Monday, January 30, 2012

भरी दोपहरी सूरज डूबा....


बात अस्सी के दशक के शुरूआती सालों की है,,पटना के एक नामी होटल के कमरे में प्रदेश की राजनीति को क़रीब से जानने वाले दो लोगों के बीच गंभीर मंत्रणा हो रही थी,,एक शख्श जिनकी उम्र उस वक्त क़रीब 60 साल रही होगी,,सूबे के बांका ज़िले के कटोरिया विधानसभा के पूर्व विधायक जयप्रकाश मिश्र थे,,और दूसरे शख्श का नाम था दिग्विजय सिंह,,जो तत्कालीन समाजवादी आंदोलन में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रहे थे,,अखबारों में लेखों के जरिए दिग्विजय सिंह उन दिनों बिहार और देश की जनता को अपील करने में लगे थे ,, दोनों के बीच लम्बी चली बातचीत का लब्बोलुआब ये था कि पटरी से उतरती जा रही बिहार की राजनीति को एक सशक्त लीडर की जरूरत है,,लिहाजा युवा नेता दिग्विजय सिंह को अब चुनाव में उतरना चाहिए और बांका संसदीय सीट से अपना दांव आजमाना चाहिए,,वो मुश्किल भरे दौर थे,,बिहार की राजनीति के लिए भी और देश की सियासत के लिए भी,,मंडल,,कमंडल और भूमंडल तीनों सियासी मैदान में कूदने की अंतिम रणनीति बना रहे थे,,और राष्ट्र की सियासत में एक बड़े भूचाल से पहले की शांति छाई थी,,ऊपर से नज़र कुछ नहीं आता था,,लेकिन भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा था,,देश के गंभीर सियासतदां चिंतन मनन के काम में लगे हुए थे,,इसी कड़ी में बिहार की राजधानी के एक होटल के कमरे में सूबे की आने वाली सियासत की धुंधली तस्वीर उकेरी जा रही थी ,,बात भले ही अव्यवहारिक हो लेकिन अतार्किक नहीं थी,,वि·ाविद्यालय के छात्र संघों की संघर्षों के सच्चे प्रतिनिधियों को हमेशा से ही सियासत में आने का निमंत्रण यूं ही मिलता रहा है,,उस दिन एक बड़ी घटना घटी और देश के सबसे ऊर्जावान यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के महासचिव रहे दिग्विजय सिंह ने जयप्रकाश मिश्र का न्योता स्वीकार कर लिया। इस वार्तालाप का जिक्र स्वर्गीय दिग्विजय सिंह ने बांका-भितिया रेल परियोजना के तहत भितिया में जंक्शन के शिलान्यास कार्यक्रम में हजारों लोगों के बीच मंच से किया था।

इस घटना के बाद बिहार और देश की नदियों में गुजरे वक्त के साथ जाने कितना पानी बह गया,, बोफोर्स को मुद्दा बनाकर वीपी सिंह ने मिस्टर क्लीन माने जाने वाले राजीव गांधी को जनता के बीच जाकर खुली चुनौती दे डाली ,, आपातकाल के बाद देश में फिर से कद्दावर विपक्ष करवट लेने लगा ,,राजा नहीं फकीर है के नारे उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीतिक गलियों से होते हुए दिल्ली पहुंचने को छटपटाने लगे ,, इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को मिला बहुमत देखते ही देखते छू मंतर हो गया ,, और 1989 में वीपी सिंह दिल्ली की गद्दी पर काबिज हो गए,,उन दिनों जनता दल में कुछ युवा नेता बड़ी लगन से काम कर रहे थे,,उन्हीं में से एक काबिल नाम था बांका की धरती से होते हुए दिल्ली के सियासी गलियारों में अपनी पहचान बनाने वाले दिग्विजय सिंह का,,दिग्विजय अपने ओजस्वी भाषणों और कर्मठ प्रबंधन से सबके चहेते बनते जा रहे थे।

फिर शुरू हुआ जनता दल में चन्द्रशेखर की उपेक्षा का दौर,,यहीं से समाजवादी जनता पार्टी का बीजारोपण हुआ,,और दिग्विजय सिंह चन्द्रशेखर के कुछ करीबी सहयोगियों में शुमार हो गए। उसके बाद दिग्विजय राज्यसभा के सदस्य चुने गए ,,महज 35 साल की उम्र में ही उन्हें चार महीनों तक चली चन्द्रशेखर की सरकार में विदेश एवं वित्त उप मंत्री की महती जिम्मेदारी सौंपी गई।यही वो समय था जब दिग्विजय की देशव्यापी पहचान बननी शुरू हुई। इन्हीं दिनों दिग्विजय सिंह ने चालीस साल बनाम चार महीने के पोस्टरों के साथ बांका में अपनी चुनावी यात्रा का आगाज किया।
पहले चुनाव में दिग्विजय को करारी हार झेलने पड़ी,लेकिन बांका की पठारी धरती का मोह इस युवा क्षत्रिय के मन में समा गया। इसने पहले चुनाव में मिले मतों की गणना नहीं की,, बल्कि बांका की धरती की उन तमाम संभावनाओं को आत्मसात कर लिया जहां विकास की थोड़ी बहुत भी गुंजाईश दिखती थी। बहरहाल दूसरे ही चुनाव में दिग्विजय को मिले मतों की संख्या हजार से बढ़कर लाखों में पहुंच गई ,,हालांकि महज कुछ हजार वोटों से दिग्विजय जीत से दूर रह गए ,, लेकिन बांका संसदीय क्षेत्र की चुनावी गणित का केन्द्र बनने में सफलता हासिल की,, बाद को चार चुनावों में तीन बार बांका के लोगों ने दिग्विजय सिंह को ही अपनी पहली पसंद बनाया वाजपेयी की सरकार में रेल उद्योग और विदेश मंत्री भी बनाए गए ,, दो हजार चार का चुनाव हारने के बाद दिग्विजय झारखंड से राज्यसभा के लिए चुने गए ,, लेकिन बीच में ही इस्तीफा देकर बांका से निर्दलीय सांसद का चुनाव लड़ा और पार्टी की बजाए जनता का टिकट हासिल कर लिया।

इन बीस वर्षों में चाहे हार हो या जीत बांका में तो दिग्विजय का रूतबा कम हुआ ,,और ही दिग्विजय के दौरे,, अपनी तरफ से दिग्विजय ने बांका की बेबसी कम करने के हर संभव प्रयास किए,,बांका के लोगों को आजादी के साठ सालों के बाद ट्रेन की सीटी सुनाई दी ,,और ज़िले की स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हुआ ,,लेकिन राजनीति का यह माहिर खिलाड़ी खेल के बीच में ही सब को छोड़कर चल दिया ,, अपनी हर सभाओं में दिग्विजय एक बात जरूर कहते थे कि हम टूट जाएंगे लेकिन झुकेंगे नहीं ,,एक दिन कम जियो लेकिन सिर उठाकर जियो,, लगता है सिर उठाकर चलने की ये आदत ऊपर वाले को पसंद गई। आज ऐसे लोग बचे ही कितने हैं ,, जो राजनीति को अपने स्वाभिमान से जोड़कर देखते हैं ,, ऐसे वक्त में जब राजनीति के पेशे में सब कुछ जायज है,, दिग्विजय जैसे स्वाभिमानी राजनीतिज्ञ का हम सबके बीच से जाना खलेगा,,किसी भी सियासतदां की अपनी मजबूरियां भी होती है,, लेकिन ऐसे पॉलीटिशियन कम ही होते हैं जो पत्रकारों और लेखकों से मित्रवत व्यवहार करते हैं,, जो अपने हर कार्यकर्ता के सुख दुख में साझीदार होते हैं,और जिनकी वाणी हमेशा ऐतिहासिक पात्रों का उदाहरण पेश करती है,,,विकास की बात आज हर कोई करता है लेकिन विकास करना सबके बूते की बात नहीं होती,, दिग्विजय आज की सियासत में उन कुछ गिने चुने नेताओं में से थे जिनका मक़सद लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने का था,, दिग्विजय सिंह का परिवार गिद्धौर रियासत से ताल्लुक रखता था,,और उनका बचपन शाही परवरिश से गुजरा था,, लेकिन ऐसी परवरिश के बावजूद भी दिग्विजय ताउम्र लोकतांत्रिक समाजवाद के लिए संघर्षशील रहे,,उनका रहन सहन शाही था लेकिन उनके महल में हर जरूरतमंद के लिए जगह थी,,उनके पास बड़ी संपत्ति थी लेकिन उसमें ग़रीब लोगों का हिस्सा था। आज लोग पद के लिए जाने क्या क्या करते हैं ,, कुल मिलाकर दिग्विजय सिंह आज की राजनीति में एक मिसाल थे। लोग पद के लिए जाने कौन कौन सी सीमाएं पार कर जाते हैं। लेकिन पिछले आम चुनाव में बांका से संसदीय चुनाव लड़ने से पहले दिग्विजय सिंह ने जिस तरह राज्य सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया उसका साहस बड़े से बड़े राजनेताओं में देखने को नहीं मिलता। दरअसल कर्मठता आज की सियासत में आने की अनिवार्य शर्त तो है लेकिन सियासत में बने रहने के लिए यह जरूरी नहीं रह जाती ,, लेकिन फिर भी बांका की धरती से दिग्विजय सिंह जैसा कोई निकलता है जो भारतीय राजनीति की तमाम कसौटियों पर खरा उतरे।
यूं तो मनुष्य का पूरा जीवन ही अन्तरद्वन्द्वों से गुजरता रहता है,,और मन में चल रहे अन्तरद्वन्दों के बीच या तो लोग हालात से समझौता कर लेते हैं या आसान रास्ता अख्तियार कर लेते हैं ,,पिछले कुछ सालों से दिग्विजय सिंह का जीवन भी इसी तरह के अन्तरद्वन्द्वों के बीच गुजर रहा था ,, पहले वे भाजपा के साथ हुए गठबंधन और जदयू और भाजपा के बीच विचारधारा की मिटती दूरी से आहत थे,,उसके बाद नीतीश से विवादों के चलते बनी बनाई पार्टी छोड़ने की असहाय पीड़ा,,अब पिछले कुछ दिनों से तो कांग्रेस से नजदीकियों की भी चर्चा चल रही थी,,ये ऐसे अन्तरद्वन्द्व थे जिनके आगे दिग्विजय सिंह के अन्तर्मन ने समर्पण नहीं किया,,लिहाजा ऊपर की राजनीति तो ठीक चलती रही लेकिन दिग्विजय का अन्तर्मन इन संघर्षों में जूझता रहा,,और यही कारण है कि चिकित्सा जगत भले ही दिग्विजय की मौत का कारण ब्रोन हेम्ररेज बता रहा हो लेकिन मेरे जैसा सुधी दर्शक बिना माईक के भाषण देने वाले दादा दिग्विजय सिंह की मौत का कारण केवल शारीरिक नहीं मान सकता।

दिग्विजय सिंह बिहार की सियासत के बड़े नेता थे ,,लेकिन उनका बड़प्पन उनके शानो शौकत में नहीं था,, दिग्विजय का बड़प्पन उनकी सादे व्यवहार में था,,बात नब्बे के दशक के शुरूआती सालों की है,,दिग्विजय सिंह बांका के दौरे पर थे,,बारिश का मौसम था लिहाजा दिग्विजय सिंह की जीप हमारे गांव तक नहीं पहुंच पाई,,और गांव से आधा किलोमीटर दूर नदी के उस पार रह गई ,, फिर दादा ने बरसाती नदी को पार किया,,उस पार का सफर खुद से मोटरसाईकिल चलाकर पूरा किया ,, फिर बारी आई भोजन की,,तो भोजन में परोसा गया दही चूड़ा और नैनुआ की सब्जी को पूरे चाव से खाया था,,। दिग्विजय सिंह का निधन देश और बिहार की राजनीति की एक बड़ी क्षति है,,लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है बांका को जहां दिग्विजय के रुप में विकास का सपना ही खो गया है। दिग्विजय सांसद रहते या न रहते ये ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं था लेकिन बांका के सर्वांगिण विकास के लिए दिग्विजय की उपस्थिति अनिवार्य थी।
राजेश कुमार

Wednesday, December 22, 2010

एक चिनगारी और।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने ये कविता कभी लोहिया जी के न रहने पर छाए घोर अंधकार और निराशा के वातावरण को देखते हुए...उम्मीद के नए नारे के साथ लिखी थी। ठीक वही कविता आज भी प्रासंगिक है...जब सुरेन्द्र मोहन हमारे बीच नहीं हैं....

लो , और तेज हो गया
उनका
रोजगार

जो
कहते आ रहे हैं

पैसे
लेकर उतार देंगे पार।


बर्फ
में पड़ी गीली लकड़ियां

अपना
तिल-तिल जला कर

वह
गरमाता रहा

और
जब आग पकड़ने ही वाली थी

खत्म हो गया उसका दौर
मेरे देशवासियों

एक
चिनगारी और।


उसने थूका था इस
सड़ी
गली व्यवस्था पर

उलट
कर दिखा दिया था

कालीनों
के नीचे छिपा टूटा हुआ फर्श,

पहचानता था वह उन्हें
जो
रंगे चुने कूड़े के कनस्तरों से

सभी
के बीच खड़े रहते थे।


एक
चिनगारी और

जो
खाक कर दे

दुर्नीति को,ढोंगी व्यवस्था को
कायर
गति को

मूढ़
मति को

जो
मिटा दे दैन्य,शोक,व्याधि,

मेरे देशवासियों

यही
है उसकी समाधि।

मैं
साधारण...

मुझे
नहीं दीखती कोई राह और,

जिधर वह गया है
उधर उसके नाम पर
एक
चिनगारी और।

Tuesday, December 21, 2010

एक उम्र कम है यहां से प्रेरणा लेने के लिए....

दिल्ली की भीड़ भाड़ वाली एक सुबह, वक्त तकरीबन दिन के दो बजे, स्थान दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित विश्व पुस्तक मेले का प्रांगण। समाजवादी चिंतक डॉ प्रेम सिंह की पुस्तक के लोकार्पण कार्यक्रम में प्रसिद्ध आलोचक डॉ नामवर सिंह को शिरकत करना था। लेकिन सारी तैयारी पूरी होने के बावजूद भी वे किसी दूसरे स्टॉल में और कार्यक्रम में व्यस्त थे। तभी एक बुजुर्ग ने मेरे कांधे पर हाथ रखकर धीरे से कहा नामवर जी अमुक के साथ हैं उनका मोबाइल नंबर मिलाओ। मैँने तुरंत उनसे पूछा कि नंबर क्या है। उन्होंने नंबर बताया। मैंने डॉयल किया। तभी बुजुर्ग सज्जन ने मोबाइल पर नामवर जी से बात की..और कहा नामवर जी कहां व्यस्त हैं अब भी जाओ..अब तो कई नामवर हो गए.. बात सीधी थी लेकिन कई मतलब रखती थी। नामवर जी ने कहा कि वे और नामवरों को तैयार करने ही आए हैं और तुरंत स्टॉल में हाजिर हो गए। ये बुजुर्ग सज्जन और कोई नहीं प्रसिद्ध समाजवादी चिंतक सुरेन्द्र मोहन थे। मैंने अपने तमाम मित्रों को बड़े गर्व के साथ कहा कि आज सुरेन्द्र मोहन ने मेरे मोबाइल से नामवर सिंह से बात की। कोई चिंता कोई मलाल कोई गिला कोई शिकवा .. बिल्कुल ही धवल चरित्र था सुरेन्द्र मोहन का। हैदराबाद में जैसे ही ख़बर आई कि सुरेन्द्र मोहन नहीं रहे। लगा सिर से अभिभावक का साया उठ गया। एक झटके में समाजवादी आंदोलन का सारथी चला गया। अपनी उन तमाम उम्मीदों को छोड़कर जिसे पूरा करने के लिए पूरी जिंदगी गुजार दी। आज के भ्रष्ट माहौल में एक ऐसी शख्शियत हमारे बीच से उठ गई , जिसे दिखाकर हम ईमानदारी की मिसाल दिया करते थे। कहा करते थे देखो ये वही शख्श है जिसने अपने सारे सपने महज इसलिए लुटा दिए कि हिन्दुस्तान में कुछ लोग सपने देख सकें। वो आंखें जो सालों साल से व्यवस्था की बोझ तले दबाई जा रही हैं। उन्हें आवाज देने के लिए ही सुरेन्द्र मोहन ने जिंदगी गुजार दी। कुर्बान अली ने बीबीसी में सटीक लिखा है...तुने न्यूनत्तम लिया ... अधिकत्तम दिया..तुम्हारे जैसा कौन जीया ... एक बड़े शायर ने कहा है कि यूं चलकर नहीं ये तर्जे सुखन आया है.. पांव दाबे हैं बुजुर्गों के तो फन आया है ... वादा भी है और भरोसा भी कि सुरेन्द्र मोहन की लड़ाई कमजोर नहीं होगी ....
राजेश कुमार

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...