Monday, May 25, 2020

फर्जी राजनीति के दौर में -प्रेम सिंह

(राजनीति का यह दौर फ़र्ज़ी है, जो लोग अब इस बात को मानने पर मजबूर हुए हैं उन लोगों को ये जानना चाहिए कि ये अचानक घटित होने वाली कोई घटना नहीं है। इसके लिए ना केवल सालों से माहौल बनाया जा रहा था, बल्कि संविधान को परे हटाकर हर साजिश को अंजाम देने से भी सियासदान बाज़ नहीं आ रहे थे। इस खेल में हिंदुत्व का राग अलापने वाला संघ परिवार अगर सबसे आगे था तो आज़ादी के आंदोलन की कोख से निकली कांग्रेस के नए नेतृत्व ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। अब तो ख़ैर नवउदारवाद के रथ पर थोड़ी सी जगह हासिल करने की होड़ में लगे क्षेत्रीय क्षत्रपों, तथाकथित समाजवादियों और खुद को आम आदमी का नुमाइंदा बताने वाले घोषित एनजीओबाज भी मैदान में उतर पड़े हैं। डॉ प्रेम सिंह जैसे लोग इस संकट की तरफ लगातार ध्यान दिला रहे थे, लेकिन नव उदारवाद की मृगतृष्णा से मोहित मिडलक्लास का ध्यान भ्रमित करने के कामयाब टोटके भी जारी थे। नतीजा देखते ही देखते फ़र्ज़ी राजनीति अपने चरम पर पहुंच गई। यह लेख 23 अप्रैल 2013 का है. 'युवा संवाद' में प्रकाशित हुआ था. आपके पढ़ने के लिए फिर ज़ारी किया है.)

फर्जी राजनीति का कांग्रेसी घराना

जल्दबाजी में लिखा गया यह समय संवाद’ कुछ ज्यादा तीखा लग सकता है। जिस तरह से नवउदारवाद के भारतीय एजेंटों ने जीवन के हर क्षेत्र पर खुला हमला बोल दिया है और देश के संविधान को ठोकर लगाकर उल्टा शेखी दिखा रहे हैंवैसे में सच्चाई अथवा तथ्यों को सीधे-सीधे रखना जरूरी हो जाता है। हम यह जानते हैं कि तथ्यों की महज छाया को छू कर विश्लेषण करने की बहुप्रचलित शैली है। उसमें व्यक्ति और पदनाम का पूरा लिहाज रखते हुए विश्लेषण किया जाता है। किसी पर कुछ आक्षेप करना भी पड़े तो इशारों से काम लिया जाता है। लेकिन व्यक्ति जब प्रवृत्ति बन जाएं तो उनका उल्लेख करना पड़ जाता है। ऐसे में नामोल्लेख का बुरा नहीं माना जाना चाहिए। फिर भीकिसी को लगता है कि उसकी वह प्रवृत्ति नहीं है, जिससे उसे जोड़ा गया है तो हम पहले ही माफी मांग लेते हैं।

अपने लेखन में हमारा सरोकार बहुत सीमित है। हम नवउदारवाद की राजनीति व विचारधारा की पहचान और समीक्षा करने तथा उसके बरक्स एक वैकल्पिक राजनीति और विचारधारा के निर्माण की पेशकश तक सीमित रहते हैं। यह अलग और पाठकों के विचारने की बात है कि हम यह काम कितना सही रूप में कर पाते हैं। नवउदारवादियों और छद्म नवउदारवादियों की नजर में हमारा लेखन पूरी तरह निरर्थक हो सकता है। लेकिन जो ऐसा नहीं मानतेउन्हें हमारे लेखन में जो कमी या गलती लगती हैध्यान दिलाने पर हम उसमें सुधार के लिए हमेशा तैयार हैं।

यह फर्जी राजनीति का दौर है। राजनीति जब देश के संविधान की पटरी से उतर कर किन्हीं इतर निर्देशों पर चलती है तो उसे फर्जी राजनीति कह सकते हैं। फर्जी राजनीति की परिभाषा करने के बजाय उसका सीधे ब्यौरा देने और व्याख्या करने से बात ज्यादा समझ में आएगी। आइए वही करते हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री पिछले दस सालों से सरकार चला रहे हैं। नब्बे के दशक के शुरू में बतौर वित्तमंत्री नई आर्थिक नीतियों की शुरुआत भी उन्होंने की थी। तब से लेकर अब तक नई आर्थिक नीतियां नवउदारवाद के वृहद संस्करण का रूप ले चुकी हैं। कतिपय छोटी वामपंथी (मार्क्सवादी और समाजवादी दोनों) राजनीतिक पार्टियों को छोड़ करभारत की ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियां मनमोहन सिंह और उनकी मंडली द्वारा शुरू और संस्कारित की गई नवउदारवादी व्यवस्था को विकल्पहीन मान कर उसका अनुसरण करती हैं। एक व्यक्ति के लिए यह कम उपलब्धि की बात नहीं कही जाएगीभले ही नवउदारवाद की वैश्विक संस्थाओं और देश में मौजूद निहित स्वार्थ वाली पूंजीवादी शक्तियों से भरपूर मदद मिली हो। यह मनमोहन सिंह की प्रतिबद्धता’ का ही उत्कर्ष है कि वे बतौर प्रधानमंत्री तीसरी पारी खेलने के लिए तैयार नजर आते हैं।  

सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि मनमोहन सिंह को भारत की एक भी समस्या की शायद ही जानकारी हो। दरअसलवेभला-बुरा जैसा भी हैभारत को जानते ही नहीं हैं। हम भारत के अतीत या मध्यकाल की बात नहीं कर रहे हैंजिसकी समुचित जानकारी के लिए कई तरह की परतों से होकर गुजरना पड़ता है। हम ठेठ आधुनिक काल की बात कर रहे हैंजिसमें करीब200 सालों का उपनिवेशवादी शासन है और उसके खिलाफ भारत के लोगों का संघर्ष है। आजादी के दौर के गांधी युग की बात भी छोड़ दी जाएमनमोहन सिंह आजादी के बाद के नेहरू युग के बारे में भी नहीं जानते। एक बार संसद में जब नई आर्थिक नीतियों के समर्थन में नेहरू को उद्धृत किया जाने लगा तो चंद्रशेखर ने तल्खी के साथ टोका कि खुली अर्थव्यवस्था के समर्थन में नेहरू को उद्धृत न करें। किसी चीज को जान कर नहीं मानना अलग बात होती है। मनमोहन सिंह ऐसी पूंजीवादी मशीन का नाम है जो विश्व बैंकआईएमएफडब्ल्यूटीओ आदि के आदेशों के अलावा वाकई कुछ नहीं जानते। गोया सब कुछ पहले से फीड किया गया है। तभी उन्हें चिंता होती है कि किसान आत्महत्या क्यों करते हैंकोई और काम क्यों नहीं कर लेतेकिसानों की हालत जानने के लिए वे पिपली लाइव’ फिल्म देखते हैं।

इतना ही नहीं है कि मनमोहन सिंह की भारत के बारे में राजनीतिकसामाजिकआर्थिक जानकारी लगभग सिफर हैवे किसी मूल्य अथवा नैतिकता के पचड़े में भी नहीं पड़ते हैं। हर्षद मेहता से लेकर 2जी स्पैक्ट्रम और कोयला आवंटन घोटालों तक से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि नैतिकता की नस उनकी मशीनी संरचना में है ही नहीं। जबकि इन सभी घोटालों में नवउदारवाद का प्रधान एजेंट होने के नाते उनकी परोक्ष-अपरोक्ष भूमिका मानी जाएगी। कोयला विभाग सीधा उनके तहत था और ए राजा बार-बार कह चुके हैं कि उन्होंने जो कुछ किया प्रधानमंत्री के कहने पर किया। क्या आप मान सकते हैं कि नवउदारवाद के पारंगत खिलाड़ी को एक कल का मंत्री गुमराह कर सकता हैभले ही भारत के नागरिक समाज और प्रबुद्ध वर्ग को इस पर अचंभा न होता होऐसा षख्स डंके की चोट पर भारत का प्रधानमंत्री है। वे राज्यसभा में झूठ के बल पर आए थे और लोकसभा का चुनाव एक बार लड़े और हार गए। ये हमारा लोकतंत्र चल रहा है!

मनमोहन सिंह को भले ही खुद नहीं लगता होलेकिन झूठ से उन्हें कोई गुरेज नहीं है। वे उसे बुरी बात नहीं मानते। इस बाबत हम भारत-अमेरिका परमाणु करार की ओर आपका थोड़ा ध्यान खींचना चाहेंगे। उस प्रकरण में मनमोहन सिंह ने मिथ्यात्व केउदात्तीकरण’ की ऐसी बानगी पेश कीजिसकी मिसाल दुनिया में षायद ही कहीं मिले। प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद की गरिमा जितनी इस सौदे में गिरीउतनी कभी नहीं गिरी थी। पिछले कुछ अरसे से संसद की गरिमा पर हायतौबा मचाने वालों ने तब चूं तक नहीं की थी। परमाणु करार प्रकरण पर उस समय हमने विस्तार से लिखा थाजो मिलिए हुकुम के गुलाम से’ पुस्तिका में शामिल है। लोकसभा सांसदों को भी हमने उस लेख की प्रति भेजी थीइस निवेदन के साथ कि अपना मत देने से पहले वह लेख पढ़ लें।   

मनमेाहन सिंह के ऊपर सोनिया गांधी हैं जिनसे किसी जानकारी की अपेक्षा करना  नादानी है। वे देश में प्रधानमंत्री से भी बड़ी ताकत मानी जाती हैं। विदेशि पत्रिकाओं में उनका इस रूप में विरुद छपता है। वे जब से बनी हैंतभी से कांग्रेस की अध्यक्ष हैं और जब तक उनका बेटा वह जिममेदारी नहीं सम्हाल लेताबनी रहेंगी। परिवार को जोड़े रखने और फलने-फूलने के लिए सबके ऊपर एक व्यक्ति की सत्ता माननी चाहिए - सामंत काल का यह मूल्य भारत की आधुनिक’ राजनीति में धड़ल्ले से चलता है। यह भी दुनिया में एक अद्भुत मिसाल है कि देश की सबसे बड़ी पार्टी पूरी तरह से चाटुकारों का जमावड़ा है। सोनिया गांधी का एक बेटा है जिसे पिछले दो दशकों से नेता और देश का प्रधानमंत्री बनाने की कवायद कराई जा रही है। कितने ही कांग्रेसी और विज्ञापन कंपनियां इस परियोजना में लग कर मालामाल होते रहते हैं! 

गांव में जिन दिनों खेती बैलों पर निर्भर रहती थीजवान होने पर बछड़ों को शरीर व दिमाग दोनों से खेती के काम के लिए तैयार किया जाता था। उस प्रक्रिया में बछड़ों के कंधे पर केवल जूआ रख कर रास्तों और खेतों में चलाया जाता था। उस अवधि में वे हिलावड़ बछड़े कहलाते थे। उसी दौरान उन्हें बधिया भी किया जाता था। बछड़ों की थकान दूर करने और शारीरिक शक्ति बढ़ाने के लिए उन्हें बांस की नाल से घी पिलाया जाता था। कुछ दिनों में बछड़ा बैल बन जाता था और हलबैलगाड़ीरहट आदि में जोतने के काम आता था। जो बछड़ा खेती के काम के लिए तैयार नहीं हो पाता थावह सांड़ बन कर रह जाता था। कांग्रेसी सोनिया गांधी के आदेश पर राहुल गांधी को नेता बनाने पर पिले हैं। बड़ा घराना है - भारत का प्रथम राजनीतिक परिवार! - तो मीडिया घराने भी सब कुछ लाइव दिखाते हैं। लेकिन वे देश की बात छोडिएइतने सालों बाद कांग्रेस के भी किसी काम के नहीं बन पाए हैं। उनका आगे क्या होगा यह खुद कांग्रेसियों को नहीं मालूम है। कोई बड़ा राजनीतिक पंडित उनके भविष्य के बारे में बता सकता है।

कांग्रेसी जब कहते हैं राहुल जी देश की नस-नस जानते हैं तो उसका अर्थ होता हैवे कुछ नहीं जानते। यह सच्चाई ऐसा कहने वाले कांग्रेसी भी जानते हैं। एक बार राय बरेली में एक कांग्रेसी कार्यकर्ता युवक ने राहुल गांधी से अपना नाम पूछ लिया तो वह भी वे नहीं बता पाए। यह जरूरी नहीं है नेता को हर कार्यकर्ता का नाम पता हो या याद रहे। लेकिन जब देश कोउसकी युवा शक्ति को जानने और दिशा  देने के के ऊंचे दावे किए जाते हों तो ऐसे वाकये पोल खोल देते हैं। कांग्रेसी राहुल गांधी को देश का भविष्य बताने और बनाने पर तुले हैं। क्योंकि राहुल गांधी के भविष्य में उनका खुद का भविष्य सुरक्षित है। देश की आजादी के साथ जिस पार्टी का नाम जुड़ा होउसका यह हाल है - वह एक फर्जी राजनीतिक पार्टी बन कर हर गई है! 

फर्जी राजनीति का संघी घराना

जहां तक नवउदारवाद की स्वीकृति का मामला हैभारत की मुख्यधारा राजनीति में कोई विपक्ष नहीं है। नवउदारवाद के पक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है ओर दूसरे नंबर की भाजपा है। बाकी के दल कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए और भाजपा की अगुआई वाले एनडीए में शामिल हैं तथा मौका देख कर इन गठबंधनों के बीच आवाजाही करते रहते हैं। उनके इस चलन से कांग्रेस और भाजपा दोनों परेशानी का अनुभव करते हैं। इसीलिए मनमोहन सिंह और लालकृष्ण अडवाणी कहते हैं कि देश में कांग्रेस और भाजपा दो पार्टियां रहनी चाहिए। भाजपा प्रमुख विपक्षी पार्टी इस नाते है कि वह नवउदारवाद के पक्ष में दूसरे नंबर की बड़ी पार्टी है और सांप्रदायिक राजनीति में अव्वल नंबर की। वह आगे आएगी तो कांग्रेस को दूसरे नंबर पर जाना होगा। संघ/भाजपा का मानना है कि वे इस देश के बारे में बखूबी जानते हैंखास कर उसके महान’ अतीत के बारे में। वे अतीत पर इस कदर मोहित रहते हैं कि आजदी के संघर्ष में हिस्सा लेकर अपना मोहभंग’ करना उन्होंने गवारा नहीं किया! अतीत के प्रेमियों को वर्तमान में कैद’ नहीं होना चाहिएइसलिए यरवदा जेल से आरएसएस प्रमुख बाला साहेब देवरस ने इंदिरा गांधी को चिठ्ठियां लिखीं कि आरएसएस से प्रतिबंध हटा लिया जाए और उसके स्वयंसेवकों को रिहा कर दिया जाए तो वे राष्ट्रीय उत्थानके काम में सरकार के आदेश का पूरी तरह पालन करेंगे।

भाजपा के सक्रिय नेताओं में लालकृष्ण अडवाणी शीर्षस्थ हैं। देश के सामने जो भी समस्याएं होंभले ही हाहाकार मचा होउन्हें केवल संघियों के आत्म-गौरव की फिक्र खाए जाती है। उन्होंने अभी कहा है कि भाजपा के नेता-कार्यकर्ता राममंदिर आंदोलन पर गर्व अनुभव करें। जाहिर हैउस आंदोलन की पूर्णाहूति बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद दंगों में मारे गए निर्दोष नागरिकों पर भी गर्व करना है। उस दौरान जो भाले-बरछे लहराए गएमुसलमानों को गालियां दी गईंवे भी सब गर्व करने की बातें हैं। आजकल उनकी नरेंद्र मोदी से रेस चल रही है। शायद वे कहना चाहते हैं कि हिंदुत्ववादी गर्व के मामले में उनका कद/काम मोदी से कहीं बड़ा है। उन्होंने पूरे देश में जो गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ की पुकार लगाई थीउसके सामने एक प्रांत का गौरव भला कहां ठहरता है! कहना न होगा कि जो राममंदिर आंदोलन पर गर्व नहीं करतेवे अडवाणी के भारत में नहीं आते। पूरा जीवन राजनीति करने के बाद 85 साल के नेता की यह समझ है!

फर्जीपन का रोग इलाकाई क्षत्रपों को भी लग चुका है। मुलायम सिंह अडवाणी के नए प्रशंसक बन कर सामने आए हैं। अपने बेटे को जीते-जी मुख्यमंत्री बना कर भी वे संन्यास लेने के मूड में नहीं हैं। खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं और बाकी रिश्तेदारों को भी ऊंचे ओहदे दिलवाना चाहते हैं। संघ के शत्रुओं की फेहरिस्त में एक समय टॉप पर रहे मुलायम सिंह यह मान बैठे हैं कि अडवाणी प्रधानमंत्री की रेस से बाहर हैं और उनकी कुछ मदद कर सकते हैं। उन्हें शायद जार्ज की तरह मुगालता है कि संघ परिवार प्रधानमंत्री के लिए उन्हें आगे कर सकता है। वे भूलते हैं कि संघ परिवार देश के सबसे बड़े यानी हिंदू परिवार’ की राजनीति करता हैन कि मुलायम सिंह की तरह अपने परिवार की।

मुलायम सिंह कहते हैं अडवाणी जी ने विभाजन के चलते बहुत सहा है। देश का विभाजनजिसमें अडवाणी की पितृसंस्था की भी बड़ी भूमिका थीएक ऐसी त्रासदी थी जिसकी मिसाल दुनिया में अभी तक नहीं मिलती। विभाजन के दौरान असंख्य लोग तबाह हुए। 10 लाख लोग मारे गए। मनुष्यता की सारी हदें टूट गईं। उस दौरान अडवाणी ने भी बहुत कुछ सहा हो सकता है। इसके लिए उनके प्रति सहानुभूति भी होनी चाहिए। लेकिन सवाल है कि उन्होंने सबक क्या सीखाएक नेता के नाते वे सांप्रदायिकता की राजनीति को हमेशा के लिए खत्म करने की भूमिका ले सकते थे। लेकिन उन्होंने पूरा जीवन सांप्रदायिकता बढ़ाने में लगा दिया और आज भी वही कर रहे हैं।

अनेक लोगों ने आजादी के संघर्ष और आजादी के बाद भी बहुत सहा है। तभी देश को आजादी मिलीजिसे नवउदारवादियों ने खतरे में डाल दिया है। मुलायम सिंह अडवाणी के दुखों पर द्रवित होते वक्त लोहिया का ही उदाहरण सामने रख लेतेजिन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लाहौर किले में अमानुषिक यातनाएं दी गई थीं। आजादी के बाद वे सबसे ज्यादा बार जेल में डाले जाने वाले नेता थे। जेल जाना लोहिया के राजनीतिक संघर्ष का अविभाज्य हिस्सा था। लिहाजाउन्होंने कभी इसकी शिकायत नहीं की। लेकिन एक बार उन्हें कहना पड़ा कि नेहरू की पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी में अंग्रेजों की पुलिस को पीछे छोड़ दिया।

अडवाणी आजादी के आंदोलन में हिस्सेदार नहीं थे कि उन्हें कुछ सहना पड़ता। वे सिंध इलाके से सुरक्षित और सुभीते से पाकिस्तान से भारत आए। कराची में वे पहले से आरएसएस के सदस्य थे और 1947 में आरएसएस के सचिव चुने गए थे। तभी आरएसएस की तरफ से उन्हें दंगों का जायजा लेने के लिए राजस्थान भेजा गया था। 1951 में जब जनसंघ का गठन हुआ तो वे उसके सदस्य बन गए। उन्होंने बैठे ठाले की हिंदुत्ववादी राजनीति की हैजिसमें अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ बयान देने के अलावा कुछ करने की जरूरत नहीं होती। ज्यादा कुछ करना हो तो पाकिस्तान की कड़े शब्दों में भर्त्सना कर दो। आगे हम देखेंगे कि यही अडवाणी संघ/भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। 

भाजपा में अडवाणी के बाद अब नरेंद्र मोदी का नाम आता है। नरेंद्र मोदी की चर्चा का बाजार आजकल काफी गरम है। उनका बोलना सुनें तो रामदेव की तरह उनके पास हर मर्ज की दवा है। किसी भी सवाल के जवाब में उन्हें रामदेव की तरह ही सोचने-विचारने के लिए पल भर भी रुकना नहीं पड़ता। वे जताते हैं कि मनमोहन सिंह कुछ नहीं जानते और वे सब कुछ जानते हैं। जाहिर हैजानने से उनका मतलब बोलने से होता है। यानी मनमोहन सिंह कुछ नहीं बोलते तो कुछ नहीं जानतेनरेंद्र मोदी खूब बोलते हैं तो सब कुछ जानते हैं। लेकिन वाचालता उन्हें मनमोहन सिंह से बड़ा नहीं बना देती। मनमोहन सिंह असली फर्जी हैंजिनके सामने नरेंद्र मोदीकारपोरेट जगत की लाख अभ्यर्थना करने के बावजूदहमेशा नकली फर्जी रहेंगे।

कह सकते हैं कि अडवाणी अगर वाजपेयी के बिगड़ैल संस्करण हैं तो नरेंद्र मोदी अडवाणी के। नरेंद्र मोदी पर कुछ विस्तार से चर्चा करते हैं। वे अडवाणी से अलग अपनी एक योग्यता - कारपोरेट घरानों को रिझाने की कवायद - का जम कर प्रदर्शन कर रहे हैं कि कारपोरेट जगत उन्हें अपना उम्मीदवार बना ले। कारपोरेट जगत कभी कच्ची गोली नहीं खेलता। वह पूरी गारंटी चाहेगा कि भाजपा का भविष्य का यह नेता पार्टी को छुटभैये व्यापारियों की हित-पोषक नहीं बनी रहने देगानवउदारवादी फैसलों को पूरी तरह और तेजी से लागू करेगा।

मीडिया नरेंद्र मोदी का पूरा साथ दे रहा है। मीडिया की चर्चा में वही शख्सविचारघटना रहती है जिसकी नाल नवउदारवाद के साथ जुड़ी हो। भारत का मुख्यधारा मीडिया हर उस शख्स अथवा आंदोलन को सिर पर उठा लेता हैजो परोक्ष-अपरोक्ष तौर पर कारपोरेट पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने और मजबूत बनाने का काम करते हैं। ऐसा करते वक्त भले ही वे सांप्रदायिकताजातिवादपरिवारवाद-वंशवादक्षेत्रवाद आदि को बढ़ावा देते हों और अंधविश्वास व अपसंस्कृति फैलाते हों। नब्बे के दशक की शुरुआतजब संविधान की अवहेलना करके देष की अर्थव्यवस्था को कारपोरेट पूंजीवाद के षिकार के लिए खोला गयामीडिया का यह चरित्र बनने लगा और पिछले एक दशक में परवान चढ़ चुका है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर मोदी के अंध समर्थन तक उसकी यह भूमिका देखी जा सकती है। राजनीति फर्जी होगी तो मीडिया भी फर्जी होता जाएगा।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के एक अगुआ और बाजारवाद के बाबा रामदेव ने हाल में खुल कर भाजपा नेतृत्व को सलाह दी है कि वह मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाए। पिछले दो सालों में देश की जनता यह देख चुकी है कि रामदेवअन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल कावर्चस्व की आपसी लड़ाई के बावजूदएक ही घराना है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान तीनों घी-शक्कर थे और आंदोलन की समाप्ती के उपरांत भी तीनों के तार कई तरह से आपस में जुड़े हुए हैं। सभी ने देखा कि गुजरात का चुनाव मोदी ने तीसरी बार आसानी से जीत लियालेकिन इन तीनों बड़बोलों में से किसी ने उस चुनाव में मोदी के खिलाफ चुंकार तक नहीं की। स्वाभाविक है कि मीडिया को ये तीनों नरेंद्र मोदी की तरह ही प्यारे हैं। 

मीडिया में मिली तेज उछाल से नरेंद्र मोदी पूरे उत्साह में है। उनका उत्साह और बढ़ जाता है जब यूरोप और अमेरिका को उनमें दूसरा मनमोहन सिंह नजर आने लगता है। वे यूरोपियन यूनियन के कारकूनों के साथ मुलाकात और खान-पान करते हैं। मीडिया सारी घटना को इस तरह परोसता हैमानो वे लोग आधिकारिक तौर पर भारत के भावी प्रधानमंत्री’ से मिलने आए हों। यह सच्चाई जनता की निगाह से छिपा ली जाती है कि वह मुलाकात मोदी और उनके हिमायती गुट द्वारा प्रायोजित थी। सामदामदंडभेदछलकपटझूठफरेबषड़यंत्र - आरएसएस के हिंदुत्व में सब कुछ चलता है। 

कुछ बुद्धिजीवियों को यह देख कर सदमा लगता है कि दुनिया को लोकतंत्रधर्मनिरपेक्षतामानवाधिकारकानून का शासनसबको समान न्याय आदि का पाठ पढ़ाने वाला अमेरिका और यूरोपियन यूनियन भला नरेंद्र मोदी का समर्थन कैसे कर सकते हैंपश्चिमी ज्ञान-विज्ञान की परंपरा में पगे ये भले लोग आज भी मानने को तैयार नहीं हैं कि यूरोप और अमेरिका की ये चिंताएं खोखली हैं। मुनाफा और वर्चस्व बनाए रखने के लिए वे एक से बढ़ कर एक तानाशाह और कातिल को अपना समर्थन देते रहे हैं। बसउनके आर्थिक और सामरिक वर्चस्व को बाकी दुनिया में चुनौती नहीं मिलनी चाहिए। अगर कोई वैसी हिमाकत करता है तो उसे नेस्तनाबूद कर दिया जाता है। हम यह इसलिए कह रहे हैं कि फर्जी राजनीति और आंदोलन को फर्जी मीडिया किस तरह से परोसता है और फर्जी नागरिक समाज किस तरह लौकता है।  
भारत समेत ज्यादातर तीसरी दुनिया के लोगों ने अपने हाल और मुस्तक्विल के बारे में खुद सोचना और फैसले लेना बंद कर दिया है। हमारे सारे फैसले यूरोप और अमेरिका में लिए जाते हैं। भारत में हम केवल अपना धर्मजाति और इलाका निभाते हुए उन फैसलों के नीचे जीते-मरते हैं। भारत के कारपोरेट घरानों और यूरोप-अमेरिका का नरेंद्र मोदी के समर्थन का मंसूबा साफ है - भारत के सभी राज्य गुजरात मॉडल’ की रोशनी में अपना विकास करेंयानी संविधान को पीछे और कारपोरेट घरानों और यूरोप-अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आगे रख कर चलें। उन्हें इससे एक और फायदा है। कारपोरेट पूंजीवाद जितना बढ़ेगाहिंसक प्रतिरोध भी उतना ही बढ़ेगा। (क्योंकि कारपोरेट पूंजीवाद के उत्पाद एनजीओ और सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट वास्तवकि राजनीतिक प्रतिरोध की जमीन तैयार नहीं होने देते। उन्होंने मिल कर अब आम आदमी के नाम पर एक राजनीतिक पार्टी ही बना ली है।) हिंसक प्रतिरोध को दबाने के लिए विदेशी कंपनियों का सुरक्षा बलों व खुफिया एजेंसियों को विषेषज्ञतातकनीकउपकरण और हथियार बेचने का मुनाफे का सौदा तेज होगा।

कहने की जरूरत नहीं कि नरेंद्र मोदी का बहुप्रचारित गुजरात मॉडल’ हिंदुत्व की प्रयोगशाला में ढल कर निकला है। गुजरात मॉडल’ फैलेगा तो कट्टरपंथ भी फैलेगा। उससे निपटने के लिए भारत की सरकारों को और उपकरणों और हथियारों की जरूरत होगी। कट्टरपंथियों को भी उपकरण और हथियार चाहिए होते हैं। नवसाम्राज्यवादी निजाम वह खुशी-खुशी उपलब्ध कराएगा। कट्टरपंथियों को हथियारों की ऐसी चाट लगा दी गई है कि वे अपने शरीरों को भी हथियार बना लेते हैं। यह पूंजीवादी निजाम दो मजबूत पहियों पर चलता है - बाजार और हथियार। नरेंद्र मोदी दोनों की गारंटी देने के लिए कारपोरेट घरानों और यूरोपी-अमेरिकी नेतृत्व के सामने कठपुतली की तरह नाच रहे हैं। इस कदर कि विदूषक लगने लगे हैं। मनमोहन सिंह को कारपोरेट पूंजीवाद का रोबो (मशीन) कहा जा सकता है तो नरेंद्र मोदी की छवि कारपोरेट पूंजीवाद के विदूषक की बनी  है।

हमने कुछ महीने पहले लिखा था कि आरएसएस एक सोची-समझी रणनीति पर काम कर रहा हो सकता है। नरेंद्र मोदी को वह इसीलिए टिटकारी दिए हुए है कि वह संघ परिवार का भविष्य का राष्ट्रीय नेता है। पिछले 20-25 सालों का नवउदारवादी दौर आरएसएस को सबसे ज्यादा फला है। इस बीच कारपोरेट-सेवी युवाओं की जो फसल तैयार होकर आई हैवह ज्यादातर अंधविश्वासी और सांप्रदायिक है। उसका भारत के संविधान और आजादी के संघर्षऔर सह-अस्त्तिव की विरासत से कोई वास्ता नहीं है। भारत को अमेरिका बनना चाहिएबल्कि वह जल्दी ही एक दिन बनेगाऐसा उसका दृढ़ (अंध)विश्वास है। नरेंद्र मोदी इसी फसल के स्वाभाविक नेता हैं। उनके अभी तक के नेता मनमोहन सिंह उन्हें थके हुए लगने लगे हैं। देष के तेज विकास और महाशक्ति बनने की हवा बांधने वाले ये लोग अपने को ही पूरा देश मानते हैं। यानी सब कुछ उन्हें सबसे पहले अपने लिए चाहिए। नवउदारवाद के तहत बन रहे फर्जी भारत के ये फर्जी नागरिक हैं।  
कहना होगा कि यह युवा बिरादरी अपने आप ऐसी नहीं बन गई है। मनमोहन सिंह के साथ नवउदारवाद और संघ परिवार के साथ संप्रदायवाद के समर्थकों ने मिल कर जो माहौल तैयार कियायह उसकी फसल है। आपने देखा है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम इनके हसीन सपनों को किस कदर हवा देते थे। यह सही है कि भारत की पूरी युवा आबादी के मुकाबले अभी कारपोरेट-सेवी युवाओं की संख्या काफी कम है। बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की हैखास कर युवतियों कीजो सांप्रदायिक और अंधविश्वासी नहीं हैं। इसीलिए नरेंद्र मोदीप्रधानमंत्री बनना दूरअभी गुजरात के बाहर सांसद का चुनाव भी नहीं जीत सकते। लेकिन आरएसएस को विश्वास हैभविष्य में उसकी विचारधारा फैलेगीतब गठबंधन की मजबूरी नहीं रहेगीउस समय आदर्श हिदुत्ववादी’ नरेंद्र मोदी उसके प्रधानमंत्री होंगे। बीच का समय निकालने के लिएअटल बिहारी वाजेपयी के समय में कट्टर कहे जाने वालेलालकृष्ण अडवाणी का सहारा लिया जाएगा।  

16 साल के प्यार के बाद कहा जा सकता है कि जदयू संघी घराने का ही अविभाज्य अंग है। उसके नेताओं ने रामविलास पासवानमायावतीममतानवीन पटनायकचंद्रबाबू नायडूएम करुणानिधिजे जयललिता आदि की तरह बीच-बीच में संघ को छोड़ा नहीं है। आपने हाल में देखा कि जदयू नेताओं ने दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परिषद की बैठक में धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य पर अपना पाखंडी रवैया एक बार फिर बखूबी दिखाया ताकि मुसलमानों का वोट उनकी झोली से बाहर न जाए। उन्होंने  आरएसएस के स्वयंसेवक और भाजपा के शीर्षस्थ नेता रहे अटल बिहारी को पूरमपूर धर्मनिरपेक्ष बताते हुएउनके जैसे नेता को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की सलाह भाजपा को दी। यह सब जानते हैं कि संघ परिवार की सांप्रदायिक विचारधारा के अंतर्गत कट्टरता और उदारता की लाइन चलती हैं। वाजपेयी की उदारता सांप्रदायिक विचारधारा की उदारता हैजिसके तहत देष के संविधान के साथ छल करके सत्ता पाई जाती है।

जदयू नेताओं की नजर में अब लालकृष्ण अडवाणी धर्मनिरपेक्ष नेता हो गए हैं। अडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर गठबंधन नहीं छोड़ने की बात करने वाले ये वही नेता हैं जिन्होंने भाजपानीत केंद्र की राजग सरकार में शामिल होते वक्त कहा था कि अगर भाजपा अडवाणी को प्रधानमंत्री बनाती तो वे सरकार में शामिल नहीं होते। उनके लिए अब कट्टर मोदी के मुकाबले अडवाणी उदार हो गए हैं। दरअसलभाजपा को जदयू नेताओं के मोदी संबंधी परोक्ष-अपरोक्ष हवालों से नाराज न होकर उनका शुक्रगुजार होना चाहिए। जदयू नेतृत्व ने कहा है कि वे मोदी का समर्थन इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि मोदी ने गुजरात दंगों से निपटने के लिए मुस्तैदी से काम नहीं लिया। यह कह कर जदयू नेताओं ने 2002 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए मुसलमानों के राज्य-प्रयोजित नरसंहार और उसे छिपाने के लिए किए गए षड़यंत्रों से मोदी को बरी कर दिया है।

बाबरी मस्जिद ध्वंस के रथी अडवाणी को अपना नेता स्वीकार करने के साथ  जदयू नेताओं ने भाजपा के साथ अपने 16 साल पुराने प्यार का बखान भी किया है। लेकिन उन्हें यह भी कहना चाहिए कि उतने ही सालों से वे मुसलमानों के साथ फ्लर्ट कर रहे हैं। यह सारी कलाबाजी बिहार में मुसलमान वोटों को कब्जे में रखने के लिए की जा रही है। अपने को सेकुलर जताने वाले दलों और नेताओं का हर राज्य और देश के स्तर पर यही रवैया बना हुआ है। सभी ताक में रहते हैं कि चुनाव में मुसलमान उनकी झोली में गिरें। यह न केवल संविधान विरोधी रवैया हैनागरिक के तौर मुसलमानों की तौहीन है। हर सेकुलर पार्टी में सत्ता का सुख भोगने वाले चंद मुसलमान नेता भी पूरे समुदाय की यह दुर्दशा बना कर रख देने में हिस्सेदार बनते हैं। भाजपा सेकुलर दलों के इस रवैये का फायदा उठाकर हिंदू वोट बैंक की राजनीति करती है और हमेशा मुख्य विपक्षी पार्टी बनी रहती है।

हमारा मानना है कि यह दुष्चक्र तभी तोड़ा जा सकता है जब देश के मुसलमान नागरिक कम से कम एक बार आमचुनाव और एक बार सभी विधानसभा चुनावों में वोट नहीं डालने का कड़ा फैसला लें। भारत की राजनीति में उससे बड़ा बदलाव हो सकता है। मुसलमानों के इस सत्याग्रह’ से धर्मनिरपेक्षता के दावेदार और सांप्रदायिकता के झंडाबरदार - दोनों संविधान की ओर लौटने के लिए मजबूर होंगे। और तब देष का संविधान सांप्रदायिकता पर भारी पड़ेगा।

पूंजीवाद के सिर पर स्वराज की टोपी

दिवंगत साथी हरभगवान मेंहदीरत्ता की बहन सत्या ने हमें बताया कि जस्टिस जेएस वर्मा की पत्नी ने उनसे आम आदमी पार्टी की सदस्य बनने का आग्रह किया। सत्या के विचार काफी रेडिकल हैं और वे अपने ढंग की स्त्रीवादी और समाज-सुधारक हैं। राजनीति को समाज से जोड़ कर देखती हैं और उससे भी ज्यादा राजनीति करने वालों के व्यक्तिगत आचरण से। उन्होंने जस्टिस वर्मा की पत्नी को यह कह कर सदस्य बनने से इनकार कर दिया कि उस पार्टी के बनाने वाले एनजीओ चलाने वाले हैं। उनमें समाज के लिए कोई दर्द या दृष्टि होती तो उन्होंने अपने बूते कुछ काम किया होता। 

ये लोग पहले मैं अन्ना हूं’ की टोपी पहनते थे। आजकल मैं आम आदमी हूं’ और मुझे चाहिए स्वराज’ की टोपी लगाए होते हैं। आम आदमी के बारे में हमने पहले आपको बताया था कि उसका गांधी के आखिरी आदमी से कोई लेना-देना नहीं है। मिश्रित और पिछले बीस-पच्चीस सालों की नई आर्थिक नीतियों का लाभ उठाकर मुटाया मध्यवर्ग खुद आम आदमी बन बैठा है। पिछले दिनों केजरीवाल ने दिल्ली में बिजली-पानी के मुद्दे पर अनशन किया था। अखबार में छपी एक दिन की तस्वीर में प्रशांत भूषण मुझे चाहिए स्वराज’ की टोपी लगा कर बैठे थे,जिस पर फोटोग्राफर ने फोकस किया था। शायद यह सोच कर कि बेचारे भले लोग स्वराज के लिए कितनी तकलीफ उठा रहे हैं। वह तस्वीर देख कर हमारे मन में आया कि एक पेशी का कई लाख रुपया लेने वालेइलाहाबाद में करोड़ों के मकान को कौडियों में अपने नाम लिखवा लेने वाले और दिल्ली, नोएडा, हिमाचल में मकान-प्लाट रखने वाले इन महानुभाव को और कितना स्वराज चाहिएएक समय संवाद’ में हमने इस मंडली के स्वराज का पाखंड रचने के वाकये का जिक्र किया था कि किस तरह से 2007 के आमचुनाव में उन्होंने मनमोहन सिंहसोनिया गांधी और अडवाणी से स्वराज मांगने के बड़े-बड़े होर्डिंगों से दिल्ली को पाट दिया था।

स्वराज का विचार तिलक युग से शुरू होकर गांधी तक आता है और गांधी उसे आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के विकल्प के रूप में विकसित करते हैं। स्वराज्य के बारे में गांधी का कहना था कि आजादी के साथ जो मिलने जा रहा हैवह उनके सपनों का स्वराज्य नहींइंग्लैंड के संसदीय लोकतंत्र का एक रूप होगा। गांधी को यह तो स्पष्ट था कि उनके सपनों का स्वराज्य फलीभूत होना लगभग नामुमकिन है। लेकिन उस दिशा में उनके प्रयास अंत तक बने रहे ताकिकम से कम लोगों की सोच मेंकुछ हद तक उस विचार की उपस्थिति बनी रहे। उनका प्रयास बिल्कुल व्यर्थ नहीं गया। गांधी का विस्तार कहे जाने वाले लोहिया ने यह कहा कि समाजवाद में गांधीवाद का फिल्टर लगाना होगा। अस्सी के दशक तक भारत की सरकारें भीभले ही आधे-अधूरे रूप मेंगांधी के स्वराज्य से कुछ न कुछ प्रेरणा लेती थीं। पिछले25 सालों की नवसाम्राज्यवादी घुसपैठ के बावजूद देश और दुनिया में अनेक लोग और संगठनभले ही वे अलक्षित रहते होंगांधी के स्वराज्य के विचार से प्रेरणा लेकर काम करते हैं।

यह बहुत चिंता की बात है कि कुछ एनजीओ वालों ने गांधी के स्वराज्य को कारपोरेट पूंजीवाद की टोपी बना दिया है। हमने कई बार यह उल्लेख किया है कि नवसाम्राज्यवादी व्यवस्था का गांधी को मिटाने का लक्ष्य है। क्योंकि हथियार और बाजार के बल पर चलने वाली इस सभ्यता का मूलभूत विकल्प साहसपूर्वक और सुचिंतित रूप में केवल गांधी ने दिया है। अपना यह लक्ष्य सिद्ध करने के लिए नवउदारवादी व्यवस्था गांधी को एप्रोप्रिएट करती है और अक्सर विकृत करती है। एप्रोप्रिएशन का उदाहरण संयुक्त राष्ट्र द्वारा गांधी जयंती को अहिंसा दिवस घोषित करने से लेकर गांधी के नाम पर देहाती गरीब परविारों के एक व्यक्ति को साल में 100 दिन अधिकतम189 रुपये की दिहाड़ी पर काम देने वाले यूपीए सरकार के मनरेगा तक देखा जा सकता है। सरकार की नजर में गांधी गरीबों के भगवान हैं जिन्हें उनके नाम पर योजना बना कर गरीबों को दे दिया गया हैइससे ज्यादा और क्या चाहिएगांधी को विकृत करने के अनेक उदाहरणों में से एक इन तथाकथित स्वराजवादियों का है। आप देखते हैंभ्रष्टाचारियों को फांसी देने और उनका मांस गिद्धों-कौओं को खिलाने का बार-बार ऐलान करने वाले अन्ना हजारे को मीडिया में लगातार गांधीवादी लिखा जाता है। ऐसा प्रमादवश नहीं है। यह गांधी को विकृत करने की वह रणनीति है जिसके तहत नवउदारवादी दौर में पली-बढ़ी पीढ़ी को बताया जाता है कि गांधी ऐसा था।        

मेधा पाटकर और अरुणा राय अनशन पर बैठे केजरीवाल को देखने गईं और उन्हें अपना समर्थन दिया। यह एनजीओ घराना हैजिसमें केंद्र और परिधि का अंतर हो सकता हैलेकिन इस पर सब एक मत हैं कि समाजवादी राजनीति और विचारधारा की जरूरत अब नहीं है। मनमोहन सिंह और उनकी मंडली भी यही कहते हैं। अरुणा राय जब कहती हैं कि लोग जाग गए हैंसवाल पूछते हैंतो उसका यही अर्थ है कि एनजीओ वालों ने लोगों को जगाया है और सवाल पूछने के लिए तैयार किया है। लेकिन पलट कर उनसे कहा जा सकता है कि एक परिवार के एक सदस्य को साल के 100 दिन धूल-मिट्टी का काम देने का कानून बना कर संविधान प्रदत्त बराबरी के हक पर डाका डाला गया है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन और उसकी नेत्री मेधा पाटकर की बड़ी चर्चा रही है। हालांकि जिन बड़े बांधों के खिलाफ वह आंदोलन थानर्मदा बांध समेत उनके निर्माण पर कोई रोक नहीं लगी है। हरसूद और टिहरी जैसे शहर डूब गए और बड़े-छोटे बांधों की लंबी फेहरिस्त सरकारों के पास है। तसल्ली के लिए हम सभी लोग कहते हैं कि उस आंदोलन से जागरूकता फैली और विस्थापितों की कुछ हद तक सहायता हो पाई। लेकिन यह आंदोलन एनजीओ का सहारा नहीं लेताऔर राजनीतिक होता,तो भले ही थोड़ालेकिन नवउदारवाद के विरुद्ध निर्णायक फर्क पड़ सकता था।

ऐसा नहीं है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन राजनीतिक हो नहीं पाया। किशन पटनायक के लाख प्रयासों के बावजूद वह होने नहीं दिया गया। कहने की जरूरत नहीं कि राजनीतिक नहीं होने की वजह से वह खुद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में जा कर डूब गया। देख सकते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का सूरज भी डूब चुका है और अन्ना हजारे अलग-अलग जगहों व मुद्दों पर हाथ-पैर मारते घूमते हैं। बीच-बीच में कहते हैं कि जन लोकपाल बनवा कर दम लेंगे। आंदोलन के पीछे कोई स्वतंत्र विचार नहीं होताउद्देश्य नहीं होतातो वह दिग्भ्रमित हो जाता है। अगर विचार और उद्देश्य नवउदारवाद के पेटे में समाने वाले हों तो आंदोलन उसी में डूब जाता है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के साथ यही हुआ है। विश्व बैंक का आदमी कोई वहां नौकरी करके ही नहीं होता। न ही उसका पुरस्कार पाकरजैसा कि अन्ना हजारे को काफी पहले मिला थाकोई विश्व बैंक का आदमी हो जाता है। अलबत्ता उसकी नवउदारवादी नीतियों और कार्यक्रमों को मानने-चलाने वाला व्यक्ति विश्व बैंक का आदमी होता है। अन्ना हजारेअरुणा रायकेजरीवाल आदि वही हैं। 

हम आपको बता चुके हैं कि असली झगड़ा सोनिया गांधी की सलाहकार परिषद में रहने और सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह की नजर में ज्यादा प्रभावशाली बनने का था, जो बढ़ गया। कांग्रेस में कई वकील हैं। उनमें पी चिदंबरमकपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी अग्रणी हैं। प्रशांत भूषण को लगता होगा कि वे इतने नामी वकील हैउन्हें क्यों नहीं ऑफर दिया जाताअपने पिता की नजीर उनके सामने थी। आप हैरान न होंशासक वर्ग के दायरे में यह सब सोचना-समझना होता रहता है। इनमें से कुछ लोग कांग्रेस का और कुछ लोग भाजपा/संघ का काम करते ही थे। खबरें हैं कि आम आदमी पार्टी में कुछ लोगों को कांग्रेस ने प्लांट किया है ताकि भाजपा के मध्यवर्ग के वोट खराब किए जा सकें और शीला दीक्षित चौथी बार चुनाव जीत जाएं। अभूतपूर्व’ आंदोलन और नई’ राजनीति के नाम पर यह फर्जीवाड़ा आपके सामने है।  

धन और मीडिया की ताकत के बावजूद अगर मध्यवर्ग मेहनतकशों का अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल नहीं कर पाया तो इस पार्टी के कुछ नेता कांग्रेस में और कुछ भाजपा में चले जा सकते हैं। कुछजो वाकई आदर्शवादी भावना से जुड़े हैंडिप्रैशन या सिनिसिज्म का शिकार हो सकते हैं। यह कहते हुए कि इस देश मेंखास कर राजनीति मेंकुछ नहीं हो सकता। राजनीति बहुत बुरी होती हैकल तक ये लोग ही चिल्ला-चिल्ला कर कहते थे। ऐसा न होपार्टी बिखरे नहींइसके लिए दिल्ली का चुनाव लूटने की मुहिम में दिन-रात दौड़-धूप की जा रही है। दिल्ली फतह तो देश फतह!

दिल्ली और देश की दौड़-धूप में कई समाजवादी भी लगे हैं। उन्हें ऐसा सक्रिय पहले कभी नहीं देखा था। साथी राजकुमार जैन अक्सर गुमान से कहते हैं कि समाजवादी पर किसी के रुतबे का रौब गालिब नहीं होता। हो सकता है जब समाजवादी आजाद देश में जेल को अपना घर मानते थेऐसी कोई भावना रही हो। लेकिन इस मामले में इधर की तस्वीर बड़ी निराशाजनक है। कांग्रेस और भाजपा छोड़िएकुछ समाजवादी केजरीवाल के कारिंदे बने घूम रहे हैं। उनकी इस विनम्रता का कारण यही हो सकता है कि उन्होंने रामदेव की संगत में राष्ट्रीय स्वाभिमान’ का ऐसा पाठ पढ़ा है कि उनका अपना स्वाभिमान शून्य हो गया है! 

कांग्रेस और भाजपा के चुनावी पंडित गणित लगा रहे हैं कि आम आदमी पार्टी किसका नुकसान करेगी। दोनों पार्टियां अपना नुकसान न होने और दूसरी का नुकसान होने का कयास लगा कर कभी खुश होती हैंकभी डरती हैं। आप देखेंगे कि विधानसभा चुनाव में यह नई’ राजनीति करने वाली नई पार्टी कांग्रेस और भाजपा के असंतुष्टों को टिकट देगी। जिन्हें बसपा का टिकट नहीं मिलेगावे भी कुछ ले-देकर वहीं से टिकट जुगाड़ सकते हैं।

यह फर्जी राजीनीति में ही हो सकता है कि कोई राजनीतिक पार्टी पंजीकरण के पहले ही आगामी आमचुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान करे। कांग्रेस और भाजपा भी यह नहीं कर पाती हैं। जाहिर हैलोकतंत्र का यह मजाक धनबल के बूते ही किया जा सकता है। मजाक को प्रचारित करने के लिए पूरा मीडिया हाजिर है। यह नहीं भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनजिसकी राख से यह पार्टी पैदा हुई बताई जाती हैमें बड़ी संख्या में राजनीति-द्वेषीघोर प्रतिक्रियावादी और सांप्रदायिक तत्व शामिल थे। वे टोपियों के पीछे छिप कर अपना काम करेंगे। हमारे जो साथी आम आदमी पार्टी में मौजूद कतिपय प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष साथियों का हवाला देकर संबंध बनाए रखना चाहते हैंवे थोड़ा रुक कर सोच लें कि मध्यवर्ग के नए नायक बनने चले ये लोग कितने प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष रह गए हैं या आगे रह जाएंगेवह पार्टी लोकतंत्र और राजनीति को क्या नई राह दिखाएगी जो अन्ना हजारेरामदेव और केजरीवाल के संबंध तक जनता को साफ बताने को तैयार नहीं है। जनता को इतना टेक इट फार ग्रांटेड’ तो वे बुरे नेता और उनकी पार्टियां भी नहीं लेती जिन्हें राजनीति से बेदखल करने के दावे ठोंके जा रहे हैं।  

गंभीर और परिवर्तनकारी राजनीति के युगानुसार कुछ सूत्र होते हैं। वे अलग-अलग विचारधारात्मक समूह के अलग-अलग और कुछ समान हो सकते हैं। गांधी ने राजनीति को समाज और सभ्यता से अलग न मान करउस लिहाज से उठने वाले एक कदम को भी पर्याप्त माना। अंबेडकर ने दलित समाज को शिक्षित होनेसंगठित होने और संघर्ष करने को कहा। लोहिया ने जेलफावड़ा और वोट का सूत्र दिया। समाजवादी जनपरिषद में विचारधारासंगठनसंघर्षरचनात्मक कार्य और चुनाव के पांच सूत्र अपनाए गए थे। आम आदमी पार्टी का अगर कोई सूत्र है तो वह चुनाव लूटना हो सकता है। जाहिर हैऐसी राजनीति कांग्रेस और भाजपा से अलग नहीं हो सकती।  

यह देश की फर्जी राजनीति का परिदृश्य है। फर्जी राजनीति का एका इतना जबरदस्त है कि गठबंधन सरकार चलाने में न वाजपेयी को परेशानी हुईन मनमोहन सिंह को है। बल्कि मनमोहन सिंह तो अल्पसंख्यक सरकार चला रहे हैंजिसे उत्तर प्रदेश में एक-दूसरे के खून के प्यासे मुलायम और मायावती का बाहर से समर्थन है। कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि इस फर्जी राजनीति को भारत के नागरिक समाज का अनुमोदन है। कांग्रेस और भाजपा से अलग कोई गठबंधन या तो बनेगा नहींबन गया तो चलेगा नहीं। यही नागरिक समाज और मीडिया उसे गिरा देंगे।

फर्जी राजनीति का ठाठ यह है कि उसका न राजनीति में कोई विपक्ष हैन नागरिक समाज में। पिछले दिनों जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुआवह इसलिए नहीं था कि यह फर्जी राजनीति बदलनी चाहिएबल्कि इसलिए था कि भारत कामहान’ मध्यवर्ग यह जताना चाहता है कि उसकी नैतिकता मर नहीं गई है। शुरू में उसने मनमोहन सिंह की ईमानदारी की छाया में अपने को भुलाए रखा और आर्थिक सुधारों की मलाई खाता रहा। क्योंकि वैसी कोई छाया थी ही नहींतो उसे झटका लगा और वह चारों तरफ से नैतिक-नैतिक चिल्लाते हुए दौड़ पड़ा। हाल में नागरिक समाज दिल्ली में हुए दो बलात्कार के मामलों को लेकर हद दरजे तक उत्तेजित हुआ। एक संवेदनशील समाज को ऐसे जघन्य कृत्यों पर आंदोलित होना ही चाहिए। लेकिन उसका फर्जीपना पहली नजर में ही पकड़ में आ जाता है। वह सरकार को समाज से बाहर मानता है और अपने को भी। वह यह सोचने को तैयार नहीं है कि जिस सरकार ने पिछले 25सालों से संविधान की परवाह नहीं कीउससे कानून व्यवस्था की सही पालना की अपेक्षा नागरिक समाज किस तर्क से करता हैजब सरकार संविधान की मर्यादाओं को तोड़ती है तो यह नागरिक समाज चुप रहता हैक्योंकि उसमें उसका फायदा है। जब कानून-व्यवस्था टूटती है तो बौखलाता हैक्योंकि उसे अपनी सोने की लंका खतरे में नजर आती है।

फर्जी नागरिक समाज की फर्जी राजनीति और फर्जी राजनीति का फर्जी नागरिक समाज। कहने का आशय यह है कि जब फुलफ्लेजेड फर्जी राजनीति चलेगी तो जीवन के सभी क्षेत्रों में फर्जीवाड़ा न होयह संभव नहीं है। उदाहरण देने लगें तो पूरा पुराण तैयार हो जाएगा। हमारे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रतीकों में भी फर्जीवाड़े की घुसपैठ हो चुकी हैयह एक उदाहरण से बताना चाहेंगे। फिल्म अभिनेता आमिर खान सरकार और कंपनियों के एक से प्रिय हैं। उनका विरुद भी विदेशी पत्रिकाओं में आ चुका है। वे अमिताभ बच्चन के नक्षे कदम पर हैं - माल भी बनाओ और नाम भी कमाओ। आज बच्चों के हक मेंकुपोषण भारत छोड़ो’ का विज्ञापन करने वाले आमिर खान ने कोकाकोला का विज्ञापन करना तब भी नहीं छोड़ा था जब कोक-पेप्सी में बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदेह तत्व होने की सच्चाई सामने आई थी। उल्टा वे कंपनी के पक्ष में विज्ञापनबाजी पर उतर आए थे।

भारत छोड़ो आंदोलन आजादी के संघर्ष का विशिष्ट और निर्णायक पड़ाव है। उससे प्रेरणा लेकर नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ पिछले बीस सालों से नारा लगाया जाता है - विदेशी कंपनियां भारत छोड़ो। ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में पड़े अकालों में कई लाख भारतीय मारे गए। अब भारत में अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां लूट मचाए हुए हैं। बच्चों के कुपोषण का संबंध इन कंपनियों की लूट और उस लूट के हिस्सेदार आमिर खान जैसे लोगों से है। नवउदारवादी समाज सुधारकों और देशभक्तों में गजब का उत्साह होता है। आमिर खान और सरकार भारत छोड़ो आंदोलन की थाती को हजम करके ही नहीं रुक जाते। सत्यमेव जयते’ जैसे राष्ट्रीय वचन को भी हजम कर जाते हैं। यह प्रोग्राम करकेबताया जाता हैआमिर खान ने कंपनियों से करोड़ों रुपया कमाया। अब वे कमाई की किसी और जुगत में लगे होंगे। इन फर्जी समाज सुधारकों और देशभक्तों का संसद में भी स्वागत होता है और नागरिक समाज में भी। {2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत के बाद उनसे सबसे पहले मिलने वाले लोगों में आमिर खान शामिल थे.}

आप कहेंगे कि हमने फर्जी राजनीति और उसके अनुमोदक फर्जी नागरिक समाज का दर्शन तो खूब करा दियाअब उसे बदलने का दर्शन’ भी कुछ बताएं। दरअसलहर समय संवादके अंत में आगे के रास्ते का सवाल खड़ा हो जाता है। हम एक बार फिर डॉ. लोहिया के हवाले से कहना चाहते हैं कि राजनीतिक मानस के निर्माण का अधूरा छूटा काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए। इसके लिए जरूरी है कि सच्ची प्रेरणा रखने वाले लोग एनजीओ नहींराजनीति में जाएं। उसके लिए जरूरी नहीं है कि हमेशा नई पार्टी बनाई जाए या किसी क्रांतिकारी पार्टी में ही शामिल हुआ जाए। प्रेरणा अगर सच्ची है तो स्थापित दलों में रह कर भी परिवर्तन की राजनीति की जा सकती है। नजरिया अगर राजनीतिक है तो बिना किसी राजनीतिक पार्टी में रहे भी परिवर्तन की राजनीति में सहायक हुआ जा सकता है। क्योंकि राजनीतिक नजरिया होगा तो राजनीति और नागरिक समाज में चल रहे फर्जीवाड़े की पहचान होगी। तब लोग भी पहचानेंगे और अपने और देश के संविधान के हक में नवउदावादियों के खिलाफ उठ खड़े होंगे।    

23 अप्रैल 2013

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Dr. Prem Singh
Dept. of Hindi
University of Delhi
Delhi - 110007 (INDIA)

Saturday, May 16, 2020

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की विरासत- प्रेम सिंह


(कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना दिवस के मौके पर डॉ प्रेम सिंह ने ये लेखअप्रैल 2016 में लिखा था। )
                भारतीय समाजवादी आंदोलन के पितामह आचार्य नरेंद्रदेव की अध्यक्षता में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) के गठन (17 मई 1934,पटना) के समय दो लक्ष्य स्पष्‍ट थे: देश की आजादी हासिल करने और समाजवादी व्यवस्था कायम करने की दिशा में संगठित प्रयासों को तेज करना। इन दोनों लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सच्ची साम्राज्यवाद विरोधी चेतना को मजबूत बनाना जरूरी था। 21-22 अक्तूबर 1934 को बंबई में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के पहले सम्मेलन में,जहां समाजवादी समाज बनाने की दिशा में विस्तृत कार्यक्रम की रूपरेखा स्वीकृत की गईजेपी ने कहा था ‘‘हमारा काम कांग्रेस के भीतर एक सच्ची साम्राज्यवाद विरोधी संस्था विकसित करने की नीति से अनुशासित है।’’जैसा कि आगे चल कर देखने में आता हैसीएसपी के संस्थापक नेता मार्क्‍सवाद और गांधीवाद के साथ फलप्रद संवाद बना कर समाजवादी व्यवस्था की निर्मिती करने के पक्षधर थे। गांधी ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन का विरोध किया था। लेकिन संस्थापक नेताओं ने उलट कर गांधी पर हमला नहीं बोला। दोनों के बीच संबंध और संवाद गांधी की मृत्यु तक चलता रहा। उसके बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं : कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना पर ‘‘गांधीवाद अपनी भूमिका पूरी कर चुका है’’ कहने वाले जेपी सर्वोदय में शामिल हुए और लोहिया ने गांधीवाद की क्रांतिकारी व्याख्या प्रस्तुत की। इस क्रम में आजादी के बाद डाॅ. अंबेडकर से भी संवाद कायम किया गयाहालांकि बीच में ही अंबेडकर की मृत्यु हो गई।
                सीएसपी के संस्थापक नेता मार्क्‍सवादी थेलेकिन अंतरराष्‍ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के तहत कोरे कम्युनिस्ट नहीं थे। वे स्वतंत्रता आंदोलन के बीचों-बीच थेउन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में लंबी जेलें काटी थीं। संस्थापक नेताओं के सामने यह स्पष्‍ट था कि स्वतंत्रता (देशसमाजव्यक्ति कीसच्ची साम्राज्यवाद विरोधी चेतना की पूर्व-शर्त है।
                बाह्य आदेशों पर चलने वाला समाजवादएक पार्टी की तानाशाही वाला क्रांतिकारी’ लोकतंत्र सीएसपी के संस्थापक नेताओं को काम्य नहीं था। आजादी के बाद कांग्रेस से अलग सोशलिस्ट पार्टी बनाने का निर्णय लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली की मजबूती की दिशा में उठाया गया दूरगामी महत्व का निर्णय था। सोशलिस्ट नेताओं के लिए लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी रणनीतिक नहीं थी। भारतीय सामाजिक और आर्थिक संरचना में हाशिए पर धकेले गए तबकों - दलितआदिवासीपिछड़े,महिलाएंगरीब मुसलमान - की सक्रिय राजनीतिक-सांस्कृतिक-बौद्धिक हिस्सेदारी से समाजवाद की दिशा में बढ़ने की पेशकश में ऐसे स्वतंत्र राष्‍ट्र का स्वप्न निहित था जो फिर कभी गुलाम नहीं होगा। कांग्रेस के नेताओं ने गांधी के कहने बावजूद कांग्रेस को लक्ष्य-प्राप्ति के बाद विसर्जित नहीं कियालेकिन सोशलिस्ट नेताओं ने शुरुआती उहापोह के बाद कांग्रेस के बाहर आकर कांग्रेस को अपनी तरफ से तिलांजलि दे दी। दो दशक के लंबे संघर्ष के बाद वे कांग्रेस की सत्ता हिलाने में कुछ हद तक कामयाब हुए। सर्वोदय में चले गए जेपी के आपाताकल विरोधी आंदोलन की अन्य कोई उपलब्धि न भी स्वीकार की जाएलोकतंत्र की पुनर्बहाली उसकी एक स्थायी उपलब्धि हैजो आज तक हमारा साथ दे रही है। पिछले करीब तीन दशकों से चल रहे नवसाम्राज्यवादी हमले की चेतावनी सबसे पहले समाजवादी नेता/विचारक किशन पटनायक ने दी थी।
                वर्तमान भारतीय राजनीति के सामने भी दो लक्ष्य हैं : नवसाम्राज्यवादी हमले से आजादी की रक्षा और समाजवादी समाज की स्थापना। यह काम भारत के समाजवादी आंदोलन की विरासत से जुड़ कर ही हो सकता हैजिसकी बुनियाद 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना के साथ पड़ी थी। इस संकल्प और पहलकदमी के बिना 82वें स्थापना दिवस का उत्सव रस्मअदायगी होगा। हालांकि रस्मअदायगी के लिए किए जाने वाले कार्यक्रमों के पीछे कुछ न कुछ भावना होती हैलेकिन इसका नुकसान बहुत होता है। कांग्रेस-भाजपा से लेकर अन्ना हजारे,केजरीवाल-सिसोदियारामदेव-श्रीश्रीवीके सिंह जैसों तक आवाजाही करने वाले सभी समाजवादी हैं - इसका नई पीढ़ी को केवल नकारात्मक संदेश जाता है। यही कारण है कि समाजवादी आंदोलन में नए युवक-युवतियां नहीं आते हैं। उन्हें यही लगता है कि समाजवाद के नाम पर ज्यादातर लोग निजी राजनीति का कारोबार चलाने वाले हैं। यह कारोबार वैश्विक स्तर पर जारी नवउदारवादी कारोबार के तहत चलता है और इस तरह नवसाम्राज्‍यवाद का शिकंजा और मजबूत होता जाता है।
                इस मंजर पर सर्वेश्‍वर दयाल सक्सेना की कविताजो उन्होंने लोहिया के निधन पर लिखी थीकी पहली पंक्तियां स्मरणीय हैं : लोऔर तेज हो गया उनका रोजगार/ जो कहते आ रहे/ पैसे लेकर उतार देंगे पार।   

Tuesday, May 12, 2020

कोरोना महामारी : श्रमिक चेतना के उन्मेष का समय - प्रेम सिंह


तालाबंदी के डेढ़ महीना बीत जाने के बाद भी देश-व्यापी स्तर पर मेहनतकश मजदूरों की दुर्दशा का सिलसिला थमा नहीं है. हर दिन भूख, जिल्लत और अपने ही देश में बेगानेपन का दंश झेलते मजदूरों के हुजूम-दर-हुजूम चारों तरफ दिखाई दे रहे हैं. गौर कर सकते हैं कि वे लगभग सभी युवा स्त्री-पुरुष हैं; उनके बच्चे छोटे हैं; गोद में खेलने या स्कूल जाने की उम्र वाले. काम और उसके साथ जुड़ी कमाई ठप्प होने से सभी अपने घर माता-पिता, बंधु-बांधवों के पास जाने को बेताब हैं. एक युवा भारत यह भी है, जिसकी तस्वीर देश-भर के गली-मोहल्लों-सड़कों-चौराहों-रेलवे स्टेशनों-बस अड्डों पर बिछी हुई है. गौर करने की बात यह भी है कि इस युवा भारत में हद दर्जे का साहस और जीवट है. कोरोना विषाणु ने दुनिया को मौत का दरिया बना दिया है. लेकिन इन्हें मौत का वैसा भय भय नहीं है, जैसा घरों में सुरक्षित रह सकने वालों को सता रहा है. ये पुलिस की नज़र से बच कर राजमार्गों से हट कर रास्ता लेते हुए हजारों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल चल रहे हैं. ऐसे ही एक रास्ते पर घर वापसी करते हुए महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मध्य प्रदेश के 16 प्रवासी मजदूर मालगाड़ी के नीचे कुचल कर मर गए. पहले दिन से ही यह देखा जा सकता है कि सरकार की प्रवासी अथवा निवासी मजदूरों के बारे में कोई स्पष्ट नीति नहीं है. यह जानते हुए भी कि देश की 90 प्रतिशत श्रम शक्ति अनौपचारिक क्षेत्र (इनफॉर्मल सेक्टर) में हैं, वह उनसे संबंधित सूचनाओं और योजनाओं के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करती है. 'सावन के अंधों को सब हरा-हरा नज़र आता है'!   

मजदूरों की दुर्दशा के ये साक्षात दृश्य प्रमाण हैं कि देश की '5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था' में उनका पसीना ही शामिल है, वे इस अर्थव्यवस्था के हिस्सेदार नहीं हैं. असंगठित-संगठित क्षेत्र के इन मजदूरों के अलावा सीमांत किसानों, अर्द्ध-पूर्ण बेरोजगारों की भी लगभग वही स्थिति है. उन्हें तालाबंदी ने सड़कों पर तो नहीं फेंका, लेकिन रोजी-रोटी के संकट में डाल दिया है. सबसे ज्यादा गौर करने की बात यह है कि देश की अधिकांश आबादी की इस दुर्दशा से सरकार को कोई बेचैनी नहीं है. डर का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. जबकि देश में लोकतांत्रिक प्रणाली है. यानी सरकार अथवा सत्तारूढ़ पार्टी को कल चुनाव में जाना है. इस चिंताजनक परिघटना का कारण चौतरफा फैले मजदूरों की दुर्दशा के परिदृश्य में ही आसानी से पहचाना जा सकता है.

मीडिया में मजदूरों से होने वाली बातचीत के ब्यौरों से पता चलता है कि मजदूरों को अपनी इस स्थिति से कोई शिकायत नहीं है. वे इस संकट में किसी तरह घर पहुंच जाने, और तालाबंदी हटने के बाद वापस काम पर लौट आने की बात कहते हैं. वे काम न होने, रहने की जगह न होने, राशन न होने की जानकारी देते हैं, सरकार के खिलाफ शिकायत नहीं करते. तालाबंदी के दौरान अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस (1 मई) भी पड़ा. हमेशा की तरह मजदूर वर्ग के गौरव और संघर्ष का स्मरण मजदूर संगठनों से लेकर सरकारों तक ने किया. लेकिन अपने मेहनतकश जीवन की सबसे बड़ी आपदा झेल रहे मजदूर अपनी पहचान से जुड़े दिवस की प्रेरणा से अछूते नज़र आते हैं. प्रगतिशील नेतृत्व जिस क्रांतिकारी श्रमिक चेतना का अत्यधिक बखान करता रहा है, उसकी अभिव्यक्त का कोई चिन्ह इन मजदूरों की बातचीत से नहीं मिलता.

भारत में पूरे विश्व में सबसे ज्यादा मजदूर संगठन (ट्रेड यूनियन) हैं. उनमें करीब दर्जन भर राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर के और हजारों स्थानीय स्तर के हैं. भारत सहित पूरी दुनिया में ज्यादातर मजदूर संगठन समाजवाद, सामाजिक न्यायवाद, कल्याणवाद सरीखी प्रगतिशील विचारधाराओं से सम्बद्ध होते हैं. मजदूर संगठन मजदूरों के वेतन-बोनस, सेवा-शर्तों, काम के घंटों, काम करने की स्थितियों आदि मुद्दों पर सरकारों अथवा/और कारखाना मालिकों से संवाद, और जरूरत पड़ने पर मजदूर-वर्ग के हित में संघर्ष करते हैं. बड़े मजदूर संगठनों की राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर श्रम कानूनों के निर्माण/बदलाव में भी भूमिका होती है. कहने की जरूरत नहीं कि भारत का मजदूर आंदोलन लंबे समय से गतिरोध का शिकार हो चुका है. 1991 में नई आर्थिक नीतियां किसानों और मजदूरों पर सीधे-सीधे थोपी गई थीं. नई आर्थिक नीतियों के साथ देश में सार्वजनिक क्षेत्र को समाप्त कर उसकी कीमत पर निजी क्षेत्र को स्थापित करने की शुरुआत हुई थी. वह देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था (पोलिटिकल इकॉनमी) में एक प्रतिमान विस्थापन (पेराडाइम शिफ्ट) था. सीधे शब्दों में, देश की अर्थव्यवस्था को संविधान की धुरी से उतार कर बाजार अर्थव्यवस्था (मार्केट इकॉनमी) के पुरोधा प्रतिष्ठानों - विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन आदि) की धुरी पर चढ़ा दिया गया था. कोई भी अर्थव्यवस्था राजनीति के बाहर नहीं हो सकती. लिहाज़ा, जल्दी ही देश की राजनीति और नेतृत्व कमोबेश बाज़ार अर्थव्यवस्था का वाहक बनते चले गए.  

1991 वह अवसर था जब मजदूर आंदोलन को नए चरण में प्रवेश करना चाहिए था. लेकिन राजनीतिक पार्टियों से जुड़े अथवा स्वतंत्र मजदूर संगठन नेतृत्व ने यह जिम्मेदारी नहीं उठाई. सरकारें 'रिफॉर्म्स' के नाम पर एक के बाद एक श्रम कानूनों को कारपोरेट घरानों के पक्ष में बदलती रहीं और मजदूर संगठन कुछ रस्मी प्रतिरोध करके बैठ जाते रहे. नतीजतन, भारत का मजदूर-वर्ग भी लगभग वैसा ही अराजनीतिक बनता गया है, जैसा बाकी समाज बना है. अराजनीतिकरण के चलते आधुनिक पहनावे और जीवन-शैली में लिपटा भारत का ज्यादातर पढ़ा-लिखा मध्य-वर्ग समानता के आधुनिक मूल्य को स्वीकार नहीं करता; समाज का वह हिस्सा भी नहीं, जो सामाजिक न्याय के संवैधानिक प्रावधानों के तहत मध्य-वर्ग में दाखिल हुआ है. इस परिघटना के चलते पिछले करीब तीन दशकों में देश में प्रतिक्रांति की गहरी नींव पड़ चुकी है. दुर्दशा का शिकार देश का विशाल मजदूर वर्ग उसीका नतीज़ा है. क्रांतिकारी चेतना छोड़िये, वह अपने श्रम अधिकारों के प्रति भी जागरूक नज़र नहीं आता. यह अकारण नहीं है कि आरएसएस से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) इस दौरान भारत का सबसे बड़ा मजदूर संगठन बन कर सामने आया है.              

तालाबंदी के पहले यह जरूरी था कि एक समुचित आर्थिक पैकेज के तहत मजदूरों को आर्थिक सहायता प्रदान की जाती. सरकार ने यह नहीं किया क्योंकि उसकी प्राथमिकता मजदूर नहीं, पूंजीपति हैं. सरकार ने महामारी के बहाने करापोरेटपरस्त नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को और मजबूती से लागू करने की कमर कस ली है. उदहारण के लिए सूक्ष्म, लघु और माध्यम उद्यम (एमएसएमई) मंत्री नितिन गडकरी कह चुके हैं कि महामारी के बावजूद प्रधानमंत्री का भारत को आर्थिक महाशक्ति (इकनोमिक सुपर पॉवर) बनाने का सपना साकार होगा. एक टीवी कार्यक्रम में अंबानी बंधुओं में से एक ने कहा कि विजनरी प्रधानमंत्री के रहते कोरोना महामारी के बावजूद अर्थव्यवस्था मजबूत होगी. प्रधानमंत्री और कैबिनेट यह फैसला कर चुके हैं कि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए विदेशी और स्थानीय निवेश पर और ज्यादा जोर दिया जाएगा. नवउदारवाद के रिसोर्स पर्सन दावे कर रहे हैं कि कोरोना महामारी के बाद बनने वाली नई विश्व-व्यवस्था (वर्ल्ड आर्डर) में भारत की अग्रणी भूमिका होगी!

यह सब करने के लिए सरकार ने सबसे पहले और सबसे ज्यादा मजदूरों पर निशाना साधा है. उसने श्रम कानूनों को और ज्यादा 'सरल' बनाने की कवायद शुरू कर दी है. मुख्यमंत्रियों के साथ हुई एक विडियो चर्चा में प्रधानमंत्री ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के मजदूरों से 8 घंटे के बजाय 12 घंटे काम लेने के सुझाव की प्रशसा करते हुए उसे 'सुधारों' (रिफॉर्म्स) की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया. श्रम कानून समवर्ती सूची में आते हैं. गहलोत के सुझाव की प्रशंसा करके प्रधानमंत्री ने राज्यों को श्रम कानून कमजोर करने की अपनी मंशा संप्रेषित कर दी थी. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अध्यादेश के ज़रिये तीन सालों तक, न्यूनतम वेतन अधिनियम सहित, लगभग सभी श्रम कानूनों को अगले तीन महीने के लिए स्थगित करने की घोषणा कर चुके हैं. मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, ओडिशा, पंजाब, महाराष्ट्र की सरकारों ने भी किसी न किसी रूप में श्रम कानूनों को ढीला करने का फैसला किया है. आगे अन्य राज्य भी ऐसा कर सकते हैं. यानी अर्थव्यवस्था देश के शासक वर्ग और कारपोरेट घरानों के बीच का मामला है, मजदूर उसमें कहीं नहीं आते! (यह जरूर है कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने पूरे कोरोना संकट के दौर में जो सुझाव सरकार को दिए हैं, उनसे यह स्पष्ट हुआ है कि उसका नवउदारवादी अर्थव्यवस्था को मानवीय चेहरा प्रदान करने का विश्वास अभी भी बरकरार है.)   

सरकार ने अपना प्रतिक्रांतिकारी चरित्र खोल कर सामने रख दिया है. वह उसी अर्थव्यवस्था की मजबूती का उद्यम कर रही है, जिसके चलते कई लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं और 50 करोड़ मजदूर सस्ते श्रम में तब्दील हो गए हैं.  सरकार जानती है उसके सामने कोई वास्तविक प्रतिरोध नहीं है. मजदूर संगठनों और मजदूर नेताओं ने श्रम कानूनों में बदलाव अथवा उन्हें निरस्त करने के फैसलों का विरोध किया है. राष्ट्रीय स्तर के 10 मजदूर संगठनों ने तालाबंदी खुलने पर विरोध प्रदर्शन करने का ऐलान भी किया है. यह सब जरूरी है. लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि मजदूरों की दुर्दशा के मद्देनज़र असली सवाल को चिंता और चर्चा के केंद्र में लाया जाए. असली सवाल उन आर्थिक नीतियों का है, जिनके चलते देश भर के मजदूर इस दुर्दशा को प्राप्त हुए हैं. नवउदारवाद के समर्थक कुछ धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी कह रहे हैं कि राज्य सरकारों ने जो किया है वह 'रिफॉर्म्स' का सही अर्थ नहीं है. वे भ्रम पैदा करना चाहते हैं. नवउदारवाद में 'रिफॉर्म्स' का शुरुआत से एक निश्चित पारिभाषिक अर्थ रहा है. उसी अर्थ के तहत 1991 के बाद से श्रम कानूनों की ताकत को मजदूर हितों के खिलाफ और कारपोरेट हितों के पक्ष में कमजोर (डाईल्युट) किया जाता रहा है. कुछ संविधानवेत्ताओं की तरफ से यह भी सुनने में आया है कि केंद्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानूनों का अवमूल्यन अथवा स्थगन संविधान के मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक तत्वों के विरुद्ध है. लेकिन वे यह नहीं कहते कि 1991 में लागू की गईं नवउदारवादी नीतियां संविधान के उलट थीं.  

राजनीति को बदले बिना अर्थव्यवस्था नहीं बदली जा सकती. कोरोना महामारी को सरकार ने एक मौका बनाया है, तो मौजूदा निगम पूंजीवाद के वास्तविक विरोधी भी इसे एक मौका बना सकते हैं. मजदूरों, किसानों, अर्द्ध-पूर्ण बेरोजगारों का महामारी काल का अनुभव आसानी से भुलाने वाला नहीं होगा. उनके इस अनुभव का राजनीतिकरण होगा तो एक नई श्रमिक चेतना का उन्मेष होगा और कारपोरेट राजनीति के बरक्स वैकल्पिक राजनीति की ज़मीन बनेगी.   

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)

Monday, April 13, 2020

कोरोना महामारी : प्रतिक्रांति की गहरी नींव-प्रेम सिंह



भारत में बीसवीं सदी का अंतिम दशक ख़त्म होते-होते समस्त मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों, मंचों और माध्यमों से गरीबी की चर्चा समाप्त हो गई. देश की शासक जमात के बीच यह तय माना गया कि अब देश में गरीबी नहीं रही/नहीं रहेगी. जो गरीबी इधर/उधर दिखाई देती है वह गरीबों की अपनी वजह से है; देश की (कारपोरेट) राजनीति और सरकार की (नवउदारवादी) आर्थिक नीतियों से उसका सीधा संबंध नहीं है. लिहाज़ा, गरीबी का रोना अब बंद होना चाहिए. देश अब सही पटरी पर आया है; जल्दी से जल्दी सब कुछ का निजीकरण कर देना चाहिए. पब्लिक डोमेन में यह सब ताल ठोंक कर कहने वाले लगभग सभी लोग सार्वजनिक क्षेत्र में चपरासी से सचिव के ओहदे तक की नौकरी करने वालों की संतान थे. 

इक्कीसवीं सदी के दो दशक अमीरी और केवल अमीरी की चर्चा के दशक रहे हैं. इस बीच गरीब और अमीर भारत की पुरानी कशमकश राजनीतिक चर्चा से ख़त्म हो गई. अब केवल अमीर भारत है जिसे चमकदार, स्मार्ट, नया, महाशक्ति, विश्व-गुरु आदि बताने की विज्ञापनबाज़ी पर सरकारें और राजनीतिक पार्टियां हर साल अरबों रूपया उड़ा देती हैं. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री स्तर के नेता यह सब कहते और करते हैं. अमीर भारत की सत्ता पर कब्ज़ा करने और बनाए रखने की लड़ाई सस्ती नहीं हो सकती - वह (यानी भारत का लोकतंत्र) खरबों का खेल बन चुकी है. अमीर भारत में धन्नासेठों, नेताओं, नौकरशाहों के ठाठ-बाट सामंतों को लजाने वाले होते हैं. सामान्य संपन्न परिवारों तक की शादियों में करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं.

24 मार्च 2020 को कोरोना विषाणु के हमले के चलते देश में अचानक तालाबंदी हुई. अमीर भारत के ठाठ-बाट को चुपचाप अपनी पीठ पर ढोने वाला गरीब भारत हकबका कर शहरों से गांवों की ओर पैदल निकल पड़ा. औरतों के सिर पर गठरियां, पुरुषों के हाथों में बक्से, दोनों की गोदियों और बगल में बच्चे. सभी का एक बयान - रहने-खाने का ठिकाना नहीं है, इसलिए गांव जा रहे हैं, पैदल अगर वाहन नहीं है. मेरी रिहाइश का इलाका आनंद विहार दिल्ली में महाकूच का केंद्र था. साथी विजेंद्र त्यागी ने लगभग रोते हुए फोन पर कहा कि भीड़ में निकली ये महिलाएं रास्ते में कहां हाजत करेंगी, कहां रात काटेंगी? राजधानी दिल्ली से लेकर देश के समस्त नगरों-महानगरों तक फैला महाकूच का नज़ारा पूरी दुनिया ने देखा. अमीर भारत के भाग्यविधाताओं ने भी आश्चर्य किया कि ये लोग क्यों सड़कों पर निकल आये हैं? क्या मज़दूर बस्तियों, अथवा इनके जो भी ठिकाने थे, में ये पड़े नहीं रह सकते थे? इनके घरों पर ऐसी ही खुशहाली थी तो यहां क्यों आए थे? दुनिया के सामने देश की छवि खराब के दी है! हालांकि अंदरखाने खुश भी थे कि यहां रहते तो और ज्यादा खतरनाक तरीके से बीमारी फैलाते. 

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ताला-बंदी के चार-पांच दिनों के भीतर यह सच्चाई सामने आ गई कि अमीर भारत असंगठित क्षेत्र के करीब 50 करोड़ प्रवासी/निवासी मेहनतकशों की पीठ पर लदा हुआ है. इनमें करीब 10 प्रतिशत ही स्थायी श्रमिक हैं. बाकी ज्यादातर रोज कुआं खोदते हैं और पानी पीते हैं. महामारी में इन मेहनतकशों की भूमिका अचानक स्थगित हो जाने से रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया और वे हुजूम में अमीर भारत और उसकी सरकार के सामने आ गए. यह एक बड़ी खबर बन गई. कई लाख किसानों की आत्महत्याएं भी कभी इतनी बड़ी खबर नहीं बनी थी. तालाबंदी में बेघर/बेरोजगार हुए असंगठित क्षेत्र के इन मज़दूरों को राशन/भोजन मुहय्या कराने के सरकारी और स्वयंसेवी प्रयास शुरू किए गए. सोशल मीडिया पर इन मज़दूरों की दुर्दशा पर लगातार अनेक टिप्पणियां होने लगीं. कई विद्वानों, विशेषज्ञों व नेताओं ने आंकड़ों के आधार पर अपने लेखों/बयानों में 50 करोड़ श्रम-बल की हकीकत सामने रखी.  उन्होंने विषय का  विविध दृष्टिकोणों से विश्लेषण किया. मुख्यधारा अखबारों और पत्रिकाओं में ऐसे लेखों को काफी जगह मिली है. देश की सर्वोच्च अदालत, संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक आर्थिक संस्थाओं तक भी बात पहुंची है.

मज़दूरों को लेकर होने वाली इस पूरी चर्चा और सहायता प्रयासों में एक अन्तर्निहित सामान्य तार मिलता है. वह यह कि देश की करीब आधी आबादी को अमीर भारत के पुरोधा आधुनिक संवैधानिक अर्थ में नागरिक नहीं मानते. उनके लिए वे सामंती अर्थ में प्रजा हैं. सुप्रीम कोर्ट ने उनके प्रति मानवीय नज़रिया अपनाने को कहा है. यानी सुप्रीम कोर्ट की नज़र में भी वे नागरिक अधिकारों के हक़दार नहीं, कृपा के पात्र हैं. सुप्रीम कोर्ट को उनकी दुर्दशा का कोई नीतिगत कारण नज़र नहीं आता. बल्कि उसे उनकी हिमायत में दाखिल की गई याचिकाएं हिमाकत नज़र आती हैं. वरना सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट को कहना चाहिए कि मज़दूरों की इस दुर्दशा का कारण संविधान विरोधी नवउदारवादी आर्थिक नीतियां हैं; उन्हें रद्द करके संविधान में उल्लिखित राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों/सिद्धांतों के आधार पर सही आर्थिक नीतियां बनाई जानी चाहिए.

इस मामले में यहां कुछ उदाहरण देना चाहूंगा. दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर दीपक नैयर ने अपने लेख 'लाइव्ज एंड लाइवलीहुड्स' (इंडियन एक्सप्रेस 3 अप्रैल 2020) में एक जगह इतिहास से सबक  सीखने की बात कही तो मुझे उत्सुकता हुई कि आगे वे 1991 में थोपी गईं नई आर्थिक नीतियों को छोड़ने का सुझाव देंगे जो एक ऐतिहसिक भूल थी. ख़ास तौर से बुद्धिजीवियों की तरफ से. लेकिन उन्होंने 1918-1919 के स्पेनिश इंफ्लुएंजा की घटना से सबक सीखने की बात कही है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के महासचिव सीताराम येचुरी ने प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में महामारी से निपटने के लिए आवंटित राशि को अपर्याप्त बताया, लेकिन उन्होंने विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्वव्यापार संगठन आदि द्वारा निर्देशित आर्थिक नीतियों को त्याग कर संविधान सम्मत नीतियां लागू करने की मांग नहीं की. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के महासचिव डी रजा ने अपने लेख 'रिवील्ड बाई द वायरस : द पेंडेमिक हैज एक्सपोज्ड द लिमिट्स ऑफ़ कैपिटलिज्म' (इंडियन एक्सप्रेस 11 अप्रैल 2020) में नवउदारवादी पूंजीवाद की सीमाओं का जिक्र किया है. लेकिन कम से कम 50 करोड़ मजदूरों को सस्ते श्रम में तब्दील करने वाली नवउदारवादी नीतियों को अविलम्ब त्यागने की मांग सरकार से नहीं की. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कोरोना महामारी के चलते पैदा हुए आर्थिक संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री को सुझाव लिख कर दिए हैं. उनमें नहीं मापी जा सकने वाली आर्थिक खाई के लिए जिम्मेदार नई आर्थिक नीतियों को वापस ले लिए जाने का सुझाव नहीं है. ये नीतियां कांग्रेस द्वारा शुरू की गईं थीं. उन्होंने ऐसा वादा भी नहीं किया कि फिर से सत्ता में आने पर कांग्रेस इन धन्नासेठ परस्त नीतियों पर पुनर्विचार करेगी.

मजदूरों की दुर्दशा पर एक जगह यह पढ़ने को मिला कि उनके साथ दोयम दर्जे के नागरिक जैसा बर्ताव किया जा रहा है. नागरिक, भले वह दोयम दर्जे का हो, के साथ कतिपय नागरिक अधिकार और मानव-गरिमा की गारंटी जुडी होती है. क्या कोई दोयम दर्जे का नागरिक वह बर्ताव बर्दाश्त कर सकता है जो तालाबंदी के दौरान सड़कों और मजदूर बस्तियों में ठुंसे लोगों के साथ किया जा रहा है? क्या दोयम दर्जे का नागरिक-परिवार सप्ताह-भर के लिए भी अपनी आर्थिक हैसियत के बल पर सम्मानपूर्वक खाना नहीं खा सकता? क्या दोयम दर्जे की नागरिक महिलाएं जन-धन योजना में डाली गई मात्र 500 रुपये की खैरात को तत्काल निकालने के लिए घंटों लाइन में खड़ी रह सकती हैं? सच्चाई सीधी और साफ़ है. यह विशाल श्रम-बल में शामिल लोग किसी भी पैमाने से नागरिक नहीं हैं - न शासक वर्ग की नज़र में, न खुद अपनी नज़र में. थोड़े भी नागरिक-बोध से संपन्न व्यक्ति कैसे भी संकट में सत्ता द्वारा फेंके गए टुकड़ों पर जीने के लिए तैयार नहीं हो सकता. वह कम से कम अपनी मेहनत की कीमत पर हक़ जरूर जताएगा. 

कहने का आशय यह है कि प्रवासी अथवा अन्य मज़दूरों को लेकर होने वाली चर्चा में राजनीतिक (संवैधानिक पढ़ा जाए) नज़रिया गायब है. भारत की इस विशाल मज़दूर आबादी का जीवन दोधारी तलवार पर चलता है : (क) नवउदारवादी आर्थिक नीतियों ने उन्हें अमीर भारत की अर्थव्यवस्था से हमेशा के लिए बहिष्कृत कर दिया है; (ख) बहिष्कृत अवस्था में उन्हें अपना सस्ता श्रम देकर दूर-दराज इलाकों में अमीर भारत का तरह-तरह का निर्माण-कार्य और सेवा-कार्य करना है. ध्यान दिया जा सकता है कि भारत में बताए जाने वाले 50 करोड़ मजदूरों की संख्या यूरोपियन यूनियन में शामिल देशों की कुल जनसंख्या अथवा अमेरिका-रूस की एक साथ कुल जनसंख्या से ज्यादा है. यह भारत के अंदर एक पूरा भारत है, जिसे डॉ. लोहिया गरीब भारत कहते थे. लेकिन चर्चा में किसी नेता, विद्वान्, संस्था, पत्र-पत्रिका अथवा नागरिक ने गरीब भारत जैसी राजनैतिक शब्दावली का प्रयोग नहीं किया. किसी ने यह नहीं कहा कि मेहनतकशों की दुर्दशा 1991 में लागू की गईं नई आर्थिक नीतियों का अनिवार्य परिणाम है; कि यह गलती थी; कि 30 साल बीत जाने के बाद इन नीतियों को रद्द किया जाना चाहिए; कि कोई देश 50 करोड़ लोगों को दयनीय स्थिति में रख कर सभ्य या शक्तिशाली नहीं कहला सकता.

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संविधान में दिए गए राज्य के नीति निर्देशक तत्व (डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पालिसी) नागरिकों के मौलिक अधिकारों की तरह बाध्यकारी नहीं हैं. लेकिन उन्हें विधायिका और कार्यपालिका की शासन-विधि (गवर्नेंस) के लिए मूलभूत बताया गया है. वे आर्थिक-सामाजिक के साथ हर तरह की बराबरी का समाज बनाने की संविधान की प्रतिज्ञा को सामने लाते हैं. राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के बारे में डॉ. अम्बेडकर ने 19 नवम्बर 1948 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए कहा था, "इस सभा का यह इरादा है कि भविष्य में विधायिका और कार्यपालिका दोनों को (संविधान के) इस भाग में अधिनियमित इन सिद्धांतों के लिए केवल दिखावटी प्रेम नहीं प्रदर्शित करना है. बल्कि अब के बाद इन्हें देश के शासन संबंधी समस्त कार्यकारी और विधायी कार्रवाई का आधार बनाया जाना चाहिए." अम्बेडकर ने नीति-निर्माण के इन्हीं निर्देशों के मद्देनज़र कहा है कि संविधान का लक्ष्य एक समाजवादी व्यवस्था कायम करना है. 1991 में संविधान के इस लक्ष्य को उलट दिया गया. नतीज़ा हम सामने देख रहे हैं - मज़दूरों की यह दुर्दशा.       

समाजवादी नेता और विचारक किशन पटनायक ने संविधान के विरुद्ध की गई इस प्रतिक्रांति को सबसे पहले चिन्हित किया था. उन्होंने 1994 के शुरू में कहा कि जगतीकरण के स्वीकार के साथ भारत में प्रतिक्रांति की शुरुआत हो गई है. करीब तीन दशक बीतने के बाद कह सकते हैं कि देश में प्रतिक्रांति की गहरी नींव डाली जा चुकी है. यह केवल वैश्वीकरण के सीधे समर्थक शासक-वर्ग के बल पर संभव नहीं हुआ है. खीज में अमीर भारत से बहिष्कृत मेहनतकश जनता पर भी इसकी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती. पूंजीवाद अपने बुद्धिजीवी और नेता ही नहीं, घरों के भीतर और बाहर गलियों-सड़कों-चौराहों पर अपनी जनता भी बनाता हुआ आगे बढ़ता है. अमीर भारत के उच्छिष्ट पर जीना इस जनता ने अपनी नियति स्वीकार कर ली है. दरअसल, भारत के शासक वर्ग का प्रगतिशील कहा जाने वाला तबका इस प्रतिक्रांति के लिए जिम्मेदार है. विकास का पूंजीवादी मॉडल उसकी घुट्टी में है. वह हमेशा से मानता है कि विकास का रास्ता केवल पूंजीवाद से होकर गुजरता है. संवैधानिक संसदीय लोकतंत्र के आधार पर समता के साथ सम्पन्नता का भारतीय समाजवादी विचार उसे कभी स्वीकार नहीं हुआ.

यह अच्छी बात है कि पूरे देश में अनेक लोग और संस्थाएं श्रमिक परिवारों की मदद में जुटे हैं. आशा की जानी चाहिए कि उनमें से कुछ लोग जरूर इस समस्या पर राजनीतिक तरीके से विचार करेंगे. यह समझेंगे कि कोरोना महामारी भले ही मानवता पर अचानक और अदृश्य शक्ति का हमला हो, देश की आबादी के विशाल हिस्से की खाद्य असुरक्षा अचानक और अदृश्य कारणों से नहीं है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के शिक्षक हैं)   

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...