Sunday, February 8, 2015

प्रतिक्रांति के हमसफर- प्रेम सिंह



 (नरेन्द्र मोदी और आरएसएस के जिस तिलस्म को तोड़ने के लिए केजरीवाल को खड़ा किया जा रहा है। ज्यादातर को नहीं पता है कि हम अपने आस पास दूसरा तिलस्म तैयार कर रहे हैं । ये तिकड़म वास्तव में कारपोरेट पूंजीवाद का तिलस्म है। मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल का समर्थन करके उस तिलस्म को दीर्घजीवी बना दिया है। )
 


‘‘इस वक्त समूची दुनिया में जो हो रहा है, वह शायद विश्‍व इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिक्रांति है। यह संगठित है, विश्‍वव्‍यापी है और समाज तथा जीवन के हर पहलू को बदल देने वाली है। यहां तक कि प्रकृति और प्राणिजगत को प्रभावित करने वाली है। इक्कीसवीं सदी के बाद भी अगर मानव समाज और सभ्यता की चेतना बची रहेगी, तो आज के समय के बारे में इसी तरह का जिक्र इतिहास की पुस्तकों में होगा। डंकेल संधि की तारीख इस प्रतिक्रांति की शुरुआत की तारीख मानी जा सकती है।’’
 ‘‘प्रतिक्रांति का मतलब पतन या क्षय नहीं है। पतन या क्षय वहां होता है, जहां परिवक्वता आ चुकी है या चोटी तक पहुंचा जा चुका है। सोवियत रूस का पतन हो गया; या हम कह सकते हैं कि आधुनिक सभ्यता का क्षय एक अरसे से शुरू  गया है। इससे भिन्न प्रतिक्रांति का रूप क्रांति जैसा ही होता है, सिर्फ उसका उद्देश्‍य उलटा होता है। यह भी संगठित होता है और एक विचारधारा से लैस रहता है और कई मूल्यों और आधारों को उखाड़ फेंकने का काम करता है। इसकी विचारधारा ही ऐसी होती है कि इसका आंदोलन अति संगठित छोटे समूहों के द्वारा चलाया गया अभियान होता है।’’ (‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’, किशन पटनायक, राजकमल प्रकाशन, पृ. 172) 
 किशन जी का यह कथन फरवरी 1994 का है। तब से दुनिया और भारत में प्रतिक्रांति का पथ उत्तरोत्तर प्रशस्त होता गया है। राजनीति में पिछले तीन-चार सालों में बनी नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की केंद्रीयता से प्रतिक्रांति की विचारधारा काफी मजबूत स्थिति में पहुंच गई है। गौरतलब है कि दोनों ने लगभग समान प्रचार शैली अपनाकर यह हैसियत हासिल की है जिसमें मीडिया और धन की अकूत ताकत झोंकी गई है। बहुत-से मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने अरविंद केजरीवाल का साथ देकर या दिल्ली विधानसभा चुनाव में बिना मांगे समर्थन करके इस प्रतिक्रांति को राजनीतिक स्वीकार्यता प्रदान कर दी है। दिल्ली में आपकी सरकार बनती है या भाजपा की, इससे इस सच्चाई पर फर्क पड़ने नहीं जा रहा है कि भारत की मुख्यधारा राजनीति में प्रतिक्रांति का सच्चा प्रतिपक्ष नहीं बचा है।
केजरीवाल की राजनीति के समर्थक खुद को यह तसल्ली और दूसरों को यह वास्ता देते रहे हैं कि जल्दी ही केजरीवाल को (अपने पक्ष में) ढब कर लिया जाएगा। हुआ उल्टा है। केजरीवाल ने सबको (अपने पक्ष में) ढब कर लिया है। सुना है किरण बेदी के छोटे गांधीकामरेडों के लेनिन हैं! प्रकाश करात ने कहा बताते हैं कि केजरीवाल का विरोध करने वाले मार्क्‍स को नहीं समझते हैं। प्रतिक्रांति इस कदर सिर चढ़ कर बोल रही है कि मार्क्‍स को भी उसके समर्थन में घसीट लिया गया है। यह परिघटना भारत की प्रगतिशील राजनीति की थकान और विभ्रम को दर्शाती है।
ऊपर दिए गए किशन जी के दो अनुच्छेदों के बीच का अनुच्छेद इस प्रकार है, ‘‘समूची बीसवीं सदी में क्रांति की चर्चा होती रही। क्रांति का एक विशिष्‍ट अर्थ आम जनता तक पहुंच गया था; क्रांति का मतलब संगठित आंदोलन द्वारा उग्र परिवर्तन, जिससे समाज आगे बढ़ेगा और साधारण आदमी का जीवन बेहतर होगा; आखिरी आदमी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। साधारण आदमी का केंद्रीय महत्व और आखिरी आदमी का अधिकार बीसवीं सदी की राजनीति और अर्थनीति पर जितना हावी हुआ, वैसा कभी नहीं हुआ था।’’
यह लिखते वक्त किशन जी को अंदेशा भी नहीं रहा होगा कि एनजीओ सरगनाओं का गिरोह करोड़पतियों को भी आम आदमी बना देगा; उनकी समृद्धी बढ़ाने के लिए गरीबों का वोट खींच लेगा; और समाजवादी क्रांति का दावा करने वाले नेता व बुद्धिजीवी उसके समर्थन में सन्नद्ध हो जाएंगे! किशन जी ने अपने उसी लेख में यह कहा है कि ‘‘1980 के दशक में हिंदुत्व के आवरण में एक प्रतिक्रांति का अध्याय शुरू हुआ है देश की राजनैतिक संस्कृति को बदलने के लिए। इस वक्त विश्‍व-स्तर पर जो प्रतिक्रांति की लहर प्रवाहित है, उससे इसका मेल है; ....’’ हम जानते हैं पूंजीवादी प्रतिक्रांति के पेटे में चलने वाली सांप्रदायिक प्रतिक्रांति के तहत 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस कर दिया गया।
किशन जी ने डंकेल समझौते के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति के मुकाबले में वैकल्पिक राजनीति की विचारधारा और संघर्ष खड़ा किया था। साथ ही न्होंने विस्तार से धर्मनिरपेक्षता का घोषणापत्र लिखा। उनके साथ शामिल रहे ज्यादातर लोग आज प्रतिक्रांति के साथ हैं। जाहिर है, वे किशन जी के जीवन काल में उन्हें धोखा देते रहे और उनके बाद उनके जीवन भर के राजनीि‍तक उद्यम को नष्ट करने में लगे हैं।
ऐसे में ज्यादा कुछ कहने-सुनने को नहीं बचा है; कुछ बिंदु अलबत्ता देखे जा सकते हैं
(1) मोदी का तिलस्म, जिसे तोड़ने के लिए केजरीवाल को अनालोचित समर्थन दिया गया है, वास्तव में कारपोरेट पूंजीवाद का तिलस्म है। मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल का समर्थन करके उस तिलस्म को दीर्घजीवी बना दिया है।
(2) केजरीवाल की जीत में धर्मनिरपेक्षता की जीत नहीं है, जैसा कि अति वामपंथियों से लेकर तरह-तरह के राजनीतिक निरक्षर जता रहे हैं। मुसलमानों के भय की भित्ति पर जमाई गई धर्मनिरपेक्षता न जाने कितनी बार भहरा कर गिर चुकी है। भारत की धर्मनिरपेक्षता मोदी की जीत के पहले कई बार हार का मुंह देख चुकी है। भारत का विभाजन, गांधी की हत्या, आजादी के बाद अनेक दंगे, 1984 में सिख नागरिकों का कत्लेआम, 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस, 2002 का गुजरात कांड - धर्मनिरपेक्षता की हार के अमिट निशान हैं।
(3) धर्मनिरपेक्षता के दावेदार यह सब जानते हैं। लिहाजा, केजरीवाल के समर्थन के पीछे के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। इनमें से बहुत-से लोग मोदी के हाथों मिली करारी षिकस्त को पचा नहीं पाए हैं। उनका दृढ़ विश्‍वास था कि मोदी जैसा शख्स भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। उनका विश्‍वास टूटा है। खीज मिटाने के लिए वे किसी को भी मोदी को हराता देखना चाहते हैं। केजरीवाल को उनके समर्थन का दूसरा अंतर्निहित कारण घृणा की राजनीति से जुड़ा है। सर्वविदित है कि आरएसएस घृणा की राजनीति करता है। धर्मनिरपेक्षतावादियों में भी संघियों के प्रति तुच्छता से लेकर घृणा तक का भाव रहता है। केजरीवाल की जीत से उनके इस भाव की तुष्टी होती है। तीसरा कारण सरकारी पद-प्रतिष्ठा से जुड़ा है। धर्मनिरपेक्षतावादियों को कांग्रेसी राज में सत्ता की मलाई खाने का चस्का लगा हुआ है। उन्हें पता है कांग्रेस दिल्ली में सत्ता में नहीं आने जा रही है। सीधे भाजपा का न्यौता खाने में उन्हें लाज आती है। दिल्ली राज्य में केजरीवाल की सत्ता होने से विभिन्न निकायों/समितियों में शामिल होने में उन्हें लाज का अनुभव नहीं होगा। हालांकि वे एक भूल करते हैं कि एनजीओ वाले राजनीति में आए हैं तो उनके अपने साथी-सगोती निकायों/समितियों में आएंगे। लिहाजा, धर्मनिरपेक्षतावादियों के लिए यहां कांग्रेस जैसी खुली दावत नहीं होने जा रही है। मोदी को हराने के नाम पर किए गए समर्थन को वे प्रतिक्रांति के समर्थन तक खींच कर लाएंगे। देखना होगा तब साथी क्या पैंतरा लेते हैं?  
(4) केजरीवाल को वोट देने वाले दिल्ली के गरीबों से कोई शिकायत नहीं की जा सकती। मीडिया और बुद्धिजीवियों ने आपके आर्थिक और गरीब विरोधी विचारधारात्मक स्रोतों की जानका उन तक पहुंचने ही नहीं दी। इस मेहनतकश वर्ग को जल्दी ही पता चलेगा कि उनका इस्तेमाल उन्हीं के खिलाफ किया गया है। हालांकि केजरीवाल के दीवाने आदर्शवादीनौजवानों को वैसा नादान नहीं कहा जा सकता। प्रतिभावान कहे जाने वाले इन नौजवानों ने प्रतिक्रांति के पदाति की भूमिका बखूबी निभाई है।
(5) दलित पूंजीवाद के पैरोकार देख लें, शूद्रों समेत ज्यादातर सवर्ण नेता, प्रशासक, विचारक, एनआरआई पूंजीवादी प्रतिक्रांति के साथ जुट गए हैं। पूंजीवाद की दौड़ में बराबरी का मुकाम कभी नहीं आता। 
(6) उस अदृश्‍य एजेंसी का लोहा मानना पड़ेगा जिसने केजरीवाल का यह चुनाव अभियान तैयार किया और चलाया। जनता का सीएमकैसे बनता है, यह उस एजेंसी ने बखूबी करके दिखाया है। वह जनता का प्रधान सेवकबनाने वाली एजेंसी की टक्कर की ठहरती है।    
अंत में सबक। नई आर्थिक नीतियों के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति का लगातार प्रतिरोध हुआ है। अब, जबकि सारे भ्रम हट गए हैं, क्रांति का संघर्ष निर्णायक जीत की दिशा में तेज होना चाहिए।

Friday, February 6, 2015

दिल्ली विधानसभा चुनाव और हाशिए पर जाती प्रगतिशील राजनीति- डॉ प्रेम सिंह


मार्क्सवादियोंसमाजवादियोंसामाजिक न्यायवादियोंगांधीवादियों और नागरिक समाज के बहुत-से लोगों की अरविंद केजरीवाल की जीत के पक्ष में एकजुटता भारत और दुनिया के कारपोरेट प्रतिष्ठान की बड़ी उपलब्धि है।
 दो फरवरी की शाम को आकाशवाणी से प्रसारित मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का चुनाव प्रसारण सुना। कांग्रेससीपीआईसीपीएम और राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रसारणों में दिल्ली शहर में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिशों का प्रमुखता से जिक्र और सांप्रदायिक ताकतों को चुनाव में परास्त करने की अपील की गई थी। भाजपा और आम आदमी पार्टी (आप) के प्रसारण में बाकी जो भी कहा गया होशहर में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं पर एक शब्द भी नहीं था। आप’ का प्रसारण मनीष सिसोदिया ने हिंदू हित’ का पूरा ध्यान रखते हुए पढ़ा और सरकार बनाने की दावेदारी ठोकी। किसी धर्मनिरपेक्षतावादी ने इस नाजिक्री (ओमिशन) पर सवाल नहीं उठाया है। बल्कि चुनावपूर्व सर्वेक्षणों में आप’ की जीत की प्रबल संभावना को देखकर अपना पूरा वजन आप’ के पक्ष में डाल दिया है। उन्होंने अरविंद केजरीवाल को हिंदुओं की भावनाओं का खयाल रखने की पूरी आजादी दी हुई है। वे जानते हैं चुनाव अकेले मुसलमानों के वोटों से नहीं जीता जा सकता।
हमने चुनाव प्रसारण का यह प्रसंग धर्मनिरपेक्षता-सांप्रदायिकता के सवाल पर चर्चा करने के लिए नहीं लिया है। बल्कि धर्मनिरपेक्षता को बचाने की आड़ में होने वाली एक बड़ी राजनीतिक तब्दीली पर संक्षेप में विचार करने के लिए यह प्रसंग उठाया है। मार्क्सवादियोंसमाजवादियोंसामाजिक न्यायवादियोंगांधीवादियों और नागरिक समाज के बहुत-से लोगों की अरविंद केजरीवाल की जीत के पक्ष में एकजुटता भारत और दुनिया के कारपोरेट प्रतिष्ठान की बड़ी उपलब्धि है।
मनमोहन सिंह के बाद कांग्रेस कारपोरेट प्रतिष्ठान के खास काम की नहीं रह गई है। कांग्रेस राहुल गांधी से चिपकी है और कारपोरेट उन पर मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी जैसा भरोसा नहीं कर सकता। दलितों और आदिवसियों को आर्थिक मुद्दों पर कांग्रेस के साथ जोड़ने के राहुल गांधी के प्रयास कारपेारेट प्रतिष्ठान के रजिस्टर में दर्ज हैं। कारपोरेट प्रतिष्ठान वंचितों के हित की दिखावे की अथवा टोकन राजनीति भी बरदाश्त करने को तैयार नहीं है। अलबत्ता, उनका सांप्रदायीकरण करने की राजनीति उसे माफिक आती है।
कारपोरेट प्रतिष्ठान को अब सोनिया गांधी पर भी भरोसा नहीं हैजो सलाहकारों के दबाव’ में गरीबों के लिए थोड़ी-बहुत राहत की व्यवस्था करवा देती हैं। उसे जैसे मनमोहन सिंह के साथ और उनके बाद मोदी चाहिए थेमोदी के साथ और उनके बाद केजरीवाल चाहिए। कारपोरेट पूंजीवाद की कोख से पैदा एक ऐसा शख्स जो देश की मेहनतकश जनता की आंखों में धूल झोंक कर सफलतापूर्वक कारपोरेट प्रतिष्ठान का हित साधन करे। कारपोरेट प्रतिष्ठान को अब अपने बचाव के लिए सेफ्टी वाल्व नहीं चाहिए। प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष खेमा उसके पक्ष में एकजुट हो गया है।
 कारपोरेट प्रतिष्ठान यह जानता है कि कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षतावादियों को प्रश्रय देकर उनका समर्थन पाया है। इस तरह फलाफूला धर्मनिरपेक्षतावादी खेमा मोदी की जीत से एकाएक समाप्त नहीं हो जा सकता। उन्हें कांग्रेस के अलग किसी और के साथ जोड़ना होगा। वे मजबूती से केजरीवाल के साथ जुट गए हैं। कल तक जो सोनिया के सेकुलर सिपाही थेअब निस्संकोच केजरीवाल के सेकुलर सिपाही हैं। कहने की जरूरत नहीं कि धर्मनिरपेक्षतावादियों का केजरीवाल को बिना शर्त समर्थन दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में ही नहीं है। वे शुरू से केजरीवाल के समर्थन में हैं। हालांकि उन्हें माक्र्सवादी/समाजवादी/गांधीवादी आदि बताने या बनाने की बात अब वे नहीं करते। उन्हें इसी में तसल्ली है कि केजरीवाल क्रोनी पूंजीवाद के खिलाफ है।
यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप’ की जीत से सांप्रदायिक भाजपा पर कितनी रोक लगेगी और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को दूसरे राज्यों के चुनावों में कितना फायदा होगा। लेकिन इतना निश्चित है कि राजनीतिक विमर्श से समाजवादी विचारधारा और ज्यादा हाशिए पर चली जाएगी। विचारधारा विहीनता का तमाशा और तेजी से जोर पकड़ेगा। चुनाव और तेजी से गरीबों के साथ छल-कपट का पर्याय बनेंगे।

अभी तो संभावना नजर नहीं आतीलेकिन अगर आगे की किसी पीढ़ी ने नवसाम्राज्यवादी गुलामी की तह में जाकर पता लगाने की कोशिश कीतो उसे पता चलेगा कि अकेले नवउदारवादी इसके लिए जिम्मेदार नहीं थे। देश की मुख्यधारा राजनीतिक में एका बना थाजिसके तहत नवसाम्राज्यवादी गुलामी आयद हुई। भारत के बुद्धिजीवियोंजो सभी प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष खेमे से आते हैंके गुलाम दिमाग के छेद’ की ओर ध्यान दिलाने वाले किशन पटनायक ने कहा हैमनुष्य के लिए गुलामी की अवस्था सहज स्वीकार्य नहीं होती। हम यह दिल्ली विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर नहीं कह रहे हैं। लंबे समय से हमारा कहना है कि इस दौर में भारत की सबसे बड़ी अकलियत की बड़ी भूमिका है। हालांकि मुस्लिम नेतृत्व ने हमारी बात पर गौर नहीं किया है। हमारा अभी भी मानना है कि नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ अगर कोई सच्चा संघर्ष होगातो वह अल्पसंख्यक समाज की मजबूती और भागीदारी से होगा। आशा करनी चाहिए ऐसा जरूर और जल्दी होगा।

Monday, February 2, 2015

‘आप’ से नहीं बचेगी धर्मनिरपेक्षता: प्रेम सिंह



(दरअसल, धर्मनिरपेक्षता जैसे संविधान सम्मत मूलभूत मूल्य को लेकर फुटकर व्यवहार नहीं चल सकता। वह मुकम्मल व सर्वस्वीकृत बना रहे, इसके लिए नई राजनीति की जमीन तैयार करते रहना होगा। ऐसी राजनीति का कोई भविष्य नहीं है, ऐसा कहने वाले साथियों को इतना ध्यान जरूर देना चाहिए कि उसी राजनीति से धर्मनिरपेक्षता का भविष्य बना रह सकता है। )

इस लेख के लिए हम पर कई सेकुलर साथियों का कोप और तेज होगा। हम यह नहीं लिखते यदि पिछले करीब एक महीने में कई साथियों ने फोन पर और ईमेल भेज कर हमसे दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) का समर्थन करने को नहीं कहा होता। उनमें कई वरिष्ठ साथी ऐसे हैं जिनका हम सम्मान करते हैं। ‘आप’ के समर्थन का आग्रह करने वाले ज्यादातर साथी अरविंद केजरीवाल में मोदी की काट देखने वाले हैं। लेकिन यह आग्रह करने वाले कतिपय साथी ऐसे भी हैं, और वे काफी आक्रामक हैं, जो केजरीवाल की मजबूती में मोदी की मजबूती देखते हैं। वे समझते हैं उनकी इस समझ को कोई समझ नहीं रहा है। वे केजरीवाल को मजबूत करना चाहते हैं, ताकि ‘भ्रष्ट’ कांग्रेस और ‘जातिवादी’ क्षत्रप आगे कभी मोदी के आगे सिर न उठा पाएं। उनकी नजर में मोदी दमदार नेता हैं, जिन्होंने विकास और प्रषासन को पटरी पर ला दिया है। केजरीवाल के ऐसे समर्थकों से हमारा कोई सवाल नहीं है। लेकिन केजरीवाल के समर्थक उन साथियों से जरूर सवाल है जो एक बार फिर केजरीवाल में मोदी की काट देख रहे हैं और दूसरों को भी वह ‘सच्चाई’ दिखाने पर आमादा हैं। ऐसे साथियों का प्रबल आग्रह है कि धर्मनिरपेक्षता को बचाना है तो दिल्ली में भाजपा को हराना होगा, जो ‘आप’ ही कर सकती है। उनका तर्क है कि सारे तर्क छोड़ कर ‘आप’ का समर्थन करना है। 

सांप्रदायिक ताकतों ने पूर्ण बहुमत से ‘दिल्ली’ जीत ली है। यह उनकी अभी तक की पराकाष्ठा है। ‘दिल्ली’ के भीतर दिल्ली राज्य, जिसे पूर्ण राज्य का दर्जा भी नहीं है, के चुनाव में ‘आप’ की जीत से पराकाष्ठा पर पहुंची सांप्रदायिक ताकतों का पराभव षुरू हो जाएगा - साथियों की यह मान्यता हैरान करने वाली है। दरपेष सांप्रदायिक फासीवाद के प्रति साथी भले ही वे गंभीर चिंता जताते हों, संकट की प्रकृति पर उनकी पकड़ मजबूत नहीं कही जा सकती। 

हम मानते हैं कि यह धर्मनिरपेक्षता पर अभी तक का सबसे बड़ा संकट है, जिसका भारतीय सभ्यता पर दूरगामी प्रभाव पड़ना है। इसलिए संकट का तात्कालिक समाधान भी ऐसा सोचना होगा, जिससे दूरगामी समाधान निकल सके। हमने ‘आप’ का समर्थन करने वाले साथियों से कहा कि सात वामपंथी पार्टियों ने दिल्ली के नागरिकों और षहर के लिए सभी जरूरी मुद्दों पर एक कार्यक्रम बनाया है और उनमें पांच पार्टियों के 14 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने इसे एक निरर्थक कार्रवाई मानते हुए कार्यक्रम या उम्मीदवारों में अपनी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हमने उनसे कहा कि दिल्ली के सभी धर्मनिरपेक्ष साथी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के उम्मीदवारों के समर्थन में बाहर निकलें। धर्मनिरपेक्ष उम्मीदवारों को ज्यादा से ज्यादा समर्थन और वोट मिलने से न केवल उनका आगे काम करने का हौसला बढ़ेगा, इस पूरे चुनाव अभियान में नवउदारवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ के संकीर्ण दायरे में घूमने वाली बहस में समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को कुछ जगह मिलेगी। लेकिन वे धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई, जो हारी जा चुकी है, की हार का डर दिखा कर जीत का भ्रम पालना चाहते हैं। इससे उनके कुछ करने के जज्बे की भले तसल्ली होती हो, धर्मनिरपेक्षता के मोर्चे पर और ज्यादा नुकसान ही होते जाना है।

नवउदारवादी व्यवस्था आगे बढ़ेगी तो सांप्रदायिकता भी आगे बढ़ेगी। उपनिवेषवादी दौर से हम यह सच्चाई जानते हैं और विभाजन की त्रासदी के रूप में उसका गहरा दंष झेल चुके हैं। नवउदारवाद, सांप्रदायिकता और सामाजिक न्याय-विरोध के घोल से तैयार भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सबसे पहले और सबसे ज्यादा आरएसएस को फला है। चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले कुछ पूर्व उल्लिखित तथ्यों को संक्षेप में रखना मुनासिब होगा। 

जिस मौजूदा सांप्रदायिक फासीवाद को लेकर साथी इस कदर चिंतित हैं वह अकेले आरएसएस की कामयाबी नहीं है। उसमें इंडिया अगेंस्ट करप्षन, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और ‘आप’ का मास्टर स्ट्रोक लगा है। यह स्पष्ट हो चुका है कि अण्णा हजारे से पहले केजरीवाल ने रामदेव को साधा था, जो उन्हीं की तरह षासक जमात में ऊंची हैसियत बनाने के लिए बेताब घूमते थे। न केवल अण्णा हजारे ने जंतर-मंतर से पहली प्रषंसा मोदी की, रामदेव ने मोदी को हरिद्वार अपने आश्रम में बुला कर हिंदुओं का नेता घोषित किया। अण्णा हजारे इस्तेमाल के बाद अप्रासंगिक हो गए और रामदेव व केजरीवाल सत्ता के गलियारे में पहुंच गए। दिल्ली विधानसभा चुनाव में सफलता के बाद ‘आप’ के धर्मनिरपेक्षतावादी सदस्य प्रषांत भूषण ने कहा था कि ‘आप’ को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस से नहीं, भाजपा से मुद्दा आधारित समर्थन लेना चाहिए। उनके पिता ‘आप’ के वरिष्ठ नेता षांति भूषण लंबे समय से लालकृष्ण अडवाणी के राजनैतिक साथी हैं। केजरीवाल को ‘छोटे गांधी’ कहने वाली किरण बेदी ने उस समय कहा था कि ‘आप’ और भाजपा की विचारधारा एक है। यानी ‘भारत की बेटी’ पहले से ही ‘भाजपा की बेटी’ रही है। यह अकारण नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामदेव और केजरीवाल दोनों के प्रिय हैं। दोनों नरेंद्र मोदी, उनके द्वारा गुजरात में तैयार की गई हिंदुत्व की प्रयोगषाला, फरवरी 2002 में मुसलमानों के राज्य-प्रायोजित नरसंहार और उसे छिपाने के लिए किए गए षड़यंत्रों पर कुछ नहीं बोलते। न ही बाबरी मस्जिद ध्वंस के संविधान और सभ्यता विरोधी कृत्य के खिलाफ उनकी आवाज सुनाई देती है। यह तथ्य भी देखें कि 1984 में स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई हजारों निर्दोष सिख नागरिकों की हत्या पर केजरीवाल सत्ता के गलियारे में पहुंचने के बाद से काफी राजनीति करते हैं। लेकिन घटना के वक्त और उसके बाद उन्होंने पीडि़तों के पक्ष में आवाज नहीं उठाई। 2006 में आई जस्टिस सच्चर कमेटी की रपट और सिफारिषों को लेकर ‘आप’ भाजपा के साथ खड़ी रही है।

केजरीवाल ‘बदनाम’ कांग्रेस से पीछा छुड़ाने के लिए मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर बनारस चुनाव लड़ने जा पहुंचे ताकि नरेंद्र मोदी की जीत सुनिष्चित की जा सके और उसके बदले में भाजपा में षामिल होकर या बाहर से समर्थन लेकर पक्के मुख्यमंत्री बन सकें। तब किसी को पता नहीं था कि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल जाएगा। सारे कयास 160 से लेकर 180 सीटों तक लगाए जा रहे थे। आम चुनाव और उसके बाद कुछ राज्यों में मिली चुनावी सफलता के चलते भाजपा ने जोड़-तोड़ की सरकार बनाने के बजाय अंततः चुनाव में जाने का फैसला किया। केजरीवाल का गणित गड़बड़ा गया और मोदी ने उन्हें घास नहीं डाली। फिर भी केजरीवाल ने पटरी बैठाने के लिए ‘केंद्र में पीएम मोदी, दिल्ली में सीएम केजरीवाल’ का नारा फेंका जो चल नहीं पाया। मोदी अगर बनारस से हारते तो उनकी जीत का वजन आधा रह जाता।

लालकृष्ण अडवाणी कई बार कह चुके हैं कि देष में कांग्रेस और भाजपा दो पार्टियां होनी चाहिए। मनमोहन सिंह ने भी उनकी यह बात दोहराई है। नरेंद्र मोदी का सोचना अलग है। वे कांगे्रसमुक्त भारत का संकल्प लेकर चल रहे हैं। आम चुनाव में कांग्रेस को अभी तक का सबसे बड़ा धक्का देने के बाद दिल्ली की चुनावी रैली में उन्होंने कांग्रेस का जिक्र ही नहीं किया। उन्होंने मुकाबले में ‘आप’ को संबोधित किया। संदेष साफ है कि कांग्रेस के परंपरागत मतदाता भाजपा को वोट नहीं दे सकते तो ‘आप’ को वोट दे दें। दिल्ली में ‘आप’ की लड़ाई भी कांग्रेस के साथ है। दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ ‘आप’ और भाजपा का वोट साझा था। इस बार वैसी स्थिति नहीं है। जिन्होंने केजरीवाल को दिल्ली का सीएम बनाया था, उन्होंने केंद्र में मोदी को पीएम बना दिया है। जाहिर है, अब उनका मोदी की मरजी का सीएम बनाने का प्रयास रहेगा। इसीलिए ‘आप’ के कई नेता-कार्यकर्ता भाजपा में षामिल हो गए हैं। दोनों के बीच यह आवाजाही आगे भी जारी रहेगी। 

यहां एक और तथ्य पर गौर किया जा सकता है। राजनीति में पार्टियों और नेतृत्व की नीतियों के आधार पर आलोचना और विरोध होना चाहिए। केजरीवाल ने कांग्रेस और उसके नेतृत्व की नवउदारवादी नीतियों की आलोचना और विरोध न करके, उन्हें बदनाम करने का जबरदस्त अभियान चलाया। बदनाम करने की ‘कला’ में आरएसएस को महारत हासिल है। कांग्रेस की बदनामी के माहौल में आरएसएस का काम आसान हो गया और ‘आप’ को सत्ता की राजनीति (पावर पोलिटिक्स) में आसानी से प्रवेष मिल गया। आषय यह कि भाजपा और ‘आप’ का एक साथ उत्थान सम्मिलित उद्यम की देन है। 

‘आप’ ने पिछले दिनों हुए कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में हिस्सा न लेकर दिल्ली पर फोकस करने का निर्णय लिया। ‘आप’ के नेताओं की विषेषज्ञता धन और स्टेªटेजी बनाने में है। इन दो के सहारे उसने दिल्ली में अपने पक्ष में माहौल बनाया है और चुनाव में भाजपा के मुकाबले में आ गई। धर्मनिरपेक्षता के जो दावेदार ‘आप’ पर दांव लगा रहे हैं, उन्हें देखना चाहिए कि दिल्ली में ‘आप’ की जीत होने पर अन्य राज्यों में भी यह रणनीति दोहराई जाएगी। तब साथी भाजपा को हराने के लिए ‘आप’ को जिताने का आग्रह करेंगे। इस प्रक्रिया में नवउदारवाद का विरोध करने वाली पार्टियों, भले ही उनकी धर्मनिरपेक्ष साख कितनी ही हो, को चुनाव के मैदान से बाहर रहना होगा। इस तरह धर्मनिरपेक्षता किनारे होती जाएगी और नवउदारवादी-सांप्रदायिक ताकतों का गठजोड़ नए रूप में ज्यादा मजबूत होता जाएगा। तब भाजपा और ‘आप’ के नेता अडवाणी और मनमोहन सिंह की तरह कह सकते हैं कि देष में ये दो पार्टियां ही होनी चाहिए। नवउदारवाद की अंधी छलांगों से अगर देष का नक्षा आमूल-चूल बदलेगा तो राजनीति का नक्षा भी आज जैसा नहीं रहेगा। ‘आप’ के समर्थन का आग्रह करने वाले धर्मनिरपेक्ष साथियों को इस पर गंभीरता से विचार कर लेना चाहिए। कुछ धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने यह सोच कर ‘आप’ को समर्थन दिया है कि दिल्ली में ‘आप’ के हाथों भाजपा की हार होने से उनके राज्यों में उनकी पार्टियों की जीत की संभावना मजबूत हो जाएगी। उन्हें भी अपने फैसले के दूरगामी परिणाम पर विचार करना चाहिए। 

दरअसल, धर्मनिरपेक्षता जैसे संविधान सम्मत मूलभूत मूल्य को लेकर फुटकर व्यवहार नहीं चल सकता। वह मुकम्मल व सर्वस्वीकृत बना रहे, इसके लिए नई राजनीति की जमीन तैयार करते रहना होगा। ऐसी राजनीति का कोई भविष्य नहीं है, ऐसा कहने वाले साथियों को इतना ध्यान जरूर देना चाहिए कि उसी राजनीति से धर्मनिरपेक्षता का भविष्य बना रह सकता है। 

धर्मनिरपेक्षता की कसौटी केवल यह नहीं हो सकती कि भाजपा के खिलाफ मुसलमानों के वोट कौन ले जाता है? न ही यह कि फलां व्यक्ति विचार से सांप्रदायिक नहीं है। नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार करने वाली मायावती, कल्याण सिंह के साथ मिल कर सरकार बनाने वाले मुलायम सिंह यादव, भाजपा के साथ लंबे समय तक गठबंधन चलाने वाले जन (यू) के नेतागण, भाजपा के साथ समय-समय पर सरकार चलाने वाले नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू, करुणा निधि, ओमप्रकाष चैटाला, ममता बनर्जी, जयललिता आदि नेताओं को वैचारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष ही कहा जाएगा। लेकिन हम उनकी आलोचना करते हैं कि वे सत्ता के लिए सांप्रदायिक राजनीति करते हैं। राजनीतिक आचरण धर्मनिरपेक्षता की कसौटी होता है। भारत में सांप्रदायिकता के बरक्स धर्मनिरपेक्षता के संघर्ष की लंबी परंपरा है। उस संघर्ष में गांधी की हत्या भी हो जाती है। लेकिन मजेदारी देखिए केजरीवाल सांप्रदायिक तत्वों के साथ जितनी और जैसी सांठ-गांठ करें, धर्मनिरपेक्षतावादी उन्हें कुछ नहीं कहते। उल्टा उन्हें धर्मनिरपेक्षता का रक्षक बताते हैं। 

अब जबकि यह साफ हो चुका हे कि ‘आप’ वास्तव में राजनीतिक पार्टी न होकर, चुनाव जीतने के लिए जुटे निपट सत्ता-स्वार्थी लोगों का गिरोह है, कई बार अपनी पार्टियों की कीमत पर साथी केजरीवाल का बचाव करने को तैयार नजर आते हैं। इसे केजरीवाल की बड़ी कामयाबी कहा जाएगा कि धर्मनिरपेक्षतावादी उनके सौ खून माफ करने को हमेषा तैयार हैं। जबकि वे हमारे जैसे सामान्य कार्यकर्ता को कलम, जबान या आचरण की जरा-सी चूक पर तंदूरी मुर्गे की तरह मार कर लटका देंगे!

‘आप’ का समर्थन करने का दबाव बनाने वाले साथियों की पृष्ठभूमि विचारधारात्मक प्रतिबद्धता की रही है। जबकि ‘आप’ खुले बाजार की खुली पार्टी है। विचारधारात्मक और संगठनात्मक बंधन उस पर आयद नहीं होते। राजनीतिषास्त्र के एक विद्वान ने ‘आप’ को विचारधारा की कसौटी पर कसने वाले ‘विचारधारात्मक योद्धाओं’ (आइडियोलोजिकल वारियर्स) की अपने एक लेख में कड़ी खबर ली थी। और भी कई विद्वान ‘आप’ के सहयात्री बने हुए हैं। विचारधाराविहीन राजनीति का यह ‘आदर्ष प्रयोग’ उन्हें सांप्रदायिकता समेत सभी समस्याओं के लिए रामबाण नजर आता है। हैरत की बात है कि वे यह देखने-सुनने को कतई तैयार नहीं हैं कि मौजूदा प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार को पूर्ण बहुमत से कायम करने में इस ‘आदर्ष प्रयोग’ ने निर्णायक भूमिका निभाई है। राजनीतिषास्त्र व अर्थषास्त्र के विद्वान भी राजनीतिक मानस से रहित हो सकते हैं! दरअसल, अपने को विचारधारा-मुक्त कहने वाले आज की प्रचलित विचारधारा कारपोरेट पूंजीवाद के समर्थक होते हैं। जब से ‘आप’ बनी है यह विवाद होता रहता है कि कौन किसका मोहरा है। भाजपा की सीएम उम्मीदवार बनने पर किरण बेदी को मोदी का मोहरा बताया गया है। हकीकत में ये सब नवसाम्राज्यवाद के मोहरे हैं।

इस ‘आदर्ष प्रयोग’ ने करीब दो दषक के वैकल्पिक राजनीति की अवधारणा और संघर्ष को दो-तीन साल में ही बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया है। हो सकता है धर्मनिरपेक्षतावादी साथी इसे कोई बड़ा नुकसान नहीं मानते हों, यह मान कर कि इसकी भरपाई कर ली जाएगी। लेकिन उनकी धर्मनिरपेक्षता की चिंता भी सच्ची नजर नहीं आती। यह सही है कि सेकुलर कह जाने वाली पार्टियों ओर नेताओं ने धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को छलनी कर दिया है। वे इस कदर अपनी साख गंवा चुके हैं कि मोदी/षाह देष-विदेष में सरेआम उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। केजरीवाल नवउदारवाद का पक्ष ले या सांप्रदायिकता का - उसे धर्मनिरपेक्षतावादियों का अभय प्राप्त है। नवउदारवाद और सांप्रदायिकता के गठजोड़ की राजनीति में जगह बनाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। उसे पता है उसे कोई कुछ नहीं कहेगा। अलबत्ता, सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के नाम पर केजरीवाल के समर्थन का आग्रह करने वाले एक दिन अपनी साख गंवा बैठ सकते हैं।