Sunday, February 8, 2015

प्रतिक्रांति के हमसफर- प्रेम सिंह



 (नरेन्द्र मोदी और आरएसएस के जिस तिलस्म को तोड़ने के लिए केजरीवाल को खड़ा किया जा रहा है। ज्यादातर को नहीं पता है कि हम अपने आस पास दूसरा तिलस्म तैयार कर रहे हैं । ये तिकड़म वास्तव में कारपोरेट पूंजीवाद का तिलस्म है। मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल का समर्थन करके उस तिलस्म को दीर्घजीवी बना दिया है। )
 


‘‘इस वक्त समूची दुनिया में जो हो रहा है, वह शायद विश्‍व इतिहास की सबसे बड़ी प्रतिक्रांति है। यह संगठित है, विश्‍वव्‍यापी है और समाज तथा जीवन के हर पहलू को बदल देने वाली है। यहां तक कि प्रकृति और प्राणिजगत को प्रभावित करने वाली है। इक्कीसवीं सदी के बाद भी अगर मानव समाज और सभ्यता की चेतना बची रहेगी, तो आज के समय के बारे में इसी तरह का जिक्र इतिहास की पुस्तकों में होगा। डंकेल संधि की तारीख इस प्रतिक्रांति की शुरुआत की तारीख मानी जा सकती है।’’
 ‘‘प्रतिक्रांति का मतलब पतन या क्षय नहीं है। पतन या क्षय वहां होता है, जहां परिवक्वता आ चुकी है या चोटी तक पहुंचा जा चुका है। सोवियत रूस का पतन हो गया; या हम कह सकते हैं कि आधुनिक सभ्यता का क्षय एक अरसे से शुरू  गया है। इससे भिन्न प्रतिक्रांति का रूप क्रांति जैसा ही होता है, सिर्फ उसका उद्देश्‍य उलटा होता है। यह भी संगठित होता है और एक विचारधारा से लैस रहता है और कई मूल्यों और आधारों को उखाड़ फेंकने का काम करता है। इसकी विचारधारा ही ऐसी होती है कि इसका आंदोलन अति संगठित छोटे समूहों के द्वारा चलाया गया अभियान होता है।’’ (‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’, किशन पटनायक, राजकमल प्रकाशन, पृ. 172) 
 किशन जी का यह कथन फरवरी 1994 का है। तब से दुनिया और भारत में प्रतिक्रांति का पथ उत्तरोत्तर प्रशस्त होता गया है। राजनीति में पिछले तीन-चार सालों में बनी नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की केंद्रीयता से प्रतिक्रांति की विचारधारा काफी मजबूत स्थिति में पहुंच गई है। गौरतलब है कि दोनों ने लगभग समान प्रचार शैली अपनाकर यह हैसियत हासिल की है जिसमें मीडिया और धन की अकूत ताकत झोंकी गई है। बहुत-से मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने अरविंद केजरीवाल का साथ देकर या दिल्ली विधानसभा चुनाव में बिना मांगे समर्थन करके इस प्रतिक्रांति को राजनीतिक स्वीकार्यता प्रदान कर दी है। दिल्ली में आपकी सरकार बनती है या भाजपा की, इससे इस सच्चाई पर फर्क पड़ने नहीं जा रहा है कि भारत की मुख्यधारा राजनीति में प्रतिक्रांति का सच्चा प्रतिपक्ष नहीं बचा है।
केजरीवाल की राजनीति के समर्थक खुद को यह तसल्ली और दूसरों को यह वास्ता देते रहे हैं कि जल्दी ही केजरीवाल को (अपने पक्ष में) ढब कर लिया जाएगा। हुआ उल्टा है। केजरीवाल ने सबको (अपने पक्ष में) ढब कर लिया है। सुना है किरण बेदी के छोटे गांधीकामरेडों के लेनिन हैं! प्रकाश करात ने कहा बताते हैं कि केजरीवाल का विरोध करने वाले मार्क्‍स को नहीं समझते हैं। प्रतिक्रांति इस कदर सिर चढ़ कर बोल रही है कि मार्क्‍स को भी उसके समर्थन में घसीट लिया गया है। यह परिघटना भारत की प्रगतिशील राजनीति की थकान और विभ्रम को दर्शाती है।
ऊपर दिए गए किशन जी के दो अनुच्छेदों के बीच का अनुच्छेद इस प्रकार है, ‘‘समूची बीसवीं सदी में क्रांति की चर्चा होती रही। क्रांति का एक विशिष्‍ट अर्थ आम जनता तक पहुंच गया था; क्रांति का मतलब संगठित आंदोलन द्वारा उग्र परिवर्तन, जिससे समाज आगे बढ़ेगा और साधारण आदमी का जीवन बेहतर होगा; आखिरी आदमी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। साधारण आदमी का केंद्रीय महत्व और आखिरी आदमी का अधिकार बीसवीं सदी की राजनीति और अर्थनीति पर जितना हावी हुआ, वैसा कभी नहीं हुआ था।’’
यह लिखते वक्त किशन जी को अंदेशा भी नहीं रहा होगा कि एनजीओ सरगनाओं का गिरोह करोड़पतियों को भी आम आदमी बना देगा; उनकी समृद्धी बढ़ाने के लिए गरीबों का वोट खींच लेगा; और समाजवादी क्रांति का दावा करने वाले नेता व बुद्धिजीवी उसके समर्थन में सन्नद्ध हो जाएंगे! किशन जी ने अपने उसी लेख में यह कहा है कि ‘‘1980 के दशक में हिंदुत्व के आवरण में एक प्रतिक्रांति का अध्याय शुरू हुआ है देश की राजनैतिक संस्कृति को बदलने के लिए। इस वक्त विश्‍व-स्तर पर जो प्रतिक्रांति की लहर प्रवाहित है, उससे इसका मेल है; ....’’ हम जानते हैं पूंजीवादी प्रतिक्रांति के पेटे में चलने वाली सांप्रदायिक प्रतिक्रांति के तहत 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस कर दिया गया।
किशन जी ने डंकेल समझौते के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति के मुकाबले में वैकल्पिक राजनीति की विचारधारा और संघर्ष खड़ा किया था। साथ ही न्होंने विस्तार से धर्मनिरपेक्षता का घोषणापत्र लिखा। उनके साथ शामिल रहे ज्यादातर लोग आज प्रतिक्रांति के साथ हैं। जाहिर है, वे किशन जी के जीवन काल में उन्हें धोखा देते रहे और उनके बाद उनके जीवन भर के राजनीि‍तक उद्यम को नष्ट करने में लगे हैं।
ऐसे में ज्यादा कुछ कहने-सुनने को नहीं बचा है; कुछ बिंदु अलबत्ता देखे जा सकते हैं
(1) मोदी का तिलस्म, जिसे तोड़ने के लिए केजरीवाल को अनालोचित समर्थन दिया गया है, वास्तव में कारपोरेट पूंजीवाद का तिलस्म है। मार्क्‍सवादियों, समाजवादियों, सामाजिक न्यायवादियों, गांधीवादियों और बुद्धिजीवियों ने केजरीवाल का समर्थन करके उस तिलस्म को दीर्घजीवी बना दिया है।
(2) केजरीवाल की जीत में धर्मनिरपेक्षता की जीत नहीं है, जैसा कि अति वामपंथियों से लेकर तरह-तरह के राजनीतिक निरक्षर जता रहे हैं। मुसलमानों के भय की भित्ति पर जमाई गई धर्मनिरपेक्षता न जाने कितनी बार भहरा कर गिर चुकी है। भारत की धर्मनिरपेक्षता मोदी की जीत के पहले कई बार हार का मुंह देख चुकी है। भारत का विभाजन, गांधी की हत्या, आजादी के बाद अनेक दंगे, 1984 में सिख नागरिकों का कत्लेआम, 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस, 2002 का गुजरात कांड - धर्मनिरपेक्षता की हार के अमिट निशान हैं।
(3) धर्मनिरपेक्षता के दावेदार यह सब जानते हैं। लिहाजा, केजरीवाल के समर्थन के पीछे के मनोविज्ञान को समझने की जरूरत है। इनमें से बहुत-से लोग मोदी के हाथों मिली करारी षिकस्त को पचा नहीं पाए हैं। उनका दृढ़ विश्‍वास था कि मोदी जैसा शख्स भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। उनका विश्‍वास टूटा है। खीज मिटाने के लिए वे किसी को भी मोदी को हराता देखना चाहते हैं। केजरीवाल को उनके समर्थन का दूसरा अंतर्निहित कारण घृणा की राजनीति से जुड़ा है। सर्वविदित है कि आरएसएस घृणा की राजनीति करता है। धर्मनिरपेक्षतावादियों में भी संघियों के प्रति तुच्छता से लेकर घृणा तक का भाव रहता है। केजरीवाल की जीत से उनके इस भाव की तुष्टी होती है। तीसरा कारण सरकारी पद-प्रतिष्ठा से जुड़ा है। धर्मनिरपेक्षतावादियों को कांग्रेसी राज में सत्ता की मलाई खाने का चस्का लगा हुआ है। उन्हें पता है कांग्रेस दिल्ली में सत्ता में नहीं आने जा रही है। सीधे भाजपा का न्यौता खाने में उन्हें लाज आती है। दिल्ली राज्य में केजरीवाल की सत्ता होने से विभिन्न निकायों/समितियों में शामिल होने में उन्हें लाज का अनुभव नहीं होगा। हालांकि वे एक भूल करते हैं कि एनजीओ वाले राजनीति में आए हैं तो उनके अपने साथी-सगोती निकायों/समितियों में आएंगे। लिहाजा, धर्मनिरपेक्षतावादियों के लिए यहां कांग्रेस जैसी खुली दावत नहीं होने जा रही है। मोदी को हराने के नाम पर किए गए समर्थन को वे प्रतिक्रांति के समर्थन तक खींच कर लाएंगे। देखना होगा तब साथी क्या पैंतरा लेते हैं?  
(4) केजरीवाल को वोट देने वाले दिल्ली के गरीबों से कोई शिकायत नहीं की जा सकती। मीडिया और बुद्धिजीवियों ने आपके आर्थिक और गरीब विरोधी विचारधारात्मक स्रोतों की जानका उन तक पहुंचने ही नहीं दी। इस मेहनतकश वर्ग को जल्दी ही पता चलेगा कि उनका इस्तेमाल उन्हीं के खिलाफ किया गया है। हालांकि केजरीवाल के दीवाने आदर्शवादीनौजवानों को वैसा नादान नहीं कहा जा सकता। प्रतिभावान कहे जाने वाले इन नौजवानों ने प्रतिक्रांति के पदाति की भूमिका बखूबी निभाई है।
(5) दलित पूंजीवाद के पैरोकार देख लें, शूद्रों समेत ज्यादातर सवर्ण नेता, प्रशासक, विचारक, एनआरआई पूंजीवादी प्रतिक्रांति के साथ जुट गए हैं। पूंजीवाद की दौड़ में बराबरी का मुकाम कभी नहीं आता। 
(6) उस अदृश्‍य एजेंसी का लोहा मानना पड़ेगा जिसने केजरीवाल का यह चुनाव अभियान तैयार किया और चलाया। जनता का सीएमकैसे बनता है, यह उस एजेंसी ने बखूबी करके दिखाया है। वह जनता का प्रधान सेवकबनाने वाली एजेंसी की टक्कर की ठहरती है।    
अंत में सबक। नई आर्थिक नीतियों के साथ शुरू होने वाली प्रतिक्रांति का लगातार प्रतिरोध हुआ है। अब, जबकि सारे भ्रम हट गए हैं, क्रांति का संघर्ष निर्णायक जीत की दिशा में तेज होना चाहिए।

Friday, February 6, 2015

दिल्ली विधानसभा चुनाव और हाशिए पर जाती प्रगतिशील राजनीति- डॉ प्रेम सिंह


मार्क्सवादियोंसमाजवादियोंसामाजिक न्यायवादियोंगांधीवादियों और नागरिक समाज के बहुत-से लोगों की अरविंद केजरीवाल की जीत के पक्ष में एकजुटता भारत और दुनिया के कारपोरेट प्रतिष्ठान की बड़ी उपलब्धि है।
 दो फरवरी की शाम को आकाशवाणी से प्रसारित मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों का चुनाव प्रसारण सुना। कांग्रेससीपीआईसीपीएम और राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रसारणों में दिल्ली शहर में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिशों का प्रमुखता से जिक्र और सांप्रदायिक ताकतों को चुनाव में परास्त करने की अपील की गई थी। भाजपा और आम आदमी पार्टी (आप) के प्रसारण में बाकी जो भी कहा गया होशहर में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं पर एक शब्द भी नहीं था। आप’ का प्रसारण मनीष सिसोदिया ने हिंदू हित’ का पूरा ध्यान रखते हुए पढ़ा और सरकार बनाने की दावेदारी ठोकी। किसी धर्मनिरपेक्षतावादी ने इस नाजिक्री (ओमिशन) पर सवाल नहीं उठाया है। बल्कि चुनावपूर्व सर्वेक्षणों में आप’ की जीत की प्रबल संभावना को देखकर अपना पूरा वजन आप’ के पक्ष में डाल दिया है। उन्होंने अरविंद केजरीवाल को हिंदुओं की भावनाओं का खयाल रखने की पूरी आजादी दी हुई है। वे जानते हैं चुनाव अकेले मुसलमानों के वोटों से नहीं जीता जा सकता।
हमने चुनाव प्रसारण का यह प्रसंग धर्मनिरपेक्षता-सांप्रदायिकता के सवाल पर चर्चा करने के लिए नहीं लिया है। बल्कि धर्मनिरपेक्षता को बचाने की आड़ में होने वाली एक बड़ी राजनीतिक तब्दीली पर संक्षेप में विचार करने के लिए यह प्रसंग उठाया है। मार्क्सवादियोंसमाजवादियोंसामाजिक न्यायवादियोंगांधीवादियों और नागरिक समाज के बहुत-से लोगों की अरविंद केजरीवाल की जीत के पक्ष में एकजुटता भारत और दुनिया के कारपोरेट प्रतिष्ठान की बड़ी उपलब्धि है।
मनमोहन सिंह के बाद कांग्रेस कारपोरेट प्रतिष्ठान के खास काम की नहीं रह गई है। कांग्रेस राहुल गांधी से चिपकी है और कारपोरेट उन पर मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी जैसा भरोसा नहीं कर सकता। दलितों और आदिवसियों को आर्थिक मुद्दों पर कांग्रेस के साथ जोड़ने के राहुल गांधी के प्रयास कारपेारेट प्रतिष्ठान के रजिस्टर में दर्ज हैं। कारपोरेट प्रतिष्ठान वंचितों के हित की दिखावे की अथवा टोकन राजनीति भी बरदाश्त करने को तैयार नहीं है। अलबत्ता, उनका सांप्रदायीकरण करने की राजनीति उसे माफिक आती है।
कारपोरेट प्रतिष्ठान को अब सोनिया गांधी पर भी भरोसा नहीं हैजो सलाहकारों के दबाव’ में गरीबों के लिए थोड़ी-बहुत राहत की व्यवस्था करवा देती हैं। उसे जैसे मनमोहन सिंह के साथ और उनके बाद मोदी चाहिए थेमोदी के साथ और उनके बाद केजरीवाल चाहिए। कारपोरेट पूंजीवाद की कोख से पैदा एक ऐसा शख्स जो देश की मेहनतकश जनता की आंखों में धूल झोंक कर सफलतापूर्वक कारपोरेट प्रतिष्ठान का हित साधन करे। कारपोरेट प्रतिष्ठान को अब अपने बचाव के लिए सेफ्टी वाल्व नहीं चाहिए। प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष खेमा उसके पक्ष में एकजुट हो गया है।
 कारपोरेट प्रतिष्ठान यह जानता है कि कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षतावादियों को प्रश्रय देकर उनका समर्थन पाया है। इस तरह फलाफूला धर्मनिरपेक्षतावादी खेमा मोदी की जीत से एकाएक समाप्त नहीं हो जा सकता। उन्हें कांग्रेस के अलग किसी और के साथ जोड़ना होगा। वे मजबूती से केजरीवाल के साथ जुट गए हैं। कल तक जो सोनिया के सेकुलर सिपाही थेअब निस्संकोच केजरीवाल के सेकुलर सिपाही हैं। कहने की जरूरत नहीं कि धर्मनिरपेक्षतावादियों का केजरीवाल को बिना शर्त समर्थन दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में ही नहीं है। वे शुरू से केजरीवाल के समर्थन में हैं। हालांकि उन्हें माक्र्सवादी/समाजवादी/गांधीवादी आदि बताने या बनाने की बात अब वे नहीं करते। उन्हें इसी में तसल्ली है कि केजरीवाल क्रोनी पूंजीवाद के खिलाफ है।
यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप’ की जीत से सांप्रदायिक भाजपा पर कितनी रोक लगेगी और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को दूसरे राज्यों के चुनावों में कितना फायदा होगा। लेकिन इतना निश्चित है कि राजनीतिक विमर्श से समाजवादी विचारधारा और ज्यादा हाशिए पर चली जाएगी। विचारधारा विहीनता का तमाशा और तेजी से जोर पकड़ेगा। चुनाव और तेजी से गरीबों के साथ छल-कपट का पर्याय बनेंगे।

अभी तो संभावना नजर नहीं आतीलेकिन अगर आगे की किसी पीढ़ी ने नवसाम्राज्यवादी गुलामी की तह में जाकर पता लगाने की कोशिश कीतो उसे पता चलेगा कि अकेले नवउदारवादी इसके लिए जिम्मेदार नहीं थे। देश की मुख्यधारा राजनीतिक में एका बना थाजिसके तहत नवसाम्राज्यवादी गुलामी आयद हुई। भारत के बुद्धिजीवियोंजो सभी प्रगतिशील व धर्मनिरपेक्ष खेमे से आते हैंके गुलाम दिमाग के छेद’ की ओर ध्यान दिलाने वाले किशन पटनायक ने कहा हैमनुष्य के लिए गुलामी की अवस्था सहज स्वीकार्य नहीं होती। हम यह दिल्ली विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर नहीं कह रहे हैं। लंबे समय से हमारा कहना है कि इस दौर में भारत की सबसे बड़ी अकलियत की बड़ी भूमिका है। हालांकि मुस्लिम नेतृत्व ने हमारी बात पर गौर नहीं किया है। हमारा अभी भी मानना है कि नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ अगर कोई सच्चा संघर्ष होगातो वह अल्पसंख्यक समाज की मजबूती और भागीदारी से होगा। आशा करनी चाहिए ऐसा जरूर और जल्दी होगा।

Monday, February 2, 2015

‘आप’ से नहीं बचेगी धर्मनिरपेक्षता: प्रेम सिंह



(दरअसल, धर्मनिरपेक्षता जैसे संविधान सम्मत मूलभूत मूल्य को लेकर फुटकर व्यवहार नहीं चल सकता। वह मुकम्मल व सर्वस्वीकृत बना रहे, इसके लिए नई राजनीति की जमीन तैयार करते रहना होगा। ऐसी राजनीति का कोई भविष्य नहीं है, ऐसा कहने वाले साथियों को इतना ध्यान जरूर देना चाहिए कि उसी राजनीति से धर्मनिरपेक्षता का भविष्य बना रह सकता है। )

इस लेख के लिए हम पर कई सेकुलर साथियों का कोप और तेज होगा। हम यह नहीं लिखते यदि पिछले करीब एक महीने में कई साथियों ने फोन पर और ईमेल भेज कर हमसे दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (आप) का समर्थन करने को नहीं कहा होता। उनमें कई वरिष्ठ साथी ऐसे हैं जिनका हम सम्मान करते हैं। ‘आप’ के समर्थन का आग्रह करने वाले ज्यादातर साथी अरविंद केजरीवाल में मोदी की काट देखने वाले हैं। लेकिन यह आग्रह करने वाले कतिपय साथी ऐसे भी हैं, और वे काफी आक्रामक हैं, जो केजरीवाल की मजबूती में मोदी की मजबूती देखते हैं। वे समझते हैं उनकी इस समझ को कोई समझ नहीं रहा है। वे केजरीवाल को मजबूत करना चाहते हैं, ताकि ‘भ्रष्ट’ कांग्रेस और ‘जातिवादी’ क्षत्रप आगे कभी मोदी के आगे सिर न उठा पाएं। उनकी नजर में मोदी दमदार नेता हैं, जिन्होंने विकास और प्रषासन को पटरी पर ला दिया है। केजरीवाल के ऐसे समर्थकों से हमारा कोई सवाल नहीं है। लेकिन केजरीवाल के समर्थक उन साथियों से जरूर सवाल है जो एक बार फिर केजरीवाल में मोदी की काट देख रहे हैं और दूसरों को भी वह ‘सच्चाई’ दिखाने पर आमादा हैं। ऐसे साथियों का प्रबल आग्रह है कि धर्मनिरपेक्षता को बचाना है तो दिल्ली में भाजपा को हराना होगा, जो ‘आप’ ही कर सकती है। उनका तर्क है कि सारे तर्क छोड़ कर ‘आप’ का समर्थन करना है। 

सांप्रदायिक ताकतों ने पूर्ण बहुमत से ‘दिल्ली’ जीत ली है। यह उनकी अभी तक की पराकाष्ठा है। ‘दिल्ली’ के भीतर दिल्ली राज्य, जिसे पूर्ण राज्य का दर्जा भी नहीं है, के चुनाव में ‘आप’ की जीत से पराकाष्ठा पर पहुंची सांप्रदायिक ताकतों का पराभव षुरू हो जाएगा - साथियों की यह मान्यता हैरान करने वाली है। दरपेष सांप्रदायिक फासीवाद के प्रति साथी भले ही वे गंभीर चिंता जताते हों, संकट की प्रकृति पर उनकी पकड़ मजबूत नहीं कही जा सकती। 

हम मानते हैं कि यह धर्मनिरपेक्षता पर अभी तक का सबसे बड़ा संकट है, जिसका भारतीय सभ्यता पर दूरगामी प्रभाव पड़ना है। इसलिए संकट का तात्कालिक समाधान भी ऐसा सोचना होगा, जिससे दूरगामी समाधान निकल सके। हमने ‘आप’ का समर्थन करने वाले साथियों से कहा कि सात वामपंथी पार्टियों ने दिल्ली के नागरिकों और षहर के लिए सभी जरूरी मुद्दों पर एक कार्यक्रम बनाया है और उनमें पांच पार्टियों के 14 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने इसे एक निरर्थक कार्रवाई मानते हुए कार्यक्रम या उम्मीदवारों में अपनी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। हमने उनसे कहा कि दिल्ली के सभी धर्मनिरपेक्ष साथी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के उम्मीदवारों के समर्थन में बाहर निकलें। धर्मनिरपेक्ष उम्मीदवारों को ज्यादा से ज्यादा समर्थन और वोट मिलने से न केवल उनका आगे काम करने का हौसला बढ़ेगा, इस पूरे चुनाव अभियान में नवउदारवादी-सांप्रदायिक गठजोड़ के संकीर्ण दायरे में घूमने वाली बहस में समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को कुछ जगह मिलेगी। लेकिन वे धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई, जो हारी जा चुकी है, की हार का डर दिखा कर जीत का भ्रम पालना चाहते हैं। इससे उनके कुछ करने के जज्बे की भले तसल्ली होती हो, धर्मनिरपेक्षता के मोर्चे पर और ज्यादा नुकसान ही होते जाना है।

नवउदारवादी व्यवस्था आगे बढ़ेगी तो सांप्रदायिकता भी आगे बढ़ेगी। उपनिवेषवादी दौर से हम यह सच्चाई जानते हैं और विभाजन की त्रासदी के रूप में उसका गहरा दंष झेल चुके हैं। नवउदारवाद, सांप्रदायिकता और सामाजिक न्याय-विरोध के घोल से तैयार भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन सबसे पहले और सबसे ज्यादा आरएसएस को फला है। चर्चा को आगे बढ़ाने से पहले कुछ पूर्व उल्लिखित तथ्यों को संक्षेप में रखना मुनासिब होगा। 

जिस मौजूदा सांप्रदायिक फासीवाद को लेकर साथी इस कदर चिंतित हैं वह अकेले आरएसएस की कामयाबी नहीं है। उसमें इंडिया अगेंस्ट करप्षन, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और ‘आप’ का मास्टर स्ट्रोक लगा है। यह स्पष्ट हो चुका है कि अण्णा हजारे से पहले केजरीवाल ने रामदेव को साधा था, जो उन्हीं की तरह षासक जमात में ऊंची हैसियत बनाने के लिए बेताब घूमते थे। न केवल अण्णा हजारे ने जंतर-मंतर से पहली प्रषंसा मोदी की, रामदेव ने मोदी को हरिद्वार अपने आश्रम में बुला कर हिंदुओं का नेता घोषित किया। अण्णा हजारे इस्तेमाल के बाद अप्रासंगिक हो गए और रामदेव व केजरीवाल सत्ता के गलियारे में पहुंच गए। दिल्ली विधानसभा चुनाव में सफलता के बाद ‘आप’ के धर्मनिरपेक्षतावादी सदस्य प्रषांत भूषण ने कहा था कि ‘आप’ को सरकार बनाने के लिए कांग्रेस से नहीं, भाजपा से मुद्दा आधारित समर्थन लेना चाहिए। उनके पिता ‘आप’ के वरिष्ठ नेता षांति भूषण लंबे समय से लालकृष्ण अडवाणी के राजनैतिक साथी हैं। केजरीवाल को ‘छोटे गांधी’ कहने वाली किरण बेदी ने उस समय कहा था कि ‘आप’ और भाजपा की विचारधारा एक है। यानी ‘भारत की बेटी’ पहले से ही ‘भाजपा की बेटी’ रही है। यह अकारण नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रामदेव और केजरीवाल दोनों के प्रिय हैं। दोनों नरेंद्र मोदी, उनके द्वारा गुजरात में तैयार की गई हिंदुत्व की प्रयोगषाला, फरवरी 2002 में मुसलमानों के राज्य-प्रायोजित नरसंहार और उसे छिपाने के लिए किए गए षड़यंत्रों पर कुछ नहीं बोलते। न ही बाबरी मस्जिद ध्वंस के संविधान और सभ्यता विरोधी कृत्य के खिलाफ उनकी आवाज सुनाई देती है। यह तथ्य भी देखें कि 1984 में स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुई हजारों निर्दोष सिख नागरिकों की हत्या पर केजरीवाल सत्ता के गलियारे में पहुंचने के बाद से काफी राजनीति करते हैं। लेकिन घटना के वक्त और उसके बाद उन्होंने पीडि़तों के पक्ष में आवाज नहीं उठाई। 2006 में आई जस्टिस सच्चर कमेटी की रपट और सिफारिषों को लेकर ‘आप’ भाजपा के साथ खड़ी रही है।

केजरीवाल ‘बदनाम’ कांग्रेस से पीछा छुड़ाने के लिए मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देकर बनारस चुनाव लड़ने जा पहुंचे ताकि नरेंद्र मोदी की जीत सुनिष्चित की जा सके और उसके बदले में भाजपा में षामिल होकर या बाहर से समर्थन लेकर पक्के मुख्यमंत्री बन सकें। तब किसी को पता नहीं था कि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल जाएगा। सारे कयास 160 से लेकर 180 सीटों तक लगाए जा रहे थे। आम चुनाव और उसके बाद कुछ राज्यों में मिली चुनावी सफलता के चलते भाजपा ने जोड़-तोड़ की सरकार बनाने के बजाय अंततः चुनाव में जाने का फैसला किया। केजरीवाल का गणित गड़बड़ा गया और मोदी ने उन्हें घास नहीं डाली। फिर भी केजरीवाल ने पटरी बैठाने के लिए ‘केंद्र में पीएम मोदी, दिल्ली में सीएम केजरीवाल’ का नारा फेंका जो चल नहीं पाया। मोदी अगर बनारस से हारते तो उनकी जीत का वजन आधा रह जाता।

लालकृष्ण अडवाणी कई बार कह चुके हैं कि देष में कांग्रेस और भाजपा दो पार्टियां होनी चाहिए। मनमोहन सिंह ने भी उनकी यह बात दोहराई है। नरेंद्र मोदी का सोचना अलग है। वे कांगे्रसमुक्त भारत का संकल्प लेकर चल रहे हैं। आम चुनाव में कांग्रेस को अभी तक का सबसे बड़ा धक्का देने के बाद दिल्ली की चुनावी रैली में उन्होंने कांग्रेस का जिक्र ही नहीं किया। उन्होंने मुकाबले में ‘आप’ को संबोधित किया। संदेष साफ है कि कांग्रेस के परंपरागत मतदाता भाजपा को वोट नहीं दे सकते तो ‘आप’ को वोट दे दें। दिल्ली में ‘आप’ की लड़ाई भी कांग्रेस के साथ है। दिल्ली के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ ‘आप’ और भाजपा का वोट साझा था। इस बार वैसी स्थिति नहीं है। जिन्होंने केजरीवाल को दिल्ली का सीएम बनाया था, उन्होंने केंद्र में मोदी को पीएम बना दिया है। जाहिर है, अब उनका मोदी की मरजी का सीएम बनाने का प्रयास रहेगा। इसीलिए ‘आप’ के कई नेता-कार्यकर्ता भाजपा में षामिल हो गए हैं। दोनों के बीच यह आवाजाही आगे भी जारी रहेगी। 

यहां एक और तथ्य पर गौर किया जा सकता है। राजनीति में पार्टियों और नेतृत्व की नीतियों के आधार पर आलोचना और विरोध होना चाहिए। केजरीवाल ने कांग्रेस और उसके नेतृत्व की नवउदारवादी नीतियों की आलोचना और विरोध न करके, उन्हें बदनाम करने का जबरदस्त अभियान चलाया। बदनाम करने की ‘कला’ में आरएसएस को महारत हासिल है। कांग्रेस की बदनामी के माहौल में आरएसएस का काम आसान हो गया और ‘आप’ को सत्ता की राजनीति (पावर पोलिटिक्स) में आसानी से प्रवेष मिल गया। आषय यह कि भाजपा और ‘आप’ का एक साथ उत्थान सम्मिलित उद्यम की देन है। 

‘आप’ ने पिछले दिनों हुए कुछ राज्यों के विधानसभा चुनावों में हिस्सा न लेकर दिल्ली पर फोकस करने का निर्णय लिया। ‘आप’ के नेताओं की विषेषज्ञता धन और स्टेªटेजी बनाने में है। इन दो के सहारे उसने दिल्ली में अपने पक्ष में माहौल बनाया है और चुनाव में भाजपा के मुकाबले में आ गई। धर्मनिरपेक्षता के जो दावेदार ‘आप’ पर दांव लगा रहे हैं, उन्हें देखना चाहिए कि दिल्ली में ‘आप’ की जीत होने पर अन्य राज्यों में भी यह रणनीति दोहराई जाएगी। तब साथी भाजपा को हराने के लिए ‘आप’ को जिताने का आग्रह करेंगे। इस प्रक्रिया में नवउदारवाद का विरोध करने वाली पार्टियों, भले ही उनकी धर्मनिरपेक्ष साख कितनी ही हो, को चुनाव के मैदान से बाहर रहना होगा। इस तरह धर्मनिरपेक्षता किनारे होती जाएगी और नवउदारवादी-सांप्रदायिक ताकतों का गठजोड़ नए रूप में ज्यादा मजबूत होता जाएगा। तब भाजपा और ‘आप’ के नेता अडवाणी और मनमोहन सिंह की तरह कह सकते हैं कि देष में ये दो पार्टियां ही होनी चाहिए। नवउदारवाद की अंधी छलांगों से अगर देष का नक्षा आमूल-चूल बदलेगा तो राजनीति का नक्षा भी आज जैसा नहीं रहेगा। ‘आप’ के समर्थन का आग्रह करने वाले धर्मनिरपेक्ष साथियों को इस पर गंभीरता से विचार कर लेना चाहिए। कुछ धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने यह सोच कर ‘आप’ को समर्थन दिया है कि दिल्ली में ‘आप’ के हाथों भाजपा की हार होने से उनके राज्यों में उनकी पार्टियों की जीत की संभावना मजबूत हो जाएगी। उन्हें भी अपने फैसले के दूरगामी परिणाम पर विचार करना चाहिए। 

दरअसल, धर्मनिरपेक्षता जैसे संविधान सम्मत मूलभूत मूल्य को लेकर फुटकर व्यवहार नहीं चल सकता। वह मुकम्मल व सर्वस्वीकृत बना रहे, इसके लिए नई राजनीति की जमीन तैयार करते रहना होगा। ऐसी राजनीति का कोई भविष्य नहीं है, ऐसा कहने वाले साथियों को इतना ध्यान जरूर देना चाहिए कि उसी राजनीति से धर्मनिरपेक्षता का भविष्य बना रह सकता है। 

धर्मनिरपेक्षता की कसौटी केवल यह नहीं हो सकती कि भाजपा के खिलाफ मुसलमानों के वोट कौन ले जाता है? न ही यह कि फलां व्यक्ति विचार से सांप्रदायिक नहीं है। नरेंद्र मोदी का चुनाव प्रचार करने वाली मायावती, कल्याण सिंह के साथ मिल कर सरकार बनाने वाले मुलायम सिंह यादव, भाजपा के साथ लंबे समय तक गठबंधन चलाने वाले जन (यू) के नेतागण, भाजपा के साथ समय-समय पर सरकार चलाने वाले नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू, करुणा निधि, ओमप्रकाष चैटाला, ममता बनर्जी, जयललिता आदि नेताओं को वैचारिक रूप से धर्मनिरपेक्ष ही कहा जाएगा। लेकिन हम उनकी आलोचना करते हैं कि वे सत्ता के लिए सांप्रदायिक राजनीति करते हैं। राजनीतिक आचरण धर्मनिरपेक्षता की कसौटी होता है। भारत में सांप्रदायिकता के बरक्स धर्मनिरपेक्षता के संघर्ष की लंबी परंपरा है। उस संघर्ष में गांधी की हत्या भी हो जाती है। लेकिन मजेदारी देखिए केजरीवाल सांप्रदायिक तत्वों के साथ जितनी और जैसी सांठ-गांठ करें, धर्मनिरपेक्षतावादी उन्हें कुछ नहीं कहते। उल्टा उन्हें धर्मनिरपेक्षता का रक्षक बताते हैं। 

अब जबकि यह साफ हो चुका हे कि ‘आप’ वास्तव में राजनीतिक पार्टी न होकर, चुनाव जीतने के लिए जुटे निपट सत्ता-स्वार्थी लोगों का गिरोह है, कई बार अपनी पार्टियों की कीमत पर साथी केजरीवाल का बचाव करने को तैयार नजर आते हैं। इसे केजरीवाल की बड़ी कामयाबी कहा जाएगा कि धर्मनिरपेक्षतावादी उनके सौ खून माफ करने को हमेषा तैयार हैं। जबकि वे हमारे जैसे सामान्य कार्यकर्ता को कलम, जबान या आचरण की जरा-सी चूक पर तंदूरी मुर्गे की तरह मार कर लटका देंगे!

‘आप’ का समर्थन करने का दबाव बनाने वाले साथियों की पृष्ठभूमि विचारधारात्मक प्रतिबद्धता की रही है। जबकि ‘आप’ खुले बाजार की खुली पार्टी है। विचारधारात्मक और संगठनात्मक बंधन उस पर आयद नहीं होते। राजनीतिषास्त्र के एक विद्वान ने ‘आप’ को विचारधारा की कसौटी पर कसने वाले ‘विचारधारात्मक योद्धाओं’ (आइडियोलोजिकल वारियर्स) की अपने एक लेख में कड़ी खबर ली थी। और भी कई विद्वान ‘आप’ के सहयात्री बने हुए हैं। विचारधाराविहीन राजनीति का यह ‘आदर्ष प्रयोग’ उन्हें सांप्रदायिकता समेत सभी समस्याओं के लिए रामबाण नजर आता है। हैरत की बात है कि वे यह देखने-सुनने को कतई तैयार नहीं हैं कि मौजूदा प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार को पूर्ण बहुमत से कायम करने में इस ‘आदर्ष प्रयोग’ ने निर्णायक भूमिका निभाई है। राजनीतिषास्त्र व अर्थषास्त्र के विद्वान भी राजनीतिक मानस से रहित हो सकते हैं! दरअसल, अपने को विचारधारा-मुक्त कहने वाले आज की प्रचलित विचारधारा कारपोरेट पूंजीवाद के समर्थक होते हैं। जब से ‘आप’ बनी है यह विवाद होता रहता है कि कौन किसका मोहरा है। भाजपा की सीएम उम्मीदवार बनने पर किरण बेदी को मोदी का मोहरा बताया गया है। हकीकत में ये सब नवसाम्राज्यवाद के मोहरे हैं।

इस ‘आदर्ष प्रयोग’ ने करीब दो दषक के वैकल्पिक राजनीति की अवधारणा और संघर्ष को दो-तीन साल में ही बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया है। हो सकता है धर्मनिरपेक्षतावादी साथी इसे कोई बड़ा नुकसान नहीं मानते हों, यह मान कर कि इसकी भरपाई कर ली जाएगी। लेकिन उनकी धर्मनिरपेक्षता की चिंता भी सच्ची नजर नहीं आती। यह सही है कि सेकुलर कह जाने वाली पार्टियों ओर नेताओं ने धर्मनिरपेक्षता के मूल्य को छलनी कर दिया है। वे इस कदर अपनी साख गंवा चुके हैं कि मोदी/षाह देष-विदेष में सरेआम उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। केजरीवाल नवउदारवाद का पक्ष ले या सांप्रदायिकता का - उसे धर्मनिरपेक्षतावादियों का अभय प्राप्त है। नवउदारवाद और सांप्रदायिकता के गठजोड़ की राजनीति में जगह बनाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। उसे पता है उसे कोई कुछ नहीं कहेगा। अलबत्ता, सांप्रदायिक ताकतों को रोकने के नाम पर केजरीवाल के समर्थन का आग्रह करने वाले एक दिन अपनी साख गंवा बैठ सकते हैं।

Sunday, January 4, 2015

भारतरत्‍न – चर्चा में विवेक का अभाव

(भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है और आरएसएस अपना एजेंडा लागू करने में पूरे जोशोखरोश से लगा है। ऐसी स्थ्‍िाति में भाजपा के वरिष्‍ठतम नेता वाजपेयी को देश का यह सर्वोच्‍च सम्‍मान मिलना तय था। लेकिन क्या इन पुरस्कारों की चर्चा में कहीं विवेक देखने को मिला -राजेश कुमार)
देशी-विदेशी बडे पुरस्‍कार मिलने पर भारतीय उपमहाद्वीप में अतिरंजनापूर्ण प्रतिक्रियाएं होती हैं। वह भी चरम पर पहुंची हुई। पुरस्‍कार पाने वाला व्‍यक्ति एक सिरे से उपलब्धियों का पिटारा और महानता का शिखर मान लिया जाता है। ऐसा ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारतरत्‍न मिलने पर हो र‍हा है। जिधर देखो उनकी महानता का अतिरंजनापूर्ण गुणगाण हो रहा है। पिछले दिनों पाकिस्‍तान में जमातउद दावा के अध्‍यक्ष हाि‍‍फज सईद से मिलने पर सुर्खियों में आए एक वरिष्‍ठ पत्रकार ने तो यहां तक कह डाला है कि वाजपेयी को यह पुरस्‍कार मिलने पर भारतरत्‍न सम्‍मानित हुआ है। प्रशंसा और निंदा में हमारी अतिरंजनाओं का कोई अंत नहीं रहता है। विषय पर विवेकसम्‍मत चर्चा करना हम भूलते जा रहे हैं।     
भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार है और आरएसएस अपना एजेंडा लागू करने में पूरे जोशोखरोश से लगा है। ऐसी स्थ्‍िाति में भाजपा के वरिष्‍ठतम नेता वाजपेयी को देश का यह सर्वोच्‍च सम्‍मान मिलना तय था। पिछली एनडीए सरकार के समय संसद में सावरकर के चित्र की स्‍थापना से लेकर मौजूदा सरकार के वाजपेयी को भारतरत्‍न देने तक कट्टरतावादी और पुराणपंथी ताकतों ने भारत के राजनीतिक इतिहास में लंबा सफर तय किया है। पराधीनता के दौर में उपनिवेशवाद औेर स्‍वतंत्रता के दौर में नवसाम्राज्‍यवाद का समर्थन करने वाली इन ताकतों की यह उपलब्धि कही जा सकती है। और स्‍वतंत्रता आंदोलन व संविधान के मूल्‍यों में विश्‍वास करने वालों के लिए सबक।      
इस मौके पर डॉ प्रेम सिंह की पुस्तिका ‘मिलिए योग्‍य प्रधानमंत्री से’ (2004) की चर्चा होनी चाहिए थी जिसमें वाजपेयी के राजनीतिक व्‍यक्तित्‍व और विचारधारा की पडताल की गई है। पुस्तिका में संकलित सभी लेख ‘जनसत्‍ता’ में प्रकाशित हुए थे और हमारी पुस्‍तक ‘कट्टरता जीतेगी या उदारता’ (राजकमल प्रकाशन) में भी शामिल हैं। उस समय भाजपा ने स्‍वदेशी का मुखौटा लगा कर नवउदारवादी नीतियों को आगे बढाया था। आज उसने वह मुखौटा उतार कर फेंक दिया है। पिछले कार्यकाल में उसने अमेरिका के साथ सघन रिश्‍ते भी कायम किए थे जो मौजूदा सरकार का एक मात्र ध्‍येय बन गया है। उसी का नतीजा है नवउदारवादी व्‍यवस्‍था के शीर्षस्‍थ नेता अमेरिका के राष्‍ट्रपति बराक ओबामा हमारे गणतंत्र दिवस के मुख्‍य मेहमान हैं।  
वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में ही गुजरात कांड हुआ था। उपर्युक्‍त पुस्तिका के साथ डॉ प्रेमसिंह की एक और पुस्तिका ‘गुजरात के सबक’ प्रकाशित हुई थी। उसमें गुजरात सरकार और उस समय के मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी के बचाव में वाजपेयी की भूमिका को तथ्‍यों की रोशनी में उजागर किया गया है। संसद में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के ‘दर्शन’ की बतौर प्रधानमंत्री प्रशंसा करने वाले वाजपेयी को भारतरत्‍न मिलने पर भावनाओं में बहने के बजाय उनके राजनीतिक व्‍यक्तित्‍व और विचारधारा पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। उसमें उपर्युक्‍त दो पुस्तिकाएं सहायक हो सकती हैं।     
वाजपेयी के साथ स्‍वतंत्रता सेनानी मदनमोहन मालवीय को भी भारतरत्‍न दिया गया है, हालांकि उनकी खास चर्चा नहीं हो रही है। वाजपेयी के साथ मदनमोहन मालवीय को पुरस्‍कार देकर आरएसएस-भाजपा मदनमोहन मालवीय के साथ अपना जुडाव दिखाना चाहते हैं। वास्‍तविकता में ऐसा नहीं है। मदनमोहन मालवीय स्‍वतंत्रता आदोलन की विचारधारा के साथ थे और आएसएस उसके विरोध में था। 
वाजपेयी ने भारत छोडो आंदोलन में क्रांतिकारियों की मुखबरी की थी, इस आरोप पर संघियों का कहना होता है कि वह काम बडे पैमाने पर कम्‍युनिस्‍टों ने भी किया था। अरुण शौरी ने इस विषय पर ‘दि ओन्‍ली फादरलैंड’ शीर्षक से एक किताब ही लिखी है। इसे उनकी पुस्‍तक ‘वर्शिपिंग फाल्‍स गॉडस’ की पूर्वपीठिका कहा जा सकता है। इस पुस्‍तक के लेख पहले ‘इलस्‍ट्रेटेड वीकली’ में प्रकाशित हुए थे। कम्‍युनिस्‍ट नेतृत्‍व ने तब जवाब दिया था कि उनकी पार्टी भारत छोडो आंदोलन में अपनी भूमिका के लिए उसी समय माफी मांग चुकी है। वाजपेयी के समर्थन में संघी यह भी कहते हैं कि वाजपेयी की उम्र उस समय बहुत कम थी। हम सब जानते हैं पुलिस की गोली से मारे जाने वाले या फांसी चढने वाले कई क्रांतिकारी वाजपेयी जितनी उम्र के ही थे। क्‍या आरएसएस और वाजपेयी को आजादी के आंदोलन के प्रति दगाबाजी के लिए राष्‍ट्र से माफी नहीं मांगनी चाहिए? अगर विवेकपूर्ण चर्चा होगी तो सबसे ऊपर यही सवाल उभर कर आएगा।   

Monday, December 15, 2014

कैसे बचेगी धरती कैसे बचेगी दुनिया? - प्रेम सिंह

 (यह लेख ‘युवा संवाद’ हिंदी मासिक में अक्तूबर 2009 में प्रकाशित हुआ था। नरेंद्र मोदी ने ‘गंगा के बुलावे’ पर बनारस से चुनाव लड़ा और जीता। नई सरकार बनने के बाद से गंगा के सफाई अभियान की चर्चा जोरों पर है। इधर लीमा शहर में जलवायु परिवर्तन पर कई दिन  की चर्चा के बाद कुछ फैसले लिए गए हैं। ऐसे में पांच साल पहले लिखा गया यह लेख पाठकों के लिए फिर से प्रेषित है। आशा है उन्हें लेख प्रासंगिक लगेगा।)

‘गंगा मेरे लिए भारत के स्मरणीय अतीत का प्रतीक है। वह अतीत जो वर्तमान तक बहता चला आया है और भविष्य के सागर की ओर जिसका बहना जारी है।’ - जवाहरलाल नेहरू

गंगा नदी की सफाई पर पिछले दो दशकों में 960 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। यह सरकारी आंकड़ा है। सरकारी से अलग भी कई संगठन और पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध लोग गंगा की सफाई के लिए प्रयास करते रहे हैं। भारत नदियों का धनी देश है। उन नदियों में यहां की सवर्ण आबादी के लिए गंगा का सबसे ज्यादा धार्मिक-आध््यात्मिक महत्व है। लोक और शास्त्र दोनों में ‘पतित पावनी’ गंगा की अनंत महिमा का गान है। स्वाभाविक है कि धार्मिक संगठन और लोग भी गंगा की सफाई के लिए चिंता और प्रयास करते हैं। गंगा नदी के प्रदूषण की समस्या पर कई अध्ययन हुए हैं। इन अध्ययनों में गंगा के बुरी तरह प्रदूषित होने की समस्या के निदान के साथ कुछ समाधन भी सुझाए जाते रहे हैं। लेकिन इतने खर्च, प्रयासों और सुझावों के बावजूद गंगा और ज्यादा प्रदूषित और विषाक्त होती गई है। यह सच्चाई सामने दिखाई भी देती है और सरकारी व गैर-सरकारी सूत्रों से भी पता चलती है। देश की बाकी नदियों का हाल भी कमोबेस गंगा जैसा ही है।
भारत सरकार ने पिछले महीने एक बार फिर गंगा की सफाई के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना बनाए जाने की घोषणा की है। परियोजना ‘राष्टीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण’ (नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथाॅरिटी) के तहत अंजाम दी जाएगी, जिसका गठन प्रधनमंत्री की अध्यक्षता में इस साल फरवरी में हुआ बताया गया है। परियोजना पर अगले 10 सालों में ‘मिशन क्लीन गंगा’ के लिए 15,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। केंद्र और वे राज्य सरकारें मिल कर यह खर्च उठाएंगी जहां से गंगा बहती है - केंद्र 70 प्रतिशत और राज्य सरकारें 30 प्रतिशत। भारत में कोई छोटा या बड़ा काम हो और विश्व बैंक से कर्ज न लिया जाए, वैश्वीकरण के दौर में ऐसा संभव नहीं होता है। लिहाजा, विश्व बैंक से एक अरब डाॅलर यानी 41, 474 करोड़ रुपये का कर्ज मांगा गया, जिसके लिए विश्व बैंक ने सैद्धांतिक सहमति दे दी है। उसमें से 30 लाख डाॅलर की रकम परियोजना की तैयारी के लिए स्वीकृत भी हो गई है। कर्ज संबंधी बाकी का काम दिसंबर में हो जाएगा, जब विश्व बैंक के अध्यक्ष राॅबर्ट जौलिक भारत में होंगे।
यह सब सूचना पर्यावरण और वन मंत्री जयराम रमेश ने ‘राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण’ की 5 अक्तूबर 2009 को प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद पत्रकारों को दी। जाहिर है, प्रधानमंत्री द्वारा ‘राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण’ के गठन और उसके तहत गंगा की सफाई के लिए चलाई जाने वाली परियोजना की घोषणा के पहले ही विश्व बैंक से सौदा हो चुका था। यानी यह परियोजना, जैसा कि जताया गया है, भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय की नहीं है, विश्व बैंक की है। लेकिन हमारे प्रबुद्ध पत्रकारों में से किसी ने प्रधानमंत्री, मंत्री अथवा बैठक में उपस्थित मुख्यमंत्रियों से यह सवाल नहीं पूछा। इससे एक बार फिर पता चलता है, सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह मंडली के नेतृत्व में भारत का प्रधानमंत्री कार्यालय विश्व बैंक जैसी वैश्विक संस्थाओं का एक्सटेंशन कार्यालय बना हुआ है। वह ऐसा अड्डा है जहां भारत के कुछ अमीरों की समृद्धि बढ़ाते हुए एक तरफ देश के संसाधनों को लूटा जा रहा है और दूसरी तरफ देश की जनता पर कर्ज दर कर्ज पोता जा रहा है। भारत के हर क्षेत्र के ज्यादातर हैसियतमंदों को यह स्थिति स्वीकार्य होती जा रही है।
बताया गया है कि इस बार प्रधानमंत्री गंगा की सफाई को लेकर काफी गंभीर हैं। वे बैठकों के लिए ज्यादा समय नहीं दे पाएंगे इसलिए ‘राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण’ के साथ केंद्रीय वित्तमंत्री की अध्यक्षता में अलग से एक स्टैंडिंग कमेटी का गठन किया जाएगा जो जल्दी-जल्दी ‘मिशन’ के कार्यान्वयन की समीक्षा करेगी। एक स्टीयरिंग कमेटी का भी गठन किया जाएगा जो ‘मिशन’ जल्दी पूरा करने के लिए जरूरी विभिन्न परियोजनाओं को जल्दमजल्द स्वीकृति दिलाने का काम करेगी। आजकल देश में जनांदोलन शब्द काफी चल निकला है। उसकी धमक सरकार तक भी पहुंचती है। समस्त सरकारी इंतजाम का बयान करने के बाद मंत्री महोदय ने बताया है कि सरकार का इरादा ‘मिशन क्लीन गगा’ को ‘पीपल्स मिशन’ यानी जन-अभियान बनाने का है। इसके लिए प्राधिकरण में आठ गैर-सरकारी लोग रखे गए हैं। ये जन, अभियान की सामाजिक आॅडिटिंग सहित मूल्यांकन करने और नजर रखने का दायित्व निभाएंगे। उपर्युक्त बैठक की ‘दि हिंदू’ में प्रकाशित खबर में प्राधिकरण में नामित 8 गैर-सरकारी लोगों में से 7 उपस्थित बताए गए हैं। हालांकि उनके नामों और बैठक में व्यक्त विचारों का उल्लेख खबर में नहीं है।   
पर्यावरण मंत्री का कहना है कि इस बार गंगा की सफाई का काम पहले से ज्यादा व्यवस्थित और गंभीर रूप में किया जाएगा। वे पहले से अलग नए तरीके अपनाने की भी बात करते हैं। हालांकि फिलहाल करने के नाम पर बताया गया है कि गंगा किनारे के शहरों की गंदगी और कचरा, जो अभी बड़ी मात्रा में अशोधित रूप में गंगा में गिरता है, उसे शोधित करके गिरने दिया जाएगा। इसके लिए चालू मल-परिशोधन संयंत्रों को और तेज किया जाएगा और गहन प्रदूषण के स्थलों पर नए संयत्र लगाए जाएंगे। कहने वाले कहने के लिए कह सकते हैं कि शहरों की गंदगी और कारखानों का कचरा अगले दस सालों में परिशोधित होकर गंगा में गिरने लगेगा तो क्या उससे गंगा (या कोई दूसरी नदी) साफ मान ली जाएगी?
 गंगाजल की पवित्रता में युगों से आस्था रखती चली आ रही भारत की सवर्ण हिंदू आबादी को उस रूप में कम से कम गंगा को साफ मानने में अभी काफी समय लगेगा। हालांकि इस आबादी ने सदियों से अपने पाप धोते वक्त गंगा के गंदा होने की कभी चिंता नहीं की। शायद वह मानती रही है कि गंगा में धुले पाप उसके पवित्र जल में मिल कर पवित्र हो जाते हैं। चिंता उसे गंदगी और कचरे की भी नहीं है। शायद वह भी सब गंगा में गिर कर पवित्र हो जाता है! तभी न गंगा मैया के प्रदूषण में कमी होती है, न जैकारों में। इस पवित्रतावादी तर्क को हम आगे नहीं बढ़ाना चाहते। वैसे भी लोक में कहावत है, ‘ज्यादा छना पीने की बात करने वाला अंत में गंदा पीता है’। पवित्रता और विशुद्धता के दावे हमेशा से होते हैं और धरे रह जाते हैं। गंगा को पवित्र मानने वाली हिंदू आबादी का हाल सामने है। वह अपनी समस्त धार्मिक विभूतियों और आश्रमों समेत अभी भी गंगा की पवित्रता के नशे में जीती है और गंदा पानी पीती है! 
गंगा की सफाई के नए अभियान पर हमारा अलग सवाल है। लेकिन पहले एक परिघटना की और ध्यान दिलाना चाहते हैं जो नवउदारवादी दौर में उत्तरोत्तर प्रबल होती जा रही है। आजकल पहले की सभी संस्थाओं और नीतियों को निकम्मा और भ्रष्ट बताया जा रहा है और नई संस्थाएं और नीतियां, जाहिर है नवउदारवादी अजेंडे के मुताबिक, बनाने की घोषणाएं की जा रही हैं। इसके लिए हर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम हो रहा है। ज्यादातर वही लोग यह काम कर रहे हैं जो पहले चली आ रही संस्थाओं के भी कर्ता-धर्ता रहे हैं। नौकरशाही तो वही रहती ही है, बुद्धिजीवी भी वही हैं; नेता तो हैं ही। कोई ठहर कर यह नहीं पूछता या विचार करता कि उन संस्थाओं और नीतियों के निकम्मा और भ्रष्ट होने के लिए जो जिम्मेदार हैं, उन्हें पहले कटघरे में लाया जाए। ताकि संस्थाएं आगे निकम्मेपन और भ्रष्टाचार का शिकार न बनें, इसके लिए कुछ सबक हासिल हो सकें। लेकिन नहीं। विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व व्यापार संगठन के आदेश पर नित नई संस्थाओं, नीतियों, परियोजनाओं और कार्यक्रमों की घोषणा हो रही है। कल तक ‘निकम्मी और भ्रष्ट’ संस्थाओं को चलाने वाले बुद्धिजीवी नई रपटें लेकर मंत्रियों और सचिवों के दरबार में हाजिर हो रहे हैं। नए कार्यभार सम्हाल रहे हैं। बल्कि वैसा करने के लिए हमेशा की तरह तरह-तरह के जोड़-तोड़ कर रहे हैं।
दरअसल, भारत में नवउदारवाद की सांस इसी पर टिकी है कि कुछ नया होते दिखना चाहिए। इससे गरीबी और जहालत के नर्क में रहने वाली विशाल आबादी में यह भ्रम बना रहता है कि उनके लिए कुछ हो रहा है। और नवउदारवाद के फायदेमंद चांदी काटने में लगे रहते हैं। हमने यहां यह चर्चा इसलिए चलाई है कि यह जो गंगा साफ करने का अचानक नया ज्वार पैदा हुआ है और उन्हीं में हुआ है जो पिछले 20-25 सालों से ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्राण बोर्ड’, ‘केंद्रीय जल आयोग’, ‘राष्ट्रीय नदी संरक्षण प्राधिकरण (1995) और ‘गंगा एक्शन प्लान’ (1985) जैसी परियोजनाएं और संस्थाएं और पर्यावरण मंत्रालय चलाते रहे हैं। उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि पहले जो काम संपन्न नहीं हुआ, बल्कि बिगड़ा, उसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? रुड़की आईआईटी के उन इंजीनियरों से भी जवाब तलब होना चाहिए जिन्होंने कहा - गंगा और अन्य नदियों में पानी का बहाव बरकरार रहने की कोई जरूरत नहीं है, सारा पानी सिंचाई और पेयजल योजनाओं के लिए निकाल लेना चाहिए, समुद्र में एक बूंद पानी नहीं जाना चाहिए। नदियों में पानी बहते रहना चाहिए, इसके लिए 90 के दशक में सुप्रीम कोर्ट को आदेश जारी करना पड़ा। जनता की गाढ़ी कमाई का धन खाने और बरबाद करने की अगर उन्हें सजा नहीं दी जाती है तो कम से कम नए काम की जिम्मेदारी नहीं दी जानी चाहिए। कम से कम कुछ बुद्धिजीवियों को जनता के साथ किए जाने वाले छल पर मजबूती से सवाल उठाने चाहिए। नए भारत के निर्माण के लिए यह भी एक जरूरी कर्तव्य है। जनांदोलनकारियों को तो ऐसी समितियों से सोची-समझी दूरी बना कर रखनी ही चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। तभी नवउदारवादी अजेंडा इतनी बरबादी करने के बावजूद इतनी आसानी से हर क्षेत्र पर अपनी गिरफ्त बनाता जा रहा है। 
अब हम अपने सवाल पर आते हैं। प्रधानमंत्री का ऐलान है कि जल्दी से जल्दी ज्यादा से ज्यादा आबादी को शहरों में ले आना है। अगर हमें ठीक से याद है तो उनका लक्ष्य 2020 तक, जो उनकी मंडली के मुताबिक भारत के महाशक्ति बनने का वर्ष भी है, 40 प्रतिशत आबादी शहरों में लाई जाएगी। उसके बाद 60 प्रतिशत को शहरों में लाने का काम जारी रहेगा। कहने की जरूरत नहीं, देश की सारी ग्रामीण और कस्बाई आबादी शहरों में लाकर नहीं बसाई जा सकती। अभी ही यह हालत है कि भारत का एक भी बड़ा शहर ऐसा नहीं है जिसमें कुल आबादी के एक-चैथाई हिस्से के लिए नागरिक और प्रशासनिक सुविधाएं उपलब्ध हों। इसके बावजूद मौजूदा शहरों पर आबादी का बोझ बढ़ता जा रहा है। तो फिर तेजी से अनेक नए शहर बनाने होंगे। हालांकि अभी तक मौजूदा छोटे-बड़े शहरों में सीवर की व्यवस्था पूरी नहीं है, यह मान कर चलना होगा कि नए शहरों में लोगों को बसाने के लिए भवन और सीवर की व्यवस्था करनी होगी। शहर के लोग खुले में न रह सकते हैं, न जंगल-जोहड़ जा सकते हैं। भवन बनाने के लिए रेत नदियों से निकालना होगा जो पहले ही अंधाधुंध रेत-खनन (सैंड माइनिंग) से खोखली हो चुकी हैं। गंगा के प्रदूषण का एक प्रमुख कारण 79 से 99 प्रतिशत तक किया जा चुका रेत-खनन है। शहरी लोग खेती नहीं करते लिहाजा शहरी आबादी की नौकरी के लिए हर शहर में कोई न कोई उद्योग लगाने होंगे। जाहिर है, नए शहरों की नगरपालिकाओं की गंदगी और उद्योगों का कचरा नदियों में जाएगा।
गंगा 13452 फुट की उंचाई पर गंगोत्री ग्लेसियर से निकल कर 2525 किलोमीटर का फासला तय करती हुई बंगाल की खाड़ी में जा कर मिलती है। वह पांच राज्यों से होकर गुजरती है जिनमें उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे सघन आबादी वाले राज्य भी हैं। उसके किनारों पर छोटी-बड़ी आबादी वाले 114 शहर बसे हैं। उसकी घाटी में गंगा के पानी और धरती को क्रोमियम कचरे से विषाक्त बनाने वाले कानपुर के कुख्यात चमड़ा उद्योग सहित 132 बड़ी औद्योगिक ईकाइयां हैं। ‘केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ की रपट के अनुसार शहरों की नगरपरलिकाओं की 1.2 बिलियन सीवेज गंदगी और 2.1 बिलियन लीटर औद्योगिक कचरा प्रतिदिन गंगा में गिरता है। प्रधानमंत्री, अथवा जिस आधुनिक औद्योगिक पूंजीवादी-उपभोक्तावादी सभ्यता के वे पुरस्कर्ता हैं, की इच्छित  शहरीकरण की प्रक्रिया में कुछ नए शहर गंगा के किनारे भी बनेंगे। बाकी नदियों और पूरे देश की बात जाने दीजिए, गंगा किनारे के शहरों की गंदगी और औद्योगिक कचरा कहां जाएगा? जाहिर है, गंगा में। फिर और परियोजनाएं बनेंगी, विश्व बैंक से और कर्ज आएगा,  और हजम होगा। इस पूरी प्रक्रिया में देश की ज्यादातर आबादी गंदगी और कचरे का ढेर बनी रहेगी। साथ में गंगा भी। 
हम गंगा की सफाई के अभियान में हिस्सेदारी करने वाले संगठनों और लोगों का सम्मान करते हैं। हम उन विद्वानों और वैज्ञानिकों का भी सम्मान करते हैं जो गंगा व अन्य नदियों समेत पर्यावरण-प्रदूषण के दरपेश संकट की वास्तविकता समझा कर सामने रखते हैं और आगाह करते हैं। हमारा इतना कहना है कि वे अगर इस विकास के साथ हैं तो उनके प्रयास कभी सार्थक नहीं होने हैं। पर्यावरण-प्रदूषण के अध्ययन और उसके प्रति जागरूकता फैलाने के प्रयासों का औचित्य तभी बनता है जब पूंजीवादी-उपभोक्तावादी विकास की धुरी को वैकल्पिक विकास के दर्शन की तरफ अग्रसर करने के प्रयास किए जाएं। वरना यह सारा उद्यम एक छोटी आबादी के ऐश्वर्यपूर्ण किंतु खोखले जीवनस्तर को बनाए और बढ़ाए रखने के लिए हो जाता है। यह नहीं भूलना चाहिए कि पर्यावरण का संकट दुनिया के गरीबों की जान का संकट बना हुआ है। इस विकास के माॅडल के तहत उसके चलाने वालों के साथ उनकी संस्थाओं में बैठ कर समाधन निकालने में हिस्सेदारी करने वाले पर्यावरणविद और वैज्ञानिक गरीबों के मददगार नहीं होते। 
अब शुरू में दिए गए नेहरू जी के उद्धरण पर आते हैं। भारत में ज्यादातर नदियां तीर्थस्थल भी हैं। उनके किनारे पूरे साल छोटे-बड़े नहान (स्नान) व अन्य पर्व चलते रहते हैं। उनमें महीनों तक विशाल संख्या में लोगों का जुटान होता है। इस तरह के नदियों वाले देश के विकास का माॅडल तय करते वक्त नदियों की सफाई के काम को विशेष महत्व दिया जाना चाहिए था। लेकिन नेहरू जी खामखयाली में ज्यादा रहते थे। गोया औद्योगिकरण-शहरीकरण और प्राकृतिक शुचिता और सौंदर्य साथ-साथ चलते रहेंगे! उसी समय डाॅ. लोहिया ने ‘नदियां साफ करो’ का आह्वान किया था। नेहरूवादियों ने पूरी ताकत से उनकी हर बात का विरोध किया। आज भी करते हैं। ‘गंगा एक्शन प्लान’ के निदेशक रहे के. सी. शिवरामकृष्णन का कहना है कि 70 के दशक के अंत तक गंगा सहित भारत की लगभग सभी नदियां गंदा नाला बन चुकी थीं। डाॅ. लोहिया के आह्वान पर ध््यान दिया जाता तो आज समस्या उतनी विकराल नहीं होती।
यह डाॅ. लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष है। सरकार को उससे कोई लेना-देना नहीं है। अगर जरा-मरा भी होता तो, जैसा कि सरकारें करती हैं, इस परियोजना को नदियों के प्रदूषण के प्रति जन-चेतना फैलाने वाले डाॅ. लोहिया के नाम पर कर सकती थी। डाॅ. लोहिया का तमगा पहनने वालों का हाल किसी से छिपा नहीं है। अमेरिका में जिसे ‘पोर्न प्रेजीडेंट’ का नाम अता किया गया, उस बिल क्लिंटन के साथ लखनऊ में नाच-रंग जमाने वाले और परमाणु करार को संसद में पारित कराने के लिए अमेरिका और मनमोहन सिंह सरकार की खुली दलाली करने वाले ‘समाजवादी’ उनके जन्मशताब्दी वर्ष का भी समारोह कर रहे हैं। हमने जन्मशताब्दी वर्ष की शुरुआत के पहले ‘समय संवाद’ में गांधीवादी समाजवादी साथियों से लोहिया जन्मशताब्दी वर्ष के कर्तव्य के रूप में निवेदन किया था कि कांग्रेस और भाजपा की विचारधारा और राजनीति में हजम हो चुके समाजवादियों को छोड़ कर नई शुरुआत करें। लेकिन साथियों को हमारी बात उचित नहीं लगी। हम भारत में गंगा समेत सभी नदियों की सफाई और स्वच्छता की सच्ची इच्छा रखने वाले लोगों और संगठनों से आशा करते हैं कि वे अपना उद्यम गांधी और लोहिया के चितंन से जोड़ेंगे। ताकि प्रकृति और अनेक जीवधारियों सहित बहुलांश मानव आबादी का विनाश करने वाले इस विकास का विकल्प तैयार हो सके।
जलवायु परिवर्तन का संकट
विशेषकर पिछले दो दशकों से दुनिया के स्तर पर जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) नेताओं, नौकरशाहों, वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और विद्वानों के बीच चिंता और बहस का एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे बहुत-से अध्ययन हुए हैं और आंकड़े सामने आए हैं जिनसे पता चलता है कि आधुनिक औद्योगिक विकास की वजह से जलवायु में खतरनाक हद तक परिवर्तन आ गया है। धरती का तापमान बढ़ता जा रहा है। समुद्र तल ऊंचा हो रहा है। ओजोन परत में छेद हो चुका है। ग्लेसियर तेजी से पिघल रहे हैं। जैव विविधता नष्ट हो रही है। अंधाधुंध दोहन और उपभोग से धरती के संसाधनों की सीमा अत्यंत निकट आ पहुंची है। अनावृष्टि, अतिवृष्टि, भूकंप, भूस्खलन, सुनामी जैसी आपदाएं जलवायु परिवर्तन का नतीजा बताई जाती हैं। जल, हवा मिट्टी, खाद्य पदार्थ कहीं कम कहीं ज्यादा मात्रा में प्रदूषित और विषाक्त हो चुके हैं।
ऐसे में जलवायु परिवर्तन पर चिंता और बहस होना स्वाभाविक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधन में और आर्थिक अथवा सामरिक हितों के आधार पर बने देशों के समूहों के बीच जलवायु परिवर्तन की समस्या पर और उससे निपटने के उपायों पर गंभीर विचार-विमर्श होता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1992 में ब्राजील की राजधनी रियो डे जेनेरो मेें बड़ी धूम के साथ पृथ्वी सम्मेलन (अर्थ सम्मिट) आयोजित किया था। उसमें संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश शामिल हुए थे। उसमें जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण ग्रीन हाउस गैसों (जीएचजी) का उत्सर्जन कम करने के लिए ‘यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कनवेंशन आॅन क्लाइमेट चेंज’ (यूएनएफसीसीसी) को स्वीकृति दी गई थी। हालांकि उसकी कोई वैधानिक बाध्यता नहीं थी। पृथ्वी सम्मेलन की अगली कड़ी के रूप में 1997 में जापान के क्योटो शहर में संयुक्त राष्ट्र संघ के ही तत्वावधान में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन हुआ और क्योटो संधि (क्योटो प्रोटोकोल) अस्तित्व में आई। यह संधि यूएनएफसीसीसी का संशोधित रूप है। इसके तहत विकसित औद्योगिक देश 1990 को आधार बना कर 2012 तक जीएचजी में 5.2 प्रतिशत कमी लाने के लिए तैयार हुए। विकासशील देश यह मनवाने में कामयाब रहे कि उत्सर्जन की मात्रा के माप का आधार प्रति व्यक्ति रखा जाए, न कि एक देश में उत्सर्जन की समग्र मात्रा। उदाहरण के लिए चीन, जो उस समय अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्रीन हाउस गैस छोड़ने वाला देश था और अब पहला बन चुका है, अपनी आबादी के आधार पर उत्सर्जन कम करने की शर्त से बाहर हैे। भारत को भी यह छूट मिली है। आस्ट्रेलिया और आइसलैंड जैसे देशों को उत्सर्जन बढ़ाने की छूट भी दी गई। रूस में यथास्थिति रखना तय हुआ।
2005 में रूस के राष्ट्रपति द्वारा दी गई सहमति के बाद प्रभावी हुई इस संधि का वास्तविक प्रतिबद्धता का समय 2008 तक शुरू नहीं हो पाया, जब उसके लक्ष्य-वर्ष - 2012 - में केवल 4 साल बचे रह गए। 2009 तक 183 देश संधि पर अपनी सहमति दे चुके हैं। सहमति बनाने के लिए 2007 में इंडोनेशिया के द्वीप बाली में और 2008 में पोलेंड के शहर पोजनान में संयुक्त राष्ट्र संघ के दो और सम्मेलन हुए। अन्य कई मंचों से भी जलवायु परिवर्तन और उससे निपटने के लिए बनी क्योटो संधि पर चर्चा होती रही है। अमेरिका ने संधि पर दस्तखत तो किए लेकिन आज तक उस पर अपनी सहमति नहीं दी है। हालांकि वह प्रति व्यक्ति के आधर पर सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैस छोड़ने वाला देश है। प्रोटोकोल के समय अमेरिका में बिल क्लिंटन और अल गोर राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति थे। लेकिन वे सीनेट से संधि को स्वीकृत नहीं करवा पाए। आठ साल राष्ट्रपति रहने वाले जाॅर्ज बुश ने दो स्पष्ट आपत्तियां दर्ज करते हुए सहमति से इंकार कर दिया। पहली, चीन और भारत जैसे विकासशील देशों को छूट नहीं दी जानी चाहिए। दूसरी, इसे मानने से अमेरिका की अर्थव्यवस्था की गति धीमी होगी। 2008 में अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, जापान, भारत, चीन और दक्षिण कोरिया ने मिल कर ‘एशिया पेसीफिक पार्टनरशिप आॅन क्लीन डवलेपमेंट एंड क्लाइमेट’ नाम से मंच बनाया है। इसमें सदस्य देशों के लिए कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है, जैसा कि क्योटो संधि में है। इसे अमेरिका की तरफ से क्योटो संधि का जवाब भी बताया जाता है। ये सात देश मिल कर दुनिया की कार्बनडाय आॅक्साइड का आधा छोड़ते हैं।
अब संधि की अवधि के तीन साल बचे हैं। वैज्ञानिक और विशेषज्ञ बताते हैं 1992 से अब तक धरती का तापमान और ज्यादा बढ़ा है। आगामी दिसंबर में डेनमार्क की राजधनी कोपेनहेगन में अगला जलवायु परिवर्तन सम्मेलन होने जा रहा है। पिछले कुछ महीनों से सम्मेलन के अजेंडे और संभावनाओं को लेकर विभिन्न देशों और जानकारों में काफी तेजी से विचार-विमर्श हो रहा है। आर्थिक मंदी के साए में होने वाले इस सम्मेलन में पूंजीवादी दुनिया की ‘आशा के केंद्र’ बराक ओबामा क्या रुख अपनाते हैं, देखना रोचक होगा। अमेरिका यह भी कह सकता है कि जब तक आर्थिक मंदी दूर नहीं हो जाती, तब तक विकसित औद्योगिक देशों पर कोई भी संधि वैधानिक रूप से बाध्यकारी न बनाई जाए। वैसे भी क्योटो संधि की कई तरह की आलोचनाएं सामने आ चुकी हैं।    
हमने यह ब्यौरा इसलिए दिया है ताकि स्पष्ट हो सके कि संकट की भयावहता के बावजूद उससे निपटने के प्रयास ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ की चाल से चल रहे हैं। साथ ही यह भी कि विकास का माॅडल और रास्ता सबका वही है, जिसके चलते संकट खड़ा हुआ है। जाहिर है, जलवायु परिवर्तन की यह चिंता और बहस विकास के प्रचलित माॅडल के दायरे में होती है। ‘क्लीन डवलेपमेंट मेकेनिज्म’, ‘ससटेनेबल डवलपमेंट’, ‘ग्रीन टैक्नोलोजी’ बदलती जलवायु के साथ ‘अडेप्टेशन’ की युक्तियां तलाशने जैसे जो उपाय सुझाए जाते हैं, उनका संकट की विकरालता के मद्देनजर कोई खास अर्थ नहीं बनता है। इसीलिए जलवायु परिवर्तन की समस्या पर विचार-विमर्श के दौरान देशों के भीतर और देशों के बीच स्वार्थों का टकराव चलता है। जो विकसित हो चुके हैं वे और विकास चाहते हैं और जो अभी विकासशील हैं, वे विकसित देशों की तरह विकसित होना चाहते हैं। अमीरों का अमीर देश अमेरिका नहीं चाहता कि उसके नागरिकों का जीवनस्तर जरा भी घटे। जलवायु परिवर्तन से जुड़े सम्मेलनों, प्रस्तावों, संधियों को अपने अनुकूल बनाने की अड़ पकड़ता है। जाॅर्ज बुश ज्यादा बदनाम इसलिए हो गए कि उन्होंने अमेरिका के साम्राज्यवादी चरित्र और लक्ष्य को कुछ ज्यादा ही खुले रूप में प्रदर्शित कर दिया। उसने यह भी खुला कर दिया कि अमेरिकी राजनय पर सैन्यवाद का मजबूत चक्का चढ़ा हुआ है।
क्योटो संधि को अमेरिकी अर्थव्यवस्था धीमी होने के तर्क पर नकारना बुश की साम्राज्यवादी दूरदृष्टि को बताता है। अगर अमेरिकी नागरिकों की आर्थिक हैसियत में कमी आएगी तो साम्राज्यवाद समर्थक अमेरिकी, जो रिपब्लिक और डेमोक्रेटिक दोनों पार्टियों में हैं, साम्राज्यवाद विरोधी अमेरिकी नागरिकों और उसके बाद दुनिया के साथ खड़ा हो सकते हैं। लिहाजा, उनके जीवन की समृद्धि व सुविधाओं को दीर्घावधि नीतियों और योजनाओं के जरिए निरंतर बनाए रखना है। विकसित और अगड़े विकासशील देश भी अमेरिकी रुख के मद्देनजर अपने दांव चलते हैं। चीन के प्रधानमंत्री जिबाओ का कहना है कि अमीर देश अपनी अटिकाऊ जीवन-शैली (अनसस्टेनेबल लाइफ स्टाइल) का त्याग करें। तकनीकी हस्तांतरण और जलवायु परिवर्तन के साथ तालमेल (एडेप्टेशन) बनाने में सहायता के लिए गरीब देशों को अपने जीडीपी का एक प्रतिशत अनुदान दें। उनसे पूछा जा सकता है कि गरीब देशों के अभिजनों की जीवन-शैली क्या टिकाऊ (ससटेनेबल) होती है? चीन ने जिस तरह से अपनी ऊर्जा परियोजनाओं से ग्रीन हाउस गैसों, विशेषकर कार्बनडाय आॅक्साइड, के उत्सर्जन में अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है, क्या वह टिकाऊ विकास और जीवन-शैली के लिए है? और देशों की भी कुछ ऐसी ही कहानियां हैं। आतंकवाद की तरह जलवायु परिवर्तन भी आज एक राजनय बन चुका है।
विकास का यह रास्ता धरती के विनाश से होकर गुजरता है। विकासवादियों को पहले भरोसा था कि धरती के संसाधन खत्म होने के बाद समुद्र और आकाश का दोहन करने को पड़ा है। लेकिन कुदरत का यह नियम आड़े आ जाता है कि पैर धरती पर ही टिक सकता है, चांद और मंगल ग्रह पर नहीं। और धरती संकट में है। इसलिए चैतरफा चिंता और बहस है। लेकिन धरती को बचाने की नहीं, विकास को बचाने की - कैसे, किस तकनीकी से धरती को विकास की धारिणी बनाए रखा जा सके।
पिछले हजारों सालों में पृथ्वी पर मानव और अन्य जीवधारियों ने पहले भी जलवायु परिवर्तन का सामना किया है और अपने को उसके अनुकूल ढाला है। आज भी जलवायु परिवर्तन के साथ ‘अडेप्टेेशन’ की चर्चा होती है। लेकिन उसके साथ यह सच्चाई भी स्वीकार करनी पड़ती है कि इस बार का जलवायु परिवर्तन, जिसने समस्त पारिस्थितिक व्यवस्था को संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है, मानव निर्मित है। इस संकट से पार पाने में हो सकता है वह अपने एक हिस्से को बचा ले जाए। लेकिन बहुत बड़ी मानव आबादी और अन्य जीवधारियों की अनेक प्रजातियों का बचना नामुमकिन है। यह तर्क आने लगा है कि दुनिया की, यानी तीसरी दुनिया की, बढ़ती आबादी जलवायु परिवर्तन का कारण है। इस पर हम कभी फिर विस्तार से बात करेंगे। फिलहाल इतना ही कहना है कि यह तर्क आगे करने वालों की नीयत होती है कि धरती पर गरीब न रहें तो उसका संकट समाप्त हो जाएगा। हमारा कहना है अमीरों को हटा दीजिए, धरती का संकट हट जाएगा। गांधी ने कहा ही है कि धरती के पास सबके लिए पर्याप्त है लेकिन एक भी व्यक्ति के लालच के लिए उसकी संपदा कम पड़ जाती है।
कुछ लोग कहते हैं कुछ लोगों ने फिजूल में प्रलय का हल्ला मचाया हुआ है। कहीं कोई प्रलय होने नहीं जा रही है। सही बात है। भविष्य का कुछ पता नहीं होता है। हो सकता है देर-सबेर जलवायु परिवर्तन से पैदा संकट से निपट लिया जाए। लेकिन यह भी हो सकता है कि विकास की गति को बनाए रखने के लिए भविष्य में और तेजी से मानव आबादियों और अन्य जीवधारियों की प्रजातियों का सफाया किया जाए! भविष्य की बात जाने दें, पूंजीवादी साम्राज्यवाद के अभी तक के दौर में जिन कई करोड़ मनुष्यों और जीव-जंतुओं का संहार हो चुका है, उनके लिए तो प्रलय हो चुकी है। दुनिया की विशाल वंचित आबादी के लिए भी निरंतर प्रलय की स्थिति बनी हुई है। लोक में एक कहावत चलती है, ‘आप मरे जग परलो’। इसे हम थोड़ा बदल कर कहना चाहेंगे, ‘आप तरे जग परलो’। जो लोग अपने जीवन की डोंगी को खेकर किसी तरह पूंजीवादी-साम्राज्यवादी विकास-द्वीप के इनारे-किनारे कहीं लगा लेते हैं, उनके लिए फिर भले ही जगत में प्रलय होती रहे!
इस प्रलय को अगर रोकना है तो विकास की अवधारणा को ही बदलना होगा। मानव जाति के बहुलांश द्वारा अर्जित पर्यावरण संरक्षण के परंपरागत विवेक को विमर्श में जगह देनी होगी। बच्चों के पाठ्यक्रम में भी।

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...