Tuesday, June 20, 2017

संविधान नहीं नवउदारवाद का अभिरक्षक राष्ट्रपति- डॉ प्रेम सिंह

     
 एक बार फिर नवउदारवाद  
      पिछली बार की तरह इस बार भी राष्ट्रपति चुनाव लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। राष्ट्र के सर्वोच्च संवैधनिक प्रमुख के चुनाव के अवसर पर चर्चा होना अच्छी बात है। इस अवसर पर चर्चा के कई बिंदु हो सकते है। मसलनचर्चा में पिछले राष्ट्रपतियों के चुनावसमझदारी और विशेष कार्यों का आलोचनात्मक स्मरण किया जाए। यहां हम याद दिलाना चाहेंगे कि देश के दो बार राष्ट्रपति रहे डॉ. राजेंद्र प्रसाद की डॉ. लोहिया ने इस बात के लिए कड़ी आलोचना की थी कि उन्होंने राष्ट्रपति रहते बनारस के पंडितों के पैर पखारे थे। संविधान निर्माण के समय की राष्ट्रपति संबंधी बहसों का स्मरण भी किया जा सकता है। संसदीय प्रणाली की जगह राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की जो बात अक्सर होती है - अक्सर यह मान कर कि अमेरिका की तरह भारत में भी राष्ट्रपति प्रणाली अपना ली जाए तो सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी - उस पर गंभीर बहस चलाई जाए। राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल महानुभावों से देश और दुनिया के सामने दरपेश समस्याओं पर गंभीर वार्तालाप आयोजित किया जाए। उनसे संविधन के बारे में भी बात की जाए और वे संविधन को कितना समझते और महत्व देते हैंयह जाना जाए। सीधे राजनीति से इतर जीवन के विभिन्न आयामों पर उनसे उनका अध्ययन और राय पूछी जाए। राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के पीछे उनकी प्रेरणा और जीतने के बाद रुटीन भूमिका के अलावा करने के लिए सोचे गए कामों की जानकारी ली जाए।
      चर्चा के और भी विषय और मुद्दे हो सकते हैं। हालांकि पूरी चर्चा का मुख्य बिंदु यही हो कि मौजूदा दौर में राष्ट्रपति से भारतीय राष्ट्र यानी देश के समस्त नागरिकों की क्या अपेक्षाएं हो सकती हैं और उम्मीदवार उन्हें कितना समझते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि संविधान का अभिरक्षक (कस्टोडियन) होने के नाते राष्ट्रपति के व्यक्तित्वपद और भूमिका को लेकर पूरी चर्चा भारत के संविधान की संगति में होन कि उससे स्वतंत्र। इस तरह राष्ट्रपति चुनाव का अवसर हमारे संवैधानिक नागरिक बोध को पुष्ट करने में सहायक हो सकता है।
      लेकिन जो चर्चा चल रही है उससे लगता है कि हमारे लिए राष्ट्रपति चुनाव कोई महत्व का अवसर नहीं है। मीडिया और राजनीतिक पार्टियां दोनों का संदेश यही है कि महत्व की बात केवल यह है कि कौन राजनीतिक पार्टी या नेता अपना आदमी राष्ट्रपति बना कर राष्ट्रपति भवन पर कब्जा करता है। (आगे देखेंगे कि यह जरूरी नहीं कि राजनीति से बाहर का सर्वसम्मति से चुना गया व्यक्ति राजनेता के मुकाबले संविधान की कसौटी और अन्य अपेक्षाओं पर ज्यादा खरा उतरता हो।) इस बार के चुनाव में राजनीतिक पार्टियां और नेता दांव-पेच में कुछ ज्यादा ही उलझे हैं। किसी ने गुगली फेंकी है तो कोई पांसा फेंक रहा है! प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति बनाने का सुझाव फेंका गया तो यह पूरा प्रकरण एक एब्सर्ड ड्रामा जैसा लगने लगा। जो दांव-पेच हुए और आगे होने की संभावना हैउनका पूरा ब्यौरा देने लगें तो कॉलम उसी में सर्फ हो जाएगा। एक वाक्य में कहें तो यह पूरा प्रकरण भारतीय राजनीति की दिशाहीनता दर्शाता है। कई बार दिशाहीनता का संकट सही दिशा के संधान में सहायक हो सकता है। बशर्ते उसके पीछे एक वाजिब दिशा की तलाश की प्रेरणा निहित हो। लेकिन मुख्यधारा भारतीय राजनीति की दिशाहीनता की एक ही दिशा है - नवउदारवाद की तरफ अंधी दौड़।
      राष्ट्रपति का चुनाव भी उसी अंधी दौड़ की भेंट चढ़ चुका है। राष्ट्रपति संविधान का अभिरक्षक कहलाता हैलेकिन पूरी चर्चा में - चाहे वह विद्वानों की ओर से होनेताओं या उम्मीदवारों की ओर से - वह नवउदारवाद के अभिरक्षक के रूप में सामने आ रहा है। किसी कोने से यह चर्चा नहीं आई है कि राष्ट्रपति को पिछले 25 सालों में ज्यादातर अध्यादेशों के जरिए नवउदारवाद के हक में बदल डाले गए संविधान की खबरदारी और निष्ठा के साथ निगरानी करनी है; कि ऐसा राष्ट्रपति होना चाहिए जो संविधान को पहुंचाई गई चौतरफा क्षति को समझ कर उसे दुरुस्त करने की प्रेरणा से परिचालित हो; और जो संविधान के समाजवादी लक्ष्य से बंधा हो।
      जाहिर हैनवउदारवाद को अपना चुकी कांग्रेस और भाजपा की तरफ से ऐसा उम्मीदवार नहीं आएगा। क्षेत्रीय पार्टियां भी कांग्रेस-भाजपा के साथ नवउदारवादी नीतियों पर चलती हैं। उनमें कई अपने को समाजवादी भी कहती हैं। उनमें एक जनता दल (यू) है जिसके प्रवक्ता ने कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के समर्थन में कहा है कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियां अटल हैं। उनके मुताबिक भाजपा के प्रवक्ता रविप्रसाद वित्तमंत्री बन जाएं तो वे भी वही करेंगे जो प्रणव मुखर्जी ने किया है। सीधे  समाजवादी नाम वाली समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह की भूमिका को देख कर लगता नहीं कि जिस लोहिया को वे मायावती के अंबेडकर की काट में इस्तेमाल करते हैंउस महान समाजवादी चिंतक की एक पंक्ति भी उन्होंने पढ़ी है। बीजू जनता दल और अन्ना द्रमुक पीए संगमा की उम्मीदवारी के प्राथमिक प्रस्तावक हैं। संगमा ने प्रणब मुखर्जी को बहस की चुनौती दी है। इसलिए नहीं कि बतौर वित्तमंत्री उन्होंने नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू करके संविधान विरोधी कार्य किया है; बल्कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियां तेजी से लागू करने में उनकी विफलता उद्घाटित करने के लिए वे प्रणव मुखर्जी से शास्त्रार्थ’ करना चाहते हैं। वे अपने को नवउदारवादी नीतियों का प्रणव मुखर्जी से बड़ा विशेषज्ञ और समर्थक मानते हैं।
      प्रणब मुखर्जी के समर्थन पर जिस तरह से राजग में विभाजन हुआ हैउसी तरह वाम मोर्चा भी विभाजित है। हालांकि वाम मोर्चा का विभाजन ज्यादा महत्व रखता हैक्योंकि वह समाजवाद के लक्ष्य से परिचालित एक विचारधारात्मक मोर्चा है जो पिछले करीब चार दशकों से कायम चला आ रहा है। वाम मोर्चा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया है, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का मतदान में हिस्सा नहीं लेने का फैसला है। माकपा के साथ फारवर्ड ब्लॉक है और सीपीआई के साथ आरएसपी। माकपा ने पिछली बार भी प्रतिभा पाटिल की जगह प्रणब मुखर्जी का नाम कांग्रेस अध्यक्ष के सामने रखा था। तब वाम मोर्चा की ताकत ज्यादा थी और पश्चिम बंगाल में माकपा नीत वाम मोर्चा की सरकार थी।
      समर्थन का माकपा का तर्क अजीब और खुद की पार्टी की लाइन के विपरीत है। जैसा कि प्रकाश  करात ने कहा हैराष्ट्रपति का चुनाव विचारधारा के बाहर कैसे हो गयाअगर मार्क्सवादी विचारधारा के बाहर मान भी लेंतो क्या वह संविधान की विचारधारा के भी बाहर माना जाएगाराष्ट्रपति संविधान का अभिरक्षक होता हैफिर इसके क्या मायने रह जाते हैंभारत में मार्क्सवादी विमर्श और पार्टी अथवा संगठन तंत्र की अपनी दुनिया है। उसका अपना शास्त्र एवं शब्दावली और उसके आधार पर आपसी सहयोग और टकराहटें हैं। माकपा के इस फैसले पर कम्युनिस्ट सर्किल में बहस चल रही है और उसे सही नहीं माना जा रहा है। खुद माकपा के शोध प्रकोष्ठ के एक युवा नेता ने फैसले को सिरे से गलत और पार्टी लाइन के विपरीत बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया है। माकपा ने उसे पार्टी से ही बाहर कर दिया है। माकपा का कहना है कि प्रणव मुखर्जी की व्यापक स्वीकृति है और माकपा की ताकत विरोध करने की नहीं है। सवाल है कि क्या व्यापक स्वीकृति नवउदारवाद की नहीं हैतो क्या उसका विरोध न करके उसके साथ हो जाना चाहिएस्पष्ट है कि माकपा का फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति से संबद्ध है। अपनी प्रतिद्वंद्वी ममता बनर्जी द्वारा प्रणब मुखर्जी के विरोध के चलते माकपा बंगाली मानुष’ को रिझाने के लिए मुखर्जी का समर्थन कर रही है।
      लेकिन इसमें विचारधारात्मक उलझन भी शामिल है। संकट में घिरी माकपा भारतीय समाजवाद की बात करने के बावजूद पूंजीवाद के बगैर समाजवाद की परिकल्पना नहीं कर पाती है। उसके सामने दो ही रास्ते हैं - या तो वह पूंजीवाद का मोह छोड़े या एकबारगी पूंजीवाद के पक्ष में खुल कर मैदान में आए। एक दूसरी उलझन भी है। मार्क्सवादियों के लिए भारत का संविधान (और उसके तहत चलने वाला संसदीय लोकतंत्र) समाजवादी क्रांति में बाधा है। उन्होंने मजबूरी में उसे स्वीकार किया हुआ है। इसलिए संविधान के प्रति सच्ची प्रेरणा उनकी नहीं बन पाती। तीसरी उलझन यह है कि आज भी वे राजनीति की ताकत के पहले पार्टी की ताकत पर भरोसा करते हैं। संगठन से बाहर - चाहे वह पार्टी का होलेखकों का,या सरकार का - मार्क्सवादी असहज और असुरक्षित महसूस करते हैं। लिहाजाबाहर की दुनिया उनके लिए ज्यादातर सिद्धांत बन कर रह जाती है। इसके चलते राजनीतिक ताकत का विस्तार नहीं हो पाता।
      अच्छा यह होता कि वाम मोर्चा अपना उम्मीदवार खड़ा करता। चुनावी गणित में वह कमजोर होतालेकिन जब तक जनता तक यह संदेश नहीं जाएगा कि उसकी पक्षधर राजनीति कमजोर हैतब तक वह उसे ताकत कैसे देगीअभी तो यह हो रहा है कि खुद जनता की पक्षधर राजनीति के दावेदार यह कह कर मुख्यधारा के साथ हो जा रहे हैं कि उनकी चुनाव लड़ने की ताकत नहीं है। अकेली आवाजअगर सच्ची हैतो उसे अपना दावा पेश करना चाहिए। नवउदारवादी साम्राज्यवाद के इस दौर में समाजवादी राजनैतिक चेतना के निर्माण का यही एक रास्ता है जो संविधान ने दिखाया है। जरूरी नहीं है कि नवउदारवाद की पैरोकार राजनीतिक पार्टियों के सभी नेता और कार्यकर्ता नवउदारवाद के समर्थक हों। वे भी उठ खड़े हो सकते हैं और अपनी पार्टियों में बहस चला सकते हैं। कहने का आशय यह है कि नवउदारवाद समर्थक प्रणब मुखर्जी और पीए संगमा के मुकाबले में वाम मोर्चा की तरफ से एक संविधान समर्थक उम्मीदवार दिया जाना चाहिए था।
      वह उम्मीदवार राजनीतिक पार्टियों के बाहर से भी हो सकता था। जैसे कि जस्टिस राजेंद्र सच्चर का नाम सामने आया था। लेकिन उस दिशा में आगे कुछ नहीं हो पाया। जबकि नागरिक समाज संविधान के प्रति निष्ठावान किसी एक व्यक्ति को चुन कर नवउदारवादी हमले के खिलाफ एक अच्छी बहस इस बहाने चला सकता था। ऐसे व्यक्ति का नामांकन नहीं भी होतातब भी उद्देश्य पूरा हो जाता। लेकिन भारत के नागरिक समाज की समस्या वही है जो मुख्यधारा राजनीति में बनी हुई है। वहां समाजवादी आस्था वाले लोग बहुत कम हैं। ज्यादातर आर्थिक सुधारों की तेज रफ्तार के सवार हैं। यही कारण है कि जस्टिस सच्चर अथवा किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में नागरिक समाज की ओर से मजबूत प्रयास नहीं हो पाया।
      कह सकते हैं कि राष्ट्रपति का यह चुनाव संकट के समाधन की दिशा में कोई रोशनी नहीं दिखाता। बल्कि संकट को और गहरा करता है। प्रणब मुखर्जी की राष्ट्रपति के रूप में जीत को मनमोहन सिंह और मंटोक सिंह आहलुवालिया आर्थिक सुधारों को तेज करने का अवसर बनाएंगे। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति चुनाव जीतते ही सबसे पहले संभवतः खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश के स्थगित फैसले को लागू कर दिया जाएगा।
      यह भी कह सकते हैं कि इस संकट से जूझा जा सकता थाबशर्ते नागरिक समाज संविधान की टेक पर टिका होता। हम नक्सलवादियों को बुरा बताते हैं और उन पर देशद्रोह का अपराध जड़ते हैंक्योंकि वे भारत के संविधान को स्वीकार नहीं करते। लेकिन नक्सलवादियों को देशद्रोही बताने वाले राजनेताओं और नागरिक समाज एक्टिविस्टों की संविधान के प्रति अपनी निष्ठा सच्ची नहीं हैं - पिछले 25 सालों में यह उत्तरोत्तर सिद्ध होता गया है। इस चुनाव से भी यही सबक मिलता है।  
      टीम अन्ना ने प्रधनमंत्री समेत उनकी केबिनेट के जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं उनमें प्रणव मुखर्जी भी हैं। वे राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि टीम अन्ना की लड़ाई भ्रष्टाचार से उतनी नहीं,जितनी कांग्रेस से ठन गई है। प्रणब मुखर्जी का राष्ट्रपति बनना कांग्रेस की जीत है। भाजपा कांग्रेसी उम्मीदवार को रोकने कीया कम से कम उसे मजबूत टक्कर देने की रणनीति नहीं बना पाई। उसके वरिष्ठतम नेता अडवाणी दयनीयता से कह रहे हैं कि कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार के नाम पर सर्वसम्मति बनाने के लिए भाजपा से बात नहीं की। ममता बनर्जी अभी यूपीए से निकली नहीं हैं और मुलायम सिंह झोली में गिरने को तैयार बैठे हैं। भाई रामगोपाल यादव को उपराष्ट्रपति का पद मिल जाएदूसरे भाई शिवपाल यादव और बहू डिंपल केंद्र में मंत्री बन जाएं तो परिवार के मुखिया का कर्तव्य संपूर्ण हो जाएगा! आरएसएस हालांकि मोदी पर अड़ेगा नहींलेकिन विनाश काले विपरीत बुद्धि’ हो जाए तो राजग के घटक दल ही नहींदेर-सबेर भाजपा में भी विग्रह तेज होगा। ऐसी स्थिति में 2014 में कांग्रेस की पक्की हार मानने वाले टीम अन्ना के कुछ सदस्य अभी से अलग लाइन पकड़ सकते हैं। वैसे भी राजनीति से दूर रहने की बात केवल कहने की है। केजरीवाल और प्रशांत भूषण चुनाव लड़ने की संभावनाएं तलाशते घूम रहे हैं। रामदेव गडकरी से लेकर बर्धन तक नेता-मिलाप करते घूम रहे हैं। ये सब एक ही टीम है - नवउदारवाद की पक्षधर और पोषक। इनके पास सारा धन इसी भ्रष्ट व्यवस्था से आता है। अपने नाम और नामे के फिक्रमंद ये सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट भला किसी सही व्यक्ति के नाम पर अड़ कर अपनी ऊर्जा क्यों बरबाद करते?     
      बहरहालकई नाम चर्चा में आने के बाद दो उम्मीदवार तय हो गए हैं। यूपीए की तरफ से प्रणब मुखर्जी और एनडीए की तरफ से पीए संगमा। कांग्रेस में राष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस प्रत्याशी का चुनाव सोनिया गांधी ने किया। पार्टी के नेताओं ने इसके लिए बाकायदा उनसे गुहार लगाई। जैसे संसद में सब कुछ तय करने का अधिकार सोनिया गांधी का है और विधानसभा में एमएलए प्रत्याशी से लेकर मुख्यमंत्री तक तय करने का अधिकार हैउसी तरह राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार भी वे स्वयं ही तय करती हैं। पिछली बार भी उन्होंने यही किया था। इससे कांग्रेस पर तो क्या फर्क पड़ना है,राष्ट्रपति पद की गरिमा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
      जैसा कि कहा जा रहा हैप्रणब मुखर्जी बहुत हद तक सर्वस्वीकार्य हैं। लेकिन सोनिया गांधी ने उस वजह से उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया है। सोनिया गांधी के प्रति व्यक्तिगत और नवउदारवाद के प्रति विचारधारागत समर्पण की लंबी तपस्या के बाद उन्हें रायसीना हिल पर आराम फरमाने का पुरस्कार दिया गया है। हालांकि तपस्यारत प्रणब मुखर्जी को,कहते हैंप्रधनमंत्री पद की आशा थी। लेकिन सोनिया गांधी किसी राजनीतिक व्यक्ति को इस पद के आस-पास नहीं फटकने दे सकतीं। नवउदारवादी प्रतिष्ठान सोनिया गांधी को स्वाभाविक तौर पर अपना मानता है। सोनिया गांधी की ताकत का स्रोत केवल कांग्रेसियों द्वारा की जाने वाली उनकी भक्ति नहीं है। केवल उतना होता तो अब तक तंबू गिर चुका होता। वैश्विक पूंजीवादी ताकतें उन्हें सत्ता के शीर्ष पर बनाए हुए हैं। जिस दिन चाहेंगी, हटा देंगी।   
      जाहिर हैसर्वस्वीकार्यअनुभवी और योग्यतम प्रणब मुखर्जी किसी गंभीर दायित्व-बोध के तहत राष्ट्रपति के चुनाव में नहीं हैं। बल्कि यह चुनाव उनका अपना है ही नहीं। वे चुनाव जीतेंगे और संविधान की एक बार फिर हार होगी। पार्टी और सरकार से विदाई के बिल्कुल पहले तक आर्थिक सुधारों की रफ्तार तेज करने की जरूरत बताने वाले प्रणब मुखर्जी की डोर राष्ट्रपति भवन में भी सुधारों के साथ बंधी रहेगी।
      दूसरे उम्मीदवार संगमा भी किसी गंभीर दायित्व-बोध के तहत चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। बल्कि अपने अब तक के राजनैतिक कैरियर का उत्कर्ष हासिल करने के लिए मैदान में हैं। वे सत्ता के सुख में मगन रहने वाले नेता हैं जो 1977से अब तक आठ बार लोकसभा के सदस्य चुने गए हैं। वे केंद्र में मंत्री रहे हैंमेघालय के मुख्यमंत्री रहे हैं और सर्वसम्मति से लोकसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी बेटी केंद्र में मंत्री है और बेटा मेघालय में। कांग्रेस से राकांपाराकांपा से तृणमूल कांग्रेसफिर राकांपा और अपनी उम्मीदवारी न छोड़ने के चलते अब राकांपा से बाहर हैं। इस पद पर उनकी पहले से नजर थी। कोई आदिवासी अभी तक राष्ट्रपति नहीं बना हैयह तर्क उन्होंने अपने पक्ष में निकाला और पांच-छह लोगों का ट्राइबल फॉरम ऑफ इंडिया बना कर खुद को उस फॉरम का उम्मीदवार घोषित कर दिया। यह कहते हुए कि वे देश के करोड़ों आदिवासियों के प्रतिनिधि हैं।
      संयोग से हमें एक टीवी चैनल पर संगमा का इंटरव्यू सुनने को मिल गया। तब तक भाजपा ने उन्हें अपना उम्मीदवार स्वीकार नहीं किया था। इंटरव्यू के अंत का भाग ही हम सुन पाए। उनके जवाब कहीं से भी राष्ट्रपति के पद की गरिमा के अनुरूप नहीं थे। जिस सर्वोच्च पद के लिए वे खड़े हैंअपने को उसके के लिए उन्होंने कतई तैयार नहीं किया है। वे राजनीति का मतलब अपने और अपने बच्चों के लिए बड़े-बड़े पदों की प्राप्ति मानते हैं। यह सब उन्हें मिला हैइसके लिए उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद  दिया। लेकिन राजनीतिक सत्ता की उनकी भूख किंचित भी कम नहीं हुई है। वे अपनी और अपने बच्चों की और बढ़ती देखना चाहते हैं। जब एंकर ने पूछा कि अभी तो वे काफी स्वस्थ हैं और आगे की बढ़ती देख पाएंगे तो उन्होंने कहा कि राजेश पायलट कहां देख पाए अपने बेटे को मंत्री बनेयानी जिंदगी का कोई भरोसा नहीं कब दगा दे जाएइसलिए जो पाना है जल्दी से जल्दी पाना चाहिए। उन्होंने अंत में यह संकेत भी छोड़ा कि इस बार न सहीअगली बार उन्हें राष्ट्रपति बनाया जाए।
      उपनिवेशवादी दौर रहा होआजादी के बाद मिश्रित अर्थव्यवस्था का दौर रहा हो या पिछला 25 सालों का नवउदारवादी दौर - विकास के पूंजीवादी मॉडल की सबसे ज्यादा तबाही आदिवासियों ने झेली है। संगमा उत्तर-पूर्व से हैं। वहां के आदिवासियों और शेष भारत के आदिवासियों की स्थितियों में ऐतिहासिकभौगोलिक व सांस्कृतिक कारकों के चलते फर्क रहा है। पूंजीवाद का कहर बाकी भारत के आदिवासियों पर ज्यादा टूटा है। संगमा आदिवासियों की तबाही करने वाली राजनीति और विकास के 1977 से अग्रणी नेता रहे हैं। उन्होंने कभी आदिवासियों के लिए आवाज नहीं उठाई। आदिवासियों को उजाड़ने वाली राजनीति के सफल नेता रहे संगमा अब उनके नाम पर राष्ट्रपति बनना चाहते हैं। सत्ता की उनकी भूख इतनी सहज’ है कि वे किसी भी समझौते के तहत मैदान से हट कर उपराष्ट्रपति बनने को तैयार हो सकते हैं। ताकि आगे चल कर राष्ट्रपति बन सकें। 
      हवाई सपनों के सौदागर डॉ. कलाम
      पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम भी देर तक चलता रहा। ममता बनर्जी ने उन्हें उम्मीदवार बनाना चाहा और भाजपा ने। मुलायम सिंह ने जो तीन नाम उछाले थे उनमें डॉ. कलाम का नाम भी था। जिस तरह पिछली बार डॉ. कलाम ने दूसरा कार्यकाल पाने के लिए कोशिश की थीइस बार भी सक्रिय नजर आए। पिछली बार की तरह इस बार भी फेसबुक पर उनके लिए लॉबिंग की गई। उन्हें शायद आशा रही होगी कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की दाब में कांग्रेस उन्हें समर्थन दे देगी और वे एक बार फिर सर्वसम्मत उम्मीदवार बन जाएंगे। लेकिन प्रणब मुखर्जी का नाम तय होने और उन्हें व्यापक समर्थन मिलने के बाद जब देखा कि जीत नहींफजीहत होने वाली हैअपनी उम्मीदवारी से इनकार कर दिया।
      याद करें प्रतिभा पाटिल के राष्ट्रपति बनने पर काफी नाक-भौं सिकोड़ी गई थी। इसलिए नहीं कि वे बतौर राष्ट्रपति अपेक्षाएं पूरा नहीं कर सकती थींया उन्होंने चुनाव के पहले ही अपने दिवंगत गुरु से वार्तालाप संबंधी रहस्य’ का उद्घाटन कर दिया था। या इसलिए कि सोनिया गांधी ने उन्हें थोप दिया था। बल्कि इसलिए कि उनका अपीयरेंस एक ग्रामीण महिला जैसा हैवे विदेश में भारत की बेइज्जती कराएंगी। हमने यह खास तौर पर गौर किया था कि निम्न मध्यवर्ग से आने वाले हमारे छात्रजिनके अपने माता-पिता प्रतिभा पाटिल जैसे लगते होंगेदेश की बेइज्जती कराने का तर्क ज्यादा दे रहे थे। उनमें भी खास कर लड़कियां। उन्हें यह भी शिकायत थी कि प्रतिभा पाटिल फर्राटे से अंग्रेजी नहीं बोलती। उन्हें डॉ. कलाम जैसा हाईफाई राष्ट्रपति चाहिए था। 
      प्रतिभा पाटिल अपना कार्यकाल ठीक-ठाक निभा ले गईं। उन्होंने कुछ भी खास नहीं किया। संविधान पर जो कुठाराघात हो रहा हैउस तरफ उन्होंने इशारा तक नहीं किया। स्त्री सशक्तिकरण का तर्क सोनिया गांधी ने दिया था। उस दिशा में उन्होंने कुछ भी विशेष नहीं किया। लेकिन यह स्वीकार करना होगा कि उन्होंने डॉ. कलाम जैसी हवाई बातें कभी नहीं कीं। हम इसे उनका एक बड़ा गुण मानते हैं। अपनी छवि चमकाने के लिए जिस तरह से डॉ. कलाम ने राष्ट्रपति के ओहदे से हवाई बातें कीवह गलत परंपरा थीजिसे प्रतिभा पाटिल ने तोड़ा। डॉ. कलाम की हाई-हवाई बातों में युवा ही नहींकई वरिष्ठ लोग भी आ गए थे। उसीका सरमाया खाने के लिए वे दो बार फिर से राष्ट्रपति बनने के लिए उद्यत दिखे। उनकी अवकाश-प्राप्ती के अवसर पर हमने युवा संवाद’ (अगस्त 2007) में हवाई सपनों के सौदागर डॉ. कलामशीर्षक से लेख लिखा था जो इस प्रकार है :
      ‘‘जिन कलाम साहब के बारे में यह कहा गया कि उन्होंने अपने कार्यकाल में प्रेसीडेंसी’ के मायने बदल दिएमैं कभी उनका प्रशंसक नहीं हो सका। मैंने काफी कोशिष की उनकी सराहना कर सकूंलेकिन वैसा नहीं हुआ। यह मेरी सीमा हो सकती है और उस सीमा के कई कारण। मुझे उनके विचारों में न कभी मौलिक चिंतन की कौंध प्रतीत हुईन इस देश की विशाल वंचित आबादी के प्रति करुणा का संस्पर्श। जिस तरह की हाई-हवाई बातें वे करते रहे और उनके गुणग्राहक उनका बढ़ा-चढ़ा कर प्रचार करते रहेउसके बाद यह सोचना मुश्किल है कि अपनी ऊंची उड़ान में कलाम साहब कभी इसअपराधबोध’ का शिकार होते हों कि आदर्शवादियों’ नेमुक्तिबोध के शब्दों मेंदेश को मार कर अपने आप को जिंदा रखा है। राष्ट्राध्यक्षों का प्रेरणादायी भाषण देनासपने दिखाना आम रिवाज है। लेकिन निराधार प्रेरणा और सपने का कोई अर्थ नहीं होता। उनके नीचे ठोस जमीन होनी चाहिए।
      यह लेख मैं नहीं लिखता, अगर सुरेंद्र मोहन और कुलदीप नैयर जैसे समाजवाद और ध निरपेक्षता की विचारधारा में विश्वास रखने वाले दो वरिष्ठतम विद्वान अवकाश ग्रहण करने के अवसर पर राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की अतिरंजनापूर्ण बड़ाई नहीं करते। सुरेंद्र मोहन जी तो अपनी प्रशंसात्मक अभिव्यक्ति को न भूतोन भविष्यति’ तक खींच लाए। वे लिखते हैं : सपनों को जगाने वालाआशाओं  और उमंगों को हर दिल में बसाने वाला और नई दृष्टियों का संवाहक डॉ. अब्दुल कलाम जैसा राष्ट्रपति फिर कभी भारत को मिल पाएगा, यह कहना कठिन ही है। राष्ट्र को ऐसा विज्ञानवेत्ता और यांत्रिकी का विषेषज्ञ राष्ट्रपति अब तक नहीं मिला था। न वे भाषणकला के धनी थे और न ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद या वेंकटरमण की तरह संविधानवेत्ता ही थे। डॉ. जाकिर हुसैन और डॉ. शंकरदयाल शर्मा राजनीतिप्रशासन और शिक्षा के क्षेत्रों के सम्मानित विद्वान थेइन गुणों से भी डॉ. कलाम का संबंध नहीं था। इसके बावजूद जो अपार लोकप्रियताखास कर नई नस्लों का असीम प्यार डॉ. कलाम को मिलावह शायद अन्य किसी पूर्व राष्ट्रपति को नहीं मिला। सपनोंकल्पनाओंउमंगों और अरमानों से सभी दिलों को भरने वाला ऐसा प्रेरणादायक शिक्षक न तो कभी इस गौरवपूर्ण पद पर बैठा हैन बैठेगा - 'न भूतोन भविष्यति।’ (‘दैनिक भास्कर’, 22 जुलाई 2007)
      इस तरह सुरेंद्र जी ने सपनों के सौदागर’ कलाम साहब को शीशे में उतार दिया हैजो अर्थशास्त्रियों से कहते रहे हैं कि मनुष्य सिर्फ पेट की भूख से ही नहीं तड़पताउसे ज्ञान का प्रकाश भी चाहिए।’ (वही) यह अफसोस की बात है कि सुरेंद्र जी की पैनी नजर सतह पर तैरती यह सच्चाई नहीं देख पाती कि कलाम साहब जैसों की दुनिया में ज्ञान का प्रकाश पाए लोगों का पेट कभी नहीं भरता। कलाम साहब के कार्यकाल में उन्हीं के हस्ताक्षर से स्वीकृत हुआ सांसदों और विधायकों के लाभ के पद से संबंधित विधेयक इसका एक छोटा-सा उदाहरण है। यह कहना कि कलाम साहब खुद सादगी पसंद हैंकोई मायने नहीं रखता। जिस देश में सरकार के अनुसार देश की आधी से ज्यादा आबादी - नौनिहालोंनौजवानों,महिलाओंबुजुर्गों समेत - हर तरह और हर तरफ से असुक्षिरत हैवहां कलाम साहब और मनमोहन सिंह जैसों की सादगीशाही’ कही जाएगी। उस तंत्र का हिस्सा होना जो ऐश्वर्य और ऐशोआराम में मध्यकालीन शासकों को लज्जित करने वाला हैसादगी के अर्थ को शून्य कर देता है।
      उपर्युक्त कथन के पूर्व सुरेंद्र जी ने लिखा है : डॉ. कलाम देश को उस अंधी दौड़ से ऊपर उठाना चाहते हैंजो हमें अमेरिका की राह पर ले जाती हैजहां अमीरी और गरीबी में बहुत अंतर है और एक सैंकड़ा लोग देश के पचीस सैंकड़ा गरीबों की समूची संपत्ति से भी अधि संपत्ति के स्वामी हैं।’ (वही) हमें याद नहीं पड़ता कि कलाम साहब ने देश की अर्थनीति से लेकर राजनीति तक को अमरीकी पटरी पर डालने वाली मौजूदा या पिछली सरकार को कभी इसके प्रति आगाह किया हो। हमें यह भी नहीं लगता कि देश के अमरीकीकरण का विरोध करने वाले आंदोलनों और उनके नेताओं-विचारकों के बारे में कलाम साहब को कोई जानकारी या सहानुभूति हो। वे देश में दो राजनीतिक पार्टियां होने के समर्थक हैं। वे दो पार्टियां कांग्रेस और भाजपा ही हो सकती हैं। ये दोनों देश को अमरीका के रास्ते पर चलाने वाली हैं। इनके अलावा कलाम साहब वामपंथीसामाजिक न्यायवादी या क्षेत्रीय पार्टियों को देश के विकास में बाधा  मानते हैंजिनके चलते कांग्रेस और भाजपा को गठबंधन सरकार चलाने के लिए बाध्य होना पड़ता है। कलाम साहब की जिस लोकप्रियता का विरुद गाया जाता हैवह उसी जनता के बीच है जो विशाल भारत के भीतर बनने वाले मिनी अमेरिका की निवासी है। मिनी अमेरिका के बाहर की जनता पर उनकी लोकप्रियता लादी गई है।
      नैयर साहब को मलाल है कि कलाम साहब के रहते राष्ट्रपति पद के लिए किसी दूसरे उम्मीदवार के बारे में सोचा गया। अवकाश-प्राप्त करने की बेला में उन्होंने कलाम साहब से मुलाकात की और उनसे कोई खास खबर निकालने की कोशिश की। लेकिन कलाम साहब का कमाल कि वे उनके विजन 2020’, जिसके तहत सन 2020 तक भारत दुनिया का महानतम देश हो जाएगाके गंभीर रूप से कायल होकर बाहर निकले। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं और बहसों पर गहरी पकड़ रखने वाले नैयर साहब ने मिसाइल मैन’ के समक्ष यह सवाल नहीं उठाया कि अगर सभी देश विकसित,महाशक्ति और महानतम बनेंगे तो किसकी कीमत परभारत 2020 तक विकसित महाशक्ति और महानतम हो जाएगा तो किस विचारधारा और रास्ते के तहतनैयर साहब की खुशी और बढ़ गई होगी जब कलाम साहब ने अपने विदाई भाषण में यह घोषणा की कि 2020 से पहले भी भारत दुनिया का महानतम राष्ट्र बन सकता है। यह शीशे की तरह साफ है कि कलाम साहब उसी राष्ट्र के विकास और महानता की बात कर रहे हैं जिसे नवउदारवादी पिछले डेढ़ दशक से बनाने में लगे हैं। कलाम साहब का आह्वान पूरी तरह से अमरीकावादियों-नवसाम्राज्यवादियों की संगति में है। वरना कोई बताए कि एक अरब 20 करोड़ की आबादी का देश आधुनिक विज्ञान और तकनीकीजिसके कलाम साहब विशेषज्ञ हैंपर आधारित पूंजीवादी विकास के मॉडल के मुताबिक 2020 तक कैसे विकसित हो सकता हैक्या कहा जा सकता है कि अपने कार्यकाल में कलाम साहब ने सपने नहींअंधविश्वास परोसे हैं!
      सरकारी तंत्र और मीडिया में कलाम साहब की गुणगाथा पूरे पांच साल सतत चलती रही। वह अगले पांच साल और चलती रहे इसके लिए कलाम साहब के गुणगायकों ने एसएमएस के जरिए जोरदार प्रयास किया। लेकिन जब लगा कि राष्ट्रपति का पदजिसे उनकी नजर में कलाम साहब ने अभूतपूर्व महानता और पवित्रता से मंडित कर दिया था,राजनीति के गंदे कीचड़ में लथेड़ा जा रहा हैतो गुणग्राहक दुखी हो गए। राजनीति कलाम साहब को बुरी लगती है तो उनके गुणगायकों को कैसे अच्छी लग सकती है! गठन के समय से ही कलाम साहब के गुणगायक तीसरे मोर्चे का उपहास उड़ाने और उन पर लानत भेजने में अग्रणी थे। लेकिन जैसे ही मोर्चे ने अपनी तरफ से कलाम साहब का नाम चलाया,गुणगायक और खुद कलाम साहब मोर्चे के मुरीद हो गए। काश कि मोर्चा उनकी जीत सुनिश्चित कर पाता और गुणगायकों को कलाम साहब को आखिरी सलाम नहीं करना पड़ता! कमाल के कलाम साहब’ का आखिरी सलाम का कार्यक्रम एक ग्रांड फिनाले’ रहना ही था। हैरत यही है कि उसमें सबसे ऊंचा स्वर हमारे आदरणीय सुरेंद्र मोहन जी और कुलदीप नैयर साहब का रहा।
      कहना न होगा कि कलाम साहब के कमाल का मिथक उनके गुणगायकों और मीडिया का रचा हुआ था। उनके पद से हटने के बाद अब वह कहीं नजर नहीं आएगा। (ये गुणगायक और मीडिया अब किसी और बड़ी हस्ती को पकड़ेंगे जो उनके मिशन अमेरिका’ को वैधता प्रदान करे।) अंत की घोषणाओं के बावजूद इतिहास चल रहा है। वहां ठोस विचार अथवा कार्य करने वाले लोगों की जगह बनती है। इसलिए इतिहास में कलाम साहब की जगह गिनती भर के लिए होगीजो पदासीन हो जाने के नाते किसी की भी होती है। ऐसे में ज्ञान और अनुभव में पगे दो वरिष्ठतम विद्वानों की कलाम साहब के बारे में इस कदर ऊंची धारणा का औचित्य किसी भी दृष्टिकोण से समझ में नहीं आता। अगर अवकाश-प्राप्ति के अवसर की औपचारिकता मानें तो वह वंदना के सुरों में एक सुर और मिलाने जितनी ही होनी चाहिए थी। लेकिन दोनों का सुर भानुप्रताप मेहता सरीखों को भी पार कर गयाजिन्होंने वंदना में व्याजनिंदा का भी थोड़ा अवसर निकाल लिया। (देखें, ‘इंडियन एक्सप्रैस’ 25 जुलाई 2007 में प्रकाशित उनका लेख प्राइम मिनिस्टर कलाम?’)
      धर्मनिरपेक्षता के संदर्भ में भी कलाम साहब के राष्ट्रपतित्व पर कुछ चर्चा की जा सकती है। राष्ट्रपति के पद के लिए कलाम साहब का नाम भले ही मुसलमानों को रिझाने के लिए समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह ने चलाया होउनके नाम पर सहमति बनने का वास्तविक कारण गुजरात में सांप्रदायिक फासीवादी नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा हजारों मुसलमानों की हत्या और बरबादी था। अगर गुजरात में राज्य-प्रायोजित हिंसा में मुसलमानों का नरसंहार न हुआ होता तो कलाम के नाम पर भाजपा तो तैयार नहीं ही होतीउस सांप्रदायिक हिंसा और उसके कर्ता को रोकने में खोटा सिक्का साबित हुई कांग्रेस भी कदापि तैयार नहीं होती। यह कहने में अच्छा नहीं लगेगालेकिन वास्तविकता यही है कि कलाम साहब को राष्ट्रपति का पद एक मुसलमान होने के नाते गुजरात में मुसलमानों की हत्याओं के बदले तोहफे में मिला था। अगर कोई संजीदा इंसान होता तो वह विनम्रतापूर्वक उस सांप्रदायिक’ आम सहमति से इनकार कर देता और वैसा करके धर्मनिरपेक्षता के साथ ही मानवता की नींव भी मजबूत करता। हमारी यह मान्यता अनुबोध (after thought) पर आधारित नहीं है। गुजरात के कांड के बाद उनके नाम पर बनी सहमति के वक्त हमने अपनी भावना एक कविता लिख कर अभिव्यक्त की थी जो सामयिक वार्ता’ में प्रकाशित हुई थी। अपने लेख की शुरुआत में सुरेंद्र मोहन जी ने भी इस वास्तविकता का जिक्र किया है : जब इस पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार ने उनका नाम प्रस्तावित किया थातब उसे अपनी छवि सुधारने के लिए एक मुस्लिम नाम की जरूरत थीक्योंकि गुजरात के घटनाक्रम के कारण उसका चेहरा दागदार बन गया था। लेकिन इन पांच वर्षों में किसी नागरिक को यह पहचान याद नहीं आई। वे ऐसी सांप्रदायिकजातिगत या क्षेत्रीय गणनाओं से कहीं ऊपर उठे हुए थे और पूरे देश में यह सहमति थी कि वे उसी पद पर दोबारा आसीन हों।’ यह सही है कि कलाम साहब सांप्रदायिकजातिगत और क्षेत्रीय गणनाओं से ऊपर रहे। यह बड़ी बात है और अभी तक देश के हर राष्ट्रपति ने इसका निर्वाह किया है। लेकिन इससे यह वास्तविकता निरस्त नहीं होती कि कलाम साहब का चयनजैसा कि खुद श्री सुरेंद्र मोहन जी ने कहा हैसांप्रदायिक आधार पर हुआ था। अगर वे सांप्रदायिक आधार पर होने वाले अपने चयन को नकार देते तो उनका बड़प्पन हमारे जैसे लोग भी मानते और उन्हें बगैर राष्ट्रपति बने भी सलाम करते।’’ (युवा संवाद’ (अगस्त 2007)
      जाहिर हैराष्ट्रपति चुनाव के संदर्भ में कलाम साहब का व्यवहार भी गरिमापूर्ण नहीं कहा जा सकता। वे पिछली बार भी राष्ट्रपति बनना चाहते थे और इस बार भी ऐन चुनाव के मौके पर सक्रिय हो गए। सवाल सर्वानुमति का नहीं,जीत का था। अगर जीत की संभावना होती तो वे कंटेस्ट भी कर सकते थे। पहले की तरह उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन-सी पार्टियां उनका समर्थन कर रही हैं। जैसे उनकी भारत के महाशक्ति होने की धारणा पर अढ़ाई लाख किसानों की आत्महत्याओं से कोई फर्क नहीं पड़ता!
     
      धर्मनिरपेक्षता के दावेदार : कितने गाफिल कितने खबरदार
      राष्ट्रपति के उम्मीदवारों की चर्चा में भाजपा के भावी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार पर भी चर्चा चल निकली। आरएसएस ने नरेंद्र मोदी का नाम आगे किया तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने को धर्मनिरपेक्षता का बड़ा दावेदार सिद्ध करने के लिए आगे आ गए। क्योंकि राष्ट्रपति चुनाव पर 2014 में होने वाले आम चुनाव की छाया है। लिहाजानीतीश-नरेंद्र मोदी प्रकरण पर भी थोड़ी चर्चा वाजिब होगी।  
      गुड़ खाना परंतु गुलगुलों से परहेज करना’ - बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर इस कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं। 2004 के पहले केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में राजग की सरकार बनी थी तो उसका समर्थन करने और उसमें शामिल होने वाले नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने कहा था कि भाजपा की तरफ से उदार’ वाजपेयी की जगह अगर कट्टर’ अडवाणी प्रधानमंत्री बनाए जाते तो वे राजग सरकार का न समर्थन करतेन उसमें शामिल होते। धर्मनिरपेक्षता की दावेदारी जताते हुए अपनी इस शर्त का उन्होंने काफी ढिंढोरा पीटा था। हालांकि कुछ समय बाद उसी सरकार में अडवाणी उपप्रधानमंत्री बनाए गए और मंत्री बने नीतीश कुमार ने कोई आपत्ति नहीं उठाई थी। वे पूरे समय राजग सरकार में मंत्री रहे और बिहार में भाजपा के साथ मिल कर बतौर मुख्यमंत्री दूसरी बार सरकार चला रहे हैं। गुजरात कांड उनके लिए घटना से लेकर आज तक कोई मुद्दा नहीं रहा। लेकिन बीच-बीच में नरेंद्र मोदी का व्यक्तिगत विरोध का शगल करते रहते हैं। गोया नरेंद्र मोदी अपने संगठन से अलग कोई बला है!
      राजनीतिक सफलता ने नीतीश कुमार को आश्वस्त कर दिया है कि आरएसएस-भाजपा के साथ लंबे समय तक राजनीति करके भी वे धर्मनिरपेक्ष बने रह सकते हैं। यह स्थिति नीतीश कुमार से ज्यादा धर्मनिरपेक्षता के अर्थ पर एक गंभीर टिप्पणी है। मुख्यधारा राजनीति में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ भाजपा के साथ रह कर या भाजपा का भय दिखा कर मुसलमानों के वोट हासिल कर लेना है। जाहिर हैधर्मनिरपेक्षता का यह अर्थ संविधान में प्रस्थापित धर्मनिरपेक्षता के मूल्य के पूरी तरह विपरीत और विरोध में है। भाजपा, आरएसएस का राजनैतिक मंच होने के नाते स्वाभाविक रूप से सांप्रदायिक है। भारतीय संविधान के तहत राजनीति करने की मजबूरी में उसे अपनी सांप्रदायिकता को ही सच्ची धर्मनिरपेक्षता प्रचारित करना होता है। दूसरे शब्दों मेंएक राजनीतिक दल के रूप में भाजपा संविधान के साथ धेखाधड़ी करती है। लेकिन भाजपा के साथ या उसका भय दिखा कर मुस्लिम वोटों की राजनीति करने वाले दल और नेता भी संविधान के साथ वही सलूक करते हैं।    
      कहने का आशय है कि पिछले 25 साल की राजनीति में धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को जो लगातार ठोकरें खानी पड़ रही हैंउसके लिए अकेले सांप्रदायिक ताकतों को दोष नहीं दिया जा सकता। सांप्रदायिकता उनका धर्म’ है। इसमें धर्मनिरपेक्ष ताकतों का दोष ज्यादा हैक्योंकि वे धर्मनिरपेक्षता की दावेदार बन कर उसका अवमूल्यन करती हैं। यह परिघटना राजनीति से लेकर नागरिक समाज तक देखी जा सकती है। और असली खतरा यही है।      
      नरेंद्र मोदी का विरोध करने पर आरएसएस ने भले ही नीतीश कुमार को धता बताई होलेकिन नीतीश कुमार आरएसएस की बढ़ती का ही काम कर रहे हैं। आरएसएस शायद यह जानता भी है। उसने सेकुलर नेताओं और बुद्धिजीवियों को अपने आंतरिक झगड़े’ में उलझा लिया है। वह नरेंद्र मोदी पर दांव लगा कर अडवाणी के प्रधनमंत्री बनने का रास्ता साफ कर रहा है। जैसे अडवाणी के सामने वाजपेयी उदार’ हुआ करते थेवैसे अब नरेंद्र मोदी के मुकाबले अडवाणी उदार बन जाएंगे। आगे चल कर जब गुजरात का शेर’ अडवाणी जैसा नखदंतहीन बूढ़ा हो जाएगा तो उसके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता भी साफ होगा। क्योंकि तब तक हिंदुत्व का कोई और नया शेर आरएसएस में पैदा हो चुका होगा। खुद मोदी उस तरह के कई शेरों के साथ प्रतियोगता करके अव्वल आए हैं। जब मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया था तो उनसे पहले उस समय कट्टरता के मामले में उनसे कहीं ज्यादा प्रख्यात प्रवीण तोगड़िया का नाम था। मोदी ने उन्हें पछाड़ कर मुख्यमंत्री का पद हासिल किया था। यह जानकारी अक्सर दोहराई जाती है कि मोदी की कट्टरता से वाकिफ उदार’ वाजेपयी ने आरएसएस-भाजपा को आगाह किया था। साथ ही यह कि गुजरात कांड के मौके पर वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म निभाने की नसीहत दी थी। लेकिन होने वही दिया जो हुआ। आरएसएस की उदारता’ की बस इतनी ही सिफत है।   
      आरएसएस यह जानता है कि मनमोहन सिंह के बाद देश के पूंजीपतियों की पहली पसंद नरेंद्र मोदी हैं। खुद मनमोहन सिंह के वे चहेते हैं। नरेंद्र मोदी को भी अपनी हिंदुत्ववादी हुंकार के साथ सबसे ज्यादा भरोसा पूंजीपतियों का है। वे पूंजीपतियों के बल पर इठलाते हैं। पूंजी के पैरोकार इधर लगातार कह रहे हैं कि गुजरात-कांड को अब भुला देना चाहिए। उनका तर्क है इससे देश के विकास में बाधा पैदा हो रही है। यानी मोदी ने गुजरात को विकास का मरकज बना दिया है। अब उन्हें देश के विकास की बागडोर सौंप देनी चाहिए। विदेशी पूंजी को मुनाफे से मतलब होता है। वह मुनाफा मनमोहन सिंह कराएं या मोदीइससे विदेशी पूंजी को सरोकार नहीं है। इसलिए हो सकता है मोदी को अडवाणी जैसा लंबा इंतजार न करना पड़े। दरअसलयह खुद नरेंद्र मोदी के हक में है कि वे इस बार अडवाणी को प्रधानमंत्री  के उम्मीदवार के रूप में आगे रहने दें। वे रहने भी देंगे। फिलहाल जो फूं-फां वे कर रहे हैंवह भविष्य के कतिपय दूसरे दावेदारों को दूर रखने के लिए है।(हम यहाँ स्वीकारते हैं कि उस समय आरएसएस की तरफ से अडवाणी की उम्मीदवारी को लेकर हमारा आकलन गलत निकला। मोदी के लिए कारपोरेट घरानों का पूर्ण समर्थन को देख कर उसने अडवाणी को तुरंत ड्राप कर दिया।)

Monday, June 12, 2017

जमीन लेंगे ... और जान भी- डॉ प्रेम सिंह

(किसानों की किस्मत में गोलियां उसी दिन तय हो गई थी जब उदारीकरण की आड़ में प्राकृतिक संसाधनों की लूट तय हो गई थी। अंग्रेज ज़मीन छीनते थे तो हम कहते थे ज़मीन नहीं देंगे भले जान दे देंगे। आज की सरकारें कह रही है ज़मीन भी लेंगे और जान भी लेंगे। आज के दौर में जब तमाम बुद्धिजीवियों के होंठ सिले हुए हैं, उनके भी जो कांग्रेसी राज में मलाईदार पदों पर बैठे थे। ऐसे में डॉ प्रेम सिंह की तरह कुछ लोग ही हैं जो पहले भी डंके की चोट पर सच लिख पढ़ रहे थे और अब भी सच लिख पढ़ रहे हैं। यह लेख 2009 का है. आपके पढ़ने के लिए फिर से

दिया जा रहा है.) 
                 जमीन की जंग
                खेतजंगलनदी-घाटीपठारपहाड़समुद्र के गहरे किनारे - हर जगह जमीन की अंतहीन जंग छिड़ी है। यह जंग जमीन पर बसने और उसे हथियाने वालों के बीच उतनी नहीं हैजितनी जमीन हथियाने वालों के बीच है। जमीन हथियाने वालों में छोटे-बड़े बिल्डिरों से लेकर देशी-विदेशी बहुराष्टीय कंपनियां शामिल हैं। भारत की सरकारें उनके दलाल की भूमिका निभाती देखी जा सकती हैं। वे बहुराष्टीय कंपनियों के लिए सस्ते दामों पर जमीन का अधिग्रहण करती हैं और प्रतिरोध करने वाले किसानों-आदिवासियों को ठिकाने लगाती हैं। ठिकाने वे किसानों-आदिवासियों के साथ जुटने वाले जनांदालनकारियों/सरोकारधर्मी नागरिकों को भी लगाती हैं। नवउदारवाद की शुरुआत से ही सभी सरकारें जनहित’ का यह काम तेजी और मुस्तैदी से कर रही हैं। हम जमीन के अधिग्रहण या खरीदी को हथियाना इसलिए कहते हैं कि देश में लोकतंत्र होने के बावजूद जिनकी जमीन है उन्हेंपहली छोड़िएबराबर की पार्टी भी नहीं माना जाता। उनसे पूछा तक नहीं जाता। सरकारें जो तय कर देती हैंवही उन्हें मंजूर करना पड़ता है।
                अंग्रेजों ने 1894 में भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था जो आज भी चलता है। उस कानून के तहत सरकारें जनहित में किसी भी किसान या गांव की जमीन का अधिग्रहण कर सकती हैं। नवउदारवादी दौर में इस कानून के इस्तेमाल में तेजी आई है। विशेष आर्थिक जोन (सेज) कानून उसी उपनिवेशवादी कानून का विस्तार है। 2005 में बना और 2006 व 2007 में संशोधित हुआ यह कानून एक ट्रेंड सैटर’ है। चीन के 6विशेष आर्थिक क्षेत्रों का हवाला देते हुए जिस तरह से सेज के नाम पर जमीन की लूट-मार मची (2009 के मध्य तक 578 सेज स्वीकृत हुए हैं)उसे देखकर लगता है भारत में सेज-युग’ आ गया है।
                यह हकीकत बहुत बार बताई जा चुकी है कि सेज पूंजीपतियों के मुनाफे के विशेष क्षेत्र हैं जहां भारतीय संविधान और कानून लागू नहीं होते। सेज इस सच्चाई का सीध सबूत हैं कि भारत की सरकारों के लिए जनहित का अर्थ पूंजीपतियों का हित बन गया है। इसी अर्थ में हमने सेज को टेंड सैटर’ कहा है। तर्क दिया गया है कि सेज को अवंटित जमीन भारत की कुल कृषि योग्य भूमि का एक निहायत छोटा हिस्सा है। सवाल यह नहीं है कि सेज के हवाले की गई जमीन कितनी हैसवाल सरकारों और पूंजीपतियों की नीयत का है। यह नीयत भरने वाली है।
                सेज की आलोचना और विरोध करने वाले लोगों की आवाज सरकारों के संवेदनहीन रवैये के आगे मंद पड़ गई है। दरअसलसरकारों का यह रवैया बन गया है कि पूंजीपतियों के हित का काम कर गुजरो,कुछ दिन हो-हल्ला होगाफिर विरोध का नया मुद्दा आ जाएगा और पिछला पीछे छूट जाएगा। इसी रवैये के तहत सरकारें पिछले बीस सालों में एक के बाद एक जन-विरोधी देश-विरोधी फैसले लेती और उनके विरोध की अनदेखी करती गई हैं। नवउदारवादी दौर का यह इतिहास पढ़ना चाहें तो वह अभी हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के परचोंपुस्तिकाओं और लघु पत्रिकाओं में दर्ज है। विद्वानों के लेखन का विषय वह अभी नहीं बना है। विद्वानों के सामने शोध के बहुत-से नवउदारवाद-सम्मत विषय हैंजिनमें एक औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ संघर्ष करने वालों के चरित्र और चिंतन में कीड़े निकालना भी है।
                सेज पूंजीवादी साम्राज्यवाद के तरकस से निकला एक और तीर है जिसे देश में पूंजीवादी साम्राज्यवाद के एजेंटों ने भारत माता की छाती बेधने के लिए चलाया है। देश की संप्रभुता और जनता के खून के प्यासे ये एजेंट राजनीतिनौकरशाहीऔर पूंजीपतियों से लेकर बौद्धिक हलकों तक पैठे हुए हैं। एक ताजा उदाहरण लें। देश में आलू के बाद उत्पादन में दूसरा स्थान रखने वाले बैंगन को लेकर बहस चल रही थी कि देश में बीटी बैंगन के उत्पादन की स्वीकृति दी जाए या नहीं। देश में कई नागरिक और जनांदोलनकारी संगठन इसका विरोध कर रहे थे। उन्होंने अपना विरोध बड़ी संख्या में नागरिकों के हस्ताक्षरों समेत सरकार के सभी महत्वपूर्ण पदाधिकारियों तक पहुंचा दिया था।
                आप जानते हैं इससे पहले बीटी कॉटन के उत्पादन की स्वीकृति मिली थी। महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में सबसे ज्यादा किसानों की आत्महत्या के पीछे एक प्रमुख कारण बीटी कॉटन की खेती में लगने वाला घाटा माना गया। उसकी काट के लिए बीज का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीच्यूट (आईएफपीआरआई) नाम का अमेरिकी थिंकटैंक’ भारत भेजा। उसने यह सिद्धकिया कि आत्महत्या के कारणों में बीटी बॉटन की खेती का घाटा नहीं है। 
                कपास इंसान के खाने के काम नहीं आती। अनाज और सब्जियां जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों से उगाना अप्राकृतिक लिहाजा असुरक्षित है। हालांकि,समस्त विरोध के बावजूद मुनाफाखोर कंपनियों के सामने पेश नहीं पड़ती है। क्योंकि देश के कर्णधारों के साथ उनका नेक्सस’ बना हुआ है। इस जानी-मानी सच्चाई की जाने-माने मोलेक्युलर बायोलॉजिस्ट डॉ. पीएम भार्गव ने हाल में एक बार फिर पुष्टि की है। डॉ. भागर्व जीएम फूड की स्वीकृति के लिए बनी जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) में सुप्रीम कोर्ट के नुमाइंदे थे। कमेटी ने डॉ. भागर्व के विरोध के बावजूद बीटी बैंगन के उत्पादन की स्वीकृति दे दी है। डॉ. भागर्व  कहते हैं देश के नेताओंप्रशासकों,वैज्ञानिकोंउद्योगपतियों का बहुराष्टीय कंपनियों के साथ नेक्सस’ बना हुआ है। जीईएसी की स्वीकृति भारत में बैंगन की फसल पर एकाधिकार करने के बहुराष्ट्रीय कंपनियों के षड़यंत्र का नतीजा है। उन्होंने इस स्वीकृति को देश पर आने वाली सबसे बड़ी आपदाओं में माना है।
                देश के कृषिमंत्री कहते हैं कमेटी का निर्णय अंतिम हैंसरकार की उसमें कोई भूमिका नहीं है। वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश कहते हैं सरकार का यह अधिकारबल्कि जिम्मेदारी है कि वह जनता की सुरक्षा के मामले में कमेटी की अनुशंसाओं पर अपना स्वतंत्र निर्णय ले। हम जानते हैं सरकार का वह निर्णय कमेटी का निर्णय बदलने वाला नहीं होगा। इस मामले में होगा वही जो कंपनियां चाहती हैं। मंत्रियों का आपसी विवाद वास्तविक विरोध से ध्यान भटकाने के लिए हो सकता है। हम चाहते हैं ऐसा न होलेकिन अभी तक के अनुभव को देखते हुए जयराम रमेश के वक्तव्य के पीछे अपना हिस्सा’ सुनिश्चित करना भी हो सकता है। कृषिमंत्री शरद पवार राष्ट्रवादी कांग्रेस के हैं,जयराम रमेश कांग्रेस के। भोपाल गैस कांड के अनुभव से हम अच्छी तरह जानते हैं कि डॉ. भार्गव जैसे वैज्ञानिकों/विशेषज्ञों का बाद में पता नहीं चलता। या तो वे सरकार की राय के हो जाते हैं या हटा दिए जाते हैं।
                भारत माता की छाती पर जमे ये पीपल,जैसा कि हमने मनमोहन सिंह के संदर्भ में पहले कहा हैसाम्राज्यवाद की संतान हैं। इनका बीज औपनिवेशिक दौर में पड़ा था जो भूमंडलीकरण के दौर में माकूल खाद-पानी पाकर लहलहा उठा है। आज यह अतिशयोक्ति लग सकती हैलेकिन जल्दी ही एक दिन ऐसा आ सकता है जब साम्राज्यवाद की ये संतानें कहें कि 1857 तो गलत हुआ ही, 1947 उससे भी ज्यादा गलत हुआबीच में विभिन्न धाराओं के स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा स्वतंत्रतास्वराजसमता और स्वावलंबन की पुकार न लगाई होती तो भारत को विकसित और महाशक्ति होने के लिए 2020 तक इंतजार नहीं करना पड़ता। आपको याद होगा यह तारीख पूर्व वैज्ञानिक’ राष्टपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने तय की थी। हालांकि अवकाश प्राप्ति के अवसर पर उन्हें यह तारीख नजदीक खिसकती नजर आई। उन्होंने आतुर भाव से कहा, ‘भारत 2020 से पहले भी महाशक्ति हो सकता है।’ 
                सेज की तरफ लौटें। देश के कई भागों में किसानों के प्रतिरोध और सिंगुर और नंदीग्राम में उनकी हत्याओं के बाद जो कुछ नेता किसानों के हित’ में सेज कानून 2005 में कुछ सुधार करने का सुझाव दे रहे थे,वे उस समय भी मौजूद थे जब किसानों को बरबाद और देशी-विदेशी पूंजीपतियों को मालामाल करने वाला यह कानून बना था। सुधारवादियों’ से स्वर मिलाते हुए सोनिया गांधी का कहना कि सेज के लिए खेती की जमीन नहीं दी जानी चाहिएभारतीय रिजर्व बैंक का बैंकों को यह निर्देश देना कि सेज विकसित करने वाली कंपनियों को उसी आधर पर कर्ज दिया जाए जिस आधार पर रीयल इस्टेट का धंधा करने वालों को दिया जाता हैसेज को टैक्स स्वर्ग’ बनाने के मामले में उस समय के वित्तमंत्री पी चिदंबरम की शुरुआती आपत्ति आदि से सरकार के भीतर तालमेल के अभाव का भले ही पता चलता होकानून को लेकर असहमति किसी की नहीं थी। किसानों के विरोध के बाद जिस तरह से सभी राजनैतिक पार्टियों की ओर से कानून में सुधार और संशोधन की आवाज उठीउससे एकबारगी लगा गोया यह कानून संसद ने नहीं कंपनियों ने बनाया है!
                सेज के लिए कर्ज और टैक्स के लिए क्या नीति होबंजर भूमि दी जाए या उपजाऊजमीन लेने से पहले किसानों की अनुमति ली जाए या नहीं;मुआवजे की दर और पुनर्वास की नीति क्या हो;प्रभावित किसानों को रोजगार दिया जाए या सहभागिता - ये जो सारे मुद्दे उठाए गएउन पर जो बहस चली और उनका जो भी समाधान निकला अथवा नहीं निकलासच्चाई यही रही कि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी विकास में किसानों-आदिवासियों को समाप्त होना है। किसानों-आदिवासियों की समाप्ति का मतलब है कारीगरों और छोटे दुकानदारों का भी समाप्त होना।
               
                पूंजी की रंगभूमि
                देश के नगर-महानगर भी जमीन की जंग से बाहर नहीं हैं। विदेशी हो या निजीमुनाफाखोर पूंजी का अड्डा पूरी शानो-शौकत के साथ शहरों में जमता है। प्रेमचंद के उपन्यास का शार्षक उधार लें तो कह सकते हैं नगर-महानगर पूंजी की रंगभूमि’ हैं। यहां जमीन हथियाने के लिए गांव तो गंदी बस्ती में तब्दील किए ही जाते रहे हैंगंदी बस्तियों की जमीन हथियाने के लिए दंगों तक का सहारा लिया जाता है। झुग्गी-झोंपड़ियों में आग लगा दी जाती है। शहरों में जमीन का चक्कर गरीबों को ही नहींअमीरों को भी नचा रहा है। विभिन्न महकमों की या स्वतंत्र समूह आवास सोसायटियों की मार्फत सरकार से सस्ती जमीनें लेकर बनीं या खुद सरकारों द्वारा बनाई गई कॉलोनियों के कम अमीर वाशिदों को नए ज्यादा अमीर खरीदार और बिल्डर भारी-भरकम रकम देकर विस्थापित’ कर रहे हैं। यह सिलसिला शहर के विकास के छोर तक चलता चला जाता है। 
                अब जमीन हथियाने के लिए सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं या सार्वजनिक-निजी भागीदारी के नाम पर उन्हें निजी पूंजी के हवाले किया जा रहा है। निजी स्कूलों के लिए जमीन का टोटा न कभी पहले था,न अब है। नए खुलने वाले निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए जमीन शहरों में ही चाहिए। उन्हें मिल भी रही है। कमी पड़ती है तो आस-पास के गांवों तक शहर पहुंचा दिया जाता है। उदाहरण के लिए,दिल्ली की उत्तरी सीमा पर हरियाणा के 6 गांवों की उपजाऊ जमीन जबरन अधिग्रहित करके राजीव गांधी एजुकेशन सिटी बनाया जा रहा है। जमीन हरियाणा सरकार ने जनहित’ के नाम पर ली हैलेकिन एजुकेशन सिटी की योजना से लेकर निर्माण तक सारा काम विदेशी संस्थाएं/कंपनियां कर रही हैं। अपनी जमीन के अधिग्रहण का विरोध करने वाले या ज्यादा मुआवजा चाहने वाले किसानों को अदालत से भी राहत नहीं मिली।
                गांव के किसान व्यापार नहीं कर पाते। उनका मीजान एक-दो छोटी-मोटी नौकरी और जम कर खेती करने में ही बैठता है। हर जगह छिड़ी जमीन की जंग के चलते अब यह भी आसान नहीं रहा कि किसी दूसरे इलाके में जाकर जमीन खरीद ली जाए और खेती की जाए। मुआवजे का पैसा बरबाद होने में देर नहीं लगती। कोठियां बन जाएंगीकारें आ जाएंगीदुकानें खुल जाएंगी। गांव कुछ सालों में गंदी बस्तियों में तब्दील हो जाएंगे। पिछले अंक में हमने आपको बताया था पचास-सौ साल बाद साहब लोग’ कहेंगे इन गंदी बस्तियों को हटा कर कहीं दूर बसाओ। मोतीलाल नेहरू स्पोर्ट्स स्कूल भी कभी न कभी वहां से हटा दिया जाएगा। राजीव गांधी एजुकेशन सिटी में एनआरआई और दिल्ली समेत अन्य नगरों के नवधनाढ्य वर्ग के बच्चे शिक्षा पाएंगे। यह जरूरी है क्योंकि वैसी शिक्षा विदेशों में बहुत मंहगी पड़ती है। अब तो उसमें जान-जोखिम भी हो गया है। इन 6 गावों अथवा हरियाणा के अन्य गांवों के कुछ बच्चे वहां दाखिला पा सकते हैं,लेकिन वे फिर गांव के नहीं रह कर कंपनियों के बच्चे बन जाएंगे। पूरे देश में देहात के साथ यही कहानी चल रही है।
                शहरों में स्थित सरकारी कॉलिजों और विश्वविद्यालयों की जमीन पर अभी सरकारी स्कूलों जैसा हमला नहीं है। उन्हें बंद करके सीधे या पार्टनरशिप में निजी/विदेशी पूंजी का अड्डा बनाना अभी कठिन होता है। लेकिन वहां भी रास्ता निकाल लिया गया है। उच्च शिक्षा की सरकारी संस्थाओं में तेजी से नवउदारवादी अजेंडे की घुसपैठ बनाई जा रही है। यानी उन्हीं विषयों को शिक्षा बताया और बढ़ाया जा रहा है जो बाजार में बिकते हैं। यहां एक उदाहरण आपको देना चाहेंगे। कुछ साल पहले देश के मूर्द्धन्य दिल्ली विश्वविद्यालय की इमारतों का सौंदर्यीकरण करने के लिए इंग्लैंड से बड़ी मात्रा में विदेशी धन आया था। उस धन से बने कला संकाय और केंद्रीय संदर्भ पुस्तकालय के प्रवेशद्वार पर यूनीवर्सिटी प्लाजा’ लिखा गया है। उसी समय विद्यार्थी युवजन सभा ;वियुसद्ध के एक सदस्य राजेश रौशन ने प्लाजा के सभी शब्दकोशीय अर्थ देकर कुलपति को पत्र लिखा था कि शिक्षा-स्थल के लिए प्लाजा शब्द का उपयोग गलत हैलिहाजा उसे हटाया जाए। वह पत्र दि हिंदू’ अखबार में भी प्रकाशित हुआ था। लेकिन आज तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। 
                आमतौर पर जब किसानों की जमीन हथियाने का विरोध किया जाता है तो उस विशेष कानून में खामियां निकाली जाती हैंजिसके तहत सरकारें जमीन हथियाती हैं। ज्यादातर तो उचित मुआवजा देने और सही से पुनर्वास करने की मांग की जाती है। आदिवासी अलबत्ता जमीन न देने के लिए अड़ते हैं। उनके संघर्ष में जनांदोलनकारी संगठन जुटते हैं। नक्सलवादी-माओवादी आंदोलन भी जनांदोलन है जो संघर्ष का हिंसक रास्ता अपनाता है। किसानों का संघर्ष ज्यादातर ज्यादा मुआवजा पाने के लिए होता है। किसानों के साथ नेता होते हैं। ऐसे नेता जो फिलहाल सत्ता में नहीं होते। सत्ता बदलने पर किसानों के हिमायती नेता भी अक्सर बदल जाते हैं।
                मांगें न आदिवासियों की पूरी होती हैंन किसानों की। क्योंकि मूलभूत सच्चाई यह है कि किसानों-आदिवासियों के लिए इस व्यवस्था में जगह नहीं है। यानी किसान-आदिवासी रहते कोई जगह नहीं है। हम उनके विकास के जटिल प्रश्न को भूल नहीं रहे हैं। लेकिन विकास के प्रचलित मॉडल में उनकी आहुति ही होनी है। जब सिंगूर और नंदीग्राम के किसानों का संघर्ष चल रहा थापूंजीवादी विकास की शराब पीकर मतवाले हुए बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपनी जान में लाख टके का सवाल दागा - क्या किसान का बेटा किसान ही रहेगा?’ पलट कर उनसे पूछा जा सकता है - क्या आप किसान के बेटों को टाटा-अंबानी बनाने जा रहे हैंऐसा नहीं है भविष्य में खेती नहीं होगी। कारपोरेट खेती होगीजिसे मुनाफे के लिए कारपोरेट जगत कराएगा। सेज आने के पहले कारपोरेट खेती का फरमान जारी हो चुका था। कहने का आशय है कि किसानों-आदिवासियों की जमीन और जिंदगी से बेदखली कोई फुटकर घटना नहीं है। यह आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का अविभाज्य कर्तव्य’ है। 
                बड़ी पूंजी और उच्च तकनीकी पर आधरित उपभोक्तावादी सभ्यता कायम करना पूंजीवादी साम्राज्यवाद का ध्येय रहा है। उसे जलजंगलजमीन,पहाड़जैविक संपदा - सब चाहिए। उसकी राक्षसी भूख अनंत है। लिहाजाप्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और लूटपाट होना लाजिमी है। इस रास्ते पर उसने औपनिवेशिक दौर में तीन-चौथाई दुनिया के संसाधनों को लूटाआबादियों का सफाया किया और कई विशाल भूभागों पर कब्जा कर लिया। यह सब करने के लिए उसके पास मानव प्रगति के इतिहास में क्रांतिकारी होने का प्रमाणपत्र थाजो केवल पूंजीवादी विचारकों ने नहींसमाजवादी चिंतक कार्ल मार्क्स ने भी दिया था। उसी प्रमाणपत्र के बल पर पूंजीवादी साम्राज्यवाद आज तक उन आबादियों का सफाया करने में लगा हैजो उसके विकास में आड़े आती हैं। खेती-किसानीकारीगरीखुदरा दुकानदारी आदि में लगी आबादियां ऐसी ही हैं। पूंजीवादी साम्राज्यवाद को पूरी दुनिया में कायम होना हैतो दुनिया में बची इन आबादियों का सफाया होना लाजिमी है। यह उनकी नियति है। मार्क्स ने भी भोंदूऔर प्रतिक्रियावादी’ किसानों की इस नियति को देख लिया था।
                उपनिवेशवादी दौर के बाद स्वतंत्र हुए देशों में विकास का मॉडल पूंजीवादी ही रहाइसलिए स्वतंत्रात के बावजूद उनमें आंतरिक उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया चलती रही। विकास का मॉडल वही होने के चलते समाजवादी व्यवस्था वाले देशों में भी स्थिति ज्यादा भिन्न नहीं रही। लेकिन स्वतंत्रता संघर्ष की कुर्बानियों और मूल्यों के चलते आंतरिक उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया धीमी गति से चलती थी। जैसे ही भूमंडलीकरण के रास्ते नवसाम्राज्यवाद की वापसी और साम्राज्यवाद की संतानों की प्रतिष्ठा हुई,इन अभागी आबादियों के विस्थापन और विनाश की प्रक्रिया में एक बार फिर तेजी आ गई है।
1997 से अब तक अब करीब दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का आंकड़ा है कि 2008 तक199,132 किसानों ने आत्महत्या की है। गैर-सरकारी हवाले यह संख्या कहीं ज्यादा मानते हैं। वह हो भी सकती है। कल्पना कीजिए अगर देश में 100 पूंजीपति आत्महत्या कर लेते तो क्या कोहराम मचतालेकिन इतने बड़े पैमाने पर किसानों की आत्महत्या और आदिवासियों के विस्थापन के साथ व्यवस्था का काम बखूबी चलता रहता है। किसानों पर क्या कर्ज होता होगा जो पूंजीपतियों पर होता है! लेकिन वे कभी आत्महत्या नहीं करते। यह उनकी अपनी व्यवस्था है। सरकार उन्हें कर्ज माफी के साथ और कर्ज देती है। वे भव्य चैंबरों में सीधे प्रधनमंत्री और वित्तमंत्री से मिलते हैं। कृषिमंत्री और कृषि वैज्ञानिक उनकी मदद और हाजिरी में होते हैं। किसान-आदिवासी कहीं प्रतिरोध करते हैं तो पुलिस बल भेज कर उन पर गोली चलवाई जाती है। कलिंगनगर-काशीपुर से लेकर सिंगुर-नंदीग्राम,दांतेवाड़ादिल्ली की जड़ में नोएडा तक किसानों-आदिवासियों की जान और जमीन दोनों ली जा रही हैं। देश की सभी राजनैतिक पार्टियोंउनके बुद्धिजीवियों,यहां तक की देश की सर्वोच्च अदालत को यह मंजूर है। इस व्यवस्था में किसानों को आत्महत्या करने की अनुमति हैविरोध करने की नहीं!  

                जान के मायने
                पिछले करीब पंद्रह सालों से देश-भर में नारा गूंजता है - जान दे देंगे जमीन नहीं देंगे। हम लोग मध्य प्रदेश में संघर्ष के दौरान एक जोरदार गीत गाते हैं। गीत का मुखड़ा है - जान जावे तो जाएपर हक्क न मेरा जाए। जाहिर हैजान देने का नारा इसलिए दिया जाता है कि अपनी सरकार हैजान की कीमत पर जमीन भला क्यों लेगीअंग्रेजी हुकूमत तो है नहींकि नरम नहीं पड़ जाएगीलेकिन सरकारें अपनी रह नहीं गई हैं। वे हक के साथ जान भी लेने में नहीं हिचकतीं। आप झट से कह सकते हैं कि तब तो नक्सलवादी ठीक ही हिंसा का रास्ता अख्तियार किए हुए हैं। क्रांति न हो,दो-चार को मार कर मरते हैं। महाशक्ति’ भारत केईमानदार’ प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह, ‘त्याग की देवीसोनिया गांधी और उनके सिपहसालार ठीक यही चाहते हैं।
                नक्सलवाद भारत की सबसे विकट समस्या नहीं हैयह बच्चा भी बता देगा। लेकिन प्रधानमंत्री उसे बार-बार देश की सबसे विकट समस्या बताते हैं। यह दरअसल हकीकत नहींउनकी मंशा है। हिंसक व्यवस्था के एजेंट को हिंसक प्रतिरोध चाहिए। ताकि सेना भेज कर विकास विरोधियों’ की हत्या के अभियान को तेज किया सके। हर पार्टी के विकास पुरुष’ उनके साथ हैं। शायद ही किसी ने नक्सलवादियों पर सेना से हमले करने के उनके मंसूबे का गंभीर विरोध किया हो। दरअसलजल-जंगल-जमीन के हक की लड़ाई लड़ने वाले सभी संगठनों और लोगों को मनमोहन सिंह मंडली जल्दी से जल्दी निपटा देना चाहती है। ध्यान कर लेंउनके इस मंसूबे में देश का लोकतंत्र भी निपट सकता है!
                जरूरी नहीं कि सभी किसानआदिवासी,छोटे दुकानदार आत्महत्या कर लें या प्रतिरोध करते हुए मारे जाएं। भारत की विशाल आबादी के मद्देनजर यह असंभव है। आधुनिक सभ्यता में खेती एक अधम पेशा हैवह भी घाटे का। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि किसान घाटे की खेती से निजात पाने या आधुनिक उपभोक्तावाद की चकाचौंध में खुद जमीनें बेचने का फैसला कर रहे हैं। आदिवासीदलित और अति पिछड़ी जातियां इस व्यवस्था को अपनी विकास परियोजनाओं में हाड़-तोड़ मेहनत करने के लिए जिंदा चाहिए। उनका अपने घरों और फिर परियोजना दर परियोजना से मुसलसल विस्थापन  होते रहना है। इस तरह भारत की यह विशाल आबादी काफी बड़ी तादाद में लंबे समय तक जिंदा रहेगी। लेकिन उनके होने का कोई मोल या मीजान इस व्यवस्था में नहीं होगा। 
                मनुष्य की जान केवल शरीर नहीं होती। उसमें बहुत कुछ होता है। कुछ अच्छा होता हैकुछ बुरा होता है। अच्छाई क्या है यह जाननेउसे पानेकायम करनेऔर उतरोत्तर उन्नत करने का उद्यम मनुष्य करता है। उसी क्रम में बुराई की पहचान और परहेज का विवेक भी बनता चलता है। अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष चलता है। अच्छाई में कुछ बुराई समा जाती है,बुराई में कुछ अच्छाई। अलबत्ताऐसा माना जाता है कि संघर्ष के पीछे अच्छाई की प्रेरणा होती है, या होनी चाहिए; अच्छाई की जीत की इच्छा और इच्छा-शक्ति भी; ताकि हम निरे बुरे न बन जाएं। मनुष्य का यह सांस्कृतिक संघर्ष है जो चिरकाल से चला आया है। बुराई से निरंतर लड़ने के लिए मनुष्य/समाज का सख्तजान होना जरूरी होता है। अगर वह जमीन से,श्रम से जुड़ा हैतो सख्तजान होगा। जमीन से काट दिए जाने पर उसकी जान जाती रहेगी। किसानों-आदिवासियों की वही हालत है। जिंदा रहने पर भी वे बेजान हैं।  
                किसानों-आदिवासियों को सामंती संस्कृति का बुरा अवशेष माना जाता है। जबकि वे सामूहिकता और श्रम की संस्कृति की संतान हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि शोषणमूलक ठल्लू सामंती संस्कृति पूंजीवाद के साथ मिल कर बची रहती है। लेकिन सहयोगश्रम और प्रकृति से साहचर्य पर आधारित किसान-आदिवासी संस्कृति को विनष्ट और विकृत किया जाता है। ग्राम-विकास की बात हो तो आजादी के समय से ही रही है,लेकिन उसका अर्थ होता है गांव को शहर बनाना - गांव होने के पाप’ को मिटाना। हम यह नहीं कहते कि गांव आदर्श या निष्पाप उपस्थिति थे। लेकिन वे थे और बड़ी तादाद में थेतो ग्राम-विकास की गांव-केंद्रित योजनाएं बननी चाहिए थीं। यह लोकतंत्र का भी तकाजा था,समाजवाद का भी और धर्मनिरपेक्षता का भी। लेकिन एक अंधविश्वास की तरह मान लिया गया कि गांव गंदे होते हैं और वे सभी शहर बन जाएंगे। गांधी की बात बिल्कुल नहीं सुनी गई।
                अंबेडकर नेहरू की तरह गांवों को बुरा मानते थे। लेकिन उनका वैसा मानने का विशेष संदर्भ था। उन्होंने दलितों को सलाह दी थी कि वे जातिवाद के दंश और प्रताड़ना से बचने के लिए गांवों से शहर आकर बसें। दलितों के लिए यह बिल्कुल सही सलाह थी। लेकिन दलित लेखकों की आत्मकथाएं पढ़ कर पता चलता है कि शहरों में भी वे अछूत ही बने रहे। गांवों में रहने वाले दलित गांधी-अंबेडकर के समय से और ज्यादा अछूत बन गए हैं। शहर आकर बसने वाले दलित तक अब उनके पास  नहीं जाना चाहते।  
                गांव से उभरने वाली आवाज को दबा दिया गया। वह दमित होकर विकृत हुई और विध्वंसक भी। जिस देश में सरकारें सत्ता का खुला और भरपूर दुरुपयोग करती होंमाफिया अपनी सरकार चलाते हों,वहां खाप पंचायतें हत्या के फरमान जारी न करेंयह कैसे संभव हैखाप पंचायतों का युवक-युवतियों की हत्या का फैसला देना मध्ययुगीन बर्बरता का अवशेष नहींआधुनिकता का ही एक विकृत रूप है। करीब आठ लाख गांवों और छोटे कस्बों के देश को नगरीय सभ्यता में बदलने के अव्यावहारिक उद्यम का यही नतीजा होना था। और अव्यावहारिक बता दिया गया गांव-स्वराज की बात करने वाले गांधी को! दरअसल,सामंती संस्कृति वाया पूंजीवाद समाजवाद में प्रवेश कर जाती है। फिर तीनों की ताकत किसान-कारीगर-आदिवासी संस्कृति पर हमला बोलती है। अपनी मेहनत से थोड़े में गुजारे का आदर्श न सामंतवाद में थान पूंजीवाद में है। वैज्ञानिक समाजवाद में भी समानता का भौतिक लक्ष्य सबको सेठ-साहूकारों जैसा अमीर बनाना है। उसीसे समाजवादी नेताओंनौकरशाहों और बुद्धिजीवियों को अपने शानो-शौकत भरे जीवन की वैधता हासिल होती है।
                चर्चा को समेटें। बड़ी से बड़ी पूंजी और उन्नत से उन्नत तकनीकी भारत की एक अरब बीस करोड़ आबादी को विकसित’ नहीं बना सकती। जिस नौ-दस प्रतिशत विकास-दर का राग प्रधनमंत्री गाते नहीं थकतेउससे एक यूरोपीय देश के बराबर की आबादी का ही दोयम दर्जे का विकास हो सकता है। वही हो रहा है। बाकी सब अंधविश्वास है और अंधकार है। किसान-आदिवासी बच सकें और एक बेहतर जीवन-स्तर और जीवन-शैली के हकदार होंतो पूंजीवादी साम्राज्यवाद को खारिज कर उसका विकल्प तैयार करना होगा। ऐसा करना आसान हो सकता हैअगर आधुनिक बुद्धि यह स्वीकार करे कि पूंजीवाद मानव प्रगति का क्रांतिकारी चरण नहीं था। यह धारणा तर्कसम्मत नहीं हो सकती कि कोई चरण शुरू में क्रांतिकारी हो और बाद में प्रतिक्रियावादी-फासीवादी-साम्राज्यवादी बन जाए। जबकि उसने शुरू में ही अलग-अलग भूभागों में अनेक आबादियों का लगभग समूल नाश कर दिया और उनके समस्त संसाधनों पर कब्ज़ा जमा लिया।
                लेनिन समेत सभी कम्युनिस्ट विचारक साम्राज्यवाद को पूंजीवाद की उच्चतम अवस्था मानते हैं। लोहिया का कहना है कि पूंजीवाद का अस्तित्व बिना साम्राज्यवाद के संभव ही नहीं होता। उन्होंने अपने मशहूर लेख मार्क्सोत्तर अर्थशास्त्र’ में मार्क्स के पूंजीवाद के अध्ययन की एकांगिता का उल्लेख करते हुए बताया है कि उन्नीसवीं सदी के जिस पूंजीवाद को मार्क्स अपने अध्ययन का आधार बनाते हैंउसमें यूरोप द्वारा बाकी दुनिया की लूट की अनदेखी की गई है। पूंजीवाद के क्रांतिकारी होने और साथ ही श्रमआपसी सहकार और प्रकृति के साहचर्य से बनी किसान-आदिवासी जन-संस्कृति को सामंती मानने की भ्रांति का निवारण जब तक नहीं होतातब तक किसानों-आदिवासियों की जमीन और जान दोनों ली जाती रहेंगी।

                दिसंबर 2009

   पुनश्च : मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पद ग्रहण करने पर सबसे पहले उपनिवेशकालीन 'भूमि अधिग्रहण कानून' में किसानों के हित में हुए कतिपय प्रावधानों को निरस्त करने के लिए अध्यादेश लेकर आए। हमने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कारपोरेट का रोबो’ कहा थानरेंद्र मोदी को कारपोरेट का डिजिटल टॉय’ कहा जा सकता है।