Saturday, April 30, 2016

संघर्ष और समाधान: गांधीवादी परिप्रेक्ष्य- प्रेम सिंह

(डीएवी महिला कॉलेज, यमुना नगर, के गांधी अध्‍ययन केंद्र ने मार्च 2013 में Conflict & Conflict Resolution : A Gandhian Perspective विषय पर संगोष्‍ठी का आयोजन किया था। संगोष्‍ठी का बीज-भाषण डाॅक्‍टर प्रेम सिंह ने दिया था। दुनिया के स्‍तर पर हिंसा में निरंतर हो रही बढोतरी के मद्देनजर वह भाषण हम यहां दे रहे हैं। इसे बांचने की जरूरत है, ताकि वर्तमान संदर्भ में गांधीवादी नजरिए की व्यापकता पर पुनर्विचार किया जा सके )

‘‘मेरा दावा उस वैज्ञानिक से जरा भी अधिक नहीं है जो अपने प्रयोग अत्यंत शुद्ध ढंग से, पहले अच्छी तरह सोच-समझ कर और पूरी बारीकी से करता है फिर भी उससे प्राप्त निष्कर्षों को अंतिम नहीं मानता बल्कि उनके बारे में अपना दिमाग खुला रखता है। मैं गहरी आत्म-निरीक्षण की प्रक्रिया से गुजरा हूं, मैंने प्रत्येक मनोवैज्ञानिक स्थिति को परखा और उसका विष्लेषण किया है। इसके बावजूद मैं अपने निष्कर्षों के अंतिम और अचूक होने के दावे से बहुत दूर हूं।’’ (‘आत्मकथा’ की प्रस्तावना से) ‘‘इस किताब (‘हिंद स्वराज’) में ‘आधुनिक सभ्यता’ की सख्त टीका की गई है। यह 1909 में लिखी गई थी। इसमें मेरी जो मान्यता प्रगट की गई है, वह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है। मुझे लगता है कि अगर हिंदुस्तान ‘आधुनिक सभ्यता’ का त्याग करेगा, तो उससे उसे लाभ ही होगा।’’ (1921 में ‘यंग इंडिया’ में लिखी टिप्पणी से) 
 Conflict & Conflict Resolution : A Gandhian Perspective अकादमिक अध्ययन के एक विषय के रूप में काफी अहमियत प्राप्त कर चुका है। विषेषकर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और सामान्य तौर पर राष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में यह विषय उपयोगी माना जाता है। कुछ विष्वविद्यालयों में इसके अलग से विभाग भी खुले हैं। षांति अध्ययन, पर्यावरण अध्ययन, हाषिए की अ्िरस्मताओं का अध्ययन, नागरिक एवं मानवाधिकार अध्ययन, जनांदोलनों का अध्ययन आदि के पाठ्यक्रम संघर्ष-समाधन की जरूरत के मद्देनजर बनाए और चलाए जाते हैं। संघर्ष से मुक्ति पाने के लिए सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक एवं ध्यान व योग के स्तर पर भी काफी प्रयास देखने को मिलते हैं। बड़े नौकरषाह, कंपनियों के सीईओ, नेता, खिलाड़ी, फिल्मी कलाकार और दिन-रात गला-काट प्रतिस्पर्धा में जीने वाला मध्यवर्ग/नागरिक समाज तरह-तरह के उपायों से संघर्ष के समाधान की तलाष में लगे रहते हैं। 
संघर्ष-समाधान के अकादमिक अध्ययन में गांधी के विचारों, रास्ते और उनके द्वारा किए गए कार्यों को प्रमुखता से षामिल किया जाता है। संघर्ष-समाधान के अन्य रूपों में भी गांधी की स्वीकृति कुछ न कुछ रहती है। मसलन, यूएनओ द्वारा 2 अक्तूबर को षांति दिवस घोषित करने से लेकर एक फिल्म के माध्यम से चर्चा में रही गांधीगीरी तक यह देखा जा सकता है। इस तरह के परिदृष्य में, जाहिर है, यह सेमिनार विषेष महत्व रखता है। मैं आयोजकों को इस महत्वपूर्ण और प्रासंगिक विषय के लिए बधाई देता हूं। लेकिन साथ ही यह हिदायत भी कि संघर्ष-समाधान का गांधीवादी चिंतन और रास्ता विचार और व्यवहार, दोनों स्तरों पर आसान नहीं है। हम आगे देखेंगे कि गांधी ने आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का एक मुकम्मल विकल्प प्रस्तुत किया था और जहां तक संभव हो पाया उसके अनुसार जीवन जीने का प्रयोग किया था। वे अपने को व्यावहारिक आदर्षवादी कहते थे। उनके लिए विचार अथवा अध्ययन की उपयोगिता व्यवहार की कसौटी पर ही मान्य होती थी। 
मानव सभ्यता के हर दौर में संघर्ष विद्यमान रहा है। आमतौर पर संघर्ष को सत्ता-संघर्ष यानी राजनीतिक क्षेत्र का विषय माना जाता है। लेकिन वह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक आदि स्तरों पर भी विविध रूपों में हमेषा से सक्रिय रहा है। प्राकृतिक और समाजविज्ञान के विद्वानों में यह बहस का विषय है कि मानव सभ्यता के निर्माण और विकास में सहयोग मूलभूत है या संघर्ष। वह एक लंबी चर्चा है, जो यहां नहीं की जा सकती। अलबत्ता गांधी की मान्यता इस मामले में स्पष्ट है। वे यूरोपीय आधुनिकता के बरक्स मनुष्य की प्रकृति को आवष्यक रूप से षांतिप्रिय और परस्पर सहयोगी मानते हैं।  उनके मुताबिक मनुष्य मूलतः अच्छाई की प्रेरणा से परिचालित होता है।  
जहां तक आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का संबंध है, संघर्ष उसमें बद्धमूल है।  विकासवाद, पूंजीवाद, माक्र्सवाद और मनोविष्लेषणवाद - आधुनिकता के चारों सिद्धांतों और उन पर आधारित विचारधारा/जीवनदर्षन के मूल में समाज और व्यक्ति की प्रगति के मूलभूत उत्प्रेरक कारक के रूप में संघर्ष अथवा द्वंद्व की स्वीकृति है। डार्विन के विकासवाद में ताकतवर और कमजोर का संघर्ष; पूंजीवाद में मनुष्य का मनुष्य के साथ और मनुष्य समाज का प्रकृति के साथ संघर्ष; माक्र्सवाद में वर्ग-संघर्ष यानी षोषित और षोषक का संघर्ष; और फ्रायड व जुंग आदि के मनोविष्लेषणवाद में मनुष्य के चेतन और अवचेतन का संघर्ष स्वीकृत है। जीवन और जगत के ‘वैज्ञानिक सत्य’ संबंधी इन आधुनिक सिद्धांतों में आपस में मान्यताओं व वर्चस्व का संघर्ष भी चलता है; हालांकि इससे यह सच्चाई निरस्त नहीं होती कि इनकी पैदाइष एक ही कोख से हुई है।  
आधुनिक ज्ञान और विज्ञान संघर्ष को बद्धमूल मानने वाले इन चार सिद्धांतों से होकर गुजरता है। आधुनिकता की अवधारणा की निर्मिति में मूलभूत मानी जाने वाली बुद्धि और तर्क (तमंेवद) की प्रकृति का निर्धारण भी इसी से होता है। यानी बुद्धि और तर्क का संघर्षमूलकता के साथ नाभि-नाल संबंध है। आधुनिक प्रगति की अवधारणा और विकास का माॅडल इसी बुद्धि से तय होता है और बदले में उसे ही पोषित करता है। इस तरह आधुनिकता और उस पर आधारित आधुनिक सभ्यता का प्रचलित स्वरूप अपनी प्रकृति में ही संघर्षमूलक है। मनुष्य और मानव सभ्यता के विकास की उत्प्रेरक षक्ति के रूप में संघर्ष की यह मान्यता आधुनिक ज्ञान-मीमांसा में सार्वभौम और सही मानी जाती है। जो ऐसा नहीं मानते उनके चिंतन को आधुनिकता के दायरे से बाहर रखा जाता है।  
इसी अर्थ में हमने कहा है कि आधुनिक औद्योगिक सभ्यता में संघर्ष बद्धमूल है। यह परिघटना राष्ट्रों के संघर्ष से लेकर समाजों, सभ्यताओं, संस्कृतियों, धर्मों, व्यक्तियों और अस्मिताओं के संघर्ष में स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के अभी तक के विभिन्न चरणों में विभिन्न स्तरों पर विभिन्न रूपों में होने वाले संघर्ष के समाधान के प्रयास राजनैतिक और बौद्धिक नेतृत्व द्वारा लगातार किए जाते हैं। ये प्रयास अलग-अलग राष्ट्रों की सरकारों व संस्थाओं और समय-समय पर बनने वाली वैष्विक संस्थाओं, मसलन, मौजूदा दौर में यूएनओ, विष्व बैंक, आईएमएफ, डब्ल्यूटीओ आदि, के जिम्मे होते हैं। नागरिक स्तर पर संघर्ष के समाधान के स्वयंसेवी (एनजीओ) किस्म के प्रयास भी होते हैं। इस समय दुनिया में लाखों ऐसे एनजीओ का जाल फैला है। लेकिन पिछली करीब तीन षताब्दियों में देखा गया है कि संघर्ष-समाधान के निरंतर प्रयासों के बावजूद ऐसा समाधान नहीं निकलता कि संघर्ष आगे फिर सिर न उठाएं अथवा नए संघर्ष पैदा न हों। 
दरअसल, संघर्ष-समाधान के जो प्रयास होते हैं, उनमें ज्यादा जोर इस बात पर रहता है कि आधुनिक बुद्धि और तर्क के स्वीकृत उपयोग के आधार पर हर तरह के संघर्ष का जल्दी ही समाधान हो जाएगा और सारी मानवता आगे चल कर सुख-षांति से रहने लगेगी। इस परिप्रेक्ष्य से संघर्ष-समाधान तो नहीं ही होता, युद्धों और नरंहारों से लेकर पर्यावरण विनाष तक की कार्रवाइयों को वैधता मिल जाती है। दूसरे षब्दों में, संघर्ष दूर करने के सारे उपाय आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था और विकास के माॅडल के अंतर्गत खोजे और लागू किए जाते हैं। उसके विकल्प की तलाष और स्वीकृति का सच्चा प्रयास और इच्छा नहीं दिखाई जाती। उत्तर आधुनिक विमर्षों में आधुनिकता की ज्ञान-विज्ञान संबंधी धारणाओं और उन पर आधारित सार्वभौमिकता का दावा करने वाले महाख्यानों को चुनौती मिली है। लेकिन संघर्ष का समाधान वहां भी नजर नहीं आता है। उत्तर आधुनिक विमर्षों में बहुलता की स्वीकृति और हाषिए की अस्मिताओं को स्वर देने की जो बात होती है, आधुनिक ज्ञान-विज्ञान बुद्धि बहुलताओं और अस्मितावादी स्वरों को भी संघर्ष की धारा में समो  लेती है।    
गांधी ने आधुनिक औद्योगिक सभ्यता (जिसे अपने समय में वे सौ-पचास वर्ष पुरानी मानते थे और यूरोप में उसके वैकल्पिक चिंतन की सषक्त उपस्थिति स्वीकार करते थे) का विकल्प प्रस्तुत किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत विकल्प इस मायने में मुकम्मल है कि उसमें गांधी ने विकल्प की विचारधारा और अन्याय के प्रतिरोध की कार्यप्रणाली अथवा रास्ता दोनों बताए हैं; साधन और साध्य को परस्परावलंबित मानते हुए दोनों की एक-सी पवित्रता का स्वीकार किया है; और अपने जीवन में उन विचारों और रास्ते का पालन करने का निरंतर प्रयोग भी किया है। हालांकि वे यह स्वीकार नहीं करते कि उन्होंने पूर्ण सत्य पा लिया है। वे मानते हैं उनकी पहुंच केवल सापेक्ष सत्य तक हो पाई है। स्वराज्य के बारे में भी उनका कहना है कि आजादी के साथ जो मिलने जा रहा है वह उनके सपनों का स्वराज्य नहीं, इंग्लैंड के संसदीय लोकतंत्र का एक रूप होगा। लेकिन पूर्ण सत्य और स्वराज्य की दिषा में वे निरंतर प्रयासरत रहे। 
गांधी उन चिंतकों में हैं जो मनुष्य और सभ्यता के मूल में संघर्ष नहीं, सहयोग, सहअस्त्तिव, परस्परता को मानते हैं। सबसे पहले वे प्रकृति और मनुष्य की परस्परता का प्रतिपादन करते हैं। वे पष्चिमी सभ्यता को लालच और मुनाफे से परिचालित मानते हैं। लालच केवल ज्यादा से ज्यादा उपभोग करने का ही नहीं, ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने का भी होता है। गांधी मानते हैं कि धरती के पास सबका पेट भरने के लिए इफरात है, लेकिन एक के भी लोभ-संतुष्टि के लिए उसके संसाधन कम पड़ जाएंगे। वे बार-बार जोर देकर कहते हैं कि भारत को यूरोप और अमेरिका के विकास का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। साथ ही वे यूरोप और अमेरिका को भी आगाह करते हैं। गांधी ने कहा कि हथियारों के विषाल भंडार जमा करने से सुरक्षा और षांति नहीं बनाए रखे जा सकते। वही हुआ भी। दो महायुद्धों में यूरोप में कत्लोगारत का भयानकतम रूप देखने में आया। उसके पहले यूरोपवासी उपनिवेषित दुनिया में षोषण और दमन का लंबा सिलसिला चलाए हुए थे।  
राजनीति संघर्ष का जटिल क्षेत्र मानी जाती है। इसीलिए अक्सर राजनीति को छोड़ कर संघर्ष-समाधान के प्रयास किए जाते हैं। राजनीति के विकल्प की भी बात होती है और विकल्प की राजनीति की भी। गांधी ने विकल्प की राजनीति की रचना करने की कोषिष की ताकि राजनीति संघर्ष नहीं, सहयोग और मानवीय उत्थान का माध्यम बन सके। जयप्रकाष नारायण ने उसे लोकनीति नाम दिया है। आजादी के संघर्ष के दौरान और आजादी मिलने के बाद उन्होंने एक पल के लिए भी खुद सत्ता पाने का विचार नहीं किया। आजादी मिलने पर उन्होंने कांग्रेस को राजनीतिक पार्टी के बजाय लोक सेवक संघ बनाने का सुझाव दिया था। हालांकि उनके राजनीतिक साथियों ने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। 
गांधी भारत की आजादी के संघर्ष के राष्ट्रीय नेता थे। उन्होंने सबको साथ लेकर वह संघर्ष चलाने का अभूतपूर्व उद्यम किया। गांधी के सामने यह स्पष्ट था कि आजादी के बाद उनकी मान्यता का स्वराज हासिल नहीं होने जा रहा है; वह पार्लियामेंटरी ढंग का स्वराज होगा। लेकिन वे अपने ‘आध्यात्मिक स्वराज’ के लिए अड़े नहीं। उसे वे अकेले नहीं, सभी देषवासियों के साथ पाने में सार्थकता समझते थे। लेकिन विभाजन के सवाल पर वे अकेले रह गए और आजादी मिलने के साढ़े पांच महीने बाद उनकी हत्या भी हो गई। ऐसा नहीं है कि जिन्ना ने ही उनकी बात नहीं सुनी। नेहरू, जिन्हें उन्होंने अपना वारिस चुना था, ने भी उनके सपनों का भारत बनाने की दिषा में काम करने से साफ इनकार कर दिया। लेकिन गांधी ने इसके बावजूद अपना सहयोग, सक्रियता और स्वराज्य पाने की दिषा में आग्रह अंत तक बनाए रखा। खासकर विभाजन के वे इसीलिए विरोधी थे कि धर्म से राष्ट्रीयता का निर्धारण नहीं होता। यह मान्यता वे ‘हिंद स्वराज’ में स्पष्टता के साथ व्यक्त कर चुके थे।     
यह ध्यान देने की बात है कि गांधीवादी चिंतन पर आधारित भारत और दुनिया में एक भी पार्टी या सरकार नहीं रही है। फिर भी दुनिया में सबसे ज्यादा अध्ययन गांधी का हुआ है। यह संघर्ष में फंसी दुनिया में उनके चिंतन और रास्ते की सार्थकता को बताता है। लेकिन संघर्ष-समाधान के लिए उन्हें फुटकर तौर पर नहीं, पूर्णता में अपनाना होगा। गांधी ने कहा है कि उन्होंने ऐसी कोई नई बात नहीं कही है जो पहले लोगों ने नहीं कही हो। उन्होंने केवल उन बातों की सच्चाई को अनुभव किया है। ‘हिंद स्वराज’ के अंत में दी गई संदर्भग्रंथ सूची में टाल्सटाॅय, षेरार्ड, कारपेंटर, टेलर, ब्लाउंट, थोरो, रस्किन, मेजिनी, प्लेटो, मैक्स, नोरडो, मेन, दादाभाई नौरोजी और दत्त की पुस्तकों की सूची दी गई है। ‘बाईबल’, ‘कुरान’, ‘गीता’ से लेकर माक्र्स और एंगेल्स तक का अध्ययन उन्होंने किया था। अपने विषाल अध्ययन और सार्वजनिक उद्यम के साथ गांधी आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का साक्षात विकल्प बन गए थे। इस रूप में उन्होंने भरसक एक मुकम्मल राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, षैक्षिक दर्षन प्रदान करने की कोषिष की है।
गांधी संसार में मौजूद षोषण के विभिन्न रूपों, परंपरागत और उपनिवेषवाद के कारण पैदा हुए, को संजीदगी से देखते हैं और निरंतर उनका प्रतिकार करते हैं। लेकिन प्रतिकार का उनका तरीका हिंसा और हथियार पर नहीं, अहिंसा और आत्मबल पर आधारित है। असहयोग, सविनय अवज्ञा, सत्याग्रह और उपवास के जरिए वे संघर्ष को मूल से मिटाने की कोषिष करते हैं। गांधी के आलोचक अक्सर आरोप लगाते हैं कि गांधी का चिंतन और रास्ता भाववादी हैं। इस आरोप का जवाब अनिल नौरिया ने अपने एक महत्वपूर्ण लेख ‘गांधी एंड ह्यूमनिज्म: सम नोट्स आॅन गांधी एंड रीजन’ (ीजजचरूध्ूूूण्ंबंकमउपंण्मकन) में विस्तार से दिया है।  
गांधी ने कहीं भी और कभी भी तर्क का तिरस्कार नहीं किया है। उन्होंने ‘गीता’ समेत दुनिया के सभी धार्मिक षास्त्रों को तर्क की कसौटी पर कसने का आह्वान किया है। यह कहते हुए कि यह तर्क का युग है और हर धर्म के हर सूत्र को तर्क और सार्वभौम न्याय के एसिड टेस्ट से गुजरना होगा। जाहिर है, गांधी की अहिंसा, उपवास, सत्याग्रह, प्रार्थना, अंतःकरण की आवाज जैसे सिद्धांत और मान्यताएं उनके समग्र चिंतन के मद्देनजर तर्क पर आधारित हैं। आमतौर पर हिंसा के पक्षधर अपने को तर्क पर चलने वाला मानते हैं और गांधी की अहिंसा को भाववाद पर आधारित बताते हैं। लेकिन गांधी स्पष्ट करते हैं कि जब आप तर्क से किसी को अपनी बात नहीं समझा पाते तो हिंसा का सहारा लेते हैं। लिहाजा, तर्क का साथ गांधी नहीं, उनके आलोचक छोड़ते हैं। गांधी ने तर्कबुद्धि को हृदय के विपरीत नहीं माना है, न ही नैतिकता के। बल्कि वे तर्क की कसौटी हृदय और नैतिकता को स्वीकार करते हैं। 
गांधी के बारे में यह भ्रांत धारणा काफी प्रचलित है कि वे गरीबी की पूजा करने वाले थे। गांधी ग्रामीण सभ्यता को आधुनिकतावादियों की तरह खारिज नहीं करते। बल्कि वे उसके उत्थान की बात करते हैं। उन्होंने गांवों में हर तरह के समूहों के लिए, वे चाहे षाकाहारी हो या मांसाहारी, समुचित खाद्यान्न की व्यवस्था के साथ सफाई, षिक्षा, स्वाथ्य और मनोरंजन की व्यवस्था जरूरी बताई है। स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों के हक और प्रबंधन की भी वे वकालत करते हैं। विकेंद्रीकरण और विषाल उद्योगों की जगह लघु व कुटीर उद्योगों का समर्थन वे लोगों को गरीब नहीं, संपन्न बनाने के लिए करते हैं। यह सही है कि गांधी समृद्धि को मनुष्य के लिए वर्चू नहीं मानते। वे ईसा मसीह के हवाले से कहते हैं कि सुई के छेद से हाथी भले निकल जाए, पर एक समृद्ध व्यक्ति का ईष्वर के राज्य में प्रवेष असंभव है। 
भैतिक समृद्धि अगर आत्मबोध की कीमत पर आती है तो वह गांधी को पूरी तरह अमान्य है। आत्मबोध का विकास हो सकता है, आत्मबोध को खोकर विकास का मूल्य नहीं है। क्योंकि भौतिक अथवा किसी भी मूल्य की मीमांसा मनुष्य के आत्म अथवा चेतना में ही होती है। आत्म अथवा चेतना पर गांधी भौतिकता के नियम अथवा बंधन लागू करने के पक्ष में नहीं हैं। इस तरह वे आधुनिकता के पूरे प्रोजेक्ट को उलट देते हैं।   
हालांकि गांधी के अपरिग्रह और सादगी के सिद्धांत में सामाजिक स्तर पर आर्थिक पक्ष जुड़ा है। उनका मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों का उत्तरोत्तर समृद्धि के लिए अंधाधुंध दोहन से लाभ के बजाय आर्थिक हानि इतनी ज्यादा है कि उसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती। आधुनिक सभ्यता में एक तर्क प्रकृति के रहस्यों को जानने और खोलने का दिया जाता है। लेकिन वह खोज प्रकृति के अधिकाधिक दोहन की नीयत से परिचालित होती है। गांधी इस तरह की खोजों को न मनुष्यों के लिए उचित मानते हैं, न मानवेतर प्राणियों के लिए, न ही प्रकृति के लिए।    
वैष्वीकरण ने संघर्ष के नए रूप और आयाम पैदा किए हैं। एक तरफ पराराष्ट्रीय कंपनियां दुनिया के संसाधनों पर कब्जा और अपने बाजार का विस्तार कर रही हैं तो दूसरी तरफ आतंकवादी कार्रवाइयां, आतंकवाद के खिलाफ युद्ध और गृहयुद्धों से हिंसा का फैलाव बढ़ता जा रहा है। जाहिर है, इसके साथ हथियारों का कारोबार गरीब देषों की अर्थव्यवस्था की कीमत पर तेजी से बढ़ रहा है। बच्चे तक एक तरफ बंदूकों से हत्याएं कर रहे हैं और दूसरी तरफ मानव बम के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। यूं तो दूसरे विष्वयुद्ध के बाद से ही यूरोप और अमेरिका ने तय कर लिया था कि आगे वे आपस में नहीं लड़ेंगे। मारग्रेट थेचर और रोनाल्ड रीगन के बीच अस्सी के दषक में हुए नवउदारवादी क्रांति के करार के तहत आधुनिक सभ्यता के मौजूदा चरण कारपोरेट पूंजीवाद को बचाने और बढ़ाने के लिए संघर्ष को पूर्व-उपनिवेषों की ओर धकेल दिया गया है। 
ऐसे में गांधी की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। लेकिन गांधी को गंभीरता पूर्वक तभी समझा और अपनाया जा सकता है जब देष-विदेष में उनसे प्रभावित चिंतकों और अन्न्याय का अहिंसक प्रतिरोध करने वालों ने गांधी की जो व्याख्या और विस्तार किया है, उसे गंभीरता से समझा जाए। भारत में मुख्यतः जेपी और लोहिया ने गांधीवाद की उसके समस्त आयामों में गंभीर समीक्षा प्रस्तुत की है। अन्याय के प्रतिरोध के सविनय अवज्ञा - सिवलि नाफरमानी - के गांधी के तरीके के बारे में डाॅ. लोहिया ने कहा है, ‘‘ ... इसलिए हमारे युग की सबसे बड़ी क्रांति कार्यप्रणाली की क्रांति है, एक ऐसे तरीके द्वारा अन्याय का प्रतिकार जिसकी प्रकृति न्यायसम्मत हो। यहां सवाल न्याय के स्वरूप का उतना नहीं है जितना उसे प्राप्त करने के उपाय का। वैधानिक और व्यवस्थित प्रक्रियाएं अक्सर काफी नहीं होती। तब हथियारों का इस्तेमाल उनका अक्रिमण करता है। ऐसा न हो, मनुष्य हमेषा वोट और गोली के बीच भटकता न रहे, इसलिए सिविल नाफरमानी की कार्यप्रणाली संबंधी क्रांति सामने आई है। हमारे युग की क्रांतियों में सर्वप्रमुख है हथियारों के विरुद्ध सिविल नाफरमानी की क्रांति, यद्यपि वास्तविक रूप में यह क्रांति अभी तक कमजोर रही है।’’ (‘माक्र्स, गांधी एंड सोषलिज्म’, भूमिका) 
लोहिया ने पूंजीवाद और साम्यवाद के बरक्स जिस समाजवाद की प्रस्तावना की है, उसमें गांधीवाद का फिल्टर लगाने की बात की है। अपने बौद्धिक और राजनीतिक जीवन में लंबे समय तक माक्र्सवादी-समाजवादी रहे जेपी 1957 में सक्रिय राजनीति छोड़ कर सर्वोदय में षामिल हुए। तब गांधी जिंदा नहीं थे। लेकिन उन्होंने गांधी के सर्वोदय के विचार की वैष्विक संदर्भों में सुंदर विवेचना की है। उन्होंने कहा कि कोरा भौतिकवाद नैतिकता और अच्छाई की प्रेरणा नहीं देता।  
यह भी ध्यान खींचने वाली बात है कि गांधी का प्रभाव और प्रेरणा भारत के बाहर के विद्वानों और नेताओं पर ज्यादा है। सरसरी नजर से देखें तो गांधी से प्रभावित लोगों और आंदोलनों की दुनिया में एक पूरी धारा मौजूद है। कई विद्वान, कलाकार, पत्रकार और आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिक गांधी से गहराई से प्रभावित रहे हैं। नेताओं में अफ्रीका के नेल्षन मंडेला, डेस्मंड टूटू, घाना के क्वामे न्क्रूमा, तंजानिया के जूलियस न्ययेरे, जांबिया के केनेथ कांेडा, अमेरिका के मार्टिन लूथर किंग जूनियर, चैकोस्लोवाकिया के वैक्लाव हैवेल, पोलैंड के लेष वैलेसा, चीन के थ्येनमन चैक के सत्याग्रही, तिब्बत की स्वतंत्रता के अहिंसक आंदोलनकारी बहुत हद तक प्रतिरोध के गांधी द्वारा प्रवर्तित रास्ते पर चलने वाले रहे हैं। भारत में ईरोम षर्मीला पिछले 12 सालों से अफ्सपा के विरोध में अनषन सहित सत्याग्रह कर रही हैं। वे बार-बार गांधी की प्रेरणा का हवाला देती हैं।      
गांधीवाद की इस पूरी धारा को अक्सर नजरअंदाज करके गांधी के समर्थन या विरोध की बात की जाती है। ऐसे में होता यह है कि जो समर्थन होता है, वह उसी आधुनिक सभ्यता के दायरे में होता है, जिसका विकल्प गांधी ने प्रस्तुत किया है। जो विरोध होता है, वह तो आधुनिक सभ्यता की पक्षधरता के चलते होता ही है। दोनों ही मामलों में समग्र गांधी की अवहेलना होती है। समग्रता में ग्रहण किए और समझे बिना न गांधी की स्वीकृति फलप्रद हो सकती है, न अस्वीकृति से कोई अच्छा नतीजा निकल सकता है।  
आषा है इस सेमिनार में गांधीवादी विकल्प को समग्र रूप में सामने रख कर संघर्ष-समाधान के उपायों पर चर्चा होगी। उस दिषा में अकादमिक काम की चाहे थोड़ी और धीमी प्रगति हो, लेकिन संघर्ष समाधान के लिए आने वाले समय में उसीसे अपेक्षित परिणाम हासिल हो सकेगा।  

Friday, March 11, 2016

दलित-चिंतन को मिटाने की मुहिम- डॉ प्रेम सिंह

मध्यकाल के रचनाकारों में कबीर का अध्ययन और मूल्यांकन सबसे जटिल और चुनौती भरा रहा है। साहित्य के इतिहासकारों और आलोचकों के  अलावा दूसरे विषयों के विद्वानों ने भी कबीर के अध्ययन में रुचि ली है। 
कबीर का एक विमर्श लोक में भी बराबर चलता रहा है। वहां भी अन्य रचनाकारों के मुकाबले कबीर सबसे आगे और विशिष्ट हैं। हिंदी में कबीर के अध्ययन की लंबी परंपरा है। उस परंपरा में 1997 में डाॅ. धर्मवीर की 
आलोचना-पुस्तक ‘कबीर के आलोचक’ प्रकाशित हुई। उस पुस्तक में कबीर के व्यक्तित्व और चिंतन के मूल्यांकन संबंधी पूर्व मान्यताओं को ध्वस्त कर डाॅ. धर्मवीर ने अपनी नई स्थापनाएं प्रस्तुत की हैं। इस पुस्तक से कबीर के अध्ययन की परंपरा में पहली बार एक बड़ा तूफान उठ खड़ा हुआ। हिंदी आलोचना के परिदृश्य में सक्रिय सभी रंगतों के आलोचक डाॅ. धर्मवीर की ‘हिमाकत’ से क्षुब्ध हो उठते हैं। और साथ ही उन्हें ठिकाने लगाने के लिए सन्नद्ध। जमे हुए आलोचकों को तजुर्बा है, खासकर प्रगतिवादी आलोचकों को, कि कैसे उनकी काट करने वाले को काटा जाता है। हिंदी के ज्यादातर आलोचक और लेखक डाॅ. धर्मवीर पर चैतरफा हमला बोल देते हैं। इस विश्वास के साथ कि मैदान में नया और अकेला उतरा यह शख्स उनके हमलों के आगे थोड़ी देर भी नहीं टिक पाएगा। लेकिन धर्मवीर उनके हमलों से किंचित भी परेशान नहीं होते। स्वागत और खुशी के साथ पूरी तसल्ली और तफसील से सबकी आपत्तियों और सवालों के नुक्ता दर नुक्ता जवाब देते हैं। बहस के साथ कबीर पर उनका शोध-कार्य जारी रहता है। इस दौरान उनकी एक के बाद एक पांच पुस्तकें सामने आती हैं। तीन 
पुस्तकें - ‘कबीर: डाॅ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का प्रक्षिप्त चिंतन’ (2000), ‘कबीर और रामानंद: किंवदंतियां’ (2000), ‘कबीर: बाज भी, कपोत भी, पपीहा भी’ (2000) - नई सदी में कबीर श्रृंखला के अंतर्गत और दो पुस्तकें - ‘कबीर के कुछ और आलोचक’ (2002) और ‘सूत न कपास’ (2003) कबीर के आलोचक श्रृंखला के अंतर्गत। इन पुस्तकों से पता चलता है कि शुरुआती छोटी पुस्तक के पीछे लेखक की बड़ी तैयारी थी। चर्चा कबीर और उनकी आलोचना के दायरे से निकल कर ज्ञान की कई दिशाओं - दर्शन, धर्म, समाजशास्त्र, इतिहास, न्याय, कानून आदि - में व्याप्त हो जाती है। जो समझ रहे थे कि डाॅ. धर्मवीर को हवा में उड़ा देंगे, जान गए कि मुठभेड़ किसी सामान्य आलोचक से नहीं, एक गंभीर चिंतक से है। कबीर के आत्मविश्वास से लैस एक ऐसा चिंतक जिसने प्रगतिशीलता एवं आधुनिकता के झंडाबरदार ब्राह्मणों-ठाकुरों-वैश्यों को एक झटके में दलित-चिंतन की धार पर धर दिया है। ब्राह्मणवादी दर्षन और संस्कृति में पगे दिमाग को मानववाद, माक्र्सवाद, अस्तित्ववाद, मनोविश्लेषणवाद, उत्तर-आधुनिकतावाद आदि की पैकेजिंग से संवार कर आधुनिक बुद्धिजीवी बने विद्वानों के सामने यह कड़ी चुनौती थी। जो बड़े उत्साह और आत्मविश्वास के साथ डाॅ. धर्मवीर से उलझे थे, वे सब पीछे हट गए।  दरपेश चुनौती के सामने प्रभुत्वशाली प्रतिष्ठान अथवा महानुभाव कई बार चुप्पी की राजनीति (पाॅलिटिक्स आॅफ साइलेंस) का सहारा लेते हैं। वह किसी गंभीर चुनौती को निष्क्रिय करने की बोलने-लिखने से ज्यादा असरदार रणनीति होती है। डाॅ. धर्मवीर की चुनौती के सामने हिंदी के कुछ विद्वानों ने चुप्पी का हथियार इस्तेमाल किया। डाॅ. नामवर सिंह ने कहा कि वे डाॅ. धर्मवीर के विरोध में नहीं बालेंगे; हालांकि वे उनकी स्थापनाओं से सहमत नहीं हैं। उन्होंने पहेली बुझाई कि डाॅ. धर्मवीर का विरोध करने से ब्राह्मणवाद मजबूत होगा। शायद शुरू में डाॅ. नामवर सिंह को लगा होगा कि उनके दो शिष्य डाॅ. वीरभारत तलवार व डाॅ. पुरुषोत्तम अग्रवाल उनके साथी डाॅ. मैनेजर पांडे के साथ मिल कर ‘डेमेज कंट्रोल’ कर लेंगे। अथार्त् तूफान से माक्र्सवाद और डाॅ. हजारीप्रसाद द्विवेदी को सुरक्षित बचा कर ले आएंगे। ‘डेमेज कंट्रोल’ न हो पाने की स्थिति में वे खुद कुछ देर के लिए मैदान में उतर कर डाॅ. धर्मवीर को मर्यादा तोड़ने यानी ‘शास्त्र’ एवं ‘गुरु’ की निंदा का दंड देंगे। लेकिन लगता है वे जल्दी ही समझ गए कि इस बार चुनौती विकट है और अभी तक आजमाई ‘साहित्यिक’ युक्तियों से मामला रफा-दफा होने वाला नहीं है। यह कबीर पर कब्जे की लड़ाई नहीं, डाॅ. धर्मवीर ने ज्ञान पर ब्राह्मणी कब्जे को हटाने का ‘कांड’ उपस्थित कर दिया है। यह पहचानने में वे सबसे ज्यादा सयाने निकले कि पूरी तैयार से मैदान में उतरे डाॅ. धर्मवीर के सामने सीधी मुठभेड़ में जीतने का माद्दा इस समय हिंदी के किसी विद्वान में नहीं है। इसलिए चुप हो जाओ, झुक जाओ, नई रणनीति बनाओ! ‘कबीर के आलोेचक’ समेत उपर्युक्त छह पुस्तकों और लंबी बहस के बाद कबीर पर कोई नया और गंभीर अध्ययन डाॅ. धर्मवीर को नजरअंदाज करके नहीं किया जा सकता है। भले ही उसमें डाॅ. धर्मवीर की काट ही काट हो। अगर उस बहस में शामिल रहने वाला कोई विद्वान अपनेे कबीर संबंधी अध्ययन में डाॅ. धर्मवीर को नजरअंदाज करता है तो अकादमिक जगत के लिए यह चिंता का बायस होना चाहिए। अकादमिक ईमानदारी का विकल्प नहीं है और 
उसका समुचित निर्वाह सभी विद्वानों की सम्मिलित जिम्मेदारी है। जब डाॅ. पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की: कबीर की कविता और उनका समय’ का प्रकाशन-पूर्व प्रचार शुरू हुआ तो हमने स्वाभाविक तौर पर माना कि आलोचक ने डाॅ. धर्मवीर की पुस्तकों और बहस को खाते में लेकर अपना अध्ययन प्रस्तुत किया होगा और इस रूप में वह कबीर पर एक महत्वपूर्ण आलोचना-कृति होगी। पुस्तक प्रकाशित होने पर हमें अपने एक शोधार्थी से यह जान कर आश्चर्य हुआ कि डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक में डाॅ. धर्मवीर की पुस्तकों का कहीं जिक्र ही नहीं है। पांच साल पहले जो महाभारत कबीर को लेकर मच चुका है उसके बाद यह संभव नहीं है कि कबीर पर तीस-बत्तीस साल लगा कर काम करने वाले विद्वान के सामने डाॅ. धर्मवीर के कबीर की तस्वीर न झूलती रहे। यह स्वीकृत मान्यता है कि भक्तिकालीन भक्त एवं संत कवियों ने अपनी-अपनी मनोभूमि से समवेत रूप में प्रेम को पांचवा पुरुषार्थ सिद्ध कर दिया था। यह भी माना जा सकता है कि कबीर और रैदास की प्रेमोपासना संभवतः सबसे निराली और सबसे उदात्त है। ऐसे में कबीर समेत समस्त भक्तिकालीन रचनाकारों के प्रेमोपासक होने से भला किसे ऐतराज हो सकता है? डाॅ. धर्मवीर ने कबीर की खोज मुक्त-ज्ञान के करुणानिधान के रूप में की है। वहां उनसे मुठभेड़ की जा सकती है जो कुछ हद तक हुई भी और धर्मवीर ने जवाब भी दिए। उनके जवाबों को अपर्याप्त, यहां तक कि गलत ठहराया जा सकता है। डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक के शाीर्षक से ही यह समझा जा सकता है कि लेखक ने प्रेम की अकथ कहानी की आड़ में ज्ञान पर वर्चस्व की 
राजनीति की है। कबीर को डाॅ. धर्मवीर से छुड़ा कर प्रेम के पुराने अखाड़े में खींच कर ले जाना दरअसल प्रतिक्रियावाद कहा जाएगा। दलित-चिंतन की भूमि से इसे ब्राह्मणवादी साजिश भी कहा जा सकता है। हमने इस पुस्तक की राजनीति के बारे में बाहर से बताया है। बेहतर होगा कि डाॅ. धर्मवीर तीन दषक लगा कर लिखी गई डाॅ. अग्रवाल की बहुप्रशंसित पुस्तक को पढ़ें और उसकी अंदरूनी राजनीति की विस्तृत समीक्षा करें।  हमें विश्वास था कि डाॅ. धर्मवीर के कबीर को ‘गायब’ करने का डाॅ. अग्रवाल का ‘जादू’ सभी विद्वानों पर नहीं चलेगा। कहीं न कहीं से आवाज आएगी। हमारे कान पुस्तक की भूरी-भूरी प्रशंसा करने में लगे विद्वानों की तरफ लग गए कि वे डाॅ. धर्मवीर का कोई जिक्र करते हैं या नहीं? भले ही यह कह कर कि डाॅ. अग्रवाल ने कबीर के नाम पर डाॅ. धर्मवीर द्वारा फैलाया गया ‘कूड़ा-कर्कट’ साफ कर दिया है। डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक का प्रकाशन और विमोचन समारोहपूर्वक हुआ। उस पर गोष्ठियों और समीक्षाओं का सिलसिला अभी जारी है। जिस सुनियोजित ढंग से पुस्तक को ‘लाॅन्च’ किया गया है उससे लगता है गोष्ठियों और समीक्षाओं का सिलसिला लंबा चलेगा। अब तक प्रायः हर रंगत का विद्वान पुस्तक पर न्यौछावर लुटा चुका है। इसमें कोई समस्या नहीं है - जब अफसर-लेखकों के लिए विद्वानों के दिल के दरवाजे खुल जाते हैं तो लेखक-अफसर के लिए छाती चैड़ी क्यों नहीं होगी! समस्या यह है कि किसी विद्वान ने अपनी लिखित या मौखिक राय रखते वक्त डाॅ. धर्मवीर और उनके कबीर का हवाला नहीं दिया है। डाॅ. नामवर सिंह ने भी नहीं, जो कहते थे कबीर पर आगे बात बिना डाॅ. धर्मवीर के नहीं हो सकती। ऐसा माहौल बना दिया गया है मानो कबीर पर धर्मवीर की पुस्तकें आई ही नहीं थीं, न कोई बहस थी, न धर्मवीर नाम का कोई विद्वान हिंदी में है। इसके बावजूद कि कबीर के बाद धर्मवीर की कई विषयों पर कई पुस्तकें आ चुकी हैं।अब हम कह सकते हैं कि डाॅ. धर्मवीर को ‘गायब’ करने का काम चूक से या अकेले डाॅ. अग्रवाल के करने से नहीं हुआ है। यह जाना-बूझा और सम्मिलित उद्यम है। जिस तरह से आधुनिक और प्रगतिशील युग में डाॅ. धर्मवीर को ‘गायब’ करने का ‘तिलस्म’ रचा गया है, उससे यह आशंका मजबूत होती है कि पिछड़े सामंतकालों में दलित-चिंतन को दबाने और नष्ट करने की युक्तियां और रणनीतियां बड़े पैमाने पर ईजाद की गई होंगी और अमल में लाई गई होंगी। कम से कम शुरुआती दौर में तो जरूर ऐसा हुआ होगा - जब तक दलित और शूद्र जीवन को श्रम और सेवा का पर्याय बना कर ज्ञान-विहीन क्षेत्र में तब्दील नहीं कर दिया गया। यह तो खैर पीछे की बात है और उसे मध्यकाल के मत्थे मढ़ कर तसल्ली पाई जा सकती है। लेकिन प्रस्तुत और इस तरह के अन्य वाकये बताते हैं कि हाशिए के समूहों एवं अस्मिताओं के सशक्तिकरण की आधुनिक बुद्धिजीवियों की चिंता वास्तविक नहीं है। आधुनिक बौद्धिक प्रतिष्ठान हजारों साल तक दबा कर रखी गई हाशिए की अस्मिताओं को स्वतंत्र चिंतन की छूट देने को तैयार नहीं है। ऐसे चिंतन को तो कतई नहीं जिसमें प्रभुत्वशाली चिंतन के बरक्स समुचित ढांचा और दृष्टि मिलती हो।  डाॅ. धर्मवीर के चिंतन की पद्धति में एक हद के बाद तेर-मेर का रवैया हमें ठीक नहीं लगता रहा है। दुनिया में चिंतन का अभी तक का अनुभव बताता है कि चिंतन की एक मनोभूमि ऐसी होती है जहां अपने रास्ते और दृष्टि से पहुंच कर चिंतक विभक्त नहीं रह जाता है। अब बात हमारी समझ में आती है कि एक दलित-चिंतक अनेक खतरों के लिए खुला होता है। वह मिला कि रला! ब्राह्मणी चिंतन वाले लेखकों-विचारकों से दलितों को सावधन रहने की डाॅ. धर्मवीर की हिदायत का निहितार्थ भी अब हमारी समझ में आता है। रास्ते के बटमार दलित चिंतक को कभी पूर्णकाम नहीं होने दे सकते। दलित चिंतक प्रचलित अर्थ में समन्वयवादी नहीं हो सकता। अगर वह होता है तो ब्राह्मणी चिंतन कई तरह के हथकंडों से उसके चिंतन को रला सकता है। डाॅ. धर्मवीर ने दलित-चिंतन को सबसे बड़ा खतरा ‘माक्र्सवादी बटमारों’ से बताया है। षायद यही उनका सबसे बड़ा अपराध हो गया है?    डाॅ. धर्मवीर के स्वतंत्र दलित-चिंतन के विरोधियों ने पीछे हटते वक्त मुंह बनाते हुए जताया था कि ‘मूर्ख के मुंह कौन लगे’! बात वहीं समाप्त हो जा सकती थी। लेकिन हुई नहीं। डाॅ. धर्मवीर ने बारूद का जो ढेर इकठ्ठा कर दिया था, उसे निष्क्रिय करना जरूरी था। पुश्त दर पुश्त चले आए सत्ता पर कब्जे को बरकरार रखने के लिए ज्ञान पर कब्जा बनाए रखना अनिवार्य है। उन्हें यह अहसास अच्छी तरह हो गया कि डाॅ. धर्मवीर कब्जे में आने वाले नहीं हैं। लिहाजा, अंदर ही अंदर तय पाया गया कि उन्हें ध्वस्त करने की पुख्ता और दूरगामी रणनीति बनानी होगी। डाॅ. अग्रवाल की पुस्तक और उसके जन्म पर जो सोहर गाए जा रहे हैं, उसी रणनीति का प्रतिफल है। इस प्रतिफल तक आने के पहले काफी कुछ घटित हुआ है जिसके विस्तृत ब्यौरे में नहीं जाया जा सकता। लेकिन एक-दो मोटी बातें बताई जा सकती हैं। डाॅ. अग्रवाल के शिष्य बजरंगबिहारी तिवारी और रमणिका गुप्ता के निर्देशन में दलित महिलाओं से ‘नैतिकता के ठेकेदार’ धर्मवीर पर चप्पलें फिंकवाई गईं। डाॅ. धर्मवीर द्वारा ‘कफन’ की बुधिया के पेट में ठाकुर का बच्चा बताने पर, सामंतवाद को पानी पी-पी कर कोसने वाले राजेंद्र यादव सरीखे प्रगतिशीलता के पर्याय लेखक हाहाकार कर उठे। बड़े-बड़े लेखकों ने गली के छोकरों के अंदाज में डाॅ. धर्मवीर की बौद्धिकता पर फब्तियां कसीं और लानत भेजी। गोया किसी ‘ठाकुर’ ने किसी दलित महिला का कभी शीलहरण किया ही न हो? काॅलिजों और विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में कबीर सभी जगह पढ़ाए जाते हैं। लेकिन लगभग सभी जगह कबीर के अध्ययन के लिए प्रस्तावित संदर्भग्रंथों में डाॅ. धर्मवीर की किताबें नहीं हैं। डाॅ. धर्मवीर पर शोध करने के इच्छुक शोधर्थियों को हतोत्साहित किया गया। चार साल पहले एमफिल के हमारे एक शोधार्थी को डाॅ. धर्मवीर की आलोचना-दृष्टि पर शोध का विषय मिला तो डाॅ. अग्रवाल ने उस पर विषय बदलने के लिए दबाव डाला। हमें यह सुन कर अपने पेषे पर गहरी ग्लानि हुई कि उन्होंने शोधार्थी के सामने डाॅ. धर्मवीर के प्रति असंसदीय भाषा का प्रयोग किया। एक चर्चित दलित लेखक ने भी शोधार्थी को लताड़ा कि वह डाॅ. धर्मवीर पर शोध करके क्यों उनका महत्व बढ़ाता है? हमारे नामचीन और जिम्मेदार पदों पर बैठे विद्वानों का यह क्या हाल हो गया है! डाॅ. सुधीश पचैरी ने जताया है कि वे चैतरफा विरोध के बीच डाॅ. धर्मवीर के समर्थक हैं। लेकिन वे पहली ही नजर में पकड़े जाते हैं जब भारतीय समाज और वांडमय की गहरी खुदाई करने वाली और अपने को आदि स्रोतों से जोड़ने वाली प्रतिभा को उत्तर-आधुनिकता की ‘संजीवनी’ से जाग्रत हुआ बताते हैं। यानी एक ‘आजीवक’ को आज के बाजार का जीव मानते हैं। समर्थन की आड़ में भ्रम फैलाने के और भी उदाहरण मिल सकते हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि डाॅ. धर्मवीर के चिंतन को निष्क्रिय करने के लिए जार-सत्ता, बाजार-सत्ता और सरकार-सत्ता के नुमांइदे बुद्धिजीवी एकजुट हो गए हैं। यह अलग विषय है कि उनकी संलिप्तता में भारत में पिछले डेढ़ हजार सालों से चली आ रही रूढि़ की बड़ी भूमिका है। क्योंकि वे इतने नादान नहीं हैं कि यह सच्चाई नहीं जानते हों कि मौलिक सृजन और चिंतन कुछ देर के लिए नजरअंदाज किए जा सकते हैं, उन्हें हमेशा के लिए निष्क्रिय नहीं किया जा सकता।

Saturday, February 27, 2016

घिर गई है भारत माता-प्रेम सिंह

ये भी तो मादरे हिंद की बेटी है! 
आज हर जगह देशभक्ति और देशद्रोह की  बहस हो रही है। जो आरएसएस की नवउदारवादी और सांप्रदायिक नीतियों की मुखालफत कर रहा है, उसे देशद्रोही साबित करने की सरकारी साजिश हो रही है। और इसमें किस क़दर केन्द्रीय मंत्रियों की भागीदारी है ये भी अब किसी से छिपा नहीं है। हालात ये हो गए हैं, कि अवसरवादी बुद्धिजीवीयों के एक तबके ने सरकार के सुर मे सुर मिलाना भी शुरू कर दिया है। लेकिन अब सवाल ये खड़ा हो रहा है कि क्या आज जो हालात हैं वो एक दिन में पैदा हुए हैं। बिल्कुल नहीं कुछ लोग इस विस्फोटक परिस्थिति का सिग्नल सालों से दे रहे थे। लेकिन कार्पोरेटपरस्त मीडिया ने चतुराई के साथ उन आवाज़ों को दबाए रखा है। देशभक्ति के छलछंद भरे कोलाहल में उम्मीद की एक किरण के तौर पर नज़र आते हैं डॉ प्रेम सिंह। जो अकेले ऐसे बुद्धिजीवी हैं। जो सांप्रदायिक और नवउदारवादी नीतियों के खिलाफ सैद्धांतिक और व्यवहारिक रूप से खड़े हैं। पेश है उन्हीं का एक लेख जो मौजूदा माहौल में खरा है। डॉ प्रेम सिंह का ये लेख युवा संवाद (अंक मई 2012) में प्रकाशित हुआ था। जिसे उनकी पुस्‍तक भ्रष्‍टाचार विरोध : विभ्रम और यथार्थ (वाणी प्रकाशन) में संकलित किया गया है। )
करीब पांच साल पहले की बात है। हम परिवार के साथ कार में रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे नोएडा से एक शादी से लौट रहे थे। गाजीपुर चैराहे पर अंधेरा था और कड़ाके की ठंड थी। करीब पंद्रह साल की एक लड़की लाल बत्ती पर गजरा बेच रही थी। लिबास से वह खानाबदोश या फिर आदिवासी समाज से लग रही थी। वह थोड़ी ही दूरी पर खड़ी थी लेकिन धूसर शरीर और कपड़ों में उसकी शक्ल साफ नहीं दिख रही थी। हालांकि यह साफ था कि वह कुपोषण के चलते पतली-दुबली है और कुदरत की ताकत के सहारे जिंदा ;दिलद्ध है। हमने इधर-उधर नजर दौड़ाई। उसके साथियों में और कोई नजर नहीं आया। वह चैराहा शहर के बाहर और सुनसान था, जहां लड़की के साथ कुछ भी हो सकता था। हमने यह मान कर मन को तसल्ली दी कि उसके कोई न कोई साथी जरूर आस-पास कहीं होंगे, लड़की अकेली नहीं है। इतनी रात गए अकेली कैसे हो सकती है? 
वह लड़की थोड़ा हमारी कार के पास आई। देखा, वह वैसी चिंतित और डरी हुई नहीं थी जैसा हम उसको लेकर सोच रहे थे। अपनी जड़ों से वह उखड़ी हुइ्र्र जरूर थी, लेकिन उसके बावजूद जीवन पर उसकी गिरफ्त मजबूत लगी। हजारों साल का सामंतवाद उसकी स्वायत्तता और स्वच्छंदता को नष्ट नहीं कर पाया था। उसी ताकत के बल पर वह पूंजीवाद से लोहा ले रही थी। हमने महसूस किया कि उस लड़की और हमारे बीच गहरा फासला है। उसका मन-मानस हमसे अलग और आज भी स्वच्छंद है। हमें तब नागार्जुन की उपर्युक्त काव्य-पंक्ति अनायास याद आई थी। हल्की मुस्कुराहट के साथ - मादरे हिंद की एक बेटी यह भी है! 
आधुनिक कलाकारों को सामंती/पूंजीवादी शोषण के शिकार लोगों पर रचना करने की आदत पड़ चुकी है। आदत के वशीभूत हम कई दिनों तक उस लड़की की दशा पर कोई लेख या कविता लिखने की सोचते रहे। हालांकि लिखा नहीं गया। यह सोच में पड़ कर कि लोग कब से गरीबों, वंचितों, शोषितों को विषय बना कर लिखते आ रहे हैं। उसे मुक्ति का, क्रांति का साहित्य कह कर उसका संघर्ष और सौंदर्य मूल्य भी सिद्ध कर दिया जाता है। लेकिन भारत के शहरों की गंदी बस्तियों, झुग्गियों, लाल बत्तियों, फुटपाथों पर भीड़, कितना ही खदेड़ो, बढ़ती ही जाती है। यह रोज का किस्सा है, कोई कितनी कविता करेगा! महाकवि को इलाहाबाद के पथ पर जो पत्थर तोड़ती दिखी थी, उसकी पोतियों-नातिनों की इतनी ही तरक्की हुई है कि वे एक के बाद एक और नए से नए बनने वाले एक्सप्रैस रास्तों पर पत्थर तोड़ रही हैं। वे इस देश और दुनिया की कभी नागरिक नहीं बन सकती, उन्हें मानव कहना मुश्किल लगता है। उस दिन खास बात थी तो बस यही कि वह अकेली लड़की एक-दो रुपये के लिए इतनी रात गए वहां थी। 
हमें लगा कि जिस तरह पूंजीवादी कंपनियों के लिए जल, जंगल, जमीन संसाधन हैं, आधुनिक और तरक्कीपसंद कलाकारों/लेखकों के लिए कंपनियों द्वारा जड़ों से उजाड़ा गया जीवन भी संसाधन है। कंपनियों को जैसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा चाहिए, रचना के बदले लेखकों को भी नाम और नकद पुरस्कार चाहिए - ज्यादा से ज्यादा और बड़ा से बड़ा। जो सरकार कंपनियों को ठेके देती हैं, वही रचनाकारों को पद और पुरस्कार देती हैं। इधर कंपनियां भी अपने पुरस्कार देने लगी हैं। ‘रचना सत्ता का प्रतिपक्ष होती है’, ‘सत्ता रचना/रचनाकार से भय खाती है’ - इस तरह की टेक को ऊंचा उठाए रखते हुए रचनाकारों ने वे पुरस्कार लेने भी शुरू कर दिए हैं। आने वाले समय में कंपनियों की ओर से कुछ पद भी आॅफर किए जा सकते हैं। आखिर कंपनियों का भी कोई सामाजिक-सांस्कृतिक दायित्व बनता है! यूरोप और अमेरिका में लंबे समय से यह चल रहा है। 
बहरहाल, हमने उस लड़की पर कुछ लिखा नहीं। उसे रात के अंधेरे में वहां देख कर सहानुभूति का एक तीव्र ज्वार उठा था। आज साफ लगता है कि उसके बारे में लिखे जाने पर जो भी मुक्ति होती, वह अपनी ही होती। उस लड़की की मुक्ति से उसका कोई साझा नहीं होता। हमारा कभी उससे मिलना या बातचीत नहीं होनी थी। पांच साल बाद देखते हैं कि वह लड़की और ज्यादा अकेली होती और अमानवीय परिस्थितियों में घिरती जा रही है। चिंता की जाती है कि इतिहास, विचारधारा, मुक्ति, प्रतिबद्धता, सरोकार, सहानुभूति आदि पद निकम्मे घोषित हो चुके हैं। उस लड़की के संदर्भ उन्हें एक दिन निकम्मे साबित होना ही था। क्योंके वे पूंजीवाद के पेट से उठाए गए थे। जिस दिन पूंजीवाद को मानव सभ्यता के विकास में क्रांतिकारी चरण होने का प्रमाणपत्र मिला था, उसी दिन यह तय हो गया था कि वह लड़की महानगर के चैराहे पर, रात के अंधेरे में, अकेली गुबारा या गजरा जैसा कोई सामान बेचेगी। और उसकी एक अन्य बहन को उसका मालिक ताले में बंद करके सपरिवार निश्चिंत विदेश घूमने निकल जाएगा। यह तय हो गया था कि यह भारत सहित पूरी दुनिया में अनेक जगहों पर अनेक रूपों में अनेक बार और लगातार होगा। भारत में पिछले 20-25 सालों में इस प्रक्रिया में खासी तेजी आई है।     
पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली की मध्यवर्गीय आवास काॅलोनी द्वारिका के एक मकान से पुलिस ने एक 13 साल की घरेलू नौकरानी को डाॅक्टर दंपत्ति के घर की कैद से छुड़ाया। डाॅक्टर दंपत्ति मार्च के अंतिम सप्ताह में उसे घर में बंद करके अपनी बेटी के साथ थाईलैंड की सैर पर गए थे। 6 दिन बाद बालकनी से पड़ोसियों ने लड़की की पुकार सुनी। वह पहले भी पुकार करती रही थी, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। 30 मार्च को एक एनजीओ की मदद से पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने फायर इंजिन बुला कर लड़की को कैद से बाहर निकाला। यह मामला मीडिया में काफी र्चिर्चत रहा। खबरों में आया कि लड़की भूखी, डरी हुई और बेहाल थी। मालिकों ने लड़की को उसके लिए छोड़े गए खाने के अलावा रसोई से कुछ और नहीं खाने के लिए सख्ती से मना किया था। खबरों के मुताबिक लड़की ने मालिकों द्वारा अक्सर प्रताडि़त किए जाने की बात भी कही। 
मामला टीवी और अखबारों में आने से, जाहिर है, डाॅक्टर दंपत्ति के रिश्तेदारों ने उन्हें बैंकाॅक में सूचित कर दिया। वे आए और पुलिस से बचते रहे। उन्होंने कहा कि उनकी नौकरानी बच्ची नहीं, 18 साल की बालिग है और उसके साथ कोई दुव्र्यवहार नहीं किया जाता रहा है। वे उसे साथ ले जाना चाहते थे, लेकिन लड़की ने जाने से इंकार कर दिया। जो भी हो, मामला पकड़ में आ गया था, पुलिस ने डाॅक्टर दंपत्ति को न्यायिक हिरासत में ले लिया। अब वे जमानत पर हैं और अदालत में केस दायर है। वाकये को ज्यादा दिन नहीं हुए हैं लेकिन लोग अभी से उसके बारे में भूल चुके हैं। हो सकता है कोई गंभीर पत्रकार मामले में आगे रुचि ले और केस की प्रगति और नतीजे के बारे में बताए। और उस लड़की के बारे में भी कि उसका क्या हुआ? उसे क्या न्याय मिला?  
जैसा कि अक्सर होता है, इस मामले में भी मीडिया की खबरों में लड़की को मेड (उंपक) अथवा घरेलू नौकरानी लिखा/कहा गया है। लड़की का उत्पीड़न करने वाले डाॅक्टर दंपत्ति का नाम - संजय वर्मा, सुमित्रा वर्मा - हर खबर में पढ़ने/सुनने में आया। काफी खोजने पर हमें लड़की का नाम एक जगह सोना लिखा मिला। हालांकि हमें यह नाम असली नहीं लगता। लड़की की मां जब झारखंड से आई तो उसका नाम भी मीडिया में पढ़ने को नहीं मिला। उसे लड़की की मां लिखा और कहा गया। भारत का मध्यवर्ग अपने बच्चों के नामकरण के पीछे कितना पागल होता है, इसकी एक झलक अशोक सेकसरिया की करीब 15 साल पहले छपी कहानी ‘राइजिंग टू द अकेजन’ में देखी जा सकती है। पिछले, विशेषकर 25 सालों में सुंदर-सुंदर संस्कृतनिष्ठ नाम रखने की देश में जबरदस्त चल्ला चली हुई है। केवल द्विज जातियां ही नहीं, शूद्र और अनुसूचित जाति और जनजाति से मध्यवर्ग में प्रवेश पाने वाले दूसरी-तीसरी पीढ़ी के लोग द्विजों की देखा-देखी यह करते हैं। लाड़लों पर लाड़ तो उंड़ेला जाता ही है, जो स्वाभाविक है, भारत का मध्यवर्ग अपने सांस्कृतिक खोखल को सांस्कृतिक किस्म के नामों से भरने की कोशिश करता है। इस समाज में झारखंड के आदिवासी इलाके से आने वाली निरक्षर मां-बेटियों का नाम नहीं होता। 
द्वारिका काॅलोनी का यह मामला सुख्रियों में आने पर नागरिक समाज ने ऐसा भाव प्रदर्शित किया मानो वे स्वयं ऐसा कुछ नहीं करते जो डाॅक्टर दंपत्ति ने किया। मानो वह द्वारिका काॅलोनी, दिल्ली या देश में एक विरल मामला था जो भले पड़ोसियों के चलते समय पर सामने आ गया। कानून तोड़ने और लड़की के साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले शख्स को गिरफ्तार कर लिया गया। अब पुलिस और कानून अपना काम करेगा। ऐसा सोचने में उसका पीडि़ता से कोई सरोकार नहीं, खुद से है। ऐसा सोच कर वह अपने को कानून का पाबंद नागरिक और परम मानवीय इंसान मानने की तसल्ली पा लेता है। इस तसल्ली में अगर कुछ कमी रह जाती है तो वह बाबाओं के दर्शन और प्रवचन से पूरी करता है। इस झूठी तसल्ली में वह इतना सच्चा हो जाता है कि गंदी राजनीति और राजनेताओं पर अक्सर तीखे हमले बोलता है। उनके द्वारा कर दी गई देश की दुर्दशा पर आक्रोश व्यक्त करता है। राजनीति को बुरा बताते वक्त भी राजनैतिक सुधार उसकी इच्छा नहीं होती, वैसा करके वह अपने अच्छा होने का भ्रम पालता है। यह सच्ची बात है कि भारत की मौजूदा राजनीति बुरी बन चुकी है। लेकिन इस बुरी राजनीति की मलाई काटने की सच्चाई मध्यवर्ग छिपा लेता है।  
हम सब जानते हैं भारत में कारखानों, ढाबों, दुकानों से लेकर घरों तक में बाल मजदूरों की भरमार है। शहर की लाल बत्तियों पर छोटे-छोटे लड़के-लड़कियां तमाशा दिखाते, कोई सामान बेचते या भीख मांगते मिलते हैं। जो 14 साल से ऊपर हो जाते हैं उन्हें भी हाड़तोड़ श्रम के बदले सही से दो वक्त पेट भरने लायक मेहनताना नहीं मिलता। सुबह 6 बजे से रात 8 बजे तक माइयां काॅलोनियों में इस घर से उस घर चैका-बर्तन, झाड़ु-बुहारू, कपड़े धोने, बच्चे सम्हालने और खाना बनाने के काम में चकरी की तरह घूमती हैं। वे दस-बीस रुपया बढ़ाने को कह दें तो सारे मोहल्ले में हल्ला हो जाता है। उनके मेहनताने - ज्यादा से ज्यादा काम, कम से कम भुगतान - को लेकर पूरे मध्यवर्गीय भारत में गजब का एका है। 
दूसरी तरफ, मध्यवर्ग के लोग जिस महकमे, कंपनी या व्यापार में काम करते हैं, अपने सहित पूरे परिवार की हर तरह की सुविधा-सुरक्षा मांगते और प्राप्त करते हैं। इसमें संततियों के लिए ज्यादा से ज्यादा संपत्ति जोड़ना भी शामिल है। फिर भी उनका पूरा नहीं पड़ता। वे कमाई के और जरिए निकालते हैं। रिश्वत लेते हैं। टैक्स बचाते हैं। अपने निजी फायदे के लिए कानून तोड़ते हैं। अभिनेता, खिलाड़ी, विश्व सुंदरियां, कलाकार, जावेद अख्तर जैसे लेखक अपने फन से होने वाली अंधी कमाई से संतुष्ट नहीं रहते। वे विज्ञापन की दुनिया में भी डट कर कमाई करते हैं। सरकारें ऐसी प्रतिभाओं से लोक कल्याण के संदेश भी प्रसारित करवाती हैं। वे अपनी कमाई को लेकर जरा भी शंकित हुए, देश की आन-बान-शान का उपदेश झाड़ते हैं। उनमें कुछ सचमुच बड़े कलाकार हैं! किसानों की आत्महत्याओं, महिलाओं के उत्पीड़न, गरीबों की बेबसी, बच्चों की वलनरेबिलिटी को भी मुनाफे का सामान बना लेते हैं। इस तरह अपनी बड़ी-छोटी सोने की लंका खड़ी करके उसे और मजबूत बनाने में जीवन के अंत काल तक जुटे रहते हैं। इनकी हविस का कोई अंत नहीं है। रोजाना करोड़ों बचपन तिल-तिल दफन होते हैं, तब उनकी यह दुनिया बनती और चलती है।
भोग की लालसा में फंसे मध्यवर्ग का एक और रोचक पहलू है जो फिल्मों और साहित्य में भी देखा जा सकता है। यह सब करते वक्त उन्हें अपनी मजबूरी सोना की मां की मजबूरी से भी बड़ी लगती है, जिसे अपनी नाबालिग लड़की अंधेरे में धकेलनी पड़ती है। ‘पापी पेट की मजबूरी’ में वे झूठ बोलने, धोखा देने, फ्लर्ट करने, प्रपंच रचने की खुली छूट लेते हैं। कई बार यह पैंतरा भी लिया जाता है कि हम भी तो कुछ पाने के लिए अपनी आत्मा को अंधेरे में धकेलते हैं। रोशनी दिखाने वाले बाबा लोग न हों तो जीना कितना मुश्किल हो जाए! यह अकारण नहीं है कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समर्थन में आम मध्यवर्गीय भारतीय से लेकर बड़े-बड़े उद्योगपति, उनकी संस्थाएं और नवसाम्राज्यवाद का पंजा गड़ाने वाली कुख्यात फंडिंग एजेंसियों का धन खाने वाले बुद्धिजीवी और समाजसेवक शामिल हैं।       
लोग यह भी जानते हैं कि देश में चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन एंड रेगुलेशन) एक्ट 2006 है। लेकिन उसकी शायद ही कोई परवाह करता है। कुछ एनजीओ और स्वयंसेवी संस्थाएं ही इस मुद्दे पर सक्रिय रहते हैं। बाकी कहीं से कोई आवाज नहीं उठती कि बचपन को कैद और प्रताडि़त करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो, अगर मौजूदा कानून में कमी है तो उसे और प्रभावी बनाया जाए। कड़क लोकपाल की स्वतंत्र संस्था और कानून बनाने के लिए आसमान सिर पर उठाने वाले लोग ये ही हैं। उनके लिए ही बाल मजदूरी और सस्ती मजदूरी की यह ‘प्रथा’ चल रही है। वह न चले तो इनका जीवन भी चलना असंभव हो जाएगा।
आइए सोना की बात करें। सोना अपनी मां की बेटी है। लेकिन क्या वह भारत माता की भी बेटी है? नागार्जुन ने अपनी कविता में जब आराम फरमा मादा सुअर का चित्रण किया तो वे उसकी मस्ती और स्वतंत्र हस्ती पर फिदा हुए लगते हैं - देखो मादरे हिंद की गोद में उसकी कैसी-कैसी बेटियां खेलती हैं! कविता का शीर्षक ‘पैने दांतों वाली ...’ कविता की अंतिम पंक्ति है। शायद कवि कहना चाहता है कि ‘‘जमना किनारे/मखमली दूबों पर/पूस की गुनगुनी धूप में/पसर कर लेटी .../यह ... मादरे हिंद की बेटी ...’’ अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने में समर्थ है। 
सोना का वह भाग्य नहीं है। उससे भारत माता की गोद छीन ली गई है। भारत माता सोना की मां जैसी ही मजबूर कर दी गई है, जिसे अपनी बेटी अनजाने देश भेजनी पड़ती है, जहां वह सीधे वेश्यावृत्ति के धंधे में भी धकेली जा सकती है। वह चाह कर भी अपनी बेटी को अपने पास नहीं रख सकती। पूंजीवादी आधुनिक सभ्यता आदिवासियों को उनके घर-परिवेश-परिजनों से उखाड़ कर जमती है। ऐसा नहीं है कि नागरिक समाज में ईमानदार और दयालु लोग नहीं हैं या नवउदारवाद के चलते आगे नहीं रहेंगे। लेकिन उससे अनेकार्थी विषमताजनित शोषण नहीं रुकेगा। आदिवासी लड़कियों, महिलाओं, लड़कों, पुरुषों को अपने घर-परिवेश से निकल कर हमारे घरों और निर्माण स्थलों पर आना ही होगा। उन्हें कुदरत का भी श्राप है। उनकी घर-धरती के नीचे जो खनिज संपदा जमा है, उसे निकाले बगैर पूंजीवाद का एक कदम काम नहीं चल सकता।       
आपको याद होगा अन्ना आंदोलन के दौरान दिल्ली में पोस्टर लगे थे - ‘देश की बेटी कैसी हो, किरण बेदी जैसी हो।’ किरण बेदी काफी चर्चा में रहती हैं। कहती हैं, जो भी करती हैं, देश की सेवा में करती हैं। हमें किरण बेदी की कारगुजारियों से यहां मतलब नहीं है। सवाल है - मादरे हिंद की बेटी कौन है? किरण बेदी या सोना? आप कह सकते हैं दोनों हैं। लेकिन हम सोना को मादरे हिंद की बेटी मानते हैं। इसलिए नहीं कि हमारी ज्यादा सही समझ और पक्षधरता है। सोनाएं किरण बेदियों के मुकाबले भारी सख्या में हैं और किसी का बिना शोषण किए, बिना बेईमानी किए, बिना देश सेवा का ढिंढोरा पीटे, दिन-रात श्रम करके, किफायत करके अपना जीवन चलाती हैं। यौन शोषण समेत अनेक तरह की प्रताड़नाएं सहती हैं। अपनी ऐसी गरीब बेटियों के लिए हर मां मरती-पचती और आंसू बहाती है। सोनाओं की मांओं के समुच्चय का नाम ही भारत माता है। इस भारत माता को कपूतों ने एकजुट होकर अपनी कैद में कर लिया है। 
कपूतों की करतूत
हमारे गांव के पंडित लिखी राम अब दुनिया में नहीं हैं। वे एक स्वरचित गीत गाते थे। गीत के बोल बड़े मार्मिक और रोमांच पैदा करने वाले थे। गीत की टेक थी - ‘भारत माता रोती जाती निकल हजारों कोस गया’। हजारों कोस का बीहड़ रास्ता हमारी बचपन की नजरों के सामने खिंच जाता था, जिस पर रोती-बिलखती भारत माता नंगे पांव चली जाती थी। गीत सुखांत नहीं था। हमें इससे परेशानी होती थी। भगत सिंह और उनके पहले के क्रांतिकारियों की शहादत, सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज और गांधी जी की हत्या पर गीत समाप्त होता था। तब हमें राष्ट्रवाद, उसकी विचारधारा और वर्ग चरित्र के बारे में जानकारी नहीं थी। हम अपनी जन्म देने वाली मां के अलावा एक और मां - भारत माता - से जुड़ाव का अनुभव करते थे और पाते थे कि वह कष्ट में है। भावना होती थी कि भारत माता के कष्ट का निवारण होना चाहिए। तब हमें भारत माता साड़ी, मुकुट और गहनों में सजी-धजी नहीं दिखाई देती थी। उसके हाथ में तिरंगा भी नहीं होता था। वह दिन-रात खटने वाली गांव की औरतों के वेश में उन्हीं जैसी लगती थी। 
बड़े होकर भी हम पंडित लिखी राम का गीत सुनते रहे। भारत माता की विशिष्ट छवि, उससे संबंधित साहित्य और बहसों के बीच बचपन में पंडित लिखी राम द्वारा खींची गई भारत माता की तस्वीर मौजूद रहती रही है। ‘मैला आंचल’ में तैवारी जी का गीत - ‘गंगा रे जमुनवा की धार नवनवा से नीर बही। फूटल भारथिया के भाग भारत माता रोई रही।’’ पढ़ा तो उसकी टान (लय) लिखी राम के गीत की टान के साथ खट से जुड़ गई। तैवारी जी के गीत की टान को सुन कर बावनदास आजादी के आंदोलन में खिंचा चला आया था। उस टान पर वह अपना जीवन आजादी के संघर्ष में बिता देता है। अंत में माफिया द्वारा निर्ममता पूर्वक मारा भी जाता है। उसे मारा ही जाना था, क्योंकि वह यह सच्चाई जान लेता है कि आजादी के बावजूद भारत माता को स्वार्थी तत्वों ने अपने कब्जे में ले लिया है और वह जार-जार रो रही है। बावनदास गांधी का अंधभक्त है। भारत माता अंग्रेजों की कैद से छूट कर कपूतों के हाथ में पड़ गई है - इस सच्चाई पर वह कोई ‘निगोसिएशन’ करने को तैयार नहीं था। उसकी वैसी तैयारी ही नहीं थी। वह राजनैतिक से अधिक नैतिक धरातल पर जीता था। वह अहिंसक क्रातिकारी था। भला भारत माता को लेकर सौदेबाजी की जा सकती है? 
हमारे मित्र चमनलाल ने भगत सिंह पर काम किया है। काम को और बढ़ाने के लिए उन्होंने भारत में नवउदारवाद के प्रतिष्ठापक मनमोहन सिंह को मदद के लिए पत्र लिखा था जिसे नेट द्वारा सबको भेजा कि सभी उनकी मांग का समर्थन करें। पता नहीं मनमोहन सिंह ने उनकी बात सुनी या नहीं। एक बार वे कह रहे थे कि भगत सिंह जिंदा रहते तो भारत के लेनिन होते। उनसे कोई पूछ सकता है कि नवउदारवादी मनमोहन सिंह से भगत सिंह पर काम के लिए मदद मांगने का क्या तर्क बनता है, और भगत सिंह लेनिन क्यों होते; भगत सिंह क्यों नहीं होते? किन्हीं रूपकिशोर कपूर द्वारा 1930 के दशक में बनाए गये एक चित्र की प्रतिलिपि मिलती है। उसमें भगत सिंह तलवार से अपना सिर काट कर दोनों हाथों से भारत माता को अर्पित कर रहा है। भारत माता भगत सिंह को हाथ उठा कर रोते हुए आशीर्वाद दे रही है। (संदर्भ: ‘मैप्स, मदर/गोडेस, मार्टिर्डम इन माॅडर्न इंडिया)।     
नवजागरणकालीन चिंतकों, क्रांतिकारियों, कवियों-लेखकों, चित्रकारों ने विविध प्रसंगों में भारत माता की छवि का अंकन किया है। ‘भारत माता ग्रामवासिनी’ से लेकर ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ के रूप में उसके गुण गाए गए हैं। भारत माता की छवि की राष्ट्रीय और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन में भूमिका की सीमाएं और अंतर्विरोध आज हम जानते हैं। विद्वानों के लिए शोध का यह एक प्रमुख विषय है। लेकिन हम यह भूल गए हैं कि क्रांतिकारियों का आंदोलन हो या गांधी के नेतृत्व में चलने वाला आंदोलन या इन दोनों से पहले आदिवासियों और किसानों का आंदोलन - उनमें भारत माता को पूंजीवादी बेडि़यों से मुक्त करने की मंशा थी। आजादी के बाद समाजवादी और कम्युनिस्ट आंदोलन की तो टेक ही पूंजीवाद विरोध थी। लेकिन देखते-देखते देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, दवाइयों से लेकर हथियारों तक हर तरह की दलाली करने वालों, बिल्डरों, माफियाओं, नेताओं, बुद्धिजीवियों ने एका बना कर भारत माता को घेर लिया है। सब मिल कर उसे नवउदारवादी हमाम में खींच रहे हैं। 
हम यहां टीम अन्ना और उसके आंदोलन पर इसलिए चर्चा करना चाहेंगे क्योंकि वे भारत माता का नाम बढ़-चढ़ कर लेने वालों में हैं। इस विषय में ज्यादातर जो आलोचना या विरोध हुआ, वह यह कि टीम अन्ना ने जंतर-मंतर पर भारत माता की जो तस्वीर लगाई वह आरएसएस लगाता है। यह बहुत ही सतही आलोचना या विरोध है। हमने आलोचकों से पूछा था कि जो आरएसएस की भारत माता से खफा हैं, वे बताएं कि उनकी अपनी भारत माता कौन-सी है? दूसरे, आरएसएस की भारत माता की तस्वीर से क्या परहेज हो सकता है जब पूरा आरएसएस ही आंदोलन में मौजूद है? भारत माता के घिराव में टीम अन्ना की सहभागिता पर थोड़ा विचार करते हैं। 
अन्ना आंदोलन के दौरान सबसे ज्यादा अवमूल्यन भाषा का हुआ है। इस आंदोलन की बाबत यह गंभीर मसला है। कहीं से कोई वाकया उठा लीजिए, उसमें बड़बोलापन और खोखलापन एक साथ दिखाई देगा। आंदोलन में कई गंभीर लोग शामिल हुए। कुछ बाहर आ गए, कुछ अभी वहीं हैं। ऐसे लोगों की भाषा पर भी असर आया है। उनकी भाषा पिछली ताकत खो बैठी। जब विरोधी पृष्ठभूमियों के और विरोधी लक्ष्य लेकर चलने वाले व्यक्ति या समूह आंदोलन के उद्देश्य से एक साथ आते हैं तो भाषा में छल-कपट और सतहीपन आता ही है। टीम अन्ना के प्रमुख सदस्यों द्वारा भाषा का अवमूल्यन अभी जारी है। एक उदाहरण लें। उसकी प्रमुख सदस्य किरण बेदी ने हाल में कहा कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर तीन फकीर हैं, जो देश का कल्याण करने निकले हैं। हमें 1989 का वह नारा - ‘राजा नहीं फकीर है, भारत की तकदीर है’ - याद आ गया जो समर्थकों ने वीपी सिंह के लिए गढ़ा था।   
जिनका नाम किरण बेदी ने लिया है उन तीनों को अगर सबसे ज्यादा प्यार है तो वह धन से है। धन के लिए वे कोई भी धत्कर्म करने के लिए तत्पर हैं। इसीलिए वल्र्ड बैंक से लेकर भारत और विदेश के आला अमीरों तक इनके तार जुड़े हैं। बंदा अमीर होना चाहिए, वह कौन है, कैसे अमीर बना है, इसकी तहकीकात का काम बाबाओं का नहीं होता! यह ‘फकीरी’ खुद किरण बेदी और टीम अन्ना के पीछे मतवाले मीडिया तथा सिविल सोसायटी को भी बड़ी प्यारी है। फकीरी का यह नया अर्थ और ठाठ है, जो नवउदारवाद के पिठ्ठुओं ने गढ़ा है। भारत का भक्ति आंदोलन सर्वव्यापक था, जिसमें अनेक अंतर्धाराएं सक्रिय थीं। फकीर शब्द तभी का है। संत, फकीर, साधु, दरवेश - इनका जनता पर गहरा प्रभाव था। दरअसल, उनके अपने सादगी और त्याग भरे जीवन का उतना महत्व नहीं है। ज्यादा महत्व इसका है कि उन्होंने सामंती ठाठ-बाट के बरक्स विशाल श्रमशील जीवन के दर्शन को वाणी दी। 
ऐसा नहीं है उन्हें संसार और बाजार का ज्ञान और सुध नहीं है। ‘पदमावत’ में ऐसे बाजार का चित्रण है जहां एक-एक वस्तु लाखों-करोड़ों में बिकती है। लेकिन भक्त बाजार से नहीं बंधता। भक्तिकाल में फकीरी भक्त होने की कसौटी है। जो फकीर नहीं है, गरीब नहीं है, वह भक्त नहीं हो सकता। फकीरी महज मंगतई नहीं है। वह एक मानसिक गठन है, जिसे संसार में काम करते हुए उत्तरोत्तर, यानी साधना के जरिए पाया जाता है। वह हद (सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक संरचनाओं) से बेहद (जहां ये संरचनाएं प्रभावी नहीं रह जाती) में जाने की साधना है, जहां भक्त केवल प्रभु का रह जाता है। जब गरीब ही भक्त हो सकता है तो प्रभु गरीब नेवाज होगा ही। 
यह साधना बिना सच्चे गुरु के संभव नहीं होती। इसीलिए उसे गोविंद से बड़ा बताने का भी चलन है। जाहिर है, फकीरी गुरु होने की भी कसौटी है। दिन-रात भारी-भरकम अनुदान और दान के फेरे में पड़े तथाकथित गुरुओं और संतों को क्या कहेंगे - फकीर या फ्राड! काफी पहले हमने ‘त्याग का भोग’ शीर्षक से एक ‘समय संवाद’ लिखा था। उसमें सोनिया गांधी के ‘त्याग’ का निरूपण किया था। अन्ना हजारे सरीखों के आरएसएस टाइप त्याग के चैतरफा पूंजीवाद और उपभोक्तवाद चलता और फलता है। ऐसे त्यागी महापुरुषों को उस व्यवस्था से कोई परेशानी नहीं होती। क्योंकि वहां दान के धन से ही सामाजिक काम किए जाते हैं। दान सामंत देता है या पूंजीपति या दलाल, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।   
हमारे मित्र जयकुमार ने सुबह की सैर में हमें ‘खुशखबरी’ दी कि बाबा रामदेव डाॅ. लोहिया का नाम ले रहे थे। करीब दो साल पहले साथी हरभगवान मेंहदीरत्ता (अब दिवंगत) ने भी हमें बताया था कि रामदेव के एक कार्यक्रम में उन्हें डाॅ. लोहिया का चित्र दिखा। कुछ दिन बाद हमने उनके चेलों के हाथ में भारत स्वाभिमान अभियान का वह फोल्डर देखा जिस पर एक पूरी चित्रावली बनी थी। लोहिया का चित्र उसमें भी था। इस देश में गांधी के नाम पर कोई भी जबान साफ कर सकता है। न किसी को ऐतराज होता है, न अचरज। लगभग ऐसी ही गति क्रांतिकारियों की बन चुकी है। वे माफियाओं से लेकर बाबाओं तक के हीरो हैं। लेकिन अन्ना के अंबेडकर का और रामदेव के लोहिया का नाम लेने पर किसी को भी कौतुक होगा। अज्ञेय ने लिखा है, ‘कालिदास की पीड़ा थी, अरसिकों को कवित्त निवेदन न करना पड़ जा जाए, केशवदास की पीड़ा थी, च्रद्रबदनि मृगलोचनी बाबा कहि-कहि न चली जाए, अज्ञेय की पीड़ा है, मैं क्या जानता था यह गति होगी कि हिंदी विभागों में हिंदी के अध्यापकों द्वारा पढ़ाया जाऊंगा!’ भारत में आत्मा मरने के पहले भी रहती है और मरने के बाद भी। लोहिया की आत्मा को जरूर कौतुक हुआ होगा कि भारत माता के नाम पर अपने उपभोक्ता उत्पाद बेचने वाले ध्ंाधेबाज उनका नाम ले रहे हैं! 
सुना है रामदेव का अपना ‘विचार साहित्य’ भी है। उसके बारे में जो ब्यौरे इधर-उधर पढ़ने को मिलते हैं, उनसे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है। वे दरअसल कुंठित मानसिकता के प्रतिनिधि बाबा हैं। भारत के मध्यवर्ग ने पढ़ना-लिखना बिल्कुल छोड़ दिया है। स्कूल स्तर पर की गई विभिन्न विषयों की पढ़ाई भी उसके जीवन में नहीं झलकती। मध्यवर्ग की नई से नई बसने वाली काॅलोनियों में सब कुछ मिलेगा, सिवाय विचार और रचना-साहित्य के। जहां तक पत्रिकाओं का सवाल है, मनोरंजन, खेल, प्रतियोगिता और राजनीतिक खबरों की पत्रिकाओं के अलावा वहां कुछ नहीं मिलता। मध्यवर्ग ने कर्मकांड को संस्कृति और अंधविश्वास को आस्था मान लिया है। ऐसे में कुंठित मानसिकता ही पनपती है, जो मीडिया की मार्फत परवान चढ़ी हुई है। जब ‘पढ़े-लिखे’ मध्यवर्ग का यह हाल है तो गांवों और कस्बों के बारे में अंदाज लगाया जा सकता है। ज्यादातर फिल्में, सीरियल और धार्मिक-आध्यात्मिक प्रवचन कुंठित मानसिकता का प्रतिफलन और उसे पोसने वाले होते हैं। उपभोक्तवाद के शिकंजे में पूरी तरह फंसा भारत का ‘महान’ मध्यवर्ग भावनाओं, संबंधों, मूल्यों आदि को लेकर अजीबो-गरीब आचरण करता है। मध्यवर्ग की इस विशिष्ट परिघटना पर हमें कभी विस्तार से लिखना है।   
यह फंसाव राजनीति में भी देखने को मिलता है। ताजा उदाहरण सीपीएम का ‘देसी समाजवाद’ है। संगठित और अपने को विचारधारात्मक कहने वाली पार्टी कैसे टोटके कर रही है! उससे पूछा जा सकता है कि आचार्य नरेंद्रदेव, जेपी और लोहिया के बाहर देसी समाजवाद के कौन स्रोत हैं? लेकिन यह किसी ने नहीं पूछा और पूरे मीडिया में सीपीएम प्रस्तावित भारतीय समाजवाद की खूब धूम रही। बाबा रामदेव और श्री श्री रविशंकर को नेताओं से और नेताओं को इन दोनों से संबंध बनाने का बड़ा शौक है। रामदेव ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के लिए राजनीतिक पार्टी बनाने से पहले लालू यादव और नीतीश कुमार के एक साथ चहेते थे। श्री श्री की हसरतें ‘जीवन की कला’ का कारोबार शुरू करने के समय से ही जवान रही हैं। हमें ज्यादा हैरानी नहीं हुई, जब देखा कि वे दिल्ली विश्वविद्यालय में भी घुस गए हैं। एक रोज हम स्टाफ रूम में बैठे थे। चार-पांच युवक-युवतियां भक्तिभाव से भरे हुए आए और सूचना दी कि श्री श्री फलां तारीख को हिंदू काॅलेज में आ रहे हैं। फिर कहने लगे कि वे श्री श्री और कार्यक्रम के बारे में एम.ए. की क्लास को संबोधित करना चाहते हैं। हमने उन्हें कहा कि अपना पोस्टर लगाइए और जाइए। हमें लगा कि क्या सचमुच हमारा बीमार समाज बाबाओं की बदौलत चल रहा है!   
रामदेव के साथ न्याय करते हुए कहा जा सकता है कि जब अपने को समाजवादी कहने वाले नेता और पार्टियां कारपोरेट घरानों की राजनीति करते हैं तो बाबा के लोहिया को चेला मूंडने पर क्योंकर ऐतराज किया जा सकता है? यूपी के नए मुख्यमंत्री प्रधनमंत्री से मिलने गए तो उन्होंने वही सब बातचीत की जो दूसरे मुख्यमंत्री करते हैं। सोना से उसकी मां और भारत माता की गोद छीन लेने वाले पूंजीवाद और मनमोहन सिंह द्वारा लाई गई नवउदारवादी नीतियों पर उन्होंने जरा भी सवाल नहीं उठाया। इसके बावजूद भाई लोगों को वहां लोहिया का समाजवाद फलीभूत होने की संभावनाएं नजर आ रही हैं। भारतीय समाज और राजनीति में यह जो स्थिति बनी है, उसकी अभिव्यक्ति के लिए विडंबना, विद्रूप, विसंगति जैसे पद अपर्याप्त हैं। जब कोई समाज अंधी गली में प्रवेश कर जाता है तो यही होता है। जिस आंदोलन की पीठ पर उद्योग और व्यापार जगत की हस्तियां/संस्थाएं हैं, बड़े-बड़े एनजीओ हैं, संघियों के उसमें शामिल होने की बात तो समझ आती है, अचरज है कि समाजवादी, गांधीवादी, माक्र्सवादी उसमें डुबकी लगा रहे हैं। 
राजनैतिक समझ के अभाव में अन्ना और रामदेव नहीं समझ सकते कि वे क्या कह और कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में, वे वही कह और कर रहे हैं जो उनकी समझदारी है। उनकी समझदारी के मेल का समाज बना हुआ है तो उनका कहना और करना रंग लाता है। उनके सिपहसालार उन्हें किसी विशेष नेता या विचारक का नाम लेने और मुद्दा उठाने की सलाह देते हैं। लेकिन किसी के कहने पर नेता या विचारक विशेष का नाम लेना या किसी विशेष मुद्दे को उठाना रंग को चोखा नहीं कर सकता। इसके पीछे एक जिंदगी बीत जाती है। लेकिन जिनकी राजनीतिक समझदारी है, जो महत्वपूर्ण भूमिका या तो निभा चुके हैं या निभा रहे हैं, उन्हें आज नहीं तो कल जवाब देना पड़ेगा। 
यह विचारणीय है कि अगर 1990 के पहले के माहौल में पले-बढ़े लोगों का यह आलम है तो आगे आने वाली पीढि़यों का क्या रुख-रवैया होगा? आज अगर भले ही थोड़े लोग, कम से कम संविधान की कसौटी पर, सही हैं तो आगे ज्यादा सही होने की संभावना बनी रहेगी। लेकिन आज अगर सही नहीं हैं, तब आगे भी सही नहीं होंगे। भ्रष्टाचार विरोध की ओट बहुत दिन तक साथ नहीं दे सकती। विदेशी बैंकों में जमा काला धन हो या यहां की लूट, दोनों पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत हैं। काला धन फिर जमा हो जाएगा। जमा करने वालों में बाबाओं के चेले नहीं हैं या होंगे, इसकी क्या गारंटी है?          
आजकल प्रैस परिषद के अध्यक्ष मार्कंडे काटजू साहब खासे चर्चा में रहते हैं। उन्होंने कई मुद्दों, विशेषकर मीडिया से संबंधित, पर दो टूक बात रख कर बहस पैदा की है। कुल मिला कर, बाजार और विचार की बहस में उन्होंने विचार पर बल दिया। उन्होंने यह भी कहा है कि जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने से भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा। हमें लगा कि काटजू साहब की वैचारिकता नवउदारवाद विरोधी रुख अख्तियार करेगी। उनके पद और प्रतिष्ठा को देखते हुए उसका लाभ नवउदारवाद विरोधी मुहिम को मिलेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जल्दी ही पता लग गया कि वे शासक वर्ग के साथ खड़े हैं। अंग्रेजी का अंधविश्वास उन पर भी वैसा ही हावी है। उन्होंने अंग्रेजी न जानने वालों को बैलगाड़ी हांकने वाला कहा है। उनका तर्क मानें तो केवल अंग्रेजी जानने वाले ही भारत माता के बेटे-बेटियां हैं। आपको ध्यान होगा, ऐसा ही तर्क सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रमुख न्यायधीश बालाकृष्णन साहब ने भी दिया था। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी नहीं जानने वाले केवल चपरासी बन सकते हैं। जाहिर है, उनकी नजर में चपरासी और उनके बेटे-बेटियां भारत माता के बेटे-बेटियां नहीं हैं, और न ही कभी बन पाएंगे। 
काटजू साहब और बालाकृष्णन साहब के हिसाब से सोना का भारत माता पर कोई दावा ही नहीं है। वह बेचारी कभी अंग्रेजी बोल ही नहीं पाएगी। दूरदर्शन पर देहाती महिलाओं को अंग्रेजी में बताया जाता है कि उनकी बेटियां अच्छी पढ़ाई करती हैं, यानी अंग्रेजी बोलती हैं। नवउदारवाद के पिछले 20 सालों में हिंदुस्तान का शासक वर्ग पूरी तरह अंग्रेजी का अंधा हो चुका है। लोहिया इस वर्ग के इसलिए अपराधी हैं कि उन्होंने अंग्रेजी का विरोध कर सभी बच्चों को भारत माता की गोद में बिठाना चाहा था, जो उनका प्राकृतिक हक है। 
अन्ना आंदोलन से भाषा के साथ दूसरा अवमूल्यन प्रतिरोध की अहिंसक कार्यप्रणाली, जिसे लोहिया ने सिविल नाफरमानी कहा है, का हुआ है। इस मायने में कि जिस पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था और शोषण के खिलाफ उसका आविष्कार और उपयोग हुआ, उसी के समर्थन में उसे लगाया जा रहा है। इसके गहरे और दूरगामी परिणाम होने हैं। जाहिर है, इससे अहिंसक आंदोलन को गहरा धक्का लगेगा। अहिंसक कार्यप्रणाली में विश्वास करने वाले कई महत्वपूर्ण जनांदोलनकारी और राजनैतिक कार्यकर्ता इस आंदोलन को समर्पित हो गए हैं। यह शेखी भी जताई जाती है कि अरब देशों में जहां बदलाव के लिए हिंसा हो रही है, वहां यह आंदोलन पूरी तरह अहिंसक है। लेकिन यह सच्चाई छिपा ली जाती है कि यह आंदोलन किसी बदलाव के लिए नहीं है। अपने स्वार्थ के लिए अहिंसक और अनुशासित रहना कोई बड़ाई की बात नहीं है। नवउदारवाद के पक्ष में अहिंसा को अगवा किया गया है। और उसके विरोध के लिए हिंसा का रास्ता छोड़ा गया है। मनमेाहन सिंह और चिदंबरम यही चाहते हैं। हमने पीछे लिखा था कि अगर अनशनरत अन्ना को कहीं जरा-सी खंरोच या मूच्र्छा आ जाती तो अहिंसकों की हिंसा का जबरदस्त नजारा देखने में आता।
इधर खबर आई है कि टीम अन्ना के एक सदस्य मुफ्ती शहमीम कासमी साहब को स्वामी अग्निवेश बना दिया गया है! वे टीम का मुस्लिम चेहरा थे। टीम अन्ना के सरदार ने कहा है कि कासमी चर्चा के किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले ही उसकी रिकाॅर्डिंग कर रहे थे, जिसे वे चैनलों को देते। अजीब बात है। चर्चा के दौरान रिकाॅर्डिंग करने में भला क्या बुराई हो सकती है। सही फैसला सही चर्चा से ही होकर आता है। इसलिए चर्चा की जानकारी टीम के बाहर भी साझा हो तो इसमें क्या ऐतराज हो सकता है? हालांकि कासमी साहब ने कहा है कि उन्हें रिकाॅर्डिंग करना आता ही नहीं है। मतभेद के कारण दूसरे हैं। जो भी हो, एक रिकाॅर्डिंग आदमी के दिमाग में भी चलती है। आपसी चर्चा के दौरान टीम अन्ना के सदस्यों के दिमाग में भी चलती होगी। क्या टीम अन्ना के सरदार का उसे भी प्रतिबंधित करने का इरादा है? लोकतंत्र और पारदर्शिता के पहरेदार इस पर क्या कहते हैं, अभी तक सुनने में नहीं आया है। कौन नहीं जानता कि विदेशी धन खाने वाले एनजीओ और उन्हें चलाने वाले ऐसे ही फर्जीवाड़े पर पलते हैं।  
मीडिया और सिविल सोसायटी के समर्थन का जो नशा टीम अन्ना को हुआ है, वह जल्दी नहीं टूटने वाला है। ‘हम एक हैं’ की घोषणा करते हुए रामदेव और अन्ना फिर साझी हो गए हैं। वे अलग कभी थे ही नहीं। हमने कहा था कि कांग्रेस समेत ये सब एक पूरी टीम हैं। इस टीम का कारोबार आगे और चलेगा। प्रधनमंत्री के प्रमुख आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने पिछले दिनों कहा है कि अब से आगे 2014 के आम चुनाव तक आर्थिक सुधारों की गति धीमी रहेगी। लेकिन आम चुनाव के बाद सुधारों में यथावत और विधिवत तेजी आ जाएगी। यानी सरकार किसी की भी हो, नवउदारवादी व्यवस्था इसी रूप में जारी रहेगी। कभी मनमोहन सिंह और कभी अटल बिहारी वाजेपयी द्वारा उछाला गया जुमला - ‘आर्थिक सुधारों का मानवीय चेहरा’ - कभी का फालतू हो चुका है। अफसोस की बात है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में यह तय हो चुका है कि चुनावी महाभारतों का देश की व्यवस्था के संदर्भ में कोई मायना नहीं रह गया है। आर्थिक सलाहकार के बयान पर सबसे पहले और सबसे तीखी प्रतिक्रिया भाजपा की थी। उसने कहा कि आर्थिक सुधारों की तेजी पर ब्रेक सरकार की असपफलता की निशानी है।
नवउदारवाद बढ़ेगा, कांग्रेस के राज में भी और भाजपा के राज में भी। जाहिरा तौर पर उसके दो नतीजे होंगे। एक तरफ पहले से बदहाल आबादी की बदहाली में तेजी आएगी और दूसरी तरफ पहले से विकराल भ्रष्टाचार और तेज होगा। इसके साथ यह भी होगा कि जनता की बदहाली के अंधकार को लूट के माल से मालामाल होने वाले ‘शाहनिंग इंडिया’ की चमक से ओट करने की कोशिश की जाएगी और दूसरी ओर कठोर कानून बनाने की मांग करके भ्रष्टाचार पैदा करने और बढ़ाने वाली व्यवस्था पर परदा डालने का खेल रचा जाता रहेगा। जन लोकपाल कानून यथारूप में बन जाने पर आगे और कड़े कानून की जरूरत उसके पैरोकार और वारिस बताएंगे। भले ही अभी तक कड़े कानूनों की दौड़ का अंत सैनिक तानाशाही में होता रहा है। 
नवउदारवाद ने टीम अन्ना का रूप धर कर जनांदोलनकारियों का अपने हिसाब से पूरा इस्तेमाल कर लिया है। मुख्यधारा राजनीति के अंतर्गत फर्क होने का दावा करने वाले भी उस रूप के चक्कर में आ गए। हमें आश्चर्य भी हुआ और आघात भी लगा जब भाकपा के वयोवृद्ध नेता एबी बर्द्धन रामलीला मैदान में हाजिरी लगाने पहुंच गए। ऐसे में नवउदारवाद के विरोध में अभियान जीरो से शुरू होगा।  
तो टीम अन्ना भारत माता को घेरने वाले कपूतों की साथी है। निर्लज्जों ने भारत माता की लाज बचाने का ठेका उठा लिया है! इसके अलावा उसका कोई और चरित्र होता या कुछ अच्छे लोगों के उसमें शामिल होने के चलते बन पाता तो वह सामने आ चुका होता। यही सच्चाई है। इसका विश्लेषण जैसे और जितना चाहें कर सकते हैं। 
भारत माता धरती माता
हम यह नहीं कहते कि सोना अपने घर, गांव, कस्बे, शहर तक महदूद रहे। लोहिया ने कहा था देश माता के साथ हर इंसान की एक धरती माता होती है। लोहिया ने स्टालिन की बेटी स्वेतलाना के भारत में बसने के अनुरोध का समर्थन किया था। यह कितनी सुंदर बात होगी कि सोना भारत माता के साथ धरती माता की बेटी बने। दुनिया के किसी भी कोने में जाए। घूमे, काम करे, सीखे, सिखाए, मित्र बनाए, मन करे तो वहीं शादी करे, भले ही बस जाए। ऐसा होने पर वह भारत माता के ज्यादा फेरे में न पड़े तो ही अच्छा है। बाहर अगर उसका निधन होता है तो अंतिम क्रिया वहीं संपन्न हो। 
अभी तक देश-विदेश के इक्का-दुक्का लोगों ने आदिवासी क्षेत्रों में रह कर वहां की लड़कियों से शादी की है। आदिवासी लड़कियां बाहर जा कर ऐसा करें तो बराबर की बात बनेगी। हम किसानों और मजदूरों की लड़कियों के लिए भी ऐसा सपना देखते हैं कि वे स्वतंत्रतापूर्वक बड़ी हों और और देश-दुनिया में अपनी जगह बनाएं। लेकिन समस्या यही है कि जब तक वे भारत माता की गोद से बहिष्कृत हैं, धरती माता की गोद उन्हें नसीब नहीं हो सकती। 
हमने ऊपर देखा कि भारत माता किस कदर घिर गई है। यह घेरा टूटे, इसके लिए हिंदुस्तान में एक बड़ी और बहुआयामी क्रांति की सख्त और तत्काल जरूरत है। उस क्रांति के कुछ सूत्र लोहिया ने दिए थे। लेकिन शासक वर्ग और उसका क्रीतदास बौद्धिक वर्ग प्रतिक्रांति पर डटा रहा। सत्ता के साथ मिल कर लोहिया के राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-दार्शनिक-सांस्कृतिक चिंतन को स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक बहिष्कृत करके अपना ‘वाद’ बचा और चला लेने की खुशी पालने वाले लोगों ने हिंदुस्तान की क्रांति के साथ गहरी दगाबाजी की है। देश में उथल-पुथल है, उसका फायदा लेना चाहिए, कह कर टीम अन्ना और उसके आंदोलन में जुटे लोग भी जाने-अनजाने वही कर रहे हैं।   

26 अप्रैल 2012

Sunday, January 3, 2016

भारत की समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए बडी क्षति

कामरेड बर्द्धन के निधन पर सोशलिस्ट पार्टी की श्रद्धांजलि
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व महासचिव अर्धेंदु भूषण बर्द्धन का निधन भारत की समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक धारा के लिए एक बडी क्षति है। खास तौर पर नवउदारवादी और सांप्रदायिक ताकतों के गठजोड़ के मौजूदा दौर में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। वे देश की प्रगतिशील जमातों के बीच एकता कायम करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहते थे। पिछले लोकसभा चुनाव के पूर्व उन्होंने सभी बडी-छोटी समाजवादी, साम्यवादी, सामाजिक न्यायवादी पार्टियों का मोर्चा बनाने की दिशा में काफी प्रयास किया। इस बारे में सोशलिस्‍ट पार्टी की ओर से जस्टिस राजेंद्र सच्चर और भाई वैद्य की उनसे कई बार वार्ता हुई थी। सोशलिस्‍ट पार्टी के महासचिव डॉ प्रेम सिंह ने अपने एक महत्‍वपूर्ण लेख में यह सुझाव रखा था कि सभी समाजवादी, साम्यवादी, सामाजिक न्यायवादी पार्टियों को बर्द्धन साहब का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे करके कांग्रेस-भाजपा के विरुद्ध चुनाव में उतरना चाहिए। अगर बर्द्धन साहब का प्रयास सफल होता तो नवउदारवादी और सांप्रदायिक ताकतों का केंद्र की राजनीतिक सत्ता पर मुकम्मल कब्जा नहीं होता। 
आॅल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) के महासचिव और अध्यक्ष रहे बर्द्धन जी एक संघर्शषील ट्रेड यूनियन नेता थे। उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन आजादी के आंदोलन के दौरान आॅल इंडिया स्टुडेंट फेडरेशन के कार्यकर्ता के रूप में शुरू किया था। वे एक अच्छे विचारक थे और उन्होंने सांप्रदायिकता की समस्या पर महत्वपूर्ण लेखन किया। 
बंग्लादेश में जन्मे बर्द्धन जी का 1990 में दिल्ली आने से पूर्व राजनीतिक कार्यक्षेत्र महाराष्‍ट्र प्रांत था जहां से उन्होंने 1957 में महाराष्‍ट्र विधानसभा का चुनाव जीता और 1967 व 1980 में लोकसभा का चुनाव लडा। महाराष्‍ट्र से होने के नाते वरिष्‍ठ समाजवादी नेता और सोशलिस्‍ट पार्टी के अध्‍यक्ष भाई वैद्य का उनसे लंबा राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंध था। उनका निधन भाई वैद्य के लिए व्यक्तिगत क्षति भी है।   
सोशलिस्ट पार्टी वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता को श्रद्धांजलि देती है।

Monday, December 21, 2015

प्रवास की पीड़ा नहीं, प्रेम कहानी है ‘नॉन रेज़िडेन्ट बिहारी’-राजेश कुमार


अगर आप भी मेरी तरह ‘नॉन रेज़िडेन्ट बिहारी’ खरीदकर लाए हैं, ये सोचकर कि इसमें पलायन की पीड़ा होगी, प्रवासी बिहारियों का दुख दर्द होगा। अपनी मिट्टी की खूशबू से बिछड़ने की कसक होगी। उस बेइंतहा बेबसी की दास्तान होगी, जो आज भी लाखों बिहारी और पुरवईया युवाओं को अपनी मिट्टी छोड़कर दर-बदर की ठोकर खाने को मजबूर करता है। तो ‘नॉन रेज़िडेन्ट बिहारी’ पढ़कर आपको निराशा हाथ लगेगी। किताब ना तो पलायन की पीड़ा बताती है, ना ही ज़िंदगी को बेहतर ढंग-ढर्रे से जीने को जद्दोजहद में लगे लाखों-करोड़ों प्रवासियों की दास्तान बयान करती है।

दरअसल ‘नॉन रेज़िडेन्ट बिहारी’ एक लंबी प्रेम कहानी है, जिसे राधाकृष्ण प्रकाशन ने उपन्यास की शक्ल में प्रकाशित किया है। ‘नॉन रेज़िडेन्ट बिहारी’ यूपीएससी का ख्वाब संजोकर दिल्ली आए एक ऐसे युवक राहुल की दास्तान है। जो बिहार के कटिहार में अपने कॉलेज की दोस्त शालू से मोहब्बत करता है। अब चूंकि नायक दिल्ली में है और नायिका बिहार में, तो होता ये है कि दिल्ली की कहानी हर वक़्त बिहार में ही रहती है। इसीलिए नॉन रेज़िडेन्ट वाली फीलिंग नहीं आती है। उपन्यास यूपीएससी का ख्वाब संजोए एक युवा और उनके दोस्तों के ईर्द गिर्द बुनी गई है। लेकिन कहीं से भी ये किताब दिल्ली में रहनेवाले पुरवईया छात्र-छात्राओं की परेशानी की प्रतिबिंबित नहीं करती है।‘नॉन रेज़िडेन्ट बिहारी’ शुरू तो होती है यथार्थ के धरातल पर, लेकिन कहानी क्लाइमेक्स तक आते-आते फिल्मी हो जाती है। जिस तरीके से नायक यूपीएससी की मेन्स परीक्षा छोड़कर नायिका की शादी रोकने निकलता है, और जिस तरीके से नायिका उससे मिलती है। कहानी पूरी तरह से फिल्मी बन जाती है। 

एक चीज क़िताब में बड़ी ख़ास है, जो आज के दौर में बेहद ज़रूरी है। ये क़िताब धार्मिक उन्माद और असहिष्णुता के बीच अपने कई प्रसंगों और संवादों के जरिए एक सेक्यूलर समाज को मजबूती से गढ़ती नज़र आती है। अब्दुल और गोपी के बीच तक़रार और फिर प्रगाढ़ दोस्ती इसकी मिसाल है। क़िताब की एक और ख़ासियत है, ये बेहद रोचक है, और जब आप पढ़ने बैठेंगे, तो बिना खत्म किए नहीं उठेंगे। यूपीएससी की तैयारी के बारे में आपको जानकारी हाथ लगेगी। और अगर सबक लेना चाहेंगे, तो सबक मिलेगा कि प्रेम के आगे कॅरियर बनाने का सपना कितना बौना साबित होता है, लाखों-करोड़ों पुरवईया युवाओं के आगे।

Friday, December 18, 2015

कलम और हल के बीच का रिश्ता है 'इश्क़ में माटी सोना'-राजेश कुमार

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के
इस शेर को गुनने-गाने में ना जाने कितनी पीढ़ियां निकल गई, इन पंक्तियों को हर दौर में मौजूं माना गया। लेकिन लप्रेक सीरीज़ की क़िताबें उनकी ज़ुबानी गढ़ी गई हैं, जो अपनी क़ामयाबी का सारा श्रेय इश्क़ को देते हैं। प्रेम की लघुकथाओं के जरिए ये बदलाव केवल शब्दों का नहीं सभ्यताओं का भी है। क्योंकि गिरीन्द्र नाथ झा की क़िताब इश्क़ में माटी सोना केवल एक पत्रकार के किसान बनने भर की दास्तान नहीं है। ये बग़ावत है बने-बनाए लीक पर चलने वाले हम जैसे युवाओं के लिए। ये क्रांति है कलम को हल के क़रीब लाने की। यक़ीन मानिए इसके बिना जो भी सभ्यता गढ़ी जाएगी, वो चाहे बुलेट ट्रेन की रफ्तार से ही क्यों ना निकले अधूरी होगी।
'इश्क़ में माटी सोना' भी उन क़िताबों में शुमार हो गई, जिसे मैं पढ़ने बैठा तो ख़त्म करके ही उठा। गिरीन्द्र बाबू के चनका की दास्तान पढ़ते हुए मुझे लगने लगा कि बात मेरे गाम भितिया की हो रही है । वैसे ही खेत, वैसे ही ज़मीन के झगड़े, बंदोबस्ती और भगैत। आहा क्या खूबसूरत रचना की है 'इश्क़ में माटी सोना'। दिल्ली जाने वाले युवाओं के मन में वही चलता है, जो गिरीन्द्र नाथ ने अपनी किताब में लिखा है। गाम की वेष भूषा, गमछा, माछ और अनाज से आगे एक सेक्यूलर सपना देखने की दास्तान का नाम है 'इश्क़ में माटी सोना'।  किसान काग़ज़ नहीं हल देखता है, इस एक पंक्ति में सियासत की पूरी बखिया उधेड़ कर रख दी है। चुनाव का वर्णन है। इश्क़ में घोषणापत्र नहीं होते जैसी सुंदर पंक्तियां हैं। और नॉस्टेलजिक फीलिंग तो ऐसे ऐसे जिसे हमारे जैसे युवा दिन रात अपने सीने से चिपकाए घूमते हैं । काले कलर की राजदूत मोटरसाइकिल से आपके बाबूजी आते थे। हमारे पापा आते थे। और ना जाने कितने बाबूजी आते होंगे। लेकिन 'इश्क़ में माटी सोना' में गिरीन्द्र नाथ झा चनका देरी से आए, दिल्ली में गुजारा वक़्त किताब में ज़्यादा दे दिया। अगर चनका की लप्रेक ज़्यादा गुनी जातीं। तो हमारे जैसे पाठक क़िताब के और क़रीब आते। बात 'नेपथ्य के अभिनेता' की हो या अपरूप रूप की , 'इश्क़ में माटी सोना' के हर पन्ने में गिरीन्द्र बाबू ख़ुद रेणु के 'एक अकहानी के सुपात्र' नज़र आते हैं। नायक जब तक दिल्ली में रहता है, लप्रेक अपनी लय में है। लेकिन जैसे ही बात चनका की होती है, लघुकथा अपनी व्यापकता में निखर आती है। हर शब्द का विस्तार कोसी के ओर से लेकर खेतों के छोर तक, पूरी 'परती परिकथा' की दास्तान। चनका की बातें, कदम के पत्तों की खड़खड़ाहट, और जानने का मन करता है। एक कसक और है, बाबूजी के साथ गुजारे प्रसंग को थोड़ी जगह और मिल जाती, तो किताब और निखर जाती। पूरी क़िताब पढ़ने के बाद यही लगा....कि काश थोड़ी हिम्मत मैं भी कर लेता, अपने मन की बात कहके तो आज मैं भी एक लप्रेक लिख रहा होता। 

Saturday, December 12, 2015

संविधान पर चर्चा तथ्‍य–तर्क सम्‍मत हो- प्रेम सिंह


(गुजरात के विकास के लिए नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करने वाले अण्‍णा हजारे और हजारे का इस्‍तेमाल करने वाले अरविंद केजरीवाल को गांधी बताने वालों में कई लेखक-आलोचक भी शामिल हैं। यानी साहित्‍यकारों की ओर से भी भाषा का अवमूल्‍यन हो रहा है। वे भी नवसाम्राज्‍यवादी गुलामी लाने के गुनाहगारों में शामिल हो रहे हैं। दूसरी, अनेकों बार उधेड़ी जा चुकी बखियाओं को फिर-फिर उधेड़ने का उद्यम अपने भाषण में करने वाले मोदी-विरोधी वक्‍ताओं ने भी संविधान की मूल संकल्‍पना के हनन पर चिंता जाहिर नहीं की। यानी संविधान पर लादा गया नवसाम्राज्यवादी जुआ उन्‍हें स्‍वीकार्य है। ऐसे हालात में उदय प्रकाश ने मोदी के भाषण पर जो कुछ कहा वो निराशाजनक है।)
     संविधान दिवस 26 नवंबर को संविधान के प्रति प्रतिबद्धता विषय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की हिंदी के कथाकार उदय प्रकाश ने भूरी-भूरी प्रशंसा की है। उदय प्रकाश ने मोदी के साथ वाजपेयी को भी याद किया है, जिनकी जुमलेबाजी की प्रवृत्ति पर संविधान और संसदीय प्रणाली व प्रक्रियाओं के गहरे जानकार मधु लिमये ने एक बार कटाक्ष किया था। ‘भाषा का जादूगर’ कहे जाने वाले इस साहित्‍यकार ने अपनी प्रशंसात्‍मक टिप्‍पणी में भाषा का विवेक नहीं रखा है। लेखकों-कलाकारों को राजनीतिक विषयों पर गंभीरता पूर्वक विचार करके ही अपना मंतव्‍य देना चाहिए। ऐसा किए बगैर की गईं फुटकर टिप्पणियां उनके दरजे को कम करती हैं। साहित्य भाषा की अर्थवत्‍ता कायम रखने और समृद्ध करते जाने का स्थायी माध्‍यम होता है। मौजूदा शासक वर्ग ने भाषा को स्‍तरहीन और कपटपूर्ण बनाने में कोई कसर नहीं रखी है। ऐसे में लेखकों की इस तरह की टिप्पणियों से भाषा का संकट और गहराता है। दृष्‍टा का दर्जा पाने वाले रचनाकार जब इस तरह की अंधी अभिव्यक्तियां करते हैं तो इस समय देश में परिव्‍याप्‍त विमूढ़ता का विराट रूप ज्‍यादा सघन व सर्वव्यापी बनता है।

     यह व्याख्यायित करने की जरूरत नहीं है कि संविधान पर चर्चा विषय-निष्‍ठ एवं तथ्य-तर्क सम्‍मत (रैशनल) ही हो सकती है। विषय संविधान है और तथ्‍य यह है कि डुंकेल प्रस्तावों से लेकर भारत-अमेरिका परमाणु करार (जिसका एक शब्द भी भारत में नहीं लिखा गया) और रक्षा से लेकर शिक्षा तक को कारापेरेट क्षेत्र को सौंपने के नवउदारवादी फैसलों से शासक वर्ग ने संविधान की मूल संकल्पना का हनन कर डाला है। संविधान पर कोई भी गंभीर चर्चा इस तथ्‍य को नजरअंदाज करके नहीं हो सकती। बल्कि उसे अगर सार्थक होना है तो शुरू ही यहां से होना होगा। संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का पहला तकाजा बनता है कि उसकी मूल संकल्‍पना की पुनर्बहाली के अविलंब व पुख्‍ता उपाय किए जाएं। अथवा कम से कम इतना संकल्‍प लिया जाए कि आगे संविधान को और ज्‍यादा क्षतिग्रस्‍त नहीं किया जाएगा। मसलन, समाज के लिए सबसे अहम शिक्षा जैसे विषय को कारपोरेट क्षेत्र के लिए कदापि नहीं खोलने का निर्णय लिया जा सकता है। खुद नरेंद्र मोदी अपने भाषण में कम से कम भारत अमेरिका-परमाणु करार और खुदरा में विदेशी निवेश के फैसलों, जिनका भाजपा ने कड़ा विरोध किया था, को निरस्त करने की अपनी सरकार की घोषणा करते तो संविधान के प्रति प्रतिबद्धता का कुछ अर्थ होता। लेकिन उनके देशकाल से विच्छिन्‍न भाषण में संविधान के प्रति कोई सरोकार था ही नहीं।

     उदय प्रकाश ने ऐसे भाषण की प्रशंसा की है। जाहिर है, उदय प्रकाश की तथ्‍य व तर्क से रहित भाषा नरेंद्र मोदी की तथ्‍य व तर्क से रहित भाषा से जा मिलती है। यह स्थिति भाषा के गहरे संकट को दर्शाती है। उदय प्रकाश ने अपनी टिप्पणी के अंत में नरेंद्र मोदी के भाषण के निहितार्थ का अंदेसा भी जताया है। उन्‍होंने कहा है नरेंद्र मोदी के ‘सारगर्भित व प्रभावशाली’ भाषण के पीछे उनकी कारपोरेट हित के कुछ कानून पारित कराने की मंशा हो सकती है। क्‍या देश के साहित्‍यकार को पता नहीं है कि मनमोहन सिंह के बाद मोदी का चुनाव कारपोरेट प्रतिष्‍ठान ने इसीलिए किया है, और मनमोहन सिंह से लेकर मोदी तक ऐसे संविधान विरोधी कानूनों-अध्‍यादेशों की लंबी सूची है। उनके इस अंदेसे से मोदी की ही मजबूती होती है। लोगों में संदेश जाता है कि इसके पूर्व नवउदारवादी दौर के बाकी कानून कारपोरेट हित में नहीं बनाए हैं।    

     यहां संक्षेप में पांच बातों का उल्‍लेख मुनासिब होगा। पहली, पिछले दिनों कई लेखकों-आलोचकों की यह स्थिति देखने को मिली है। गुजरात के विकास के लिए नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करने वाले अण्‍णा हजारे और हजारे का इस्‍तेमाल करने वाले अरविंद केजरीवाल को गांधी बताने वालों में कई लेखक-आलोचक भी शामिल हैं। यानी साहित्‍यकारों की ओर से भी भाषा का अवमूल्‍यन हो रहा है। वे भी नवसाम्राज्‍यवादी गुलामी लाने के गुनाहगारों में शामिल हो रहे हैं। दूसरी, अनेकों बार उधेड़ी जा चुकी बखियाओं को फिर-फिर उधेड़ने का उद्यम अपने भाषण में करने वाले मोदी-विरोधी वक्‍ताओं ने भी संविधान की मूल संकल्‍पना के हनन पर चिंता जाहिर नहीं की। यानी संविधान पर लादा गया नवसाम्राज्यवादी जुआ उन्‍हें स्‍वीकार्य है। हमने पहले भी यह कई बार कहा है कि संविधान में निहित समाजवाद के मूल्‍य को त्‍याग कर अलग से धर्मनिरपेक्षता के मूल्‍य को नहीं बचाया जा सकता। तीसरी, संविधान दिवस का आयोजन डा. अंबेडकर की 125वीं जयंती के अंतर्गत किया गया। चर्चा संविधान के बारे में कम, डा. अंबेडकर पर कब्जे की कवायद ज्यादा थी। संविधान की मूल संकल्‍पना को नष्‍ट करके जिस डा. अंबेडकर को पाया जाएगा, वह एक खोखला नाम अथवा मूर्ति भर होगी। पांचवी, संविधान लागू होने की पचासवीं वर्षगांठ पर संसद में बहस हुई थी। भावनाओं का तेज ज्वार था। आशा थी कि सांसद भावनाओं के ज्वार से बाहर आकर पिछले एक दशक में हुई संविधान की क्षति की मरम्मत करेंगे और आगे क्षतिग्रस्त नहीं होने देंगे। ऐसा नहीं हुआ। उसके पंद्रह साल यह बहस सामने आई है!     

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...