Sunday, February 3, 2013

संविधान पर भारी सांप्रदायिकता - प्रेम सिंह

( गुजरात को लक्षित कर जो नगाड़े बज रहे हैं, वो हमारे कानों में ही नहीं आत्मा पर भी चोट करते हैं। अगर साम्प्रादियकता को स्वीकार करने की इतनी ही मजबूरी है तो फिर हमें संविधान को खारिज कर देना चाहिए। ये सही है कि मोहब्बत की क़िताब पल पल का हिसाब करके नहीं लिखी जाती। लेकिन सवाल जब प्राण तत्व का हो तो उसके बिना जिया भी नहीं जा सकता। बुद्घिजीवीयों ने तो सुर अभी से ही बदलने शुरू कर दिए है। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की संघ परिवार ने जो धुन तैयार की है, मीडिया उसके कोरस में गा रही है। ऐसे में डॉ प्रेम सिंह का ये लेख निश्चय ही हमारे जैसे लोगों की हौसला अफ्जाई करती है। )
भूलने के विरुद्ध
नरेंद्र मोदी के समर्थक और प्रशंसक पिछले कई सालों से दबाव बना रहे हैं कि गुजरात में २००२ में जो हुआ उसे भूल जाना चाहिए; गुजरात नरसंहार की बात अब मोदी के संदर्भ में नहीं करनी चाहिए; पीछे छूट चुके २००२ की बातें भुला कर आगे देखना चाहिए; मोदी ने कुछ भी गलत नहीं किया था; उन्हें बदमान किया गया है; मोदी के रूप में देश को एक ऐसा काबिल नेता मिल गया है जिसे देश का प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए। मोदी के पक्ष में जितनी तेजी और तरीकों से यह गुट काम कर रहा है, उतनी तेजी मोदी के पक्ष में आरएसएस में भी नहीं देखने को मिलती। भाजपा में तो नहीं ही मिलती। मोदी के प्रशंसकों में उनके छवि निर्माण के लिए नियुक्त उनकी जनसंपर्क (पीआर) टीम और विकास के अंधे कोरे नवउदारवादी ही नहीं है। ऐसे विद्वान, पत्रकार, संपादक और राजनीतिक टिप्पणीकार भी काफी संख्या में शामिल हैं जो सांप्रदायिक नहीं माने जाते और कभी-कभी संविधान और गरीबों की बात भी कर लेते हैं। कई ख्नमॉडरेट हिंदुओंज् ने फरवरी-मार्च २००२ के नरसंहार के वक्त ही मोदी का परोक्ष बचाव शुरू कर दिया था। ख्नगांधीवादीज् और ख्नसमाज सुधारकज् अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के जंतर-मंतर पर हुए पहले धरने पर सबसे पहले नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। उनकी टीम में शामिल खास पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, जनांदोलनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी मोदी का प्रशंसक माना जाए या नहीं, यह अपने-अपने सोचने और तय करने की बात है। पिछले दिनों ख्नगली के शेरज् बाल ठाकरे के निधन पर उनकी प्रशंसा में कसीदे पढ़ने वाली हस्तियां, जिनमें कलाकारों से लेकर उद्योगपति तक शामिल हैं, ख्नराष्ट्र के शेरज् मोदी की प्रशंसा में पीछे रहने वाले नहीं है।
मोदी का महिमामंडन योजनाबद्ध ढंग से सोशल और मुख्यधारा मीडिया के चतुराईपूर्ण इस्तेमाल से हुआ है। टीवी, प्रिंट मीडिया, पत्रिकाएं, ब्लॉग, ट्वीटर, फेसबुक नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में लंबे समय से लगे हैं। सार्वजनिक मंचों, सरकारी व गैर-सरकारी बैठकों में मोदी का गुणगान होता है। इस हल्ले में २००२ के कृत्य की निंदा करने वाले जल्दी ही हाशिए पर चले गए और प्रशंसक आगे आ गए हैं। नरसंहार के वक्त गुजरात के बाहर हुई व्यापक स्तर पर निंदा का स्थान व्यापक स्तर पर प्रशंसा ने ले लिया है। ऐसा नहीं है कि मोदी के विरोध में बोलने और लिखने वाले लोग नहीं हैं, अब उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। मोदी के प्रशंसकों का पलड़ा उनसे कहीं भारी है।
मोदी के प्रशंसकों से हालांकि पूछा जा सकता है कि अगर मोदी ने सब ठीक किया था, जैसा कि वे कहते हैं, और उन्हें बदनाम किया गया है, तो फिर भूलने की बात करने की जरूरत कहां से पैदा होती है? उन्हें भूलने की बात किए बगैर मोदी का समर्थन करना चाहिए। अगर मोदी को ख्ननिहित स्वार्थोंज् ने बदनाम किया है, जैसा कि मोदी समेत उनके पार्टी के नेता और समर्थक कहते हैं, तो उन्हें बदनाम करने वालों की परवाह नहीं होनी चाहिए। न ही उनके द्वारा की जाने वाली बदनामी की। जाहिर है, भूलने के पक्षधर उन सारे तथ्यों और सबूतों को आंख बंद करके भी अनदेखा नहीं कर पाते, जो सत्ता का भरसक दुरुपयोग करने के बावजूद मोदी मिटा नहीं पाए। जनहित याचिकाओं के चलते गुजरात कांड में सुप्रीम कोर्ट का सीमित हस्तक्षेप तो २००४ में हुआ। सांप्रदायिक फासीवादी वैसे भी हाई कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट की परवाह कहां करते हैं? बाबरी मस्जिद ढहाने का कृत्य सुप्रीम कोर्ट में उसे नुकसान न होने देने का हलफनामा देकर किया गया था। बहरहाल, मोदी के प्रशंसकों के गुट से इतना आग्रह तो किया ही जा सकता है कि भूलने से पहले यह याद कर लेना उचित होगा कि हम क्या भूलने की बात कर रहे हैं?
गुजरात नरसंहार - २७ फरवरी २००२ को गोधरा में और उसके बाद कई हफ्तों तक पूरे गुजरात में - के वक्त लिखे गए लेखों, जो ख्नगुजरात के सबकज् पुस्तिका में अलग से प्रकाशित हैं, के बाद हमने इस प्रकरण पर विशेष कुछ नहीं लिखा है। यहां भी हम कुछ नया नहीं लिखने जा रहे हैं। मोदी के समर्थन की परिघटना को कुछ पुरानी और नई घटनाओं के संदर्भ में देखना चाहते हैं ताकि उन्हें प्रधानमंत्री चाहने वालों की फैंटेसी की हकीकत समझी जा सके। 
नरेंद्र मोदी वर्ष २००२ में उनके नेतृत्व में हुए राज्य प्रायोजित मुसलमानों के नरसंहार के कारनामे के बाद चर्चा में आने से पहले आरएसएस के बाहर ज्यादा नहीं जाने जाते थे। वहां उनकी कट्टरता की छवि थी, जिसका जिक्र खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने २००१ में उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने के पार्टी के निर्णय के वक्त किया था। मोदी को यह ख्नश्रेयज् जाता है कि उन्होंने संघ की विचारधारा को राममंदिर आंदोलन और बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद बची-खुची ख्नउदारज् लाइन से उतार कर मजबूती के साथ कट्टरता की लाइन पर चढ़ा दिया। गुजरात में कट्टर हिंदुत्व का प्रयोग काफी अरसे से चल रहा था। २७ फरवरी २००२ को साबरमती एक्सप्रैस जब गोधरा स्टेशन पर रुकी, आगे चली और कुछ किलोमीटर बाद फिर रुकी और उसके एस ६ डिब्बे में आग लगा कर ५८ कारसेवकों को जिंदा जला दिया गया, तो मोदी ने कट्टरता की लाइन को हरी झंडी दिखा दी। हिंदुत्व की गुजराती प्रयोगशाला में संविधान का धर्मनिरपेक्ष मूल्य धू-धू करके जलने लगा।
यह महज ख्नक्रिया की प्रतिक्रियाज्, जैसा कि मोदी ने उस समय कहा था, होती तो ५८ मुसलमानों को मार कर पूरी हो जानी चाहिए थी। कुदरत का नियम अपने अनुशासन के दायरे से बाहर नहीं जाता। लेकिन वैसा था नहीं। बहुसंख्या के बल पर राज्य की सरपरस्ती में गुजराती हिंदुओं ने बच्चों, बूढ़ों, औरतों समेत हजार से ज्यादा मुसलमानों को खुल कर सरेआम मौत के घाट उतारा और उनकी संपत्तियों की लूटपाट की। २० हजार घर और दुकानें लूटे और जलाए गए। ३६० पूजास्थल तोड़े गए। डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को कैंपों में शरण लेनी पड़ी। पढ़े-लिखे मध्यवर्ग से लेकर आदिवासियों तक उसमें शामिल थे। मोदी खुद, उनके चहेते नेता और कुछ पुलिस व अन्य अधिकारी नरसंहार में संलिप्त थे। 
गोधरा का नरसंहार को लेकर काफी ख्नराजनीतिज् हुई है। वह पूर्वनियोजित था या हालात बिगड़ने का नतीजा या दुघर्टना - इस पर जस्टिस डी.एस. तेवतिया और उनके साथियों की रपट, गुजरात सरकार द्वारा गठित जस्टिस जी.टी. नानावती आयोग की रपट, फासट ट्रेक कोर्ट के जज पी. आर. पटेल का फैसला, केंद्र सरकार द्वारा गठित जस्टिस यू.सी. बनर्जी आयोग की रपट (इस आयोग के गठन को कोर्ट ने अवैध करार दिया था) और जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर, जस्टिस पी.बी. सामंत, जस्टिस एच. सुरेश, नागरिक अधिकार वकील के.जी. कन्नाबिरन, सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय, विद्वान तनिका सरकार, घनश्याम ख्नााह और के.एस. सुब्रमण्यम द्वारा तैयार कंसर्ड सिटीजंस ट्रिब्युनल (सीसीटी) की रपट में अलग-अलग दावे और निष्कर्ष हैं। उस घटना के लिए ३१ लोगों को निचली अदालत से सजा हो चुकी है। उनमें ११ को मृत्युदंड और २० को आजीवन कारावास की सजा मिली है। ६३ आरोपियों को अदालत ने बरी किया है। सजा पाने वाले सभी अपराधी मुसलमान हैं। जाहिर है, कोर्ट ने यह स्वीकार किया है कि डिब्बे में आग मुसलमानों ने लगाई थी।
लेकिन गोधरा मामले में किसी ने यह देखने की कोशिश नहीं की कि अगर बाकी गुजरात गोधरा की प्रतिक्रया था तो गोधरा बाकी गुजरात की प्रतिक्रिया हो सकता है। गोधरा के बारे में हम यह कहना चाहते हैं, जो हमने उस वक्त भी कहा था, कि उसे अकारण और निरपेक्ष कार्रवाई न मान कर संघ की देशव्यापी सांप्रदायिक मुहिम की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। घटना के पिछले पंद्रह सालों से संघ संप्रदाय के नेता राम मंदिर आंदोलन के नाम पर खुलेआम गाली-गलोज की भाषा में भाषणों, कैसटों, पेंफ्लेटों, पुस्तिकाओं और इलैक्ट्रिॉनिक मीडिया में परिचर्चाओं के जरिए अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों का मानमर्दन करने में जुटे हुए थे। संघ की इस लंबी सांप्रदायिक मुहिम ने देश के सामाजिक सौहार्द का माहौल गहरे तक विषाक्त कर दिया था। १९९२ में बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ और देश में बड़े पैमाने पर दंगे हुए जिसमें हजारों लोग मारे गए और तबाह हुए। यह सिलसिला चलता रहा और उसके फलस्वरूप प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री-उपप्रधानमंत्री बने लालकृष्ण अडवाणी ने अपने सुनियोजित भड़काऊ बयानों से माहौल को बिगाड़ने में भूमिका अदा की। गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाया गया। 
गोधरा की घटना के बारे में ८ मार्च के अंग्रेजी दैनिक ख्नटाइम्स आॅफ इंडियाज् में छपी अमरीकी अखबार ख्नवाशिंगटन पोस्टज् की खबर पर ध्यान देने की जरूरत है। ख्नवाशिंगटन पोस्टज् लिखता है कि ५८ लोगों को जिंदा जला दिए जाने की गुजरात ट्रेन-ट्रैजडी मुसलमान नौजवानों के पहले से घात लगा कर आक्रमण करने के कारण नहीं हुई। इस ट्रैजडी का कारण हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा झगड़ा उकसाना था जो काबू के बाहर हो गया। ख्नपोस्टज् लिखता हःै ख्नख्नदो दिनों तक साबरमती एक्सप्रेस उत्तर भारत के आर-पार रुकती-चलती गंतव्य की ओर जाती रही। एस ५ और एस ६ बोगियों में बैठे कुछ हिंदू कार्यकर्ता उपद्रवियों (हुलिगंस) जैसी हरकतें कर रहे थे। उन्होंने मुसलमान महिलाओं के सिर के आँचल खींच कर उतार दिए। उन्होंने चार सदस्यों के एक परिवार को ख्नश्रीराम-श्रीरामज् भजने से इनकार करने पर मध्यरात्री को बोगी से उतार दिया। कार्यकर्ताओं ने हर स्टेशन पर चाय और नाश्ते के पैसे नहीं दिए।ज्ज् ख्नपोस्टज् ने अपने ६ मार्च, २००२ के संस्करण में लिखा था कि २७ फरवरी को जब ट्रेन गोधरा रुकी तो वहाँ उपद्रवियों की पिछले स्टेशन से की जा रही हरकतों की जानकारी पहुँच गई थी। ट्रेन यात्रियों, प्रत्यक्षदर्शियों, पुलिस और रेलवे अधिकारियों से की गई मुलाकातों से यह लगता है कि ट्रेन में जो आग लगाई गई, वह मुसलमानों द्वारा पहले से घात लगाकर की जाने वाली आगजनी नहीं थी।
ख्नपोस्टज् ने गोधरा के एक पुलिस अधिकारी का हवाला देते हुए लिखा ख्नख्नदोनों पक्षों का ही दोष था। उकसाया गया था और उसकी प्रतिक्रिया ज्यादा हुई, लेकिन किसी ने भी यह सोचा तक नहीं था कि यह सब इतनी बड़ी ट्रैजडी का रूप ले लेगा।ज्ज् ख्नपोस्टज् ने आगे लिखा कि ख्नख्नगोधरा के डीएसपी बीके नानावटी ने यह कहा बताते हैं कि जाँच-पड़ताल से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दावे का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि ट्रेन पर हमला ख्नआतंकवादीज् आक्रमण था; वह पूर्वनियोजित नहीं था। यह तो अचानक उकसावे के कारण पैदा हुई घटना थी।ज्ज् ख्नपोस्टज् आगे लिखता है, ख्नख्नजैसे ही ट्रेन गोधरा पर रुकी, उपद्रव होने के सारे कारण बन चुके थे। ट्रेन कार्यकर्ताओं की हरकतों के कारण पाँच घंटा लेट हो गई थी, क्योंकि कार्यकर्ताओं की हरकतों की वजह से ट्रेन को कई बार रास्ते में रुकने को बाध्य होना पड़ा। गोधरा स्टेशन के ख्नवेंडरज् यह तय कर चुके थे कि वे अपने को उपद्रवियों का शिकार नहीं होने देंगे। उधर विश्व हिंदू परिषद के सदस्य भी ख्नकार्रवाई के लिए प्रस्तुतज् थे। ट्रेन के डिब्बों के फाटकों के नजदीक उन्होंने रेल लाइनों के बगल से पत्थर जमा कर उनका ढेर लगा रखा था। जब हिंदुओं ने चाय और नाश्ते के पैसे चुकाने से इनकार किया तो कई मुसलमान नौजवान ट्रेन के भीतर कूद पड़े और जब ट्रेन चल पड़ी तो उन्होंने जंजीर खींच दी। साबरमती एक्सप्रेस स्टेशन से आठ मील दूर एक मुसलमान मुहल्ले में सीत्कार करती हुई रुकी। झगड़ा शुरू हुआ और मुहल्ले के सैंकड़ों लोग इक्ट्ठा हो गए।ज्ज् ख्नपोस्टज् के अनुसार पुलिस और रेल अधिकारियों का कहना था कि वे यह नहीं जानते कि किसने पहले पत्थर फेंकने शुरू किए।
ख्नख्नलेकिन अधिकारियों का खयाल है कि दस मिनट बाद एक या उससे अधिक मुसलमानों ने एक गद्दे पर ज्वलनशील पदार्थ डाल कर उसे एस ५ और एस ६ बोगियों के बीच प्रज्वलित कर दिया। कुछ मिनटों बाद एस ५ बोगी की दूसरी तरफ एक अन्य स्थान पर आग दिखाई पड़ी। कुछ ही क्षणों में बोगियाँ आग की लपटों में घिर गईं। पुलिस अधिकारियों ने यह कहा बताते हैं कि उन्हें इस बात का ठीक पता नहीं है कि दूसरी आग कैसे लगी। नानावटी ने कहा कि यह संभव है कि मुसलमानों ने दूसरी आग लगाई हो या यह भी संभव है कि हिंदुओं ने आग का जवाब आग से देने की नीयत से बिना सोचे-समझे कि उनका अपना डिब्बा मिट्टी के तेल और खाना  पकाने की गैस से भरा है, दूसरी आग लगाई हो; ख्नख्नयह दुर्घटना भी हो सकती है।ज्ज्
मोदी के प्रशंसक कह सकते हैं कि यह विदेशी अखबार की रपट है जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन मोदी के इन्हीं समर्थकों ने ब्लॉग ख्नदि वल्र्ड लाउड्स नरेंद्र मोदी ः एक्सर्ट्प्स फ्राम टाईम, ब्रुकिंग एंड इकॉनॉमिस्टज् पर उनकी विदेशी मीडिया में प्रकाशित प्रशंसाएं चस्पा की हुई हैं। ऐसा करते वक्त उन्हें जरूर आशा होगी कि जिस तरह से अंततः इंग्लैंड ने मोदी को स्वीकार कर लिया है, अमेरिका भी जल्दी ही उन्हें अपना लेगा। दुनिया में अनेक तानाशाहियों को कायम करने और आगे बढ़ाने वाला अमेरिका अपने सही मौके पर मोदी का स्वीकृति-तिलक क्यों नहीं कर देगा! हमें ख्नटाईमज् मैगजीन के हवाले से ही पता चला कि नरेंद्र मोदी ख्नाादी-शुदा हैं और अपनी पत्नी को छोड़े हुए है। लेकिन यह तथ्य समर्थकों ने ब्लॉग पर नहीं डाला है।   
उस समय की भाजपा नीत केंद्र सरकार समेत पूरा संघ संप्रदाय यह ख्नसिद्धज् करने में लग गया था कि इस घटना के लिए खुद मुसलमान, जो आतंकवादी होते हैं; और सेकुलर खेमा, जिसने गोधरा कांड की निंदा नहीं की, जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने नरसंहार पर मुख्यमंत्री और राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया, लेकिन ख्नउदारज् वाजपेयी ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। मोदी को हटाने की बात दूर, उनकी हौसला अफजायी की गई। नरसंहार पर मोदी को ख्नराजधर्मज् निभाने की नसीहत देने वाले प्रधानमंत्री वाजपेयी ने गोवा के पणजी शहर में हुई भाजपा की बैठक मेंं गोधरा कांड करने वालों तक ही अपनी चिंता को सीमित करते हुए सारा दोष मुसलमानों पर डाल दिया। यह कहते हुए कि गोधरा न होता तो गुजरात नहीं होता। गोधरा क्यों हुआ, इस पर औरों की तरह देश के प्रधानमंत्री ने भी ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। जैसा कि ऊपर कहा गया है, मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी गोधरा नरसंहार को मुस्लिम आतंकवादियों की पूर्व-नियोजित करतूत बताया। वे अपराधियों की पहचान और सजा हो जाने के बाद आज भी वैसा ही प्रचार करते हैं। यह सही है कि देश में लश्करे तोएबा और आईएसआई जैसे पाकिस्तानी संगठन अपना जाल फैलाते हैं। गुजरात के नरसंहार के बाद गांधी नगर में अक्षरधाम मंदिर पर आतंकवादी हमला हुआ। नरेंद्र मोदी और प्रवीन तोगड़िया को निशाना बनाने का प्लाट उजागर हुआ। बाकी देश में भी कई आतंकवादी हमले गोधरा के पहले और बाद में हो चुके हैं। लेकिन उसकी रोकथाम की जिम्मेदारी भाजपा समेत सभी राजनीतिक पार्टियों की है। भाजपा और उसके नेता सांप्रदायिकता के सहारे राजनीति करेंगे तो दुनिया के हिंसक हालातों के चलते हिंदू-मुस्लिम समेत देश के सभी नागरिक असुरक्षित रहेंगे।   
गोधरा के बाद हुए नरसंहार के पक्ष में मोदी समर्थकों के दो मुख्य तर्क चलते हैं। पहला तो यही कि गोधरा के अपराधियों पर उसकी सारी जिम्मेदारी आती है। दूसरा यह कि कांग्रेस शासित अन्य राज्यों और केंद्र में कई बार ऐसा हो चुका है; गुजरात में ही कांग्रेसी राज में लंबे समय तक हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़के रहे; फिर मोदी को ही क्यों बदनाम किया जाता है और प्रधानमंत्री बनने से रोका जाता है? मोदी के बचाव में १९८४ में हुए सिखों के नरसंहार का हवाला सबसे ज्यादा दिया जाता है। हालांकि मोदी के प्रशंसकों से पूछा जा सकता है कि जिन राजीव गांधी का वे हवाला देते हैं, उन्हें दंगों के बाद अभूतपूर्व बहुमत से उन्होंने ही जिताया था। तब उन्हें मुसलमानों से भी ज्यादा अल्पसंख्यक सिखों की पीड़ा का खयाल नहीं आया। आरएसएस ने उस चुनाव में राजीव गांधी का खुल कर साथ दिया था। कारण साफ था - राजीव गांधी की जीत में हिंदू गौरव की जीत तो थी ही, अमेरिकी सपना पूरा होने की दिशा में भी रास्ता खुलता हुआ नजर आ रहा था। राजीव गांधी ने उन्हें निराश नहीं किया। मोदी पूरे हिंदुत्वी राजीव गांधी ही हैं, जो अमेरिका का प्रमाणपत्र पाने के लिए अपने समर्थकों के साथ दिन-रात एक किए हुए हैं।
कहने का आशय है कि देश के संविधान में आस्था रखते हुए उसके मुताबिक शासन चलाना होता है। सभ्य समाज में इसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री ने ऐसा नहीं किया। उनके पहले कुछ अन्य नेताओं ने भी ऐसा नहीं किया था, यह तर्क स्वीकार्य नहीं हो सकता। लिहाजा, हम गुजरात के दोनों नरसंहारों को भूलने के विरुद्ध हैं। इसमें कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए कि अगर मनुष्य अपने किए पर पछताता है तो उसके किए को भुलाने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन एक अकेले मनुष्य और एक नेता में फर्क होता है। मारे गए और तबाह हुए लोगों की जो भी पीड़ाएं रही हों, मोदी ने संविधान के प्रति अपराध किया, यह सच्चाई दर्ज रहनी चाहिए। उसे भुलाने का अधिकार उन लोगों (मोदी के प्रशंसकों) को नहीं दिया जा सकता जो खुद संविधान के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं।  
गुजरात कांड में जान और माल की भयानक तबाही के साथ औरतों के सामूहिक बलात्कार और फिर जिंदा जला देने की घटनाएं भी बड़े पैमाने पर हुईं। सिटीजंस इनिशिएटिव, अमदाबाद की ओर से महिलाओं के एक पेनल ने एक रपट जारी की। इस रपट में बलात्कार की शिकार या प्रत्यक्षदर्शी औरतों की गवाहियों (टेस्टीमोनियल्स) का संकलन किया गया है। इस रपट के कुछ हिस्से - तीन गवाहियाँ - १८ अप्रैल के ख्नहिंदुस्तान टाइम्सज् में ख्नमाई डॉटर वाज लाइक ए फ्लावरज् (मेरी बेटी फूल की मानिंद थी) शीर्षक से प्रकाशित हुए।
ख्नहिंदुस्तान टाइम्सज् में प्रकाशित तीनों गवाहियों का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है ः
ज् सामूहिक बलात्कार (नाबालिग लड़कियों सहित) को प्रत्यक्ष देखना, नरोदा पटिया, अमदाबाद, फरवरी २८ ः ख्नख्नहमें गंगोत्री सोसायटी से जबरन बाहर निकाला गया। उसके बाद भीड़ ने जलते हुए टायर लेकर हमारा पीछा किया। उसी दौरान उन्होंने बहुत-सी लड़कियों के साथ बलात्कार किया। हमने आठ-दस बलात्कार अपनी आँखों से देखे। हमने उन्हें सोलह साल की मेहरुन्निसा को निर्वसन करते देखा। वे लोग अपने कपड़े उतार रह थे और लड़कियों को इशारा कर रहे थे। उसके बाद उन्होंने वहीं सड़क पर उनके साथ बलात्कार किया। . . . बलात्कार के बाद लड़कियों को जला दिया गया। अब कोई साक्ष्य नहीं बचा है।ज्ज् (स्रोत ः कुलसुम बीवी, शाह-ए-आलम कैंप, २७ मार्च)
ख्नख्नमैंने गुड्डु चारा को फरजाना के साथ बलात्कार करते हुए देखा। फरजाना की उम्र तेरह साल थी। वह हुसैन नगर की रहने वाली थी। उन्होंने फरजाना के पेट में सरिया घोंप दिया। बाद में उसे जला दिया गया। बारह साल की नूरजहां के साथ भी बलात्कार किया गया। बलात्कारियों में गुड्डु, सुरेश, नरेश चारा और हरिया थे। राज्य परिवहन विभाग में काम करने वाले भवानी सिंह को भी मैंने पाँच आदमियों और एक लड़के की हत्या करते हुए देखा।ज्ज् (स्रोत ः अजहरुद्दीन, १३ साल, उसने बलात्कार के दृश्य उस समय देखे जब वह गंगोत्री सोसायटी की छत पर छिपा हुआ था। चारा बस्ती जवान नगर के बिलकुल पीछे स्थित है।)
चारा नगर और कुबेर नगर से आई भीड़ ने शाम छह बजे के करीब लोगों को जलाना शुरू कर दिया। भीड़ ने मेरी तेईस साल की बेटी सहित सभी लड़कियों को निवर्सन कर दिया और उनके साथ बलात्कार किया। मेरी बेटी की शादी तय हो चुकी थी। मेरे परिवार के सात सदस्यों को जला दिया गया। उनमें मेरी चालीस साल की पत्नी, अठारह, चैदह और सात साल के बेटे और दो, चार और बाईस साल की बेटियाँ शामिल थीं। बाद में सिविल अस्पताल में दम तोड़ देने वाली मेरी सबसे बड़ी बेटी ने बताया कि जिन्होंने उसके साथ बलात्कार किया वे निक्कर पहने हुए थे। उन्होंने उसके सिर पर प्रहार किया और फिर जला दिया। अस्सी प्रतिशत जली हालत में उसकी मौत हो गई। (स्रोत ः अब्दुल उस्मान, सिटीजंस इनिशिएटिव, अमदाबाद द्वारा रिकॉर्ड किया गया।)
ज् बलात्कार के बाद बची सुल्तानी का बयान, गाँव एराल, कल्लोल तालुका, पंचमहल, २८ फरवरी ः ख्नख्नहम करीब चालीस लोग २८ फरवरी की दोपहर बाद हिंसक भीड़ से बचने के लिए एक टैंपो में कल्लोल की तरफ भागे। मेरे पति फिरोज टैंपो चला रहे थे। कल्लोल के बिल्कुल बाहर एक मारुति कार ने सड़क पर रास्ता रोका हुआ था। भीड़ इंतजार में लेटी हुई थी। फिरोज को टैंपो मोड़ना पड़ा और वह उलट गया। जैसे ही हम बाहर आए उन्होंने हमें मारना शुरू कर दिया। लोग चारों तरफ भागे। हम कुछ लोग नदी की तरफ भागे। मैं पीछे रह गई क्योंकि मैंने अपने बेटे फैजान को उठाया हुआ था। भीड़ के लोगों ने मुझे पीछे से पकड़ कर जमीन पर पटक दिया। फैजान मेरी गोद से गिर गया और और रोने लगा। उन लोगों ने मेरे कपड़े उतार कर मुझे निवर्सन कर दिया। उन्होंने एक के बाद एक मेरे साथ बलात्कार किया। पूरे समय मैं अपने बच्चे का रोना सुनती रही। तीन बलात्कारियों के बाद में गिनती भूल गई। उसके बाद तेज धार हथियार से उन्होंने मेरा पैर काट डाला और मुझे उसी हालत में छोड़ कर चले गए। (स्रोत ः सुल्तानी, कल्लोल कैंप, पंचमहल, ३० मार्च। इस मामले में डीएसपी को लिखित स्टेटमेंट देने के बावजूद अभी तक एफआईआर नहीं लिखी गई है। सुल्तानी ने देलोल गाँव के जीतू शाह और रामनाथ गाँव के अशोक पटेल के नाम भी लिए हैं।)
ज् माँ द्वारा अपनी बेटी के बलात्कार का विवरण, गाँव एराल, कल्लोल तालुका, पंचमहल, ३ मार्च ः ख्नख्नमेरे अवकाश-प्राप्त शिक्षक ससुर ने २८ फरवरी को बाकी मुसलमानों के साथ गाँव छोड़ कर कल्लोल जाने से इनकार कर दिया। उन्हें विश्वास था कि हमें कोई नुकसान नहीं पहुँचाएगा। मेरे परिवार के १३ सदस्यों ने २८ फरवरी से लोगों के घरों और खेतों में शरण ले रखी थी। जिस झोंपड़ी में हम छिपे थे, ३ मार्च को दोपहर बाद उस पर हमला हुआ। हम अलग-अलग दिशाओं में भागे और खेतों में छिप गए। लेकिन भीड़ ने हम में से कुछ को पकड़ लिया। . . . हमला होने पर मैंने अपने परिवार के लोगों को जान बख्शने के लिए चिल्लाते सुना। मैंने अपने गाँव के दो लोगों गनो बरिया और सुनील को अपनी बेटी शबाना को खींच कर ले जाते देखा। वह उन लोगों से उसे छोड़ देने के लिए चिल्ला रही थी। . . . अपनी इज्जत की भीख माँगती रुकैया, सुहाना, शबाना की आवाजें साफ सुनी जा सकती थीं। मेरा दिमाग भय और उत्तेजना से भर गया था। मैं अपनी बेटी की इज्जत और जान बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकी। . . . मेरी बेटी फूल की मानिंद थी। अभी तो उसे जीवन जीना था। उन्होंने उसके साथ ऐसा क्यों किया? ये कैसे लोग हैं? राक्षसों ने मेरी बेटी के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। कुछ समय के बाद भीड़ कह रही थी, ख्नइनके टुकड़े-टुकड़े कर दो, कोई भी सबूत बचे नहीं।ज् मैंने देखा कि आग लगा दी गई है। . . .ज्ज् (स्रोत ः मदीना मुस्तफा इस्माइल शेख, कल्लोल कैंप, पंचमहल्स, ३० माच २००र्२)
यह सब हमें नहीं भूलना चाहिए ताकि आगे ऐसा न हो। यह सही है कि किसी व्यक्ति या समाज को अतीत का बंदी नहीं होना चाहिए। अतीत का बंदी होकर वर्तमान में नहीं जिया जा सकता। जो जीने की कोशिश करते हैं वे सामान्य नहीं रह पाते और यदि उनके पास सत्ता आ जाए तो मनुष्यताञ्चमानव सभ्यता को क्षतिग्रस्त और विकृत कर सकते हैं। अतीत से प्रेरणा और सबक लेकर वर्तमान में जीते हुए भविष्य में कदम रखना ही सामान्यतः सही माना जाता है। जो मोदी के नेतृत्व में राज्य प्रायोजित नरसंहार को भूलने की बात पिछले दस सालों से कर रहे हैं, उन्हें इस पर विचार कर लेना चाहिए।  
गुजराती गौरव का तिलस्म
मोदी की यह बड़ी कामयाबी है कि उन्होंने नरसंहार के बाद से गुजराती गौरव का एक तिलस्म रचा हुआ है। उस तिलस्म के तहत पूरा गुजरात उनके इशारों पर नाच रहा है। मोदी का रचा यह गुजराती गौरव मोदी का बंधक है। उन्होंने हिंदुत्व के गौरव को गुजराती गौरव बना कर पेश किया है। मोदी ने गुजरातियों के जेहन में उतार दिया है कि मेरे साथ नहीं रहोगे तो हत्या, लूट, बलात्कार करने वाले कहलाओगे। आइए इस परिघटना पर थोड़ी चर्चा करें। 
मोदी ने नरसंहार के दस महीने बाद हुआ विधानसभा चुनाव जीता। ख्नजो आग मेरे सीने में जली है, वही तुम्हारे सीने में भी जली हुई हैज् जैसे जुमलों से मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़काए रख कर और फिर दूसरा और अब तीसरा चुनाव भी जीता। हमारा इस बीच अलग-अलग समय पर तीन-चार बार गुजरात जाना हुआ। जैसा कि देश के दूसरे हिस्सों से जाने वाले सभी का अनुभव है, हमारा भी रहा कि गुजरात में ज्यादातर लोग मोदी के मुस्लिम-मर्दन से अकड़े हुए मिलते हैं। लेकिन मामला उतना भर नहीं है। महज उतना होता तो अकड़ अब तक ढीली पड़ चुकी होती।
गोधरा कांड के बाद से नरोदा पटिया के फैसले तक, एक के बाद एक सबूत मोदी की संलिप्तता और षड़यंत्र के आते रहे हैं। ध्यान देने की जरूरत है कि मोदी ने जितने इंटरव्यू और वक्तव्य इस मामले में दिए हैं, वे सब गुजरातियों को संबोधित हैं। उनके साक्षात्कारों और वक्तव्यों का संदेश है कि वे (मोदी) निर्दोष हैं तो वे गुजराती भी निर्दोष हैं, जिन्होंने हत्या, लूट और बलात्कार में हिस्सा लिया। मोदी में सारे गुजराती और सारे गुजरातियों में मोदी समाहित हैं। ख्नतहलकाज् पत्रिका में बाबू बजरंगियों के मुंह से नरेंद्र मोदी ही बोल रहे थे। यह सही है, जैसा कि मोदी और उनके समर्थक कहते हैं, कि झूठी मुठभेड़  अन्य राज्यों में भी खूब होती हैं। लेकिन गुजरात की झूठी मुठभेड़ों (विशेष संदर्भ शोहराबुद्दीन शेख मामला और इशरत जहां मामला) को अंजाम देने वाले पुलिस अधिकारियों और नेताओं के भीतर मोदी बैठे थे। नरेंद्र मोदी नहीं होते तो बाबू बजरंगी जैसों की हिम्मत नहीं होती कि वे इतनी शान से मनुष्यता के प्रति किए गए अपराध का विज्ञापन करें। न ही डी.जी. वनजारा जैसे पुलिस अधिकारियों और अमित शाह जैसे नेताओं की वह करने की हिम्मत होती जो उन्होंने किया। न ही मायाबेन कोडनानी, जिन्हें २८ फरवरी २००२ को नरोदा पटिया में ९७ मुसलमानों, जिनमें ३६ महिलाएं और ३५ बच्चे थे, की हत्या के लिए १० साल बाद २८ साल की जेल हुई है, राज्य की स्त्री एवं बाल विकास मंत्री बनतीं। 
एक और बात की ओर हम आपका ध्यान दिलाना चाहते हैं कि इस नरसंहार और उसका गौरव मनाने में मोदी और उनके गर्वीले गुजरातियों ने गांधी को भी लात लगाई है। गांधी के चिंतन और कामों में अहिंसा और हिंदू-मुस्लिम एकता केंद्रीय हैं। इन दोनों को तोड़ कर उन्होंने गांधी को अपने साथ गुजराती गौरव में जोड़ लिया है। वही सलूक सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ किया गया है। पटेल ने गांधी की हत्या होने पर आरएसएस पर आरोप और प्रतिबंध लगाया था। मोदी और उनके गर्वीले गुजरातियों ने सरदार को भी अपने में मिला लिया है। इसी अर्थ में उद्योगपति अंबानी ने ख्नवाइब्रेंट गुजरातज् जमावड़े में मोदी को गांधी और पटेल सरीखा बताया है!
समर्थकों को राजनीतिक बचपना देखने लायक है। मोदी बिना सलाह और संवाद के सरकार चलाते हैं। न उनका कोई दोस्त है, न किसी के प्रति उनके मन में आदर है। सांप्रदायिक फासीवाद के साथ तानाशाही, जितनी वे चला सकते हैं, के मिश्रण का नाम नरेंद्र मोदी की हुकूमत है। मोदी को राजनीतिक सहयोगी नहीं, अनुचर चाहिए। वैसे ही प्रशासक। गुजरात के वरिष्ठ नेताओं को उन्होंने नेपथ्य में धकेल दिया है। हरेन पंड्या की हत्या में उनकी पत्नी ने मोदी का हाथ मानते हुए उन्हें उस समय अपने घर से वापस कर दिया था जब वे अफसोस जताने आए थे। वे थोड़ा भी विरोध करने वालों को दुश्मन मानते हैं। मोदी पिछले १० सालों से जिस शैली में गुजरात का शासन चला रहे है, क्या प्रशंसक मानते हैं कि उसमें देश भी चलाया जा सकता है?  
मोदी के समर्थक उन्हें माफ कर देने की बात नहीं कहते; न ही मोदी ने कभी वैसी पेशकश की है; समर्थक चाहते हैं मोदी बतौर प्रधानमंत्री देश को गुजरात जैसा खुशहाल और प्रशासन-क्षम बनाने की योग्यता रखते हैं, जो और किसी में नही है। इस बीच एक सवाल सबने पूछा है कि मोदी माफी क्यों नहीं मांग लेते? सभी जानते हैं राजनीति में माफी दिल से नहीं मांगी जाती। वह वोटों के लिए मांगी जाती है। जैसे कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने १९८४ के नरसंहार के २५ साल बाद सिखों से मांगी। इस नसीहत के साथ कि उस नरसंहार की घटना को भूल जाना चाहिए। इस तरह की माफी से न पीड़ाएं कम होती हैं, न आगे कट्टरता पर रोक लगती है। राजनीति में माफी कई बार समय की नदी के बह कर समुद्र में गिर जाने के बाद मांगी जाती है। जैसे कि पिछले दिनों इंग्लैंड की महारानी ने जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए भारत से माफी मांगी। पछतावा, प्रायश्चित, माफी का जीवन में बड़ा अहम स्थान होता है, जो मनुष्य के जीवन को सुधारता और निखारता है; कई बार उसे उदात्त बना देता है। लेकिन राजनीति में यह सब और नीचे गिरने का खेल होता है। मोदी माफी मांग भी लेते तो उसका कम से कम पीड़ितों के लिए कोई महत्व नहीं होना था।
मोदी का माफी नहीं मांगना उनकी गुजराती गौरव की राजनीति से जुड़ा हुआ है। माफी मांगते ही उनका तार गुजराती गौरव से कट जाता। अभी उन्हें वह तार जोड़े रखना है। जब तक दिल्ली न पहुंच जाएं। तीसरा चुनाव जीतने पर उन्होंने जो उड़ती-सी माफी मांगी है, वह मुसलमानों से नहीं है। उन्होंने कहा है, ख्नख्नकिसी वक्त मैंने किसी को दुख पहुंचाया हो या कोई गलती की हो, उसके लिए मैं ६ करोड़ गुजरातियों से माफी मांगता हूं।ज्ज् अगर मामला एकाध का दिल दुखाने या गलती करने का है तो ६ करोड़ से माफी क्यों? जाहिर है, उन्हें गुजराती गौरव की ज्वाला को जलाए रखना है। हालांकि १० साल के लंबी अवधि के बाद यह भी हो सकता है कि खुद मोदी उस गुजराती गौरव के बंधक बन जाएं जिसे उन्होंने अपना बंधक बनाया हुआ है। देश का प्रधानमंत्री पद तो छोड़िए, गुजरात के बाहर कोई उन्हें पूछे ही नहीं। हो यह भी सकता है कि खुद उनकी पार्टी उन्हें गुजराती गौरव के बंधन में तब तक कैद रखे जब तक वे उसी में छटपटा कर शेष नहीं हो जाते! 
गुजराती गौरव के तिलस्म को थोड़ा और खोला जा सकता है। मोदी और उनके समर्थक यह संकेत देते हैं कि मोदी और वे चाहते तो एक भी मुसलमान नहीं बचता? मोदी ने ख्ननई दुनियाज् को दिए इंटरव्यू में हिंदुओं को अपना गुस्सा निकाल लेने देने के अधिकारियों को दिए संदेश को झूठ बताते हुए कहा कि यह सोचो कितने मुसलमान बचा लिए गए। अगर योजनाबद्ध तरीके से मारा जाता तो आज कौन बचा होता? यह पूछा जाने पर कि क्या भारत, पाकिस्तान और बंगला देश को एक हो जाना चाहिए तो मोदी ने कहा है कि तुम लोगों के मुंह में पानी आ रहा है कि तीनों देशों के मुसलमान मिल कर भारत में तनाव पैदा करें।
भारत में कई धर्मों के लोग रहते हैं। लेकिन वे नागरिक भी हैं; बल्कि राजनेता के लिए पहले नागरिक हैं, यह सोच ही मोदी की नहीं है। लेकिन समर्थक हैं कि उन्हें अपरिहार्य रूप से देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं। जाहिर है, वे आर्थिक रूप से ख्नाक्तिशाली मध्यवर्ग, जो पिछले करीब तीन दशकों में फला-फूला है, को ही देश मानते हैं। मध्यवर्ग को और ख्नाक्तिशाली बनाते जाने के लिए उन्हें मोदी चाहिए। मध्यवर्ग फैलेगा और ख्नाक्तिशाली बनेगा तो आबादी के किसी न किसी समूह का सफाया होगा। रेड इंडियनों से लेकर यहूदियों के सफाए तक की नजीरें इस आधुनिक सभ्यता के पास हैं। मनमोहन सिंह नवउदारवाद में तो अडिग हैं, लेकिन अभी तक अढ़ाई-तीन लाख किसानों की ही आत्महत्याएं करवा पाए हैं। इस तरह से तो जगह खाली होने में बड़ा समय लगेगा। एक झटके में काम तमाम होना चाहिए। मोदी आएंगे तो मुसलमानों का काम तमाम करेंगे! 
भारत का मध्यवर्ग समृद्ध और साक्षर तो हो गया है, उसका छिछोरापन नहीं जाता। खास कर महिलाओं पर, जो कुछ स्वतंत्र और सजीली होती हैं, हल्की टिप्पणियां करना ज्यादातर की आदत में ख्नाुमार है। मोदी ने हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान मंडी में ख्नाशि थरूर की पत्नी के बारे में अशोभनीय टिप्पणी की। कोई संदर्भ भी नहीं था। लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनाने वालों को उसमें कुछ भी गलत नहीं लगता। भारत में यह सामान्य प्रवृत्ति है कि जो गरीब और पिछड़ी पृष्ठभूमि से आते हैं, अंग्रेजीदां लोगों से चिढ़ते हैं। अगर किसी की पत्नी भी अंग्रेजीदां हो तो उस पर पहले भड़ास निकालते हैं। मंडी के अपने भाषण में मोदी ने वही किया।
ऐसे लोगों की दशा बड़ी खराब होती है - चिढ़ेंगे भी और पिछलग्गू भी बनेंगे। अभी मोदी मुख्यमंत्री हैं और उन पर गुजराती गौरव का नशा है। वे उद्योगपतियों द्वारा की जाने वाली प्रशंसा की बौछार का मजा ले रहे हैं। उद्योगपति जानते हैं मोदी को उनका हुक्म बजाना ही है। वे जब तक उनका हुक्म बजाएंगे, यानी सत्ता में रहेंगे, तब तक उद्योगपति उनकी तारीफ करेंगे। जिस दिन सत्ता से बाहर हो जाएंगे, पहचानेंगे भी नहीं।    
मोदी पर दोषारोपणों में अतियां और राजीनति हो सकती है; उन्हें लगाने वालों की अपनी साख नहीं हो सकती है - वे चाहे कांग्रेसी हों, क्षेत्रीय क्षत्रप हों, या एनजीओ वाले; लेकिन मोदी के समर्थकों की मुहिम पूरी तरह तथ्यों से आंख चुरा कर प्रत्यारोप लगाने और गुमराह करने वाली है। यह सही है कि एनजीओ वालों के धन के स्रोत संदिग्ध और विवादास्पद होते हैं। लेकिन मोदी समर्थकों का उन्हें कटघरे में खड़ा करने का मुंह नहीं है। जब आपको नवउदारवाद मंजूर है तो एनजीओ उस व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। मोदी के समर्थकों से समाजवाद के समर्थन की उम्मीद नहीं की जा सकती; लेकिन क्या मोदी की अंधभक्ति करते हुए वे संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की परवाह करते हैं? यह भी छोड़िए, क्या वे न्यूनतम नागरिक मूल्यों और तकाजों में यकीन करते हैं? अगर करते हैं तो मोदी के प्रशंसक कैसे हो सकते हैं? हत्याओं और षड़यंत्रों के बल पर कुछ समय के लिए एक राज्य की सरकार चलाई जा सकती है, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय में कोरा षड़यंत्र नहीं चल सकता। उद्योगपति और नौकरशाह ही सबसे पहले ऐतराज उठा देंगे। केवल फायदा पहुंचा कर सबको खुश नहीं रखा जा सकता, क्योंकि फायदा सबको नहीं पहुंचाया जा सकता। हैरत और अफसोस होता है कि जो शख्स अपने नागरिकों को बांट कर देखता है, उसे देश की बागडोर देने के लिए लोगों ने घोड़े खोले हुए हैं।
मोदी के प्रशंसकों का उत्साह देखने लायक है, जो आगे भी बना रहना है। इसके निश्चित कारण हैं। आधारभूत कारण तो यही है कि आगे गांधी के नहीं, मनमोहन-मोदी के सपनों का भारत बनना है, जिसकी दिशा पिछले करीब तीन दशकों में निर्णायक रूप से तय हो चुकी है। मोदी के युवा प्रशंसक इसी नवउदारवादी दौर की उपज हैं। मुख्यधारा और सोशल मीडिया दोनों उनके हाथ में हैं। इसके चलते उस विशाल युवा शक्ति का वजूद और आवाज प्रभावी नहीं हो सकते, जिसका इस दौरान बड़े पैमाने पर बाह्यीकरण (एक्सक्लूजन) हुआ है। इस युवा शक्ति की कोई राजनीतिक पार्टी देश में नहीं है। जैसे उनका श्रम सस्ते में खरीदा जाता है, वैसे ही वोट भी ले लिया जाता है। उनके ऊपर प्रशंसकों द्वारा मोदी थोप दिया जाना है। दूसरा महत्वपूर्ण और प्रकट कारण है - देश में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की राजनीति का पराभव। इसके चलते देश की राजनीति के केंद्र में भारतीय संविधान के निर्देश न रह कर, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आदेश आ गए है। तीसरा तात्कालिक कारण पिछले दो साल में हुआ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन है, जो भ्रष्टाचार का तो कुछ नहीं कर पाया, उसके सूरमाओं ने मोदी की ख्नजयगाथाज् को आसमान पर पहुंचा दिया है। (इसके विस्तृत अध्ययन के लिए हमारी जल्दी प्रकाशित होने वाली पुस्तक ख्नभ्रष्टाचार विरोध ः विभ्रम और यथार्थज् देखी जा सकती है जिसमें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर समानांतर रूप से लिखे गए हमारे करीब एक दर्जन लेख संकलित हैं।) अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, किरण बेदी, चेतन भगत, अरविंद केजरीवाल जैसे एनजीओ और धर्म का धंधा करने वालों ने युवाओं को सपना दिखाया है कि वे उन्हें भ्रष्टाचार रहित नवउदारवादी भारत बना कर देंगे। इस गारंटी के साथ कि उसमें हिंदू, अगड़ा और पुरुष वर्चस्व कायम रहेगा।
चैथा कारण तीसरे से जुड़ा है। जबकि जरूरत मोदीञ्चसांप्रदायिकता के एकजुट और निर्णायक विरोध की है, कई माक्र्सवादी-समाजवादी-गांधीवादी नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार और जनांदोलनकारी अपने इन नए नेताओं को मोदीञ्चसांप्रदायिकता विरोधी बनाने के फेर में न घर के रहे हैं, न घाट के। उनमें कुछ ख्नभ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की राखज् से पैदा होने वाली राजनीतिक पार्टी में शामिल हो गए हैं और नवउदारवाद के प्रतिरोध की धारा और ताकत को तोड़ने में लगे हैं। उनकी ख्ननई राजनीतिज् पूंजीवाद के नए रूप नवउदारवाद, जिसे कारपोरेट पूंजीवाद व नवसाम्राजयवाद भी कहा जाता है, की मुख्यधारा में जगह बनाने की कवायद है। जाहिर है, उसके विचारधारात्मक और आर्थिक स्रोत नवउदारवाद में निहित हैं। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि केजरीवाल के कुछ लोग कट-पेस्ट करके उसे ख्ननया समाजवादज् बताने लगें। कट-पेस्ट कला के माहिर ऐसे लोग कांग्रेस और राहुल गांधी को भी कभी वामपंथी, कभी समाजवादी, कभी गांधीवादी आदि बताने लगते हैं। ख्ननई राजनीतिज् की नई दुकान नहीं चलने पर उनकी घर वापसी हो सकती है। लेकिन उससे मोदी के प्रशंसकों का उत्साह कम होने नहीं जा रहा है।        
विकास की मरीचिका
मोदी की पीआर टीम ने उनकी प्रशंसा और समर्थन का सर्वप्रमुख आधार उनके द्वारा किए गए गुजरात के विकास को बनाया है। २००८ में नैनो कार के निर्माण के लिए टाटा कंपनी को गुजरात बुलाने की सफलता को विकास के उद्यम में उनकी सबसे बड़ी जीत बताया जाता है। जाहिर है, अमीरों के विकास की जो मुहिम नवउदारवाद के तहत चल रही है, मोदी उसमें मनमोहन सिंह के महत्वपूर्ण साथी हैं। सभी जानते हैं कि गुजरात मोदी को वहां मुख्यमंत्री बनाए जाने के पहले से उद्योग और व्यापार में कुछ अन्य राज्यों के साथ आगे रहा है। पता चलता है कि मोदी के समय में गुजरात की विकास दर अधिकतम १२ प्रतिशत हुई है, जबकि १९९२-९३ में वह १६.७५ प्रतिशत थी। नवउदारवादी दौर में कारपोरेट घरानों को लूट की खुली छूट देकर उच्च और मध्यवर्ग को और अमीर बनाया जाता है। ऐसे में किसानों, आदिवासियों, दलितों, मजदूरों, कारीगरों, लघु उद्यमियों, दुकानदारों और उनके बेटे-बेटियों को कीमत चुकानी ही पड़ती है, जो गुजरात में भी चुकाई जा रही है। ऊंची विकास दर कुपोषण, अशिक्षा और बेरोजगारी कम नहीं करती। गुजरात में भी वही स्थिति है।
महिलाओं में कुपोषण पर मोदी महिलाओं द्वारा ख्नडाइट्रिगज् की बात करके हवा में उड़ाने की कोशिश करते हैं, लेकिन क्या गुजरात में कुपोषित बच्चे भी डाइटिंग करते हैं! २०११ की मानव विकास रपट में बताया गया है कि गुजरात में भूख और कुपोषण की समस्या देश के अन्य बड़े राज्यों से ज्यादा है। गुजरात में लगभग ४५ प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। उत्तर प्रदेश से ज्यादा बच्चे गुजरात में भूखे पेट सोते हैं। मोदी के शासन काल में शिशु और मां की मृत्यु दर अन्य राज्यों से ज्यादा है। गुजरात में लाइफ एक्सपेक्टेंसी राष्ट्रीय औसत (६६ साल) से दो साल कम है। मोदी के २००१ में गुजरात का शासन सम्हालते वक्त साक्षरता में गुजरात का सत्रहवां स्थान था, जो अब अठारहवां हो गया है।
मोदी के शासन में मुसलमानों के विकास का तर्क भी दिया जाता है। मुसलमानों के लिए केंद्र की १५ योजनाओं को लागू करने से मोदी ने यह कह कर इनकार कर दिया कि इससे राष्ट्र के सामाजिक तानेबाने में तनाव पैदा होगा। केंद्र की मुसलमान छात्रों के लिए निर्धारित ५३ हजार छात्रवृत्तियों को भी मोदी ने लागू करने से इनकार कर दिया। भूख, गरीबी, शिक्षा, रोजगार के पैरामीटर पर सुरक्षा के मामले में विकास दर का लाभ मुसलमानों को नहीं मिला है। सच्चर कमेटी की रपट में बताया गया है कि गुजरात में मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति राष्ट्रीय औसत से पिछड़ी है। गुजरात में शहरी गरीबी का अनुपात राष्ट्रीय अनुपात लगभग २१ प्रतिशत के मुकाबले १८ प्रतिशत है, लेकिन उनमें (शहरी गरीबों में) मुसलमान ४२.४ प्रतिशत हैं। राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत ३९.९ प्रतिशत है।  
हाल में हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में कई लेखों और रपटों में आंकड़ों और तथ्यों के साथ बताया गया कि गुजरात का विकास एक मिथक है जिसे मोदी और उनकी पीआर टीम ने सुनियोजित ढंग से खड़ा किया है। इस ख्नमिथकज् को आगे रख कर उन्होंने मोदी के समर्थन की मुहिम चलाई हुई है। मोदी के प्रशंसक जानकर यह सब कर रहे हैं। उनका संविधान से तो वास्ता है ही नहीं, भविष्य से भी वास्ता नहीं है। वे विकसित भारत देखना चाहते हैं और उसे सांप्रदायिकता के साथ पाने में कोई बुराई नहीं देखते। उनके अवचेतन में यह इच्छा पल रही हो सकती है कि जब विकास संभव नहीं हो पाएगा तो सफाया होगा। आत्महत्याएं कारगर रास्ता नहीं हैं; मुसलमानों को साफ करने से वह हो सकता है। सच्चर कमेटी ने बता ही दिया है कि कि मुसलमान दलितों से भी पिछड़े हैं। जिस तरह की घृणा गुजरात में हिंदुत्व की प्रयोगशाला में ढल कर आई है, उसे मोदी पूरे भारत पर लागू करेंगे!
दरअसल, भारत में विकास एक मरीचिका बना हुआ है जो हाथ नहीं आती, लेकिन जिसे पाने की लालसा में सबसे गरीब से लेकर सबसे अमीर तक दिन-रात जुटा रहता है। मोदी ने पिछले दिनों गुजरात में देश-विदेश के पूंजीपतियों का जमावड़ा किया। निवेशकों ने मोदी पर प्रशंसा की बौछार की। मोदी और मीडिया ने जमावड़े को इस तरह प्रोजेक्ट किया मानो उन्हें मिला जनादेश पूंजीपतियों को जुटाने और उनकी प्रशंसा पाने के लिए था। जमावड़े का संदेश भी साफ तौर पर प्रसारित किया गया कि पूंजीपतियों को ही जनता की सेवा करनी है; जो नेता जितने पूंजीपति जुटा सकता है, वह उतना ही बड़ा जनता का सेवक है। कांग्रेस ने इस ख्नचुनौतीज् को तुरंत स्वीकारा और हिटलर का हवाला देकर कोपोरेट जगत को दक्षिणपंथियों के साथ ख्नफ्लर्टज् नहीं करने की सलाह दी। कांग्रेस ने तुलना का आदर्श विदेशी निवेश ही रखा है और बताया है कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक निवेश के मामले में गुजरात से आगे हैं।
अगर होड़ का पैमाना विदेशी निवेश है तो कल गुजरात आगे निकल सकता है। क्योंकि मोदी को पूंजीवादी विकास के स्वरूप और रास्ते में जरा भी संदेह नहीं है। बाकी पिछड़े नेता कहीं न कहीं हिचक जाते हैं। सोशल इंजीनियरी का यह नया सोपान है कि गरीब और पिछड़ी पृष्ठभूमि का नेता नवउदारवाद की पूरमपूर वकालत कर रहा है। इसमें केवल उसकी आरएसएस की ट्रेनिंग का ही योगदान नहीं है, पिछले तीन दशकों से जारी नवउदारवाद के पुरोधाओं की भी भूमिका है। वणिक पूंजीवाद की जगह कारपोरेट पूंजीवाद का पाठ उसे राजीव गांधियों-मनमोहन सिंहों और नवउदारवाद के अंधसमर्थक बुद्धिजीवियों ने पढ़ाया है। ख्नविकास पुरुषज् नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह के शुरू से प्रिय रहे हैं।
इस बार के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने अपने भाषण में गुजरात में अल्पसख्यकों को पूरी तरह सुरक्षित बताया। इस शख्स का दिमाग कैसे चलता है, इस पर शोध की जरूरत है। क्या वे कहना चाहते हैं कि २००२ का गुजरात, जो मोदी को मिला था, अविकसित था इसीलिए इतने मुसलमान मारे गए? क्या उनका आशय है कि अब, जबकि गुजरात नवउदारवादी रास्ते पर विकसित हो चुका है, नरसंहार या दंगे नहीं होंगे? क्या वे यह विश्वास व्यक्त कर रहे हैं कि २००२ में मुसलमानों की हत्या और लूटपाट करने वाला अब ख्नमोटाज् हो चुका मध्यवर्ग वैसा नहीं करेगा? क्या मनमोहन सिंह कहना चाहते हैं कि मारे गए मुसलमान विकास की कीमत हैं; जैसे कि किसानों की आत्महत्याएं और अपने जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए लड़ने वालों की पुलिस फायरिंग में मौतें विकास की कीमत हैं? प्रधानमंत्री के इस बयान का हवाला हमने यह कहने के लिए दिया है कि मनमोहन सिंह और मोदी एक ही हैं।    
दलित भी नरेंद्र मोदी के प्रशंसक हो सकते हैं। क्योंकि वे दलित मुसलमानों और ईसाइयों को आरक्षण मिलने का स्वाभाविक और निर्णायक विरोध करेंगे तथा निजी क्षेत्र में दलितों के आरक्षण का समर्थन। गुजरात नरसंहार के बाद वहां १० महीने बाद हुए विधानसभा चुनावों में अकेले मायावती ने मोदी के समर्थन में चुनाव प्रचार करने की ख्नहिम्मतज् दिखाई थी। गुजरात में वे बसपा का ज्यादा प्रचार-प्रसार करती भी नहीं दिखतीं। मोदी बाकी नेताओं की तरह कारपोरेट घरानों को गुजरात सौंपने का आतुर हैं; आर्थिक रूप से मजबूत मध्यवर्ग को और मजबूत बनाते जाने का उनका भी संकल्प है; इस प्रक्रिया में तबाह होने को अभिशप्त दलितों-आदिवासियों को उन्होंने हिंदुत्व का ख्नसुरापानज् करा दिया है; वे भी कहते हैं ख्नमेरे पास मोदी हैज्। पिछड़े नेताओं में यह काम केवल उन्होंने किया है। मायावती को हिंदुत्ववादी राजनीति में शुरू से ही अपना सुनहरा भविष्य दिखाई देता है। वे वाकई दूरदृष्टि वाली नेता है! 
मोदी के प्रशसंक कोई तर्क सुनने को तैयार नहीं हैं। संविधान और उसमें निहित समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का तो कतई नहीं। वे इस ख्नसच्चाईज् में पूरे पगे हैं कि देश संविधान से नहीं, बाजार से चलता है। पहले ही काफी देर हो चुकी है, अब भारत को बाजार का कहार बनने में जरा भी देरी नहीं करनी चाहिए। सांप्रदायिकता का उसमें रोल है, यह उन्होंने स्वीकार किया है। इसीलिए उन्हें मनमोहन के बाद या साथ मोदी चाहिए। हमारा आग्रह है कि मोदी के प्रशंसकों को थोड़ी हिम्मत और दिखानी चाहिए - संविधान को नकारने की। मनमोहन सिंह ने एक बार फिर हाल में कहा कि ख्नसमाजवादज् जैसी पुरानी विचारधारा की बात करना बेमानी है। कारपोरेट पूंजीवाद में निश्चित ही मनमोहन सिंह की विशेषज्ञता सबसे ज्यादा है। मोदी उनके प्रिय हैं, लेकिन उनके सामने बच्चे हैं। मोदी की विशेषज्ञता सांप्रदायिक फासीवाद में है। प्रशंसकों को यह दबाव बनाना चाहिए कि मनमोहन सिंह यानी कांग्रेस और मोदी यानी भाजपा मिल कर प्रस्ताव लाएं कि संविधान की प्रस्तावना में पूंजीवाद कायम करने का लक्ष्य लिखा जाए और उसकी प्राप्ति में  कारपोरेट घरानों का अहम जिम्मा तय किया जाए। वह लक्ष्य सांप्रदायकिता, जातिवाद, क्षेत्रवाद-भाषावाद या इन सभी को मिल कर हासिल करने में कोई संवैधानिक अड़चन नहीं हो। मोदी के प्रशंसक दोगलेपन से काम न लें। जो चाहते हैं, उसे उसी रूप में कहें। तब उनसे कोई जिरह नहीं करेगा।
मोदी से नहीं लड़ पाने के दो कारण स्पष्ट हैं। भाजपा से इतर राजनीतिक नेताओं और पार्टियों का मुसलमानों को वोट बैंक मानना और पूरी मुख्यधारा राजनीति का पूंजीवादपरस्त होना। अगर भारत में सांप्रदायिक फासीवाद रोकना है तो नवउदारवाद रोकना होगा। इसके लिए नेताओं में संवैधानिक और सैद्धांतिक प्रतिबद्धता चाहिए। सामान्य प्रवृत्तियां, मसलन, संप्रदायवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद, उदारवाद आदि व्यक्तियों और संगठनों का औसत रूप होती हैं। धर्मनिरपेक्षतावादियों की अगर व्यक्ति अथवा संगठन के रूप में भूमिका अल्पकालिक सोच और लक्ष्य से परिचालित होगी तो दीर्घकालिक फायदा नहीं हासिल किया जा सकता। नेताओं से लेकर बुद्धिजीवियों, जनांदोलनकारियों, नागरिक समाज एक्टिविस्टों तक अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं, जो अल्पकालिक सोच और लक्ष्य से परिचालित हैं। धर्मनिरपेक्षता के ज्यादातर फुलटाइमर एनजीओ वाले तो होते ही हैं, वे कांग्रेस की गोद में भी बैठे होते हैं। अन्ना हजारे की प्रशंसा पर नरेंद्र मोदी ने उन्हें चेताया था कि उन्हें बदनाम करने वाले लोग उन्हें (अन्ना को) गुमराह करने की कोशिश करेंगे। अन्ना हजारे ने गुजरात कांड पर न उस समय, न वर्तमान में कभी टिप्पणी की। उनकी प्रशंसा ने बता दिया कि वे उस समय भी मोदी के साथ थे और आज भी हैं। उनके  सहयात्री बाबा रामदेव गुजरात जाकर मोदी की प्रशंसा करके आए हैं। हमने इन महानुभावों का जिक्र इसलिए नहीं किया है कि हमें उनसे धर्मनिरेपक्षता के लिए कोई उम्मीद है। जिक्र इसलिए किया है कि अरविंद केजरीवाल की बिसात पर धर्मनिरपेक्षता के बड़े-बड़े दावेदार इन दोनों की छत्रछाया में ख्नक्रांतिज् कर चुके हैं। 
आप कहेंगे कि मोदी पर चर्चा है और आरएसएस पर चोट बहुत कम हो रही है। धर्म की उदार धारा को भी सांप्रदायिकता का पोषण करने वाली मानने वाले ख्नवैज्ञानिकज् धर्मनिरपेक्षतावादियों को यह बहुत नाइंसाफी लगेगी। आइए थोड़ी संघ की बात करें। जैसा कि हर संगठन में होता है, संघ की भी अपनी अंदरूनी राजनीति होती है। उसकी राजनीतिक भुजा भाजपा में यह आंतरिक राजनीती ज्यादा होती है। दावेदारी अगर प्रधानमंत्री पद की हो तो अंतर्कलह होना स्वाभाविक है। नरेंद्र मोदी के विरोधी उनके ख्नउत्थानज् से परेशान रहते हैं और भरसक उसे अनुशासित करने की कोशिश करते हैं। प्रशंसकों की नजर में मोदी भले ही विश्व स्तरीय नेता बन चुके हों, भाजपा हाईकमान की नजर में वे राष्ट्रीय नेता नहीं हैं। अगर क्षेत्रीय क्षत्रप राष्ट्रीय बनने का मंसूबा पालेंगे तो राष्ट्रीय नेता कहां जाएंगे? कल्याण सिंह के सिर बाबरी मस्जिद गिराने का सेहरा है, लेकिन उसे पहन कर जब वे राष्ट्रीय बनने चले तो क्षेत्र के भी नहीं रहे।    
नवउदारवाद आरएसएस को खूब फला है। वरना हालत यह हो चली थी कि संघी घरों के लड़के-लड़कियां न खुद निक्कर पहनने को तैयार थे, न पिताओं का रोजाना निक्कर पहनना पसंद करते थे। नवउदारवाद ने उसे एक पूरी फसल दी है जो टैक्नोलोजी और प्रबंधन पढ़ती है और उसके अलावा कुछ नहीं जानती। या वह सब जानती है जो मीडिया उसे बताता है। नई शक्ति से भर कर आरएसएस हालातों को तौल रहा है। अगर मोदी के नाम पर एनडीए घटकों की ओर से कुछ विरोध होगा तो अडवाणी को आगे किया जाएगा और अगर मोदी के प्रशंसकों का स्वर बुलंद रहेगा तो वह मोदी पर दांव लगा सकता है। हालांकि यह चिंता आरएसएस को भी होगी (भले वह खुद भाजपा के संगठनात्मक मामलों में अपनी चलाता है) कि नरेंद्र मोदी भाजपा के आंतरिक लोकतंत्र को ध्वस्त कर देंगे। संघ-भाजपा के लिए वह बड़ा और दूरगामी नुकसान होगा।
वैसे तो यह हम किसी न किसी रूप में राजनीति में सक्रिय लोगों का कसूर है कि मोदी का नाम देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए प्रमुखता से चल रहा है, लेकिन कांग्रेस का कसूर सीधे है। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की जिद मोदी को फायदा पहुंचाएगी। इतनी कवायद और खर्च के बावजूद राहुल गांधी देश के युवाओं की पसंद नहीं है। जिनकी पसंद हैं, वे चाटुकार और भाड़े के हैं। वे गडकरी की टक्कर के भी नहीं हैं। कांग्रेसियों को मलाई चाभने के लिए राहुल गांधी पसंद हैं, लेकिन देश के सामने वैसी कोई मजबूरी नहीं है। बेहतर होगा कि सोनिया उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बना दें और प्रधानमंत्री के लिए किसी अन्य नेता को आगे करें। प्रणब मुखर्जी को रायसीना हिल भेज कर सोनिया गांधी ने मोदी के लिए मैदान खाली छोड़ दिया है।
ऐसे में, जबकि देश में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति गतिरोध का शिकार ही नहीं है, थकी हुई भी है, क्या आरएसएस से ही गुहार लगाई जाए कि वह सांप्रदायिकता की मोदी की कट्टर लाइन को रोक कर सांप्रदायिकता की वाजपेयी वाली उदार लाइन को आगे बढ़ाए? वह वाजपेयी से ज्यादा उदार चेहरे का निर्माण करे, जैसा कि पिछले दिनों अडवाणी ने अपने को दिखाने की कोशिश की थी? संघ की कट्टर कोख से निकल कर आया मोदी संघ की पहली पसंद बनता है तो उससे राष्ट्र और समाज का बहुत बुरा होगा। 
मोदी के प्रशंसक जितना भी कामयाब हों, अनेक भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्य और धर्म की उदार धारा को आगे रखकर सांप्रदायिकता को संविधान पर भारी न पड़ने देने का संघर्ष जारी रखेंगे।     

२६ जनवरी २०१३