Wednesday, July 5, 2017

रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के निहितार्थ-प्रेम सिंह


राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का अगला राष्ट्रपति बनना तय है. राष्ट्रपति चुनाव को लेकर होने वाली चर्चा मुख्यत: भाजपा द्वारा जाति-कार्ड खेलने के इर्द-गिर्द सिमटी है. भाजपा के जाति-कार्ड की काट में कांग्रेस की तरफ से मीरा कुमार को उम्मीदवार बनाये जाने पर चर्चा का रुख इतना ही बदला कि किसका दलित उम्मीदवार ज्यादा अच्छा/असली दलित है? एक नुक्ता यह निकला गया है कि रामनाथ कोविंद आरएसएस के समर्पित स्वयंसेवक हैं. यह आपत्ति बेमानी है. भाजपा का कौन-सा नेता है, या हो सकता है, जो समर्पित स्वयंसेवक न हो?

चर्चा में आरएसएस/भाजपा द्वार रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाने के वास्तविक लक्ष्य की तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है. इस टिप्पणी में हमने उसी पर कुछ रोशनी डालने की कोशिश की है. आरएसएस ने अम्बेडकर को हस्तगत करने का फैसला सोची-समझी रणनीति के तहत किया था. याद किया जा सकता है कि 'उदार' वाजपेयी तक पल्ली टोपी क्या, पूरा हरा साफा बांध कर वोट के लिए मुसलमानों को रिझाने का काम किया जाता था. भले ही फिर उन्हें धमकाया भी जाता था कि भाजपा मुसलामानों के वोट के बगैर भी सरकार बना सकती है. कट्टर अडवाणी ने भी डर कर वही रास्ता अपनाना मुनासिब समझा और पाकिस्तान जाकर जिन्ना की मजार पर फूल चढ़ा आए. आरएसएस ने आडवाणी को भारत लौटते ही बाहर का रास्ता दिखा दिया. तब से वे आज तक वनवास झेल रहे हैं.
उसके बाद आरएसएस ने नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अपना काम तेजी से शुरु कर दिया. वह नरेन्द्र मोदी जिसने गुजरात की प्रयोगशाला में वह कारनामा कर दिखाया जिसकी आशंका वाजपेयी को उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने के फैसले पर हुई थी. नवउदारवादी नीतियों ने वह ज़रखेज ज़मीन पहले से तैयार कर दी थी, जिस पर गोधरा और उसके बाद पूरा गुजरात-कांड हुआ; नरेन्द्र मोदी राज्य सत्ता के बूते पर सारे सबूत मिटाने में कामयाब हुए; और अब, जो कतिपय आरोपी सजा पा गए थे, उन्हें रिहा किया जा रहा है.
अगर भागवत-मोदी-शाह की भाजपा को चुनाव जीतने के लिए मुसलमानों का वोट नहीं चाहिए, तो ज़ाहिर है, उसकी पूर्ति के लिए भारतीय समाज के एक बड़े समुदाय का वोट सुनिश्चित करना अनिवार्य है. वह समुदाय दलित ही हो सकता है. भागवत-मोदी-अमिताशाह के अति-संक्षिप्त काल में आरएसएस-भाजपा को इस दिशा में अच्छी कामयाबी मिली है. उसने अन्य पिछड़ी जातियों, यहाँ तक की आदिवासियों को अपने पक्ष में गोलबंद कर लिया है. कालांतर में उसे इसमें और कामयाबी मिलती जाएगी. चुनाव जीतने का स्थायी इंतज़ाम तो होगा ही; संविधान को तोड़ने-मरोड़ने में सुविधा होगी. 2019 की जीत के बाद जब संविधान से धर्मनिरपेक्षता की मौजूदा संकल्पना को आरएसएस की परिकल्पना के हिंदू-राष्ट्र की संकल्पना से प्रतिस्थापित किया जायेगा तो उस पर हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति भवन में एक दलित राष्ट्रपति तत्परता से मौजूद रहेंगे. अडवाणी शायद वह काम नहीं कर पाते. मोहन भागवत को राष्ट्रपति भवन में लाकर यह काम कराने की सांप्रदायिक सीनाजोरी की हिम्मत मोदी-शाह की जोड़ी को पता नहीं किस अंदेशे के चलते नहीं हुई. वह काम आगे के लिए छोड़ दिया गया है.
एक दलित वह काम करेगा तो कहा जा सकता है कि मोदी के 'नए भारत' के दलित ने बाबा साहब का ही काम आगे बढ़ाया है, जिसे कांग्रेस पिछले 70 सालों से रोके बैठी थी! इस तरह आरएसएस/भाजपा बाबा साहब के हिंदू धर्म को छोड़ने के 'गलत' फैसले को दुरुस्त करेगें. इसके साथ दलित अस्मिता विमर्श के तहत हिंदू धर्म के खिलाफ बोलने वालों को भी सबक सिखाया जा सकेगा. वैसे भी, दलित और पिछड़े 'ज्ञानियों' से निपटने में आरएसएस/भाजपा को ज्यादा कठिनाई नहीं होने जा रही है, क्योंकि जिस तरह हिंदू-राष्ट्र नवउदारवाद के पेट में फलता-फूलता है, ज्यादातर दलित और पिछड़े बुद्धिजीवी नवउदारवादी व्यवस्था के भीतर ही अपनी सत्ता कायम करने का संघर्ष करते हैं.
यह योजना परवान चढ़ती है तो लोकतंत्र से बेदखल मुसलमानों को देश से बेदखल करने के आरएसएस/भाजपा के लंबे समय से प्रतीक्षित एजेंडे की तरफ बढ़ा जाएगा. इसकी एक रिहर्सल चार साल पहले उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फर नगर इलाके में देखने को मिली. त्रिपुरा के राज्यपाल ने हाल में ट्वीट किया है कि श्यामाप्रसाद मुख़र्जी ने हिंदू-मुस्लिम समस्या का समाधान गृहयुद्ध बताया है. मुसलमान-मुक्त भारत बनाने के लिए गृहयुद्ध अभी असंभव लग सकता है. लेकिन एशिया में ही अफगानिस्तान, इराक और सीरिया में कई सालों से गृहयुद्ध चल रहा है. लाखों लोग मारे जा रहे हैं. ड्रोन से लेकर मदर बम तक - हमलों में लाखों बच्चों का जीवन तबाह हो चुका है. मानव इतिहास के भीषणतम गृहयुद्धों के फुटेज देख कर एक पीढ़ी तैयार हो रही है. जिस तरह से पढ़े-लिखे संभ्रांत हिंदू मुसलमानों के खिलाफ घृणा के उन्माद का शिकार हैं, लगता नहीं उन्होंने विभाजन की त्रासदी से कोई सबक सीखा है. गृहयुद्ध के विपक्ष में बाल-बच्चों और परिजनों की चिंता जैसी भावुक बातें नहीं चल पाएंगी. 'हिंदू-राष्ट्र' के लिए क्या मोदी ने अपने परिवार, यहाँ तक कि अपनी पत्नी को नहीं छोड़ दिया?
नवसाम्राज्यवादी गुलामी का शिकंजा जैसे-जैसे कसता जाएगा, मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ घृणा का उन्माद बढ़ता जायेगा. अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक समुदाय भी उस घृणा का शिकार होंगे. आधुनिक भारतीय तथा विश्व नागरिक नहीं हो पाने के खोखलेपन को आरएसएस/भाजपा के 'हिंदू-राष्ट्र' में हिंदू राष्ट्रपति, हिंदू प्रधानमंत्री, हिंदू सरकार, हिंदू विकास, हिंदू टेक्नोलोजी, हिंदू ज्ञान आदि से भरा जाएगा.
इस गहरे संकट की स्थति में नीतीश कुमार जैसे नेताओं का राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को समर्थन देने का फैसला कोई ख़ास मायना नहीं रखता है. नीतीश कुमार शुरू से ही परजीवी और अवसरवादी नेता रहे हैं. पहले से ही उनके आदर्श प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी हैं. वे कांग्रेस को दोष दे रहे हैं, क्योंकि समर्थन के पहले खुद को 2019 के लिए प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करवाना चाहते थे. वे बिहार के मुख्यमंत्री का पद तभी छोड़ना चाहते हैं, जब विपक्ष उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाए. वरना वे भाजपा के साथ अपना सम्बन्ध बना कर रखेंगे, ताकि लालू प्रसाद यादव के समर्थन वापस लेने की स्थिति में भाजपा की मदद से मुख्यमंत्री रहें या केंद्र में मंत्री रहें. केवल अपनी चलने की उनकी धर्मनिरपेक्ष सीनाजोरी पिछले दो दशकों से बदस्तूर चल रही है.
लेकिन नीतीश कुमार के आलोचकों की स्थिति उनसे बेहतर नहीं है. उदाहरण के लिए, अगर कांग्रेस राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री बनाने में कामयाब नहीं होती, तो सरकारी कम्युनिस्टों का आदर्श प्रधानमंत्री केजरीवाल है. यह धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और प्रगतिशीलता की राजनीति का काला कोलाज़ है. भारतीय समाज को इस कोलाज़ से बहार निकालने की अभी की युवा पीढ़ी की कितनी भारी जिम्मेदारी है!

पुनश्च:
इस माहौल से घबरा कर मुस्लिम सहित किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय का धार्मिक पहचान को मज़बूत बनाने का प्रयास सकारात्मक नतीज़ा नहीं दे सकता. आधुनिक नागरिक बोध को मज़बूत करना ज्यादा जरूरी है.


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