। कौन जीवधारी और कौन वनस्पती बचेंगे और कब तक बचेंगे, इसका फैसला पूंजीवाद के हाथ में है। उसने धर्मों, संस्कृतियों,
भाषाओं, शिक्षा और सबसे बढ़ कर विज्ञान में अपनी गहरी घुसपैठ बनाई है। पूंजीवाद की गिरफ्त से छूटे मनुष्य दुनिया में बहुत थोड़े मिलेंगे। अलबत्ता उसके हाथों मरने वाले कई करोड़ हैं। जिस पूंजीवाद को सामंतवाद से मुक्ति का दर्शन कहा गया था, आधुनिक दुनिया उसकी बंधक बन गई है। पूंजीवाद का अपनी प्रतिष्ठाा के उद्यम में वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों पर सबसे ज्यादा भरोसा और दारोमदार रहा है। पहले वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी थोड़े हुआ करते थे। आज वे असंख्य हैं और प्रयोगशालाओं और अध्ययन संस्थानों में पूंजीवादी व्यवस्था के पक्ष में वैज्ञानिक और बौद्धिक काम काम कर रहे हैं। अक्सर वैज्ञानिकों और बौद्धिकों को पता भी नहीं होता कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं। उनमें जो आला दरजे का काम करते हैं, उनके लिए बड़े-बड़े पुरस्कारों की व्यवस्था है। उनकी एक अलग दुनिया पूंजीवादी व्यवस्था ने बना दी है। हाल में नासा ने मंगल ग्रह पर जब क्युरियोसिटी यान को सफलतापूर्वक उतारा तो प्रयोगशाला में बैठे वैज्ञानिक पागलों जैसी खुशी से झूम उठे। अकूत धन से चलने वाले प्रयोगों और खोजों में डूबे वैज्ञानिकों के दिमाग में शायद ही कभी यह आता हो कि दुनिया में भूख, भय और मौत ने जो असंख्य लोगों को अपनी गिरफ्त में लिया हुआ है, उसका गहरा संबंध उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियों से है। मंगल ग्रह पर उतारे गए क्युरियोसिटी यान पर होने
वाला खर्च 2. 5 अरब डालर बताया गया है। इसके साथ एनजीओ का विशाल जाल बिछाया गया है जो पूंजीवादी साम्राज्यवाद का किसी भी परिवर्तनकारी प्रतिरोध से बचाव करते हैं। पूरी तीसरी दुनिया में लाखों की संख्या में फैले एनजीओ पूंजीवादी सरकारों और संस्थाओं से अरबों डालर का दान पाते
हैं। उनमें से कुछ के कर्ताओं का बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सीईओ जैसा ठाठ-बाट होता है। वे बुद्धिजीवी की हैसियत रखते हैं और लोगों को बताते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था अंतिम और आत्यंतिक है। उसके विकल्प की बात करना निरर्थक है। दुनिया में, यानी तीसरी दुनिया में, अगर गरीबी है, बीमारी है, अशिक्षा है, भूख है, कुपोषण है, असुरक्षा है, अशांति है, तो व्यवस्था परिवर्तन की बात मत करिए। एनजीओ बनाइए, धन लीजिए और समस्या का समाध् ाान कीजिए। पूंजीवाद के एजेंट नेताओं और सरकारों सेस्वराजमांगने तक के लिए विदेशी धन मिल सकता है। खास कर गरीब देशों में बताया जाता है कि समस्याओं के उच्च अध्ययन और शोध के लिए विदेशी धन का कोई विकल्प नहीं है। वह लेना ही चाहिए और उसमें कसेई बुराई नहीं है।
एनजीओ वाले कितने ही बेरोजगार नौजवानों को कम से कम वेतन पर खटाते हैं। उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व और चिंतन को दबा कर उन्हें दब्बू बना देते हैं। राजनीतिक कार्यकर्ता पर उनकी निगाह पड़ी नहीं कि मुंह में पानी जाता है। वे उसे, हैसियत के अनुसार कीमत देकर, अपने एनजीओ में शामिल कर लेते हैं। एनजीओ ने देश और दुनिया से राजनीतिक एक्टिविज्म को ही खत्म नहीं किया है, गांध्ाी के रचनात्मक काम की परंपरा को भी विनष्ट कर दिया है। मजेदारी यह है कि अगर कहीं पूंजीवाद का विकल्प चिंतन और काम के स्तर पर बनने लगता है और लोगों का ध्यान उस पर जाने लगता है, तो ये लोग साल में दस जगह दस बार विकल्प की चचाएं चला कर लोगों का ध्यान उधर हटा देते हैं। कांग्रेस नीत यूपीए या भाजपा नीत एनडीए के राजनीतिक प्रतिरोध और वैकल्पिक राजनीति के निर्माण के प्रयास पिछले 20-25 सालों से हो रहे हैं। हालांकि आपस में विकल्प की विचारधारा और तरीके को लेकर विद्यमान मतभेद प्रयास की सफलता में प्रमुख बाधा है, लेकिन पूंजीवाद के पक्ष में एनजीओबाजों का अड़ंगा भी उतनी ही बड़ी बाधा बना हुआ है। पूंजीवाद की इस कदर मजबूती के कई प्रत्यक्ष कारणों के अलावा अप्रत्यक्ष कारण भी हैं। उनमें शायद सबसे महत्वपूर्ण कारण पूंजीवाद की यह विशेषता है कि वह अपने विरोध का भी खुद निर्माण और पोषण करता चलता है। वह बड़ी सफाई और गहराई से यह काम करता है। अपने जन्म से लेकर आज तक पूंजीवाद अपनी इस योग्यता के बल पर बचता और फलता-फूलता आया है। उसने यह सिद्ध किया है कि उसके गर्भ में विनाश के नहीं, उसके विकास के बीज छिपे होते हैं। पिछली करीब डेढ़ शताब्दी से पूंजीवाद के विनाश का मंत्र जानने का दावा करने वाला वैज्ञानिक माक्र्सवाद पूंजीवाद की मजबूती के काम आकर विश्रांत अवस्था में पड़ा है। वह अपने पैरों के बल खड़ा होने की स्थिति में नहीं है। संकट से जूझता हुआ पूंजीवाद अलबत्ता माक्र्सवाद को एक बार फिर अपने विरोध में खड़ा होने का मौका दे सकता है। गतिरोध या संकट का शिकार होने पर पूंजीवाद अपनी कोख में पले पहलवानों को अपने खिलाफ खड़ा कर देता है। रातों-रात उन्हें बड़ा भी बना देता है। भारत का मामला हो तो सीध् ो गांधी और जेपी जैसा।दूसरी दुनिया संभव है’, ‘सत्ता नहीं व्यवस्था परिवर्तन करना है’, ‘भारत माता की जय’ ‘दूसरी आजादी’, ‘तीसरी आजादी’, ‘क्रांति’, ‘महाक्रांतिजैसे नारों के साथ पूंजीवाद
 के पहलवान मैदान में कूद पड़ते हैं। अपने बचाव के लिए अपना विरोध करने की पूंजीवाद की चाल को समझना अक्सर आसान नहीं होता। उसके स्वनिर्मित विरोध को वास्तविक विरोध समझकर पूंजीवाद
के वास्तविक विरोधी भी कई बार उसमें शामिल हो जाते हैं। पूंजीवाद की चैतरफा गिरफ्त और मार से त्रस्त भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश की जनता में जो थोड़ी-बहुत वास्तविक विरोध की चेतना बनती है, विचार बनता है और उसके बल पर पूंजीवाद के वास्तविक विरोध् ाी संगठनों में जो थोड़ी-बहुत ताकत जुटती है, पूंजीवाद के पहलवानों की टोली उसे पीछे धकेल देती है। कुछ करने के जज्बे से भरे नौजवान, जिन्हें अक्सर परिवर्तनकारी राजनीति से दूर रखा जाता है, नारों-झंडों से प्रभावित होकर उस मुहिम में शामिल हो जाते हैं। भीड़ जुट जाती है। पूंजीवाद बच जाता है और आगे तक का वास्तविक विरोध एकबारगी खारिज हो जाता है।

पूंजीवाद का अपने खिलाफ विरोध का कारोबार किस कदर फल-फूल चुका है, भारत में उसकी बानगी अन्ना आंदाोलन के नाम से मशहूर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में देखी जा सकती है। कुछ एनजीओ वालों द्वारा सुनियोजित ढंग से अंजाम दिए गए और राजनीति को एक सिरे से बुरा बताने वाले इस आंदोलन की परिणति
पिछले दिनों एक तरफ एक नई राजनीतिक पार्टी बनाने और दूसरी तरफ भाजपा नीत एनडीए को समर्थन देने की घोषणा में हुई है। जुलाई के अंत और अगस्त के प्रारंभ में आगे-पीछे हुई ये दोनों घोषणाएं एक ही उद्देश्य की पूर्ति करती हैं - भारत में नवउदारवादी निजाम को बचाना और मजबूत बनाना। टीम अन्ना के, जिसे अन्ना हजारे द्वारा भंग किए जाने का समाचार आया था, राजनीतिक पार्टी बनाने के फैसले पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं। ज्यादातर समर्थकों ने इसे गलत फैसला माना है। टीम के एक-दो प्रमुख सदस्यों ने भी राजनीतिक पार्टी बनाने पर अपना एतराज जताया है। शुरू में सुना यह भी गया था कि अन्ना हजारे खुद पार्टी बनाने के पक्ष में नहीं हैं। लेकिन टीम केचाणक्यअरविंद केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि अन्ना हजारे पार्टी बनाने के फैसले के साथ हैं। टीम अन्ना के मामले में उन्हीं की बात प्रामाणिक मानी जाती है। बहरहाल, जो लोग आंदोलन को गैर-राजनीतिक मान कर शामिल हुए थे, पार्टी बनाई जाने और चुनाव लड़ने के फैसले
पर उनकी शिकायत वाजिब कही जा सकती है। टीम ने अपने गैर-राजनीतिक होने का दावा किया था और, साथ ही, राजनीति और नेताओं के प्रति घृणा का माहौल और भावना पैदा की थी। टीम के प्रमुख लोगों की मंशा और योजना जन लोकपाल बनवा कर उस पर कब्जा करने की थी। जैसा लोकपाल वे चाहते हैं, वैसा उनकी समर्थक पार्टियां - भाजपा से लेकर माकपा तक - भी बनाने के लिए तैयार नहीं होंगी। अगले आम चुनाव में भाजपा की सरकार बने या तीसरे मोर्चे की, टीम अन्ना द्वारा प्रस्तावति जन लोकपाल विध्ोयक कानूनी शक्ल नहीं ले पाएगा। कांग्रेस ने भी संसद के बाहर तैयार किया गया जन लोकपाल विधेयक कानून नहीं बनाया। हालांकि इन पार्टियों की भारतीय संविधान में आस्था नहीं है। लेकिन संविध्ाान और लोकतंत्र में सच्ची आस्था रखने वाली किसी भी पार्टी में जन लोकपाल जैसे प्राधिकारवादी कानून के लिए जगह नहीं हो
सकती। मीडिया आंदोलन के माफिक हो गया और भीड़ ज्यादा उमड़ पड़ी तो टीम के प्रमुख सदस्यों की राजनीतिक हसरतें जोर मारने लगीं। उन्हें समानांतर सरकार और संसद होने का गुमान हो गया कि वे जो चाहे कर सकते हैं। यानी राजनीति कर सकते हैं। टीम अन्ना द्वारा आंदोलन के पहले उफान के तुरंत बाद होने
वाले मध्यावधि कुछ विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के उम्मीदवारों को हरवाने का प्रयास अपने लिए राजनीतिक संभावनाएं तलाशने के लिए किया गया था। भीतर राजनीतिक हसरतें और बाहर तीखा राजनीति विरोध - ऐसे में आंदोलन को गैर-राजनीतिक मान कर शामिल हुए नागरिकों का ठगे जाना अनुभव करना स्वाभाविक है। लेकिन टीम के उन सदस्यों और समर्थकों, जो राजनीति समझते हैं और करते हैं, पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने के फैसले की शिकायत का वाजिब आधार नहीं है। खबरों से पता चलता है टीम के भीतर राजनीति में उतरने के बारे में चर्चा बराबर होती रही। रामलीला मैदान में हुए पिछले अनशन के वक्त टीम के सदस्यों और समर्थकों की ओर से यह आग्रह जोरों पर हुआ कि वहीं से राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर दी जाए। जिहाजा, फैसले से असहमति रखने वाले सदस्य जानते हैं कि वह वैसा अचानक नहीं है। भले ही वह लिया गया रामदेव के दबाव में हो कि वे पार्टी बनाने की पहले घोषणा न कर दें। पार्टी बनाने के फैसले पर क्षोभ व्यक्त करने वाले टीम के सदस्यों का एतराज कई रूपों में सामने आया है। लेकिन असली दिक्कत की तरफ से वे सभी आंखें मूंदे हुए हैं। वे जानबूझ कर यह नहीं देखना चाहते कि इस आंदोलन ने परिवर्तकारी राजनीति और विमर्शों को ही नहीं, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के संवैधानिक
मूल्यों को भी गड्डमड्ड कर दिया है। आंदोलन की कोख से जो राजनीतिक पार्टी बनने जा रही है, जाहिर है, उसमें भी यह मिलावट जारी रहेगी। अपने को लोकतांत्रिक दिखाने के लिए जनता के उम्मीदवार खड़े करने की जो बात की जा रही है, वे टीम के प्रमुख नेताओं के बाद होंगे। जैसे कांग्रेस समेत हर पार्टी हाईकमान को जनता चाहिए होती है, अन्ना की पार्टी को भी चाहिएगी। इसमें नई क्या बात है? जो लोग पूरी टीम और मुख्य समर्थकों से सलाह नहीं करते, वे जनता को कितना पूछेंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है। और हकीकत समझ आने पर जनता उन्हें कितना पूछेगी, यह भी देखने की बात है। नई पार्टी बनाने वालों की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। जाहिर है, समझ भी नहीं है। राजनीति का मतलब उनके लिए सोनिया-मनमोहन सिंह और अडवाणी-मोदी की राजनीति रहा है। एक समय संवादमें हमने बताया था कि अरविंद केजरीवाल ने पिछले आम चुनाव में इन नेताओं सेस्वराजमांगने वाले होर्डिंगों से पूरी दिल्ली को पाट दिया था। राजनीतिक निरक्षरता का वह स्व-प्रचार देखने लायक था। एनजीओ वालों की राजनीतिक समझ इतनी ही नजर आती है कि ये नवउदारवादी राजनीति से प्रेम, और प्रतिदान मिलने पर घृणा कर सकते हैं।
ये लोग कैसी राजनीतिक चेतना जगाएंगे इसकी एक बानगी हमें मेरठ में देखने को मिली थी। जंतर-मंतर के पहले धरने के वक्त हमारा चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय जाना हुआ। विश्वविद्यालय के गेट पर अन्ना के समर्थकमैं अन्ना हूंकी टोपी पहन कर धरना कर रहे थे। उनमें जो बोल रहा था उसकी बात हमने कुछ देर खड़े रह कर सुनी। जानकारों के मुताबिक वह अरएसएस की नैतिक पुलिस का सिपाही नहीं था। एक स्थानीय प्रापर्टी डीलर था जो राजनैतिक पार्टियों की दलाली भी करता था। उसका भाषण फैशन करने वाली लड़कियों कीबदचलनीपर केंद्रित था। धरने में कोई स्त्री नहीं थी लेकिन छात्राएं -जा रही थीं। हमने सोचा, लड़कियां वह भाषण सुन कर क्या सोचती होंगी? भाषण खत्म करने के बाद उसने जोर से तिरंगा लहराया और अन्ना हजारे का जैकारा लगाया। राजनीति में आने के फैसले के पीछे गंभीरता होती तो ये लोग पहले से मौजूद मुख्यधारा राजनीति का विरोध करने वाली किसी एक या अलग-अलग पार्टियों में शामिल हो सकते थे। कई छोटी पार्टियां देश में हैं जो नई आर्थिक नीतियों के नाम पर लागू की गई नवउदारवादी व्यवस्था का मुकम्मल विरोध करती हैं। लेकिन टीम अन्ना चरित्रतः वह नहीं कर सकती। बल्कि अगले आम चुनाव में यह पार्टी इन्हीं छोटी पार्टियों से मुकाबला करेगी। भारत की सिविल सोसायटी वैसे भी छोटी पार्टियों को लोकतंत्र के लिए खतरा बताती है। टीम अन्ना की पार्टी छोटी पार्टियों का भक्षण करके बड़ी बनने की कोशिश करेगी। छोटी राजनीतिक पार्टियों के जो लोग टीम अन्ना के पार्टी बनाने के फैसले का स्वागत कर रहे हैं और (बिना मांगी) सलाहें दे रहे हैं, समस्याएं, चुनौतियां और मुद्दे बता रहे हैं, उनके बारे में कहा जा सकता है कि वे अपनी राजनीतिक नियति नई पार्टी के साथ जोड़ कर देख रहे हैं। अन्ना हजारे के अनुसार वे पार्टी को बाहर से सुझाव देंगे। उन्होंनेअच्छे’ (राइट) उम्मीदवार खड़ा करने की सलाह दी है। अच्छे का पैमान क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं किया गया है। लेकिन नई पार्टी बनाने वालेअच्छे लोगोंको स्वाभाविक तौर अच्छे उम्मीदवार का पैमाना माना जाएगा। यानी नई पार्टी को केजरीवाल, किरन बेदी और प्रशांत भूषण जैसे अच्छे लोग चाहिए होंगे। आइए इन पर थोड़ा गौर करें। ये तीनों अपनी आज की हैसियत में उच्च मध्यवर्गीय हैं। जिस तरह से केजरीवाल और किरन बेदी बड़े-बड़े एनजीओ चलाते हैं और वे सारे धत्कर्म करते हैं जो ज्यादातर एनजीओ चलाने वाले करते हैं, सेवा में रहते हुए जिन्होंने अपनी पोजीशन का उसी तरह दुरुपयोग किया जिस तरह ज्यादातर अफसरान करते हैं, उससे यही पता चलता है कि वे वर्ग-स्वार्थ से परिचालित हैं,
 कि अपने वर्ग-चरित्र को बदलने की प्रेरणा से। यहां हमें मुक्तिबोध्ा की कविताअंधेरे मेंका काव्यनायक याद आता है। वह एक कमजोर मध्यवर्गीय व्यक्ति है जो सामान्य जनता के पक्ष में व्यक्तित्वांतरण करना चाहता है। काफी पीड़ादायक अनुभव से गुजरने के बाद वह अपने को बदल भी पाता है। इन दोनों महानुभावों और उनके समर्थकों से पूछा जाए कि मेहनतकशों की कमाई का जो ध्ान पूंजीवादी निजाम उन्हें एनजीओ की मार्फत उपलब्ध कराता है, उसमें कार से लेकर हवाई जहाज तक कितना खर्च उनके ऊपर होता है? प्रशांत भूषण पारिवारिक पृष्ठभूमि और पेशे से ही अमीर हैं। वे और अमीर होना चाहते हैं। अमीरी की भूख के चलते
इलाहाबाद में उन्होंने करोड़ों की संपत्ति कौड़ियों में खरीद ली। आपको याद होगा कि इन अच्छे लोगों के कारनामे जब साामने आए तो उन्होंने स्वयं और उनके समर्थकों ने कहा कि सरकार अपना भ्रष्टाचार छिपाने के लिए गड़े मुर्दे उखाड़ रही है। यह तर्क आपको इस पार्टी के और भी बहुत से उम्मीदवारों के बारे में सुनने को मिलेगा। दरअसल, ये सब राजनीतिक निरक्षर हैं। कुछ भी कशिश होती तो ये काफी पहले कुछ कुछ राजनीतिक पहलकदमी करते। ये एनजीओ वाले हैं, एनजीओ वाले रहेंगे। एनजीओ में भी ये लोग दलित, आदिवासी, महिला विरोधी गुट के हैं। ये लोग खुल्लमखुल्ला आरक्षण के विरोधी हैं, और सांप्रदायिकता के पोषक हैं। फिर भी व्यापक समर्थन पा रहे हैं। विदेशी धन में वाकई बड़ी ताकत है। नई पार्टी की राह भी वही होगी जो रामदेव की है। उसके अलावा और कुछ हो नहीं सकता। सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों की तरफ से 2004 में कांग्रेस के साथ यह औपचारिक चर्चा चली थी कि वह मेधा पाटकर के लिए महाराष्ट्र में एक सीट छोड़ दे। उसके लिए राजापुर सीट चिन्हित भी की गई थी। मेधा पाटकर और सोनिया के सलाहकार ही बता सकते हैं कि मामला सिरे क्यों नहीं चढ़ पाया। यह पार्टी जब चुनाव लड़ेगी तो भाजपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ भी यह दिक्कत आएगी। दिक्कत हल नहीं हुई तो हो सकता है पार्टी बनाने वाले खुद चुनाव लड़ें। अगर आने वाले समय में एनजीओ के धन को राजनीतिक गतिविधियों में इस्तेमाल करने की सहूलियत नहीं हो 
पाई, तो पार्टी अगले आम चुनाव के बाद बंद भी की जा सकती है। रामदेव लीला के किरदार दुनिया अब सचमुच कचरे का ढेर बन गई है, जिस पर चढ़ कर कोई भी मुर्गा बांग देता है तो मसीहा बन जाता है। बाबा
भी एक वैसा ही मसीहा है। इसका कारण है कि असली मसीहाओं की विमर्श-विनोदियों ने मिट्टी पलीद करके रख दी है। ऐसे में निम्न की तरफ झुका हुआ मध्यवर्ग का एक अच्छा-खासा हिस्सा रामदेव के साथ जुट गया। प्रमुख नेताओं, नौकरशाहों, उद्योगपतियों, मीडियाकारों और दलालों को बाबा ने चेला मूंड लिया। रामदेव ने अन्ना हजारे के सीन पर आने से पहले राजनीतिक पार्टी बनाने का एलान और प्रक्रिया शुरू की थी। नारा था कि सत्ता परिवर्तन तो बार-बार हुआ है, अबकी व्यवस्था परिवर्तन करना है। उस समय भगवा बाबा को सब कुछ हरा-हरा लग रहा था। लेकिन आरएसएस को उनका मंसूबा काला लगने लगा और बाबा को पार्टी बनाने का विचार रोकना पड़ा। बाबा का इरादा कांग्रेस और भाजपा दोनों को उलझाए रखने का था ताकि उनकी गुरुगीरी और व्यापार सुभीते से चलते रह सकें। रामदेव कांग्रेस के साथ चाल खेलने लगे तो चालबाजों की सरताज कांग्रेस ने उन्हें पिछले साल रामलीलीला मैदान से बेज्जत करके खदेड़ दियो। पिछली शर्म मिटाने के लिए रामदेव इस बार रामलीला मैदान में तैयारी के साथ आए। उसके पहले जंतर-मंतर पर भीड़ के इंतजार में
बैठे अन्ना हजारे और उनके लोगों को अपनी ताकत दिखा कर जता दिया कि इस बार बाजी उनके हाथ में रहेगी। तीन दिन तक सरकार ने जब कोई ध्यान नहीं दिया तो उन्होंने भाजपा और दूसरे नेताओं को काले धन के मसले पर अपनी ओर खींचा। भ्रष्टाचार के दागों से भरे नेताओं को यह अच्छा मौका लगा और उन्होंने बाबा के समर्थन में संसद और बाहर आवाज उठाई। उस आवाज की ध्वनि साफ थी कि हम यहां छोटा-मोटा भ्रष्टाचार करते हैं। कांग्रेस बड़ी भ्रष्टाचारी है जिसके नेताओं का धन विदेशी बैंकों में जमा है। अपने और भाजपा के भ्रष्टाचार कोराष्ट्रवादी भ्रष्टाचारमानने वाले बाबा का हौसला बढ़ गया।  जैसा कि खबरों में आया, कांग्रेस छोड़ भाजपा समेत विपक्ष के अन्य नेताओं को मंच पर बुलाने की कवायद की गई। खबरों में ही यह आया कि भाजपा अध्यक्ष गडकरी ने शर्त लगा दी कि वे तभी आएंगे जब बाबा कांग्रेस का खुल्लमखुल्ला और पूरा विरोध करे और आरएसएस-भाजपा की तारीफ करे। कांग्रेस से पूरी तरह टूट चुके बाबा ने आरएसएस-भाजपा और नरेंद्र मोदी की तारीफ और धन्यवाद किया। नरेंद्र मोदी की तारीफ वे इस बीच गुजरात जाकर भी कर आए थे। अब वे आरएसएस वालों के साथ अपनी अगली रणनीति बना रहे होंगे।
यूं तो इस पूरे आंदोलन में भाषा और बोलने की कोई मर्यादा नहीं रही है, लेकिन रामदेव गजब के वाचाल हैं। उनकी दाद देनी होगी कि वाचालता के अखाड़े में उन्होंने पूरी टीम अन्ना को अकेले पछाड़ दिया है। इस बार उनकी वाचालता अपने शबाब पर थी। जहां वाचालता होगी, झूठ अपने आप चला आएगा। अभी न भ्रष्टाचार हटा है, काला धन वापस आया है, लेकिन रामदेव अपने आंदोलन को लाख प्रतिशत सफल घोषित कर देते है। कहते हैं, उनके समर्थन में लाखों लोग दिल्ली की सड़कों पर उतर आए हैं। बात काला धन वापस लाने, भ्रष्टाचार हटाने की होती है और तुरंत क्रांति, महाक्रांति, दूसरी आजादी, तीसरी आजादी तक पहुंच जाती है। खुद को और समर्थकों को बार-बार सच्चा देशभक्त, क्रांतिकारी और शहीद बताते हैं। उन्होंने जीते जी शहीद होने की एक नई परंपरा स्थापित कर दी है। उनके मैनेजर बालकृष्ण सीबीआई की हिरासत में हैं, लेकिन बाबा ने उनकी तस्वीर शहीदों की तस्वीरों के साथ लगा दी। यह आंदोलन वाचालता के साथ शहीदों और तिरंगे के अपमान के लिए भी याद किया जाएगा। गांधी, जेपी, लोहिया, अंबेडकर आदि की राजनीतिक पार्टियों द्वारा काफी फजीहत होती है। लेकिन अभी तक किसी राजनीतिक पार्टी ने शहीदों और तिरंगे को इतना सस्ता नहीं
बनाया था। यहश्रेयइस आंदोलन को ही जाता है। इस देश के नौजवानों का खून इस कदर पानी हो गया है कि एनजीओबाज और ध्र्म के धंधेबाज अपने निहित स्वार्थों के लिए शहीदों को सरेआम अपमानित कर रहे हैं और उन्हें गुस्सा छोड़िये, बुरा भी नहीं लगता।
जिस आंदोलन की सराहना और समर्थन में टाटा-बिड़ला,फिक्की, एसोचेम से लेकर अमेरिकी प्रतिष्ठान तक हों, यह स्वाभाविक है भारत का ज्यादातर नागरिक समाज उसका समर्थन करे। योगेंद्र यादव और उन जैसे आंदोलन के समर्थकों का विवेचन सभी के साथ जाता है। हम अलग से उनका नाम नहीं लेते, अगर उन्होंने अपनी सफाई में लिखे लेख (‘व्हाय आई चूज टीम अन्ना’, इंडियन एक्सप्रैस, 7अगस्त 2012) में किशन पटनायक का उल्लेख नहीं किया होता। उनके मुताबिक वह लेख किसी मित्र के सवाल के जवाब में लिख गया है। लिखने की यह शैली काफी प्रचलित है कि आप अपने मन के सवालों को किसी मित्र के नाम पर डाल कर हल करने की कोशिश करें। लेकिन किशन पटनायक का उल्लेख करने का औचित्य उस लेख में कहीं से नजर नहीं आता। स्पष्ट है कि वे कहना चाहते हैं, अगर किशन पटनायक होते तो टीम अन्ना और आंदोलन का स्वागत और समर्थन करते। योगेंद्र यादव की इस धारणा पर हमारा कुछ कहना मुनासिब नहींे है। राजनीति और जनांदोलनों में और भी साथी हैं जो किशन पटनायक को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। बेहतर है कि वे ही बताएं किशन पटनायक के समस्त चिंतन और संघर्ष को दरकिनार करके इस प्रायोजित आंदोलन के
पक्षकार के रूप में उन्हें घसीटना कहां तक उचित है? अद्र्धसत्य झूठ से ज्यादा बुरा होता है। योगेंद्र यादव का यह कहना कि हम सबके मन के कोने में एक अन्ना बैठा है, अद्र्धसत्य है। हम सबमें केवल वे हम सब आते हैं, जिनके मन में चोर है। भला एक मेहनतकश किसान, कारीगर, मजदूर, बेरोजगार - वह औरत हो,
मर्द हो, बच्चा हो, जवान हो, बूढ़ा हो - को अन्ना की क्यों जरूरत पड़ने लगी? उसके मन के कोने में कौन-सा पाप छिपा हो सकता है? अपने यानी नवउदारवादी मध्यवर्ग के देवता को सबका देवता बताना क्सा पूरी सच्चाई है? समर्थकों द्वारा अन्ना को गांधी बनाने के पीछे का मनोविज्ञान समझा जा सकता है। वेपवित्रता की मूर्तिकी छाया में अपने पवित्र होने का अहसास करते हैं। वरना किसी को थप्पड़ मारे जाने पर एक सामान्य समझदार बजुर्ग भी वह नहींे कहेगा जो अन्ना हजारे ने कहा। इस नए गांधी की नजर पापियों के हृदय पर नहीं, शरीर के मांस पर होती है, जिसे वे गिद्ध-कौओं को खिला देना चाहते हैं। अन्ना हजारे ने अपना कुछ नहीं छिपाया है। दरअसल, ये दूसरे लोग हैं जिन्होंने अपनापापछिपाने के लिए अन्ना की आड़ ली है।
हो यह भी सकता है कि खुद अन्ना ने मन के किसी पाप को ध्ाोने के लिए सेवा का व्रत लिया हो? सीमा पर युद्ध में उनके साथी मारे गए और वे बच गए। युद्धस्थल में ऐसा होता है। लेकिन यह भी होता है कि बचने वाले असल में बच निकलने वाले होते हैं। दो विश्वयुद्ध ों में हिस्सा लेने वाले कई जनरलों और सिपाहियों ने अपने अनुभव लिखे हैं। यूरोप में विपुल युद्ध-साहित्य उपलब्ध है। युद्ध ों के लोक-प्रचलित किस्से भी बहुत सारे होते हैं। उनमें दोनों तरह के उदाहरण मिलते हैं - सीमा पर मर-मिटने वालों के भी और भाग निकलने वालों के भी। हमारे गांव के लोककवि कर्म सिंह ने लड़ाई परहोलीबनाई थी। उसका मुखड़ा है - ‘लड़ रहे सजीले ज्वान, कायर तो पीठ दिखावें।वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा के साथ अन्ना हजारे और बाबा रामदेव शुरू से साथ हैं। योगेंद्र यादव फिर भी कहते हैं कि अन्ना और उनकी टीम रामदेव से अलग हैं। इसे वे टीम अन्ना को चुनने का प्रमुख आधार बनाते हैं। वे शुरू से टीम अन्ना के समर्थक हैं तो रामदेव के भी समर्थक हुए। आंदोलन के हाल के आयोजन में रामदेव जंतर-मंतर पर आए। रामदेव के पहले से भक्त जनरल वीके सिंह ने जूस पिला कर अनशनकारियों का अनशन तुड़वाया। वे रामदेव के अनशन तोड़ने के अवसर पर भी मौजूद रहे।भारत की बेटीको जंतर-मंतर और रामलीला मैदान दोनों जगह रहना ही था।नया क्रांति धर्मनिभाने के उत्साही समर्थक दोनों जगह मौजूद थे। अरविंद केजरीवाल रामदेव का समर्थन करने का एलान किया। अन्ना और रामदेव ही नहीं, कांग्रेस-भाजपा समेत यह पूरी एक टीम है। लेखक गिरिराज किशोर अन्ना केत्याग और तपस्याके कायल हैं। गांधी के जीवन पर उपन्यास लिखने वाले लेखक को अन्ना हजारे में गांधी नजर आते हैं, तो बाकियों की भ्रांति को समझा जा सकता है। लेकिन गिरिराज किशोर यह नहीं बताते कि अन्ना त्याग और तपस्या की कीमत वसूलते रहे हैं। विश्व बैंक, मैगसेसे और भारत सरकार के पुरस्कार उन्हें मिले हैं। उनका जन्मदिन तक लाखों में मनता है, जिसका हिसाब रखने की जरूरत नहीं समझी जाती। हमने पहले भी यह कहा है कि इस आंदोलन में गांधी के साथ बड़ा ही भौंड़ा बर्ताव किया गया है। एक कोशिश होती है कि व्यक्ति अपने आदर्श के औदात्य की छाया को छूने की कोशिश करता है। लेकिन एक व्यक्ति उसे अपने स्तर पर गिरा लेता है। इस आंदोलन ने गांधी को वाकई सवर्णों और पूंजीपतियों का नेता बना दिया है। गांधी को इस स्तर पर गिराने में कई गांधीवादियों की सहभागिता रही है। दलित विचारक और नेता चाहें तो खुद गांधीवादियों द्वारा कमजोर किए गए गांध्  की इसदशाका लाभ उठा कर अपने हमले तेज सकते हैं। उन्हें
कोई यह कहने वाला नहीं रहेगा कि कि गांधी को गाली देने के साथ वे अगड़ों की नकल करते हैं और पूंजीवाद की पूजा। आंदोलन में सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह का नया किरदार जुड़ा है। हाल में अवकाश पाने वाले जनरल साहब ने कहा है कि अवकाश प्राप्त फौजी अनुशासित होते हैं। उन्हें राजनीति में आना चाहिए। उनकी अपनी चैकसी गौरतलब है। राजनीति में आने के पहले उन्होंने जाति-समागमों में जाने का काफी ध्यान रखा है! शुक्र यही मनाना चाहिए कि कल को वे अवकाश प्राप्त फौजियों को कुछ ढीला पाकर, सेवारत फौजियों का आह्वान कर डालें? वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर जनरल से बहुत खफा हैं। (देखें, ‘दि बैटल हैज जस्ट बिगन’, जनता, 19 अगस्त 2012) उन्हें जनरल के राजनीति की बात करने में लोकतंत्र कमजोर होने का खतरा लगता है। उन्होंने सुझाव दिया है कि अवकाश प्राप्ति के 5 साल तक फौजियों को चुनाव नहीं लड़ने देने का कानून बनना चाहिए। हालांकि लगे हाथ सिविल अधिकारियों पर भी उन्होंने यह कानूनी पाबंदी लगाने की बात की है। नैयर साहब यह देखें कि भारतीय लोकतंत्र सबको खपाने की क्षमता रखता है। जब वह संत, संन्यासी, दलाल, भांड, बाहुबली, धनबली, नेताओं के बेटा-बेटी (ग्लोबलाइजेशन की यही रफ्तार बनी रही तो एनआरआई भी एक दिन यहां चुनाव लड़ेंगे) - सबको झेल जाता है, तो क्या एक अवकाश प्राप्त जनरल को नहीं झेल पाएगा? जनरल ने अभी तक अलग पार्टी बनाने की बात नहीं कही है। अगर वे राजनीति करेंगे तो अन्ना और रामदेव के साथ ही करेंगे, जिनके मंचों पर उनकी सम्मिलित आवा-जाही रही है और जहां से उन्होंने जेपी का नाम लेकर राजनीतिक ललकार दी है। नैयर साहब अन्ना और रामदेव दोनों के प्रशंसक हैं। जब उनसे लोकतंत्र को खतरा नहीं है तो जनरल से कैसे हो जाएगा? जैसा कि हमने ऊपर कहा, नैयर साहब अन्ना और रामदेव के प्रशंसक हैं। और अन्ना और रामदेव नरेंद्र मोदी के। दोनों  प्रशंसा पात्रों में मोदी सबसे पहले आते हैं। इसके बावजूद दोनों की अहिंसा से भी नैयर साहब बड़े प्रभावित हैं। भले ही अन्ना के अंध-समर्थकों ने प्रशांत भूषण पर उनके कश्मीर संबंध् बयान के विरोध में चैंबर में घुस कर हमला किया और अन्ना ने हमलावरों की देशभक्ति की ताईद की। इस टीम के एक महत्वपूर्ण सदस्य चेतन भगत आजकल दिखाई नहीं दे रहे हैं। (सुना है वे प्रध्नमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी को पछाड़ने के नेट पर किए जाने वाले सर्वे में व्यस्त हैं।) आंदोलन की सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने नरेंद्र मोदी से राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व करने की गुहार लगाई थी। यह उन्हीं दिनों की बात है जब नरेंद्र मोदी ने अन्ना हजारे द्वारा अपनी प्रशंसा पर उन्हें आभार और धन्यवाद का पत्र लिखा था। और आगाह भी किया था कि उनके शत्रु उन्हें यानी को अन्ना को उनसे विमुख करने की कोशिश करेंगे। रामदेव अपने समर्थकों को पुलिस के हवाले छोड़ कर स्त्रीवेश में भाग खड़े हुए थे। राजदेवी की दुखद मौत की जिम्मेदारी पुलिस के साथ रामदेव की भी उतनी ही
है, जिनकी तस्वीर को रख कर वे जनभावनाओं का शोषण करते हैं। हालांकि यह भारत आजादी के बाद से गांधी का नहीं है, फिर भी अहिंसा पर उनके चिंतन और आचरण के हवाले से कहा जा सकता है कि अहिंसा क्रोधी और कायर का हथियार नहीं होती। धोखा देने वालों का तो कतई नहीं। नैयर साहब को अन्ना और रामदेव के आंदोलन से भ्रष्टाचार मिटने और काला धन वापसी के साथ देश का दारिद्रय मिटने का पूरा भरोसा लगता है। क्योंकि किंचित किंतु-परंतु के बाद नई पार्टी का उन्होंने स्वागत किया है। (देखें, ‘पार्टी राइजिज फ्राम एशीज आॅफ मूवमेंट’, जनता, 12 अगस्त 2012) हालांकि अब वे अन्ना के लोगों को बाबा और उनके मसलमैनों से बचने की सलाह देते हैं। अन्ना के लोग कौन हैं? मेधा पाटकर और अरुणा राय, जैसा कि नैयर साहब कहते हैं, या केजरीवाल, किरन बेदी, चेतन भगत, प्रशांत भूषण आदि? अन्ना के आंदोलन में धन किसका लगा है और रणनीति किसकी चलती है? जिनका धन लगा है और जिनकी रणनीति चलती है, वही अन्ना के असली लोग हैं। नैयर साहब अन्ना के अनशन और तरीके को गांधी के विपरीत भी बताते हैं और उन्हें पक्का गांधीवादी भी कहते हैं। उनका अन्ना आंदोलन की खूबी और प्रशंसा में कहा गया यह कथन - ‘अन्ना आंदोलन ने इंटैलिजेंसिया के पैर उखाड़ दिए’ - सही बैठता है। जिन्हें वे अन्ना के लोग बता रहे हैं, दरअसल, वे लोग हैं जो अन्ना आंदोलन की आंधी में पैर उखड़ने के चलते उसमें जा मिले। नैयर साहब कहते हैं कि सबके पैर उखाड़ देने वाले इस आंदोलन पर ठीक ही 18 महीनों तक मीडिया का फोकस बना रहा। हालांकि इसे उलट कर भी कहा जा सकता है कि मीडिया के फोकस से यह आंदोलन खड़ा हुआ और मीडिया की भूख ने ही बहुतों की पैर उखाड़े।
नैयर साहब समेत इस आंदोलन के समर्थकों की लोकतंत्र की चिंता परिवर्तनकारी राजनीति की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। जैसा कि नैयर साहब कहते हैं, मान लिया यह आंदोलन अहिंसक है। लेकिन किसके पक्ष में है? पूंजीवाद के पक्ष में भारत का नागरिक समाज आंदोलन करेगा तो उसके विरोध में हिंसक आंदोलन होगा ही। हिंसक परिवर्तन के हिमायती यही तो कहते हैं कि यह पूंजीवादी लोकतंत्र है। तो कौन-से अहिंसक लोकतंत्र की चिंता इस आंदोलन के समर्थक कर रहे हैं? हमें जनरल के राजनीति में आने पर एतराज का कोई कारण नजर नहीं आता। उनके पहले कई अवकाश प्राप्त फौजी राजनीति में रहे हैं और अभी भी हैं। कांग्रेस में भी हैं और भाजपा में भी। जनरल साहब से हमारी शिकायत अलग है। वे रामदेव के पहले से भक्त हैं। कहीं उनकी देशभक्ति रामदेव जैसी हो? दूसरे, जिन मुद्दों को वे उठा रहे हैं, पिछले 25 सालों से नवउदारवाद विरोधी पार्टियां और संगठन उन पर संघर्ष कर रहे हैं। अगर देश के लुटाए जाने वाले संसाधनों और किसानों की तबाही को लेकर जनरल को वाकई चिंता होती, तो वे अपनी एक साल की और नौकरी के लिए कानून-कचहरी नहीं करते। सोचते कि प्रोपर्टी डीलर बन चुकी देश की सरकार के खिलाफ संघर्ष में जुटने का एक साल पहले मौका मिल रहा है। गौर करें, अन्ना से लेकर जनरल तक, यह पूरा आंदोलन मुद्दों की उठाईगीरी का आंदोलन है। किसानों की जमीन को लेकर जनरल साहब खासे चिंतित हैं। यह अच्छी बात है। आदिवासियों के बाद नवउदारवादी निजाम ने किसानों का बाढा लगाया है और खुदरा में विदेशी निवेश का
फैसला करके छोटे व्यापारियों की तबाही का फरमान लिख दिया है। सेना के सिपाही की सभी इज्जत करते हैं। कांग्रेस से अलग भाजपा और क्षेत्रीय क्षत्रप उनकी बात पर गौर करेंगे। वे कम से कम उनसे यह वायदा
ले लें कि अमेरिका में तैयार अमेरिका के फायदे के लिए अमेरिका के साथ किया गया परमाणु करार रद्द किया जाएगा; खुदरा में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश का कानून भी रद्द किया जाएगा; और 1894 में बने लैंड एक्वीजीशन एक्ट सहित हाल बने लैंड एक्वीजीशन, रीहेबिलिटेशन एंड रीसेटलमेंट बिल, 2011 को भी रद्द किया जाएगा। प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा को मुनाफाखोर पूंजी की चरागाह बनाया जा रहा है। भारत के विश्वविद्यालयी ढांचे को नष्ट करके निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों की बाढ़ लाई जा रही है। जनरल साहब कहें कि आने वाली सरकार को 1991 के बाद अक्सर अध्यादेशों के जरिए हुए संविधान विरोधी फैसलों और कानूनों की समीक्षा करनी होगी और संविधान को सबसे ऊपर रखना होगा। उनके अपने गृहराज्य हरियाणा में राजीव गांधी एजुकेशन सिटी के नाम पर 6 गांवों की अत्यंत उपजाऊ जमीन सरकारी दर पर लेकर निजी घ्ारानों को सौंपी गई है। किसानों की सरकार ने सुनी, अदालत ने। जनरल साहब हरियाणा में अगली बार आने वाली सरकार से वायदा लें कि बेचने के अनिच्छुक किसानों को उनकी जमीन वापस की जाएगी
और बाजार के भाव पर मुआवजा मिलेगा। अगर अगली बार हरियाणा में गैर-कांग्रेसी सरकार बनती है तो वे वादा लें कि फतेहाबाद के पास गोरखपुर में परमाणु पावर रिएक्टर नहीं लगाया जाएगा। तभी पता लगेगा
कि उनकी चिंता कितनी सच्ची है। वरना जनरल साहब, गरीबों के श्रम और देश के संसाधनों की बिकवाली से जो बड़ी दावत चल रही है, उसमें जूठन बीनने वालों की कमी नहीं है। सफल संपूर्ण प्रतिक्रांति इस आंदोलन के होते यूपी के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने नौजवानों को लैपटॉप देने का चुनावी वादा किया। हाल में यूपीए सरकार ने सबको मोबाइल फोन देने की घ्ाोषणा की है।टाइमपत्रिका द्वारा मनमोहन सिंह को अपेक्षा से कम उपलब्धियां हासिल करने के लिए लताड़ा गया तो भाजपा ने मनमोहन सिंह से आगे बढ़ कर उपलब्धियां हासिल कर दिखाने का हौसला और दावा पेश किया। नवउदारवाद का यह बहुरूपी सिलसिला आगे और ध्ड़ल्ले से चलेगा। पिछले 25 सालों में नवउदारवाद विरोध की जो वास्तविक राजनीति संगठित हुई थी, उसकी जगह टीम अन्ना की नकली राजनीति गई है। ये लोग पार्टी भी बनाएं, जो नुकसान करना
था, वह हो चुका है। इस आंदोलन ने पूंजीवाद के ज्यादा खूंखार संस्करण को प्रमाणपत्र दे दिया है। मनमोहन सिंह अभी तक के सर्वाधिक क्रूर प्रध्ाानमंत्री हैं। जैसे आज विकास और ग्रोथ के नाम पर गुजरात के राज्य
प्रायोजित नरसंहार को भूलने की नसीहतें दी जा रही हैं, वैसे ही उन्होंने थोड़े मुआवजे के बदले सिखों के कत्लेआम को भूलने की सलाह दी थी। मनमोहन सिंह जिस पार्टी से प्रधानमंत्री हैं, वह सूक्ष्म सांप्रदायिकता की माहिर पार्टी है। आरएसएस-भाजपा खुली संाप्रदायिकता करते हैं। नरेंद्र मोदी ने उसे कुछ ज्यादा ही खुले
आयाम पर पहुंचा दिया है। यह अलग सवाल है कि दोनों में कौन ज्यादा खतरनाक है, लेकिन इस आंदोलन ने आरएसएस-भाजपा की ज्यादा खुली सांप्रदायिकता के पक्ष को मजबूत और स्वीकार्य बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। यह आंदोलन जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे के नरेंद्र मोदी की प्रशंसा से शुरू हुआ था और रामलीला मैदान में रामदेव की नरेंद्र मोदी और आरएसएस की प्रशंसा के साथ समाप्त हुआ है। ऐसे में आरएसएस वालों का खुश होना बनता है। आपको याद होगा, पहले अनशन के वक्त सत्ता की सूंघ पाकर राजघाट पर वे किस कदर मतवाले होकर नाचे थे! इस आंदोलन और पूरी दुनिया में पूंजीवाद ने अपने विरोध्  का जो तिलस्म रचा हुआ है, उसके आधार पर कह सकते हैं कि आध्ाुनिक दुनिया की अभी तक की सदियां समाजवाद के बरक्स पूंजीवाद के पक्ष में प्रतिक्रांतियों की सदियां रही हंै। पूंजीवाद की ताकत और उसके वास्तविक विरोधी संघर्षों की कमियों कमजोरियों को जानने के लिए इतिहास का वैसा पाठ किया जाना जरूरी है ताकि इतिहास के अंत की घोषणाओं को झुठलाया जा सके। लोहिया ने कहा है कि माक्र्सवाद या गांधीवाद विरोधी होने का कोई मायना नहीं है। पूंजीवाद के बरक्स विविध स्रोतों से नई समाजवादी विचारधारा के दार्शनिक आधार तैयार करने की जरूरत होती है। किशन पटनायक ने जो शास्त्र-संकट की बात की है, उसका आशय यही है कि पूंजीवाद के विरोध का सम्यक शास्त्र हमसे नहीं तैयार हो पाया है। अंत में, जो लोग कह रहे हैं कि अन्ना आंदोलन विफल हो गया, पूरी तरह से गलत हैं। आंदोलन पूरी तरह से सफल हुआ है। डंकल संधि की तारीख से शुरू हुआ प्रतिक्रांति का अध्याय इस आंदोलन ने पूरा कर दिया। किशन पटनायक लिखते हैं, ‘‘इस वक्त समूची दुनिया में जो हो रहा है, वह शायद विश्व इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिक्रांति है। यह संगठित है, विश्वव्यापी है और समाज तथा जीवन के हर पहलू को बदल देने वाली है। यहां तक कि प्रकृति और प्राणिजगत को प्रभावित करने वाली है। इक्कीसवीं सदी के बाद भी अगर मानव समाज और सभ्यता की चेतना बची रहेगी, तो आज के समय के बारे में इसी तरह का जिक्र इतिहास की पुस्तकों में होगा। डंकेल संधि की तारीख इस प्रतिक्रांति की शुरुआत की तारीख मानी जा सकती है।’’ (‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’, पृ. 172, राजकमल प्रकाशन, 2000) प्रतिक्रांति का भारतीय अध्याय इतना जल्दी पूरा हो जाएगा, यह किशन पटनायक को नहीं लगा होगा। इस आंदोलन के चलते भारत वैश्विक प्रतिक्रांति के साथ नत्थी मजबूती के साथ (इंटीग्रेटिड) हो गया है।
डॉ प्रेम सिंह
राष्ट्रीय महासचिव , सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)
25 अगस्त 2012