Tuesday, August 7, 2012

देर से आए लेकिन दुरूस्त नहीं


पिछले डेड़ साल के सक्रिय आंदोलन से पलटी मारते हुए टीम अन्ना ने देश को राजनीतिक विकल्प देने की जो बात की है, उसका स्वागत तो लोकतंत्र में किया ही जाना चाहिए भले ही मुद्दों और विचारों के आधार पर टीम अन्ना से इत्तफाक ना हो। वैसे अभी तक टीम अन्ना ने देश के तमाम मुद्दों पर अपनी राय नहीं रखी है , इसीलिए जनसरोकारी राय रखने वाले लोगों को अभी इंतज़ार करना है। लेकिन जनतंत्र में जब कोई राजनीति में आस्था जताए या फिर जनता से चुनकर व्यवस्था सुधारने की बात करे तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन बावजूद इसके टीम अन्ना ने राजनीतिक विकल्प देने की जो बात कही है उसने कुछ सवाल छोड़ दिए हैं। जिसका जवाब राजनीति में आस्था रखने वाले इस देश के तमाम नागरिकों से लेकर अन्ना आंदोलन से जुड़े लोगों को भी है। बात राजनीति में आने या नहीं आने की नहीं है, बात ये है कि अपने शुरुआत से ही आंदोलन का जो चरित्र रहा उसमें रातों रात बदलाव कैसे आया। पिछले डेड़ साल में टीम अन्ना ने जितने भी दौरे किए जितनी भी बयानबाजी की और जो कुछ भी किया , आखिर क्यों उसमें टीम अन्ना को यू टर्न लेना पड़ा। क्या टीम अन्ना घटते जनसमर्थन से घबरा गई या फिर दूरदर्शी रणनीति के अभाव में जल्दी में वो फैसला कर लिया जिसके लिए बड़ी तैयारी की जरूरत पड़ती है। अगर आंदोलन अपने स्वरूप में सच्चा है तो फिर भीड़ नहीं जुटने से घबराने की कोई वजह नहीं है। 
युवा संवाद के लोहिया विशेषांक निकालने के सिलसिले में उस्मानिया यूनिवर्सिटी से अवकाश प्राप्त प्रोफेसर केशव राव जाधव से मुलाक़ात की थी। वे हैदराबाद प्रवास के दौरान डॉ राम मनोहर लोहिया के करीबी थे और उनका मैनकाइंड के संपादन में सहयोग करते थे। उन्होंने डॉ लोहिया से जुड़ा एक प्रसंग सुनाया था। एक बार केशव राव जाधव ने डॉ लोहिया से पूछा कि डॉ साहब आप इतने बड़े नेता हैं, देश में आपका इतना नाम है। फिर भी आप छोटी मोटी मीटिंग्स के सिलसिले में यहां चले आते हैं। कभी कभी तो ज्यादा भीड़ भी नहीं जुटती, फिर इतना संघर्ष क्यों। डॉ लोहिया ने जवाब दिया था कि देखो जिस वक्त ईसा मसीह को शूली पर चढ़ाया गया था उस वक्त उनके साथ केवल कुछ ही लोग थे, लेकिन आज पूरी दुनिया में उनको माननेवाले सबसे ज्यादा है। इसीलिए मायने भीड़ नहीं रखती ये मायने रखती है कि तुम्हारी बात किस रूप में किन लोगों तक पहुंच रही है। यही नहीं एक बार संसद में किसी कांग्रेसी मंत्री ने डॉ लोहिया से पूछा था , कि आप कितने मतों से जीतकर आए हैं। तब डॉ लोहिया ने कहा था कि इस सदन में जितने सांसद हैं उससे ज्यादा मतों से जीतकर आए हैं। ये दो प्रसंग उस जज्बे की बानगी भर हैं जो किसी दूरगामी लड़ाई के लिए ज़रूरी होते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात है कि पिछले डेड़ साल से भी ज्यादा समय से चलाए जा रहे आंदोलन के रणनीतिकारों ने (जिसमें मठी गांधीवादियों से लेकर कुछ स्वघोषित लोहियावादी भी शरीक हैं ) घटती भीड़ से घबराकर आनन फानन में अपनी रणनीति ही बदल दी। लगातार एकतरफा संवाद चलता रहा हम राजनीति में नहीं आएंगे , हम राजनीति में नहीं आएंगे... हम अगर अस्पताल इलाज कराने जाएंगे तो कोई जरूरी है कि डॉक्टर ही बनकर आएं... या फिर राजनीति मैली हो चुकी है वहां हमारा काम नहीं है। लेकिन बिना किसी संगठनात्मक और वैचारिक समन्वय के अचानक पार्टी बनाने की घोषणा कर दी। इस फैसले ने पिछले डेड़ से अन्ना को परोक्ष या प्रत्यक्ष समर्थन दे रहे अधिकांश लोगों को निराश किया।
नई पीढ़ी के लिए जब टीम अन्ना जन आंदोलनों का रीमिक्स संस्करण लेकर सामने आए। तो उदारीकरण के बाद मनमोहन  सिंह के बाज़ार में खाए अघाए कुछ लोगों ने इस आंदोलन को हाथों हाथ लिया। मीडिया कवरेज भी कुछ इस तरह दी गई जैसे आज़ादी मिलने के बाद पहली बार देश में इस तरह के आंदोलन खड़े किए गए हो। जबकि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और कच्छ से लेकर कामरूप तक हर जगह सच्चे आंदोलनकारी अपनी वाजिब मांगों को लेकर अड़े हुए हैं। सरकार केवल जन लोकपाल पर ही नहीं उन आंदोलनकारियों की वाजिब मांगों पर भी आंख कान बंद किए हुए है। मिट्टी से लेकर मानुष तक और जल जंगल से लेकर ज़मीन तक सब कुछ निजी कंपनियों के लाभ कमाने के लिए छोड़ दिया गया है। और जो इस सरकारी लूट का विरोध करते हैं उन्हें या तो नक्सली बताया जाता है या फिर सरेआम गोली मार दी जाती है। ज़मीन अधिग्रहण और अवैध खनन ने तो विस्थापन की भयावह इबारत ही लिख दी है। जंगलों में रहने वाले आदिवासी अपने पुरखों के आशियाने से जबरन निकाले जा रहे हैं। उन्हें प्रकृति के बीच से निकालकर शहरों में फ्लाईओवर और ओवर ब्रिाज निर्माण में मजदूर बना दिया गया है। सरकार इस तरफ से भी आंखें बंद किए हुए है। पूर्वोत्तर भारत की समस्या को लेकर इरोम शर्मिला पिछले 12 सालों से अन्न त्यागे हुए है सरकार के कान में अभी तक जूं नहीं रेंगी है। शर्मिला के संघर्ष को भी कभी भीड़ हासिल नहीं हुई। यही नहीं टेलीविजन चैनल्स के बुलेटिन जिन ख़बरों से भरे पड़े रहते हैं , उनमें भी संख्याबल के हिसाब से कोई बहुत बड़ी भागीदारी नहीं होती है। तो फिर क्या सभी आंदोलनकारियों और सरकार से लड़नेवालों को अपनी मांगों के मुताबिक राजनीतिक दल का गठन कर लेना चाहिए।                              
लेकिन लोकतंत्र में भीड़ को खारिज भी नहीं किया जा सकता। अगर शुरूआती समय में टीम अन्ना को लोगों का खूब समर्थन मिला था , और अब नहीं मिल रहा तो निश्चय ही ये टीम अन्ना के लिए सोचने वाली बात है। क्योंकि भीड़ देखकर अगर टीम अन्ना ये कहती है कि पूरे देश का उनको साथ है। तो भीड़ हटने पर वो ये नहीं कह सकती कि अभी भी उनको देश का साथ है। भीड़ की जितनी स्तुती टीम अन्ना ने की है, उससे पहले किसी जनआंदोलनकारी ने नहीं की। इसीलिए शायद टीम अन्ना ने कभी भी ना तो संगठन की मजबूती पर ध्यान दिया और ना ही मुद्दों पर। राजनीतिक चेतना का तो टीम अन्ना के संगठन में में जबर्दस्त अभाव है।
इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले भ्रष्टाचार की लड़ाई लड़ रही टीम अन्ना ने शुरुआत से ही जो सबसे बड़ी ग़लती की वो ये कि उन्होंने कभी भी समस्या के जड़ की तरफ ध्यान नहीं दिया। वे हमेशा पत्तियों और शाखों की बात करती रही। टीम अन्ना को जनलोकपाल की बजाए इस बात पर केन्द्रीत होना चाहिए था कि भ्रष्टाचार पनपता कहां से है। कौन घूसखोरी को हवा देता है, कौन सी नीतियां किसानों को उसके खेतों से ज़ुदा करती है। किस तरह की ताक़ते मिलावटखोरों और कमीशनखोरों की रक्षक बनकर खड़ी होती है और कौन सी वजह हमारी राजनीति और संसदीय प्रणाली को दीमक की तरह चाट रही है। टीम अन्ना को भूमंडलीकरण के बाद पनपी बाजार व्यवस्था के दुष्परिणाम और उसके बाद फैले भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार करना चाहिए था, लेकिन टीम अन्ना ने सारी ताकत संसदीय व्यवस्था की कमियां गिनाने में लगा दी। टीम अन्ना को सांप्रदायिक राजनीति को पोषित करने वाली ताकतों के खिलाफ बोलना चाहिए था लेकिन टीम अन्ना आंकड़ों के विकास की बाजीगारी में उलझ गई। और इन सबके बीच सरकार को मौका मिल गया आंदोलन की हवा निकालने का । और आंदोलन अपने मौलिक स्वरूप से भटक गया। अब जहां तक राजनीतिक पार्टी का सवाल है तो सबसे पहले टीम अन्ना को संख्या बल नहीं बल्कि आत्मबल और नैतिक बल का आंकड़ा बढ़ाना पड़ेगा। क्योंकि सत्ता से टकराने के लिए नैतिक बल के अलावा और कोई ताक़त काम नहीं आती और गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण तक सभी ने सत्ता को केवल इसी बल के सहारे पराजित किया है।

Monday, June 18, 2012

सेवा यात्रा की सच्चाई

भारतीय राजनीति में यात्राओं का बड़ा योगदान है। आजादी के पहले से ही राजनीतिक यात्राओं ने हमारी एकता को नई पहचान दी है। महात्मा गांधी की दांडी यात्रा तो स्वाधीनता की लड़ाई में मील का पत्थर साबित हुई थी। उसके बाद गांधी की ग्राम यात्रा और आचार्य बिनोवा भावे की भूदान यात्राओं ने देश को सामाजिक मजबूती प्रदान की।  आजाद भारत में भी सियासी यात्राओं ने अपनी छाप छोड़ी। पूर्व प्रधानमंत्री और युवा तुर्क के नाम से मशहूर चंद्रशेखर की पदयात्रा ने भी देश में राजनीतिक जागृति जगाने की कोशिश की। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस राजशेखर रेड्डी की यात्रा ने भी मजबूत दिख रहे चंद्रबाबू नायडू के सत्ता से बाहर कर दिया था। यही नहीं समाजसेवी पी वी राजगोपाल की जनादेश यात्रा ने भी सोई व्यवस्था को झकझोरने का काम किया था।

इसके साथ ही यात्राओं के लेकर हमारे पास कुछ कटु अनुभव भी हैं। नब्बे के दशक में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा और बीजेपी की तिरंगा यात्रा ने देश को कई कभी ना मिटने वाले जख्म दिए। सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ और देश में अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा का भाव मजबूत हुआ। बावजूद इसके अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने में इन यात्राओं ने बड़ी भूमिका अदा की। कुल मिलाकार हमारा इतिहास सियासी यात्राओं के संस्मरणों से भरा पड़ा है। ज़रूरत है सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था पर उसके प्रभावों के आकलन की। यात्राएं कभी भ्रष्टाचार हटाने के लिए शुरू की जाती है, तो कभी विकास के एंजेडे को प्रचारित करने के लिहाज़ से।

इन सबसे इतर एक और यात्रा है बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सेवा यात्रा।  जो आजकल प्रशासनिक ताम झाम और सरकारी चकाचौंध के बीच लोगों की सेवा के नाम पर करोड़ों खर्च कर की जा रही है। मुख्यमंत्री पहले ज़िले में अपने पहुंचने की सूचना भिजवाते हैं। फिर उनका कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की जाती है। उसके बाद तमाम स्थानीय प्रशासन उनकी यात्रा को सफल बनाने की चेष्टा में जुट जाते हैं। मुख्यमंत्री ज़िले में विश्राम करते हैं और कई कार्यक्रमों में शिरकत भी करते हैं। सेवा यात्रा में मुख्यमंत्री जनता दरबार लगाते हैं और जनता की समस्याओं के तुरंत निपटारे का दावा करते हैं। उनके साथ मौजूद प्रशासनिक अमला समस्या के समाधान की क़वायद में जुटने की बात भी करता है। लेकिन सच्चाई इन सबसे कोसों दूर है। इसकी एक बानगी देखने को मिली बांका में जहां मुख्यमंत्री पिछले साल नवंबर में सेवा यात्रा के दौरान गए थे।  वहीं एक स्थानीय नागरिक ने भितिया कटोरिया मार्ग के वन विभाग की सड़क में क़रीब एक किलोमीटर तक किए गए अतिक्रमण को लेकर शिकायत की। मुख्यमंत्री ने आवेदन को गंभीरता से देखा और समीप ही खड़े ग्रामीण विकास सचिव से मामले में कार्रवाई करने की बात कही। ग्रामीण विकास सचिव ने युवक से पूरी जानकारी लेकर उचित कार्रवाई का आ·ाासन दिया। साथ ही अपना नंबर भी शिकायतकर्ता को दिया ताकि इस मामले के संबंध में आगे भी जानकारी ली जा सके। लेकिन क़रीब सात महीने बीत जाने के बाद भी उक्त मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई। यहां तक की शिकायत की कोई सुध तक नहीं ली गई। अब इस मामले में हाल ये है कि शिकायतकर्ता ने कई बार ग्रामीण विकास सचिव द्वारा दिए गए नंबर पर बात करने की भी कोशिश की, लेकिन दूसरी तरफ से कोई इस संबंध में बात करने तक को तैयार नहीं है।

ये महज एक उदाहरण भर है बांका में सेवा यात्रा के दौरान मिली अधिकांश शिकायतों का हाल यही है। अगर बांका के अनुभव को पूरे सूबे में साझा किया जाए तो सेवा यात्रा की हक़ीकत समझ में आती है। सरकारी मशीनरी को दुरूस्त करने के लिए मुख्यमंत्री भले ही कई उपाय करने का दावा करते होंं , लेकिन प्रदेश में अधिकारियों की सुस्ती और बढ़ती लालफीताशाही किसी भी तरह के सुधार की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। अब इस मामले में दो बातें हो सकती है, एक तो ये कि सारा खेल मुख्यमंत्री की जानकारी में खेला जा रहा है। और मुख्यमंत्री जान बूझकर आंख मूंदे पड़े हैं। और दूसरी बात ये कि मुख्यमंत्री तथ्यों से दूर हैं , और अधिकारी मुख्यमंत्री को वस्तुस्थिति की जानकारी नहीं दे रहे। दोनों ही स्थितियां बिहार के विकास के लिए सही नहीं है जिसका दंभ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिन रात भरते रहते हैं।
राजेश कुमार

Monday, April 30, 2012

गुजरात दंगों की टाट में पैबंद

हिन्दुस्तान में शायद ही कोई हो जो कलाम को बतौर राष्ट्रपति याद रखता हो। सभी के मन में कलाम की छवि एक साहसिक वैज्ञानिक की है, जो भारतीय परंपरा की जीती जागती मिसाल हैं। कलाम साहब का चयन ही ग़लत था, भाजपा ने उन्हें गुजरात दंगों की टाट में पैबंद की तरह इस्तेमाल किया था। और कलाम साहब खुशी खुशी राजी हो गए। पहले कहते रहे दौड़ में नहीं हैं, लेकिन जब अवधि पूरी हुई तो फिर रेस में आ गए। पिछली दफा तर्क ये दिया था कि उन्हें दोबारा राष्ट्रपति बनने के समर्थन में देश भर से इतने ई मेल आए कि उनका मेल आई डी ही हैंग हो गया। जवाब में प्रभाष जी ने जनसत्ता में लिखा था कि .. कलाम साहब जितने मेल से एक ई मेल आई डी हैंग होता है उतने में हिन्दुस्तान जैसे देश में नगर निगम का भी चुनाव नहीं जीता जाता। हम कुछ नहीं कहते बस इतना कहते हैं कि कलाम साहब पिछले कार्यकाल की पांच उपलब्धि बताकर राष्ट्रपति का चुनाव लड़ें
कलाम साहब हर भारतीय की तरह मेरे भी दिल में बसते हैं। लेकिन एक राष्ट्रपति के रूप में नहीं। मैं उनके राष्ट्पति बनने का विरोध इसलिए कर रहा हूं क्योंकि हमारे जैसे लोगों को ये लगता है कि उस पद के लिए जितनी सार्वजनिक जीवन और संविधान की जानकारी चाहिए उतनी डॉ कलाम में नहीं है। इसका उदाहरण हमने तब देखा जब विदेश दौरे पर होते हुए भी कालम साहब ने रातों रात बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने वाली बूटा सिंह की फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए। जबकि वे कैबिनेट की सिफारिश को लौटा सकते थे। अतित में उनसे पूर्व के कई राष्ट्रपतियों ने कई बार ऐसा किया है। कलाम साहब का क्षेत्र अलग है और वे उनके सूरमा रहे हैं। और हमने उन्हें राष्ट्रपति बनने से पहले ही इस काम के लिए भारत रत्न से नवाजा भी है जो देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। लब्बोलुआब ये है कि कलाम साहब जब राष्ट्रपति बने तब भी एक मोहरे मात्र थे , और अगर अब वे चुनाव लड़ते हैं तो भी वे एक मोहरे मात्र होंगे।
रही बात भारतीय जनता पार्टी की तो मेरा विरोध केवल उससे नहीं है और ऐसा हो भी नहीं सकता क्योंकि ये तो उस राजनीतिक विचार और धारा की एक प्रतिनिधि संस्था मात्र है जिससे हमारा विरोध है। और हां आज़ाद भारत में इस धारा का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कांग्रेस का । ये वही धारा है जिसने इस देश में विभाजन की त्रास्दी के बाद कभी भी हिन्दु मुस्लिम एकता की दीवार खड़ी नहीं होने दी। ये वही धारा है जिसने गांधी को गोली मारी और बाबरी मस्जिद गिराकर इस देश के करोड़ों मुस्लमानों में अवि·ाास का माहौल खड़ा कर दिया। ये वही धारा है जिसने गुजरात में कत्ले आम कराए और स्वदेशी के नाम पर वोट मांगकर जब सत्ता में आए तो दुनिया में पहली बार विनिवेश मंत्रालय बनाया । यहां तक कि इस धारा की मातृ संगठन को तिरंगे पर भी एतबार नहीं है। ख़ैर गुनाह गिनने से कोई फायदा नहीं नहीं, अगर मान भी लिया जाए कि कांग्रेस सांप्रदायिक है तो इससे बीजेपी कैसे धर्मनिरपेक्ष हो सकती है। 
-राजेश कुमार

Friday, March 23, 2012

लोहिया मेरी नज़र में


जिस समय के साक्षी हम हैं वो विचारधाराओं के अतिक्रमण का या यूं कहें कि दरकने का वक्त है। खुद को ग़रीबों का स्वघोषित रहनुमा बताने वाले वामपंथी सत्ता के लिए हर बलि देने की होड़ में लगे हैं । गांधी नाम को पेटेंट कराकर आजादी की लड़ाई का इनाम मांगती कांग्रेस तो नेहरू से मनमोहन तक के सफर में बाजार की कठपुतली बनकर रह गई। बाजार के नाव पर सवार मनमोहन सिंह जब भी अपने शासनकाल में मुटाए कुछ उद्योगपतियों और बाजारवादियों की सूची दिखाने लगते हैं तो कोई न कोई सरकारिया आयोग सरकार का मुंह चिढ़ाने लगती है। फिर चाहे वो सच्चर कमेटी की रिपोर्ट हो या तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट। अब बची सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और स्वदेशी का भजन गाने वाली भाजपा, तो फिलहाल पार्टी की पूरी ताकत, बाबरी विध्वंस की त्रास्दी, गुजरात दंगों , फर्जी मुठभेड़ों और अपने तमाम कारनामों को मनमोहन के महंगाई छाप साबुन से धोने में जुटी है। कट्टरवाद और बाजार के चोली-दामन के साथ ने शायद हिन्दुस्तान के लोकतंत्र से विपक्ष की भूमिका ही ग़ायब कर दी है। अब तो ग़रीबों के हक़ की सशस्त्र लड़ाई लड़ने वाले नक्सल आंदोलनकारी भी संदेह में घिरने लगे है। ऐसे वौचारिक तंगी के दौर में जब युवाओं का एक बड़ा तबका निराशा के गर्त में गिरता जा रहा है, तो लोहिया जी आते हैं, और उनकी याद कोई संयोग नहीं है, बल्कि दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे और बेरोजगारों के इस शाइनिंग राष्ट्र की मजबूरी है। डॉ राममनोहर लोहिया ने जिन चुनौतियों से सालों पहले आगाह किया था, इतने दिनों बाद उन्हीं के नज़रों से समाधान नज़र आता है।
आज की सियासत की सबसे बड़ी समस्या पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र का घोर अभाव और राजनीतिक संगठनों में आई गिरावट है। अभी के दौर में कोई भी नेता संसदीय भागीदारी की कसौटियों पर खरा उतरने में सक्षम नहीं है। बेहतर सांगठनिक क्षमता तो अब बीते दिनों की बात हो गई है। लेकिन डॉ राम मनोहर लोहिया संसदीय राजनीति और सांगठनिक क्षमता के अगाध सिंह थे। संसदीय भागीदारी शुरू करने से पहले ही उन्होंने सियासत में अपनी जगह मुकम्मल कर ली थी। तभी तो 13 अगस्त 1963 को जब उत्तर प्रदेश की फर्रूखाबाद लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर डॉ लोहिया लोकसभा पहुंचे , तो उनके स्वागत में पूरा सदन उठ खड़ा हुआ। आज जब पूरा विपक्ष भी सरकार के आगे कमतर साबित होता है, उस जमाने में अकेले लोहिया जी का नाम ही सत्ता विरोधी संगठन बन गया था। भारतीय समाज में व्याप्त असमानता की गहरी खाई को पाटने के लिए समता और संपन्नता के मकसद के साथ उन्होंने समाजवाद का झंडा उस वक्त उठाया था जब कांग्रेस में धुर समाजवादी खेमा हावी था। जो किसी भी नये सिद्धान्त को स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थे। लेकिन जन्मजात विद्रोही लोहिया जी ने कांग्रेस के यथास्थितिवादी नेतृत्व को चुनौती दी। लिहाजा कांग्रेसियों को डॉ लोहिया की विचारधारा स्वीकार करनी पड़ी। इसे डॉ राम मनोहर लोहिया के व्यापक सांगठनिक क्षमता की एक छोटी सी मिसाल समझी जा सकती है। उन्होंने 1952 में एशियाई देशों के समाजवादियों का पहला सम्मेलन आयोजित किया गया जिस तरह की पहल फिर आगे नहीं की जा सकी।
पिछले कई सालों से हमारे यहां गठबंधन सरकारें चल रही हैं, जो भारतीय राजनीति को डॉ लोहिया का एक अनुपम उपहार है। परिवर्तन की राजनीति का मकसद लेकर अलग अलग विचारधाराओं वाली शक्तियों में मुद्दों के आधार पर एका कराकर देश में गठबंधन की नींव लोहिया जी ने ही डाली। अगर ऐसा नहीं कराया होता तो आज के दौर में शायद सरकार भी नहीं बन पाती। जब लोहिया जी ने गठबंधन की बात शुरू की थी तो बड़े से बड़े लोहियावादियों को भी उनकी बात पर एतबार नहीं हुआ था लेकिन उनकी बात तब सही साबित हुई जब 1967 के चुनावों के बाद अलग-अलग राज्यों में ग़ैर कांग्रेसी सरकारें बनी। उनका जुमला वोट , फावड़ा और जेल आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था। क्योंकि जमीन से जुड़े रहकर सत्ता के प्रतिकार की जरूरत आज लोहिया जी के जमाने से कहीं ज्यादा है। सिविल नाफरमानी तो दुनिया भर के लोकतंत्र का सबसे मजबूत कवच है ही। अगर आम लोगों को इसकी ताकत समझ में आ जाएगी तो एक झटके में दुनिया की सारी तानाशाही ताकतें चकनाचूर हो जाएंगी। आज देश पर चुनी हुई सरकारें मनमानी फैसले थोपती हैं। सत्ता में आने के बाद सरकारें ऐसा व्यवहार करने लगती हैं मानो चुनाव जीतने के बाद बहस बांझ हो जाती है। लेकिन डॉ लोहिया की बात...ज़िंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती.. पर अमल लाना शुरू कर दिया जाए, तो चुनी हुई सरकारों का सारा गुरूर काफूर हो जाएगा। लोहिया जी का साफ कहना था कि देश पर अगर कोई सरकार शासन करेगी तो उसे हर पल अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराना होगा।
डॉ. लोहिया सामाजिक समता और राष्ट्रप्रेम के ऐसे प्रचारक थे जो समाज में व्याप्त रुढ़ियों को तोड़ने के लिए आजीवन संघर्षरत रहे। लोहिया जी राजनीतिज्ञ , दार्शनिक और संस्कृति चितंक भी थे। उनका मानना था कि वि·ा क्रांति स्थानीयता के रथ पर ही आएगी..और असली समस्या तो देशी बनाम विदेशी की है। यहीं नहीं डॉ लोहिया पूंजीवाद के प्रसार.. ग़रीबी.. महंगाई.. हिंसा.. वर्णव्यवस्था..रंगभेद और पर्यावरण पर भी एक समान चिंतित थे। उनकी व्यापकता का कोई सानी नहीं था। वे समता और संपन्नता के सच्चे प्रवर्तक थे। राजनीति में इतनी गहरी पैठ रखने के बावजूद लोहिया जी की राजनीति महत्वाकांक्षा बिल्कुल नहीं थी..। और न ही वे राष्ट्र की सीमाओं में बंधकर ही चिंतन करते थे..। कई बार उनके संघर्षों का दूरगामी असर दिखता था। डॉ लोहिया ने अगर अमेरिका के एक रेस्टोरेंट में अ·ोत लोगों के प्रवेश के लिए लड़ाई नहीं लड़ी होती .. तो शायद आज दुनिया के सबसे ताक़तवर मुल्क का राष्ट्रपति एक अ·ोत नहीं होता। यहीं नहीं वे पर्यावरण के भी सच्चे हितैषी थे। 1950 में ही जब पूरी दुनिया पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कुम्भकर्णी नींद में थी..तो लोहिया जी ने हिमालय बचाओ सम्मेलन आयोजित किया। उनका निर्णय आने वाले कल की परिस्थितियों के हिसाब से होता था। वे भारत की गुलामी और विभाजन से सबसे अधिक आहत थे। राजनीति को अल्पकालीन धर्म मानने वाले लोहिया खुद में तो नास्तिक रहे..लेकिन जब देश के लोगों को कुछ समझाया तो धर्मग्रंथो से प्रेरणा लेकर ही समझाया। राम की मर्यादा ..कृष्ण की पूर्णता और शिव की व्यापकता का उदाहरण रखकर रिुायों से सावित्री की बजाए द्रोपदी का आदर्श रखने की वकालत एक धुर विद्रोही ही कर सकता है। जबकि उन्हें मालूम था कि सीता और सावित्री का आवरण भारतीय समाज से उतारना कोई आसान काम नहीं है।
लोहिया जी अकेले ऐसे राजनेता थे जो उत्पादन से लेकर बाजार तक..धर्म से लेकर धर्मनिरपेक्षता तक..सत्ता से लेकर सिविल नाफरमानी तक..और क्षेत्रीय भाषाओं से लेकर अंग्रेजी हटाओ तक सक्रिय थे। कुल मिलाकर गांधी और माक्र्स तक की कमियां गिनाने वाले डॉ लोहिया गांधी के विचारों की अगली कड़ी थे।

Sunday, March 4, 2012

कमरों में कॉमरेड बैठे

कमरों में कॉमरेड बैठे हैं,
सड़कों पर खून बह रहा है।
क्रांति तो किताबों में बंद है,
खुले हैं किवाड़े इतिहासों के।
नारों की फसल उगे हैं होठों पर,
सौ टुकड़े होते विश्वासों के।
हरे भरे सपनों की कौन कहे,
जंगल में गीत दह रहा है।
लाशों को चीत रहे कौओं की,
अपनी क्या जात कहीं होती है।
दिन पर दिन बढ़ रहे नाखूनों की,
कोई तारीख नहीं होती है।
सन्नाटा मौसम पे भारी है,
कितना कुछ शब सह रहा है।
सूरज के माथे पे पसीना है,
सुबह कहीं कोई अफवाहों में।
थर थर कांपती मुंडेरे हैं,
सहमी है धूप कत्लगाहों में।
बदलेगा ये सबकुछ बदलेगा,
मूरख है कौन कह रहा है।
-यश मालवीय

२१वी सदी की रथयात्रा

भेड़िये अब धम्मम शरणं गच्छामी का जाप करते हुए,
नगर के प्रवेश द्वार तक आ पहुंचे हैं।
अनुरोध के अनुसार पहला समागम,
मेमनों के मुहल्ले में होगा।
अरे नहीं डर कैसा,
देखते नहीं उनका पवित्र पीताम्बर।
शुभ्र यज्ञोपवित्र हवा की बेलौस चाल में ,
पताका सी फहराती रामनामी।
अमन का राग गाती स्निग्ध वाणी,
कैसा दिव्य आलोक है मुख मंडल पर।
औह कैसा तेजोमय रूप है,
धन्य भाग धन्य भाग।
-प्रियंकर पालीवाल

Tuesday, February 21, 2012

एक अच्छी कविता

अरसे बाद एक बहुत अच्छी कविता सुनी। शुद्ध कविता कह लीजिए।वो भी किसी न्यूज़ चैनल के प्राइम टाइम कार्यक्रम में। बहुत बेहतरीन सबको अच्छी लगेगी

सवाल प्यार करने या न करने का नहीं था दोस्त
सवाल किसी हां या ना का भी नहीं था
सवाल तो यह था कि उन आंखों में हरियाली क्यों नहीं थी
और क्यों नहीं थी वहां खामोश पत्थरों की जगह एक झील
सवाल मिलने या ना मिलने का नहीं था दोस्त
सवाल खुशी और नाराजगी का भी नहीं था
सवाल तो ये था कि एक उदास तख्ती के लिए क्यों नहीं थी
दुनिया भर में कहीं कोई खड़िया मिट्टी
और क्यों नहीं एक भी दूब इतने बड़े मैदान में
सवाल ताल्लुकात रखने या मिटा देने का नहीं था दोस्त
सवाल ज़रूरत या ग़ैर जरूरत का भी नहीं था
सवाल तो ये था कि इतनी बड़ी दुनिया में कोई इतना अकेला क्यों था
और क्यों नहीं था उसके पास एक भी सवाल इतनी बड़ी दुनिया के लिए

-घनश्याम कुमार देवांश

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...