Thursday, March 5, 2009

धूमिल का सच

मुझसे कहा गया कि

संसद देश की धड़कन को

प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है

जनता को

जनता के विचारों का

नैतिक समर्पण है

लेकिन क्या यह सच है?

या यह सच है कि

अपने यहां संसद -तेली की वह घानी है

जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है

और यदि यह सच नहीं है

तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को

अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?

जिसने सत्य कह दिया है

हैउसका बुरा हाल क्यों है?

धूमिल

Saturday, February 28, 2009

कानून को इंतजार ?

कानून क्यों कर रहा है इंतजार
एक ख़बर मिली कि उड़ीसा के कंधमाल में हुई सांप्रदायिक हिंसा की जांच कर रहे जस्टिस पाणिग्रही इंतजार करते रहे , लेकिन कंधमाल में हुई सांप्रदायिक हिंसा का कोई चश्मदीद नहीं आया। जस्टिस पाणिग्रही कंधमाल के समीप खड़े थे। लेकिन कोई ऐसा नहीं मिला जो दंगे के खिलाफ बयान दे सके। कानून इंतजार करता रहा , और लोग अपने रोजमर्रा के काम में लगे रहे। वे लोग जिनके घर आतिशजनों ने फूंके हैं। वे लोग जिनके अपनों को मारा गया है। वे लोग जिनके उन बस्तियों को उजाड़ा गया , उन घरों को जलाया गया। जहां सदियों से वे भाईचारे के साथ रहे थे। लेकिन सियासत के हस्तछेप ने सबकुछ उलटा पुलटा कर दिया। और सदियों से अमन पसंद लोग एक दूसरे को मरने मारने पर उतारू हो गए। मुन्नवर राणा का एक शेर है कि लहू कैसे बहाया जाए ये लीडर बताते हैं,लहू का जायका कैसा है ये खादी बताती है।
सचमुच ये स्थिति बहुत ही विकट है। और चिंता खड़ी करती है। ये घटना तो साफ दिखाती है , कि लोगों का विश्वास उठ गया है। लोग कानून को बस राजनीतिक जांच भर समझने लगे है। आज अगर कंधमाल में कोई गवाही देने नहीं आया तो । हो सकता है लोग कल बड़े हादसो के बाद चुप बैठ जाएँ । जब समाज चुप्पी साधने लगे तो स्थिति बहुत भयानक होती है। जिसका अंदाजा शायद हम आज नहीं लगा पा रहे हैं।
राजेश कुमार

Sunday, February 22, 2009

कमजोर होती धर्मनिरपेक्ष राजनीती


कमजोर होती धर्मनिरपेक्ष राजनीति
(राजनीति की जिस धारा का दंभ मुलायम सिंह दिन रात भरते हैं । उसी धारा का लहू हमारी भी राजनीतिक रगों में दौड़ता है। इसीलिए इस लेख की जरुरत महसूस हुई)

इस देश की राजनीतिक नसों में जो सबसे ज्यादा सक्रिय अल्फाज है , और जिसने १९९२ के बाद से लगातार मंडल मुद्दे को पीछे छोड़ते हुए हमारे राजनीतिक फैसलों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। वो है धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिक राजनीति । लगभग आज़ादी मिलने के बाद से ही इस शब्द के विशाल आवरण से पूरा भारतीय राजनीतिक परिदश्य आभामंडित है। और बस धर्मनिरपेक्षता को बरकरार रखने के लिए ही हमने बड़ी-बड़ी कुर्बानियां दी , सिर्फ गुजरात ही नहीं , बस मऊ, धार और भागलपुर ही नहीं , इस देश का एक बड़ा हिस्सा बलवे की आग में जला। देश की आत्मा कही जाने वाली संविधान की मूल स्वर धर्मनिरपेक्षता को बचाए रखने के लिए हमने निरंतर अपनी सत्ता को दाव पर लगाया । बाबरी मस्जिद बिध्वंस के बाद के तथाकथित सांस्कतिक राष्ट्रवाद का सामना किया, गुजरात और देश के अलग-अलग हिस्सों के गहरे जख्मों को साफ किया। देश के सीमाओं के पार के आतंकवाद को झेलते हुए भी अपनी आत्मा अछुण्ण रखी।

इकबाल का मशहूर शेर कुछ बात है कि मिटती हस्ती नहीं हमारी , इतने दिनों के बाद ग़लत साबित होने लगा , और हमें अपनी हस्ती मिटती दिखाई देने लगी। अचानक ये लगने लगा कि , देश में धर्मनिरपेक्ष राजनीति कमजोर होने लगी, सच्चर समिति रिपोर्ट की आंच से झुलसी सांप्रदायिक राजनीति के जख्मों को मानो मरहम मिल गया । सबसे पहले धर्म की राजनीति करने वालों को गुजरात चुनाव परिणाम ने संबल दिया। और गुजरात चुनाव से पहले तक राम की परछाई से कतराकर चल रही भारतीय जनता पार्टी अचानक से राम मंदिर के जिन्न को बोतल से बाहर निकालने की फिराक में लग गई। उसके बाद धर्मनिरपेक्ष राजनीति को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब उत्तर प्रदेश के एक ही मंच पर मुलायम और कल्याण सिंह साथ दिखे। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में सक्रिय राजनीति करने वाले दो नेताओं मायावती और मुलायम सिंह में जो बड़ा फर्क भाजपाई दूरी को लेकर था, उसे कल्याण की दोस्ती ने पाट दिया। अब उत्तर प्रदेश की सक्रिय राजनीति में कोई अछूत नहीं। मुलायम की सपा ने आडवाणी को क्लीन चीट दे दी, मुलायम भले भूल सकते हों कि अपने पूरे संसदीय राजनीति में जितनी बातें उन्होंने धर्मनिरपेक्ष राजनीति की दुहाई देते हुई कही होंगी उतना शायद ही इस देश के किसी और नेता ने कहा हो। मुळायम भूल गए होंगे कि उन्होंने मायावती के खिलाफ में जितने संगीन आरोप लगाए हैं। उनमें से एक आरोप ये भी है कि मायावती और भाजपा का पुराना साथ रहा है। अब मुलायम सिंह अपने नए राग और नए याराने के बारे में क्या कहेंगे। हमें अमर सिंह से कोई गिला नहीं , क्योंकि हमें न तो उनसे कोई उम्मीद है , और न ही हमारी जमात उन्हें समाजवादी मानती है । और हम उनके हाथो समाजवाद का कुछ हित चाहते भी नहीं है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि जिसने रहनुमाई का दावा किया वही रहजन निकला। फिराक का एक मशहूर शेर है ,,,
तू इधर-उधर की न बात कर,

ये बता कि काफिला क्यों लूटा।

तेरी रहबरी का सवाल है,

मुझे राहजन से गरज नही।
इस अंधेरी रात में जितने दिए जल रहे थे वो भी बुझने लगे। ऐसे मौके पर साहिर साहब याद आ रहे हैं, जिन्होंने बहुत पहले ही कहा था कि ,,, वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा,,,,। इस देश का राजनीति इतिहास भले बाद में लिखा जाएगा , और इतिहासकारों की नज़रों में मुलायम की क्या क़ीमत होगी ये भी बाद में देखी जाएगी। लेकिन हमने मुळायम सिंह को अपना फ़ैसला सुना दिया है। और हमारा फ़ैसला मुलायम को जार्ज की बिरादरी में खड़ा कर समाजवाद को कलंकित करने वालों में शुमार करता है।
राजेश कुमार

Wednesday, February 4, 2009

एक फोटो



ऐसी बात नहीं है कि आज के युवा राजनीति पसंद नहीं करते बस ,,, अरे हम तो तैयार बैठे हैं ,,,, पोस्टर छापूंगा तो यही फोटो लगाउंगा



राजेश कुमार

ईमानदारी की मिशाल


इस फोटो को देखकर कौन यकीन करेगा कि कभी पटना की राजनीतिक गलिया इस आदमी की ईमानदारी की मिसाल दिया करती होगी ,,,लेकिन मेरी राय मानिए तो आप ईमानदारी की जगह मेरे दादाजी (जयप्रकाश मिश्र) का नाम लिख सकते हैं ,,,, कभी आईंसटिन ने महात्मा गांधी की फोटो देखकर कहा था कि आने वाली पीढ़ियां शायद ही इस बात पर यकीन करे कि इस प्रकार का मानव धरती पर चला होगा ,,,लेकिन मैं कहता हूं कि आज भी इनकी ईमानदारी से लोग डरते हैं ,,,,,, राजेश कुमार

Thursday, November 6, 2008

सुधाकर के संस्मरण

कैसी छात्र राजनीति है ये?

( सुधाकर जी हमारी मित्रमंडली में बलरामपुर का प्रतिनिधित्व करते हैं... इसी वजह से छात्र राजनीति में बोलने का पहला हक़ इन्हीं को मिलता है... अली सरदार जाफरी और बेकल उत्साही के शहर के सुधाकर जी ने लखनऊ यूनिवर्सिटी को कितना जीया है ... उन्हीं से सुनते हैं )

जब मैं लखनऊ के कॉल्विन ताल्लुकेदार्स कॉलेज में पढ़ता था...तो अक्सर लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर को बाहर से देखने का मौका मिला करता था। बताना चाहूंगा कि कॉल्विन और लखनऊ विवि ठीक एक दूसरे के सामने स्थित हैं...बस अंतर केवल दोनों के बीच से गुजरती सड़क का है। मंगलवार के दिन विवि के ठीक बगल में हनुमान सेतु पर बजरंग बली के दर्शन को भी जाया करता था...इन्हीं दिनों में मैंने एक सपना देखा॥सपना था लखनऊ विवि में बतौर छात्र अध्ययन करने का। सपना पूरा भी हुआ॥हालांकि सपना पूरा होने में एक दशक लग गए॥अब मैं लखनऊ विवि का संस्थागत छात्र हो चुका था। बात साल २००४ की है॥लखनऊ में मुलायम सिंह की सरकार थी और छात्र राजनीति अपने परवान पर चढ़ चुकी थी॥मैंने मॉस कम्युनिकेशन के पीजी कोर्स में दाखिला लिया था॥विवि परिसर छात्र नेताओं के पोस्टरों और बैनरों से पूरी तरह पट चुका था...फ़िज़ाओं में तमाम तरह के नारे अक्सर गूंज जाते थे..उदाहरण के तौर पर- सत्यनिष्ठ कर्तव्य परायण, तेज नारायण तेज नारायण...यही पुराण यही रामायण तेज नारायण तेज नारायण। ये तेज नारायण कोई और नहीं उपाध्यक्ष पद के लिए छात्र संघ का चुनाव लड़ रहे तेज नारायण पाण्डेय उर्फ पवन पाण्डेय थे। यानी छात्र राजनीति के लिए पूरा उन्मुक्त माहौल तैयार हो चुका था।मेरी फैकल्टी में पीटीआई से संजय पाण्डेयजी क्लास लेने आया करते थे..मुझे आज भी याद है कि चुनाव में छात्र नेताओं के उपनामों पर संजय जी के एक कमेंट पर क्लास में जबरदस्त ठहाका लगा था..दरअसल उन्होंने एक सवाल पूछा था...Does anybody know how many Pintoo's are there in LUSU elections? और जवाब भी अलग-अलग तरह के आए किसी ने विजय कुमार सिंह टिंटू का नाम लिया तो कोई बोला विजय शंकर पिंटू तो किसी की जुबान पर इन्द्रेश मिश्रा शिंटू का नाम था।

उन दिनों मैं अपने मित्र जितेंद्र के पास गाहे-बगाहे मिलने के लिए जाया करता था। जितेंद्र अन्तःवासी छात्र थे अब आप कहेंगे कि अंतःवासी मतलब...दरअसल अंतःवासी उस छात्र को कहा जाता है जो विवि परिसर में ही स्थित छात्रावास में रहते हैं। जितेंद्र कैम्पस के लाल बहादुर शास्त्री हॉस्टल के कमरा नं- १५९ में रहते थे। मैं और जितेंद्र क्लास के बाद जब भी मौका मिलता था टैगोर लाइब्रेरी आते थे और परिसर में छात्र राजनीति के बदलते स्वरूप पर चर्चा किया करते थे। एक वाकया याद आता है॥जब विवि में मुलायम सिंह और अमर सिंह को एक कार्यक्रम में बुलाया गया। ये दीगर बात है कि कार्यक्रम का मकसद शैक्षणिक कम राजनीतिक ज्यादा था। भरी सभा में मुलायम सिंह ने मंच से ही कुलपति एसबी सिंह को नसीहत दी कि वे परिवार के मुखिया हैं और छात्र नेता परिवार के सदस्य...अगर परिवार का सदस्य कोई गलती करता है तो उसे घर से निकाला नहीं जाता बल्कि उसे समझा-बुझाकर मनाया जाता है। अब नेताजी इतना तो समझते ही होंगे कि बंदूकों के साये में रहने वाले इन बिगड़ैल छात्र नेताओं को समझाना बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसा था। मुलायम सिंह जी चाह रहे थे कि आपराधिक प्रवृत्ति के इन छात्र नेताओं को परिसर में खुली छूट मिली रहे और तथाकथित छात्रहित के लिए संघर्ष की बात करने वाले इन छात्र नेताओं को स्वच्छंद छोड़ दिया जाए...भले ही उसके कारण आम छात्रों की पढ़ाई में व्यवधान ही क्यों पड़े अब अमर सिंह की बात हो ऐसा हो नहीं सकता कार्यक्रम के दौरान ही छात्र संघ के तत्कालीन अध्यक्ष अभिषेक सिंह आशू ने खुद को अमर सिंह से कुछ इस तरह जोड़ने की कोशिश की। आशू ने मंच से ही गुहार लगाई कि वे आजमगढ़ के हैं और अमर सिंह उनका नाम नहीं भूलते होंगे क्योंकि उनके परम मित्र अमिताभ बच्चन के पुत्र का नाम भी अभिषेक है। इस तरह लच्छेदार बातें करते हुए॥अभिषेक सिंह आशू ने विवि परिसर में छात्रों की भूख को शांत करने के लिए एक कैंटीन बनवाने की मांग रखी और बातों बातों में अमर सिंह से दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता मांगी। अब अमर सिंह तो ठहरे अमर सिंह वो कहां इस गोल्डेन चांस को चूकने वाले थे। माइक थामते ही अमर सिंह ने मंच पर ही आशू को दो की बजाय चार लाख का चेक थमा दिया अब उस चार लाख का क्या हुआ ये सवाल ही पूछना शायद अपने आप में ही बेमानी होगा।

वापस लौटते हैं एलबीएस हॉस्टल की ओर...छात्र राजनीति को क़रीब से देखना हो तो आपको छात्रावासों के ताने-बाने को भी कायदे से समझना होगा। कैंपस में मेरा भी पहला साल था लिहाजा मैं भी छात्रसंघ चुनाव की तमाम रणनीतियों से परिचित होना चाह रहा था। उन्हीं दिनों एलबीएस हॉस्टल में एक नई परंपरा देखी...ये परंपरा थी भोजशालाओं की ये उस तरह की भोजशाला नहीं थी जिसकी स्थापना धार के राजा भोज ने ११वीं शताब्दी में की थी॥ये वो भोजशाला भी नहीं थी जिसकी स्थापना कैटरीना से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए अमेरिका के सिख समुदाय ने की थी...ये लखनऊ विवि के छात्र नेताओं द्वारा स्थापित नई भोजशाला थी जिसका मकसद भी सांस्कृतिक या सामाजिक होकर विशुद्ध रूप से राजनैतिक था। कमोवेश हर छात्रावास में ऐसी भोजशाला स्थापित की गई थी..अंतःवासी छात्र भी इस भोजशाला का पूरा लाभ उठा रहे थे...भोजशाला में भी अलग-अलग तरह के पकवान बन रहे थे...कहीं पूड़ी सब्जी और खीर बन रही थी तो कहीं चिकन करी और तंदूरी रोटी का पूरा इंतजाम था..हॉस्टल में रहने वाले छात्रों को एक महीने के लिए चूल्हा-चौके से फुरसत मिली हुई थी। कभी हालचाल लेने वाले छात्र नेता इस चुनावी मौसम में अपने टारगेट वोटर पर पूरी तरह मेहरबान थे। छात्रों को चमचमाती गाड़ियों में घूमने का शौक पूरा करने का भी मौका मिल रहा था। कोई लैंडक्रूजर पर बैठने की हसरत पूरी कर रहा था तो किसी का सीना होंडा सीआरवी पर बैठकर चौड़ा हो रहा था...मतलब कि छात्रसंघ की राजनीति का ग्लैमर पूरी तरह से शबाब पर था हर छात्र नेता की अपनी अपनी भोजशाला थी कोई भी छात्र किसी भी भोजशाला में बेरोक-टोक -जा सकता था। भोजशाला बदलने के साथ ही मुंह का स्वाद बदल रहा था...और अपने अपने छात्र नेता के प्रति निष्ठाएं भी बदल रही थीं...घात...प्रतिघात और भितरघात में भोजशालाएं महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही थीं...जिस छात्र नेता की भोजशाला में बढ़िया भोजन मिल रहा था...वहां छात्रों की भीड़ भी इकट्ठा हो रही थी...छात्र नेता की भोजशाला में जुटने वाला मजमा एक तरीके से उसके वोट बैंक का प्रतीक था...भोजशाला में लंच और डिनर के दौरान प्रतिद्वंदी छात्र नेता के वोट बैंक में सेंध लगाने का हर मुमकिन प्रयास किया जाता था। इसके लिए जरूरी था मेन्यू में लजीज पकवानों को शामिल करना।

ऐसी ही एक भोजशाला परिसर के चंद्रशेखर आजाद छात्रावास (बटलर हॉस्टल) में भी स्थापित की गई थी...एक प्रतिद्वंदी छात्र नेता के गुट ने दूसरे छात्र नेता की भोजशाला का तंबू-कनात उखाड़ दिया। दूसरे गुट को ये हरकत नागवार गुजरी और मामले ने हिंसक रूप ले लिया। देखते ही देखते छात्र नेताओं के समर्थकों की बंदूकें गरजने लगीं और भोजशाला छात्र नेताओं के खूनी संघर्ष का अखाड़ा बन गई...गोलीबारी में जख्मी हॉस्टल के एक छात्र की किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज में मौत हो गई। इसके बाद तो हालात काबू से बाहर हो गए...पहले तो छात्रों ने हॉस्टल में जमकर तोड़फोड़ और आगजनी की...इसके बाद विवि परिसर में स्थित पुलिस चौकी को फूंक दिया गया...मौके पर पहुंचे आला अधिकारियों के साथ जमकर गाली-गलौज की गई...छात्र संघ चुनाव के लिए नामांकन स्थगित कर दिया गया...परिसर अनिश्चितकाल के लिए बंद हो चुका था। चुनावी भोजशाला की बलिवेदी पर एक निर्दोष छात्र के प्राण जा चुके थे...लखनऊ विवि का ये सहमा -सहमा मंजर मेरे लिए एक सपने के टूटने जैसा था। कुछ दिनों बाद कैंपस फिर खुल गया और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह की सरकार के रहते लखनऊ यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव हो ऐसा असंभव था। सो चुनाव प्रचार फिर शुरू हो गया और खुल गईं भोजशालाएं...पूरे लखनऊ विवि परिसर में अब इस तरह के नारे तीर की तरह चुभ रहे थे- लइया चुरुरमुरुरिया, भइयक लाल चुनरिया....

भइया फिलिम देखइहैं, भइया नकल करइहैं...

भइया बम चलइहैं, भइया इलेक्शन लड़िहैं...

भइया जीत जइहैं, लइया चुरुरमुरुरिया

मैंने दोबारा कैंपस आना शुरू कर दिया था॥हालांकि मन में डर भी बना रहता था। एक दिन जब मैं प्रॉक्टर ऑफिस के पास से गुजर रहा था तो दो अंतःवासियों को बात करते सुना कि इस बार छात्र संघ चुनाव में एक विकेट गिर चुका है...दो-तीन विकेट और गिर सकते हैं...तो दूसरा छात्र जवाब देता है कि हर बार तो चार-पांच विकेट गिरा करते थे...इस लिहाज से इस बार लगता है कि कम विकेट गिरेंगे। मैं भी चुपचाप बगलें झांकता हुआ अपने डिपार्टमेंट की ओर बढ़ चला।

सुधाकर सिंह

2 नवंबर, २००८

संप्रति- टीवी पत्रकार

Sunday, November 2, 2008

सोचने को मजबूर करती कविताये


दामन के दाग़
इतने दाग़ हैं दामन में,, खुद को ढूंढ नहीं पाता हूं।

इतनी आह है ज़माने में,, खुद की आवाज़ सुन नहीं पाता हूं।

कहां जाऊं ये आशियाना छोड़कर यारों।

हिन्द से प्यारा कोई जहां नहीं पाता हूं।

मुझे शक है कि कहीं मैं आतंकी तो नहीं,

जमाने की सदायें ये बोलती हैं।

मुझे डर है कि मैं मर न जाऊं कहीं,

दिल से निकली हर धड़कन ये बोलती है।

इस क़दर है साया आतंक का मुझ पर,

उजाले में खुद की छाया ढूंढ नहीं पाता हूं।


वो कहतें हैं कि मैंने मासूमों को मारा है,

वो कहते हैं कि मैं ही उनकी बर्बादी का जिम्मेदार हूं।

कैसे दिलाऊं यकीं ज़माने को अपनी बेकसूरी का,

कि अपनी बेगुनाही का सबूत ढूंढ नहीं पाता हूं।

कहां जाऊं ये आशियाना छोड़कर यारो,

हिन्द से प्यारा कोई जहां नहीं पाता हूँ .

शेख मोहम्मद नईम

संप्रति - टीवी पत्रकार

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...