Monday, January 23, 2017

ऐसे थे जननायक कर्पूरी ठाकुर-राजेश कुमार

गौरीशंकर नागदंश ने कभी कर्पूरी ठाकुर के लिए कहा था ....

हिंदुस्तान के करोड़ों शोषितों के हक के लिए, लाखों निरीह नंगे बच्चों की कमीज और स्लेट के लिए, आंखों में यंत्रणा का जंगल समेटे भटकती बलत्कृत आदिवासी और दलित महिलाओं की अस्मिता की रक्षा के लिए, बेसहारा किसानों की कुदाल और ज़मीन के लिए, फूस के बूढ़े मकानों पर उम्मीद की छप्पर के लिए, हांफती सांसों वाले हारे हुए लोगों की जीत के लिए, गांधी, लोहिया और अंबेडकर के सफेद हो चुके सपनों को सतरंगा बनाने के लिए संघर्ष का नाम थे कर्पूरी ठाकुर।

संघर्षों की मिसाल इसी से समझी जा सकती है, कि बेदाग छवि के कर्पूरी आजादी से पहले 2 बार और आजादी मिलने के बाद 18 बार जेल गए। इतिहास में हालांकि किन्त-परन्तु की गुंजाईश नहीं होती। लेकिन कुछ सवाल हैं जो कर्पूरी की राजनीति को लेकर जानकार अक्सर उठाते हैं...

कि क्या बिहार की सियासत में पिछड़े धुरी बन पाते? क्या लालू प्रसाद यादव पिछड़ों के मसीहा बन पाते? क्या बिहार की सियासत में नीतीश कुमार का उभार हो पाता? और सबसे अहम सवाल तो ये कि क्या मंडल कमीशन की रिपोर्ट अस्तित्व में आती?

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को समस्तीपुर ज़िले के पितोंझिया में हुआ था। विरासत में कर्पूरी को अभाव, अशिक्षा और ग़रीबी मिली। उनकी शादी मुजफ्फरपुर के चंदनपट्टी की फुलेश्वरी देवी से हुई। लेकिन कर्पूरी ठाकुर ने साफ कह दिया कि वे गुलाम भारत में गुलाम संतान पैदा नहीं करेंगे।

1952 में हुए बिहार विधानसभा के पहले चुनाव से लेकर 1988 तक बिहार की सियासत कर्पूरी ठाकुर के ही ईर्द-गिर्द घूमती रही। बिहार विधानसभा का चुनाव उन्हें कोई नहीं हरा पाया। डॉ लोहिया के ग़ैरकांग्रेसवाद के नारे के साथ 1967 में बिहार में संविद सरकार बनी। ये ऐसी अनूठी सरकार थी जिसमें जनसंघ भी था और कम्यूनिस्ट पार्टी भी। मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद बने और कर्पूरी ठाकुर उपमुख्यमंत्री। कर्पूरी ठाकुर के पास शिक्षा का महकमा भी था। कर्पूरी ठाकुर ने जो पहला फैसला लिया, वो था मैट्रिक की परीक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता को समाप्त करने का। ये डॉ लोहिया के अंग्रेजी हटाओ के नारे को ज़मीन पर उतारने की तरह था। इस फैसले की तीखी आलोचना हुई, लेकिन इसने पिछड़े समुदाय के करोड़ों लोगों को मैट्रिक पास कराया । लोगों ने कर्पूरी डिवीजन कहकर मजाक उड़ाया, लेकिन कर्पूरी हार मानने वालों में से नहीं थे।

संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में कर्पूरी भूमिगत हो गए, और केंद्र सरकार लाख कोशिश के बावजूद कर्पूरी ठाकुर को पकड़ नहीं पाई। जनवरी 1977 को पटना के गांधी मैदान में कर्पूरी ठाकुर ने जयप्रकाश नारायण की सभा में सरेंडर किया। बिहार में जब चुनाव हुआ कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने और फिर वो फैसला किया जिसने सामाजिक न्याय का नारा बुलंद कर दिया। तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए, कर्पूरी ठाकुर ने 11 नवंबर 1978 को बिहार में आरक्षण लागू कर दिया। बिहार में महिलाओं को 3 फीसदी समेत पिछड़ी जातियों को कुल 26 फीसदी आरक्षण दिया गया। विपक्ष ने मुखर विरोध किया और उनके खिलाफ व्यक्तिगत हमले भी किेए गए। लेकिन कर्पूरी अपने फॉर्मूले पर कायम रहे। बाद में इसी कर्पूरी फॉर्मूले ने 12 साल के बाद मंडल कमीशन की शक्ल अख्तियार कर ली। 

कर्पूरी ठाकुर बिहार में एक बार उपमुख्यमंत्री, दो बार मुख्यमंत्री और दशकों तक विधायक और विरोधी दल के नेता रहे। सियासत में इतना लंबा सफर करने के  
बाद जब उनका देहांत हुआ, तो परिवार को विरासत में देने के लिए उनके पास ना एक मकान था और ना ही कोई ज़मीन का टुकड़ा।

बिहार के सियासी गलियारों में आज भी कर्पूरी की ईमानदारी के किस्से सुने-सुनाए जाते हैं। एक बार कर्पूरी ठाकुर विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नाम का एलान कर रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि लिस्ट में उनके बेटे का भी नाम है। कर्पूरी ठाकुर ने मीडिया के सामने बोल दिया कि या तो वे चुनाव लड़ेंगे या फिर उनका बेटा। कर्पूरी ठाकुर से जुड़े लोग बताते हैं कि एक बार मुख्यमंत्री आवास में उनके बहनोई उनसे मिलने आए, और नौकरी लगवाने की बात कही। पूरी बात सुनकर कर्पूरी ठाकुर गंभीर हो गए और जेब से पचास रूपये निकालकर उन्हें दिया। और कहा, कुछ काम नहीं है तो नाई का पुश्तैनी काम शुरू कर दीजिए। एक और कहानी मशहूर है, 1952 में विधायक बनने के बाद उन्हें प्रतिनिधिमंडल में शामिल होकर ऑस्ट्रिया जाने का मौका मिला, उनके पास कोट नहीं था। उन्होंने दोस्त से कोट उधार लिया। वे युगोस्लाविया गए, जहां मार्शल टीटो ने देखा कि कर्पूरी ठाकुर का कोट फटा हुआ है। मार्शल टीटो ने कर्पूरी को एक कोट भेंट किया। 

जनता के हित में लिए गए फैसलों और कर्पूरी ठाकुर की लोकप्रियता ने ही उन्हें राजनीति का जननायक बना दिया।

Tuesday, January 17, 2017

गणतंत्र दिवस, संप्रभुता और युवा -प्रेम सिंह


  26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू होता है और हम दुनिया के मंच पर एक संप्रभु गणतंत्र के रूप में प्रवेश करते हैं। तब से हर 26जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता हैजो हमारी संप्रभुता का उत्सव है। गणतंत्र दिवस पर राज्‍यों एवं विभागों की रंगारंग झंकियां निकाली जाती हैं। लेकिन वह मुख्यतः देश की सैन्य शक्ति के प्रदर्शन का उत्सव होता है। गौर करें तो पाएंगे कि 1991 में नई आर्थिक नीतियां लागू होने - यानी शासक वर्ग द्वारा देश की आर्थिक संप्रभुता के साथ समझौता करने - के बाद से गणतंत्र दिवस का उत्सव ज्यादा से ज्यादा प्रदर्शनकारी होता गया है। पिछले करीब तीन दशकों में जैसे-जैसे आर्थिक संप्रभुता के साथ राजनीतिक संप्रभुता पर भी समझौता होता गयाराजपथ पर गणतंत्र दिवस का उत्‍सव प्रदर्शन की पराकाष्‍ठा पर पहुंचता गया।
                       सवाल है कि गणतंत्र दिवस पर प्रदर्शनकारिता के परवान चढ़ने के साथ क्या हमारी संप्रभुता भी परवान चढ़ी हैनवउदारवाद के दौर में किए गए समझौतों और फैसलों पर सरसरी तौर पर नजर डालने से ही पता चल जाता है कि शासक वर्ग ने सरकारों को संविधानजिसमें हमारी संप्रभुता निहित हैकी धुरी से उतार कर नवउदारवाद की पुरोधा वैश्विक पूंजीवादी आर्थिक संस्थाओं - विश्‍व बैंकअंतरराष्‍ट्रीय मुद्रा कोषविश्‍व व्यापार संगठन आदि - की धुरी पर बिठा दिया है। ये समझौते और फैसले वैश्विक पूंजीवादी आर्थिक संस्थाओं के आदेशों के मातहत देशी-विदेशी कारपोरेट घरानोंबहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के हितों के लिए किए गए हैं। पिछले 70 सालों में देश में कुछ भी नहीं होने की बात करने वाले मौजूदा नेतृत्व ने अढ़ाई साल में देश की संप्रभुता को गिरवीं रखने की दिशा में पिछले नेतृत्व से ज्यादा तेजी दिखाई है। आजादी और उसे हासिल करने की कुर्बानियों का मूल्य नहीं समझने के चलते संप्रभुता खोने की बात उन्हें नहीं सालती। नरसिम्हा रावमनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के साथ भी यही समस्या थी। तभी उन्होंने आजादी के संघर्ष की पार्टी को आजादी गिरवीं रखने वाली पार्टी में तब्दील कर दिया।
                शासक वर्ग सेना की मजबूती को संप्रभुता की मजबूती के रूप में पेश करता है। लेकिन रक्षा-क्षेत्र में सौ प्रतिशत विदेशी निवेश की छूट और अमेरिका को दी गई सुरक्षातंत्र में घुसपैठ की छूट के चलते यह तसल्ली झूठी है। सरकारेंखास कर मौजूदा सरकार,राष्‍ट्रभक्ति का उन्माद पैदा करके देश की जनता को भ्रमित करती हैं कि वह सरकार के संवैधानिक संप्रभुता के प्रति द्रोह को नहीं देख-समझ पाए। राष्‍ट्रभक्ति का उन्माद केवल पाकिस्तान के खिलाफ पैदा किया जाता हैजिसे परास्त करने की क्षमता भारतीय सेना में हमेशा रही है। भारत का कई हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के कब्जे में है। शासक वर्ग उसके सैन्य समाधान के लिए राष्‍ट्रभक्ति का उन्माद पैदा नहीं करता। कुल मिला कर गणतंत्र दिवस की परेड सम्मिलित रूप से शासक वर्गउसका हिस्सा नागरिक समाज और साधरण जनता के लिए संप्रभुता खोने से पैदा होने वाले खोखलेपन को भरने की कवायद बन जाती है। संप्रभुता पर नवसाम्राज्यवादी शिकंजा जितना कसता जाएगायह कवायद भी अधिकाधिक बढ़ती जाएगी। उग्र राष्‍ट्रवाद उग्रतर होता जाएगा।
                यह स्थिति बेहद उलझी और निराश करने वाली है। लेकिन लंबे संघर्ष से हासिल की गई संप्रभुता को बचाने और मजबूत बनाने की बड़ी चुनौती भी पेश करती है। खास कर देश के युवाओं के सामने। भारत में युवाओं का कोई एक धरातल नहीं है। सामाजिक,आर्थिक एवं शैक्षिक स्‍तर पर कई धरातल हैं। इन सबके अपने-अपने सपने और संकल्‍प हैं। इन तीनों धरातलों पर शिक्षित, अर्द्धशिक्षित और अशिक्षित बेरोजगार युवाओं की एक विशाल फौज है। युवाओं का राष्‍ट्र को लेकर और राष्‍ट्र में अपनी हिस्‍सेदारी को लेकर अलग-अलग नजरिया है। राष्‍ट्रीय संप्रभुता पर नवसाम्राज्‍यवादी हमले को लेकर भी युवाओं का नजरिया एक जैसा नहीं है। हालांकि उनमें ज्‍यादातर भारत को महाशक्ति देखना चाहते हैं। बल्कि कुछ तो  मानते हैं कि भारत महाशक्ति बन चुका है।
       युवाओं को समझना होगा कि संप्रभुता खोने वाला देश कभी महाशक्ति नहीं हो सकता। वे यह कठिन कल्‍पना कर सकते हैं कि नवउदारीकरण के तहत तेजी से किए जा रहे निजीकरण के चलते भविष्‍य में गणतंत्र दिवस की झांकियों में निजी क्षेत्र की झांकियां शामिल हो सकती हैं। सौ प्रतिशत विदेशी/निजी निवेश सेना की परेड में भी अपनी झलक दिखा सकता है। उसे सोचना है कि क्‍या उसे यह सब मंजूर होगा? क्‍या वह नवसाम्राज्‍यवाद के तहत बन रहे नवउदारवादी राष्‍ट्र में हिस्‍सेदारी करेगा, या संप्रभु भारतीय राष्‍ट्र में जिम्‍मेदारी निभाएगा? देश के जागरूक युवा नई तैयारी और समझदारी से संप्रभुता बचाने की भूमिका तय करेंगे,तभी वह बचेगी।    

Thursday, November 24, 2016

जनता की तकलीफ की राजनीति-प्रेम सिंह

(पांच सौ और हजार के नोट बंद करने के बाद देश के हालात को सामान्य नहीं कहा जा सकता है। इस अदूरदर्शी फैसले से सबसे ज्यादा तकलीफ उठाने को मजबूर है आम अवाम। लेकिन सवाल ये है कि क्या देश की सियासत में आम अवाम की तकलीफ से किसी को वास्ता है। नवउदारवाद के बाद इस देश में जिस तरह के फैसले लिए जा रहे हैं, उसमें ग़रीब और मेहनतकश अवाम को जान देकर विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। डॉ प्रेम सिंह का ये लेख पढ़िए, ऐसे माहौल में ये एक जरूरी लेख है, जो बताता है कि हम किस सियासी संकट के दौर से गुजर रहे हैं।  
                पिछले दिनों लिए गए विमुद्रीकरण के फैसले पर छिड़ी बहस में फैसले से साधारण जनता को होने वाली तकलीफ का जिक्र कई रूपों में बार-बार हो रहा है। इस औचक फैसले से साधारण जनता को होने वाली तकलीफ की शिकायत उच्च एवं उच्चतम न्यायालय ने भी की है। फैसले के अनेक समर्थकों ने भी जनता की तकलीफ पर अपनी चिंता व्यक्त की है। 50 से अधिक लोगों की मौत सीधे इस फैसले के कारण हो चुकी है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों का कहना है कि फैसले से जनता को कोई तकलीफ नहीं हैबल्कि वह खुश है। वे फैसले से होने वाली तकलीफ की शिकायत करने वाले भुक्तभोगियों और पत्रकारों को धमकाते नजर आते हैं। उनका कहना है कि जनता को तकलीफ होती तो वह बैंक की कतारों में नहींफैसले के विरोध में सड़कों पर होती। पूरे देश में सुबह से शाम तक बैंक की लाइनों में लगी जनता की तकलीफ शायद कहीं न कहीं मोदी समर्थकों को भी नजर आती है। तभी वे सीमा पर तैनात सेना के जवानों द्वारा सही जाने वाली तकलीफ का वास्ता देने लगते हैं। पहले केवल चार-पांच दिनों की तकलीफ उठाने की बात करने वाले प्रधानमंत्री ने देश का वास्ता देकर पचास दिनों तक तकलीफ उठाने की भावुक गुहार लगाई है।
                इस फैसले के चलते जनता की तकलीफ से सचमुच विचलित होने वाले लोगों द्वारा कहना कि गरीब की हाय लगेगी’, एक असहाय उद्गार भर है। ऐसे उद्गारों का आज की राजनीति में कोई अर्थ नहीं है। लोकतंत्र में जनता को एक दिन भी तकलीफ देने का किसी सरकार को हक नहीं हैइस तरह की बातें न चलन में रह गई हैंन पसंद की जाती हैं। लोहिया की उस स्थापना का हवाला देना भी बेकार है जिसमें वे कहते हैं कि प्रत्येक कदम/फैसले का औचित्य उस कदम/फैसले में ही निहित होना चाहिएभविष्‍य का वास्ता देकर किया गया औचित्य-प्रतिपादन सरकारों/राजनीतिक पार्टियों को जनता पर मनमाने अत्याचार की छूट देता है। विमुद्रीकरण के फैसले से भविष्‍य में स्वर्णिम भारत’ बनने के दावे बढ़-चढ़ कर किए जा रहे हैं। मैं तुम्हें स्वर्णिम भारत दूंगा’ का खर्चीला प्रचार अभियान दिल्ली में शुरू हो चुका है।
                यह गौर करने की बात है कि नवउदारवादी अर्थव्यवस्था लागू होने के बाद से भारतीय राजनीति में जनता की तकलीफ के प्रति शासक वर्ग का रवैया तेजी से बदलता गया है। शासक वर्ग अब जनता की वोट की ताकत से नहीं डरताकि उसकी नीतियों के कारण तकलीफ उठाने वाली जनता चुनाव में उसे परास्त कर देगी। किसी भी व्यवस्था में लोगों की तकलीफ का इंतिहाई छोर जीवन को ही समाप्त कर देना होगा। नवउदारवादी दौर में करीब तीन लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। यह सिलसिला जारी है। लेकिन सरकारों और नेताओं पर इसका कोई असर नहीं है। क्योंकि चुनाव काले धन के बल पर प्रचार कंपनियोंकारपोरेट घरानोंचुनाव जिताने के विशेषज्ञों और मीडिया की मार्फत लड़ा जाता है। ये मिल कर तय करते हैं कि केंद्र में कब किस नेता और पार्टी की सरकार होगी। नवउदारवादी दौर में नेता/पार्टियां नहींलाल बुझक्कड़ विशेषज्ञ भारत की राजनीति और सरकारें चलाने लगे हैं। ऐसी स्थिति में जनता की तकलीफ पर केवल लफ्फाजी और झांसेबाजी होती है, जो सबके सामने है। 50 दिन में जनता की तकलीफ दूर करने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री और उनके विशेषज्ञों को अच्छी तरह पता है कि जनता उसके बाद भी तकलीफ में ही रहेगी।
                यह स्पष्‍ट है कि 6 महीने पहले लिए गए विमुद्रीकरण के फैसले में अन्य जो भी खयाल रखे गए होंजनता को होने वाली तकलीफ पर ध्यान नहीं दिया गया। जनता की तकलीफ कोई समस्या नहीं रह गई है। नेताओं को पता है उनका प्रचारतंत्र जनता की तकलीफ पर भारी पड़ेगा। वे अपने पक्ष में सहमति का निर्माण कर लेंगे। तकलीफ सहने वाली जनता फिर कारापोरेट के हित की राजनीति करने वालों को वोट देगी। शासक वर्ग ऐसा इंतजाम करता है कि जनता आत्महत्याविस्थापनबेरोजगारीमंहगाईबीमारी जैसी निरंतर बनी रहने वाली तकलीफों का दर्द अपने को धर्मजातिक्षेत्र आदि से जोड़ कर भुला देती है। इस प्रक्रिया में जनता का अराजनीतिकरण होता जाता है। विकल्पहीनता की स्थिति दरअसल जनता के अराजनीतिकरण के चलते बनती है। वह नवउदारवादी व्यवस्था के विकल्प की राजनीति खड़ी करने की कोशिशों में लगे नेताओं और पार्टियों के साथ खड़ी नहीं होती। स्थिति और जटिल हो जाती है जब ज्यादातर नागरिक समाज और जनांदोलनकारी बिचौलिए की भूमिका निभाते है।
                यह मान्य तथ्य है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ पूंजीवादी व्यवस्था के सेफ्टी वाल्व हैं। वे राजनीतिक कार्यकर्ताओं को राजनीतिक कर्म से विरत करके अराजनीतिकरण की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं। नवउदारवाद के प्रतिष्‍ठापकों का दावा है कि नवउदारवादी व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं हैन ही किसी विकल्प की जरूरत है। अगर नवउदारवादी व्यवस्था के तहत कतिपय समस्याएं हैं तो एनजीओ गठित करके उनका समाधान निकाल लीजिए। पिछले दिनों दो एनजीओ सरगनाओं द्वारा प्रायोजित भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन का अधिकांश नागरिक समाज और जनांदोलनकारियों ने पुरजोर समर्थन और उसमें हिस्सेदारी करके नवउदारवाद के विकल्प की राजनीति को गहरी क्षति पहुंचाई। उस आंदोलन को आरएसएस और कारपोरेट घरानों समेत रामदेवरविशंकरजनरल वीके सिंह सरीखों का खुलेआम सक्रिय समर्थन था। अन्ना हजारे ने तब भी नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी और आज भी मोदी के साथ है। इतना ही नहींसीधे कारपोरेट की कोख से जन्मी आम आदमी पार्टी का साथ भी सेकुलर और प्रोग्रेसिव नागरिक समाज ने दिया और आज भी दे रहा है। इसके बावजूद कि यह पार्टी घोषित रूप सेसंविधान की विचारधारा सहितविचारधाराहीनता की वकालत करती है। उनमें से बहुतों के लिए मोदी का विकल्प अगर राहुल गांधी नहीं बन पाते हैंतो केजरीवाल है।
                जाहिर है, 1991 के बाद से अराजनीतिकरण साधारण जनता का ही नहींनागरिक समाज का भी होता गया है। चुनींदा अपवादों को छोड़ दें तो देश का कौन-सा बड़ा बुद्धिजीवी है जिसने मनमोहन सिंह द्वारा लागू की गईं नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ निर्णायक स्टैंड लिया होमोदी को देश पर मूर्खों द्वारा थोपी आपदा कह कर अपने को बड़ा विचारशील जताने वाले थोड़ा रुक कर विचार करें कि जनता की तकलीफ के प्रति उनकी सहानुभूति कितनी सच्ची हैजैसा युग होता हैवैसा ही युग पुरुष निकल कर आता है। मनमोहन सिंह के बाद मोदी उस भारतीय समाज के उग्र प्रतिनिधि हैं जो नवउदारवादी दौर में बना है। यह एक झूठी तसल्ली है कि वे केवल31 प्रतिशत मतदाताओं का चुनाव हैं। विमुद्रीकरण के फैसले से जनता को होने वाली भारी तकलीफ से द्रवित कुछ लोग विरोध के लिए विपक्ष की तलाश कर रहे हैं। 1991 के बाद से भारत की राजनीति एक पक्षीय - नवउदारवादी - बनती गई है। नितीश कुमार और नवीन पटनायक विमुद्रीकरण के समर्थन में हैं। अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी दोनों नवउदारवाद के समर्थक हैं और इस मामले में मुस्लिम वोट बैंक पक्का करने की नीयत से परिचालित हैं। 
                काले धन की सारी बहस में यह नहीं बताया जाता कि वह मेहनतकश जनता की गाढ़ी कमाई की लूट का धन हैऔर उस लूट में नई आर्थिक नीतियां लागू होने के बाद से अभूतपूर्व तेजी आई है। भारत में नवउदारवाद मेहनतकशों की अनंत और अटूट तकलीफों का नाम है। 25साल बीत जाने पर भी स्वर्णिम भविष्‍य की बातें बिना किसी शर्म और हिचक के की जाती हैं। यानी किसानों की आत्महत्याआदिवासियों का विस्थापनबेरोजगारों की निरंतर बढ़ती फौजदिन-रात बड़े बांधों-राजमार्गों-पुलों-हवाई अड्डों-इमारतों आदि के निर्माण में लगे करोड़ों मजदूरों का जीवनस्वर्णिम भविष्‍य’ की कीमत है। कमेरों को आगे भी यह कीमत चुकाते रहना होगा। उदाहरण के लिएकल्पना कीजिए पांच सौ स्मार्ट सिटी बनाने के लिए मेहनतकशों की कितनी पीढियां खपेंगीपूरे भारत को डिजिटल’ और कैशलेस करेंसी’ में तब्दील करने के लिए किनकी बलि चढ़ेगीबच्चों की परवरिशशिक्षास्वास्थ्यमनोरंजन आदि का इंतजाम हर लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व होता है। लेकिन नवउदारवादी भारत के वर्तमान और भविष्‍य में मेहनतकशों के बच्चों के लिए कोई जगह नहीं है। भारतीय राजनीति की इससे बड़ी तकलीफ क्या हो सकती है कि श्रमशील जनता ने नवउदारवादी व्यवस्था के निर्माण में मर-खप जाने को ही अपनी नियति मान लिया है!
                जनता की तकलीफ में कमी होइससे शायद ही किसी को इनकार हो सकता है। इस दिशा में शुरुआत हो सकती है। कांग्रेस-भाजपा से इतर पार्टियां एका बना कर सीधे मेहनतकश जनता से कहें कि वे उन्हें तबाह करने वाली नवउदारवादी नीतियों को अपदस्थ करके संविधान के नीति निर्देशक तत्वों की रोशनी में अपनी नीतियां चलाएंगी। अगर संकल्प सच्चा हो तो 2019 का चुनाव आसानी से जीत लिया जा सकता है। उसके लिए कारपोरेट के काले धन की आवश्‍यकता नहीं पड़ेगी। नवउदारवाद का समर्थक स्वभावतः नवसाम्राज्यवाद का समर्थक हो जाता है। नवसाम्राज्यवादी शिकंजे के तहत अनेक कुर्बानियों से हासिल की गई आजादी गुलामी में तब्दील होती जा रही है। आशा करनी चाहिए कि कांग्रेस और भाजपा के समर्थकविशेषकर युवालंबे समय तक आजादी का खोते जाना चुपचाप नहीं देखते रहेंगे। वे नवउदारवाद विरोध की राजनीति का समर्थन कर सकते हैं। या अपनी पार्टियों को इसके लिए बाध्य कर सकते हैं। 

Monday, November 7, 2016

लोहिया का जनाजा है जरा..... -प्रेम सिंह

(उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी और मुलायम के सियासी परिवार में जो कुछ भी चल रहा है, इसमें कुछ भी नया नहीं है। जिन्हें खतरे का अंदेशा है वो सालों से इस पर लिख रहे हैं। मूल मुद्दा परिवार की कलह नहीं है, मूल प्रश्न ये है कि क्या मुलायम सिंह वाकई डॉ लोहिया और समाजवादी धारा की सियासत का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्या ये समाजवाद सांप्रदायिकता और नव उदारवाद के गठजोड़ को चुनौती देने वाला है। इसपर  जनवरी 2009 में डॉ प्रेम सिंह ने जनसत्ता में विस्तार से लिखा था। जिसका जिक्र स्वर्गीय प्रभाष जोशी ने अपने कागद कारे कॉलम में किया था। एक बार फिर से इस लेख को पढ़ने की जरूरत है.... समझने वालों का क्या है, वो तब भी नहीं समझे...अब भी नहीं समझ रहे....।) 
उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी के तत्वावधान में जो समाजवादचल रहा है, उस पर टिप्पणी करने का हमारा कतई इरादा नहीं था। जरूरत भी नहीं थी, क्योंकि हम लिख चुके हैं कि अपने को छोटे लोहिया और छोटे मधु लिमये कहलाने के शौकीन नेता वाकई काफी छोटे हो गए हैं - छोटे अमर सिंह! समाजवादी नंगे होते हैं’ - पिछले दिनों मुलायम सिंह ने मायावती को ललकारते हुए जब यह जुमला कहा था तो समाजवादी पार्टी की सच्चाई खुद ही बयान कर दी थी। उसके बाद किसी और की टिप्पणी के लिए कुछ बचता ही नहीं है।
हमें यह टिप्पणी एक विशेष स्थिति में करनी पड़ रही है। इस साल 23 मार्च से डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष शुरू होने जा रहा है। जैसा कि ऐसे अवसरों  पर होता है, पार्टियां और संगठन लोहिया की याद में कार्यक्रमों का आयोजन करेंगे। समाजवादी पार्टी भी कुछ कार्यक्रमों का आयोजन जरूर करेगी। बिना शताब्दी वर्ष के भी सपाई लखनउ की सड़कों पर लोहिया का जनाजा अक्सर निकालते रहते हैं। हाल में ि‍फल्मी हस्ती संजय दत्त और उनकी विवादास्पद पत्नी मान्यता के कंधें पर लोहिया का जनाजा निकाला गया। जाहिर है, शताब्दी वर्ष में वह कुछ ज्यादा धूमधाम से निकाला जाएगा।
हमें यह जान कर हैरानी हुई है कि ऐसे समाजवादी बुि‍द्धजीवी और कार्यकर्ता जो समाजवादी आंदोलन के पराभव और अपने को समाजवादी कहने वाले नेताओं के पतन पर चिंता व्यक्त करते रहते हैं, समाजवादी पार्टी के सहारे लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष मनाने की योजना बना रहे हैं। इसीलिए हमें यह टिप्पणी लिखनी पड़ी है। यह योजना समाजवादी पार्टी के उपाध्‍यक्ष जनेश्वर मिश्रा की अगुआई में उनके दिल्ली स्थित निवास पर बनाई जा रही है। अगर ऐसा होता है, यानी समाजवादी पार्टी के तत्वावधन में लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष मनाया जाता है, तो उसमें शामिल साथी समाजवादी पार्टी के समाजवादको वैधता प्रदान करेंगे। इस अर्थ में कि वह डॉ. लोहिया के विचारों और आदर्शों पर चलने वाली पार्टी है। सभी जानते हैं समाजवादी पार्टी को अमर सिंह चलाते हैं। तो सीधे संदेश यही जाएगा कि अमर सिंह जिन विचारोंऔर आदर्शोंपर पार्टी चला रहे हैं उनका कुछ न कुछ साझा लोहिया के विचारों और आदर्शों से है। जाहिर है, साथियों के इस काम से समाजवादी आंदोलन की जो थोड़ी-बहुत साख अन्य राजनीतिक और बौि‍द्धक समूहों में बची हुई है, वह भी दांव पर लग जाएगी।
बेहतर हो कि साथी जनेश्वर मिश्रा और मुलायम सिंह को अमर सिंह के नेतृत्व में अपना काम करने दें। लोहिया जन्मशताब्‍दी वर्ष उन्हें सदबुि‍द्ध दे, यह भी कामना करें। लेकिन उन्हें लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष मनाना है तो अपने स्तर और बल पर वह काम करें। यह सच्चाई तो साथी भी जानते हैं कि लोहिया के लोगवहां नहीं रहते जहां साथी जाकर बैठकें करते हैं। वे खेतों, कारखानों, खदानों, विश्वविद्यालयों में फैले हैं। अगर प्रतिबद्धता और लगन के साथ काम करें तो एक साल में देशव्यापी स्तर पर विचारपरक और आंदोलनपरक कार्यक्रम  आयोजित किए जा सकते हैं। गंभीर एकेडेमिक सेमिनार आयोजित करने में तो कोई कठिनाई हो ही नहीं सकती है। भारत के बाहर कम से कम एशिया के कुछ देशों में कार्यक्रम  आयोजित करने का प्रयास भी होना चाहिए। और हो सके तो दुनिया के अन्य हिस्सों में भी।  
इस उद्यम में विद्यार्थी युवजन सभा, सामयिक वार्ता, सोशलिस्ट
फ्रंट
, लोकशक्ति अभियान, राष्ट सेवा दल, साहित्य वार्ता, युवजन सांस्कृतिक मंच, समाजवादी साहित्य संस्थान, युवा संवाद और युवा भारत में काम करने वाले गांधीवादी समाजवादी  बिरादरी के साथी अन्य सहमना संगठनों और व्यक्तियों के साथ मिल कर जुट सकते हैं। दरअसल, नजर भव्यता पर नहीं, सार्थकता पर होनी चाहिए। और उसके साथ साख बचाने पर। युवा पीढ़ी में आज भी ऐसे छात्र और नौजवान हैं जो गांधी और लोहिया से प्रभावित होते हैं। लेकिन संप्रदायवाद और जातिवाद की राजनीति करने वाले तथाकथित समाजवादियों का भ्रष्ट चाल-चलन और रीति-नीति उन्हें रास्ते से विचलित और कई बार विरत करते हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण होगा अगर साथी लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष जैसा सौ साल बाद आया अवसर समाजवादी विचारधारा और आंदोलन की साख को बचाने के काम में नहीं लाते।
एक खबर यह भी आई है कि लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष की शुरुआत के उपलक्ष में 21 और 22 मार्च को सभी समाजवादियों का दिल्ली में इक्ठ्ठा होने का आह्वान किया गया है। भले ही वह किसी भी पार्टी में हों। जनता(11 जनवरी 2009 अंक) में इस बाबत सूचना प्रकाशित हुई है। लिखा गया है कि यह मिलन समाजवादी आंदोलन के आदर्शों, मूल्यों और नीतियों को याद करने के लिए आयोजित किया गया है। यह भी लिखा गया है कि मिलन के अवसर का उपयोग देश के विभिन्न भागों में पूरा साल मिलजुल कर कार्यक्रम करने की जमीन तैयार करने में किया जाएगा। सूचना के साथ किसी संस्था या व्यक्ति का नाम नहीं है। जाहिर है, वह संपादक सुरेंद्र मोहन जी की तरफ से निकाली गई है।
किसी कार्यक्रम में दो समाजवादी नेता मिल जाएं तो उनके बीच थोड़ी देर के विलाप के बाद दूसरी बात एका करने की होती है। जनवरी के पहले सप्ताह में दिल्ली में वयोवृद्ध् समाजवादी नेता कैप्टन अब्बास अली के सम्मान में एक कार्यक्रम हुआ। उसमें मुलायम सिंह यादव ने कहा कि समाजवादियों को इक्ठ्ठा होना चाहिए। पासवान ने भी इसकी जरूरत बताई। अपने अध्‍यक्षीय भाषण में सुरेंद्र मोहन ने कहा कि मुलायम सिंह की इच्छा पूरी करने का लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष से अच्छा अवसर नहीं हो सकता। सभी पार्टियों के महत्वपूर्ण समाजवादी 300 के आस-पास की संख्या में 21-22 मार्च को दिल्ली में जुटें। मुलायम सिंह ने सुरेंद्र मोहन को ही यह बड़ाकाम करने को कहा। इस तरह मिलन का संबंध पहले से बन रही योजना के साथ बैठ गया। उसी दिन से सुरेंद्र मोहन सभी पार्टियों के समाजवादियों से संपर्क कर रहे हैं।
जाहिर है, एका की इस कवायद से एका नहीं होने जा रहा है। कांग्रेस और भाजपा के पिछलग्गू नेताओं के लिए मुख्यधारा राजनीति में अपनी कीमत बढ़ाने का यह अवसर होगा। उसमें लोहिया कहीं नहीं होंगे। हां, देश को यह प्रचलित संदेश निर्णायक रूप से जरूर चला जाएगा कि समाजवादियों की कोई विचारधारा, पार्टी या नैतिकता नहीं होती। आगे साथियों को सोचना है।


Saturday, September 17, 2016

'साम्राज्‍यवाद से बडा कोई फासीवाद नहीं है'



सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के प्रधान महासचिव व प्रवक्‍ता और दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक डॉ प्रेम सिंह फरवरी 2015 से बुल्गारिया की सोफिया यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ इस्टर्न लेंग्वेज एंड कल्चर के अंतर्गत भारत विद्या विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। डॉ सिंह की समाजवादी विचारक, नेता और राजनीतिक विश्‍लेषक के तौर पर विशिष्‍ट पहचान है। उन्‍होंने पिछले तीन दशकों में कायम हुए नवउदारवादी-सांप्रदायिक गठजोड की सटीक पहचान, समीक्षा और सक्रिय विरोध किया है। डॉ सिंह की पहचान इस तौर पर भी होती है कि उन्‍होंने अन्ना आंदोलन, अरविंद केजरीवाल गैंग, आम आदमी पार्टी के सियासी इरादों का शुरू में ही खुलासा कर दिया था। इसके चलते उन्‍हें राजनीतिक भविष्यवाणी कर्ता कहा जाने लगा है। वे इसी 30 सितंबर को बुल्गारिया से वापस वतन लौट रहे हैं। क़रीब डेढ़ साल तक देश से बाहर रहते हुए भी वे देश की सियासत पर पैनी नजर रखते रहे और और समय-समय पर राजनीतिक टिप्पणी लिखते रहे। डॉ प्रेम सिंह से ई मेल और फोन के जरिए टीवी पत्रकार राजेश कुमार ने ऑनलाइन साक्षात्कार लिया। 

  1. आप करीब डेढ साल से यूरोप में रह रहे हैं। वहां पूंजीवाद बनाम समाजवाद की बहस  अब किस रूप में होती है? डॉ लोहिया अंतरराष्ट्रीय समाजवादी एका की बात करते थे, तब वो नहीं हो पाया आज के दौर में  आप इसकी क्‍या संभावना देखते हैं?
प्रेम सिंह- आम तौर पर यूरोप में अब यह बहस नहीं है। क्‍योंकि यूरोप कुल मिला कर अमेरिका के पीछे चलता है। लिहाजा, यूरोप का लोकतांत्रिक समाजवाद पूंजीवाद का विकल्‍प नहीं है। इसीलिए लोहिया ने पहले तीसरी दुनिया के समाजवाद की बात की।
पूंजीवाद के दुष्‍परिणामों पर चिंता करने वाले लोग और समूह यूरोप में हैं लेकिन वह विरोध विचारधारात्‍मक यानी राजनीतिक नहीं है। पूंजीवादी उपभोक्‍तावाद से अलग विकास के वैकल्पिक मॉडल की ठोस विचारणा नहीं है। लगभग हर देश में सोशलिस्‍ट पार्टियां हैं जो डेमोक्रेटिक सोशलिज्‍म के तहत कायम की गई थीं और जिनका सोलिस्‍ट इंटरनेशल से संबंध था। उनमें कई सीधे या गठबंधन में सत्‍ता में भी हैं। पूर्व कम्‍युनिस्‍ट ब्‍लॉक के देशों में ज्‍यादातर पार्टियों ने अपने को सोशलिस्‍ट पार्टी में रूपांतरित कर लिया है। उदाहरण के लिए बल्‍गारियन कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ही नाम बदल कर बल्‍गारियन सोशलिस्‍ट पार्टी है। यूरोप के सभी देशों की सोशलिस्‍ट पार्टियों के मंच पार्टी ऑफ यूरोपियन सोशलिस्‍ट्स (पीईएस) का यूरोपियन कौंसिल में नेतृत्‍व बल्‍गारिया के पूर्व प्रधानमंत्री सेरगी स्‍तानिशेव करते हैं। रूस और कम्‍युनिस्‍ट ब्‍लॉक के देशों में कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों के नेता अपनी नई पार्टियां बना कर राजनीति कर रहे हैं। उदाहरण के लिए रूस के राष्‍ट्रपति पुतिन सोवियत संघ की कम्‍युनिस्‍ट पार्टी के एक महत्‍वपूर्ण पूर्व नेता रहे हैं। यूरोक की ये सभी पार्टियां वैश्विक पूंजीवादी आर्थिक संस्‍थाओं - विश्‍व बैंक, आईएमएफ, विश्‍व व्‍यापार संगठन, विश्‍व आर्थिक फोरम - की आर्थिक नीतियों को मानतीं हैं ज्‍यादातर यूरोपीय देश, जिनमें पूर्व सोवियत यूनियन में रहे देश भी शामिल हैं, नेटो के सदस्‍य हैं और पूंजीवाद के आदर्श अमेरिका की समर्थक हैं। जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट पर भी वे पूंजीवादी विकास के मॉडल के दायरे में विचार करती हैं। जब महाराष्‍ट्र के जैतापुर परमाणु संयत्र के खिलाफ आंदोलन चल रहा था तब सोशलिस्‍ट युवजन सभा के अध्‍यक्ष डॉ अभिजीत वैद्य ने फ्रांस के समाजवादी राष्‍ट्रपति ओलेंदो को पत्र लिख कर निवेदन किया था कि फ्रांस रियेक्‍टरों की सप्‍लाई का करार रद्द कर दे। उनका जवाब आया कि सोशलिस्‍ट पार्टी को जैतापुर परमाणु संयत्र का विरोध नहीं करना चाहिए। हालांकि यूरोप में कल्याणकारी राज्‍य की अवधारणा अभी भी काम करती है। सोशलिस्‍ट पार्टियों में ज्‍यादा।

2 जब से मोदी जी प्रधानमंत्री हुए हैं, उन्होंने सत्ता संभाली है,  उनके लगातार विदेशों में दौरे हो रहे हैं। केंद्र सरकार और बीजेपी के नेता देश में इस तरीके से पेश करती है कि इन दौरों के बाद भारतीय विदेश नीति मजबूत हुई है। यूरोप में भारत की विदेश नीति को आपने किस तरीके से देखा?

प्रेम सिंह- बिना अपनी आर्थिक नीति के विदेश नीति नहीं हो सकती। भारत जैसा विशाल देश यह अफोर्ड नहीं कर सकता कि नवउदारवाद की संचालक वैश्विक आर्थिक संस्‍थाओं के डिक्‍टेट पर विकसित देशों के फायदे के लिए अपनी आर्थिक नीतियां चलाए। ऐसा होने पर विदेश नीति भी उन्‍हीं के डिक्‍टेट पर चलती है। नवउदारवादी शक्तियां भारत को पूंजीवादी विकास के नाम पर संसाधनों की लूट और उत्‍पादों की बिक्री के विशाल बाजार के रूप में इस्‍तेमाल कर रहीं है। इसी रूप में भारत की छवि को मोदी मजबूती प्रदान कर रहे हैं। वे हिंदुत्‍ववाद की चूल नवउदारवाद के साथ बिठाने में लगे हैं। भारत की पूंजीवादी विकास के मॉडल की नीतियां भी अपनी नहीं हैं, जैसा कि चीन में है। आदेश बजाने और नकल करने वाले देश की विदेश नीति नहीं होती। नेताओं और कारपोरेट घरानों के दौरों को विदेश नीति नहीं कहते।

3 हाल के दिनों में देश में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगातार हमले के मामले देखने को मिले। दलित उत्पीड़न के भी मामले सामने आए, जिसकी चर्चा विदेशी मीडिया में भी हुई। ऐसी घटनाओं के बाद विदेश में देश की छवि पर किस तरीके का असर देखते हैं?

प्रेम सिंह- अभिव्‍यक्ति की आजादी का संकट है। जीने की आजादी का भी संकट है। नवउदारवादी नीतियों से एक असहिष्‍णु समाज ही बनता है। इसके लिए अकेली भाजपा जिम्‍मेदार नहीं है। कांग्रेस समेत बाकी राजनीतिक पार्टियां भी बराबर की जिम्‍मेदार हैं। यह तानाशाही की तरफ ले जाने वाला रास्‍ता है। विदेश में छवि से मतलब हमारे यहां अमेरिका और विकसित यूरोप में छवि से होता है। वे इसे महज पूंजी निवेश की स्थितियों से जोड कर देखते हैं। मैंने कहा कि इस सब के लिए अकेला संघ संप्रदाय जिम्‍मेदार नहीं है, जैसा कि कहा जा रहा है। दलित उत्‍पीडन, महिला उत्‍पीडन, आदिवासी उत्‍पीडन करने वाले लोग हमारे आस-पास ही रहते हैं। यही स्थिति उन लोगों की है जो सांप्रदायिक उन्‍माद फैलाते हैं। ये सब आरएसएस तक सीमित और अमूर्त ‘तत्‍व’ नहीं हैं। जीते-जागते लोग हैं।

4 जनता परिवार ने निर्णय लिया था एकजुट होने का, लेकिन ये एका हो नहीं पाया। बावजूद इसके बिहार  चुनाव में बीजेपी को करारी हार झेलनी पड़ी। आगे उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे बड़े राज्यों में चुनाव है। ऐसे में  समाजवादी धारा की पार्टियों और समाजवादी नीतियों को मानने वाले दलों को आप कहां पाते हैं?

प्रेम सिंह- मुख्‍यधारा राजनीति में समाजवाद के नाम पर कई क्षेत्रीय पार्टियां हैं लेकिन समाजवादी विचारधारा और आंदोलन से उनका रिश्‍ता नहीं है। वे सभी नवउदारवाद की समर्थक हैं। अलबत्‍ता सत्‍ता के लिए जाति और क्षेत्र की राजनीति करने वाली तथाकथित समाजवादी पार्टियों का चुनावी महत्‍व है। जनता परिवार के एका को मुलायम सिंह ने तोड दिया था जबकि वे ही उसके अध्‍यक्ष थे। उत्‍तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी का एका लालू प्रसाद यादव के राजद और नितीश कुमार की जदयू से हो भी तो उससे समाजवादी पार्टी को कोई चुनावी फायदा नहीं होगा। फायदा तभी हो सकता है जब सपा और बसपा का गठबंधन हो। पंजाब में जनता परिवार से जुडी कोई पार्टी नहीं है।      

5. नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार आने के बाद भी क्या देश की सियासत में सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा पहले की तरह केंद्र में आ पाएगा ? अगर आएगा भी तो धर्मनिरपेक्ष होने का जो दल दावा करते हैं, उनके सामने क्या चुनौती है?

प्रेम सिंह- इस मुद्दे मैं कई बार बोल और लिख चुका हूं। मूल समस्‍या सांप्रदायिकता नहीं, नवसाम्राज्‍यवादी गुलामी है। जैसे उपनिवेशवादी दौर में अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता पैदा की, जिसके चलते देश का विभाजन तक हो गया, उसी तरह मौजूदा नवसाम्राज्यवादी निजाम सांप्रदायिकता की समस्‍या को ज्‍यादा गंभीर बनाता जा रहा है। संविधान की कसौटी पर कोई भी दल धर्मनिरपेक्ष नहीं है। गुजरात नरसंहार के बाद नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार करने वाली और भाजपा के समर्थन से तीन बार मुख्‍यमंत्री बनने वाली मायावती कैसे धर्मनिरपेक्ष हैं? कल्‍याण सिंह के साथ मिल कर सरकार बनाने वाले मुलायम सिंह कैसे धर्मनिरपेक्ष हैं? इन दोनों की राजनीतिक ताकत बाबरी मस्जिद के ध्‍वंस से बनी। दोनों पार्टियों में ज्‍यादातर मुस्लिम नेता, जो एक-दूसरी पार्टी में आवाजाही करते रहते हैं, बाबरी मस्जिद ध्‍वंस की देन हैं। विडंबना देखिए कि मुख्‍यमंत्री होने के नाते ध्‍वंस के लिए सीधे जिम्‍मेदार सांप्रदायिक कल्‍याण सिंह आज कहीं नहीं हैं जबकि धर्मनिरपेक्ष मुलायम सिंह और मायावती न केवल यूपी में राजनीति पर कब्‍जा किए हुए हैं, देश का प्रधानमंत्री बनने की महत्‍वाकांक्षा रखते हैं। कमोबेश पूरे देश में धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और नेताओं का यह हाल है। ऐसे में आरएसएस-भाजपा की सांप्रदायिकता को मजबूत होते जाना है। राजनीतिक ऐषणाएं रखने वाले सिविल सोसायटी एक्‍टीविस्‍ट धर्मनिरपेक्षता कायम नहीं कर सकते। आपने देखा ही कि नामी वकील प्रशांत भूषण ने आम आदमी पार्टी के नेता के बतौर साफ तौर पर कहा था कि दिल्‍ली में सरकार भाजपा के साथ मिल कर बनानी चाहिए, न कि कांग्रेस के। आम आदमी पार्टी के एक और नेता योगेंद्र यादव ने अपने सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल का बचाव करते हुए कहा था कि उनकी डुबकी से बनारस की गंगा कुछ पवित्र ही हुई है। धर्मनिरपेक्षता का संवैधानिक मूल्‍य नवउदारवाद के हमाम में इधर से उधर ठोकरें खाने को अभिशप्‍त बना दिया गया है। एका नवउदारवाद के खिलाफ बनना चाहिए। सांप्रदायिकता की जड पर अपने आप चोट हो जाएगी।

6.1991 में उदारीकरण की शुरुआत हुई, बाजारवाद फैला, उदारवाद को नवउदारवाद कहा जाने लगा, अब पूर्ण बहुमत के साथ बीजेपी के सत्ता में है। उदारवाद-बाजारवाद की बहस को अब आप किस रूप में देखते हैं? अब लगता है इस पर तकनीकी तौर पर होने वाली बहस भी दम तोडती नजर आती है जब प्रधानमंत्री खुद एक निजी कंपनी का विज्ञापन करते नज़र आ रहे हैं।

प्रेम सिंह- यह अब सीधे कारपोरेट पालिटिक्‍स का दौर है। हालांकि भारत में उसका स्‍तर बहुत ही घटिया है। घटियापन और बढेगा इसका आगाज तभी हो गया था जब नरेंद्र मोदी के समर्थन में एक महिला नग्‍नावस्‍था में फूलों के ढेर में लेट गई थी। उसी क्रम में भारत के प्रधानमंत्री को एक धनिक द्वारा कई लाख का सूट पहनाया गया। नवउदारवादी नग्‍नता अपने को इसी तरह ढंकती है! ‘महान राष्‍ट्रवादी’ नेताओं की यह राजनीति है, जिस पर देश के सभी नागरिकों को गौर करना चाहिए।
संविधान, संस्थानों और महत्‍वपूर्ण पदों की गरिमा गिराने में यह सरकार पहले से काफी आगे निकल गई है। खुद पूर्व की भाजपा नीत राजग सरकार से भी। लेकिन समस्‍या का गंभीरतम पहलू यह कि अपने को किसी भी तरह का समाजवादी अथवा सामाजिक न्‍यायवादी कहने वाले ज्‍यादातर बुदि़्धजीवी प्रछन्‍न नवउदारवादी हैं। नवउदारीकरण, न कि सांप्रदायिकता, भाजपा को पूर्ण बहुमत के साथ सत्‍ता में लेकर आया है। पहले की वाजपेयी सरकार भी नवउदारीकरण की देन थी। नवउदारवाद से निजात स्‍वतंत्र और स्‍वावलंबी आर्थिक नीतियों से ही पाई जा सकती है।

7 आपने पहले ही कहा था कि अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल का आंदोलन दरअसल देश की केंद्रीय सत्ता में नवउदारवादी और सांप्रदायिक ताकतों के गठजोड़ को स्थापित करने के लिए चलाया जा रहा है। ऐसे में जो जनवादी राजनीति में यक़ीन करते हैं उनके सामने क्या चुनौतिया हैं

प्रेम सिंह- यह तो उन्‍हें देखना है कि सीधे कारपोरेट की कोख से पैदा आंदोलन, नेता और पार्टी का अंध समर्थन करते हुए वे कितने जनवादी रह जाते हैं और कितने धर्मनिरपेक्ष? पूरा कम्‍युनिस्‍ट खेमा केजरीवाल और उस आम आदमी पार्टी का समर्थक है जिसमें सांप्रदायिक और लुपेंन तत्‍वों की शुरू से भरमार है। 

8 लोकसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन देश की राजनीति का केंद्रीय विषय इस वक्त क्‍या है?

प्रेम सिंह- सरकार का केंद्रीय विषय तो साफ ही है – कारपोरेट की ताबेदारी और सांप्रदायिक-प्रतिक्रियावादी तत्‍वों को उकसा कर देश के सामाजिक-सांस्‍कृतिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाना। जो विपक्ष है वह धर्मनिरपेक्ष तो नहीं ही है, भाजपा से अलग आर्थिक नीतियां भी उसके पास नहीं हैं। वह जानबूझ कर सांप्रदायिकता को केंद्रीय मुद्दा बता और बना रहा है। कांग्रेसी खैरात पर पलने वाले बु‍दि्धीजीवी भी यह कर रहे हैं। हमारे लिए केंद्रीय विषय इस वक्‍त भी और चुनाव के वक्‍त भी नवसाम्राज्‍यवाद को उखाड फेंकना है। साम्राज्‍यवाद से बडा कोई फासीवाद नहीं है। 

9 सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) का आने वाले दिनों में क्या लक्ष्‍य है?

प्रेम सिंह-  नवसाम्राज्‍यवाद को उखाड फेंकने के लिए मुकम्‍मल और निर्णायक जंग। यह हमारे उपर विरासत का सौंपा हुआ कार्यभार है। अगले आम चुनाव तक हम पूरी ताकत से तैयारी करेंगे ताकि सत्‍ता पर दावेदारी ठोंकी जा सके। अगला आम चुनाव हम सही केंद्रीय विषय पर लडेंगे – नवसाम्राजयवादी दायरे में आपस में लडने वाले देशद्रोही और नवसाम्राज्‍यवाद से सीधे भिडने वाले देशभक्‍त।  

10. आपकी अपनी क्‍या भूमिका होने जा रही है्?

प्रेम सिंह- सोशलिस्‍ट पार्टी का पूरे देश में संगठनात्‍मक और सदस्‍यात्‍मक आधार काफी मजबूत हुआ है। कई मोर्चों पर हम काम कर रहे हैं। सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले कई महत्‍वपूर्ण साथियों और संगठनों ने पार्टी के साथ एकजुटता दिखाई है। पीयूसीएल, अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच, रिहाई मंच, खुदाई खिदमतगार जैसे महत्‍वपूर्ण नागरिक संगठनों के साथ मिल कर हम काम कर रहे हैं। मैं नौजवानों में अपना काम और ज्‍यादा मजबूती से जारी रखूंगा। बडे शहरों से बाहर छोटे शहरों, कस्‍बों और गांवों में ज्‍यादा काम करेंगे। मुख्‍यधारा मीडिया हमें बाहर रखता है। सोशल मीडिया का ज्‍यादा से ज्‍यादा उपयोग करेंगे। सीमित साधनों में समग्र प्रभाव बनाने की कोशिश की जाएगी। वीडियो उसमें सहायक होंगे। लिहाजा, राजनीति, समाज, शिक्षा, भाषा, संस्‍कृति, धर्म, जाति जैसे ज्‍वलंत मुद्दों को समझने और उन्‍हें सुलझाने पर ऑडियों कैसेट तैयार करके जारी करेंगे। उनमें दी जाने वाली सामग्री तथ्‍यात्‍मक के साथ संवादधर्मी होगी। किसी भी व्‍यक्ति या संगठन पर आरोप या कटाक्ष का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है। अपने को सही जताने का भी कोई अर्थ अब नहीं बचा है। सभी विषयों पर सकारात्‍मक सार्थक राजनीतिक विमर्श चलाएंगे।

11 आप लोगों से क्‍या कहेंगे उनका समर्थन हासिल करने के लिए?

प्रेम सिंह- यह करते हुए लोगों से पूछा जाएगा कि क्‍या वे देश की राजनीति को इसी ढर्रे पर चलने देना चाहते हैं या इसमें वास्‍तविक बदलाव की इच्‍छा रखते हैं? बदलाव की इच्‍छा रखते हैं तो वे किस राजनीतिक पार्टी को बदलाव का माध्‍यम बनाना चाहते हैं? अगर सोशलिस्‍ट पार्टी उनका चुनाव हो सकती है तो क्‍या वे चाहते हैं कि सोशलिस्‍ट पार्टी पहले प्रचलित तरीकों से ताकत हासिल करे, तब वे साथ देंगे? या वे साथ देकर सोशलिस्‍ट पार्टी को ताकतवर बनाएंगे? हमारी अपील होगी कि वे सोशलिस्‍ट पार्टी का साथ देकर उसे मजबूत बनाएं। हमें यह विश्‍वास बना कर चलना होगा कि सोशलिस्‍ट पार्टी की विरासत, स्‍वतंत्रता संघर्ष के मूल्‍यों और संविधान की मूल संकल्‍पना के प्रति अडिगता का लोग सम्‍मान करेंगे।

12 आप शिक्षक आंदोलन से संबद्ध रहे हैं। शिक्षा के स्‍वरूप पर सुझाव देने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा गठित अंबानी-बिड़ला कमेटी की रपट की समीक्षा आपने ‘शिक्षा के बाजारीकरण की अंबानी-बिडला कमेटी की रपट’ लिख कर की थी। वह पुस्तिका बहुत पढी और सराही गई थी। शिक्षा पर नवउदारवादी हमले को आप कैसे समझते हैं?

प्रेम सिंह- शिक्षा का भट्टा ही बैठ गया है। मेरा मानना है कि जब देश की पूरी राजनीति नवउदारीकरण की वाहक बन चुकी है तब हमें कुछ क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर तय करके नवउदारीकरण की इस चौतरफा मुहिम को पीछे धकेलना चाहिए। ये क्षेत्र शिक्षा, संसाधन (जल, जंगल, जमीन) और सुरक्षा (डिफेंस) हैं। शिक्षा को पहले नंबर पर रखने का कारण है कि शिक्षा स्‍वतंत्र सोच और चेतना का सर्वप्रमुख स्रोत है। पूरे शिक्षा तंत्र को नवउदारीकरण का तौक पहना कर नवसाम्राज्‍यवादी गुलामी को हमेशा के लिए आजादी देने की कोशिश की जा रही है। इसमें कांग्रेस की भूमिका भाजपा से ज्‍यादा रही है।

13 आम आदमी पार्टी से निकले कुछ नेता स्‍वराज अभियान चला रहे हैं। नई राजनीतिक पार्टी बनाने का फैसला भी किया है। आपका क्‍या कहना है?

प्रेम सिंह- मैं क्‍या कह सकता हूं। अभी तो इसे अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की स्‍वराज पाठशाला का ही एक विस्‍तार मानना चाहिए। स्‍वराज अभियान और प्रस्‍तावित नई पार्टी के बूते कुछ ताकत बना कर अपनी असली पार्टी में वापसी कर सकते हैं।

14 आप असली समाजवादी किसे मानते हैं? स्‍वराज अभियान चलाने वाले समाजवादियों के बारे में आपकी राय?

प्रेम सिंह-  मैं कैसे कह सकता हूं कि कौन असली समाजवादी है और कौन नकली। हां, यह चुटकी जरूर ले सकता हूं कि जो आदमी ही नकली हैं, वे असली समाजवादी या कोई अन्‍य राजनीतिक वादी कैसे हो सकते हैं?

15 सर आपका धन्‍यवाद इतना समय देने के लिए। भारत लौटने पर आपसे मुलाकात करूंगा।

प्रेम सिंह-  जरूर मिलेंगे। तुम्‍हारा भी धन्‍यवाद एक अच्‍छी प्रश्‍नावली तैयार करने के लिए।

         (राजेश कुमार, टीवी पत्रकार)


1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...