Friday, August 14, 2015

स्वतंत्रता दिवस के कर्तव्य-प्रेम सिंह



आत्मालोचन का दिन


((मोदी जिस संगठन से आते हैं, उसने आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया। मौका पड़ने पर अंग्रेजों का साथ दिया। वह पुराना किस्सा है। लेकिन मनमेाहन ने जो कमाल किया वो देखने लायक था। उन्होंने और सोनिया गांधी ने मिल कर आजादी के संघर्ष की पार्टी को नवसाम्राज्यवादी गुलामी की पार्टी में तब्दील कर दिया है। बेहतर होता कि स्वतंत्रता दिवस पर बुद्धिजीवी यह सच्चाई जनता को बताते।))


पिछले स्वतंत्रता दिवस के ‘समय संवाद’ और उसके आगे-पीछे हमने जो लिखा] इस स्वतंत्रता दिवस पर उससे अलग कुछ कहने के लिए नहीं है। कहना एक ही बार ठीक रहता है। भले ही वह स्वतंत्रता जैसे मानव जीवन और मानव सभ्यता के संभवतः सर्वोपरि मूल्य के बारे में हो। दोहराव के भय से इस बार का ‘समय संवाद’ हम नहीं लिखना चाहते थे। फिर सोचा कि शासक वर्ग और उसका प्रस्तोता मीडिया दिन-रात दोहरावों की झड़ी लगाए रहते हैं तो हमें भी किंचित दोहराव के बावजूद अपनी बात कहनी चाहिए। आइए] भारी सुरक्षा घेरे में गांधी के आखिरी आदमी से बहुत दूर और ऊंचे आयोजितछियासठवें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश की आजादी के बारे में कुछ चर्चा और सवाल करें। इस आशा के साथ कि सड़सठवें साल में देश की आजादी पर आए संकट को समझा जाएगा और उसका मुकाबला हो पाएगा। 


जिस आजादी पर हासिल होने के दिन से ही अधूरी होने का ठप्पा लगा हो] हर स्वतंत्रता दिवस पर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वह उत्तरोत्तर पूर्णता और मजबूती की ओर अग्रसर है। अगर किसी वर्ष कोई ऐसी घटना या फैसला सरकार] राजनीति अथवा नागरिक समाज के स्तर पर हो गया हो] जिससे आजादी का अवमूल्यन हुआ हो और वह खतरे में पड़ी हो] तो स्वतंत्रता दिवस के मौके पर यह सुनिश्चित किया जाए कि वह गलती स्वीकार करके उसे ठीक कर लिया गया गया है। स्वतंत्रता दिवस यह देखने का भी मौका होता है कि वैचारिक और नीतिगत मतभेदों के बावजूद आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने के दायित्व पर सभी राजनीतिक पार्टियां] संगठन और नागरिक समाज एकमत हैं। भारत जैसे विशाल और बहुलताधर्मी देश में अलग-अलग समूहों की अपने हितों की चिंता वाजिब है] लेकिन इस मौके पर हम यह देखें कि समग्रता में उससे देश की आजादी की काट न हो। यह सुनिश्चित करें कि बुद्धिजीवी खास तौर पर सावधान हैं] ताकि नई पीढ़ी आजादी का मूल्य भली-भांति समझ कर अपना कर्तव्य निर्धारित करती और निभाती चले। स्वतंत्रता दिवस और उसके आगे-पीछे आजादी के तराने गाने] तिरंगा लहराने और शहीदों के गुणगान का तभी कोई अर्थ है। स्वतंत्रता दिवस पर हम यह सुनिश्चित करें कि देश की आजादी को सच्चा प्यार करके ही उसके लिए कुर्बानी देने वालों का सच्चा सम्मान किया जा सकता है। 


सवाल है कि क्या प्रत्येक आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर देश की आजादी पूर्णता और मजबूती की तरफ बढ़ती है(गलतियां अगर होती हैं तो क्या उनसे सीख लेने की कोई नजीर सामने आती है( आजादी के प्रति सभी सरकारों] राजनीतिक पार्टियों और नागरिक समाज का साझा संकल्प है( अपने हितों की चिंता करने वाले समूह समग्रतः आजादी की रक्षा का ध्यान करके चलते हैं क्या देश के बुद्धिजीवी अपनी भूमिका में मुस्तैद हैं( क्या नई पीढ़ी आजादी के प्रति अपना कर्तव्य समझती है( क्या हम शहीदों का सच्चा सम्मान करते हैं?


बिना गहरी जांच-पड़ताल के पता चल जाता है कि ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं होने की चिंता भी ज्यादातर नेताओं से लेकर नागरिक समाज तक नहीं दिखाई देती। बल्कि कह सकते हैं कि पिछले 25 स्वतंत्रता दिवसों पर लाल किले से नवसाम्राज्यवादी गुलामी का परचम फहराया जाता रहा है। लाल किले के भाषण में बच्चों से लेकर नौजवानों तक आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने का संदेश नहीं दिया जाता। ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियां] नागरिक समाज और बुद्धिजीवी आजादी के इस अवमूल्यन में बेहिचक शामिल हैं।


15 अगस्त 1947 को मिली राजनीतिक आजादी को अधूरा माना गया था। कहा गया था कि अभी आर्थिक आजादी हासिल करना है। पिछले करीब तीन दशकों में आर्थिक गुलामी का तौक गले में डाल कर राजनीतिक आजादी को भी लगभग गंवा दिया गया है। हर साल शानोशौकत से स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाने और देशभक्ति का भारी-भरकम प्रदर्शन करने के बावजूद] लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गई आजादी नहीं] नवसाम्राज्यवादी गुलामी पूर्णता और मजबूती की ओर बढ़ती जाती है। नवसाम्राज्यवादी गुलामी का गहरा रंग देखना हो तो कोई भारत आए। यहां कारपारेट पूंजीवाद की गुलामी में पगे नेताओं] खिलाडि़यों] कलाकारों] बुद्धिजीवियों] सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का उत्साह और उमंग देख कर लगता है मानो वे विज्ञापन की दुनिया के माॅडल हों! मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी मंडली ही नहीं] एपीजे अब्दुल कलाम और लालकृष्ण अडवाणी भारत के महाशक्ति बनने के गीत गाते नहीं थकते हैं। अधूरी आजादी का पूरा फायदा उठा कर भारत का शासक वर्ग कंपनियों के मुनाफे की वस्तु बन गया है।


इस उमंग भरे माहौल का दबदबा इतना ज्यादा है कि नवउदारवाद-विरोध की लघुधारा के कतिपय वरिष्ठ आंदोलनकारी और बुद्धिजीवी भी उसकी चपेट में आ जाते हैं। दोबारा पटरी पर आना उनके लिए कठिन हो जाता है। ऐसे में]नवउदारवादी नीतियों के चलते उच्छिष्ट का ढेर बना दी गई विशाल आबादी की दशा समझी सकती है। वह खटती और मरती भी है] और नकल भी करती है। इस तरह पूंजीवाद अपने शासक वर्ग के साथ-साथ अपनी (गुलाम) जनता भी तैयार करता चलता है।


इस बीच आरएसएस से लेकर गांधीवादी] समाजवादी] मार्क्‍सवादी आदि सभी राजनीतिक-वैचारिक समूह आजादी पर आने वाले संकट और उसे बचाने की चिंता जता चुके हैं। लेकिन नवसाम्राज्यवाद की ताकत कहिए या आजादी की सच्ची चेतना का अभाव या दोनों] उस चिंता का खोखलापन अथवा कमजोरी जगजाहिर होते देर नहीं लगती। आजादी बचाने की पुकार उठती है और बुलबुले की तरह फूट जाती है। ऐसा नहीं है कि आजादी को बचाने के सच्चे प्रयास नहीं हुए या अभी नहीं हो रहे हैं] लेकिन सच्चाई यही है कि इस मामले में शोर ज्यादा मचाया गया है। आजादी को बचाने के लिए ठोस विचार और रणनीति के तहत दीर्घावधि आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया है। आज की हकीकत यह है कि आजादी बचाने की वास्तविक चिंता करने वाले लोग अब बहुत थोड़े और उपेक्षित हैं।


ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता दिवस पर सर्वाधिक गंभीरता और प्राथमिकता से देश के पराधीन होते जाने की परिघटना पर विचार होना चाहिए। उसके बगैर न केवल नवउदारीकरण के दौर में भिखारी बना दी गई जनता के लिए हमारी चिंता का कोई हासिल नहीं है( हमारे प्रगतिशील] लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बौ़िद्धक कर्म का भी स्वतंत्र अर्थ नहीं रह जाता है। क्रांति के दावों की दयनीयता तो स्वयंसिद्ध है ही।


नवउदारवादी दौर में बने कारपोरेट इंडिया की सत्ता पर आरएसएस जब-जब धावा बोलता है] तब-तब सेकुलर खेमे के बुद्धिजीवी उसके ‘देशद्रोही’ चरित्र को उद्घाटित करने में लग जाते हैं। ऐसा करते वक्त वे अपने को देशभक्ति और आजादी का पक्का पैरोकार होने का प्रमाणपत्र देते ही हैं] सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह और कांग्रेस को भी वह थमा देते हैं। बार-बार दोहराई जाने वाली इस कवायद का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलता। न सांप्रदायिकता कम होती है] न नवउदारवाद थोड़ा भी पीछे हटता है। बल्कि दोनों कट्टर होते और एक-दूसरे में समाते जाते हैं। उस सम्मिलित कट्टरता के प्रहार से समाजवाद] लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की जमीन धसकती चली जाती है। भारत के संविधान में निहित समाजवाद] लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और संकल्प की रक्षा ही आजादी की रक्षा है। हमारी राजनीति] अर्थव्यवस्था और सामाजिकता की यही कसौटी हो सकती है। 


यह सही है कि आरएसएस पूंजीपतियों से सांठ-गांठ रखता है। उसका नया जमूरा नरेंद्र मोदी पूंजीपतियों के आगे नाच रहा है। लेकिन] कांग्रेस पूंजीपतियों की सबसे बड़ी करुणानिधान पार्टी है] इस सच्चाई को सेकुलर खेमा जोर देकर कभी नहीं कहता। वह आरएसएस के ‘रहस्मय चरित्र’ की गहराइयों में काफी नीचे तक धंसता है] लेकिन कांग्रेस के ‘खुला खेल पूंजीवादी’की तरफ से आंख फेरे रहता है। वह नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस का भी सेवक बना रहा और अब सोनिया गांधी की कांग्रेस का सेवक है। नरेंद्र मोदी बुरा है] क्योंकि कारपोरेट घरानों को रिझाने में लगा है। सेकुलर खेमे की शिकायत वाजिब है कि मीडिया उसे पूंजीवाद का नया ब्रांड बना कर समाज के सामने परोस रहा है। लेकिन यही मीडिया नरेंद्र मोदी के पहले मनमोहन सिंह को कारपोरेट पूंजीवाद का पुरोधा बना कर जमा चुका है। सेकुलरवादियों समेत नागरिक समाज की स्वीकृति दिला चुका है। अटल बिहारी वाजपेयी अपना अलग से पूंजीवाद लेकर नहीं आए थे। उन्होंने अपने ‘स्वदेशी’ पैर मनमोहन सिंह के ‘अमेरिकी’जूते में ही डाले थे। नरेंद्र मोदी को भी मनमोहन सिंह लेकर आए हैं। उनका सत्ता का आपसी झगड़ा है। अमेरिका और कारपोरेट घराने जिस की तरफ रहेंगे वह जीत जाएगा। 


ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी से मनमोहन सिंह किस मायने में बेहतर हैं; सिवाय इसके कि नवउदारवाद को भारत में लाने और जमाने वालों में वे अव्वल नंबर पर हैं। उसी हैसियत के चलते वे तीसरी बार प्रधानमंत्री होने के दावेदार हैं। सांप्रदायिक ताकतों को ठिकाने लगाने की कुछ ताकत अभी भारतीय जनता में बची है। लेकिन नवसाम्राज्यवाद के सामने वह लाचार बना दी गई है। जनता की यह लाचारी आगे बढ़ती जानी है। इसकी सीधी जिम्मेदारी मनमोहन सिंह और उनके सिपहसालारों की है।


पिछले दो सालों से मनमोहन सिंह पर नागरिक समाज का काफी तेज गुस्सा देखने को मिला। यह गुस्सा तभी आना चाहिए था जब उन्होंने देश के संविधान को दरकिनार कर विश्‍व बैंक के आदेश पर नई आर्थिक नीतियां लागू की थीं और देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया था। वे राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, न आज हैं। वे ऐसा कर पाए और उस दम पर दो बार देश के प्रधानमंत्री बन गए, यह नागरिक समाज की सहमति के बिना संभव ही नहीं था। नागरिक समाज को अब भी जो गुस्सा आ रहा है, वह देश के स्वावलंबन और संप्रभुता को चट कर जाने वाली उन नीतियों के खिलाफ नहीं है। वह नवउदारवाद का साफ-सुथरा चेहरा और अपने लिए और ज्यादा फायदा चाहता है। ऐसे गुस्से का कोई परिणाम देश की आजादी के पक्ष में नहीं निकलना है। भाजपा के पक्ष में भले ही निकले, जिसका स्टार प्रचारक नागरिक समाज की समस्त लालसाओं को चुटकियों में पूरा करने का ढोल पीट रहा है। 


कुमार प्रशांत ने ‘जनसत्ता’ के अपने एक लेख में मनमोहन सिंह को संजीदा इंसान बताया है। यह भी कहा है कि बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने हमेशा शालीनता का आचरण किया है, जिससे विदेशों में भारत का मान बढ़ा है। मनमोहन सिंह की यह प्रशंसा उन्होंने नरेंद्र मोदी से तुलना करते हुए की है, जिन्होंने एलान करके 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के लालकिले से दिए गए भाषण के मुकाबले अपना भाषण किया। स्वतंत्रता दिवस नेताओं के व्यक्तित्वों की तुलना करने का अवसर नहीं होता। नरेंद्र मोदी और आरएसएस खुद ही एक्सपोज हो गए कि उनकी नजर में स्वतंत्रता दिवस का सम्मान नहीं है। अडवाणी ने दबी जबान से मोदी के इस कृत्य की आलोचना भी की। 


स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘जनसत्ता’ के पन्ने मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की तुलना में रंगने का औचित्य नहीं था। तुलना का तूमार बांधने के लिए खबरी चैनलों की भरमार है। उन्होंने वह काम बखूबी किया भी। हमने दोनों का भाषण नहीं सुना। न ही टीवी चैनलों पर होने वाली वे बहसें सुनी, जिनका जिक्र नाराजगी के साथ कुछ टिप्पणीकारों ने अगले दिन अखबारों में किया। चैनल यह नहीं कर सकते थे, अगर स्वतंत्रता दिवस की गरिमा, संवैधानिक दायित्व, लोकतांत्रिक मूल्य, संघीय ढांचा और देश की अखंडता का हवाला देने वाले ‘विषेषज्ञ’ वहां नहीं जाते। इधर विषेषज्ञ कुछ ज्यादा ही हो गए हैं और उनमें ज्यादातर ने अपने को ऐसे एंकरों के हाथ बेच दिया है, जो कूपमंडूक और नवउदारवाद व सांप्रदायकिता के निःसंकोच गुण गाने वाले हैं।


गंभीर समझे जाने वाले बुद्धिजीवियों को यह बताना चाहिए था कि प्रधानमंत्री के भाषण में स्वतंत्रता की पूर्णता और मजबूती के लिए क्या कहा गया है; उस लिहाजा से दोनों के भाषणों में कोई फर्क नहीं था। दोनों नवउदारवाद की प्रतिष्ठा को स्वाभाविक कर्म मान कर बोले। संविधान की कसौटी पर दोनों के भाषण अवैध थे। दोनों में अंतर यही है कि मनमोहन सिंह नवउदारवाद की ब्रांडेड मशीन हैं, जो सीधे विश्‍व बैंक से खिंच कर आई है और मोदी आरएसएस के कारखाने में ढल कर निकली ‘देसी’ मशीन है। दोनों में बाकी सब समान है। मोदी को मुसलमान ‘पिल्ले’ नजर आते हैं तो मनमोहन को किसान निठल्ले। वे हैरानी से पूछते हैं कि किसान खेती (यानी आत्महत्या) क्यों करते हैं! कोई और काम क्यों नहीं कर लेते; पहले से ही कई करोड़ नौजवानों और अधेड़ों की बेरोजगार सेना जमा होने के बावजूद एक मशीन ही ऐसा कह सकती है, जिसमें संदेश पहले से फीड किया गया हो!


मोदी की भर्त्‍सना का खास मतलब नहीं है। मोदी को लाने वालों में सबसे पहला नाम मनमोहन सिंह का है। आरएसएस बाद में आता है। मोदी जिस संगठन से आते हैं, उसने आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया। मौका पड़ने पर अंग्रेजों का साथ दिया। वह पुराना किस्सा है। लेकिन मनमेाहन का नया कमाल देखने के लायक है। उन्होंने और सोनिया गांधी ने मिल कर आजादी के संघर्ष की पार्टी को नवसाम्राज्यवादी गुलामी की पार्टी में तब्दील कर दिया है। बेहतर होता कि स्वतंत्रता दिवस पर बुद्धिजीवी यह सच्चाई जनता को बताते।


हमने एक ‘समय संवाद’ में लिखा था, ‘‘मिश्रित अर्थव्यवस्था के करीब तीस सालों के दौर में जो साम्राज्यवादी बीज दब गया था उसने अस्सी के दशक में राजीव गांधी की छाया पाकर फूलना शुरू किया। नब्बे के दशक में उसने एक बार फिर से जड़ पकड़ ली और इक्कीसवीं सदी का जयघोष करते हुए उसकी कोपलें खिल उठीं। आज साम्राज्यवाद की संतानें ऐसा जता रही हैं मानो वे सदियों पुराना वटवृक्ष हैं। जैसे 1857 और 1947 हुआ ही नहीं था। अगले पचास साल भी नहीं लगेंगे जब साम्राज्यवाद की संतानें कहेंगी कि 1947 होना ही नहीं चाहिए था। अगर उसका 1857 की तरह दमन कर दिया जाता तो भारत को महाशक्ति बनने के लिए 2020 का इंतजार नहीं करना पड़ता। जी हां, मनमोहन सिंह उसी साम्राज्यवादी बीज से उत्पन्न हुई संतान हैं। साम्राज्यवाद के सांचे में जो भी समाए हुए हैं, वे मनमोहन सिंह के बच्चे हैं। उनमें छोटे बच्चे भी हैं और बड़े भी। (‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’, 2009) नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह का ही छोटा बच्चा है, जो अब बड़ा बनने के लिए मचल उठा है।


हमने गुजरात कांड पर ‘गुजरात के सबक’, 2002) और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विचारधारा और शैkSली पर ‘जानिए योग्य प्रधानमंत्री को’, 2002) पुस्तिकाएं प्रकाशित की थीं। सेकुलर साथियों, जिनमें सोनिया के सेकुलर सिपाही भी शामिल थे, ने काफी उत्साह से उन पुस्तिकाओं का स्वागत और प्रचार किया था। पहुंच वाले साथियों ने उन्हें कांग्रेस के प्रचार प्रकोष्ठ और प्रवक्ताओं तक पहुंचाया था। 2004 में राजग की हार हुई और यूपीए की सरकार बनी। लेकिन 2009 के चुनाव के पहले प्रकाशित हमारी पुस्तिका ‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ के प्रकाशन पर उन सब ने चुप्पी साध ली। उसमें मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की, विशेष तौर पर भारत-अमेरिका परमाणु करार के हवाले से, साम्राज्यवादपरस्ती का उद्घाटन है। साथियों ने उस पुस्तिका का न स्वागत किया, न प्रचार। इससे स्पष्ट पता चलता है कि सेकुलर खेमे की चिंता केवल सांप्रदायिकता को लेकर है, नवउदारवाद के खिलाफ वह नहीं है। जबकि सांप्रदायिकता की आड़ में नवउदारवाद फलता-फूलता है। 


भारतीय राज्य के खिलाफ हिंसक संघर्ष चलाने वाले अतिवामपंथी समूह कहते हैं कि वे भारत के संविधान को नहीं मानते। उन्हें देखना चाहिए कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नेतृत्व में भारत का शासक वर्ग भी भारत के संविधान को नहीं मानता है। यह ठीक है कि भारत का शासक वर्ग कारपोरेट पूंजीवाद की पुरोधा वैश्विक संस्थाओं के आदेश पर काम करता है। लेकिन अपने को माओवादी बताने वाले भी जिन आदेशों को मानते और लागू करना चाहते हैं, वे भारत की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की धारा से नहीं निकले हैं; जिसका कुछ आधार लेकर भारत का संविधान बनाया गया था। बल्कि आजादी के संघर्ष को वे मान्यता ही नहीं देते। उनकी पूर्वज पार्टी सीपीआई ने देश की आजादी को अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का परिणाम माना था, न कि जनता के संघर्ष और बलिदान का। आजादी की पूर्व संध्या पर उसने भारत छोड़ो आंदोलन और उसके क्रांतिकारियों के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन किया था। 


आजादी अधूरी है, यह अंबेडकर ने भी स्वीकार किया था। लेकिन उनके स्वीकार में अवमानना का भाव नहीं था। उनका संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर उसे पूर्ण करने का सपना था। कांग्रेस के भरोसे वे भी नहीं थे। समता का लक्ष्य हासिल करने का रास्ता लोकतंत्र को मानते थे। लोकतांत्रिक अहिंसक संघर्ष में अंत तक उनकी आस्था रही। इसका अर्थ यह भी बनता है कि आजादी के बाद, गांधी की तरह, अंबेडकर भी कांग्रेस की उपयोगिता नहीं देखते थे। उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और सोशलिस्ट पार्टी के साथ चुनाव लड़ा। भविष्य की राजनीति के लिए सोशलिस्ट पार्टी के साथ तालमेल का प्रयास भी उनके दिवंगत होने के पहले हुआ।


लेकिन कम्युनिस्टों ने अधूरी आजादी का ठीकरा कांग्रेस और उसके नेताओं के सिर फोड़ा। अधूरी आजादी से भी ज्यादा उनकी बड़ी शिकायत यह है कि साम्यवादी क्रांति क्यों नहीं की गई; उनकी नजर में भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और उनके साथ जुटने वाली जनता का यह दोष था। आजादी के अधूरेपन में उन्होंने न अपना कोई साझा या दायित्व स्वीकार किया, औरअ जाहिर है, न उसे पूरा करने के लिए संविधान का रास्ता स्वीकार किया। कम्युनिस्टों की अंतर्राष्ट्रीयता में ‘पिछड़े,दकियानूसी, सामंती, सांप्रदायिक, जातिवादी भारत’ को छोड़ कर सब कुछ हो सकता था। आज के आधिकारिक मार्क्‍सवादियों के लिए भी संविधान और संसदीय लोकतंत्र मजबूरी का सौदा है। 


भारतीय राज्य बुरा है, कम्युनिस्टों के लिए बात यहीं तक सीमित नहीं रहती। वह अगर उनके कब्जे में नहीं है, तो उनकी मंशा होती है कि उसे दुनिया में होना ही नहीं चाहिए। भारतीय राज्य पर कब्जा नहीं हो पाने पर उन्होंने कांग्रेस की सरपस्ती में संस्थाओं पर कब्जे की रणनीति अपनाई। इस रणनीति के निष्ठापूर्वक निर्वाह का नतीजा यह है कि वे उस रणनीति के बंदी बन कर रह गए हैं। यह सही है कि इस तरह से कम्युनिस्टों ने काफी ताकत हासिल की, लेकिन नवसाम्राज्यवाद विरोध के लिए उस ताकत का कोई उपयोग नहीं है।


दरअसल, उन्होंने सारी ताकत इस बात में लगा दी कि भारत बेशक कांग्रेस के कब्जे में रहे, भारतीय संदर्भों से जुड़ी समाजवाद या सामाजिक न्याय की कोई धारा जगह नहीं बना पाए। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और शोध संस्थाओं के शीर्ष पर रह कर उन्होंने अपने से अलग विचारों/विचारकों के प्रति संकीर्णता का बर्ताव किया। ऐसे में, जाहिर है, जगह आरएसएस की ही बननी थी, जो अपने स्थापना काल से ‘भारत माता भारत माता’ चिल्लाता चला आ रहा था और कम्युनिस्टों की तरह कांग्रेस में गहरी घुसपैठ रखता था। दरअसल, अधूरी आजादी से असंतुष्ट हो पूर्णता हासिल करने के लिए आरएसएस अगर समय में सुदूर स्थित ‘स्वर्णलोक’ की तरफ भागा, तो कम्युनिस्ट स्थान में सुदूर स्थित ‘स्वर्णलोक’ की तरफ। दोनों की आज तक भी कमोबेस वही स्थिति बनी हुई है।


यह स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यह समीक्षा वाद-विवाद के लिए नहीं की जा रही है। बल्कि आजादी का बचाव हो; वह पूर्ण, मजबूत और उच्चतर हो, इस उद्देश्‍य से की जा रही है। देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया गया है। ऐसे में आरएसएस को ठीक करने के पहले अगर अपने को ठीक नहीं किया जाता, तो नवउदारवाद के खिलाफ मोर्चा कभी नहीं जीता जा सकता। 






पूंजीवाद के बीमार 






वैश्विक परिदृश्‍य पर मचे हिंसा और मौत के तांडव के बावजूद पूंजीवाद की क्रांतिकारी भूमिका के सिद्धांतकार और पैरोकार आज भी अपनी स्थापना वापस लेने को तैयार नहीं होंगे। तीन-चैथाई दुनिया का उपनिवेशीकरण, संसाधनों की लूट,समूचे समुदायों का सफाया करके उनके भूभागों पर कब्जा, युद्धों, गृहयुद्धों, महायुद्धों के वर्तमान तक जारी अनवरत सिलसिले के समानांतर जीवधारियों और वनस्पतियों की असंख्य प्रजातियों का विनाश करते हुए दुनिया को संकट के मुहाने पर ले आने वाला पूंजीवाद आज भी ‘क्रांतिकारी‘ है। पूंजीवादी व्यवस्था की सर्वाधिक यथार्थपरक (रियलिस्टिक) और तर्कपूर्ण (रेशनल) समीक्षा करने वाला गांधी आज भी भारत में मानव प्रगति का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है। पूंजीवाद के बीमार दिमाग की इस समझ के साथ यह समझ लें कि आगे मनमोहन सिंह और मोदी ही आएंगे। गांधीए नेहरू, जेपी, लोहिया या अंबेडकर नहीं आने जा रहे हैं।


पूंजीवाद का बीमार दिमाग आज भी भारत की स्वतंत्र हस्ती नहीं स्वीकार कर पाता। इस बीमारी का बीज उपनिवेशवादी दौर में पड़ गया था। इसीके चलते उसके लिए अंग्रेज हमेशा सही और भारतीय लड़ाके, चाहे वे रजवाड़े हों,किसान हों, आदिवासी हों, हमेशा गलत थे। किसी भारतीय शासक ने भारत की जनता पर अंग्रेजों जैसा कहर नहीं बरपाया।1857 भारत के लोगों ने पहला स्वतंत्रता संग्राम लड़ा। उसके दमन में अंग्रेजों ने जो नृशंसता की, दुनिया के इतिहास में उसका उदाहरण नहीं मिलता। किसी भारतीय शासक के राज्य में वैसे भयंकर अकाल नहीं पड़े, जैसे अंग्रेजों के काल में पड़े। जब भारत में अकाल के चलते एक साथ कई लाख लोग एडि़यां रगड़ कर मरते थे, तो भारत या इंग्लैंड में अंग्रेज का एक निवाला भी कम नहीं होता था। जो अंग्रेज, सिपाही हो या नौकरशाह, भारत आ गया, मालामाल होकर गया। भारत में उसका वैभव और रौब-दाब यहां के किसी भी शासक से ज्यादा था। उनकी अय्याशी के किस्से कम नहीं हैं। लेकिन अंग्रेजी राज यहां के शासकों से अच्छा थाए पूंजीवाद के बीमार दिमाग में यह मान्यता घुट्टी की तरह गई हुई है।


उपनिवेशवादी शोषण ने भारत को आर्थिक रूप से जर्जर कर दिया था। सबसे ज्यादा शोषण किसानों, आदिवासियों,कारीगरों और मजदूरों का हुआ था। गांधी ने उस यथार्थ के मद्देनजर देश की स्वावलंबी श्रम आधारित विकेंद्रित अर्थव्यवस्था बनाने की बात की। अगर अपनी अर्थव्यवस्था नहीं है, तो आप स्वतंत्र भी नहीं हो सकते। उपनिवेशवादी शोषण की प्रक्रिया में पैदा हुए छोटे मध्यवर्ग ने गांधी का यह विचार स्वीकार नहीं किया। केवल राजनीतिक आजादी के आकांक्षी मध्यवर्ग ने गांधी की इस धारणा को न केवल अस्वीकार किया, पिछड़ा भी बताया। विकास के बने-बनाए पूंजीवादी माॅडल के भरोसे आर्थिक आजादी को वह हथेली पर धरी चीज मानता था। उसके मुताबिक पूरे भारत को मध्यवर्ग में तब्दील होना था। यानी किसानों,आदिवासियों, कारीगरों, मजदूरों, छोटे-मोटे दुकानदारों को उस विकसित भारत में नहीं रहना था। इसके साथ जो अन्य धारणाएं परोसी गईं,

Friday, April 24, 2015

वैकल्पिक राजनीति के गुनाहगार :प्रेम सिंह


(आम आदमी ने वैकल्पिक राजनीतिक धारा को जितना नुकसान पहुंचाया है, उसकी भरपाई जल्दी शायद ही हो पाएगी। लेकिन कठघरे में में वो लोग खड़े हो गए हैं, जो जमाने से वैकल्पिक राजनीति की वकालत कर रहे थे। यही वजह है कि इतिहास इसे भूल नहीं गुनाह के तौर पर देखेगा। इसी सिलसिले में डॉ प्रेम सिंह ने कुछ मौजूं सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश की है। )
वैश्‍वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण के दौर में भारत में मुकम्मल राजनीतिक दर्शन - राजनीति का ऐसा चिंतन जो इस परिघटना के मद्देनजर स्वावलंबी समतामूलक अर्थव्यवस्था और सेकुलर लोकतंत्र के पक्ष में वंचित आबादी की जमीन से किया गया हो - की रचना का काम अवरुद्ध है। नवउदारवाद पूरी ताकत से ऐसा राजनीतिक चिंतन फलीभूत नहीं होने देने में काफी हद तक सफल रहा है। कतिपय सक्रिय राजनीतिक कार्यकताओं व बुद्धिजीवियों द्वारा नवउदारवाद के बरक्स राजनीतिक चिंतन के जो फुटकर प्रयास हुए हैं, राजनीतिक विमर्श में उसकी जगह नहीं बन पाती है। इसका स्वाभाविक नतीजा है कि भारतीय जीवन के हर क्षेत्र में उत्तरोत्तर नवउदारवादी शिकंजा कसा जा चुका है। हमारे दौर के महत्वपूर्ण राजनीतिक चिंतक किषन पटनायक ने विकल्पहीनता की इस स्थिति में ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ का दावा पेश किया था। उनके इस सर्वथा सार्थक और प्रासंगिक प्रयास का नवउदारवादी सत्ता-प्रतिष्‍ठान द्वारा विरोध स्वाभाविक था। लेकिन अपने को जनांदेालनकारी और समाजवादी-गांधीवादी कहने वाले कतिपय निहित स्वार्थी तत्वों ने भी उनके विचार को आगे बढ़ने से रोका। 
ऐसी चुनौतीपूर्ण स्थिति में स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद के पूंजीवादी साम्राज्यवाद विरोधी चिंतन व संघर्श की विरासत का सहारा लिया जा सकता है, बल्कि लिया ही जाना चाहिए। लेकिन उस विरासत को नवउदारवादी शासक वर्ग, जिसमें प्रच्छन्न नवउदारवादियों का बड़ा हुजूम शामिल है, विकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। इस हुजूम में ज्यादातर नागरिक समाज एक्टिविस्ट और बुद्धिजीवी शामिल हैं। रही-सही कसर वह झगड़ा पूरी कर रहा है जो इस विरासत के पुरोधाओं को लेकर खड़ा किया जाता है। 
आधुनिक भारतीय राजनीतिक दर्शन की यह विषेशता रही है कि उसकी रचना  ज्यादातर सक्रिय राजनीतिक हस्तियों द्वारा हुई है। उपनिवेशवाद के बरक्स भारतीय मनीषा की जीवंत चिंताओं और तनावों से आधुनिक भारत का राजनीतिक चिंतन पैदा हुआ है। साहित्य, कलाएं और विद्वता (स्कालरशिप) इस राजनीतिक दर्शन से प्रेरित और कई बार उसके पूरक रहे हैं। यह सही है कि नवउदारवादी दौर में भी भारतीय भाषाओं में अच्छा साहित्य रचा गया है। विशेषकर अंग्रेजी में मानविकी व समाजशास्त्र के विषयों में गंभीर विद्वतापूर्ण लेखन हुआ है। लेकिन नवउदारवाद के बरक्स एक समुचित राजनीतिक दर्शन के अभाव में ज्यादातर साहित्यकार और विद्वान नवउदारवादी तंत्र में कोआप्ट हो जाते हैं, या कर लिए जाते हैं। कहा जा सकता है कि अगर राजनीतिक दृष्टि - विज़न - नहीं है तो साहित्य और विद्वता भी दृष्टि  - विज़न - से रहित रह जाते हैं। यह अकारण नहीं कि भ्रष्‍टाचार विरोध के नाम पर खड़े किए गए तथाकथित आंदोलन और ‘उसकी राख’ से खड़ी की गई तथाकथित राजनीतिक पार्टी की वकालत कई बड़े लेखक और विद्वान करते हुए पाए गए। विदेशी फंडिंग पर पलने वाला एक गुट नवउदारवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ की मजबूती बनाते हुए राजनीतिक सत्ता हथियाने की तिकड़म करता है और भारत का बुद्धिजीवी वर्ग उसके समर्थन में सन्नद्ध हो जाता है। वे देख नहीं पाते कि राजा को नंगा बताने वाले खुद कौन-सी पोशाक पहने हैं!   
मनमोहन सिंह के नेतृत्व में नवउदारीकरण के पक्ष में एक ‘चुप्पा युग’ चल रहा था। मनमोहन सिंह खुद तो चुपचाप अपना काम करते ही थे; वैश्‍वीकरण के समर्थक बुद्धिजीवी भी ज्यादा बढ़चढ़ कर दावे नहीं करते थे। उनका असल काम नवउदारीकरण के दुष्‍प्रभावों से बदहाल विशाल आबादी की आवाज को बार-बार यह कहते हुए चुप कराना था कि देश में नवउदारीकरण के पक्ष में आम सहमति बन चुकी है। यह बहुत अच्छा है, क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है। मनमोहन सिंह के ‘ज्ञान आयोग’ में शामिल विद्वान और सोनिया गांधी की ‘राष्‍टीय सलाहकार परिषद’ में शामिल नागरिक समाज एक्टिविस्टों ने नवउदारीकरण को सर्वस्वीकार्य बनाने का काम किया। 
अचानक इंडिया अगेंस्ट करप्‍शन, भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन, आम आदमी पार्टी के साथ बड़ी संख्या में नागरिक समाज एक्टिविस्टों, बुद्धिजीवियों, एनजीओ सरगनाओं, बाबाओं ने एकजुट होकर भारतीय राजनीतिक विमर्श को एक झटके में ‘चुप्पा युग’ से ‘लबार युग’ में पहुंचा दिया। कारपोरेट घरानों और एनआरआई ने तन-मन-धन से भ्रष्‍टाचार मिटाने के नाम पर किए उस ‘महान आंदोलन’ का भरपूर समर्थन किया। जम कर भाषणबाजी हुई। भाषा और वाणी का अवमूल्यन निम्नतम स्तर तक पहुंच गया। हालत यह हो गई कि प्रायः पूरा नागरिक समाज जहां-तहां जुबान साफ करने के लिए उतावला हो उठा। दिल्ली का जंतर-मंतर और रामलीला मैदान इसके लिए प्रमुख अड्डे बन गए। मुख्यधारा मीडिया के साथ सोशल मीडिया और लघु पत्रिकाओं - साहित्यिक पत्रिकाओं समेत - के संपादक/लेखक भी पीछे नहीं रहे। यह सब आरएसएस के इंतजाम में हुआ। जाहिर है, अंदरखाने ये सभी नवउदारवाद के लाभार्थी, लिहाजा समर्थक थे। वरना पिछले दो दशकों में बनी नवउदारवाद विरोधी ताकत को एनजीओबाजों के गुट द्वारा सांप्रदायिक ताकतों के साथ मिल कर तोड़ा नहीं जा सकता था।
देखते ही देखते भारत का राजनीतिक विमर्श एक ऐसा खुला बाजार बन गया कि बाबा रामदेव जैसे वाचाल धर्म के धंधेबाज का यह हौसला हो गया कि वह कामरेड एबी बर्द्धन के पास अपने ‘उच्च विचार’ लेकर जा पहुंचा; बर्द्धन समेत कितने ही समाजवाद के पक्षधर नेताओं और विचारकों ने जंतर-मंतर और रामलीला मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। बाजारवाद के हमाम से निकले ‘आम आदमी’ ने गांधीजनों और जनवादियों को एक साथ मोहित कर लिया। इस तरह, कह सकते हैं, राजनीतिक चिंतन की चिंताजनक कमी की क्षतिपूर्ति वाणी-विलास से पूरी की गई। वाणी-विलास के साथ कल्पना-विलास इस कदर ‘उदात्त’ हो गया कि बाजारवाद के खिलाडि़यों में एक साथ गांधी, जेपी और लेनिन की छवियां देख ली गईं!   
इस हल्ले में सत्याग्रह, स्वराज, वैकल्पिक राजनीति जैसे पदों/अवधारणाओं को धड़ल्ले से अवमूल्यित और विकृत किया गया। क्रांति तो जैसे ब्रज की गोपियों का दधि-माखन हो गया, जिसे कान्हा ग्वाल-बालों के साथ लूट-लूट कर खाते थे। राजनीतिक विमर्श की दुनिया से तथ्य और तर्क का जैसे दाना-पानी उठ गया। आष्चर्य की बात नहीं है कि लबारपंती के महोत्सव में गांधी, भगत सिंह, पटेल, जेपी, लोहिया, अंबेडकर आदि चिंतकों का इस हद तक अवमूल्यन कर डाला गया कि भविष्‍य में शायद ही उनके वास्तविक स्वरूप को प्रतिष्ठित किया जा सके। भारत के भविष्‍यद्रश्टा चिंतकों/नेताओं को भारत का भविष्‍य कारपोरेट पूंजीवाद में देखने वाले चिंतकों/नेताओं में घटित करने का यह सिलसिला जारी है। 
भाषा और वाणी के मर्यादाहीन इस्तेमाल से मुख्यधारा और सोशल मीडिया की मार्फत पूरे देश में जो माहौल बना, उसी पर सवार होकर टीम नरेंद्र मोदी ने आमचुनाव फतह कर लिया। भारत के शासक वर्ग ने एकजुट होकर यह सब किया, ताकि संकट में आया नवउदारवाद न केवल साफ बच कर निकल आए, मजबूत व दीर्घजीवी भी बन जाए। 
सत्याग्रह और स्वराज आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिंतन की पुरानी और प्रतिष्ठित  अवधारणाएं हैं। आषा की जा सकती है कि इन्हें देर-सवेर फिर से प्रतिष्ठित  किया जा सकेगा। लेकिन वैकल्पिक राजनीति की अवधारणा अपेक्षाकृत नई और निर्माणाधीन है। यह सबसे ज्यादा जरूरी और सार्थक भी है; क्योंकि इसकी उद्भावना नवउदारवाद के बरक्स हुई है। वैकल्पिक राजनीति नवउदारवाद का मुकम्मल विचारधारात्मक विकल्प प्रस्तुत करने का गंभीर प्रयास है। वैकल्पिक राजनीति के बजाय राजनीति के विकल्प का विचार भी बहस में रहा है। इस विचार के तहत माना जाता है कि शक्ति राजनीति के पास न रह कर समाज के पास रहे। इस विचार की एक उपधारा राजनीति के पूर्ण निषेध  की है। दूसरी उपधारा में राजनीति की भूमिका स्वीकार की जाती है। पहली उपधारा राजनीति को एक बुराई मान कर चलती है, जबकि दूसरी उपधारा राजनीतिक दलों की उपस्थिति स्वीकार करते हुए प्रचलित राजनीति को नागरिक समाज के प्रतिरोध से सही पटरी पर चलाने की हामी है। यहां हम इस महत्वपूर्ण बहस - वैकल्पिक राजनीति या राजनीति का विकल्प - में नहीं जा रहे हैं। 
वैकल्पिक अथवा विकल्प की राजनीति की विचारधारा के केंद्र में 21वीं सदी में समाजवाद के स्वरूप का चिंतन निहित है। इस चिंतन के सूत्र टेक्नोलोजी, प्राकृतिक संसाधन, विकास, पर्यावरण, विशमता, गरीबी, भुखमरी, विस्थापन, आत्महत्याएं, नरसंहार, परमाणु व जैव सहित बेशुमार विध्वंसक हथियार, नागरिक व मानवाधिकार, अस्मिता जैसे जीवंत सवालों में उलझे हैं। वैकल्पिक राजनीति की विचारधारा में केंद्रीकृत समृद्धि के लक्ष्य की जगह विकेंद्रित समतापूर्ण संपन्नता पर निर्णायक बलाघात है। इसमें आधुनिक औद्योगिक पूंजीवादी विकास के माडल का निर्णायक नकार है। इसीलिए वैकल्पिक राजनीति का चिंतन स्वाभाविक तौर पर गांधीवाद की तरफ जाता हैं। डा. लोहिया से लेकर किशन पटनायक तक गांधीवाद की अपरिहार्यता पर बल दिया गया है। लोहिया, जिन्हें गांधी का विस्तार/क्रांतिकारी व्याख्याकार कहा जाता है, ने पूंजीवाद और साम्यवाद से अलग समाजवाद की विचारधारा में गांधीवाद का फिल्टर लगाने की एक सुचिंतित विचारणा प्रस्तुत की है। 
वैकल्पिक राजनीति की रचना की प्रेरणा के पीछे बाबरी मस्जिद के ध्वंस की घटना भी नवउदारवादी नीतियों के स्वीकार जैसी महत्वपूर्ण है। मस्जिद का ध्वंस एक राजनीतिक पार्टी और उसके शीर्षस्थ नेताओं द्वारा ‘आंदोलन’ चला कर किया गया। संवैधानिक संस्थाएं, धर्मनिरपेक्ष राजनीति, आजदी के संघर्ष की साझी विरासत, सहअस्तित्व व सहिष्‍णुता की भावना, धर्म की उदार धारा - कोई भी वह ध्वंस नहीं रोक पाया। लिहाजा, सेकुलर लोकतंत्र की प्रतिष्ठिा वैकल्पिक राजनीति का अहम आयाम है। 
नवउदारवाद के विकल्प की विचारधारा और उस पर आधारित राजनीति का निर्माण जल्दबाजी में संभव नहीं है। गांधी का एक कदम ही इस दिशा में काफी हो सकता है, बशर्ते वह उसी दिशा में उठाया जाए। वास्तविक नवउदारवाद विरोधियों में अगर सहमति और एका बनेगा तो राष्‍टीय स्तर का आंदोलन उत्पन्न हो सकता है। तब मुख्यधारा राजनीति पर भी उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा। और नवसाम्राज्यवादी गुलामी का जुआ उतार फेंका जा सकेगा।  
वैकल्पिक राजनीति की इस संक्षिप्त प्रस्तावना के मद्देनजर देखा जा सकता है कि आम आदमी पार्टी (आप) को वैकल्पिक राजनीति की वाहक बताने वालों का दावा शुरू से ही खोखला है। वह हास्यास्पद भी है - क्योंकि ‘आप’ सीधे नवउदारवाद की कोख से पैदा होने वाली पार्टी है। इस पार्टी में सस्ते सत्ता-स्वार्थ की खींचतान के चलते कुछ लोग फिर से वैकल्पिक राजनीति का वास्ता दे रहे हैं। यह पहले से चल रही लबारपंती का एक और विस्तार है। अचानक केजरीवाल को कौरव बताने वाले ये पांडव पहले ही वैकल्पिक राजनीति की विरासत को सत्ता की बिसात पर दांव पर लगा चुके हैं। यह एक लंबी कार्रवाई रही है। विदेषी फंडिंग से जनांदोलन और विचार का काम करने वाले कुछ लोगों ने लंबे समय से वैकल्पिक राजनीति की हत्या की सुपारी उठाई हुई थी। अन्ना, रामदेव, केजरीवाल की तिकड़ी ने मौका दिया और इन्होंने काम तमाम कर दिया। 
ऐसे ही लोग किशन जी को वर्ल्‍ड सोशल फोरम के मुंबई जलसे में लेकर गए थे। किशन जी की यह निरंतर कोशिश रही कि वैश्‍वीकरण का विरोध करने वाले एनजीओकर्मियों का राजनीतिकरण हो। लिहाजा, एक बड़े आयोजन में संभावना तलाशने के उद्देश्‍य से उन्होंने वहां जाना स्वीकार किया थां। एनजीओकर्मियों द्वारा किए जाने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में भी वे इसी मकसद से जाते थे। लेकिन एनजीओकर्मी किशन जी का पक्ष समझने और स्वीकार करने के बजाय किशन जी की उपस्थिति को अपने पक्ष की वैधता के लिए इस्तेमाल करते थे। क्योंकि ये सयाने लोग अच्छी तरह जानते हैं कि किशन जी का पक्ष स्वीकार करते ही वास्तविक संघर्ष का जोखिम उठाना पड़ेगा। फंडिंग बंद हो जाएगी। ऐसे ही एक कार्यक्रम में किषन जी बीमार पड़े और चल बसे। कई सच्चे समाजवादी कार्यकर्ताओं ने तब भी कहा था और आज भी मानते हैं कि एनजीओ वालों ने किशन जी की वैकल्पिक राजनीति की हत्या करने की तो निरंतर कोशिश की ही, उनके शरीर की हत्या में भी उन्हीं का हाथ है। किशन जी की परंपरा में वैकल्पिक राजनीतिक विचारधारा और राजनीतिक संस्कृति की सर्वश्रेष्‍ठ अभिव्यक्ति साथी सुनील की बलि भी इसी रास्ते ले ली गई है! 
हमने किशन जी और सुनील का हवाला इसलिए दिया है कि वैकल्पिक राजनीति और विदेशी  फंडिंग पर पलने वाले एनजीओ का साझा मंच कभी नहीं बन सकता। यह हो सकता है, जो कि बहुत कम होता है, कि एनजीओकर्म छोड़ कर कोई व्यक्ति वैकल्पिक राजनीति के साथ आ जाए या, जो बहुत ज्यादा होता है, वैकल्पिक राजनीति करने वाला व्यक्ति एनजीओ में चला जाए। दोनों का साझा नहीं निभ सकता। बल्कि साझेदारी की कोशिश में एनजीओ पक्ष ही मजबूत होता जाता है। 
सभी जानते हैं ‘आप’ में विद्रोह का झंडा उठाने वाले लोग लोकसभा का चुनाव जीत जाते या इन्हें दिल्ली से राज्यसभा में भेज दिया जाता या पार्टी में अहम पद सौंप दिया जाता तो इनके लिए ‘आप’ वैकल्पिक राजनीति की खरी पार्टी बनी रहती और केजरीवाल, जिसके डुबकी लगाने से गंगा का उद्धार हो गया बताया जात है, वैकल्पिक राजनीति का मसीहा बना रहता। 
इन लोगों का कहना था कि ‘आप’ को समाजवादी पार्टी बना लिया जाएगा। केजरीवाल को भी बना लेंगे; नहीं बनेगा तो पार्टी पर समाजवादियों के कब्जे के चलते उन्हें चलता कर दिया जाएगा। हो उल्टा गया है। अगर नीयत साफ होती तो जिन साथियों को ‘आप’ को समाजवादी बनाने का वास्ता देकर सदस्य बनाया था उन्हें यह कहते कि हमारी समझ और आकलन गलत था। हम यह पार्टी छोड़ते हैं और समाजवादी आंदोलन को मजबूत बनाने का काम करते हैं। जाहिर है, इनके लिए समाजवाद बहाना भर था, असली मकसद ज्यादा से ज्यादा समाजवादी साथियों को पार्टी में लाकर अपनी हैसियत मजबूत करना था। केजरीवाल के दरबार में अपनी ताकत बनाने के लिए इन्होंने कैप्टन अब्बास अली जैसे समाजवाद के जीवित आइकोन का इस्तेमाल करके लोहियागीरी और नारायण देसाई जैसे गांधीवाद के जीवित आइकोन का इस्तेमाल करके गांधीगीरी की चोरबाजारी कर डाली। इस पूरे पचड़े में सोपा-प्रसोपा-संसोपा अथवा किशन पटनायक का हवाला देना शरारतपूर्ण है। 
इन लोगों ने केजरीवाल द्वारा इस्तेमाल करके फेंक दिए गए ‘स्वराज’ और अपनी तरफ से भरसक नष्‍ट कर दी गई वैकल्पिक राजनीति की धारा को इसलिए बहाना बनाया कि कुछ न कुछ सिलसिला चलता रहे। क्रांति अपने बच्चों की कड़ी परीक्षा लेती है। जान भी ले लेती है। यह भी देखा गया है कि कई बार वह खुद अपने बच्चों को खाना षुरू कर देती है। लेकिन प्रतिक्रांति की अपने बच्चों पर अपार ममता होती है। वह केजरीवाल के साथ इन लोगों को भी गोद में उठाए रखेगी।

Sunday, February 8, 2015

प्रतिक्रांति के हमसफर- प्रेम सिंह



 (नरेन्द्र मोदी और आरएसएस के जिस तिलस्म को तोड़ने के लिए केजरीवाल को खड़ा किया जा रहा है। ज्यादातर को नहीं पता है कि हम अपने आस पास दूसरा तिलस्म तैयार कर रहे हैं । ये तिकड़म वास्तव में कारपोरेट पूंजीवाद का तिलस्म है। मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल का समर्थन करके उस तिलस्म को दीर्घजीवी बना दिया है। )
 


‘‘इस वक्त समूची दुनिया में जो हो रहा है, वह शायद विश्‍व इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिक्रांति है। यह संगठित है, विश्‍वव्‍यापी है और समाज तथा जीवन के हर पहलू को बदल देने वाली है। यहां तक कि प्रकृति और प्राणिजगत को प्रभावित करने वाली है। इक्कीसवीं सदी के बाद भी अगर मानव समाज और सभ्यता की चेतना बची रहेगी, तो आज के समय के बारे में इसी तरह का जिक्र इतिहास की पुस्तकों में होगा। डंकेल संधि की तारीख इस प्रतिक्रांति की शुरुआत की तारीख मानी जा सकती है।’’
 ‘‘प्रतिक्रांति का मतलब पतन या क्षय नहीं है। पतन या क्षय वहां होता है, जहां परिवक्वता आ चुकी है या चोटी तक पहुंचा जा चुका है। सोवियत रूस का पतन हो गया; या हम कह सकते हैं कि आधुनिक सभ्यता का क्षय एक अरसे से शुरू  गया है। इससे भिन्न प्रतिक्रांति का रूप क्रांति जैसा ही होता है, सिर्फ उसका उद्देश्‍य उलटा होता है। यह भी संगठित होता है और एक विचारधारा से लैस रहता है और कई मूल्यों और आधारों को उखाड़ फेंकने का काम करता है। इसकी विचारधारा ही ऐसी होती है कि इसका आंदोलन अति संगठित छोटे समूहों के द्वारा चलाया गया अभियान होता है।’’ (‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’, किशन पटनायक, राजकमल प्रकाशन, पृ. 172) 
 किशन जी का यह कथन फरवरी 1994 का है। तब से दुनिया और भारत में प्रतिक्रांति का पथ उत्तरोत्तर प्रशस्त होता गया है। राजनीति में पिछले तीन-चार सालों में बनी नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की केंद्रीयता से प्रतिक्रांति की विचारधारा काफी मजबूत स्थिति में पहुंच गई है। गौरतलब है कि दोनों ने लगभग समान प्रचार शैली अपनाकर यह हैसियत हासिल की है जिसमें मीडिया और धन की अकूत ताकत झोंकी गई है। बहुत-से मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने अरविंद केजरीवाल का साथ देकर या दिल्ली विधानसभा चुनाव में बिना मांगे समर्थन करके इस प्रतिक्रांति को राजनीतिक स्वीकार्यता प्रदान कर दी है। दिल्ली में आपकी सरकार बनती है या भाजपा की, इससे इस सच्चाई पर फर्क पड़ने नहीं जा रहा है कि भारत की मुख्यधारा राजनीति में प्रतिक्रांति का सच्चा प्रतिपक्ष नहीं बचा है।
केजरीवाल की राजनीति के समर्थक खुद को यह तसल्ली और दूसरों को यह वास्ता देते रहे हैं कि जल्दी ही केजरीवाल को (अपने पक्ष में) ढब कर लिया जाएगा। हुआ उल्टा है। केजरीवाल ने सबको (अपने पक्ष में) ढब कर लिया है। सुना है किरण बेदी के छोटे गांधीकामरेडों के लेनिन हैं! प्रकाश करात ने कहा बताते हैं कि केजरीवाल का विरोध करने वाले मार्क्‍स को नहीं समझते हैं। प्रतिक्रांति इस कदर सिर चढ़ कर बोल रही है कि मार्क्‍स को भी उसके समर्थन में घसीट लिया गया है। यह परिघटना भारत की प्रगतिशील राजनीति की थकान और विभ्रम को दर्शाती है।
ऊपर दिए गए किशन जी के दो अनुच्छेदों के बीच का अनुच्छेद इस प्रकार है, ‘‘समूची बीसवीं सदी में क्रांति की चर्चा होती रही। क्रांति का एक विशिष्‍ट अर्थ आम जनता तक पहुंच गया था; क्रांति का मतलब संगठित आंदोलन द्वारा उग्र परिवर्तन, जिससे समाज आगे बढ़ेगा और साधारण आदमी का जीवन बेहतर होगा; आखिरी आदमी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। साधारण आदमी का केंद्रीय महत्व और आखिरी आदमी का अधिकार बीसवीं सदी की राजनीति और अर्थनीति पर जितना हावी हुआ, वैसा कभी नहीं हुआ था।’’
यह लिखते वक्त किशन जी को अंदेशा भी नहीं रहा होगा कि एनजीओ सरगनाओं का गिरोह करोड़पतियों को भी आम आदमी बना देगा; उनकी समृद्धी बढ़ाने के लिए गरीबों का वोट खींच लेगा; और समाजवादी क्रांति का दावा करने वाले नेता व बुद्धिजीवी उसके समर्थन में सन्नद्ध हो जाएंगे! किशन जी ने अपने उसी लेख में यह कहा है कि ‘‘1980 के दशक में हिंदुत्व के आवरण में एक प्रतिक्रांति का अध्याय शुरू हुआ है देश की राजनैतिक संस्कृति को बदलने के लिए। इस वक्त विश्‍व-स्तर पर जो प्रतिक्रांति की लहर प्रवाहित है, उससे इसका मेल है; ....’’ हम जानते हैं पूंजीवादी प्रतिक्रांति के पेटे में चलने वाली सांप्रदायिक प्रतिक्रांति के तहत 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस कर दिया गया।
किशन जी ने डंकेल समझौते के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति के मुकाबले में वैकल्पिक राजनीति की विचारधारा और संघर्ष खड़ा किया था। साथ ही न्होंने विस्तार से धर्मनिरपेक्षता का घोषणापत्र लिखा। उनके साथ शामिल रहे ज्यादातर लोग आज प्रतिक्रांति के साथ हैं। जाहिर है, वे किशन जी के जीवन काल में उन्हें धोखा देते रहे और उनके बाद उनके जीवन भर के राजनीि‍तक उद्यम को नष्ट करने में लगे हैं।
ऐसे में ज्यादा कुछ कहने-सुनने को नहीं बचा है; कुछ बिंदु अलबत्ता देखे जा सकते हैं
(1) मोदी का तिलस्म, जिसे तोड़ने के लिए केजरीवाल को अनालोचित समर्थन दिया गया है, वास्तव में कारपोरेट पूंजीवाद का तिलस्म है। मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल का समर्थन करके उस तिलस्म को दीर्घजीवी बना दिया है।
(2) केजरीवाल की जीत में धर्मनिरपेक्षता की जीत नहीं है, जैसा कि अति वामपंथियों से लेकर तरह-तरह के राजनीतिक निरक्षर जता रहे हैं। मुसलमानों के भय की भित्ति पर जमाई गई धर्मनिरपेक्षता न जाने कितनी बार भहरा कर गिर चुकी है। भारत की धर्मनिरपेक्षता मोदी की जीत के पहले कई बार हार का मुंह देख चुकी है। भारत का विभाजन, गांधी की हत्या, आजादी के बाद अनेक दंगे, 1984 में सिख नागरिकों का कत्लेआम, 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस, 2002 का गुजरात कांड - धर्मनिरपेक्षता की हार के अमिट निशान हैं।
(3) धर्मनिरपेक्षता के दावेदार यह सब जानते हैं। लिहाजा, केजरीवाल के समर्थन के पीछे के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। इनमें से बहुत-से लोग मोदी के हाथों मिली करारी षिकस्त को पचा नहीं पाए हैं। उनका दृढ़ विश्‍वास था कि मोदी जैसा शख्स भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। उनका विश्‍वास टूटा है। खीज मिटाने के लिए वे किसी को भी मोदी को हराता देखना चाहते हैं। केजरीवाल को उनके समर्थन का दूसरा अंतर्निहित कारण घृणा की राजनीति से जुड़ा है। सर्वविदित है कि आरएसएस घृणा की राजनीति करता है। धर्मनिरपेक्षतावादियों में भी संघियों के प्रति तुच्छता से लेकर घृणा तक का भाव रहता है। केजरीवाल की जीत से उनके इस भाव की तुष्टी होती है। तीसरा कारण सरकारी पद-प्रतिष्ठा से जुड़ा है। धर्मनिरपेक्षतावादियों को कांग्रेसी राज में सत्ता की मलाई खाने का चस्का लगा हुआ है। उन्हें पता है कांग्रेस दिल्ली में सत्ता में नहीं आने जा रही है। सीधे भाजपा का न्यौता खाने में उन्हें लाज आती है। दिल्ली राज्य में केजरीवाल की सत्ता होने से विभिन्न निकायों/समितियों में शामिल होने में उन्हें लाज का अनुभव नहीं होगा। हालांकि वे एक भूल करते हैं कि एनजीओ वाले राजनीति में आए हैं तो उनके अपने साथी-सगोती निकायों/समितियों में आएंगे। लिहाजा, धर्मनिरपेक्षतावादियों के लिए यहां कांग्रेस जैसी खुली दावत नहीं होने जा रही है। मोदी को हराने के नाम पर किए गए समर्थन को वे प्रतिक्रांति के समर्थन तक खींच कर लाएंगे। देखना होगा तब साथी क्या पैंतरा लेते हैं?  
(4) केजरीवाल को वोट देने वाले दिल्ली के गरीबों से कोई शिकायत नहीं की जा सकती। मीडिया और बुद्धिजीवियों ने आपके आर्थिक और गरीब विरोधी विचारधारात्मक स्रोतों की जानका उन तक पहुंचने ही नहीं दी। इस मेहनतकश वर्ग को जल्दी ही पता चलेगा कि उनका इस्तेमाल उन्हीं के खिलाफ किया गया है। हालांकि केजरीवाल के दीवाने आदर्शवादीनौजवानों को वैसा नादान नहीं कहा जा सकता। प्रतिभावान कहे जाने वाले इन नौजवानों ने प्रतिक्रांति के पदाति की भूमिका बखूबी निभाई है।
(5) दलित पूंजीवाद के पैरोकार देख लें, शूद्रों समेत ज्यादातर सवर्ण नेता, प्रशासक, विचारक, एनआरआई पूंजीवादी प्रतिक्रांति के साथ जुट गए हैं। पूंजीवाद की दौड़ में बराबरी का मुकाम कभी नहीं आता। 
(6) उस अदृश्‍य एजेंसी का लोहा मानना पड़ेगा जिसने केजरीवाल का यह चुनाव अभियान तैयार किया और चलाया। जनता का सीएमकैसे बनता है, यह उस एजेंसी ने बखूबी करके दिखाया है। वह जनता का प्रधान सेवकबनाने वाली एजेंसी की टक्कर की ठहरती है।    
अंत में सबक। नई आर्थिक नीतियों के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति का लगातार प्रतिरोध हुआ है। अब, जबकि सारे भ्रम हट गए हैं, क्रांति का संघर्ष निर्णायक जीत की दिशा में तेज होना चाहिए।

Friday, February 6, 2015

दिल्ली विधानसभा चुनाव और हाशिए पर जाती प्रगतिशील राजनीति- डॉ प्रेम सिंह


मार्क्सवादियोंसमाजवादियोंसामाजिक न्यायवादियोंगांधीवादियों और नागरिक समाज के बहुत-से लोगों की अरविंद केजरीवाल की जीत के पक्ष में एकजुटता भारत और दुनिया के कारपोरेट प्रतिष्ठान की बड़ी उपलब्धि है।
 दो फरवरी की शाम को आकाशवाणी से प्रसारित मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का चुनाव प्रसारण सुना। कांग्रेससीपीआईसीपीएम और राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रसारणों में दिल्ली शहर में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिशों का प्रमुखता से जिक्र और सांप्रदायिक ताकतों को चुनाव में परास्त करने की अपील की गई थी। भाजपा और आम आदमी पार्टी (आप) के प्रसारण में बाकी जो भी कहा गया होशहर में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं पर एक शब्द भी नहीं था। आप’ का प्रसारण मनीष सिसोदिया ने हिंदू हित’ का पूरा ध्यान रखते हुए पढ़ा और सरकार बनाने की दावेदारी ठोकी। किसी धर्मनिरपेक्षतावादी ने इस नाजिक्री (ओमिशन) पर सवाल नहीं उठाया है। बल्कि चुनावपूर्व सर्वेक्षणों में आप’ की जीत की प्रबल संभावना को देखकर अपना पूरा वजन आप’ के पक्ष में डाल दिया है। उन्होंने अरविंद केजरीवाल को हिंदुओं की भावनाओं का खयाल रखने की पूरी आजादी दी हुई है। वे जानते हैं चुनाव अकेले मुसलमानों के वोटों से नहीं जीता जा सकता।
हमने चुनाव प्रसारण का यह प्रसंग धर्मनिरपेक्षता-सांप्रदायिकता के सवाल पर चर्चा करने के लिए नहीं लिया है। बल्कि धर्मनिरपेक्षता को बचाने की आड़ में होने वाली एक बड़ी राजनीतिक तब्दीली पर संक्षेप में विचार करने के लिए यह प्रसंग उठाया है। मार्क्सवादियोंसमाजवादियोंसामाजिक न्यायवादियोंगांधीवादियों और नागरिक समाज के बहुत-से लोगों की अरविंद केजरीवाल की जीत के पक्ष में एकजुटता भारत और दुनिया के कारपोरेट प्रतिष्ठान की बड़ी उपलब्धि है।
मनमोहन सिंह के बाद कांग्रेस कारपोरेट प्रतिष्ठान के खास काम की नहीं रह गई है। कांग्रेस राहुल गांधी से चिपकी है और कारपोरेट उन पर मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी जैसा भरोसा नहीं कर सकता। दलितों और आदिवसियों को आर्थिक मुद्दों पर कांग्रेस के साथ जोड़ने के राहुल गांधी के प्रयास कारपेारेट प्रतिष्ठान के रजिस्टर में दर्ज हैं। कारपोरेट प्रतिष्ठान वंचितों के हित की दिखावे की अथवा टोकन राजनीति भी बरदाश्त करने को तैयार नहीं है। अलबत्ता, उनका सांप्रदायीकरण करने की राजनीति उसे माफिक आती है।
कारपोरेट प्रतिष्ठान को अब सोनिया गांधी पर भी भरोसा नहीं हैजो सलाहकारों के दबाव’ में गरीबों के लिए थोड़ी-बहुत राहत की व्यवस्था करवा देती हैं। उसे जैसे मनमोहन सिंह के साथ और उनके बाद मोदी चाहिए थेमोदी के साथ और उनके बाद केजरीवाल चाहिए। कारपोरेट पूंजीवाद की कोख से पैदा एक ऐसा शख्स जो देश की मेहनतकश जनता की आंखों में धूल झोंक कर सफलतापूर्वक कारपोरेट प्रतिष्ठान का हित साधन करे। कारपोरेट प्रतिष्ठान को अब अपने बचाव के लिए सेफ्टी वाल्व नहीं चाहिए। प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष खेमा उसके पक्ष में एकजुट हो गया है।
 कारपोरेट प्रतिष्ठान यह जानता है कि कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षतावादियों को प्रश्रय देकर उनका समर्थन पाया है। इस तरह फलाफूला धर्मनिरपेक्षतावादी खेमा मोदी की जीत से एकाएक समाप्त नहीं हो जा सकता। उन्हें कांग्रेस के अलग किसी और के साथ जोड़ना होगा। वे मजबूती से केजरीवाल के साथ जुट गए हैं। कल तक जो सोनिया के सेकुलर सिपाही थेअब निस्संकोच केजरीवाल के सेकुलर सिपाही हैं। कहने की जरूरत नहीं कि धर्मनिरपेक्षतावादियों का केजरीवाल को बिना शर्त समर्थन दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में ही नहीं है। वे शुरू से केजरीवाल के समर्थन में हैं। हालांकि उन्हें माक्र्सवादी/समाजवादी/गांधीवादी आदि बताने या बनाने की बात अब वे नहीं करते। उन्हें इसी में तसल्ली है कि केजरीवाल क्रोनी पूंजीवाद के खिलाफ है।
यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप’ की जीत से सांप्रदायिक भाजपा पर कितनी रोक लगेगी और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को दूसरे राज्यों के चुनावों में कितना फायदा होगा। लेकिन इतना निश्चित है कि राजनीतिक विमर्श से समाजवादी विचारधारा और ज्यादा हाशिए पर चली जाएगी। विचारधारा विहीनता का तमाशा और तेजी से जोर पकड़ेगा। चुनाव और तेजी से गरीबों के साथ छल-कपट का पर्याय बनेंगे।

अभी तो संभावना नजर नहीं आतीलेकिन अगर आगे की किसी पीढ़ी ने नवसाम्राज्यवादी गुलामी की तह में जाकर पता लगाने की कोशिश कीतो उसे पता चलेगा कि अकेले नवउदारवादी इसके लिए जिम्मेदार नहीं थे। देश की मुख्यधारा राजनीतिक में एका बना थाजिसके तहत नवसाम्राज्यवादी गुलामी आयद हुई। भारत के बुद्धिजीवियोंजो सभी प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष खेमे से आते हैंके गुलाम दिमाग के छेद’ की ओर ध्यान दिलाने वाले किशन पटनायक ने कहा हैमनुष्य के लिए गुलामी की अवस्था सहज स्वीकार्य नहीं होती। हम यह दिल्ली विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर नहीं कह रहे हैं। लंबे समय से हमारा कहना है कि इस दौर में भारत की सबसे बड़ी अकलियत की बड़ी भूमिका है। हालांकि मुस्लिम नेतृत्व ने हमारी बात पर गौर नहीं किया है। हमारा अभी भी मानना है कि नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ अगर कोई सच्चा संघर्ष होगातो वह अल्पसंख्यक समाज की मजबूती और भागीदारी से होगा। आशा करनी चाहिए ऐसा जरूर और जल्दी होगा।

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...