Monday, June 12, 2017

जमीन लेंगे ... और जान भी- डॉ प्रेम सिंह

(किसानों की किस्मत में गोलियां उसी दिन तय हो गई थी जब उदारीकरण की आड़ में प्राकृतिक संसाधनों की लूट तय हो गई थी। अंग्रेज ज़मीन छीनते थे तो हम कहते थे ज़मीन नहीं देंगे भले जान दे देंगे। आज की सरकारें कह रही है ज़मीन भी लेंगे और जान भी लेंगे। आज के दौर में जब तमाम बुद्धिजीवियों के होंठ सिले हुए हैं, उनके भी जो कांग्रेसी राज में मलाईदार पदों पर बैठे थे। ऐसे में डॉ प्रेम सिंह की तरह कुछ लोग ही हैं जो पहले भी डंके की चोट पर सच लिख पढ़ रहे थे और अब भी सच लिख पढ़ रहे हैं। यह लेख 2009 का है. आपके पढ़ने के लिए फिर से

दिया जा रहा है.) 
                 जमीन की जंग
                खेतजंगलनदी-घाटीपठारपहाड़समुद्र के गहरे किनारे - हर जगह जमीन की अंतहीन जंग छिड़ी है। यह जंग जमीन पर बसने और उसे हथियाने वालों के बीच उतनी नहीं हैजितनी जमीन हथियाने वालों के बीच है। जमीन हथियाने वालों में छोटे-बड़े बिल्डिरों से लेकर देशी-विदेशी बहुराष्टीय कंपनियां शामिल हैं। भारत की सरकारें उनके दलाल की भूमिका निभाती देखी जा सकती हैं। वे बहुराष्टीय कंपनियों के लिए सस्ते दामों पर जमीन का अधिग्रहण करती हैं और प्रतिरोध करने वाले किसानों-आदिवासियों को ठिकाने लगाती हैं। ठिकाने वे किसानों-आदिवासियों के साथ जुटने वाले जनांदालनकारियों/सरोकारधर्मी नागरिकों को भी लगाती हैं। नवउदारवाद की शुरुआत से ही सभी सरकारें जनहित’ का यह काम तेजी और मुस्तैदी से कर रही हैं। हम जमीन के अधिग्रहण या खरीदी को हथियाना इसलिए कहते हैं कि देश में लोकतंत्र होने के बावजूद जिनकी जमीन है उन्हेंपहली छोड़िएबराबर की पार्टी भी नहीं माना जाता। उनसे पूछा तक नहीं जाता। सरकारें जो तय कर देती हैंवही उन्हें मंजूर करना पड़ता है।
                अंग्रेजों ने 1894 में भूमि अधिग्रहण कानून बनाया था जो आज भी चलता है। उस कानून के तहत सरकारें जनहित में किसी भी किसान या गांव की जमीन का अधिग्रहण कर सकती हैं। नवउदारवादी दौर में इस कानून के इस्तेमाल में तेजी आई है। विशेष आर्थिक जोन (सेज) कानून उसी उपनिवेशवादी कानून का विस्तार है। 2005 में बना और 2006 व 2007 में संशोधित हुआ यह कानून एक ट्रेंड सैटर’ है। चीन के 6विशेष आर्थिक क्षेत्रों का हवाला देते हुए जिस तरह से सेज के नाम पर जमीन की लूट-मार मची (2009 के मध्य तक 578 सेज स्वीकृत हुए हैं)उसे देखकर लगता है भारत में सेज-युग’ आ गया है।
                यह हकीकत बहुत बार बताई जा चुकी है कि सेज पूंजीपतियों के मुनाफे के विशेष क्षेत्र हैं जहां भारतीय संविधान और कानून लागू नहीं होते। सेज इस सच्चाई का सीध सबूत हैं कि भारत की सरकारों के लिए जनहित का अर्थ पूंजीपतियों का हित बन गया है। इसी अर्थ में हमने सेज को टेंड सैटर’ कहा है। तर्क दिया गया है कि सेज को अवंटित जमीन भारत की कुल कृषि योग्य भूमि का एक निहायत छोटा हिस्सा है। सवाल यह नहीं है कि सेज के हवाले की गई जमीन कितनी हैसवाल सरकारों और पूंजीपतियों की नीयत का है। यह नीयत भरने वाली है।
                सेज की आलोचना और विरोध करने वाले लोगों की आवाज सरकारों के संवेदनहीन रवैये के आगे मंद पड़ गई है। दरअसलसरकारों का यह रवैया बन गया है कि पूंजीपतियों के हित का काम कर गुजरो,कुछ दिन हो-हल्ला होगाफिर विरोध का नया मुद्दा आ जाएगा और पिछला पीछे छूट जाएगा। इसी रवैये के तहत सरकारें पिछले बीस सालों में एक के बाद एक जन-विरोधी देश-विरोधी फैसले लेती और उनके विरोध की अनदेखी करती गई हैं। नवउदारवादी दौर का यह इतिहास पढ़ना चाहें तो वह अभी हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के परचोंपुस्तिकाओं और लघु पत्रिकाओं में दर्ज है। विद्वानों के लेखन का विषय वह अभी नहीं बना है। विद्वानों के सामने शोध के बहुत-से नवउदारवाद-सम्मत विषय हैंजिनमें एक औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ संघर्ष करने वालों के चरित्र और चिंतन में कीड़े निकालना भी है।
                सेज पूंजीवादी साम्राज्यवाद के तरकस से निकला एक और तीर है जिसे देश में पूंजीवादी साम्राज्यवाद के एजेंटों ने भारत माता की छाती बेधने के लिए चलाया है। देश की संप्रभुता और जनता के खून के प्यासे ये एजेंट राजनीतिनौकरशाहीऔर पूंजीपतियों से लेकर बौद्धिक हलकों तक पैठे हुए हैं। एक ताजा उदाहरण लें। देश में आलू के बाद उत्पादन में दूसरा स्थान रखने वाले बैंगन को लेकर बहस चल रही थी कि देश में बीटी बैंगन के उत्पादन की स्वीकृति दी जाए या नहीं। देश में कई नागरिक और जनांदोलनकारी संगठन इसका विरोध कर रहे थे। उन्होंने अपना विरोध बड़ी संख्या में नागरिकों के हस्ताक्षरों समेत सरकार के सभी महत्वपूर्ण पदाधिकारियों तक पहुंचा दिया था।
                आप जानते हैं इससे पहले बीटी कॉटन के उत्पादन की स्वीकृति मिली थी। महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में सबसे ज्यादा किसानों की आत्महत्या के पीछे एक प्रमुख कारण बीटी कॉटन की खेती में लगने वाला घाटा माना गया। उसकी काट के लिए बीज का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीच्यूट (आईएफपीआरआई) नाम का अमेरिकी थिंकटैंक’ भारत भेजा। उसने यह सिद्धकिया कि आत्महत्या के कारणों में बीटी बॉटन की खेती का घाटा नहीं है। 
                कपास इंसान के खाने के काम नहीं आती। अनाज और सब्जियां जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों से उगाना अप्राकृतिक लिहाजा असुरक्षित है। हालांकि,समस्त विरोध के बावजूद मुनाफाखोर कंपनियों के सामने पेश नहीं पड़ती है। क्योंकि देश के कर्णधारों के साथ उनका नेक्सस’ बना हुआ है। इस जानी-मानी सच्चाई की जाने-माने मोलेक्युलर बायोलॉजिस्ट डॉ. पीएम भार्गव ने हाल में एक बार फिर पुष्टि की है। डॉ. भागर्व जीएम फूड की स्वीकृति के लिए बनी जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी (जीईएसी) में सुप्रीम कोर्ट के नुमाइंदे थे। कमेटी ने डॉ. भागर्व के विरोध के बावजूद बीटी बैंगन के उत्पादन की स्वीकृति दे दी है। डॉ. भागर्व  कहते हैं देश के नेताओंप्रशासकों,वैज्ञानिकोंउद्योगपतियों का बहुराष्टीय कंपनियों के साथ नेक्सस’ बना हुआ है। जीईएसी की स्वीकृति भारत में बैंगन की फसल पर एकाधिकार करने के बहुराष्ट्रीय कंपनियों के षड़यंत्र का नतीजा है। उन्होंने इस स्वीकृति को देश पर आने वाली सबसे बड़ी आपदाओं में माना है।
                देश के कृषिमंत्री कहते हैं कमेटी का निर्णय अंतिम हैंसरकार की उसमें कोई भूमिका नहीं है। वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश कहते हैं सरकार का यह अधिकारबल्कि जिम्मेदारी है कि वह जनता की सुरक्षा के मामले में कमेटी की अनुशंसाओं पर अपना स्वतंत्र निर्णय ले। हम जानते हैं सरकार का वह निर्णय कमेटी का निर्णय बदलने वाला नहीं होगा। इस मामले में होगा वही जो कंपनियां चाहती हैं। मंत्रियों का आपसी विवाद वास्तविक विरोध से ध्यान भटकाने के लिए हो सकता है। हम चाहते हैं ऐसा न होलेकिन अभी तक के अनुभव को देखते हुए जयराम रमेश के वक्तव्य के पीछे अपना हिस्सा’ सुनिश्चित करना भी हो सकता है। कृषिमंत्री शरद पवार राष्ट्रवादी कांग्रेस के हैं,जयराम रमेश कांग्रेस के। भोपाल गैस कांड के अनुभव से हम अच्छी तरह जानते हैं कि डॉ. भार्गव जैसे वैज्ञानिकों/विशेषज्ञों का बाद में पता नहीं चलता। या तो वे सरकार की राय के हो जाते हैं या हटा दिए जाते हैं।
                भारत माता की छाती पर जमे ये पीपल,जैसा कि हमने मनमोहन सिंह के संदर्भ में पहले कहा हैसाम्राज्यवाद की संतान हैं। इनका बीज औपनिवेशिक दौर में पड़ा था जो भूमंडलीकरण के दौर में माकूल खाद-पानी पाकर लहलहा उठा है। आज यह अतिशयोक्ति लग सकती हैलेकिन जल्दी ही एक दिन ऐसा आ सकता है जब साम्राज्यवाद की ये संतानें कहें कि 1857 तो गलत हुआ ही, 1947 उससे भी ज्यादा गलत हुआबीच में विभिन्न धाराओं के स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा स्वतंत्रतास्वराजसमता और स्वावलंबन की पुकार न लगाई होती तो भारत को विकसित और महाशक्ति होने के लिए 2020 तक इंतजार नहीं करना पड़ता। आपको याद होगा यह तारीख पूर्व वैज्ञानिक’ राष्टपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने तय की थी। हालांकि अवकाश प्राप्ति के अवसर पर उन्हें यह तारीख नजदीक खिसकती नजर आई। उन्होंने आतुर भाव से कहा, ‘भारत 2020 से पहले भी महाशक्ति हो सकता है।’ 
                सेज की तरफ लौटें। देश के कई भागों में किसानों के प्रतिरोध और सिंगुर और नंदीग्राम में उनकी हत्याओं के बाद जो कुछ नेता किसानों के हित’ में सेज कानून 2005 में कुछ सुधार करने का सुझाव दे रहे थे,वे उस समय भी मौजूद थे जब किसानों को बरबाद और देशी-विदेशी पूंजीपतियों को मालामाल करने वाला यह कानून बना था। सुधारवादियों’ से स्वर मिलाते हुए सोनिया गांधी का कहना कि सेज के लिए खेती की जमीन नहीं दी जानी चाहिएभारतीय रिजर्व बैंक का बैंकों को यह निर्देश देना कि सेज विकसित करने वाली कंपनियों को उसी आधर पर कर्ज दिया जाए जिस आधार पर रीयल इस्टेट का धंधा करने वालों को दिया जाता हैसेज को टैक्स स्वर्ग’ बनाने के मामले में उस समय के वित्तमंत्री पी चिदंबरम की शुरुआती आपत्ति आदि से सरकार के भीतर तालमेल के अभाव का भले ही पता चलता होकानून को लेकर असहमति किसी की नहीं थी। किसानों के विरोध के बाद जिस तरह से सभी राजनैतिक पार्टियों की ओर से कानून में सुधार और संशोधन की आवाज उठीउससे एकबारगी लगा गोया यह कानून संसद ने नहीं कंपनियों ने बनाया है!
                सेज के लिए कर्ज और टैक्स के लिए क्या नीति होबंजर भूमि दी जाए या उपजाऊजमीन लेने से पहले किसानों की अनुमति ली जाए या नहीं;मुआवजे की दर और पुनर्वास की नीति क्या हो;प्रभावित किसानों को रोजगार दिया जाए या सहभागिता - ये जो सारे मुद्दे उठाए गएउन पर जो बहस चली और उनका जो भी समाधान निकला अथवा नहीं निकलासच्चाई यही रही कि पूंजीवादी-साम्राज्यवादी विकास में किसानों-आदिवासियों को समाप्त होना है। किसानों-आदिवासियों की समाप्ति का मतलब है कारीगरों और छोटे दुकानदारों का भी समाप्त होना।
               
                पूंजी की रंगभूमि
                देश के नगर-महानगर भी जमीन की जंग से बाहर नहीं हैं। विदेशी हो या निजीमुनाफाखोर पूंजी का अड्डा पूरी शानो-शौकत के साथ शहरों में जमता है। प्रेमचंद के उपन्यास का शार्षक उधार लें तो कह सकते हैं नगर-महानगर पूंजी की रंगभूमि’ हैं। यहां जमीन हथियाने के लिए गांव तो गंदी बस्ती में तब्दील किए ही जाते रहे हैंगंदी बस्तियों की जमीन हथियाने के लिए दंगों तक का सहारा लिया जाता है। झुग्गी-झोंपड़ियों में आग लगा दी जाती है। शहरों में जमीन का चक्कर गरीबों को ही नहींअमीरों को भी नचा रहा है। विभिन्न महकमों की या स्वतंत्र समूह आवास सोसायटियों की मार्फत सरकार से सस्ती जमीनें लेकर बनीं या खुद सरकारों द्वारा बनाई गई कॉलोनियों के कम अमीर वाशिदों को नए ज्यादा अमीर खरीदार और बिल्डर भारी-भरकम रकम देकर विस्थापित’ कर रहे हैं। यह सिलसिला शहर के विकास के छोर तक चलता चला जाता है। 
                अब जमीन हथियाने के लिए सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं या सार्वजनिक-निजी भागीदारी के नाम पर उन्हें निजी पूंजी के हवाले किया जा रहा है। निजी स्कूलों के लिए जमीन का टोटा न कभी पहले था,न अब है। नए खुलने वाले निजी और विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए जमीन शहरों में ही चाहिए। उन्हें मिल भी रही है। कमी पड़ती है तो आस-पास के गांवों तक शहर पहुंचा दिया जाता है। उदाहरण के लिए,दिल्ली की उत्तरी सीमा पर हरियाणा के 6 गांवों की उपजाऊ जमीन जबरन अधिग्रहित करके राजीव गांधी एजुकेशन सिटी बनाया जा रहा है। जमीन हरियाणा सरकार ने जनहित’ के नाम पर ली हैलेकिन एजुकेशन सिटी की योजना से लेकर निर्माण तक सारा काम विदेशी संस्थाएं/कंपनियां कर रही हैं। अपनी जमीन के अधिग्रहण का विरोध करने वाले या ज्यादा मुआवजा चाहने वाले किसानों को अदालत से भी राहत नहीं मिली।
                गांव के किसान व्यापार नहीं कर पाते। उनका मीजान एक-दो छोटी-मोटी नौकरी और जम कर खेती करने में ही बैठता है। हर जगह छिड़ी जमीन की जंग के चलते अब यह भी आसान नहीं रहा कि किसी दूसरे इलाके में जाकर जमीन खरीद ली जाए और खेती की जाए। मुआवजे का पैसा बरबाद होने में देर नहीं लगती। कोठियां बन जाएंगीकारें आ जाएंगीदुकानें खुल जाएंगी। गांव कुछ सालों में गंदी बस्तियों में तब्दील हो जाएंगे। पिछले अंक में हमने आपको बताया था पचास-सौ साल बाद साहब लोग’ कहेंगे इन गंदी बस्तियों को हटा कर कहीं दूर बसाओ। मोतीलाल नेहरू स्पोर्ट्स स्कूल भी कभी न कभी वहां से हटा दिया जाएगा। राजीव गांधी एजुकेशन सिटी में एनआरआई और दिल्ली समेत अन्य नगरों के नवधनाढ्य वर्ग के बच्चे शिक्षा पाएंगे। यह जरूरी है क्योंकि वैसी शिक्षा विदेशों में बहुत मंहगी पड़ती है। अब तो उसमें जान-जोखिम भी हो गया है। इन 6 गावों अथवा हरियाणा के अन्य गांवों के कुछ बच्चे वहां दाखिला पा सकते हैं,लेकिन वे फिर गांव के नहीं रह कर कंपनियों के बच्चे बन जाएंगे। पूरे देश में देहात के साथ यही कहानी चल रही है।
                शहरों में स्थित सरकारी कॉलिजों और विश्वविद्यालयों की जमीन पर अभी सरकारी स्कूलों जैसा हमला नहीं है। उन्हें बंद करके सीधे या पार्टनरशिप में निजी/विदेशी पूंजी का अड्डा बनाना अभी कठिन होता है। लेकिन वहां भी रास्ता निकाल लिया गया है। उच्च शिक्षा की सरकारी संस्थाओं में तेजी से नवउदारवादी अजेंडे की घुसपैठ बनाई जा रही है। यानी उन्हीं विषयों को शिक्षा बताया और बढ़ाया जा रहा है जो बाजार में बिकते हैं। यहां एक उदाहरण आपको देना चाहेंगे। कुछ साल पहले देश के मूर्द्धन्य दिल्ली विश्वविद्यालय की इमारतों का सौंदर्यीकरण करने के लिए इंग्लैंड से बड़ी मात्रा में विदेशी धन आया था। उस धन से बने कला संकाय और केंद्रीय संदर्भ पुस्तकालय के प्रवेशद्वार पर यूनीवर्सिटी प्लाजा’ लिखा गया है। उसी समय विद्यार्थी युवजन सभा ;वियुसद्ध के एक सदस्य राजेश रौशन ने प्लाजा के सभी शब्दकोशीय अर्थ देकर कुलपति को पत्र लिखा था कि शिक्षा-स्थल के लिए प्लाजा शब्द का उपयोग गलत हैलिहाजा उसे हटाया जाए। वह पत्र दि हिंदू’ अखबार में भी प्रकाशित हुआ था। लेकिन आज तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। 
                आमतौर पर जब किसानों की जमीन हथियाने का विरोध किया जाता है तो उस विशेष कानून में खामियां निकाली जाती हैंजिसके तहत सरकारें जमीन हथियाती हैं। ज्यादातर तो उचित मुआवजा देने और सही से पुनर्वास करने की मांग की जाती है। आदिवासी अलबत्ता जमीन न देने के लिए अड़ते हैं। उनके संघर्ष में जनांदोलनकारी संगठन जुटते हैं। नक्सलवादी-माओवादी आंदोलन भी जनांदोलन है जो संघर्ष का हिंसक रास्ता अपनाता है। किसानों का संघर्ष ज्यादातर ज्यादा मुआवजा पाने के लिए होता है। किसानों के साथ नेता होते हैं। ऐसे नेता जो फिलहाल सत्ता में नहीं होते। सत्ता बदलने पर किसानों के हिमायती नेता भी अक्सर बदल जाते हैं।
                मांगें न आदिवासियों की पूरी होती हैंन किसानों की। क्योंकि मूलभूत सच्चाई यह है कि किसानों-आदिवासियों के लिए इस व्यवस्था में जगह नहीं है। यानी किसान-आदिवासी रहते कोई जगह नहीं है। हम उनके विकास के जटिल प्रश्न को भूल नहीं रहे हैं। लेकिन विकास के प्रचलित मॉडल में उनकी आहुति ही होनी है। जब सिंगूर और नंदीग्राम के किसानों का संघर्ष चल रहा थापूंजीवादी विकास की शराब पीकर मतवाले हुए बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपनी जान में लाख टके का सवाल दागा - क्या किसान का बेटा किसान ही रहेगा?’ पलट कर उनसे पूछा जा सकता है - क्या आप किसान के बेटों को टाटा-अंबानी बनाने जा रहे हैंऐसा नहीं है भविष्य में खेती नहीं होगी। कारपोरेट खेती होगीजिसे मुनाफे के लिए कारपोरेट जगत कराएगा। सेज आने के पहले कारपोरेट खेती का फरमान जारी हो चुका था। कहने का आशय है कि किसानों-आदिवासियों की जमीन और जिंदगी से बेदखली कोई फुटकर घटना नहीं है। यह आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का अविभाज्य कर्तव्य’ है। 
                बड़ी पूंजी और उच्च तकनीकी पर आधरित उपभोक्तावादी सभ्यता कायम करना पूंजीवादी साम्राज्यवाद का ध्येय रहा है। उसे जलजंगलजमीन,पहाड़जैविक संपदा - सब चाहिए। उसकी राक्षसी भूख अनंत है। लिहाजाप्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और लूटपाट होना लाजिमी है। इस रास्ते पर उसने औपनिवेशिक दौर में तीन-चौथाई दुनिया के संसाधनों को लूटाआबादियों का सफाया किया और कई विशाल भूभागों पर कब्जा कर लिया। यह सब करने के लिए उसके पास मानव प्रगति के इतिहास में क्रांतिकारी होने का प्रमाणपत्र थाजो केवल पूंजीवादी विचारकों ने नहींसमाजवादी चिंतक कार्ल मार्क्स ने भी दिया था। उसी प्रमाणपत्र के बल पर पूंजीवादी साम्राज्यवाद आज तक उन आबादियों का सफाया करने में लगा हैजो उसके विकास में आड़े आती हैं। खेती-किसानीकारीगरीखुदरा दुकानदारी आदि में लगी आबादियां ऐसी ही हैं। पूंजीवादी साम्राज्यवाद को पूरी दुनिया में कायम होना हैतो दुनिया में बची इन आबादियों का सफाया होना लाजिमी है। यह उनकी नियति है। मार्क्स ने भी भोंदूऔर प्रतिक्रियावादी’ किसानों की इस नियति को देख लिया था।
                उपनिवेशवादी दौर के बाद स्वतंत्र हुए देशों में विकास का मॉडल पूंजीवादी ही रहाइसलिए स्वतंत्रात के बावजूद उनमें आंतरिक उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया चलती रही। विकास का मॉडल वही होने के चलते समाजवादी व्यवस्था वाले देशों में भी स्थिति ज्यादा भिन्न नहीं रही। लेकिन स्वतंत्रता संघर्ष की कुर्बानियों और मूल्यों के चलते आंतरिक उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया धीमी गति से चलती थी। जैसे ही भूमंडलीकरण के रास्ते नवसाम्राज्यवाद की वापसी और साम्राज्यवाद की संतानों की प्रतिष्ठा हुई,इन अभागी आबादियों के विस्थापन और विनाश की प्रक्रिया में एक बार फिर तेजी आ गई है।
1997 से अब तक अब करीब दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का आंकड़ा है कि 2008 तक199,132 किसानों ने आत्महत्या की है। गैर-सरकारी हवाले यह संख्या कहीं ज्यादा मानते हैं। वह हो भी सकती है। कल्पना कीजिए अगर देश में 100 पूंजीपति आत्महत्या कर लेते तो क्या कोहराम मचतालेकिन इतने बड़े पैमाने पर किसानों की आत्महत्या और आदिवासियों के विस्थापन के साथ व्यवस्था का काम बखूबी चलता रहता है। किसानों पर क्या कर्ज होता होगा जो पूंजीपतियों पर होता है! लेकिन वे कभी आत्महत्या नहीं करते। यह उनकी अपनी व्यवस्था है। सरकार उन्हें कर्ज माफी के साथ और कर्ज देती है। वे भव्य चैंबरों में सीधे प्रधनमंत्री और वित्तमंत्री से मिलते हैं। कृषिमंत्री और कृषि वैज्ञानिक उनकी मदद और हाजिरी में होते हैं। किसान-आदिवासी कहीं प्रतिरोध करते हैं तो पुलिस बल भेज कर उन पर गोली चलवाई जाती है। कलिंगनगर-काशीपुर से लेकर सिंगुर-नंदीग्राम,दांतेवाड़ादिल्ली की जड़ में नोएडा तक किसानों-आदिवासियों की जान और जमीन दोनों ली जा रही हैं। देश की सभी राजनैतिक पार्टियोंउनके बुद्धिजीवियों,यहां तक की देश की सर्वोच्च अदालत को यह मंजूर है। इस व्यवस्था में किसानों को आत्महत्या करने की अनुमति हैविरोध करने की नहीं!  

                जान के मायने
                पिछले करीब पंद्रह सालों से देश-भर में नारा गूंजता है - जान दे देंगे जमीन नहीं देंगे। हम लोग मध्य प्रदेश में संघर्ष के दौरान एक जोरदार गीत गाते हैं। गीत का मुखड़ा है - जान जावे तो जाएपर हक्क न मेरा जाए। जाहिर हैजान देने का नारा इसलिए दिया जाता है कि अपनी सरकार हैजान की कीमत पर जमीन भला क्यों लेगीअंग्रेजी हुकूमत तो है नहींकि नरम नहीं पड़ जाएगीलेकिन सरकारें अपनी रह नहीं गई हैं। वे हक के साथ जान भी लेने में नहीं हिचकतीं। आप झट से कह सकते हैं कि तब तो नक्सलवादी ठीक ही हिंसा का रास्ता अख्तियार किए हुए हैं। क्रांति न हो,दो-चार को मार कर मरते हैं। महाशक्ति’ भारत केईमानदार’ प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह, ‘त्याग की देवीसोनिया गांधी और उनके सिपहसालार ठीक यही चाहते हैं।
                नक्सलवाद भारत की सबसे विकट समस्या नहीं हैयह बच्चा भी बता देगा। लेकिन प्रधानमंत्री उसे बार-बार देश की सबसे विकट समस्या बताते हैं। यह दरअसल हकीकत नहींउनकी मंशा है। हिंसक व्यवस्था के एजेंट को हिंसक प्रतिरोध चाहिए। ताकि सेना भेज कर विकास विरोधियों’ की हत्या के अभियान को तेज किया सके। हर पार्टी के विकास पुरुष’ उनके साथ हैं। शायद ही किसी ने नक्सलवादियों पर सेना से हमले करने के उनके मंसूबे का गंभीर विरोध किया हो। दरअसलजल-जंगल-जमीन के हक की लड़ाई लड़ने वाले सभी संगठनों और लोगों को मनमोहन सिंह मंडली जल्दी से जल्दी निपटा देना चाहती है। ध्यान कर लेंउनके इस मंसूबे में देश का लोकतंत्र भी निपट सकता है!
                जरूरी नहीं कि सभी किसानआदिवासी,छोटे दुकानदार आत्महत्या कर लें या प्रतिरोध करते हुए मारे जाएं। भारत की विशाल आबादी के मद्देनजर यह असंभव है। आधुनिक सभ्यता में खेती एक अधम पेशा हैवह भी घाटे का। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि किसान घाटे की खेती से निजात पाने या आधुनिक उपभोक्तावाद की चकाचौंध में खुद जमीनें बेचने का फैसला कर रहे हैं। आदिवासीदलित और अति पिछड़ी जातियां इस व्यवस्था को अपनी विकास परियोजनाओं में हाड़-तोड़ मेहनत करने के लिए जिंदा चाहिए। उनका अपने घरों और फिर परियोजना दर परियोजना से मुसलसल विस्थापन  होते रहना है। इस तरह भारत की यह विशाल आबादी काफी बड़ी तादाद में लंबे समय तक जिंदा रहेगी। लेकिन उनके होने का कोई मोल या मीजान इस व्यवस्था में नहीं होगा। 
                मनुष्य की जान केवल शरीर नहीं होती। उसमें बहुत कुछ होता है। कुछ अच्छा होता हैकुछ बुरा होता है। अच्छाई क्या है यह जाननेउसे पानेकायम करनेऔर उतरोत्तर उन्नत करने का उद्यम मनुष्य करता है। उसी क्रम में बुराई की पहचान और परहेज का विवेक भी बनता चलता है। अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष चलता है। अच्छाई में कुछ बुराई समा जाती है,बुराई में कुछ अच्छाई। अलबत्ताऐसा माना जाता है कि संघर्ष के पीछे अच्छाई की प्रेरणा होती है, या होनी चाहिए; अच्छाई की जीत की इच्छा और इच्छा-शक्ति भी; ताकि हम निरे बुरे न बन जाएं। मनुष्य का यह सांस्कृतिक संघर्ष है जो चिरकाल से चला आया है। बुराई से निरंतर लड़ने के लिए मनुष्य/समाज का सख्तजान होना जरूरी होता है। अगर वह जमीन से,श्रम से जुड़ा हैतो सख्तजान होगा। जमीन से काट दिए जाने पर उसकी जान जाती रहेगी। किसानों-आदिवासियों की वही हालत है। जिंदा रहने पर भी वे बेजान हैं।  
                किसानों-आदिवासियों को सामंती संस्कृति का बुरा अवशेष माना जाता है। जबकि वे सामूहिकता और श्रम की संस्कृति की संतान हैं। यह स्पष्ट हो चुका है कि शोषणमूलक ठल्लू सामंती संस्कृति पूंजीवाद के साथ मिल कर बची रहती है। लेकिन सहयोगश्रम और प्रकृति से साहचर्य पर आधारित किसान-आदिवासी संस्कृति को विनष्ट और विकृत किया जाता है। ग्राम-विकास की बात हो तो आजादी के समय से ही रही है,लेकिन उसका अर्थ होता है गांव को शहर बनाना - गांव होने के पाप’ को मिटाना। हम यह नहीं कहते कि गांव आदर्श या निष्पाप उपस्थिति थे। लेकिन वे थे और बड़ी तादाद में थेतो ग्राम-विकास की गांव-केंद्रित योजनाएं बननी चाहिए थीं। यह लोकतंत्र का भी तकाजा था,समाजवाद का भी और धर्मनिरपेक्षता का भी। लेकिन एक अंधविश्वास की तरह मान लिया गया कि गांव गंदे होते हैं और वे सभी शहर बन जाएंगे। गांधी की बात बिल्कुल नहीं सुनी गई।
                अंबेडकर नेहरू की तरह गांवों को बुरा मानते थे। लेकिन उनका वैसा मानने का विशेष संदर्भ था। उन्होंने दलितों को सलाह दी थी कि वे जातिवाद के दंश और प्रताड़ना से बचने के लिए गांवों से शहर आकर बसें। दलितों के लिए यह बिल्कुल सही सलाह थी। लेकिन दलित लेखकों की आत्मकथाएं पढ़ कर पता चलता है कि शहरों में भी वे अछूत ही बने रहे। गांवों में रहने वाले दलित गांधी-अंबेडकर के समय से और ज्यादा अछूत बन गए हैं। शहर आकर बसने वाले दलित तक अब उनके पास  नहीं जाना चाहते।  
                गांव से उभरने वाली आवाज को दबा दिया गया। वह दमित होकर विकृत हुई और विध्वंसक भी। जिस देश में सरकारें सत्ता का खुला और भरपूर दुरुपयोग करती होंमाफिया अपनी सरकार चलाते हों,वहां खाप पंचायतें हत्या के फरमान जारी न करेंयह कैसे संभव हैखाप पंचायतों का युवक-युवतियों की हत्या का फैसला देना मध्ययुगीन बर्बरता का अवशेष नहींआधुनिकता का ही एक विकृत रूप है। करीब आठ लाख गांवों और छोटे कस्बों के देश को नगरीय सभ्यता में बदलने के अव्यावहारिक उद्यम का यही नतीजा होना था। और अव्यावहारिक बता दिया गया गांव-स्वराज की बात करने वाले गांधी को! दरअसल,सामंती संस्कृति वाया पूंजीवाद समाजवाद में प्रवेश कर जाती है। फिर तीनों की ताकत किसान-कारीगर-आदिवासी संस्कृति पर हमला बोलती है। अपनी मेहनत से थोड़े में गुजारे का आदर्श न सामंतवाद में थान पूंजीवाद में है। वैज्ञानिक समाजवाद में भी समानता का भौतिक लक्ष्य सबको सेठ-साहूकारों जैसा अमीर बनाना है। उसीसे समाजवादी नेताओंनौकरशाहों और बुद्धिजीवियों को अपने शानो-शौकत भरे जीवन की वैधता हासिल होती है।
                चर्चा को समेटें। बड़ी से बड़ी पूंजी और उन्नत से उन्नत तकनीकी भारत की एक अरब बीस करोड़ आबादी को विकसित’ नहीं बना सकती। जिस नौ-दस प्रतिशत विकास-दर का राग प्रधनमंत्री गाते नहीं थकतेउससे एक यूरोपीय देश के बराबर की आबादी का ही दोयम दर्जे का विकास हो सकता है। वही हो रहा है। बाकी सब अंधविश्वास है और अंधकार है। किसान-आदिवासी बच सकें और एक बेहतर जीवन-स्तर और जीवन-शैली के हकदार होंतो पूंजीवादी साम्राज्यवाद को खारिज कर उसका विकल्प तैयार करना होगा। ऐसा करना आसान हो सकता हैअगर आधुनिक बुद्धि यह स्वीकार करे कि पूंजीवाद मानव प्रगति का क्रांतिकारी चरण नहीं था। यह धारणा तर्कसम्मत नहीं हो सकती कि कोई चरण शुरू में क्रांतिकारी हो और बाद में प्रतिक्रियावादी-फासीवादी-साम्राज्यवादी बन जाए। जबकि उसने शुरू में ही अलग-अलग भूभागों में अनेक आबादियों का लगभग समूल नाश कर दिया और उनके समस्त संसाधनों पर कब्ज़ा जमा लिया।
                लेनिन समेत सभी कम्युनिस्ट विचारक साम्राज्यवाद को पूंजीवाद की उच्चतम अवस्था मानते हैं। लोहिया का कहना है कि पूंजीवाद का अस्तित्व बिना साम्राज्यवाद के संभव ही नहीं होता। उन्होंने अपने मशहूर लेख मार्क्सोत्तर अर्थशास्त्र’ में मार्क्स के पूंजीवाद के अध्ययन की एकांगिता का उल्लेख करते हुए बताया है कि उन्नीसवीं सदी के जिस पूंजीवाद को मार्क्स अपने अध्ययन का आधार बनाते हैंउसमें यूरोप द्वारा बाकी दुनिया की लूट की अनदेखी की गई है। पूंजीवाद के क्रांतिकारी होने और साथ ही श्रमआपसी सहकार और प्रकृति के साहचर्य से बनी किसान-आदिवासी जन-संस्कृति को सामंती मानने की भ्रांति का निवारण जब तक नहीं होतातब तक किसानों-आदिवासियों की जमीन और जान दोनों ली जाती रहेंगी।

                दिसंबर 2009

   पुनश्च : मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पद ग्रहण करने पर सबसे पहले उपनिवेशकालीन 'भूमि अधिग्रहण कानून' में किसानों के हित में हुए कतिपय प्रावधानों को निरस्त करने के लिए अध्यादेश लेकर आए। हमने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कारपोरेट का रोबो’ कहा थानरेंद्र मोदी को कारपोरेट का डिजिटल टॉय’ कहा जा सकता है। 

Saturday, May 6, 2017

किस गण का तंत्र है अर्णब का ये Republic

जेल में सजायाफ्ता क़ैदी फोन से बात करे ये कानून व्यवस्था में कोताही है। देश के एक बड़े नेता सजायाफ्ता क़ैदी की बातों को गंभीरता से सुने ये निंदनीय है। और एक टीवी चैनल इस बातचीत के स्टिंग को चलाए ये साहसिक है। इस साहस के लिए अर्णब को धन्यवाद। 

ये किसी से छिपा नहीं है कि अर्णब गोस्वामी अपना चैनल क्यों लेकर आए हैं, किसके लिए लेकर आए हैं? अर्णब गोस्वामी की एकतरफा पत्रकारिता और उसका मकसद साफ है। कौन उनके निशाने पर रहा है और आगे भी रहने वाला है? ये भी छिपा नहीं है सब खुल्लम खुल्ला है। ज़ाहिर है उनके निशाने पर वही हैं जो 2019 में भक्तों की टोली के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है। 

अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखने वाला एक पूर्व सांसद जो कि सजायाफ्ता है अपने इलाक़े में हो रहे दंगे से चिंता में है। शहाबुद्दीन साफ कह रहे हैं कि लालू जी रामनवमी में उस जगह पर पुलिस का Deputation होना चाहिए था, लेकिन नहीं हुआ। सिवान शहर की स्थिति खराब है। क्या शहाबुद्दीन की ये चिंता वाजिब नहीं है, और क्या ऑडियो सुनने के बाद पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े नहीं होते। क्या अर्णब की चिंता ये है कि सरकार ने सिवान में दंगे को कंट्रोल क्यों कर लिया? 

अभी पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में सांसद के समर्थकों ने एसपी के आवास पर हमला बोल दिया। एसपी के परिवार ने किसी तरह अपनी जान बचाई। ये ना तो देश जानना चाहता है, और ना ही इसपर किसी चैनल को चिंता है। बिहार में ऐसी कोई बात नहीं है वो एसपी आज भी वहीं हैं जिसे हटाने की बात शहाबुद्दीन 2016 में बिहार सरकार में शामिल सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष से कर रहे थे । 

एक बात और 'खत्म है SP भाई आपका' इसका अंग्रेजी अनुवाद Republic ने Your SP is finished किया है। मैं भोजपुरी भाषी तो नहीं लेकिन हमारी अंगिका में भी खत्म को जब इस तरह बोला जाएगा तो उसका मतलब होगा Non performer ना कि Finished. ज़ाहिर है Republic न्यूज़ चैनल ने ये ग़लती जानबूझकर की है।  

Wednesday, April 5, 2017

Socialist Party (India) Delhi State Convention


Socialist Party (India) Delhi State Convention
(Sanwaldas Gupta Nagar)
12 Chelmsford Road, New Delhi
2 April 2017

Resolution
Delhi is the capital of the country. The centre of power and culture. Its National Capital Regin (NCR) is a large base for several national and international multinational companies. But leaving a few privileged ones and their areas the civic life of this city is full of misery and deprivation. Murders, roberies, skirmishes and riots, assaults on women’s modesty happen here routinely in broad daylight. Ever new cyber crimes along with other crimes have become commonplace in Delhi and NCR. Lower and lower middle classs continually grapples with unemployment and inflation. Lakhs of children, women and elderly beg at intersections and sleep on the streets. Lakhs of children are servants in affluent homes or eateries. In villages, resettlement colonies, JJ colonies and older areas of the city, there is a perpetual deprivation of civic amenities like toilets, roads, parks, sewer connections etc. There is no stopping the privatisation of essential services like electricity, water, health and education at the hands of profiteering companies in the country’s capital. Instead of building schools, training institutes, colleges, universities or research institutes, the government is busy gifting away the land acquired from farmers at a pittance, to the corporate houses, the uber rich and the builders to open luxury hotels, mega malls, farm houses, resort hospitals, bars and cassinos. In pursuit of capitalist development, Delhi has become one of the most polluted city in the entire world. A lot of epidemics are unleashed due to pollution and every year thousands of people lose their lives and lakhs of them lose their health. Both the rich and the poor are affected.

Aam Admi Party which accused the Congress of corruption to come to power has a deeply corrupt administration. No work happens in any departement without bribes. In the Kejriwal government, which has been an open votary of capitalism, the wealthy and the brokers are rolling in money while the general public is in deep distress. The current Delhi government has emulated the Modi government at the centre in burning away millions of rupees of hard earned tax-payer’s money in the name of building the luminous image of their leader and the party. The Chief Minsiter Arving Kejriwal and the deputy Chief Minister Manish sisodia seem to be vying with each other for the more expensive hoardings and posters with their photos.Kejriwal, who claimed to live simply and honestly in the days of the anti-corruption movement, lives like royalty as Chief Minsiter. In a small, halfway state like Delhi, there is a Deputy CM, who lives with full fanfare in the residence of the previous CM, Sheila Dikshit. Both these characters have come from the NGO world and are running the government according to the those very principles. That is, the ruse of fooling the poor to protect profiteering capitalism. Most of the country’s progressive civil society and its leaders favour this party, which aspires to be the B team of BJP. The Socialist Party believes that this is a serious challenge for the politics of constitutionally warranted equality and freedom.

Through this convention the Socialist Party 9India) Delhi State, issues the following demands on behalf of the working class of Delhi:

  1. In every part and section of Delhi, the freedom and respect of women must be ensured.
  2. The needs of the elderly, people with disability and children must receive utmost care and attention.
  3. Keeping in mind the new challenges of life in the capital, creative policy for the youth and children must be undertaken.
  4. Privatization of electricity, water and health services in Delhi must stop.
  5. Privatization of education must stop. The existing private schools, colleges and universities must be nationalized/ socialized.
  6. The government must fulfill its constitutional duty to provide equal, free, quality education in the mother tongue.
  7. In all the schools at all levels, and in colleges and university departments, vacant positions must be filled right away.
  8. Privatization of electricity, water and health services must stop. Private hospitals must be nationalized/ socialized.
  9. In all government departments, the vacant positions of class three and four employees must be filled immediately. In order that people’s problems get resolved quickly, more positions must be generated in departments. Contractual system must end.
  10. In the villages of Delhi, services such as housing, roads, electricity, water, libraries, women centers, child centers, health centers, parks, community centers, schools, colleges, vocational institutes etc., must be made available as per the requirements of all the citizens. Apart from farmers, craftsmen families who depend on agriculture for their livelihood, must also be given residential plots.
  11. Unauthorized colonies must be authorized with all civic amenities.
  12. Families living in JJ colonies for long must be given residential flats as per at one go.
  13. Citizens willing to be self-employed must be given permission and facilities to run small cottage industries on a priority basis.
  14. Street vendors must not need to pay committees and police any kind of bribe, there must be a permanent resolution to this.
  15. Unauthorized colonies must be given comprehensive civic amenities and regularized.
  16. It must be ensured that all the traffic signals in the city function properly every day.

Thus stands the Socialist Party
Upholding brotherhood and equality




Socialist Party (India) Delhi State 

Monday, April 3, 2017

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) दिल्ली प्रदेश सम्मेलन रिपोर्ट

''दिल्ली के बुनियादी मुद्दों पर संघर्ष केवल सोशलिस्ट पार्टी इंडिया कर रही है। ये अकेली पार्टी है जिसने देश की राजधानी में कॉर्पोरेट राजनीति की आड़ में चल रहे लूटतंत्र की मुखालफत लगातार की है। साथ ही सोशलिस्ट पार्टी इंडिया ने पूरी सक्रियता से दिल्ली की केजरीवाल सरकार की वादाखिलाफी को भी जनता के सामने रखने का प्रयास किया है।- प्रेम सिंह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, सोशलिस्ट पार्टी(इंडिया)''

2 अप्रैल रविवार को 12 चेम्सफोर्ड रोड नई दिल्ली में सोशलिस्ट पार्टी इंडिया का एक दिवसीय राज्य सम्मेलmन आयोजित हुआ। सम्मेलन में शामिल पार्टी नेताओं ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार और केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों को जनता के सामने बेनक़ाब करने की रणनीति बनाई। एक दिवसीय राज्य सम्मेलन दो सत्र में आयोजित हुआ। पहले सत्र का उद्घाटन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ प्रेम सिंह ने किया। इस सत्र में सोशलिस्ट पार्टी इंडिया के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ प्रेम सिंह, पार्टी के राष्ट्रीय सचिव, फैजल भाई, पार्टी की वरिष्ठ नेता रेणु गंभीर, और .......मौजूद रहे। राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ प्रेम सिंह ने कहा कि मौजूदा दौर में देश में सबसे मजबूत राजनीतिक विकल्प सोशलिस्ट पार्टी इंडिया ही हो सकती है। क्योंकि मुख्यधारा की बाकी पार्टियां कहीं ना कहीं नव उदारववाद और सांप्रदायिकता के एजेंडे को ही आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। पार्टी नेता और खुदाई खिदमतगार के फैजल  भाई ने कहा कि मौजूदा दौर धर्मनिरपेक्ष लोगों के लिए चुनौती भरा है, और ऐसे माहौल में हमें मिलजुलकर देश की एकता बचाए रखने के लिए संघर्ष करना है।  

दूसरे सत्र में पार्टी का प्रस्ताव पढ़ा गया। युवा नेता योगेश पासवानन ने प्रस्ताव पेश किया । दूसरे सत्र में प्रस्ताव पर पार्टी के तमाम नेताओं ने अपनी राय रखी। इस सत्र में जेडीयू के महासचिव अरुण श्रीवास्तव, सोशलिस्ट पार्टी लोहिया के महासचिव संदीप मरोडिया, सोशलिस्ट जनता पार्टी की अध्यक्ष मंजू मोहन, डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष प्रबोध सिन्हा, कामरेड नरेन्द्र सिंह, ट्रेड यूनियन नेता, आज़ाद, ट्रेड यूनियन नेता, डॉक्टर एके अरुण, संपादक युवा संवाद ने अपनी बात रखी।        

सोशलिस्ट पार्टी के राज्य सम्मेलन में दिल्ली प्रदेश की नई कार्यकारिणी भी घोषित की गई। इसमें डी एन कालिया को दिल्ली का प्रदेश अध्यक्ष और सैयद तहसीन अहमद को कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया। इसके अलावा महेंद्र यादव, शऊर खान, तृप्ति नेगी को उपाध्यक्ष चुना गया। योगेश पासवान, अर्चना रानी और शिवा त्रिपाठी दिल्ली प्रदेश के पार्टी महासचिव चुने गए। जबकि रिज़वान अहमद और सहबाज मल्लिक सचिव और शिवदत्त को कोषाध्यक्ष चुना गया। 

सम्मेलन का समापन पार्टी के वरिष्ठ नेता जस्टिस राजेन्द्र सच्चर ने किया। उन्होंने दिल्ली प्रदेश की नई  टीम को बधाई देते हुए कहा कि उन्हें खास तौर पर दिल्ली की गरीब जनता के लिए काम करना है। झुग्गी झोंपड़ियों, पुनर्वास कोलोनियों और गाँवों में रहने वाले नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली की समस्याओं का स्थायी और मुकम्मल हल होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार को उन व्यापारियों का नाम घोषित करना चाहिए। जिन्होंने सरकारी बेंकों का 6 लाख करोड़ रुपया दबाया हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने भी सररकार को यह कहा है. उन्होंने आगाह किया कि मौजूदा सरकार कम्पनी ऐक्ट के जरिये लोगों के लोकतंत्र को कार्पोरेट लोकतंत्र में तब्दील करना चाहती है. सोशलिस्ट पार्टी को खासकर इन दो मुद्दों के बारे में जनजागरण का काम करना चाहिए और संसद में विपक्षी पार्टियों के नेताओं को लिखना चाहिए. 

सोशलिस्ट पार्टी इंडिया दिल्ली प्रदेश के राज्य सम्मेलन में पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं के अलावा दिल्ली के कई सामाजिक संगठन, मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार, शिक्षक और सहमना साथी मौजूद रहे।    

Sunday, April 2, 2017

सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) दिल्ली प्रदेश प्रस्ताव 2017

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सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) दिल्ली प्रदेश का राज्य सम्मेलन
(साथी सांवलदास गुप्ता नगर)
12 चैम्सफोर्ड रोडनई दिल्ली
2 अप्रैल 2017
प्रस्ताव

दिल्ली देश की राजधानी है। सत्ता और संस्कृति का केंद्र है। इसका राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र देशी-विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियों का बड़ा बेस है। लेकिन चंद हैसियतमंदों और उनके इलाकों को छोड़ कर इस शहर का नागरिक जीवन बदहाली से भरा है। यहां दिन-दहाड़े हत्याएंलूटपाटझगड़ा-फसादमहिलाओं के सम्मान और अस्मत पर हमले होते हैं। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में आये दिन नए साइबर अपराधों समेत हर तरह के अपराध आम बात है। निम्न और निम्न मध्यवर्ग लगातार मंहगाई और बेरोजगारी की मार में जीता है। लाखों बच्चेबूढ़ेमहिलाएं चौराहों पर भीख मांगते हैं और सड़कों पर सोते हैं। लाखों बच्चे संपन्न परिवारों अथवा ढाबों में नौकर हैं। गांवोंपुनर्वास बस्तियोंझुग्गी-झोंपड़ी बस्तियों और शहर के पुराने इलाकों में शौचालय, सड़कपार्कसीवर जैसी जरूरी नागरिक सुविधाओं का नितांत अभाव है। बिजलीपानीस्वास्थ्यशिक्षा जैसी जीवन के लिए जरूरी सेवाओं का निजीकरण करके मुनाफाखोर कंपनियों के हवाले करने की मुहिम पर देश की राजधानी में कोई रोक नहीं है। सरकार स्कूलप्रशिक्षण संस्थानकॉलेजविश्वविद्यालयशोध संस्थान खोलने के बजाय किसानों से मिट्टी के मोल ली गई जमीन आलीशान होटलमॉलफार्म हाउसरिजोर्टअस्पतालजुआ और शराब के अड़्डे खोलने के लिए कारपोरेट घरानोंधन्ना सेठों और बिल्डरों को लुटाती है। पूंजीवादी विकास की होड़ में दिल्ली दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरो में से एक बन गया है। प्रदूषण के चलते महामारियां फैलती हैं और हर साल हजारों लोग अपनी जान और लाखों लोग स्वास्थ्य से हाथ धो बैठते हैं। इनमें गरीब और अमीर दोनों होते हैं।
भ्रष्टाचार के लिए कांग्रेस को कोस कर सत्ता में आने वाली आम आदमी पार्टी के पूरे प्रशासन में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। किसी विभाग में कोई काम रिश्वत के बगैर नहीं हो पाता। पूंजीवाद की खुली पैरोकार केजरीवाल सरकार के शासन में अमीर और दलाल मालामाल और मेहनतकश जनता बेहाल है। मौजूदा दिल्ली सरकार ने केंद्र की मोदी सरकार की तर्ज पर जनता की गाढ़ी कमाई का अरबों रुपया अपने नेता और पार्टी की छवि चमकाने पर फूंक दिया है। मुख्यमंत्री केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया में अपने फोटो वाले कीमती होर्डिंग-पोस्टर लगवाने की होड़ लगी रहती है। फोट छपवाने की हविस का आलम यह है कि केजरीवाल ने गुरु गोविन्द सिंह जी के 350वें जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में लगवाए गए होर्डिंग्स पर भी अपना फोटो लगवाया। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान सादगी और ईमानदारी का दावा करने वाले केजरीवाल बतौर मुख्यमंत्री शाही अंदाज में रहते हैं। दिल्ली जैसे आधे-अधूरे और अत्यंत छोटी भौगोलिक सीमा वाले राज्य में उपमुख्यमंत्री रखा गया हैजो पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के आवास में ठाठबाट के साथ रहता है। ये दोनों शख्स एनजीओ जगत से आए हैं और उसी तर्ज पर सरकार चला रहे हैं। यानी मुनाफाखोर पूंजीवाद को बचाने के लिए गरीबों को फुसलाने का नाटक। भाजपा की बी टीम बनने की कवायद में लगी आम आदमी पार्टी का समर्थन देश और दिल्ली का ज्यादातर प्रगतिशील नागरिक समाज और नेता करते हैं। सोशलिस्ट पार्टी का मानना है कि संविधानसममत समता और स्वतंत्रता की राजनीतिक धारा के लिए यह चिंता और चुनौती का सबब है।   
इस सम्मेलन की मार्फत सोशलिस्ट पार्टी दिल्ली प्रदेश दिल्ली की मेहनतकाश जनता के हवाले से निम्नलिखित मांगें पेश करती है:
1. दिल्ली शहर के हर इलाके और हर तबके में महिलाओं की स्वतंत्रता और सम्मान सुनिश्चित किया जाए।
2.  वरिष्ठ नागरिकोंविकलांगों और बच्चों की सहूलियत का अधिकाधिक ख्याल रखा जाए।
3.  राजधानी के जीवन की नई चुनौतियों और जरूरतों के मद्देनजर रचनात्मक युवा नीति और बाल नीति का निर्माण किया जाए।
4.  दिल्ली में बिजलीपानी और स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण बंद हो।  
5. शिक्षा का निजीकरण बंद हो। अभी तक बन चुके निजी स्कूलोंकॉलेजोंविश्वविद्यालयों का राष्ट्रीयकरण/समाजीकरण किया जाए।
6.   सरकार सबको समाननिशुल्कगुणवत्तापूर्ण शिक्षा मातृभाषा में देने का संवैधानिक दायित्व पूरा करे। 
7.  दिल्ली सरकार के सभी स्तर के स्कूलों में और दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों/विभागों में शिक्षकों के खाली पद तुरंत भरे जाए।
8. दिल्ली में बिजलीपानी और स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण बंद हो। प्राइवेट अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण/समाजीकरण किया जाए।    
9. दिल्ली सरकार के सभी विभागों में चौथी और तीसरी श्रेणी के कर्मचारियों के खाली पद तुरंत भरे जाएं। नागरिकों का काम जल्दी होइसके लिए सभी विभागों में नए पदों का सृजन किया जाए। ठेकेदारी प्रथा बंद की जाए।
10. दिल्ली के गांवों में वहां के समस्त नागरिकों के हितों को तवज्जो देते हुए आवाससड़कबिजलीपानीपुस्तकालयमहिला केंद्रबाल केंद्रस्वास्थ्य केंद्रपार्कसामुदायिक स्थलस्कूलकालेजवोकेशनल संस्थान आदि की सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। किसानों के अलावा खेती पर निर्भर रहने वाले कारीगर परिवारों को रिहायशी प्लाट दिए जाएं।
11.  अनियमित कॉलोनियों को समुचित नागरिक सुविधाएं देकर नियमित किया जाए।
12. लंबे समय से जेजे कॉलोनियों में रहने वाले सभी परिवारों को एकमुश्त योजना के तहत रिहायशी फ्लैट दिए जाएं।
13. स्वरोजगार के इच्छुक नागरिकों को लघु व गृह उद्योग चलाने की छूट व सुविधाएं प्राथमिकता के आधार पर दी जाएं।
14. रेहड़ी-पटरी पर दुकान लगा कर पेट पालने वाले नागरिकों को कमेटी और पुलिस को रिश्वत नहीं देनी पड़ेइसका स्थायी हल निकाला जाए।
15. अनियमित कॉलोनियों को समुचित नागरिक सुविधाएं देकर नियमित किया जाए।
16. यह सुनिश्चित किया जाए कि शहर के ट्रेफिक नियमन के लिए पूरे शहर की लाल बत्तियां हर दिन काम करें।           

सोशलिस्ट पार्टी का नारा
समता और भाईचारा 

Wednesday, March 8, 2017

यूपी चुनाव: सांप्रदायिक फासीवाद की खोखली चिंता-प्रेम सिंह


सांप्रदायिकताजातिवाददल-बदल (बाहुबलियोंदागियोंधनपतियों समेत), निम्न स्तरीय आरोप-प्रत्यारोप,खैरातविकास आदि के कोहराम से भरा सात चरणों में फैला यूपी विधासभा चुनाव आज समाप्त हो गया। सभी पक्षों की सांस 11 मार्च को आने वाले नतीजों पर अटकी है। चुनाव के पहले चरण से ही मतदान के रुझानों और नतीजों को लेकर अटकलबाजियों का बाजार गरम रहा है। नतीजे जो भी होंइस बहुचर्चित चुनाव की सात विषेशताएं (नकारात्मक) स्पष्‍ट देखी जा सकती हैं : पहलीजीत की दावेदार पार्टियों के शीर्ष नेताओं की जनसभाओंरैलियोंरोड शो आदि के चलते इस बार मतदाता ही नहींचुनाव लड़ रहे उम्मीदवार भी भीड़ बना दिए गए हैं। अगर उनकी कुछ खबर लगी भी है तो यह कि वे किस जातिधर्म या परिवार के हैं। दूसरी,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने चुनाव जीतने के लिए संवैधानिक प्रावधानों के साथ सामान्य नैतिक मर्यादाओं का जो खुलेआम उल्लंघन किया हैवह दर्शाता है उनकी आस्था ही उनमें नहीं है। तीसरीसेकुलर कही जाने वाली पार्टियां पूरे पांच साल सांप्रदायिकता को बढ़ाती और मजबूत करती हैं,लेकिन चुनावों के वक्त आरएसएस/भाजपा से लड़ने की जिम्मेदारी मुसलमानों पर डाल दी जाती है। उत्तर प्रदेश में यह खास तौर पर होता है। मजेदारी यह है कि खुद मुसलमान उत्साहपूर्वक यह भूमिका निभाते नजर आते हैं। चौथीमीडिया की खबरों और रिपोर्टिंग में वस्तुनिष्‍ठता और तथ्यात्मकता की गिरावट बदस्तूर जारी है। पांचवीसांप्रदायिकता की काट में जाति समीकरण से चुनाव जीतने से सांप्रदायिकता नहीं रुकती। छठीकेंद्र हो या राज्यसेकुलर पार्टियों की सत्ता के बावजूद समाज में सांप्रदायिकता की पैठ और फैलाव तेजी से बढ़ता जा रहा है। सातवींसेकुलर नागरिक समाजखास कर चुनाव के वक्तसांप्रदायिकता पर भारी चिंता जताता है। इस लेख में नागरिक समाज की सांप्रदायिकता को लेकर जताई जाने वाली चिंता पर विचार किया गया है।
                यूपी विधासभा के साथ पंजाबउत्तराखंडगोवा और मणिपुर विधानसभाओं के चुनाव भी संपन्न हुए हैं। लेकिन नागरिक समाज के सेकुलर खेमे की सारी चिंता यूपी विधानसभा चुनावों को लेकर रही है कि वहां आरएसएस/भाजपा न जीत जाए। आगे बढ़ने से पहले हम एक प्रसंग का उल्लेख करना चाहते हैं। पिछले साल सितंबर के महीने में कनाडा से रामशरण जोशी जी से फोन पर बात हुई थी। उन्होंने फोन पर यूपी चुनाव को लेकर चिंता जताते हुए पूछा था कि वहां क्या होने जा रहा हैबातचीत के दौरान उन्होंने आतुर भाव से कहा कि कुछ भी होकोई जीतेभाजपा नहीं जीतनी चाहिए। मैंने उनसे कहा कि उत्तर प्रदेश में यह बहुत आसान है। अगर प्रदेश की दो प्रमुख सेकुलर कही जाने वाली पार्टियां - समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी - मिल कर चुनाव लड़ें तो भाजपा की पराजय लगभग निश्चित है। उन्होंने निराशा जाहिर की कि ऐसा भला कहां हो पाएगा - दोनों पार्टियों में छत्तीस का आंकड़ा है! हमने कहा कि अगर देश के सेकुलर नागरिक समाज की आरएसएस-भाजपा के सांप्रदायिक फासीवाद को लेकर चिंता सच्ची हैतो सेकुलर कही जाने वाली राजनीतिक पार्टियों को उनकी चिंता पर ध्यान देना होगा। यानी आरएसएस/भाजपा का सांप्रदायिक फासीवाद राजनीतिक पार्टियों के लिए भी सच्ची चिंता का विषय बनेगा।
                हमने जोशी जी से आगे कहा कि चुनाव जीतने के बाद सत्ता के बंटवारे का मसला आसानी से सुलझाया जा सकता है। जीत के बाद मायावती और अखिलेश यादव बारी-बारी से मुख्यमंत्री रहें। इस पर बात न बने तो अखिलेश मुख्यमंत्री रहेंबसपा का कोई नेता उपमुख्यमंत्री रहे और कांग्रेस-रहित विपक्ष मायावती को2019 में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार करे। अगर इस पर भी बात न बने तो आधा समय मायावती और आधा समय कोई दूसरा महत्वाकांक्षी नेता प्रधानमंत्री बने। जोशी जी इस सुझाव पर बहुत खुश हुए और कहा कि मैं यह लिखूं और ऐसा हो इसके लिए प्रयास करूं।
                बात आई गई हो गई। हमने लिखना इसलिए मुनासिब नहीं समझा कि सेकुलर नागरिक समाज को धर्मनिरपेक्षता-सांप्रदायिकता के सवाल और समस्या पर हमारा नजरिया पसंद नहीं आता है। इसके दो मुख्य कारण हैं: वह मान कर चलता है कि सांप्रदायिकता के लिए केवल आरएसएस-भाजपा पर प्रहार किया जाना चाहिएऔर धर्मनिरपेक्षता-सांप्रदायिकता के सवाल और समस्या को नवउदारवाद के सवाल और समस्या से नहीं उलझाना चाहिए। जहां तक प्रयास करने की बात हैपिछले लोकसभा चुनाव के करीब एक साल पहले से जस्टिस राजेंद्र सच्चरभाई वैद्य और मैंने कामरेड बर्द्धन के साथ मुलाकात और पत्राचार करके यह कोशिश की थी कि कांग्रेस और भाजपा से अलग चुनाव-पूर्व गठबंधन बनाया जाना चाहिए। उस गठबंधन में नवउदारवाद का विरोध करने वाली छोटी राजनीतिक पार्टियों और जनांदोलनकारी समूहों को भी शामिल किया जाए। यह सुझाव भी था कि राजनीति में तीसरी शक्ति कही जाने वाली पार्टियां किसी एक नेता का नाम आगे करके मिल कर चुनाव लड़ें। हमने कामरेड एबी बर्द्धन का नाम सुझाया थायह जोड़ते हुए कि संबद्ध पार्टियां किसी अन्य नाम पर भी सहमति बना सकती हैं। इस आशय का एक लेख भी हमने युवा संवाद’ और मेनस्‍ट्रीम’ में लिखा था। नवउदरवाद विरोधी छोटी राजनीतिक पार्टियों/संगठनों को उपेक्षित करके चलने वाले बड़े नेताओं को तो खैर क्या ध्यान देना थाधर्मनिरपेक्ष नागरिक समाज ने भी उस प्रयास और सुझाव का नोटिस नहीं लिया। क्योंकि तब चुनाव का केंद्रीय मुद्दा केवल भाजपा विरोध नहींनवउदारवादी नीतियों का विरोध होताजो नागरिक समाज को स्वीकार्य नहीं है। 
                अभी की स्थिति में भी हमारा एक सुझाव है कि बसपा या सपा-कांग्रेस गंठबंधन में एक की बहुमत जीत के बावजूद विधानसभा में मिली-जुली सरकार बनाई जाए। इससे 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए एक विश्‍वसनीय आधार तैयार हो सकेगासाथ ही राज्यसभा में विपक्ष की मजबूती बनेगीजिसके आधार पर राष्‍ट्रपति-उपराष्‍ट्रपति के चुनाव में प्रभावकारी हस्तक्षेप किया जा सकेगा। अगर जीत भाजपा की होती है तो दोनों पार्टियां विपक्ष में तालमेल बना कर भाजपा की सांप्रदायिक मुहिम को निरस्त करने का काम कर सकती हैं।    
                बिहार विधानसभा चुनाव के पहले और दौरान भी नागरिक समाज की कमोबेश यही स्थिति थी। उसकी पुकार थी कि आरएसएस/भाजपा को बिहार में रोकिए, वरना पूरे देश में फासीवाद फैल जाएगा। उस चुनाव में भाजपा हार गई थी। इसके बावजूद वैसी सभी घटनाएं जिन्हें फासीवाद की दस्तक या आगमन कहा जाता हैएक के बाद एक होती जा रही हैं। प्रोफेसर किरवले की हत्या अभी हाल में हुई है। फिर भी नागरिक समाज ने अपनी सारी आशाएं अब यूपी की जीत पर टिका दी हैं। बिहार की तरह यूपी में भी नागरिक समाज को भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले नेताओं से उनकी राजनीति के चरित्र को लेकर कोई शिकायत नहीं है। रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शोएब या ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के प्रवक्ता एस दारापुरी इन नेताओं की धर्मनिरपेक्षता या किसी अन्य नीति/कार्यक्रम पर कोई सवाल उठाते हैं तो नागरिक समाज का उनके प्रति नाराजगी और नकार का रवैया होता है। नागरिक समाज के कुछ अति उत्साही नुमाइंदों ने यहां तक घोषणा कर डाली कि किसी सीट पर दो वोट से भी भाजपा का उम्मीदवार जीतेगा तो उसका पाप’ उन छोटी पार्टियों के उम्मीदवारों या निर्दलियों पर जाएगा जो चुनाव लड़ने की हिमाकत कर रहे हैं। अर्थात यूपी में नागरिक समाज भाजपा को हराने के लिए लोकतंत्र को गंवा देने की हद तक चला गया है।
                यह प्रकट तथ्य है कि सेकुलर पार्टियों की जीत से समाज में सांप्रदायिकताजातिवादकूपमंडूकता,अंधविश्‍वास का फैलाव नहीं रुकता है। बल्कि यह फैलाव अनिवासी भारतीयों तक हो गया है। सांप्रदायिकता,जातिवादकूपमंडूकताअंधविश्‍वास में आकंठ डूबे ज्यादातर अनिवासी भारतीय मोदी और केजरीवाल के अंध समर्थक हैं। कहने की जरूरत नहीं कि कि वे नवउदारवाद के भी अंध समर्थक हैं और नवउदारवाद विरोधी विचारआंदोलनराजनीति के अंध विरोधी। टीम केजरीवाल ने पंजाब विधानसभा चुनाव में अनिवासी पंजाबियों का चुनाव जीतने के लिए जम कर इस्तेमाल किया। अब वे गुजरात विधानसभा चुनाव में अनिवासी गुजरातियों पर काम कर रहे हैं। यूपी का ही प्रमाण लें और पीछे की रामकहानी छोड़ कर सांप्रदायिकता की हाल की कुछ विशिष्‍ट घटनाओं पर गौर करें जहां पिछले 15 सालों से सेकुली सरकारें हैं। सेकुलर सत्तारूढ़ सपा सरकार और विपक्षी बसपा के रहते मुजफ्फर नगर के दंगे हुएमुसलमानों को उनके घरों-गांवों से खदेड़ा गयाअखलाक की हत्या हुईकई बेगुनाह मुस्लिम युवकों को आतंकवादी बता कर झूठे मुकदमों में फंसाया गया (रिहाई मंच द्वारा ऐसे 14 बेगुनाह मुस्लिम युवकों की रिहाई और विशेष कार्य बल (एसटीएफ) द्वारा 22 दिसंबर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से खालिद मुजाहिद और तारिक कासमी की विस्फोटकों सहित गिरफ्तारी के मामले में जस्टिस आरडी निमेश कमीशन की रिपोर्ट इसका उदाहरण हैं)। सपा-बसपा ने ने आज तक सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ कोई आंदोलन उत्तर प्रदेश में नहीं चलाया है। इनकी धर्मनिरपेक्षता कुछ मुसलमानों को टिकट और छोटे-मोटे पद/पुरस्कार देने तक सीमित है। बनारस भी यूपी में है। सेकुलर नागरिक समाज का चहेता केजरीवाल बनारस में चुनाव लड़ कर मोदी को जिता देता है। उसने अपना सारा वजन केजरीवाल के पीछे डाल दिया। नागरिक समाज को तब सेकुलर सपा-बसपा-कांग्रेस याद नहीं आईंजिनकी वह आज कसमें खा रहा है। केजरीवाल ने जब गंगा में डुबकी लगा कर बाबा विश्‍वनाथ के मंदिर में ढोक लगाई तो एक नागरिक समाजी ने निर्लज्जतापूर्वक कहा कि इससे गंगा कुछ पवित्र ही हुई है!
      दरअसलसेकुलर नागरिक समाज की सांप्रदायिकता पर जताई जाने वाली चिंता खोखली है। सांप्रदायिकता विरोध की आड़ में वह अपने वर्ग-स्वार्थ की पूर्ति करता है और उसका वर्ग-स्वार्थ नवउदारवाद के साथ जुड़ा है। मुक्तिबोध ने भारतीय नागरिक समाज के इस वर्ग-चरित्र को नेहरू युग में ही पहचान लिया था।
                जिन लोगों ने मोदी को चुना है नागरिक समाज को उन्हें उनके विवेक पर छोड़ देना चाहिए। आशा करनी चाहिए कि वे अपने चुनाव की समीक्षा करेंगे और अगले चुनाव में बेहतर विकल्प चुनेंगे। नागरिक समाज मोदी और भक्तों’ की खिल्ली उड़ाना भी छोड़ दे। इससे भाजपा के भीतर और भाजपा के बाहर की राजनीति में उन्हें मजबूती मिलती है। बेहतर यह होगा कि नागरिक समाज मोदी को लाने में अपनी भूमिका के बारे में ईमानदारी से विचार करे। तब उसे पता चलेगा कि मोदी को लाने में पहल उसकी थीजनता बाद में चपेट में आई। कांग्रेस के दो टर्म हो चुके थे। नवउदारवाद के तहत विषमताबेरोजगारीमंहगाई और भ्रष्‍टाचार ही बढ़ते हैंवह कांग्रेस के शासन में भी हुआ। जनता ने कांग्रेस को चुना थाक्योंकि उसके पहले की एनडीए सरकार में विषमताबेरोजगारीमंहगाई और भ्रष्‍टाचार बेतहाशा बढ़ा थाजिसे शाइनिंग इंडिया’ के सरकारी प्रचार से छिपाने की भरसक कोशिश की गई थी। नागरिक समाज कोशिश कर सकता था कि कांग्रेस-भाजपा से अलग तीसरे मोर्चे की सरकार बनेताकि जनता को नवउदारवादी दुश्‍चक्र से थोड़ी राहत मिल सके। लेकिन नागरिक समाज इंडिया एगेंस्ट करप्‍शनजिसे एनजीओबाजोंकुछ नामी प्रोफेशनलोंपुरस्कृत हस्तियोंधर्मध्यानयोग आदि का धंधा करने वालों ने आरएसएस और कारपोरेट घरानों के साथ मिल कर नवउदारवाद को बचाने के लिए खड़ा किया थाके साथ आम आदमी’ बन कर एकजुट हो गया। नवउदारवाद के खिलाफ खड़ा किया गया पिछले 25 सालों संघर्ष तहस-नहस कर दिया गया। दिल्ली की जीत पर हवन करके उसे ईश्‍वर का वरदान बताते हुए नागरिक समाज के नए नायक ने दिल्ली में बड़े उद्योगपतियों से हाथ मिला कर कहा कि वह पूंजीवाद के साथ है।
      भारत में सांप्रदायिकता पूंजीवाद की कोख से जन्मी है। पूंजीवाद के मौजूदा चरण नवउदारवादजो तीसरी दुनिया के संदर्भ में नवसाम्राज्यवाद हैके तहत उसका बढ़ते जाना तय है। लिहाजानागरिक समाज को सांप्रदायिकता की खोखली चिंता छोड़ कर ईमानदारी से 2019 के लोकसभा चुनावों में नवउदारवाद विरोध का ठोस विकल्प बनाने की चिंता करनी चाहिए।
8 मार्च 2017  

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...