Sunday, August 15, 2021

तिरंगे पर कब्जे की लड़ाई - प्रेम सिंह

 


(2011 का यह लेख हिंदी मासिक ‘युवा संवाद’ में छपा था। तब से लेकर अब तक सत्ता के गलियारों में तिरंगे का कारोबार कई गुना बढ़ चुका है। ध्यान कर सकते हैं कि इंडिया अगेन्सट करप्शन के तत्वावधान में आयोजित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, और उसकी कोख से निकली कारपोरेट राजनीति की नई बानगी तिरंगे पर सवार होकर आई थी। यह भी ध्यान कर सकते हैं कि भारत के प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष खेमे ने तिरंगे पर सवार होकर आने वाली उस विचारधारा विहीन राजनीति को स्थापित करने में पूरा हांगा लगा दिया था। खास कर पिछले दो दशकों में कारपोरेट राजनीति ने तिरंगे को बहुत ऊंचा चढ़ा दिया है। खबर आई है कि प्रवासी भारतीयों की फेडरेशन ने न्यूयार्क शहर के मशहूर टाइम्स स्क्वेयर पर 75वें स्वतंत्रता दिवस पर विशालतम तिरंगा फहराया है। तिरंगा ध्वज की ताकत की पड़ताल करने वाला यह लेख नए पाठकों के लिए फिर से साझा किया जा रहा है।)

 

शासक-वर्ग की ताकत का तिरंगा 

 

26 जनवरी को 62 वें गणतंत्र दिवस का जश्न पूरा हुआ। देश और प्रांतों की राजधानियों  के ‘राजपथ’ पर और ऊपर आकाश में तिरंगा लहराया गया और उसका गुणगान हुआ। शासकीय प्रतिष्ठान के छोटे ठिकानों पर भी धूम-धाम से जश्न मनाया गया। स्वाधीनता दिवस  और गणतंत्र दिवस पर शासक-वर्ग का तिरंगा-प्रेम देखते बनता है। तिरंगे के साथ वह जैसे खुद लहराने लगता है।  तिरंगा अब भारत के शासक-वर्ग की ताकत का प्रतीक है। दोनों एक-दूसरे में घुल-मिल गए हैं। तिरंगे में निहित जनता की ताकत शासक-वर्ग ने पूरी तरह सोख ली है। जो तिरंगा हमारे चारों तरफ लहराता नजर आता हैवह भारत के शासक-वर्ग का राष्ट्रीय ध्वज है। जिसका तिरंगे पर कब्जा होगाउसका देश पर भी कब्जा होगा। इसीलिए शासक-वर्ग में ऊंचा से ऊंचा और सुंदर से सुंदर तिरंगा लहराने की होड़ लगी रहती है।

 

हम पहले बता चुके हैं कि मुनाफे की मुहिम पर निकली दुनिया भर की बहुराष्ट्रीय कंपनियांजिन्होंने मादरे हिंद और उसकी गरीब संतानों को आक्रांत करके रख दिया हैभी तिरंगे को प्यार करती हैं। स्वाधीनता और गणतंत्र दिवसों पर कंपनियों का तिरंगे के लिए प्यार शासक-वर्ग की तरह छलकता है। हमारे बच्चे तिरंगे की महिमा वहीं से सीखते हैं। हम तफसील से बता चुके हैं कि देश के संसाधनों को इन कंपनियों और कारपोरेट घरानों को बेचने का काम शासक-वर्ग तिरंगे को साक्षी रख कर करता है। जिस दिन मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सरकार ने अमेरिका के साथ परमाणु समझौता करके देश के अस्मितासंप्रभुता और सुरक्षा तंत्र में स्थायी कील ठोंकी थीसंसद पर तिरंगा बड़ी शान से लहरा रहा था। तब हमने बताया था कि परमाणु समझौते का विरोध करने वाली भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियां सरकार में होतीं तो वही करतीं जो कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों ने किया। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब भारत के शासक-वर्ग की स्थायी सदस्य हैं। इस मायने में भारत का वाकई वैश्वीकरण हुआ है।

 

आजादी के संघर्ष के दौर में तिरंगा कांग्रेस का झंडा था जिसके बीच में चरखे का निशान रखा गया था। संविधान सभा में चरखे की जगह धर्म-चक्र रखा गया तो चरखे वाला तिरंगा कांग्रेस पार्टी ने अपने झंडे के रूप में बनाए रखा। कांग्रेस में विभाजनों से पैदा हुए विवादों के बावजूद नेहरू खानदान वाली कांग्रेस ने तिरंगा कभी नहीं छोड़ा। 1969 में कांग्रेस में विभाजन होने पर चरखे के निशान वाला झंडा और दो बैलों की जोड़ी वाला चुनाव चिन्ह चुनाव आयोग ने रोक लिए थे। इंदिरा गांधी की कांग्रेस को गाय का दूध् पीता बछड़ा चुनाव चिन्ह मिला तो उसने वह तिरंगे में चरखे की जगह रख दिया। 1978 में कांग्रेस में हुए एक और विभाजन पर इंदिरा गांधी वाली कांग्रेस को हाथ चुनाव चिन्ह मिला। उसे भी उसने पहले के तिरंगे के बीच रख दिया। इसका उसे बराबर चुनावी लाभ मिलता रहा है। वह राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे पर कब्जे की लड़ाईजिस पर हम इस बार चर्चा करने जा रहे हैंमें भी हमेशा आगे रहती है। तिरंगे में शासक- वर्ग की सत्ता की ताकत बसती है तो जाहिर है उस पर कब्जे की लड़ाई भी है। उस लड़ाई के कई रूप सामने आते रहते हैं।

 

काफी पहले से यह कहने का प्रचलन है कि देखें अगली बार लाल किले पर तिरंगा कौन फहराएगाअथवाकिसने कितनी बार लाल किले पर तिरंगा फहरायाइस तरह भी कहा जाता है कि फलां देखते हैं लाल किले पर तिरंगा फहरा पाएगा या नहींअर्थात देश के शासक-वर्ग की सबसे ताकतवर हस्ती और जमात कौन-सी होगीभारत में राजनीति करने वाला हर वह शख्स जो प्रधानमंत्री बनने का मंसूबा पालता हैअपने को लाल किले पर तिरंगा फहराते जरूर कल्पित करता होगा!

 

चौधरी चरण सिंह के समय जब डोर खींचने में कुछ विलंब हुआ तो संदेश यही गया कि वे तिरंगा फहराने के सही दावेदार नहीं हैं। उनका तिरंगे से तादात्मय नहीं हो पाया है; वह तिरंगाजो शासक-वर्ग की ताकत और शान का प्रतीक है। आप देख सकते हैं भारत के बुद्धिजीवी  कभी अपने राजनैतिक विश्लेषण में चरण सिंह का नाम नहीं लेते। हमने कभी उन पर दो-तीन लेख लिखे तो एक मार्क्सवादी मित्र ने कहा कि यह तुम्हें क्या हो गया है? यानि राजनैतिक लेखन उन्हीं पर केंद्रित होना चाहिए जो सही मायने में शासक-वर्ग में आते हैं!

 

सत्ता की दावेदार देश की दूसरी बड़ी राजनैतिक पार्टी भाजपा ने इस बार कुछ अलग अंदाज में तिरंगा फहराने की ठानी। सत्ता के बारे में बताते हैं कि वह खून की तरह मुंह लग जाती है। पिछले आम चुनाव में एक बार फिर पराजय ने भाजपा को अंदर तक बेचैन कर दिया है। अपने प्रिय भगवा ध्वज को एक तरफ फेंक कर ‘या तिरंगा तेरा ही आसरा’ कहते हुए उसने घोषणा की कि गणतंत्र दिवस पर वह श्रीनगर के लाल चौक पर जाकर तिरंगा फहराएगी। लाल चौक पर तिरंगा फहराकर वह अलगाववादियों को राष्ट्रवादी जवाब देगी। उसके हिसाब से कश्मीर अलगाववादियों के हाथ में चला गया है। वहां जो तिरंगा फहराता है अथवा इस गणतंत्र दिवस पर फहराया जाएगाउसमें राष्ट्र-भक्ति की ताकत नहीं है।

 

भाजपा मतदाताओं को संदेश देना चाहती थी कि जिस कांग्रेस सरकार को उसने चुना हैउसमेंयानी उसके राष्ट्रवाद मेंअलगाववाद और आतंकवाद से निपटने की ताकत नहीं है। वह तिरंगे की ताकत का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती। वह ताकत भाजपा के राष्ट्रवाद में हैजो जोखिम उठा कर लाल चौक पर तिरंगा फहराने का हौसला रखती है। भाजपा ने माना कि देश की जनता तक उसके देशभक्ति और बहादुरी से भरे कदम का संदेश पहुंचेगा और वह अगली बार उसे लाल किले पर एक बार फिर तिरंगा फहराने का मौका देगी। अगले आम चुनाव में उसका एक नारा हो सकता है – ‘कश्मीर बचाना हैभाजपा को लाना है’।

 

भाजपा जानती है कश्मीर को लेकर पाकिस्तान में ही नहींभारत में भावनाओं का ज्वार उमड़ता है। तभी कांग्रेस के नेताओं ने भाजपा को कहा कि वह कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति न करे। यानी उसे पूरा डर है कि भाजपा का कश्मीर में तिरंगा फहराने का अभियान उसे राजनीतिक लाभ दे सकता है। 12 जनवरी 2011 को एकता यात्रा के नाम से कलकत्ता से लहराते तिरंगों का एक रथ सजाया गया जिसे श्रीनगर के लाल चौक तक जाना था। आयोजन हालांकि भारतीय जनता युवा मोर्चा का था लेकिन पार्टी के कई बड़े नेता उसमें शामिल हुए। कश्मीर के नाजुक हालातों के मद्देनजर कार्यक्रम रोक देने की केंद्र व जम्मू-कश्मीर सरकारों की अपील पर ध्यान न देकर उन्होंने कार्यक्रम की जोरदार वकालत की।

 

एकता यात्रा के दौरान तिरंगा लहराते हुए भाजपा ने कई जगह कार्यक्रम आयोजित किए और बयान दिए। कहा कि वे राष्ट्रवादी हैंजो अलगाववादियों से मुकाबला करने कश्मीर जा रहे हैं। कश्मीर में कांग्रेस ने अलगाववादियों के सामने घुटने टेक दिए हैं। केंद्र और जम्मू-कश्मीर की सरकारें तिरंगा फहराने के संविधान-सम्मत नागरिक अधिकार को छीन कर आपातकाल जैसा बर्ताव कर रही हैं। अहिंसक आंदोलन को सुरक्षा बलों द्वारा कुचला जा रहा है। तिरंगा लेकर चलना और फहराना इस देश में क्या गुनाह हो गया है?

 

जनसत्ता’ के एक प्रचारक पत्रकारजो हिंदू और मुसलमान के खांचों को छोड़ कर कभी नागरिक या मनुष्य के रूप में नहीं सोच पातेने लिखा कि जब जम्मू-कश्मीर पुलिस में भरती इतने मुसलमान रोज तिरंगा लेकर चलते हैं तो भाजपा को तिरंगा फहराने से क्यों रोका जा रहा है? जनता दल यूनाइटेड भाजपा की सहयोगी पार्टी है। उसके नेताओं ने कहा कि भाजपा को कश्मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर यह नहीं करना चाहिए। शासक-वर्ग के नए ‘विकास पुरुष’ नितीश कुमार भी बोले। लेकिन भाजपा को उनकी न सुननी थीन सुनी। संघ संप्रदाय उनकी हकीकत और हैसियत जानता है कि ये ‘पिछड़े सम्राट’ महज एक-दो पारी मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री बनने की राजनीति करते हैं। संघ के सामने बड़ा मिशन है – हिंदू-राष्ट्र बनाने का। वह एक दीर्घावधि परियोजना है। उसमें न जाने कितने जॉर्ज फर्नांडीजों और मायावतियों को मंत्री-मुख्यमंत्री की पारियां देनी होंगी। हिंदू-राष्ट्र बनाना बलिदानी काम है  तो बलिदान  करना होगा – ‘तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें’!

 

अपने शासनकाल में भाजपा ने मुसलमानों को रिझाने और धमकाने  के काफी प्रयास किए थे। वाजपेयी ने हरा साफा भी बांध था और आरएसएस ने संघ में मुसलमानों को लेने की घोषणा की थी। लेकिन मुसलमान हैं कि सीधे साथ नहीं आते। पिछड़े और दलित नेताओं का यह फायदा है कि वे उनके साथ आ जाते हैं। इस तरह भाजपा से बिदके मुसलमान भी हिंदू-राष्ट्र बनाने के काम में आ जाते हैं। भाजपा दलितों और पिछड़ों को भी अपने काम में आया मानती है, जब मायावती और नितीश कुमार को मुख्यमंत्री बनवाती है। हालांकि दिल की तसल्ली के लिए ऐसे नेता कहते रहते हैं कि वे भाजपा का इस्तेमाल कर रहे हैंजबकि सच्चाई इसके उलट होती है – वे इस्तेमाल हो रहे होते हैं। दलित और पिछड़ा उभार की प्रगतिशील भूमिका के हिंदू-राष्ट्र को किए जाने वाले इस अवदान को भी गौर किया जाना चाहिए।

 

बहरहालजम्मू में कुछ भाजपा नेताओं की गिरफ्तारी हुई और उन्होंने मीडिया को संबोधित किया। उनकी गिरफ्तारी के विरोध् में राजनाथ सिंह दिल्ली में राजघाट पर उपवास पर बैठे। उन्हें लगा होगा कि गांधी की समाधि पर बैठ कर अहिंसा की बात करने का कुछ न कुछ प्रभाव जरूर होगा। गांधी के साथ जितना भौंड़ा और पाखंडपूर्ण व्यवहार भारत का शासक-वर्ग करता हैउसकी कहीं मिसाल नहीं मिलेगी। ‘वध्’ भी करेंगे और ‘प्रातःस्मरणीय’ भी बना लेते हैं! किसानों की आत्महत्याओंनौजवानों की बेरोजगारीबच्चों के कुपोषण और करोड़ों मेहनतकशों को भुखमरी और बीमारी का शिकार बना कर सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह कहते हैं वे गांधी के सपनों का भारत बनाने में जुटे हैं! यह कहानी भारत में नेताओं से लेकर बुद्धिजीवियों तक अनंत है।

 

काफी फेनफेयर से शुरू की गई भाजपा की एकता यात्रा ने जम्मू आते-आते दम तोड़ दिया। कार्यकर्ताओं की भीड़ नहीं उमड़ी। लाल चौक पर तिरंगा नहीं फहराया जा सका। सुरक्षा बलों के घेरे को तोड़ कर एक भी नेता या कार्यकर्ता लाल चौक नहीं पहुंचा। जम्मू इलाके के कठुआ कस्बे मेंखबरों के मुताबिक 200 कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में भाजपा नेताओं ने तिरंगा फहराने की रस्म अदायगी की। सब जानते हैं अपनी सरकार न रहे तो ‘आंदोलन’ में जोखिम रहता है। वे जोखिम उठाने की भावना में जीने और वास्तविकता में जोखिम उठाने का जमीन-आसमानी फर्क कई पीढ़ियों से जानते हैं।

 

इस संदर्भ में यहां ‘मैला आंचल’ का एक प्रसंग देखा जा सकता है: ‘‘अगस्त 1942 । कचहरी पर चढ़ाई। धांय-धांय। पुलिस हवाई फायर करती है। लोग भाग रहे हैं। बावनदास ललकारता हैजनता उलट कर देखती है। डेढ़ हाथ का इंसान सीना ताने खड़ा है। … ‘बंबई से आई आवाज!’ … जनता लौटती है। बावनदास पुलिस वालों के पांवों के बीच से घेरे के उस पार चला जाता है और विजयी तिरंगा शान से लहरा उठता है। … महात्मा गांधी की जय!’’ (पृष्ठ 131)

 

तिरंगा न फहरा पाने के बावजूद कार्यक्रम  को सफल बताते हुए भाजपा नेताओं ने एकता यात्रा में हिस्सा लेने वाले कार्यकर्ताओं को बहादुर बताया और उनकी बहादुरी की तारीफ के पुल बांधे। बातों की बहादुरी की हौसला अफजाई इसी तरह की जाती है! भाजपा ने इतनी कवायद और खर्चा बेकार नहीं किया था। उसे पता था जिस तरह के हालात हैंलाल चौक पर तिरंगा नहीं फहराने दिया जाएगा। वे यह भी जानते थे कि बातों की बहादुरी रास्ते के लिए है; लाल चौक पहुंचना जान जोखिम में डालना होगा। लेकिन उसे आशा थी कि ऐसा करने से प्रचार मिलेगाजिसका पार्टी को राजनीतिक फायदा हो सकता है। मीडिया में उसे काफी प्रचार मिला भी। राजनीतिक फायदे का बाद में पता चलेगा।

 

भाजपा का यह पुराना राग है कि अलगाववाद पर राष्ट्रवाद की जीत केवल वही सुनिश्चित कर सकती है। उसकी नजर में लाल चौक पर तिरंगा फहराना राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति काम है। यह कवायद वह एक बार पहले भी कर चुकी है। 1991 में उसके वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने एकता यात्रा की थी और हवाई जहाज से जाकर लाल चौक पर तिरंगा फहराया था। तब से अलगावाद और आतंकवाद कई गुना बढ़े हैं। यह समस्या केवल कश्मीर तक सीमित नहीं है। आसाम समेत पूरा उत्तर-पूर्व लंबे समय से अलगाववाद की चपेट में है। ऐसा नहीं है कि वहां मुसलमान अलगाववादी हों। खुद उनकी सहयोगी शिवसेना महाराष्ट्र में गरीब मेहनतकश उत्तर भारतीयों को जब-तब पीटती रहती है। महाराष्ट्र की सीमा से लगे राज्यों के साथ अगर कोई विवाद है तो शिव सैनिक उस राज्य विशेष के नागरिकों को महाराष्ट्र में रहने का दंड देते हैं। जिस जनता को भाजपा तिरंगे की ताकत दिखाना चाहती हैवह उससे पूछ सकती है कि अगर लाल चौक पर तिरंगा फहराने से अलगाववाद पर राष्ट्रीय एकता की जीत हो जाती है तो वह ‘जादू’ पहले की यात्रा से क्यों नहीं हो गया?

 

शासक-वर्ग का सम्मिलित चरित्र

 

लोहिया ने भारत के शासक-वर्ग के बारे में बताया है कि वह शुरू से कायर और जी-हुजूरिया रहा है। इसमें जोड़ा जा सकता है कि वह नकलची भी रहा है। शासक-वर्ग के कायरचापलूस और नकलची चरित्र की कई अभिव्यक्तियां (मेनीफेस्टेशंस) देखने को मिलती हैं। उन पर यहां विचार करने का इरादा नहीं है। यह कहा जा सकता है कि संघ संप्रदाय उन अभिव्यक्तियों में सबसे दयनीय नजर आता है। जोखिम उठाने और वीरता दिखाने का उसका खाता खाली है। वह जो सांप्रदायिक ‘जौहर’ दिखाता हैउसे वीरता उसके अपने शब्दकोश में ही कहा जा सकता है। संघ संप्रदाय ने आजादी के संघर्ष में हिस्सेदारी नहीं की। की होती तो उसमें जोखिम उठाने की हिम्मत आती और भारत के बहुलताधर्मी  स्वरूप की समझदारी भी बनती। तब उसकी खुद की स्थिति बेहतर होती और वह समाज की बेहतरी का काम भी कर पाता। अब जबकि सुरक्षा और सुभीता हैधरती पर रथों और आकाश में हवाई जहाजों से आना-जाना हैआलीशान होटलों में सोना-खाना हैमीडिया वाले साथ-साथ चलते हैंपल-पल प्रचार होता हैतो वह बातों का बहादुर बनता है।

 

प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी बतोला मारते थे कि भारत को कोई माई का लाल नहीं खरीद सकता। यानी उनके रहते नहीं। ये वही वाजपेयी हैं जिनके बारे में चर्चा रही है कि उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने वालों के खिलाफ मुखबरी की थी। उनके बचाव में कहा जाता है कि तब उनकी उम्र ही क्या थीहालांकि खुदीराम बोस से लेकर भगत सिंह तक क्रान्तिकारियों की उम्र ज्यादा नहीं रहीहम पुराना किस्सा नहीं उठाना चाहते। वैसे भी भारत छोड़ो आंदोलन में मुखबरी करने वाले वे अकेले नहीं थे। कम्युनिस्टों ने मुखबरी को मुहिम बना दिया था। उसके पहले क्रांतिकारियों के और क्रांतिकारियों में भी मुखबिर होते थे। उनमें कुछ आजादी के बाद तक लांछन झेलते रहे। उसके भी पहले 1857 के विद्रोह की पराजय में एक बड़ा कारण मुखबरी था।

 

आज की बात करते हैं। वाजपेयी जो अपने को प्रधानमंत्री से पहले स्वयंसेवक कहते थेके प्रधानमंत्री रहते कंपनियों को संसाधनों की बिकवाली और देश के भीतर व सीमा पर हमलों में कोई कमी नहीं रही। पिछले आम चुनाव में भाजपा की सरकार बन जाती तो वह एकता यात्रा की कवायद नहीं करती। तब उसे राष्ट्रीय एकता बनी हुई और मजबूत नजर आती। जैसे सत्तासीन कांग्रेस को आती है। शासक-वर्ग की यही खूबी होती है। कांग्रेस ने पिछले आम चुनाव में भाजपा को एक बार फिर परास्त कर दिया तो कारण साफ था। वह कारपोरेट हितों को पोसने वाली नवउदारवादी व्यवस्था को मजबूती से आगे बढ़ाने में भाजपा से ज्यादा दक्ष सिद्ध हुई है। उसका कारण भी स्पष्ट है। आज की कांग्रेस के पास राजीव गांधी को छोड़ कर विरासत के नाम पर ढोने के लिए कोई बोझ नहीं है। आज की कांग्रेस के मायने सोनिया गांधी हैं। सोनिया गांधी की चेतना में न आजादी के संघर्ष और उसके मूल्यों की कोई रेखा हो सकती हैन आजादी के बाद के नेहरूवादी समाजवाद की। अमेरिका की दाब में न आने के इंदिरा गांधी के तेवर का स्पार्क भी उनमें नहीं है।

 

भारत जिस भले-बुरे महासमुद्र का नाम हैउसे थाहने का काम बड़े-बड़े प्राच्यवादी और भारतीय विद्वान नहीं कर पाते हैं। जाहिर हैसोनिया गांधी के वश का वह काम नहीं है। ये सोनिया गांधी की कमियां नहीं कही जा सकतीं। इस सब के लिए उनकी अक्षमता स्वयंसिद्ध है। उन्होंने अक्षमता को ओवरकम करने का गंभीर प्रयास भी नहीं दर्शाया है। वे राजीव गांधी की पत्नी के नाते कांग्रेस की ‘रानी’ हैं और उनका बेटा देश का ‘युवराज’। उन्होंने अलबत्ता यह अच्छी तरह समझ लिया है कि भारत का शासक-वर्ग किन्हीं भी कारणों से सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे व्यक्ति की अंधा होकर चापलूसी करता है। मनमोहन सिंह को आप जानते हैं। वे उपनिवेशवादी दौर में पड़े पूंजीवादी साम्राज्यवाद के बीज का प्रस्फुटन हैं। उनके लिए नवसाम्राज्यवाद की सेवा एकमात्र और स्वाभाविक कर्म है। इसीलिए आज की कांग्रेस भाजपा से ज्यादा चुस्ती-फुर्ती से काम करती है। आजादी के संघर्ष का बिरसा तो भाजपा के पास भी नहीं हैलेकिन प्राचीन हिंदू-राष्ट्र और हिंदू संस्कृति की ‘महानता’ का बोझ उसे दबोचे रहता है। हालांकि उसके कुछ ‘आधुनिक सपने’ भी हैं। उनमें एक सपना रहा है कि समाजवादी रूस से काट कर पूंजीवादी अमेरिका के साथ भारत को अपने संबंध् मजबूत करने चाहिए। इसमें उसे दोहरा लाभ लगता है। पहलाभारत से समता के विचार का बीज-नाश होगा और उससे हिंदू-राष्ट्र कायम होने में भारी मदद मिलेगी। दूसराभारत से जुड़ कर अमेरिका ‘मुस्लिम राष्ट्र’ पाकिस्तान से कटेगाउससे भी हिंदू-राष्ट्र का कारज सिद्ध  होगा।

 

उसने पहली बार केंद्र में सत्ता मिलते ही अमेरिका के साथ वार्ताओं के कई दौर चलाए। जसवंत सिंह-टालबोट वार्ताएं लोग भूले नहीं होंगे। पूरे शासनकाल में भाजपा अमेरिकी चापलूसी में संलग्न रही ताकि कांग्रेस से बाजी मारी जा सके। लेकिन भूतकालिक दिमाग हमेशा फिसड्डी ही रहता है। भाजपा भूल गई कि रूस बिखर चुका है और राजीव गांधीनरसिम्हाराव-मनमोहन सिंह की जोड़ी के आने के पहले कांग्रेस को भारत में अमेरिका की सेवक पार्टी की भूमिका में डाल चुके थे। जाहिर बात है कि कारपोरेट पूंजीवाद के शिखर अमेरिका को कांग्रेस भाजपा से ज्यादा सूट करती है। अगर अगले चुनाव में सोनिया गांधी का दांव ठीक पड़ जाएगा तो भारत की सरकार और शासक-वर्ग सीधे अमेरिका का एक्सटेंशन बन जाएंगे। फिर  एंडरसनों और क्वात्रोकियों को भारत छोड़ कर अमेरिका या यूरोप नहीं भागना पड़ेगा। वे कितना भी खून-खराबाघूसखोरी-खुफियागीरी करके यहीं रहेंगेक्योंकि भारत सरकार और शासक-वर्ग के अंदरूनी तंत्र तक उनका आदेश (डिक्टेट) काम करेगा। जो अमेरिकी ‘गुणवत्ता’ भारत के शासक-वर्ग की नसों समा गई हैवह उसके शासकीय तंत्र में समाएगी ही।

 

किसी विपक्षी पार्टी के लिए स्वाभाविक लोकतांत्रिक भूमिका होगी कि वह राष्ट्रीय संप्रभुता और वंचित समूहों पर आए गंभीर संकट को दूर करने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी से संघर्ष करे। भाजपा देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। लेकिन वह देश की नवउदारवादी लूट में ही अव्वल आने की ताकत बनाने के लिए तिरंगे पर कब्जे की लड़ाई लड़ती है। नवसाम्राज्यवादी ताकतों के देश-दखल से उसे न राष्ट्रीय एकता पर खतरा लगता हैन उसकी राष्ट्र-भक्ति जोर मारती है।

भाजपा का अभी तक का इतिहास यह बताता है कि वह भी आजादी के संघर्ष की बदौलत गुलामी से निकले भारत को समझने में अक्षम है। हालांकि किसी के भी लिए नई शुरुआत की संभावना हमेशा खुली होती है। लेकिन भाजपा ने हमेशा की तरह इस बार भी निराश किया है। पूरी एकता यात्रा के दौरान और उसे रोके जाने पर किसी भाजपा नेता का बयान इस आशय का नहीं आया कि तिरंगे की ताकत को देश की जनता के साथ जोड़ कर नवसाम्राज्यवादी प्रतिष्ठान के खिलाफ लड़ा जाएगा। जाहिर हैभारत के शासक-वर्ग की दो बड़ी जमातों ने तिरंगे को देश की जनता से काट कर राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई में अवमूल्यित कर दिया है।

 

अवमूल्यन और गहरा जाता हैक्योंकि तिरंगे पर कब्जे की लड़ाई सरकार में आकर नवसाम्राज्यवाद को फेसिलीटेट करने के लिए है। भाजपा के नवउदारवादी नीतियों को आगे बढ़ाने से नाराज होकर गोविंदाचार्य अलग से राष्ट्रीय स्वाभाभिमान का आंदोलन चला रहे हैं। कुछ लोग उनके साथ जुटते भी हैं। लेकिन गोविंदाचार्य के साथ भी वही दिक्कत है जो संघ-भाजपा के साथ है। उनके राष्ट्रीय स्वाभिमान का विचार जल्दी ही खिसक कर हिंदू स्वाभिमान के चिर-परिचित धरातल पर आ जाता है। संघ-भाजपा को पुराने का मोह छोड़ कर आज के भारतीय समाज और राष्ट्र को अपना पहला सरोकार बनाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं ह पाया।

 

अतीत-जीविता के अवशेष हर समाज में होते हैं। भारत जैसे अत्यंत प्राचीन समाज में उनका काफी ज्यादा होना स्वाभाविक है। अगर कोई राजनीतिक जमात उस नस को पकड़ती है तो उसे हमेशा एक निश्चित समर्थन मिलता रहेगा। भाजपा को वह मिलता है और उसकी राजनीति चलती है। दरअसलयह बैठे ठाले की उपलब्धि है जिस पर गर्व करने का कोई अर्थ नहीं है। मनुष्यार्थ हमेशा नवीन उपलब्धियां करने में होता है। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपाई और कांग्रेसी दिमाग काफी-कुछ मिलाजुला होता है। वरना बिना अपनी सरकार के आरएसएस इतना नहीं बढ़ता। यह भी कहने की जरूरत नहीं है कि आरएसएस में किसान-मजदूर नहीं होते। उसकी रीढ़ व्यापारी और सेवा क्षेत्र के कर्मचारी-अधिकारी  होते हैंजिन्होंने कांग्रेसी शासन में अपना सफल निर्वाह किया होता है।

 

इस बार 26 जनवरी को हम गाजियाबाद की कॉलोनी सूर्यनगर में थे। वहां एक बड़े पार्क में रेजीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन का गणतंत्र दिवस पर आयोजित कार्यकम चल रहा था। कार्यकम स्थल के लिए बने गेट पर ‘गर्व से तिरंगा लहराएंभारतीयता जताएं’ लिखत के पोस्टर लगे थे। वहां जो भाषण हो रहे थे उनमें भाजपा के लाल चौक पर तिरंगा फहराने के फैसले पर भी गर्व झलक रहा था। पोस्टर और भाषणों में कांग्रेस और भाजपा दोनों की संतुष्टि के भाव आपस में आवाजाही कर रहे थे। एक बच्चे की कविता ने हमें थोड़ा चौंकाया। उसने रस्मी कविताओं के बीच आजादी के अधूरेपन की बात की जो अनेक लाशों पर पांव रखते हुए आई। लेकिन हम जल्दी ही निराश भी हुए। उस बच्चे ने आजादी को पूरा करने के लिए लाहौरकराची और ढाका को जल्दी से जल्दी मिलाने आह्वान किया।

 

बाकी का शासक-वर्ग

 

अब थोड़ी चर्चा कांग्रेस-भाजपा के वृहद दायरे से बाहर के शासक-वर्ग की करें। इसका उल्लेख होता नहीं है, लेकिन सच्चाई है कि भाजपा अकेली जमात नहीं है जिसने तिरंगे को ताकत के तर्क पर मजबूरी में स्वीकार किया हुआ है। भारत का पूरा आधिकारिक मार्क्सवादी खेमा तिरंगे को मजबूरी में सलाम करता है। वह जानता है अगर शासक-वर्ग का एक कोना पकड़े रहना है तो राजकाज में तिरंगे को साक्षी रखना होगा। रूस और चीन के जो भी झंडे होंवे पार्टी के काम के हो सकते हैंभारत में शासक-वर्ग की ताकत का प्रतीक झंडा तिरंगा है। अतिवामपंथी समूह संविधान को नहीं मानते तो तिरंगे को भी नहीं मानते। तिरंगे की ताकत पर एकजुट भारतीय राज्य पर उनका हमला है। हमला जब सफल हो जाएगावे अपना झंडा लहराएंगे जो बहुत मुमकिन है इकरंगा होगा। उनके अलावा अन्य पार्टियां नहीं होंगी तो उनके झंडे भी नहीं होंगे।

 

इस चर्चा को थोड़ा और बढ़ाते हैं। किसी प्राचीन हिंदू संस्कृति और उसके भूगोल ‘हिंदुस्थान’ पर रीझे संघियों को  अगर 15 अगस्त 1947 को अस्तित्व में आए भारत के विचार से प्रेम नहीं है तो मार्क्सवादियों को भी वह कभी नहीं रहा है। लिहाजाभारत के उस विचार के साथ जो झंडा निकल कर आयाउससे भी दोनों को स्वाभाविक प्रेम नहीं हो सकता। कारण छिपा नहीं है। एक के सपनों का भारत दूर समय में बसता हैदूसरे का दूर स्थानों में। दोनों की शिकायत है कि आजाद भारत उनके विचार के मुताबिक अस्तित्व में क्यों नहीं आयाया अब क्यों नहीं आता है? अतिवामपंथी साथी कश्मीर की आजादी का सपना इस रूप में देखते हैं कि उसके बाद भारतीय राज्य का विघटन शुरू हो जाएगा और उसे उनके विचार से अलग अस्तित्व में आने की सजा मिल जाएगी। यानी उन्हें केवल मौजूदा भारतीय राज्य से नहींभारत के उस विचार से ही खुंदक है जो आजादी के साथ अस्तित्व में आया।

 

कहने की आवश्यकता नहीं कि यह भी एक तरह से बैठे ठाले का चिंतन है। आजादी के संघर्ष में विचारों और कार्यों की कई धराएं सक्रिय थीं जो आपस में टकराती भी थीं और एक-दूसरी को मान्य करके भी चलती थीं। उन विचारों और कार्यों की प्रेरणा भारतीय-भर नहीं थी। पूरे विश्व का संदर्भ उनमें सक्रिय था। हालांकि विश्व का मतलब तब भी ज्यादातर आज की तरह यूरोप और अमेरिका होता था। लेकिन वे सब प्रेरणाएं भले-बुरे तत्कालीन भारतीय यथार्थ की कसौटी पर कसी जाकर फलीभूत हो सकती थीं।

 

अढ़ाई सौ साल के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष से गुजरने के बाद भारत का जो भला-बुरा विचार अस्तित्व में आयावह समस्त प्रेरणाओं की सामर्थ्य और संभावनाओं का समुच्चय था। इस वास्तविकता को हमें समझना और स्वीकारना होगा। एक ऐतिहासिक चरण पर समुच्चय का वह काम गांधी ने किया। उस दौर में वे नहीं होते तो कोई और करता। यह भी हो सकता है गांधी से ज्यादा बेहतर तरीके से करता। हालांकि बुरा भी हो सकता था। गांधी ने भरसक कोशिश की कि आजादी पाने का कोई मंच या प्रतीक शासक-वर्ग की ताकत का मंच या प्रतीक न बने। दूसरी बात उन्होंने यह की कि भारत गुलामी की फितरत छोड़ दे। स्वतंत्रता के साथ भारत और विश्व का ऐसा विचार गढ़े जिसमें ‘स्वराज्य’ में कोई बाधा न पड़े। तीसरी बात उन्होंने की कि जो होअहिंसक तरीके से हो। स्वराज्य की अवधारणा और उसे हासिल करने की अहिंसक कार्यप्रणालीजिसे लोहिया ने दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी क्रांति कहा थामार्क्सवादियों और संघियों के लिए नितांत त्याज्य और निंदनीय हैं। क्योंकि वे मानते हैं जो श्रेष्ठतम है वह हो चुका है – एक के लिए काल में, दूसरे के लिए स्थान में। जिम्मेदारी केवल उसे लागू करने की है।

 

गांधी के लिए परिपूर्णता (परफेक्शन) प्रक्रिया का परिणाम थान कि दिमाग में बना-बनाया फार्मूला। उस दौर की प्रक्रिया जितनी विराट और जटिल थीवैसी शायद ही किसी समाज में कभी रही हो। गांधी के नेतृत्व में चले स्वाधीनता आंदोलन में कमजोरियां और असफलताएं होना लाजिमी था, क्योंकि वे बड़ा काम कर रहे थे। बने-बनाए फार्मूलों से ‘क्रांति’ और उसके लिए जनता को हथियारबंद करने का दावा करने वालों को थोड़ा रुक कर सोचने की जरूरत है कि उनके विचार का भारत क्यों नहीं अस्तित्व में आया या आता हैतब शायद वे यह भी सोच पाएं कि कहीं उन्हें भारत-माता से ही विरोध तो नहीं रहा है?

 

जैसा कि ऊपर हमने बताया हैआजादी के संघर्ष के जमाने में तिरंगा कांग्रेस का झंडा हुआ करता था जिसके बीच में चरखे का निशान होता था। गांधी चरखे के निशान को श्रम और साधारण भारतीय जन से जोड़ कर देखते थे। तिरंगा उनके लिए जनता के विश्वास और शक्ति का प्रतीक था। संविधान सभा ने 1947 में चरखा हटा कर तिरंगे के बीच में धर्म-चक्र रखा तो उन्हें परेशानी हुई। लेकिन जब समझाया गया कि चरखा रखने से दोनों तरफ छपाई नहीं हो सकती और धर्म-चक्र चरखे के चक्र का अर्थ भी धारण करता है तो उन्होंने स्वीकार कर लिया। तिरंगे के प्रति उन्होंने कभी अतिरिक्त मोह या आवेग नहीं दिखाया। उस दौर में भी नहीं जब हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग तिरंगे के बरक्स अपने भगवा और हरे रंग के झंडों को ज्यादा महत्व देते थे और तिरंगे को फाड़ भी देते थे। आजादी के समय 1946-1947 में भड़के हिंदू-मुस्लिम दंगों के समय उन्होंने मुस्लिम लीग के झंडे को तिरंगे के साथ लगाना स्वीकार कर लिया।

 

गांधी की अनैतिहासिक और अतार्किक ढंग से निंदा करना उतना ही गलत है जितना उनका चयनात्मक अपनाव (अप्रोप्रिएशन) करना। हमें लगता है कि तत्कालीन वास्तविकता की कसौटी पर सभी प्रेरणाओं की भूमिका और भागीदारी होती तो भारत की जनता की लोकतांत्रिकधर्मनिरपेक्ष और समाजवादी राजनैतिक समझ और चेतना ज्यादा परिपक्व होती।

 

फरवरी 2011

 

Wednesday, December 9, 2020

ताकि भारत पाखंडी-राष्ट्र न बने!- प्रेम सिंह

 



तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में जारी किसान आंदोलन के शुरू से ही केंद्र की भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार और विपक्षी पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला चल रहा है. किसान संगठनों द्वारा 8 दिसंबर को आयोजित भारत बंद को लगभग पूरे विपक्ष द्वारा सक्रिय समर्थन देने के बाद सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोपों में काफी तेजी आ गई है. सरकार ने विपक्ष पर किसानों को गुमराह कर भड़काने के आरोप से आगे जाकर कहा है कि तीनों कृषि कानून कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष के एजेंडे में रहे हैं. विपक्ष ने कहा है कृषि कानूनों में किए गए प्रावधानों को किसानों के लिए रामबाण बताने वाली भाजपा पूर्व में उनका कड़ा विरोध करती रही है. सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर दोहरे चरित्र का आरोप लगाते हुए दस्तावेज़ और फुटेज पेश कर रहे हैं. दोनों के बीच 'तेरे सुधार मेरे सुधार' की जंग छिड़ी है. सरकार और विपक्ष की इस कवायद का आपसी सत्ता-संघर्ष के संदर्भ में जो भी मायने हों, इससे यह खुली सच्चाई एक बार फिर सामने है कि उदारीकरण-निजीकरण देश के शासक-वर्ग का साझा एजेंडा है. 


शासक-वर्ग का यह साझा एजेंडा पिछले तीस सालों से जारी है. दोहराव होगा, लेकिन संक्षेप में जान लें कि 1991 में जब मनमोहन सिंह ने नई आर्थिक नीतियों की शुरुआत की थी तो अटलबिहारी बाजपेयी ने कहा था कि अब कांग्रेस ने उनका काम हाथ में ले लिया है. नरसिम्हा राव-मनमोहन सिंह के बाद 1996 में करीब एक साल के लिए संयुक्त मोर्चा के प्रधानमंत्री बने एचडी देवेगौड़ा और वित्तमंत्री पी चिदंबरम उदारीकरण-निजीकरण के पक्षधर थे. अपने 6 साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री वाजपेयी ने एक के बाद एक अध्यादेशों के ज़रिए उदारीकरण-निजीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया. यह प्रक्रिया कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के दो कार्यकालों के दौरान मजबूती से जारी रही. वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता ज्योति बसु ने लंबी राजनीतिक पारी खेलने के बाद निष्कर्ष दिया कि विकास का रास्ता पूंजीवाद से होकर गुजरता है. विकी लीक्स से पता चला कि ज्योति बाबू के बाद मुख्यमंत्री बने बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अमेरिकी मिशन से मिल कर गुहार लगाईं थी कि वे नवउदारवाद के पथ पर लंबी छलांग लगाना चाहते हैं. सिंगुर-नंदीग्राम में उन्होंने वैसी छलांग लगाईं भी थी. सामाजिक न्याय अथवा अस्मितावाद की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय नेता और उनकी संतानें उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों पर प्राय: मौन रहते हैं. वे सत्ता पर कब्जे की लड़ाई को ही 'नीति' मानते हैं. 


इस दौरान देश की राजनीति कारपोरेट राजनीति होती चली गई. सीधे कारपोरेट व्यवस्था के गर्भ से पैदा होने वाली पहली राजनीतिक पार्टी - आम आदमी पार्टी - और उसका सुप्रीमो देश के सरकारी कम्युनिस्टों और ज्यादातर धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक समाजवादी बुद्धिजीवियों का दुलारा है. दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में सरकारी ताम-झाम के साथ दीपावली पूजन करने के बाद उसने अपने इन मित्रों को उपदेश दिया है कि वे प्रार्थना किया करें, मन को बहुत शांति मिलती है! भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, जिससे यह पार्टी निकली, ने उदारीकरण-निजीकरण के विरोध में चलने वाले देशव्यापी आंदोलन को गहरी चोट पहुंचाई, और गुजरात में छटपटाते नरेंद्र मोदी के लिए दिल्ली का रास्ता प्रशस्त किया.  


वर्तमान विवादस्पद कृषि कानूनों के बारे में यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि उनकी बनावट  कारपोरेट-फ्रेंडली है. लेकिन अध्यादेश के रूप में या संसद में विधेयक के रूप में किसी भी विपक्षी राजनीतिक पार्टी/नेता ने उन्हें पूरी तरह से रद्द करने की मांग नहीं की. संसद में विधेयकों पर जितनी भी बहस हो पाई, उस पर नज़र डालने से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है. सभी पार्टियों ने कुछ संशोधन सुझाने के अलावा विधेयकों को पार्लियामेंट्री पैनल को भेजने की मांग की थी. उदाहरण के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के सांसद बिनय विस्वम का वक्तव्य देखा जा सकता है : "अगर एमएसपी के बारे में दिया गया वक्तव्य सही है, तो मैं मंत्री महोदय से निवेदन करूंगा कि वे यहां यह कहते हुए आधिकारिक संशोधन लाएं कि वे किसानों के लिए एमएसपी सुनिश्चित करने की धारा जोड़ेंगे. ऐसा होने पर, मैं आपसे वादा करता हूं, भले ही हम आपका राजनीतिक विरोध करते हैं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी इस विधेयक का समर्थन करेगी." ('इंडिया एक्सप्रेस', 5 दिसंबर 2020) फोर्ड फाउंडेशन के जो बच्चे किसान आंदोलन में सक्रिय हैं, कृषि सुधारों को लेकर उनके कारपोरेट-फ्रेंडली वक्तव्य/दस्तावेज़ भी सामने आ चुके हैं. तीनों कृषि कानूनों को पूरी तरह रद्द करने की मांग केवल किसान संगठनों की तरफ से की गई. ज़ाहिर है, उन्हें ही यह निर्णायक लड़ाई लड़नी होगी.  


दरअसल, भारत का शासक-वर्ग सत्ता से बाहर होने पर संविधान की दुहाई देते हुए उदारीकरण-निजीकरण का विरोध करता है, और सत्ता में आने पर संविधान के नाम पर ही सारे फैसले उदारीकरण-निजीकरण के पक्ष में लेता है. वह बेशर्मी के साथ नाम गरीबों का लेता है, काम कारपोरेट घरानों का करता है.  उदारीकरण-निजीकरण के समर्थन और विरोध में वह संविधान के साथ देश के प्रतीक पुरुषों (आइकोंस) को भी खींच लेता है. संविधान और प्रतीक पुरुषों की ऐसी दुर्गति शायद ही किसी अन्य देश में होती हो.  शासक-वर्ग की इस प्रवृत्ति के चलते देश के राजनीतिक व्यवहार में गहरा पाखंड समा गया है. राजनीतिक व्यवहार में पैठा यह पाखंड जीवन के अन्य - सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक आदि - व्यवहारों को भी प्रभावित करता है. अगर भारत को एक पाखंडी-राष्ट्र में तब्दील नहीं होना है, तो इस परिघटना पर गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है.  


शिक्षा से लेकर रक्षा तक नवउदारवादी सुधारों पर सर्वानुमति की मौजूदा स्थिति में क्या यह बेहतर नहीं होगा कि शासक-वर्ग ईमानदारी से स्वीकार करे कि वह उदारीकरण-निजीकरण का सच्चा पक्षधर है? संविधान को एक तरफ छोड़ कर, या संविधान की मूल संकल्पना के विरुद्ध संशोधन करके, उदारीकरण-निजीकरण को राष्ट्रीय-नीति घोषित करे? इसके लिए मज़दूर संगठनों, किसान संगठनों, छात्र संगठनों, व्यावसायी संगठनों और विविध नौकरीपेशा संगठनों से वार्ता करे? घरेलू और विदेशी निवेशकों/कंपनियों को स्पष्ट संदेश दे कि उदारीकरण-निजीकरण भारत की सर्वस्वीकृत राष्ट्रीय-नीति है? विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को बताए कि उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के मामले में भारत अपने पैरों पर खड़ा हो गया है? हर मामले में उसे ऊपर से डिक्टेट की जरूरत नहीं है? नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) अमिताभ कांत सरीखे नवउदारवादियों को आश्वस्त करे कि भारत ने 'कुछ ज्यादा ही लोकतंत्र होने' की बाधा पार कर ली है? और अब वह चीन के बाज़ार समाजवाद (मार्केट सोशलिज्म) का मुकाबला कर सकता है? इसकी शुरुआत विवादास्पद कृषि कानूनों पर संसद का विशेष सत्र बुला कर व्यापक चर्चा से की जा सकती है. 


मेरे जैसे व्यक्ति की तरफ से यह सुझाव लोगों को चौंकाने वाला लग सकता है. लेकिन यदि हमें एक पाखंडी/फरेबी राष्ट्र में रूपांतरित होने से बचना है, तो सच्चाई का सामना करने के अलावा कोई चारा नहीं है. पाखंड के तीन दशक काफी होते हैं. सच्चाई की ईमानदार स्वीकारोक्ति होने पर शासक-वर्ग से अलग संवैधानिक समाजवाद के सच्चे समर्थक संगठन और व्यक्ति अपनी स्थिति और भूमिका का सही ढंग से आकलन कर पाएंगे. अगर किसानों में सचमुच राजनीतिक समझदारी, एका और साहस बना रहेगा तो वे कानूनों के बावजूद कारपोरेट की लूट से निपटने का रास्ता निकालेंगे. वह रास्ता अन्य संघर्ष-रत संगठनों के लिए भी नजीर बनेगा. 


(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)  

  

  


Tuesday, September 8, 2020

विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा- प्रेम सिंह

 (यह लेख हिंदी मासिक ‘युवा संवाद’ के दिसंबर 2012 अंक में 'समय संवाद' स्तंभ के अंतर्गत छपा था। ‘भ्रष्‍टाचार विरोध : विभ्रम और यथार्थ’ (वाणी प्रकाशन) पुस्‍तक में भी संकलित है। मौजूदा सरकार द्वारा देश बेचने का काम देश के ही नाम पर तेज़ी से किया जा रहा है। कुछ लोगों में इसे लेकर वास्तविक बेचैनी देखने को मिलती है। उन्हें इस नवउदारवादी/नवसाम्राज्यवादी परिघटना को ऐतिहासिकता और समग्रता में देखने की कोशिश करनी चाहिए। तब वे देखेंगे कि यह इंटेलीजेंसिया समेत भारत के शासक-वर्ग का फैसला है। यह फैसला बदलेगा, तभी इस स्थिति में बदलाव आने की संभावना बन पाएगी। शायद यह लेख उस दिशा में कुछ सहायता कर सकता है।) 


मनमोहन सिंह के बच्चे

ऐसा माना जा रहा था कि बेतहाशा बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी तथा 2014 में होने वाले आमचुनाव के डर से नवउदारवाद के रास्ते पर यूपीए सरकार के कदम कुछ ठिठकेंगे। चौतरफा लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों से भी सरकार डरेगी। व्यक्तिगत तौर पर मनमोहन सिंह की ईमानदारी का मिथक टूटने का भी सरकार पर कुछ दबाव बनेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पिछले दिनों उनकी सरकार ने बहादुराना अंदाज में, खुद अपनी पीठ ठोंकते हुए, नवउदारवादी सुधारों की रफ्तार तेज कर दी और इस तरह चुनाव के एक-दो साल पहले नवउदारवादी सुधारों को स्थगित रखने की अभी तक बनी रही बाधा को पार कर लिया। पिछले साल नवंबर में संसद में किए गए अपने वादे को तोड़ते हुए खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश  के साल भर से स्थगित फैसले को लागू करने की एकतरफा घोषणा के साथ सरकार ने बीमा, पेंशन और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में भी विदेशी निवेश को स्वीकृति प्रदान की। 

पैट्रोल और गैस के दामों में भारी वृद्धि के साथ इन घोषणाओं से सरकार ने कारपोरेट जगत और नवउदारवादी सुधारों के पैरोकारों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह अमीरोन्मुख ग्रोथ की अपनी टेक पर पूरी तरह कायम है। वह गरीबों द्वारा बनाई गई अमीरों की अमीरों के लिए सरकार है। उसने यह भी एक बार फिर से घोषित किया है कि ग्रोथ बढ़ाने के लिए विदेशी  निवेश ही एकमात्र संजीवनी है। हर संदेश का एक प्रतिसंदेश होता है। वह नवउदारवादी नीतियों से बदहाल जनता के लिए है कि सरकार अब उसकी चुनावी परवाह भी नहीं करने जा रही है। नवउदारवादी निजाम के पिछले दो दशकों में यह सरकार का निस्संदेह बड़ा जनता विरोधी हौसला है, जो उसने दिखाया है। देश में 4 करोड़ खुदरा व्यापारी हैं जिन पर उनके 20 से 25  करोड़ परिवारजनों का भार है। हर हौसले के पीछे अंदरूनी या बाहरी ताकत होती है। सरकार का बढ़ा हुआ हौसला वैश्विक पूंजीवादी ताकतों की देन है।    

मनमोहन सिंह जब कहते हैं कि अब कदम पीछे नहीं हटाए जा सकते, यह उनकी मजबूरी का इजहार नहीं है। कि रास्ते का चुनाव एक बार हो गया तो उस पर चलना ही होगा। ऐसा नहीं है कि वे चुनाव की गलती से नवउदारवादी रास्ते पर चले गए थे और अब उस पर चलना मजबूरी बन गया है; मजबूरी में उन्हें ये सब निर्णय लेने पड़े हैं। ऐसा होता तो आगे कभी नवउदारवादी नीतियों में बदलाव की आशा बनती। मनमोहन सिंह शुरू से नवउदारवादी रास्ते को ही विकास और सब कुछ का एकमात्र और स्वाभाविक रास्ता मानते हैं। तभी उन्होंने एक बार फिर कहा है कि अगर उन्हें जाना है तो इस रास्ते पर अडिग रह कर लड़ते हुए जाएंगे। अन्यथा रोबो की तरह लगने वाले मनमोहन सिंह नवउदारवाद के बचाव में अत्यंत संजीदा हो जाते है - ‘कुर्बान हो जाएंगे, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे!’ 

मनमोहन सिंह की इस प्रतिभा और जज्बे की पहचान सोनिया गांधी ने बखूबी की है। उन्हें यह साफ पता लग गया कि यही बंदा काम का है जो इस रास्ते पर लाखों के बोल सह कर और लाखों को गारत करके भी पीछे नहीं हट सकता। क्योंकि उनकी खुद की तरह वह कोई और रास्ता जानता ही नहीं है। मामला केवल मनमोहन सिंह को आगे रख कर राहुल गांधी के लिए रास्ता बनाने भर का नहीं है। इस काम के लिए कांग्रेस में चाटुकार नेताओं की कमी नहीं है। लेकिन कांग्रेस का अन्य कोई भी नेता वह नहीं कर सकता था, जो मनमोहन सिंह ने किया। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सम्मिलित प्रतिभा ने कांग्रेस के इतिहास और विचारधारा को धो-पोंछ कर, उसे एक ‘कारपोरेट पार्टी’ में तब्दील कर दिया है। इसीलिए मनमोहन सिंह के बाद राहुल गांधी चाहिए, जिसके जिस्म में मनमोहन सिंह का दिमाग पैदा करने की कवायद लंबे समय से की जा रही है।

लेकिन मनमोहन सिंह का कमाल कांग्रेस के कायापलट तक सीमित ही नहीं है; उन्होंने भारत की पूरी राजनीति को कारपोरेट रास्ते पर डाल दिया है। मनमोहन सिंह ने जो नवउदारवादी ‘ब्रह्मफांस’ फेंका है, उसमें सब फंसे हैं। उसकी काट आज किसी के पास नहीं है, ताकि मानव सभ्यता को पूंजीवादी बर्बरता से मुक्त किया जा सके। मनमोहन सिंह ललकार कर पूछते हैं किसी के पास है तो बताओ? ऐसा नहीं है कि लोग लड़ नहीं रहे हैं, या आगे नहीं लड़ेंगे। लेकिन हर बार जीत मनमोहन सिंह की ही होती है। किसी भी तरह ‘साइनिंग इंडिया’ की चकाचैंध में पलने वाले इस अंधे युग में पलीता नहीं लग पाता। नरेंद्र मोदी हों या राहुल गांधी या बीच में कुछ समय के लिए कोई क्षेत्रीय क्षत्रप, अभी जीत मनमोहन सिंह की ही होनी है। जो कहते हैं मनमोहन सिंह अभी तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं, उन्हें अपनी धारणा पर फिर से विचार करना चाहिए। भारत की राजनीति की धुरी को संविधान से उखाड़ कर पूंजीवाद की वैश्विक शक्तियों की उन संस्थाओं, जिन्होंने पूरी दुनिया पर शिकंजा कसा हुआ है, के आदेशें/मूल्यों पर जमा देने में उनकी युगांतरकारी भूमिका है। मुख्यधारा राजनीति में उनकी आलोचना करने वाले नेता दरअसल उन्हीं के आज्ञाकारी बच्चे हैं। उन्हें अभी तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री कहते न थकने वाले अडवाणी और हमेशा उनकी ‘मेंटर’ को निशाना बनाने वाले नरेंद्र मोदी समेत।  उनकी यह युगांतरकारी भूमिका तभी सफलीभूत हो सकती थी जब वे भारत की कांग्रेसेतर राजनीति को भी अपने पीछे लामबंद करने के साथ बुद्धिजीवियों को भी काबू में कर पाते। ऐसा उन्होंने किया है। मनमोहन सिंह के राज में बुद्धिजीवियों की हालत का क्या कहिए! जिधर देखो मनमोहन सिंह का दिमाग ही चलता नजर आता है। किसी भी समाज के सबसे प्रखर बौद्धिक शिक्षा और शोध के संस्थानों में होते हैं। भारत के विद्यालयों से लेकर विश्‍वविद्यालयों और शोध संस्थनों तक मनमोहन सिंह की खुली हवा चल रही है। भारत के बुद्धिजीवियों के संदर्भ में किशन पटनायक ने जिसे ‘गुलाम दिमाग का छेद’ कहा था, वह बढ़ कर बड़ा गड्ढा बन गया है। 

नवउदारवादी और प्रच्छन्न नवउदारवादी बुद्धिजीवी तो मनमोहन सिंह के सच्चे बच्चे ठहरे, अपने को नवउदारवाद विरोधी कहने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग का दिवाला निकलता जा रहा है। घूम-फिर कर उनका विश्‍लेषण पूंजीवाद का विश्‍लेषण होता है और तर्क भी पूंजीवाद के समर्थन में होते हैं। कारपोरेट पूंजीवाद की हर शै में विकास का दर्शन करने वाले मार्क्‍सवादियों, गांधीवादियों और समाजवादियों की कमी नहीं है। लम्बे राजनैतिक अनुभव के साथ ज्योति बसु यह पुराना मंत्र देकर गए कि पूंजीवाद के बिना समाजवाद नहीं लाया जा सकता। उनके उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अमेरिकी कूटनीतिज्ञों के सामने अपनी पीड़ा का इजहार किया कि कई तरह के दबावों के कारण वे ऊंची पूंजीवादी उड़ान नहीं भर पाते हैं। सिंदूर-नंदीग्राम प्रकरण के वक्त प्रकाश करात ने विरोधियों को विकास विरोधी कह कर लताड़ लगाई थी। भाजपाई मनमोहन सिंह के मनभाए साथी बने हुए हैं। ‘शाइनिंग इंडिया’ की पुकार सबसे पहले उन्होंने ही दी थी। पिछले दिनों ‘इंडियन एक्सप्रैस’ के स्तंभ लेखक सुधींद्र कुलकर्णी ने एक मोबाइल के विज्ञापन-गीत - ‘जो मेरा है वो तेरा है’ - को समाजवाद के विचार का सुंदर वाहक बताया। वे वहीं नहीं रुके। उन्होंने उसे गांधी से भी जोड़ा। आप कहेंगे संघी और गांधी ... ? नवउदारवाद का यही कमाल है। उन्हीं दिनों उनकी ‘म्युजिक ऑफ़ दि स्पीनिंग व्हील: महात्मा गांधीज मेनीफेस्टो फॉर दि इंटरनेट एज’ किताब आई, जिसका दिल्ली और बंगलुरू में भव्य विमोचन समारोह हुआ। समारोह में परमाणु ऊर्जा के पैरोकार पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम सहित उद्योग, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और राजनीति जगत की कई हस्तियों ने हिस्सा लिया। नवउदारवाद की बड़ी विभूतियां आजकल बढ़-चढ़ कर गांधी-प्रेम का प्रदर्शन करती हैं। ध्यान दिला दें कुलकर्णी साहब भाजपा के सिद्धांतकारों में से एक हैं, जिसके कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में पट्टी पढ़ाई जाती है कि वे ऋषियों-मुनियों की धरोहर के वारिस हैं। गुलाम दिमाग कितनी तरह के पाखंड करता है!   


भारत के नागरिक समाज में मनमोहन सिंह के बच्चों की भरमार है। खुद मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की धूम है। लेकिन उन्हें रत्ती भर परवाह नहीं है। वे जानते हैं आरोप लगाने वाले उनके ही दूध पीते बच्चे हैं। भारत माता के स्तनों में तो पूंजीवाद ने दूध की बूंद छोड़ी नहीं है। भारत माता के बच्चे बिलखते हैं और ये चिल्लाते हैं। भारत के नागरिक समाज को गुस्सा बहुत आता है, लेकिन उसे कभी ग्लानि नहीं होती। मनमोहन सिंह से ज्यादा कौन जानता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सारी फूफां के बावजूद उसमें शामिल होने वालों ने रत्ती भर भ्रष्टाचार करना बंद नहीं किया है। वे जानते हैं केवल नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, दलाल और माफिया नहीं, हर दफ्तर के बाबू और चपरासी तक भ्रष्टाचार का बाजार पहले की तरह गरम है। पहले की तरह सरकार की गरीबों के लिए बनाई योजनाओं का ज्यादातर पैसा अफसर और बाबू खा जाते हैं। मनमोहन सिंह जानते हैं उनसे कोई मुक्त होना नहीं चाहता। सब उनके मोहताज हैं। वरना जिस देश में पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोध की भावनाएं हिलोरें ले रही हों, जन लोकपाल कानून जब बनेगा तब बनेगा, आंदोलन में शामिल नागरिक समाज को कम से कम अपना भ्रष्टाचार बंद कर देना चाहिए था। उससे गरीब जनता को निश्चित ही राहत मिलती। आप कहेंगे कि भावना की क्या बात? जब जन लोकपाल कानून बन जाएगा, अपने आप भ्रष्टाचार होना बंद हो जाएगा। नागरिक समाज भी बंद कर देगा। यह भ्रष्ट सरकार कानून बनाए तो! लेकिन भावना उतनी बुरी नहीं होती। राष्ट्रीय भावना भी नहीं। भावना में निस्संदेह एक ताकत होती है। किशन पटनायक ने अपने ‘प्रबल आर्थिक राष्ट्रवाद का समाधान’ लेख में कहा है कि अपनी खदानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देना सही है या गलत, इस पर बहस करने वाला उनकी रक्षा नहीं कर पाएगा। सवाल यह उठाया जा रहा था कि केवल भावनाओं में बह कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करना ठीक नहीं है। अभी लोग समझ नहीं रहे हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बहुत गहराई में जाकर नुकसान किया है। अपने वर्ग-स्वार्थ के लिए इसने भावना की ताकत को नष्ट कर दिया है। यह सही है कि इस आंदोलन के केंद्र में खाया-पिया और कुछ हद तक अघाया मध्य-वर्ग है। लेकिन शुरू से ही वह जन-भावना का शिकार करने की नीयत से परिचालित है। उसके वर्ग-स्वार्थ की सिद्धि में नवउदारवाद की मार से तबाह जन-सामान्य शामिल हो जाए, तो उसका काम पूरा हो जाएगा। इसके लिए अब उसने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली है, जिस पर हम थोड़ा आगे विचार करेंगे।

चाहते मनमोहन सिंह भी हैं कि पूंजीवाद का काम बिना भ्रष्टाचार के चले। लेकिन पिछली तीन-चार शताब्दियों का उसका इतिहास बेईमानी और भ्रष्टाचार का इतिहास रहा है। जब अमेरिका में लीमैन ब्रदर्स और गोल्डमैन फैक्स बैंक दिवालिया हुए तो पता चला कि उसके बड़े अफसर किस कदर भ्रष्टाचार और अय्याशी में डूबे थे। उपनिवेशवादी दौर के प्रमाण हैं कि उपनिवेशों में आने वाले यूरोपीय मालामाल होकर अपने देश वापस जाते थे। उपनिवेशवादी साहब लोगों ने भ्रष्टाचार की चाट स्थानीय अमले को भी अच्छी तरह लगा दी थी। भारतेंदु ने कहा था ‘‘चूरन साहब लोग जो खाता पूरा हिंद हजम कर जाता।’’ अंग्रेज बहादुर के वारिस अगर हिंद हजम कर रहे हैं, तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है। यह व्यवस्था छोटे और मेहनत करने वाले लोगों के शोषण और बड़े और मेहनत नहीं करने वाले वाले लोगों की बेईमानी पर चलती और पलती है। सभी जानते हैं देश में कानूनों की कमी नहीं है और न ही जन लोकपाल कानून बनने से भ्रष्टाचार खत्म होने वाला है। इस व्यवस्था के समर्थक ही कह सकते हैं कि इस व्यवस्था को मिटाए बिना भ्रष्टाचार मिटाना है। यह सही है कि सरकार के नवउदारवादी सुधार तेज करने के निर्णय के पीछे मुख्यतः कारपोरेट पूंजीवाद की वैश्विक शक्तियां हैं। मनमोहन सिंह भारत में उन शक्तियों के स्वाभाविक और सफल एजेंट हैं। इसलिए उन्हें अमेरिकी दबाव और खुदरा व्यापारियों की तबाही के आरोप सनसनी फैलाने वाले लगते हैं। लोग समझते नहीं, लेकिन वे यही कहना चाहते हैं कि अमेरिकी दबाव कब नहीं रहा और पिछले 25 सालों में गरीबों की तबाही कब नहीं हुई? वे कहते हैं कि उनके आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने से लेकर आज तक ये आरोप लगाए जाते रहे हैं। न वे पहले रुके, न अब रुकेंगे। हाय-तौबा करने की जरूरत नहीं है। उससे कुछ नहीं होने वाला है। अमीरोन्मुख ग्रोथ बढ़ाने के लिए गरीबों को मंहगाई और बेरोजगारी की मार झेलनी होगी। उन्हें प्रतिरोध करना छोड़ कर मंहगाई और बेरोजगारी में जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। मनमोहन सिंह को आश्‍चर्य होता है कि 20 साल से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद लोगों को यह आदत नहीं पड़ी है। उन्हें यह आदत डालनी ही होगी। कम से कम तब तक जब तक उनका सफाया नहीं हो जाता! 

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की प्राथमिकता मंहगाई और बेरोजगारी रोकना नहीं, उसके चलते होने वाले प्रतिरोध का दमन करना बन गई है। संसाधनों की मिल्कियत कंपनियों को सौंपने और खुदरा समेत विभिन्न क्षेत्रों में कंपनियों को न्यौतने के फैसलों के विरोध का दंड कड़ा होता है। मनमोहन सिंह जब कहते हैं, उन्हें जाना है तो लड़ते हुए जाएंगे, तो उनकी लड़ाई को कोरा लोकतांत्रिक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उनके दिमाग में अपनी लड़ाई में सुरक्षा बलों को शामिल रखने की बात होती है। देश के कई हिस्सों में जो हालात बने हुए हैं, वे बताते हैं कि देश को पुलिस स्टेट बनाने में उन्हें कोई हिचक नहीं है। सरकार के खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले की समीक्षा हम यहां नहीं करने जा रहे हैं। उसके लिए हमारा ‘खुदरा में विदेशी निवेश: नवउदारवाद के बढ़ते कदम’ (‘युवा संवाद’, फरवरी 2012)  ‘समय संवाद’ देखा जा सकता है। हम यह कहना चाहते हैं कि खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सीनाजोरी फैसले के पीछे भले ही और निश्चित ही वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था और उसे चलाने वाली संस्थाओं/शक्तियों का हाथ है, लेकिन उसका एक बड़ा कारण घरेलू भी है। यह फैसला मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ने इसलिए बेधड़क होकर लिया है, क्योंकि पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने नवउदारवाद के वास्तविक विरोध के समस्त प्रयासों को पीछे धकेल दिया या धूमिल कर दिया है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नेता अब राजनीतिक पार्टी बना रहे हैं। वह पार्टी, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, चुनावों में कांग्रेस और भाजपा का नहीं, बल्कि नवउदारवाद की वास्तविक विरोधी और समाजवाद की समर्थक छोटी पार्टियों, जनांदोलनकारी संगठनों/समूहों और लोगों का विरोध करेगी। महज संयोग नहीं है कि कांग्रेस का हाथ भी आम आदमी के साथ है और नई पार्टी बनाने वाले भी ‘मैं आम आदमी हूं’ लिखी टोपी पहनते हैं। चलते-चलते पता चला है कि उन्होंने पार्टी का नाम भी आम आदमी पार्टी रखा है। मनमोहन सिंह के ये बच्चे उनकी सहूलियत के लिए उनकी जमात को ही नहीं, एजेंडे को भी आगे बढ़ाएंगे।       

कौन है आम आदमी? 

हम हर बार सोचते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर नहीं लिखेंगे। लेकिन ऐसी बाध्यता महसूस होती है कि इस परिघटना का साथ-साथ कुछ न कुछ विश्‍लेषण होना चाहिए। गंभीर विश्‍लेषण और मूल्यांकन बाद में विद्वान करेंगे ही। आम आदमी पार्टी के बारे में पांच-सात सूत्रात्मक बातों के अलावा हमें कुछ नहीं कहना है। पहली यह कि नवगठित पार्टी छोटी पार्टियों, मसलन समाजवादी जन परिषद (सजप) और जनांदोलनों, मसलन जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) में तोड़-फोड़ करने में कामयाब हुई है। जाहिर है, इस दिशा में आगे भी काम जारी रहेगा। दूसरी यह कि अन्ना हजारे से इस पार्टी का अलगाव नहीं है। पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने उन्हें अपना गुरु बताया है और अन्ना ने पार्टी के ‘अच्छे’ उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने का भरोसा दिया है। पूरे आंदोलन में सक्रिय रहने वाली मेधा पाटकर कहती हैं कि आरोप लगाने से कुछ नहीं होगा, भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने की जरूरत है। यानी वे यह बता रही हैं कि अलग पार्टी बनाने का फैसला करने वाले महज आरोप लगाने वाले हैं और उसमें शामिल नहीं होने वाले भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने वाले। लेकिन, कहने की जरूरत नहीं कि, वह काम बिना राजनीति के और पूंजीवादी व्यवस्था को बदले नहीं हो सकता। इस काम के लिए उनसे बार-बार कहा गया, लेकिन उन्हें वह रास्ता पसंद नहीं है। उन्हें देखना चाहिए कि वे वाया अन्ना, केजरीवाल की पार्टी में शामिल हो गई हैं। जो लोग अपने को अन्ना के साथ मान कर पार्टी से अलग मान रहे हैं, वे खुद अपने को मुगालते में रखने की कोशिश करते हैं। पार्टी न अन्ना से अलग है, न रामदेव से और न दोनों की मानसिकता से। मनमोहन सिंह से अलग तो है ही नहीं। तीसरी बात हम यह कहना चाहते हैं कि इस पार्टी के निर्माण की पूरी रणनीति कपट से भरी रही है। संप्रदायवादियों और आरक्षण विरोधियों को पूरा भरोसा दिलाने के बाद अब धर्मनिरपेक्षतावादियों और सामाजिक न्यायवादियों को अपने लपेटे में लेने की कोशिश की जाएगी। चुनावी जीत के लिए जरूरी मुसलमानों को वोट बैंक बनाने की भी कोई जुगत रची जाएगी। कहने की जरूरत नहीं कि कपटपूर्ण रणनीति से निकली पार्टी का नाम भी कपट से भरा है, जिस पर हम आगे विचार करेंगे। यहां यह बताना चाहते हैं कि इस पूरे खेल में कपट-क्रीड़ा के साथ एक-दूसरे को इस्तेमाल करने का खेल भी चल रहा है। बानगी के लिए अन्ना और केजरीवाल के बीच की लप्प-झप्प देखी जा सकती है। अन्ना ने केजरीवाल से अपना और आईएसी का नाम इस्तेमाल करने से मना किया है। यह बात उन्हें तब ख्याल नहीं आई जब केजरीवाल उन्हें ‘मसीहा’ बना रहे थे। 

अन्ना भी एनजीओ की पैदावार हैं और केजरीवाल भी। बाकी जीवन व्यापारों की तरह एनजीओ व्यापार भी स्थैतिक यानी ठहरा हुआ नहीं होता। लिहाजा, अन्ना के एनजीओ व व्यक्तित्व और केजरीवालों के एनजीओ व व्यक्तित्व में समय के अंतराल के चलते काफी फर्क है। लोहिया का शब्द लें तो नए एनजीओबाज 'लोमड़ वृत्ति' के हैं। उसके सामने अन्ना जैसा कच्छप गति वाला व्यक्ति इस्तेमाल होने को अभिशप्त है। अन्ना के समय में मीडिया क्रांति नहीं हुई थी। लोग बताते हैं कि उन्हें फोटो वगैरह खिंचवाने के लिए मीडिया वालों का काफी इंतजार करना पड़ता था। कई बार निराशा भी हाथ लगती थी। मीडिया में प्रसिद्धि की उनकी भूख का केजरीवाल ने बखूबी इस्तेमाल किया है। अभी दोनों में और टीम के बाकी प्रमुख लोगों में एक-दूसरे को इस्तेमाल करने के दाव-पेंच देखने मिलेंगे। एक-दूसरे को इस्तेमाल करने का खेल इसकी जरा भी शर्म किए बगैर चलेगा कि ये सभी महाशय पूंजीवादी साम्राज्यवाद के समग्र खेल में इस्तेमाल हो रहे हैं। आप कह सकते हैं फिर भला मनमोहन सिंह को ही क्यों शर्म आनी चाहिए!

चौथी बात यह कि ‘यूथ फॉर इक्वैलिटी’ में विश्‍वास करने वाली पार्टी यह भली-भांति जानती है कि भारत में युवा-शक्ति का मतलब अगड़ी सवर्ण जातियों के युवा होते हैं। इस पार्टी का दारोमदार उन्हीं पर है, और रहेगा। सुना है पार्टी की स्थापना के मौके पर तलवार वगैरह भांजी गई हैं। पांचवी बात यह कि समाजवादियों ने एक बार फिर अपनी ‘जात’ दिखा दी है। अभी तक वे संघियों और कांग्रेसियों के पिछलग्गू थे, अब एनजीओबाजों के भी हो गए हैं। किशन पटनायक को गुरु धारण करने वाले केजरीवाल के शिष्य बन गए हैं। मामला यहीं नहीं रुकता। जो वरिष्ठ समाजवादी लोहिया को ही पहला, अकेला और अंतिम गुरु मानते रहे और दूसरों को चरका देते रहे, उन्होंने भी केजरीवाल को राजनीतिक गुरु मानने में परेशानी नहीं हुई। मेधा पाटकर ने अन्ना को गुरु कबूल किया है, तो वे केजरीवाल की गुरुबहन हो गईं। आजकल के गुरु लोग अपनी सुरक्षा का निजी इंतजाम रखते हैं। भारतीय किसान यूनियन ने खुद आगे बढ़ कर यह जिम्मेदारी उठा ली है। 

छठी बात यह है कि इस पार्टी के बनाने में वे सभी शामिल हैं, जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल और उसके समर्थक थे। क्योंकि यह पार्टी, जैसा कि कुलदीप नैयर ने उसकी तारीफ में कहा है, ‘आंदोलन की राख से उठी है’। अति वामपंथियों से लेकर अति गांधीवादियों तक ने अन्ना की टोपी पहन ली थी। उनमें सामान्य कार्यकर्ता, बड़े नेता और बुद्धिजीवी शामिल थे। आज भी अपने को अल्ट्रा मार्क्‍सवादी जताने वाले कई साथी केजरीवाल के ‘पोल खोल’ कार्यक्रम पर उन्हें सलाम बजाते और उनके आंदोलन में नैतिक आभा कम न हो जाए, इस पर चिंतित होते देखे जा सकते हैं। यहां हम थोड़ा बताना चाहेंगे कि हमने बिल्कुल शुरू में आगाह किया था कि कम से कम ऐसे राजनीतिक संगठनों और लोगों को इस आंदोलन का हिस्सा नहीं होना चाहिए, जो समाजवादी विचारधारा और व्यवस्था में विश्‍वास करते हों। लेकिन जब एबी बर्द्धन और वृंदा करात जैसे अनुभवी नेता रामलीला मैदान जा पहुंचे तो बाकी की क्या बिसात थी। राजनैतिक डर उन्हें उस आंदोलन में खींच ले गया, जिसमें उमा भारती से लेकर गडकरी तक, चौटाला से लेकर शरद यादव तक शिरकत करने पहुंचे। बाद में तो सबके लिए खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया। उनमें यह डर नहीं पैदा होता, अगर उन्होंने समाजवाद की किताबी से ज्यादा जमीनी राजनीति की होती। वे विवेकानंद से लेकर अंबेडकर तक को अपने शास्त्र में फिट करने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनके शास्त्र से कोई स्वतंत्र संवाद किया जा सकता है, जैसा कि भारत में आचार्य नरेंद्र देव, जेपी और लोहिया ने किया, यह उन्हें बरदाश्‍त नहीं है। उन्हें चीन का ‘मार्केट सोशलिज्म’ मंजूर है, लेकिन ‘देशी समाजवाद’ की बात करने के बावजूद भारतीय समाजवादी चिंतकों को बाहर रखते हैं। दरअसल, यह डर हमेशा बने रहना है; उसी तरह जैसे शास्त्र को प्रमाण मानने वाला ब्राह्मण हमेशा डरा रहता है और रक्षा के लिए बार-बार देवताओं के पास भागता है। 

सातवीं बात यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में नवउदारवाद के खिलाफ वास्तवकि संघर्ष को निरस्त करने की राजनीति पहले से निहित थी। उसे ही तेज करने के लिए नई पार्टी बनाई गई है। लिहाजा, कुछ भले लोगों का यह अफसोस जताना वाजिब नहीं है कि राजनीति जैसी गंदी चीज में इन अच्छे लोगों को नहीं पड़ना चाहिए। आठवीं बात यह कि एनजीओ वालों को धन देकर काम कराने की आदत होती है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में यह काम खूब हुआ है। पार्टी में भी होगा। एक वाकया बताते हैं। हम लोग सितंबर के अंतिम सप्ताह में जंतर-मंतर पर एफडीआई के खिलाफ क्रमिक भूख हड़ताल पर थे। 23  सितंबर को वहां केजरीवाल का कार्यक्रम था। सुबह दस बजे से कुछ युवक और अधेड़ तिरंगा लेकर एक कोने से दूसरे कोने तक चक्कर लगाने लगे। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे इक्कीस सौ रुपया की दिहाड़ी पर हरियाणा से आए हैं। 

जैसा कि अक्सर होता है, जंतर-मंतर पर पूरा दिन और कुछ देर के लिए होने वाले कई कार्यक्रम थे। केजरीवाल के समर्थकों द्वारा बजाए गए डीजे की तेज आवाज ने सभी को परेशान करके रख दिया था। देशभक्ति के फिल्मी गीत बार-बार बजाए जा रहे थे। पुलिस का एक वरिष्ठ कांस्टेबल हमारे पास आया कि हम उन्हें तेज आवाज में डीजे बजाने से रोकें, क्योंकि वे उसके कहने से नहीं मान रहे हैं। डीजे पूरा दिन लगातार बजता रहा। शाम के वक्त केजरीवाल आए और उनका भाषण शुरू हुआ तो उनके समर्थकों ने हमसे आदेश के स्वर में माइक व भाषण बंद करने को कहा। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें डपटा तो वे आंखें दिखाने लगे। हमने खुद उन्हें समझा कर वहां से हटाया। 

नौवीं बात है कि कांग्रेस और भाजपा का चेहरा काफी बिगड़ गया है। क्षेत्रीय दलों के नेताओं में एक भी ‘अंतरराष्ट्रीय’ केंडे का नहीं है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद के नेटवर्क से जुड़े अपने अधीनस्थ देशों में साफ-सुथरे चेहरों की पार्टी, जो लोकतंत्र की सबसे ज्यादा बात करे, अमेरिका की अभिलाषा होती है। जो देश उसके नेटवर्क में फंसने से इनकार करते हैं, वहां वह खुद हमला करके अपने माफिक नेता बिठा देता है। पार्टी का पंजीकरण हुए बिना ही अगले आम चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार लड़ाने की घोषणा बताती है कि नई पार्टी के लिए धन की कोई समस्या नहीं होगी। दसवीं और अंतिम बात यह कि यह सब प्रदर्शन - ‘मैं अन्ना हूं’, ‘मैं केजरीवाल हूं’, ‘मैं आम आदमी हूं’ - हद दरजे का बचकानापन है। मुक्तिबोध ने भारत के मध्य-वर्ग की इस प्रवृत्ति को ‘दुखों के दागों को तमगे-सा पहना’ कह कर अभिव्यक्त किया है। कपट, इस्तेमाल-वृत्ति और लफ्फाजी से भरे आंदोलन से कोई जेनुइन राजनीतिक पार्टी नहीं निकल सकती है। 

पार्टी को एक तरफ छोड़ कर ‘आम आदमी’ पर थोड़ी चर्चा करते हैं, जिसकी दावेदारी में कांग्रेस और भाजपा नई पार्टी के साथ उलझे हैं। लाखों-करोड़ों में खेलने वाले लोग जब ‘मैं आम आदमी हूं’ की टोपी लगाते हैं, तो उसका पहला और सीधा अर्थ गरीबों के उपहास में निकलता है। अगर लाखों की मासिक तनख्वा और फोर्ड फाउंडेशन जैसी पूंजीवाद की जमी हुई संस्थाओं से करोड़ों का फंड पाने वाले लोग अपने को आम आदमी कहें, तो यह गरीबों के सिवाय अपमान के कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर जो अकूत खर्चा किया गया है, वह दरअसल इस पार्टी के निर्माण पर किया गया खर्च है। आम आदमी से अगर मुराद गरीबों से है, जैसे कि दावे हो रहे हैं, तो कोई उन्हें इतना धन देने वाला नहीं है कि वे अपनी पार्टी धन की धुरी पर खड़ी कर सकें। गरीबों की किसी भी पार्टी को याराना पूंजीवाद का यार याराना मीडिया दिन-रात तो क्या, कुछ सेकेंड तक नहीं देगा। लिहाजा, यह स्पष्ट है कि आम आदमी का अर्थ गरीब आदमी नहीं है - न कांग्रेस के लिए, न आम आदमी की टोपी पहनने वालों के लिए।

 ‘आम आदमी’ की अवधारणा पर थोड़ा गंभीरता से सोचने की जरूरत है। आजादी के संघर्ष के दौर में और आजादी के बाद आम आदमी को लेकर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में काफी चर्चा रही है, जिसका साहित्य और कला की बहसों पर भी असर पड़ा है। साहित्य में आम आदमी की पक्षधरता के प्रगतिवादियों के अतिशय आग्रह से खीज कर एक बार हिंदी के ‘व्यक्तिवादी’ साहित्यकार अज्ञेय ने कहा कि ‘आम आदमी आम आदमी ... आम आदमी क्या होता है?’ उनका तर्क था कि साहित्यकार के लिए सभी लोग विशिष्ट होते हैं। राजनीति से लेकर साहित्य तक जब आम आदमी की जोरों पर चर्चा शुरू हुई थी, उसी वक्त आम आदमी का अर्थ भी तय हो गया था। उस अर्थ में गांधी का 'आखिरी आदमी' कहीं नहीं था। आम आदमी की पक्षधरता और महत्ता की जो बातें हुईं, वे शुरू से ही ‘मेहनत-मजदूरी’ करने वाले गरीब लोगों के लिए नहीं थीं। सब टीवी पर एक सीरियल ‘आरके लक्ष्मण की दुनिया’ आता है। उसका उपशीर्षक होता है ‘आम आदमी के खट्टे-मीठे अनुभव’। यह सीरियल उस आम आदमी की तस्वीर पेश करता है, जो आम आदमी की अवधारणा में निहित रही है। ये आम आदमी ज्यादातर नौकरीपेशा हैं, साफ-सुथरी और सुरक्षित हाउसिंग सोसायटी के फ्लैट में रहते हैं, मोटे-ताजे सजे-धजे होते हैं, स्कूटर-कार आदि वाहन रखते हैं, आमदनी बहुत नहीं होती लेकिन खाने-पीने, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, सैर-सपाटा-पिकनिक, बच्चों का कैरियर आदि ठीक से संपन्न हो जाते हैं। मध्य-वर्ग ने आम आदमी की अवधारणा में अपने को ही फिट करके उसकी वकालत और मजबूती में सारे प्रयास किए हैं और आज भी वही करता है। आम आदमी मध्यवर्गीय अवधारणा है। उसका गरीब अथवा गरीबी से संबंध हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मध्य-वर्ग को अपने केंद्र में लेकर चलने वाली आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का यह वायदा रहा है कि वह किसी को भी गरीब नहीं रहने देगी। दूसरे शब्दों में, जो गरीब हैं, उन्हें होना ही नहीं चाहिए। भारत का यह ‘महान’ मध्य-वर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह सब कुछ अपने लिए चाहता हैं, लेकिन गरीबों का नेता होने की अपनी भूमिका को छोड़ना नहीं चाहता। इस पाखंड ने भारत की गरीब और आधुनिकता में पिछड़ी जनता को अपार जिल्लत और दुख दिया है।  भारत का मध्य-वर्ग मुख्यतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनता है। यही कारण है कि इस आंदोलन और उससे निकली पार्टी का वर्णाधार अगड़ी सवर्ण जातियां हैं, जिनका साथ दबंग पिछड़ी जातियां देती हैं। इसी आधार पर पार्टी के नेताओं ने युवकों का आह्वान किया है कि वे जातिवादी नेताओं को छोड़ कर आगे आएं और मध्य-वर्ग नाम की नई जाति में शामिल हों। यहां उनकी जात भी ऊंची होगी, और वर्ग-स्वार्थ भी बराबर सधेगा।    

राजनीति में विदेशी निवेश 

आम आदमी पार्टी का बनना अचानक या अस्वाभाविक घटना नहीं है। किशन पटनायक ने एक जगह आक्रोश में कहा है कि जब देश में विदेशी धन से सब हो रहा है, पेड़ तक विदेशी धन से लग रहे हैं, तो अमुक क्षेत्र में विदेशी निवेश क्यों नहीं होगा? आज वे होते तो कहते कि विदेशी धन से चलने वाले एनजीओ जब समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, मानवाधिकार, नागरिक अधिकार, लोकतंत्र सुधार/संवर्द्धन आदि का काम बड़े पैमाने पर करते हैं, तो राजनीति क्यों नहीं करेंगे? एनजीओ पूंजीवादी व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं, जो उसके विरोध की राजनीतिक संभावनाओं को खत्म करते हैं। वे बताते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था अपने में पूर्ण और अंतिम हैं। अगर किसी समाज में समस्याएं हैं, तो वहां के निवासी एनजीओ बना कर धन ले सकते हैं और उन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। उसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध करने की जरूरत नहीं है। देश में जब सब क्षेत्रों में धड़ाधड़ एनजीओ काम कर रहे हैं, तो राजनीति भी अपने हाथ में लेने की कोशिश करेंगे ही। आखिर सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (नैक) में कितने एनजीओ वालों को खपाया जा सकता है? सुनते हैं, केजरीवाल नैक में शामिल होना चाहते थे, लेकिन वहां जमे उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उनका रास्ता रोक दिया। आखिर आदमी केवल प्रवृत्ति नहीं होता; उसकी अपनी भी कुछ फितरत होती है। मनमोहन सिंह का यह बच्चा रूठ कर कुछ उच्छ्रंखल हो गया है। उच्छ्रंखलता ज्यादा न बढ़े, इसके लिए कतिपय पालतू बच्चे पार्टी में शामिल हो गए हैं। यह उनका अपना निर्णय है या खुद मनमोहन सिंह मंडली ने उन्हें वहां भेजा है, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है। 

एनजीओ द्वारा कार्यकर्ताओं को हड़पने की समस्या पहले भी रही है। फर्क इतना आया है कि एनजीओं के जाल में पुराने लोग भी फंसने लगे हैं। यह स्थिति नवउदारवादी व्यवस्था की मजबूती की दिशा में एक और बढ़ा हुआ कदम है। इस बीच घटित एक वाकये को रूपक के रूप में पढ़ा जा सकता है। 1995 में बनी राजनीतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) के वरिष्ठ नेता सुनील एक प्रखर विचारक और प्रतिबद्ध समाजवादी कार्यकर्ता हैं। जेएनयू से अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद से वे पूर्णकालिक राजनीतिक काम कर रहे हैं। किशन पटनायक द्वारा शुरू की गई ‘सामयिक वार्ता’ का समता संगठन और बाद में सजप के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। किशन जी के रहते ही यह पत्रिका अनियमित होने लगी थी, जिसकी उन्हें सर्वोपरि चिंता थी। उनके बाद पत्रिका के संपादक बने साथी ने उसे अपना प्राथमिक काम नहीं बनाया। जबकि संपादकी की जिम्मेदारी लेने वाले किसी भी साथी को उसे अपना प्राथमिक काम स्वीकार करके ही वैसा करना चाहिए था। इस दौरान पत्रिका की नियमितता पूरी तरह भंग हो गई। अब पिछले दो-तीन महीने से सुनील उसे केसला-इटारसी से निकालने और फिर से जमाने की कोशिश  कर रहे हैं। सुनील राजनीति करने वाले थे, और संपादक बने साथी फोर्ड फाउंडेशन से संबद्ध हैं। अब सुनील पत्रिका निकाल रहे हैं और राजनीति करने का काम किशन जी के बाद संपादक बने साथी ने सम्हाल लिया है। सजप के भीतर यह फेर-बदल होता तो उतनी परेशानी की बात नहीं थी। उनका मन बड़ा है! वे केजरीवाल की नई पार्टी की राजनीति कर रहे हैं। कह सकते हैं, जो जहां का होता है, अंततः वहीं जाता है। लेकिन इस नाटक में बड़ी मशक्कत से खड़े किए गए एक संगठन और उससे जुड़े नवउदारवाद विरोधी संघर्ष का काफी नुकसान हुआ है। कहना न होगा कि इससे किशन पटनायक की प्रतिष्ठा को भी धक्का लगा है। आप समझ गए होंगे हम साथी योगेंद्र यादव की बात कर रहे हैं। हमने इस प्रसंग को रूपक के बतौर रखा है, जिसमें सुनील और योगेंद्र व्यक्ति नहीं, दो प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं।

साम्राज्यवाद की सगुणता के कई रूप हैं। विदेशी धन उनमें शायद मूलभूत है। पूरी दुनिया में बिछा बहुराष्ट्रीय कंपनियों और एनजीओ का फंदा उसीसे मजबूती से जुड़ा है। विदेशी धन, चाहे कर्ज में आया हो चाहे खैरात में, वह खलनायक है जो हमारे संसाधनों, श्रम और रोजगार को ही नहीं लूटता, स्वावलंबन और स्वाभिमान का खजाना भी लूट लेता है। उसके बाद कितना भी तिरंगा लहराया जाए, देशभक्ति के गीत गाए जाएं, न स्वावलंबन बहाल होता है, न स्वाभिमान। केवल एक झूठी तसल्ली रह जाती है। सोवियत संघ के विघटित होने के बाद यह प्रकाश में आया कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को वहां से कितना धन मिलता था। उस समय गुरुवर विश्‍वनाथ त्रिपाठी ने हमें बगैर पूछे ही कहा कि ‘क्या हुआ, धन क्रांति करने के लिए लिया था।’ सवाल है कि अगर लिया था तो क्रांति का क्या हुआ? एक दौर के प्रचंड समाजवादी जार्ज फर्नांडीज पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने सोशलिस्ट इंटरनेशनल से धन लिया। वे भी सोचते होंगे कि उन्होंने धन समाजवादी क्रांति करने के पवित्र उद्देश्य के लिए लिया है। आज वे कहां हैं, बताने की जरूरत नहीं। विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा। नई पार्टी ने स्वराज लाने की बात कही है। लेकिन वह झांसा ही है। एनजीओ वाले कैसे और कैसा स्वराज लाते हैं उसका जिक्र हमने ‘भ्रष्टाचार विरोध: विभ्रम और यथार्थ’  शीर्षक ‘समय संवाद’ में किया है, जो अब इसी नाम से प्रकाशित पुस्तिका में उपलब्ध है। अब दोनों ही बातें हैं। नुकसान की भी और फायदे की भी। फायदे की बात पर ध्यान देना चाहिए। जो इस नवउदारवादी प्रवाह में शामिल नहीं हुए, उनकी समझ और रास्ता अब ज्यादा साफ होंगे। जो शामिल हुए, लेकिन लौट आए, यह अफसोस करना छोड़ दें कि कितनी बड़ी ऊर्जा बेकार चली गई! ऊर्जा कभी बेकार नहीं जाती। वह जिस काम के लिए पैदा हुई थी, वह काम काफी कुछ कर चुकी है और आगे करेगी। साथी अपना काम इस बार ज्यादा ध्यान से करें। उनके पास यह ताकत कम नहीं है कि वे बदलाव नहीं कर पा रहे हैं, तो कम से कम देश की बदहाल आबादी के साथ धोखाधड़ी नहीं कर रहे हैं। 

लोग राजनीति को कहते हैं, हमारा मानना है कि मानव जीवन ही संभावनाओं का खेल है। यह भी हो सकता है मोहभंग हो और नई पार्टी से कुछ लोग बाहर आएं। जीवन में सीख की बड़ी भूमिका होती है। उससे नवउदारवाद विरोधी आंदोलन को निश्चित ही ज्यादा बल मिलेगा।

 26 नवंबर 2012     


1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...