Monday, August 26, 2013

स्वतंत्रता दिवस के कर्तव्य - प्रेम सिंह


आत्मालोचन का दिन 

पिछले स्वतंत्रता दिवस के ‘समय संवाद’ और उसके आगे-पीछे हमने जो लिखा, इस स्वतंत्रता दिवस पर उससे अलग कुछ कहने के लिए नहीं है। कहना एक ही बार ठीक रहता है। भले ही वह स्वतंत्रता जैसे मानव जीवन और मानव सभ्यता के संभवतः सर्वोपरि मूल्य के बारे में हो। दोहराव के भय से इस बार का ‘समय संवाद’ हम नहीं लिखना चाहते थे। फिर सोचा कि शासक वर्ग और उसका प्रस्तोता मीडिया दिन-रात दोहरावों की झड़ी लगाए रहते हैं तो हमें भी किंचित दोहराव के बावजूद अपनी बात कहनी चाहिए। आइए, भारी सुरक्षा घेरे में गांधी के आखिरी आदमी से बहुत दूर और ऊंचे आयोजित, छियासठवें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश की आजादी के बारे में कुछ चर्चा और सवाल करें। इस आशा के साथ कि सड़सठवें साल में देश की आजादी पर आए संकट को समझा जाएगा और उसका मुकाबला हो पाएगा।  
जिस आजादी पर हासिल होने के दिन से ही अधूरी होने का ठप्पा लगा हो, हर स्वतंत्रता दिवस पर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि वह उत्तरोत्तर पूर्णता और मजबूती की ओर अग्रसर है। अगर किसी वर्ष कोई ऐसी घटना या फैसला सरकार, राजनीति अथवा नागरिक समाज के स्तर पर हो गया हो, जिससे आजादी का अवमूल्यन हुआ हो और वह खतरे में पड़ी हो, तो स्वतंत्रता दिवस के मौके पर यह सुनिश्चित किया जाए कि वह गलती स्वीकार करके उसे ठीक कर लिया गया गया है। स्वतंत्रता दिवस यह देखने का भी मौका होता है कि वैचारिक और नीतिगत मतभेदों के बावजूद आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने के दायित्व पर सभी राजनीतिक पार्टियां, संगठन और नागरिक समाज एकमत हैं। भारत जैसे विशाल और बहुलताधर्मी देश में अलग-अलग समूहों की अपने हितों की चिंता वाजिब है, लेकिन इस मौके पर हम यह देखें कि समग्रता में उससे देश की आजादी की काट न हो। यह सुनिश्चित करें कि बुद्धिजीवी खास तौर पर सावधान हैं, ताकि नई पीढ़ी आजादी का मूल्य भली-भांति समझ कर अपना कर्तव्य निर्धारित करती और निभाती चले। स्वतंत्रता दिवस और उसके आगे-पीछे आजादी के तराने गाने, तिरंगा लहराने और शहीदों के गुणगान का तभी कोई अर्थ है। स्वतंत्रता दिवस पर हम यह सुनिश्चित करें कि देश की आजादी को सच्चा प्यार करके ही उसके लिए कुर्बानी देने वालों का सच्चा सम्मान किया जा सकता है।    
सवाल है कि क्या प्रत्येक आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर देश की आजादी पूर्णता और मजबूती की तरफ बढ़ती है? गलतियां अगर होती हैं तो क्या उनसे सीख लेने की कोई नजीर सामने आती है? आजादी के प्रति सभी सरकारों, राजनीतिक पार्टियों और नागरिक समाज का साझा संकल्प है? अपने हितों की चिंता करने वाले समूह समग्रतः आजादी की रक्षा का ध्यान करके चलते हैं? क्या देश के बुद्धिजीवी अपनी भूमिका में मुस्तैद हैं? क्या नई पीढ़ी आजादी के प्रति अपना कर्तव्य समझती है? क्या हम शहीदों का सच्चा सम्मान करते हैं? 
बिना गहरी जांच-पड़ताल के पता चल जाता है कि ऐसा नहीं है। ऐसा नहीं होने की चिंता भी ज्यादातर नेताओं से लेकर नागरिक समाज तक नहीं दिखाई देती। बल्कि कह सकते हैं कि पिछले 25 स्वतंत्रता दिवसों पर लाल किले से नवसाम्राज्यवादी गुलामी का परचम फहराया जाता रहा है। लाल किले के भाषण में बच्चों से लेकर नौजवानों तक आजादी को पूर्ण और मजबूत बनाने का संदेश नहीं दिया जाता। ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियां, नागरिक समाज और बुद्धिजीवी आजादी के इस अवमूल्यन में बेहिचक शामिल हैं। 
15 अगस्त 1947 को मिली राजनीतिक आजादी को अधूरा माना गया था। कहा गया था कि अभी आर्थिक आजादी हासिल करना है। पिछले करीब तीन दशकों में आर्थिक गुलामी का तौक गले में डाल कर राजनीतिक आजादी को भी लगभग गंवा दिया गया है। हर साल शानोशौकत से स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस मनाने और देशभक्ति का भारी-भरकम प्रदर्शन करने के बावजूद, लंबे संघर्ष के बाद हासिल की गई आजादी नहीं, नवसाम्राज्यवादी गुलामी पूर्णता और मजबूती की ओर बढ़ती जाती है। नवसाम्राज्यवादी गुलामी का गहरा रंग देखना हो तो कोई भारत आए। यहां कारपारेट पूंजीवाद की गुलामी में पगे नेताओं, खिलाड़ियों, कलाकारों, बुद्धिजीवियों, सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का  उत्साह और उमंग देख कर लगता है मानो वे विज्ञापन की दुनिया के मॉडल हों! मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी मंडली ही नहीं, एपीजे अब्दुल कलाम और लालकृष्ण अडवाणी भारत के महाशक्ति बनने के गीत गाते नहीं थकते हैं। अधूरी आजादी का पूरा फायदा उठा कर भारत का शासक वर्ग कंपनियों के मुनाफे की वस्तु बन गया है। 
इस उमंग भरे माहौल का दबदबा इतना ज्यादा है कि नवउदारवाद-विरोध की लघुधारा के कतिपय वरिष्ठ आंदोलनकारी और बुद्धिजीवी भी उसकी चपेट में आ जाते हैं। दोबारा पटरी पर आना उनके लिए कठिन हो जाता है। ऐसे में, नवउदारवादी नीतियों के चलते उच्छिष्ट का ढेर बना दी गई विशाल आबादी की दशा समझी सकती है। वह खटती और मरती भी है, और नकल भी करती है। इस तरह पूंजीवाद शासक वर्ग के साथ-साथ अपनी (गुलाम) जनता भी तैयार करता चलता है।
इस बीच आरएसएस से लेकर गांधीवादी, समाजवादी, माक्र्सवादी आदि सभी राजनीतिक-वैचारिक समूह आजादी पर आने वाले संकट और उसे बचाने की चिंता जता चुके हैं। लेकिन नवसाम्राज्यवाद की ताकत कहिए या आजादी की सच्ची चेतना का अभाव या दोनों, उस चिंता का खोखलापन अथवा कमजोरी जगजाहिर होते देर नहीं लगती। आजादी बचाने की पुकार उठती है और बुलबुले की तरह फूट जाती है। ऐसा नहीं है कि आजादी को बचाने के सच्चे प्रयास नहीं हुए या अभी नहीं हो रहे हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इस मामले में शोर ज्यादा मचाया गया है। आजादी को बचाने के लिए ठोस विचार और रणनीति के तहत दीर्घावधि आंदोलन नहीं खड़ा हो पाया है। आज की हकीकत यह है कि आजादी बचाने की वास्तविक चिंता करने वाले लोग अब बहुत थोड़े और उपेक्षित हैं। 
ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता दिवस पर सर्वाधिक गंभीरता और प्राथमिकता से देश के पराधीन होते जाने की परिघटना पर विचार होना चाहिए। उसके बगैर न केवल नवउदारीकरण के दौर में भिखारी बना दी गई जनता के लिए हमारी चिंता का कोई हासिल नहीं है, हमारे प्रगतिशील, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बौ़िद्धक कर्म का भी स्वतंत्र अर्थ नहीं रह जाता है। क्रांति के दावों की दयनीयता तो स्वयंसिद्ध है ही। 
नवउदारवादी दौर में बने कारपोरेट इंडिया की सत्ता पर आरएसएस जब-जब धावा बोलता है, तब-तब सेकुलर खेमे के बुद्धिजीवी उसके ‘देशद्रोही’ चरित्र को उद्घाटित करने में लग जाते हैं। ऐसा करते वक्त वे अपने को देशभक्ति और आजादी का पक्का पैरोकार होने का प्रमाणपत्र देते ही हैं, सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह और कांग्रेस को भी वह थमा देते हैं। बार-बार दोहराई जाने वाली इस कवायद का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलता। न सांप्रदायिकता कम होती है, न नवउदारवाद थोड़ा भी पीछे हटता है। बल्कि दोनों कट्टर होते और एक-दूसरे में समाते जाते हैं। उस सम्मिलित कट्टरता के प्रहार से समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की जमीन धसकती चली जाती है। भारत के संविधान में निहित समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और संकल्प की रक्षा ही आजादी की रक्षा है। हमारी राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिकता की यही कसौटी हो सकती है।    
यह सही है कि आरएसएस पूंजीपतियों से सांठ-गांठ रखता है। उसका नया जमूरा नरेंद्र मोदी पूंजीपतियों के आगे नाच रहा है। लेकिन, कांग्रेस पूंजीपतियों की सबसे बड़ी करुणानिधान पार्टी है, इस सच्चाई को सेकुलर खेमा जोर देकर कभी नहीं कहता। वह आरएसएस के ‘रहस्मय चरित्र’ की गहराइयों में काफी नीचे तक धंसता है, लेकिन कांग्रेस के ‘खुला खेल पूंजीवादी’ की तरफ से आंख फेरे रहता है। वह नेहरू-इंदिरा की कांग्रेस का भी सेवक बना रहा और अब सोनिया गांधी की कांग्रेस का सेवक है। नरेंद्र मोदी बुरा है, क्योंकि कारपोरेट घरानों को रिझाने में लगा है। सेकुलर खेमे की शिकायत वाजिब है कि मीडिया उसे पूंजीवाद का नया ब्रांड बना कर समाज के सामने परोस रहा है। लेकिन यही मीडिया नरेंद्र मोदी के पहले मनमोहन सिंह को कारपोरेट पूंजीवाद का पुरोधा बना कर जमा चुका है। सेकुलरवादियों समेत नागरिक समाज की स्वीकृति दिला चुका है। अटल बिहारी वाजपेयी अपना अलग से पूंजीवाद लेकर नहीं आए थे। उन्होंने अपने ‘स्वदेशी’ पैर मनमोहन सिंह के ‘अमेरिकी’ जूते में ही डाले थे। नरेंद्र मोदी को भी मनमोहन सिंह लेकर आए हैं। उनका सत्ता का आपसी झगड़ा है। अमेरिका और कारपोरेट घराने जिस की तरफ रहेंगे वह जीत जाएगा।  
ऐसे में सवाल पूछा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी से मनमोहन सिंह किस मायने में बेहतर हैं? सिवाय इसके कि नवउदारवाद को भारत में लाने और जमाने वालों में वे अव्वल नंबर पर हैं। उसी हैसियत के चलते वे तीसरी बार प्रधानमंत्री होने के दावेदार हैं। सांप्रदायिक ताकतों को ठिकाने लगाने की कुछ ताकत अभी भारतीय जनता में बची है। लेकिन नवसाम्राज्यवाद के सामने वह लाचार बना दी गई है। जनता की यह लाचारी आगे बढ़ती जानी है। इसकी सीधी जिम्मेदारी मनमोहन सिंह और उनके सिपहसालारों की है। 
पिछले दो सालों से मनमोहन सिंह पर नागरिक समाज का काफी तेज गुस्सा देखने को मिला। यह गुस्सा तभी आना चाहिए था जब उन्होंने देश के संविधान को दरकिनार कर विश्व बैंक के आदेश पर नई आर्थिक नीतियां लागू की थीं और देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया था। वे राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे, न आज हैं। वे ऐसा कर पाए और उस दम पर दो बार देश के प्रधानमंत्री बन गए, यह नागरिक समाज की सहमति के बिना संभव ही था। नागरिक समाज को अब भी जो गुस्सा आ रहा है, वह देश के स्वावलंबन और संप्रभुता को चट कर जाने वाली उन नीतियों के खिलाफ नहीं है। वह नवउदारवाद का साफ-सुथरा चेहरा और अपने लिए और जयादा फायदा चाहता है। ऐसे गुस्से का कोई परिणाम देश की आजादी के पक्ष में नहीं निकलना है। भाजपा के पक्ष में भले ही निकले, जिसका स्टार प्रचारक नागरिक समाज की समस्त लालसाओं को चुटकियों में पूरा करने का ढोल पीट रहा है।  
कुमार प्रशांत ने ‘जनसत्ता’ के अपने एक लेख में मनमोहन सिंह को संजीदा इंसान बताया है। यह भी कहा है कि बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने हमेशा शालीनता का आचरण किया है, जिससे विदेशों में भारत का मान बढ़ा है। मनमोहन सिंह की यह प्रशंसा उन्होंने नरेंद्र मोदी से तुलना करते हुए की है, जिन्होंने एलान करके 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के लालकिले से दिए गए भाषण के मुकाबले अपना भाषण किया। स्वतंत्रता दिवस नेताओं के व्यक्तित्वों की तुलना करने का अवसर नहीं होता। नरेंद्र मोदी और आरएसएस खुद ही एक्सपोज हो गए कि उनकी नजर में स्वतंत्रता दिवस का सम्मान नहीं है। अडवाणी ने दबी जबान से मोदी के इस कृत्य की आलोचना भी की।    
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘जनसत्ता’ के पन्ने मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की तुलना में रंगने का औचित्य नहीं था। तुलना का तूमार बांधने के लिए खबरी चैनलों की भरमार है। उन्होंने वह काम बखूबी किया भी। हमने दोनों का भाषण नहीं सुना। न ही टीवी चैनलों पर होने वाली वे बहसें सुनी, जिनका जिक्र नाराजगी के साथ कुछ टिप्पणीकारों ने अगले दिन अखबारों में किया। चैनल यह नहीं कर सकते थे, अगर स्वतंत्रता दिवस की गरिमा, संवैधानिक दायित्व, लोकतांत्रिक मूल्य, संघीय ढांचा और देश की अखंडता का हवाला देने वाले ‘विशेषज्ञ’ वहां नहीं जाते। इधर विशेषज्ञ कुछ ज्यादा ही हो गए हैं और उनमें ज्यादातर ने अपने को ऐसे एंकरों के हाथ बेच दिया है जो कूपमंडूक और नवउदारवाद व सांप्रदायकिता के निःसंकोच गुण गाने वाले हैं। 
गंभीर समझे जाने वाले बुद्धिजीवियों को यह बताना चाहिए था कि प्रधानमंत्री के भाषण में स्वतंत्रता की पूर्णता और मजबूती के लिए क्या कहा गया है। उस लिहाजा से दोनों के भाषणों में कोई फर्क नहीं था। दोनों नवउदारवाद की प्रतिष्ठा को स्वाभाविक कर्म मान कर बोले। संविधान की कसौटी पर दोनों के भाषण अवैध थे। दोनों में अंतर यही है कि मनमोहन सिंह नवउदारवाद की ब्रांडेड मशीन हैं, जो सीधे विश्व बैंक से खिंच कर आई है और मोदी आरएसएस के कारखाने में ढल कर निकली ‘देसी’ मशीन है। दोनों में बाकी सब समान है। मोदी को मुसलमान ‘पिल्ले’ नजर आते हैं तो मनमोहन को किसान निठल्ले। वे हैरानी से पूछते हैं कि किसान खेती (यानी आत्महत्या) क्यों करते हैं! कोई और काम क्यों नहीं कर लेते? पहले से ही कई करोड़ नौजवानों और अधेड़ों की बेरोजगार सेना जमा होने के बावजूद एक मशीन ही ऐसा कह सकती है, जिसमें संदेश पहले से फीड किया गया हो? 
मोदी की भत्र्सना का खास मतलब नहीं है। मोदी को लाने वालों में सबसे पहला नाम मनमोहन सिंह का है। आरएसएस बाद में आता है। मोदी जिस संगठन से आते हैं, उसने आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया। मौका पड़ने पर अंग्रेजों का साथ दिया। वह पुराना किस्सा है। लेकिन मनमेाहन का नया कमाल देखने के लायक है। उन्होंने और सोनिया गांधी ने मिल कर आजादी के संघर्ष की पार्टी को नवसाम्राज्यवादी गुलामी की पार्टी में तब्दील कर दिया है। बेहतर होता कि स्वतंत्रता दिवस पर बुद्धिजीवी यह सच्चाई जनता को बताते। 
हमने एक ‘समय संवाद’ में लिखा था, ‘‘मिश्रित अर्थव्यवस्था के करीब तीस सालों के दौर में जो साम्राज्यवादी बीज दब गया था उसने अस्सी के दशक में राजीव गांधी की छाया पाकर फूलना शुरू किया। नब्बे के दशक में उसने एक बार फिर से जड़ पकड़ ली और इक्कीसवीं सदी का जयघोष करते हुए उसकी कोपलें खिल उठीं। आज साम्राज्यवाद की संतानें ऐसा जता रही हैं मानो वे सदियों पुराना वटवृक्ष हैं। जैसे 1857 और 1947 हुआ ही नहीं था। अगले पचास साल भी नहीं लगेंगे जब साम्राज्यवाद की संतानें कहेंगी कि 1947 होना ही नहीं चाहिए था। अगर उसका 1857 की तरह दमन कर दिया जाता तो भारत को महाशक्ति बनने के लिए 2020 का इंतजार नहीं करना पड़ता। जी हां, मनमोहन सिंह उसी साम्राज्यवादी बीज से उत्पन्न हुई संतान हैं। साम्राज्यवाद के सांचे में जो भी समाए हुए हैं, वे मनमोहन सिंह के बच्चे हैं। उनमें छोटे बच्चे भी हैं और बड़े भी।’’ (‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’, 2009) नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह का ही छोटा बच्चा है, जो अब बड़ा बनने के लिए मचल उठा है।
हमने गुजरात कांड पर ‘गुजरात के सबक’ (2002) और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विचारधारा और शैली पर ‘जानिए योग्य प्रधानमंत्री को’ (2002) पुस्तिकाएं प्रकाशित की थीं। सेकुलर साथियों, जिनमें सोनिया के सेकुलर सिपाही भी शामिल थे, ने काफी उत्साह से उन पुस्तिकाओं का स्वागत और प्रचार किया था। पहुंच वाले साथियों ने उन्हें कांग्रेस के प्रचार प्रकोष्ठ और प्रवक्ताओं तक पहुंचाया था। 2004 में राजग की हार हुई और यूपीए की सरकार बनी। लेकिन 2009 के चुनाव के पहले प्रकाशित हमारी पुस्तिका ‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ के प्रकाशन पर उन सब ने चुप्पी साध ली। उसमें मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की, विशेष तौर पर भारत-अमेरिका परमाणु करार के हवाले से, साम्राज्यवादपरस्ती का उद्घाटन है। साथियों ने उस पुस्तिका का न स्वागत किया, न प्रचार। इससे स्पष्ट पता चलता है कि सेकुलर खेमे की चिंता केवल सांप्रदायिकता को लेकर है, नवउदारवाद के खिलाफ वह नहीं है।   
भारतीय राज्य के खिलाफ हिंसक संघर्ष चलाने वाले अतिवामपंथी समूह कहते हैं कि वे भारत के संविधान को नहीं मानते। उन्हें देखना चाहिए कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के नेतृत्व में भारत का शासक वर्ग भी भारत के संविधान को नहीं मानता है। यह ठीक है कि भारत का शासक वर्ग कारपोरेट पूंजीवाद की पुरोधा वैश्विक संस्थाओं के आदेश पर काम करता है। लेकिन अपने को माओवादी बताने वाले भी जिन आदेशों को मानते और लागू करना चाहते हैं, वे भारत की जनता के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष की धारा से नहीं निकले हैं, जिसका कुछ आधार लेकर भारत का संविधान बनाया गया था। बल्कि आजादी के संघर्ष को वे मान्यता ही नहीं देते। उनकी पूर्वज पार्टी सीपीआई ने देश की आजादी को अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का परिणाम माना था, न कि जनता के संघर्ष और बलिदान का। आजादी की पूर्व संध्या पर उसने भारत छोड़ो आंदोलन और उसके  क्रांतिकारियों के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन किया था।  
आजादी अधूरी है, यह अंबेडकर ने भी स्वीकार किया था। लेकिन उनके स्वीकार में अवमानना का भाव नहीं था। उनका संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर उसे पूर्ण करने का सपना था। कांग्रेस के भरोसे वे भी नहीं थे। समता का लक्ष्य हासिल करने का रास्ता लोकतंत्र को मानते थे। लोकतांत्रिक अहिंसक संघर्ष में अंत तक उनकी आस्था रही। इसका अर्थ यह भी बनता है कि आजादी के बाद, गांधी की तरह, अंबेडकर भी कांग्रेस की उपयोगिता नहीं देखते थे। उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और सोशलिस्ट पार्टी के साथ चुनाव लड़ा। भविष्य की राजनीति के लिए सोशलिस्ट पार्टी के साथ तालमेल का प्रयास भी उनके दिवंगत होने के पहले हुआ। 
लेकिन कम्युनिस्टों ने अधूरी आजादी का ठीकरा कांग्रेस और उसके नेताओं के सिर  फोड़ा। अधूरी आजादी से भी ज्यादा उनकी बड़ी शिकायत यह है कि साम्यवादी क्रांति क्यों नहीं की गई? उनकी नजर में भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और उनके साथ जुटने वाली जनता का यह दोष था। आजादी के अधूरेपन में उन्होंने न अपना कोई साझा या दायित्व स्वीकार किया, और, जाहिर है, न उसे पूरा करने के लिए संविधान का रास्ता स्वीकार किया। कम्युनिस्टों की अंतर्राष्ट्रीयता में ‘पिछड़े, दकियानूसी, सामंती, सांप्रदायिक, जातिवादी भारत’ को छोड़ कर सब कुछ हो सकता था। आज के आधिकारिक माक्र्सवादियों के लिए भी संविधान और संसदीय लोकतंत्र मजबूरी का सौदा है।  
भारतीय राज्य बुरा है, कम्युनिस्टों के लिए बात यहीं तक सीमित नहीं रहती। वह अगर उनके कब्जे में नहीं है, तो उनकी मंशा होती है कि उसे दुनिया में होना ही नहीं चाहिए। भारतीय राज्य पर कब्जा नहीं हो पाने पर उन्होंने कांग्रेस की सरपस्ती में संस्थाओं पर कब्जे की रणनीति अपनाई। इस रणनीति के निष्ठापूर्वक निर्वाह का नतीजा यह है कि वे उस रणनीति के बंदी बन कर रह गए हैं। यह सही है कि इस तरह से कम्युनिस्टों ने काफी ताकत हासिल की, लेकिन नवसाम्राज्यवाद विरोध के लिए उस ताकत का कोई उपयोग नहीं है। 
दरअसल, उन्होंने सारी ताकत इस बात में लगा दी कि भारत बेशक कांग्रेस के कब्जे में रहे, भारतीय संदर्भों से जुड़ी समाजवाद या सामाजिक न्याय की कोई धारा जगह नहीं बना पाए। शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और शोध संस्थाओं के शीर्ष पर रह कर उन्होंने अपने से अलग विचारों@विचारकों के प्रति संकीर्णता का बर्ताव किया। ऐसे में, जाहिर है, जगह आरएसएस की ही बननी थी, जो अपने स्थापना काल से ‘भारत माता भारत माता’ चिल्लाता चला आ रहा था और कम्युनिस्टों की तरह कांग्रेस में गहरी घुसपैठ रखता था। दरअसल, अधूरी आजादी से असंतुष्ट हो पूर्णता हासिल करने के लिए आरएसएस अगर समय में सुदूर स्थित स्वर्णलोक की तरफ भागा, तो कम्युनिस्ट स्थान में सुदूर स्थित स्वर्णलोक की तरफ। दोनों की आज तक भी कमोबेस वही स्थिति बनी हुई है। 
यह स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि यह समीक्षा वाद-विवाद के लिए नहीं की जा रही है। बल्कि आजादी का बचाव हो, वह पूर्ण, मजबूत और उच्चतर हो, इस उद्देश्य से की जा रही है। देश की आजादी को सीधे नवसाम्राज्यवादी शिकंजे में फंसा दिया था। आरएसएस को ठीक करने के पहले अगर अपने को ठीक नहीं किया जाता, तो नवउदारवाद के खिलाफ मोर्चा कभी नहीं जीता जा सकता।      

पूंजीवाद के बीमार  

वैश्विक परिदृश्य पर मचे हिंसा और मौत के तांडव के बावजूद पूंजीवाद की क्रांतिकारी भूमिका के सिद्धांतकार और पैरोकार आज भी अपनी स्थापना वापस लेने को तैयार नहीं होंगे। तीन-चैथाई दुनिया का उपनिवेशीकरण, संसाधनों की लूट, समूचे समुदायों का सफाया करके उनके भूभागों पर कब्जा, युद्धों, गृहयुद्धों, महायुद्धों के वर्तमान तक जारी अनवरत सिलसिले के समानांतर जीवधारियों और वनस्पतियों की असंख्य प्रजातियों का विनाश करते हुए दुनिया को संकट के मुहाने पर ले आने वाला पूंजीवाद आज भी क्रांतिकारी है। पूंजीवादी व्यवस्था की सर्वाधिक यथार्थपरक (रियलिस्टिक) और तर्कपूर्ण (रेशनल) समीक्षा करने वाला गांधी आज भी भारत में मानव प्रगति का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है। पूंजीवाद के बीमार दिमाग की इस समझ के साथ यह समझ लें कि आगे मनमोहन सिंह और मोदी ही आएंगे। गांधी, नेहरू, जेपी, लोहिया या अंबेडकर नहीं आने जा रहे हैं। 
पूंजीवाद का बीमार दिमाग आज भी भारत की स्वतंत्र हस्ती नहीं स्वीकार कर पाता। इस बीमारी का बीज उपनिवेशवादी दौर में पड़ गया था। इसीके चलते उसके लिए अंग्रेज हमेशा सही और भारतीय लड़ाके, चाहे वे रजवाड़े हों, किसान हों, आदिवासी हों, हमेशा गलत थे। किसी भारतीय शासक ने भारत की जनता पर अंग्रेजों जैसा कहर नहीं बरपाया। 1857 भारत के लोगों ने पहला स्वतंत्रता संग्राम लड़ा। उसके दमन में अंग्रेजों ने जो नृशंसता की, दुनिया के इतिहास में उसका उदाहरण नहीं मिलता। किसी भारतीय शासक के राज्य में वैसे भयंकर अकाल नहीं पड़े, जैसे अंग्रेजों के काल में पड़े। जब भारत में अकाल के चलते एक साथ कई लाख लोग एड़ियां रगड़ कर मरते थे, तो भारत या इंग्लैंड में अंग्रेज का एक निवाला भी कम नहीं होता था। जो अंग्रेज, सिपाही हो या नौकरशाह, भारत आ गया, मालामाल होकर गया। भारत में उसका वैभव और रौब-दाब यहां के किसी भी शासक से ज्यादा था। उनकी अय्याशी के किस्से कम नहीं हैं। लेकिन अंग्रेजी राज यहां के शासकों से अच्छा था, पूंजीवाद के बीमार दिमाग में यह मान्यता घुट्टी की तरह गई हुई है।
उपनिवेशवादी शोषण ने भारत को आर्थिक रूप से जर्जर कर दिया था। सबसे ज्यादा शोषण किसानों, आदिवासियों, कारीगरों और मजदूरों का हुआ था। गांधी ने उस यथार्थ के मद्देनजर देश की स्वावलंबी श्रम आधारित विकेंद्रित अर्थव्यवस्था बनाने की बात की। अगर अपनी अर्थव्यवस्था नहीं है, तो आप स्वतंत्र भी नहीं हो सकते। उपनिवेशवादी शोषण की प्रक्रिया में पैदा हुए छोटे मध्यवर्ग ने गांधी का यह विचार स्वीकार नहीं किया। केवल राजनीतिक आजादी के आकांक्षी मध्यवर्ग ने गांधी की इस धारणा को न केवल अस्वीकार किया, पिछड़ा भी बताया। विकास के बने-बनाए पूंजीवादी मॉडल के भरोसे आर्थिक आजादी को वह हथेली पर धरी चीज मानता था। उसके मुताबिक पूरे भारत को मध्यवर्ग में तब्दील होना था। यानी किसानों, आदिवासियों, कारीगरों, मजदूरों, छोटे-मोटे दुकानदारों को उस विकसित भारत में नहीं रहना था। इसके साथ जो अन्य धारणाएं परोसी गईं, उन्हें फैंटेसी ही कहा जा सकता है। मसलन, इस विकास के साथ वर्ण, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि की बाधाएं टूट कर दूर हो जाएंगी। फैंटेसी का इंतिहाई सिरा यह था कि पूरा भारत अंग्रेजी पढ़ेगा, समझेगा और बोलेगा।      
मिश्रित अर्थव्यवस्था और नेहरूवादी समाजवादी लक्ष्य की बाधाओं को पूंजीवादी दिमाग ने पार कर लिया है। उसका नया मरकज अमेरिका है। ‘मैं गुलाम मोहि बेच गुसांई’ की तर्ज पर वह उसके पैरों में बिछा हुआ है। उसके लिए अमेरिका सही ही सही और अमेरिकी गुलामी का विरोध करने वाले गलत ही गलत हैं। पूंजीवाद के बीमार दिमाग से अगर कहें कि अंग्रेजों की अगुआई में कुछ अन्य यूरोपीयों ने अमेरिका के मूल निवासी रेड इंडियनों का सफाया करके, उनका प्रकृति प्रदत्त भूभाग व संसाधन लूट कर; अश्वेतों को जानवरों की तरह खटा कर यह सोने की लंका बसाई है, तो वे कहेंगे, तो क्या हुआ? जैसा कि वे आदिवासियों, किसानों और खुदरा व्यापारियों की तबाही पर कहते हैं। अगर उनसे कहें कि अमेरिका अन्य देशों की संप्रभुता और नागरिक स्वतंत्रता का किंचित भी सम्मान नहीं करता, बल्कि उनके खिलाफ षड़यंत्र करता है, तख्ता पलट करता है, तो भी वे कहेंगे, तो क्या हुआ?  अमेरिका का अंधभक्त यह वही दिमाग है जो उपनिवेशवादी दौर में अंग्रेजों की सराहना में लगा था।  
हमारे मित्र संदीप सपकाले ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर फेसबुक पर नेहरू-अंबेडकर की प्रशंसा की है, जिनके विकास के मॉडल के तहत उनका सशक्तिकरण हुआ है। उनका यह विचार अच्छा है। हालांकि पूंजीवाद के साथ मिल कर सामंती शक्तियों का जो सशक्तिकरण हुआ है, उसके मुकाबले समग्र समाज के रूप में दलितों का सशक्तिकरण नगण्य ही कहा जाएगा। जिन थोड़े-से दलितों का सशक्तिकरण हुआ है, वे भी सामंती तौर-तरीके अपनाते हैं। हमें साथी श्यौराज सिंह बेचैन ने हाल में एक दिन बताया कि दलित समाज में अफसर होना ही कुछ होना माना जाता है। हम लेखक- विचारक अपने में कुछ भी बने रहें, दलित समाज में सम्मान नहीं मिलता। दलित राजनीति में भी अफसरों की ही पूछ है। मायावती के करीब कई दलित लेखकों-विचारकों ने पहुंचने की कोशिश की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली।   
सपकाले के विचार के साथ दिक्कत यह है कि उन्होंने नेहरू-अंबेडकर की प्रशंसा करने के साथ, समाजवाद की बात करने वालों की भत्र्सना भी की है। यानी वे नवउदारवाद, उनके मुताबिक जिसके विरोध में कुछ लोग समाजवाद की वकालत करते हैं, को नेहरू और अंबेडकर की विचारधारा की परिणति मानते हैं। और उस परिणति को सही भी मानते हैं। नेहरू आजादी के संघर्ष के दौर से समाजवादी विचारों के लिए जाने जाते थे। आजादी के बाद सोशलिस्टों के कांग्रेस से बाहर आ जाने के बाद और उनकी तीखी आलोचना के जवाब में उन्होंने कांग्रेस पार्टी का लक्ष्य समाजवाद निर्धारित किया था। अंबेडकर नेहरू से अलग कुछ और भी सोच रहे थे, तभी उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाई थी। उनका लक्ष्य भी लोकतांत्रिक रास्ते से समाजवाद लाना था। सपकाले नेहरू और अंबेडकर को पूंजीवाद के समर्थन में खींचते हैं। इस तरह की खींचतान करके पूंजीवाद का समर्थन करने वाले दलित विचारकों की कमी नहीं है।  
पूंजीवाद अगर दलितों को सामाजिक-आर्थिक मुक्ति दिला दे तो उसके स्वागत का कम से कम भारत में पूरा औचित्य बनता है। लेकिन ऐसा संभव नहीं है। पूंजीवाद चाहता तो कुछ निर्णायक प्रयास कंपनी राज के दौर में ही कर सकता था। मसलन, अंग्रेज चाहता तो जमींदारी प्रथा लागू करते वक्त कुछ जमींदार दलित समाज से भी बना देता। आदिवासियों के जंगल पर धावा बोलने वाले अंग्रेज को जमींदारी बड़ी बात लगती थी, तो दलितों को खेती अथवा बागवानी के लिए कुछ जमीन दे देता। चाहे चर्म उद्योग का ही, एकमात्र अधिकार दलितों को दे देता। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उसका सहोदराना सामंती शक्तियों के था - भारत में भी और इंग्लैंड में भी। हमें हैरानी होती है कि अश्वेतों के साथ अमेरिकी गोरों ने जो किया, उसके बावजूद दलित विचारक अमेरिका का गुणगान करते हैं।    
दलित विमर्श, दलित अस्मिता, दलित चेतना की बात करते वक्त यह ध्यान रखना जरूरी है कि दलित समाज केवल आरक्षण के तहत अथवा अपनी मेधा से संगठित क्षेत्र में आ जाने वाले लोगों तक सीमित नहीं है। दलित समाज में सम्मान अगर केवल अफसरी से मिलता है, तो पूंजीवाद से लाभान्वित दलित समाज का दायरा और भी सिकुड़ जाता है। (हालांकि हम संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण को पूंजीवादी व्यवस्था की देन नहीं मानते। अलबत्ता अब जो निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग की जा रही है, वह पूंजीवादी व्यवस्था की देन होगा।) ध्यान दिया जा सकता है कि आगे बढ़े हुए दलित कभी भी दलितोत्थान के ऐसे प्रयास यानी रचनात्मक कार्य नहीं करते, जिनके चलते बाहर छूटे दलितों में शिक्षा और चेतना का प्रसार हो; उन्हें रोजगार के बारे में जानकारी, उचित निर्देशन और प्रशिक्षण मिल सके। यह रचनात्मक काम बड़े पैमाने पर करके वे खुद पहल कर सकते हैं कि आरक्षण का लाभ लेकर कुछ हद तक सशक्त बन चुके परिवारों के पहले अब बाहर छूटे परिवारों को आरक्षण मिले। लेकिन वे रचनात्मक काम नहीं करते। एनजीओ बनाते हैं, जो पूंजीवादी तंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। 
यह सच्चाई जानने के लिए बहुत गहराई में जाने की जरूरत नहीं है कि दलित पूंजीवाद की बात करने वाले पूंजीवाद के पहलवानों के प्यादे ही रह सकते हैं। पूंजीवाद ने कितनी गहरी पैठ बनाई है और सवर्ण भारत के कितने लोग यूरोप-अमेरिका तक जमे हैं, उनमें टूटी-फूटी अंग्रेजी और गांठ में चवन्नी लेकर शामिल नहीं हुआ जा सकता। जाति को लेकर जाने पर बड़ी जाति वहां पहले से मौजूद है। जिस जाति को सदियों से छोटा बनाया गया हो, उसे सदियों से बड़ी जाति के मुकाबले कभी भी खड़ा नहीं किया जा सकता। अंबेडकर द्वारा प्रस्तावित जाति निर्मूलन ही उसका उपाय है।  
सशक्त दलितों द्वारा पूंजीवाद की पूजा, दरअसल, दलित समाज के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ की साधना है। यह प्रवृत्ति बाकी जाति समूहों में भी देखी जा सकती है और यह पूंजीवाद की देन है। समता विरोधी ब्राह्मणवाद की जितनी निंदा की जाए, कम है। लेकिन उसके साथ दलित समाज में ही विषमता बढ़ रही हो तो समझ लेना चाहिए खोट कहीं और भी है। सत्ता पाकर मद में आ जाना केवल सामंतवाद-ब्राह्मणवाद की मूल विशेषता नहीं है। जैसे भारत के अगड़े समाज को हजारों साल गुलाम रहने के कुछ कारण अपने चरित्र में खोजने चाहिए, उसी तरह वर्ण व्यवस्था के गुलाम बनाए गए पिछड़े और दलित समाज को भी आत्मालोचन करने की जरूरत स्वीकार करनी चाहिए। 
हम फुले-अंबेडकर से लेकर आज तक के दलित विचारकों की ‘अंग्रेज-भक्ति’ का बुरा नहीं मानते। जो मानते हैं उन्हें देख लेना चाहिए कि यह अंग्रेजभक्त सवर्ण समाज ही था, जिसने 200 साल तक उन्हें यहां काबिज बनाए रखा। कई लाख भारतीयों की हत्या के बाद उन्हें अपनी ‘प्रजा’ का दर्जा देने आईं इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया की शान में पढ़े गए कसीदे देख लेने चाहिए। अंग्रेजों के भारत में आने और उपनिवेश कायम करने में दलितों की कोई भूमिका नहीं थी। लेकिन अगर दलित विचारक पूंजीवाद के पक्के पक्षधर बनते हैं, तो उसके साथ अंबेडकर का नाम ज्यादा दिन नहीं चल सकता है। अंबेडकर पूंजीवाद के पक्षधर नहीं थे। उन्होंने निजी क्षेत्र में आरक्षण की न बात की, न संविधान में प्रावधान किया। वे चाहते थे कि जल्दी ही समता मूलक आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था बने और आरक्षण की जरूरत न रहे। 
गांधी का कहना था कि अंग्रेजों ने हमें गुलाम नहीं बनाया, हम खुद उनके गुलाम बन गए। आज हम देखते हैं कि गांधी ने जिस समाज को आजादी की होड़ में लगाया था और आजादी हासिल भी की थी, वह गुलामी की होड़ में दौड़ रहा है। गोया उसे पूर्णता में हासिल करके रहेगा! इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है कि गांधी को अब सबसे ज्यादा गाली दलित विचारकों की ओर से पड़ती हैं। लेकिन दलितों द्वारा गांधी को गाली देने का व्यापार भी ज्यादा दिन नहीं चलने वाला नहीं है। गांधी को उनका सबसे ज्यादा नाम लेने वाली कांग्रेस ने खत्म कर दिया है। 
नरसिम्हा राव से लेकर मनमोहन सिंह तक उन्हें कई बार नवउदारवाद के हमाम में खींच चुके हैं। आपने सुना ही है कि बराक ओबामा भी गांधी का भक्त है! पूंजीवाद के बीमार दिमाग को गांधी की जरूरत क्यों पड़ती है, इस पर हमने अन्यत्र विस्तार से लिखा है। वह दूसरों को धोखा देने से ज्यादा अपने को धोखे में रखने के लिए गांधी का नाम लेता है। वह जानता है उसने इंसानियत के ऊपर बाजार और हथियार का पहाड़ खड़ा किया हुआ है। वह यह भी जानता है कि उसे आगे यही करते जाना है। इस उपक्रम में वह कई करोड़ लोगों सहित असंख्य जीवधारियों की हत्या कर चुका है। गांधी के नाम में वह अपने इंसान होने की तसल्ली पाता है। पूंजीवादी दिमाग अपनी बीमारी की दवा के रूप में भी गांधी को रखता है, तो आने वाली दलित पीढ़ियों को उन्हें गाली देने की जरूरत नहीं रह जाएगी।  
स्वदेशी का राग अलापने वाला आरएसएस पूंजीवाद का सबसे बड़ा बीमार है। रोग असाध्य न हो जाए, इसके पहले आरएसएस को गंभीरता से आत्मालोचन करना चाहिए। उसे सचमुच सोचना चाहिए कि इतने लंबे समय में एक भी चिंतक, कलाकार, साहित्यकार वह पैदा नहीं कर पाया है। सत्ता और सुविधाओं के लालच में भले ही कुछ रचनाकार और विचारक उसके साथ नाता बना लेते हों। संघ के बाहर स्वयंसेवक पराया और नकलची बन कर रह जाता है। विचार और कला की दुनिया से बहिष्कृत आरएसएस को अपने अलग ‘बौद्धिक’ और ‘सांस्कृतिक’ चलाने की नहीं, सोच और दृष्टिकोण बदलने की जरूरत है। वरना एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में उसकी पहचान आगे भी कभी खड़ी नहीं हो पाएगी। उसके हिंदुत्व की सार्थकता केवल भाजपा को राजनीतिक सत्ता दिलाने तक ही सीमित रही है और आगे भी रहेगी। सत्ता हथियाने का हथकंडा जीवन दर्शन नहीं हो सकता।  

इतिहास की सीख 

आजादी अगर खोती है तो उसे दोबारा पाना बहुत कठिन होगा। उससे आसान है कि हम पूंजीवाद के बारे में अपनी धारणाओं को निर्णायक रूप से बदलें। भारत और तीसरी दुनिया के लिए आजदी के क्या मायने हैं और क्यों उपनिवेशवादी वर्चस्व से आजादी हासिल करने के बावजूद गुलामी फिर से कायम हो रही है, इस पर लोहिया के बाद सबसे प्रखर राजनीतिक चिंतन किशन पटनायक ने किया है। नब्बे के दशक से नई आर्थिक नीतियों के रूप में शुरू हुए नवसाम्राज्यवादी हमले के मुकाबले की ठोस राजनीति खड़ी करने की लगातर कोशिश भी उन्होंने की। एक माहौल बना भी कि नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ सन्नद्ध हुए छोटे, एक मुद्दे पर स्थानीय स्तर पर होने वाले जनांदोलनों को जोड़ कर नवउदारवाद के खिलाफ वैकल्पिक राजनीति का निर्माण किया जाए। दलित, आदिवासी और शूद्र नेतृत्व आगे आए और उसकी अगुआई करे। लेकिन विदेशी धन पर पलने वाले एनजीओपरस्तों, जिनमें कई प्रमुख जनांदोलनकारी भी शामिल हैं, ने उनके प्रयासों को फलीभूत नहीं होने दिया।  
चर्चा को समाप्त करने से पहले किशन पटनायक के महत्वपूर्ण और चर्चित निबंध ‘गुलाम दिमाग का छेद’ से एक उद्धरण द्रष्टव्य है, ‘‘हमारे जितने राष्ट्रीय बुद्धिजीवी हैं (जिस तरह से कुछ अंगरेजी अखबारों को राष्ट्रीय अखबार कहा जाता है, उसी तरह कुछ अंगरेजी वाले बुद्धिजीवियों को राष्ट्रीय बुद्धिजीवी कहा जा सकता है) उनमें कुछ अपवादों को छोड़ कर किसी ने यह नहीं माना है कि 1757 के प्लासी-युद्ध में पराजय के कारण भारत बरबाद हो गया, उसकी अपूरणीय क्षति हुई। ‘आजादी खोना बुरी बात तो है ही, लेकिन ... ’। ‘लेकिन’ के लहजे में हमारा बुद्धिजीवी ऐसी बातें कहने लगेगा मानो आजादी खोना कोई पछतावे की बात नहीं है, उसकी कीमत पर हमने इतना सारा फायदा हासिल किया है कि हमें अंगरेजों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए कि उन्होंने हमें दास बनाया। 
‘‘भारत के कितने अंगरेजी लिखने-बोलने वाले बुद्धिजीवी हैं जो भारत के आधुनिकीकरण के लिए अंगरेजी हुकूमत को श्रेय नहीं देत? जो यह नहीं मानते कि अगर भारत पर ब्रिटिश हुकूमत नहीं होती तो भारत आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ओर अंगरेजी भाषा का उतना फायदा नहीं उठा पाता, जितना वह आज उठा रहा है? अपवाद के तौर पर ही ऐसे लोग मिलेंगे। 1857 की असफल क्रांति के बारे में हमारे कुछ प्रसिद्ध इतिहासकारों ने लिख दिया है कि जो हुआ, वह अच्छा ही हुआ। अगर 1857 की क्रांति सफल हो जाती तो भारत अज्ञान के अंधकार और अंधविश्वास के गर्त में डूबा रह जाता ऐसा मानने वालों के मस्तिष्क् के बारे में सोचना पड़ेगा। प्रश्न यह है कि कहीं उनके मस्तिष्क् में कोई देइ तो नहीं हो गया है, अन्यथा सामने पड़े हुए तथ्यों को वे कैसे जनरअंदाज कर देते हैं। उनके सामने यह तथ्य है कि कि जापान और चीन यूरोपीय हुकूमत के अधीन नहीं रहे। क्या चीन और जापान का आधुनिकीकरण भारत से कम हुआ है?’’ (‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’, पृ. 22) 
जहिर है, हमारी आधुनिकता और आधुनिकीकरण की समझ इस तरह की बनी है कि भारत की स्वतंत्रता या स्वतंत्र भारत की जगह उसमें नहीं बन पाती। यह जटिल समस्या है जिसके समाधान के लिए सभी बौद्धिक समूहों और राजनीतिक पार्टियों के समग्र और गंभीर उद्यम की जरूरत है। इतिहास में हो चुकी गलतियों को अनहुआ नहीं किया जा सकता। लेकिन उनसे शिक्षा कभी भी ली जा सकती है। प्रसिद्ध कथन है, जो इतिहास से सबक नहीं सीखते, वे उसे दोहराने को अभिशप्त होते हैं। हमें इतिहास से यह सबक लेना होगा कि उपनिवेशवाद का विरोध किए बगैर नवसाम्राज्यवाद का विरोध नहीं किया जा सकता।  

25 अगस्त 2013  

Wednesday, July 31, 2013

नवउदारवाद के हमाम में - प्रेम सिंह

सोनिया के सलाहकारों की हकीकत 

‘‘सांप्रदायिकता का नंगा नाच जनभावना विरोधी है और उदारीकरण की नीतियां अर्थव्यवस्था की बरबादी हैं - ये दो सीख चुनाव नतीजों से उभर कर आई हैं और आगे के लिए चेतावनी का काम करेंगी। सचेत नागरिकों को देखना होगा कि राजग के काल में प्रचलित सामाजिक-आर्थिक नीतियों के स्थान पर नई नीतियां आ रही हैं या नहीं। आर्थिक नीति संबंधी सीख को मिटा देने का प्रयास मीडिया कर रहा है।’’ समाजवादी चिंतक किशन पटनायक

किशन जी का यह कथन 2004 के आम चुनाव में भाजपा नीत एनडीए की पराजय और कांग्रेस नीत यूपीए की जीत के बाद का है। इस कथन के कुछ ही दिनों बाद (27 सितंबर 2004 को) किशन जी हम लोगों के बीच नहीं रहे। वे ऐसे नेता और विचारक थे जिन्होंने नई आर्थिक नीतियों अथवा नवउदारवाद का सबसे पहले, सतत, सुचिंतित और मुकम्मल विरोध किया था। साथ ही उन्होंने उसका राजनीतिक व विचारधारात्मक विकल्प निर्मित करने का भी गहन प्रयास किया। किशन जी का कहना है कि राजनीति में उनकी कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। लेकिन वे अकेले ऐसे नेता व विचारक हैं जो आजादी के दौरान और प्राप्ति के बाद चले समाजवादी संघर्ष की चेतना और विचारधारा को नवउदारवाद के विकल्प में नई सोच, भाषा व रणनीति के साथ मजबूती से खड़ा करते हैं। बहुत ही मुश्किल दौर में उन्होंने देश के संविधान और समाजवाद को नए राजनीतिक विमर्शों के साथ जोड़े रखा।     
किशन पटनायक ने अपने उपर्युक्त कथन में इस बात पर जोर दिया है कि मीडिया चुनाव नतीजों से निकली आर्थिक नीतियों संबंधी सीख को मिटाने की कोशिश कर रहा है। जाहिर है, उनका सरोकार नवउदारीकरण के विरोध का ज्यादा है। क्योंकि जनभावना के विरुद्ध होने के चलते सांप्रदायिकता का नंगा नाच ज्यादा देर नहीं चल सकता। भारतीय और विश्व के इतिहास में यह देखा जा सकता है। जबकि नई आर्थिक नीतियां हमेशा के लिए लादी जा रही हैं@लादी जा सकती सकती हैं।  
इस कथन में एक और अर्थ पढ़ा जा सकता है। नवउदारवाद की मार से उसके विरुद्ध सन्नद्ध होने वाली जनता के प्रतिरोध का सरकारें कारपोरेट घरानों के साथ मिल कर कड़ाई से दमन करती हैं। पिछले बीस सालों से देश में यह दमन-चक्र चैतरफा चला हुआ है। इसके चलते अपने संवैधानिक हकों की मांग करने वाले अनेक लोगों को मौत से लेकर कारावास तक का दंड झेलना पड़ रहा है। नवउदारवाद के विरोधियों के लिए देश पुलिस राज्य में तब्दील हो गया। लिहाजा, सचेत नागरिको का पहले से ही कमजोर हालत में पड़ी जनता और जनभावना के साथ जुटना जरूरी है। हालांकि उसकी सार्थकता तभी है, जब सचेत नागरिक खुद भी नवउदारवाद का मुकम्मल विरोध करें। 
नवउदारवादी सत्ताप्रतिष्ठान मेहनतकश जनता को पराया और गुलाम मानता है। उसके संवैधानिक अधिकारों को वह नहीं मानता; क्योंकि वह संविधान को ही नहीं मानता है। उसे केवल ‘रूल’ करने के लिए संविधान चाहिए। ‘भारत उदय’ अथवा ‘भारत निर्माण’ के लिए उसके पास विश्व बैंक, आईएमएफ, डब्ल्यूटीओ, कारपोरेट घरानों और अमेरिका का ‘आदेशपत्र’ मौजूद है। किशन जी की समझ थी कि नवउदारवाद के खिलाफ जो जनभावना बन रही है, दमन और असहायता के चलते उसकी उठान गिरनी नहीं चाहिए। मूल प्रतिरोधी शक्ति वे उसे ही मानते थे। लेकिन सचेत नागरिकों की ईमानदार एकजुटता  की भी जरूरत देखते थे, ताकि एक दिन जनभावना की शक्ति नवउदारवाद को परास्त कर सके। यह उनका निर्णायक राजनीतिक ध्येय था।
आप समझ सकते हैं उनके कथन में देश के सचेत नागरिकों की भूमिका के बारे में एक भोली आशा झलकती है कि वे करीब 15 साल से जारी नवउदारवादी नीतियों को अब और आगे नहीं चलने देंगे। जाहिर है, सचेत नागरिकों, जिन्हें प्रचलित शब्दावली में नागरिक समाज एक्टिविस्ट कहा जाता है, ने उनकी बात पर कान नहीं दिया। भारत का नागरिक समाज, नागरिक समाज एक्टिविस्ट जिसके अगुआ हैं, उलटे नई आर्थिक नीतियों के तहत संसाधनों और मेहनतकश जनता के श्रम की खुली लूट से मिलने वाले लाभ को ज्यादा से ज्यादा अपने लिए लूटने की नीयत से परिचालित है।   
सचेत नागरिक कई रूपों में कई तरह से नवउदारवाद के संचालन में मददगार होते हैं। नवउदारवादी व्यवस्था चलती रहे, इसके लिए कई सचेत लोग सरकार के सलाहकार बन कर बिचैलिए की भूमिका निभाते हैं। सोनिया गांधी द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय सलाहकार समिति इस मामले में मशहूर है। उसमें स्थान पाने के लिए नागरिक समाज एक्टिविस्ट आतुर रहते हैं और आपस में झगड़ते भी हैं। नवउदारवाद के कुछ झंडाबरदार कहते हैं कि सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति के कतिपय सदस्यों को छोड़ कर देश में नवउदारवाद पर लगभग सर्वानुमति है। उनकी यह गलत धारणा है। सोनिया के सलाहाकार नवउदारवाद के कहीं ज्यादा काम के सिद्ध होते हैं। इस हकीकत को स्वीकार करके ही नवउदारवाद विरोध और समाजवाद की स्थापना का संघर्ष आगे बढ़ाया जा सकता है।  
सरकार के साथ होकर भी ये सचेत नागरिक जनता के साथ होने का भ्रम पालते और फैलाते हैं। आप अपनी पीठ ठोंकते हैं। कहते हैं जब से उन्होंने एनजीओ वर्क शुरू किया है तभी से लोग जागरूक हुए हैं और सवाल पूछते हैं। सोनिया की सलाहकार समिति में रह कर या बिना रहे वे जो योजनाएं और कानून बनवाते हैं, वही जनता का असली संघर्ष है। उनकी नजर में जनता के नाम पर राजनीति करने वालों से ज्यादा बुरा कोई नहीं होता। वे चाहते हैं लोग राजनीतिक पार्टी नहीं, एनजीओ बनाए। जबकि सरकारी सलाहकार समितियां हों या एनजीओ, नवउदारवाद का अभिन्न हिस्सा हैं। जिसे जनता का काम बताया जाता है वह अंदरखाने सरकार का काम होता है। नवउदारवादी सरकार की नीतियों का विरोध करके कोई सरकार की समितियों में रह ही नहीं सकता। यूपीए सरकार ने पूंजीवाद की पींगें बढ़ाने में ऐसे लोगों का बखूबी इस्तेमाल किया है। 
उदाहरण के लिए महात्मा गांधी राट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) को लिया जा सकता है। हमने शुरू से इस योजना का विरोध किया है। इस तरह की योजनाएं नवउदारवाद के सेफ्टी वाल्व के रूप में काम करती हैं। नवउदारवाद के कुछ झंडाबरदार कहते हैं कि सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति के कतिपय सदस्यों को छोड़ कर देश में नवउदारवाद पर लगभग सर्वानुमति है। उनकी यह गलत धारणा है। सोनिया के सलाहाकार नवउदारवाद के कहीं ज्यादा काम के सिद्ध होते हैं। वे अपने कांग्रेसी आकाओं के साथ सोनिया गांधी, मनमेाहन सिंह और राहुल गांधी की ढाल बन कर खड़े होते हैं। वे उन्हीं के आदमी हैं। (इस हकीकत को स्वीकार करके ही नवउदारवाद विरोध और समाजवाद की स्थापना का संघर्ष आगे बढ़ाया जा सकता है।)  
आइए इस चर्चा को थोड़ा आगे बढ़ाते हैं। यह अकारण नहीं है ऐसी योजनाओं का सुझाव देने वाले या तो पहले से एनजीओ वाले होते हैं या योजना बनने के बाद उसके कार्यान्वयन आदि में संलग्न होते हैं। ऐसी योजनाओं के समर्थन में वे कहते हैं कि गरीबों को कुछ तो मिला है। जबकि ऐसा कह कर वे अमीरों के सब कुछ हथियाने के ‘अधिकार’ की हिमायत कर रहे होते हैं। यह सब करने से नवउदारवादी व्यवस्था और उसके लाभों में उनका अपना हिस्सा सुरक्षित बना रहता है। समितियों की बैठकों में उपस्थित होने के लिए उन्हें मिलने वाले हवाई जहाज और टैक्सी के किराये, दैनिक भत्ते, आवास व भोजन के खर्च का हिसाब अलग, एक व्यक्ति का नाश्ता ही मनरेगा में मिलने वाली राशि की कीमत से ज्यादा का होता है। 
मामला केवल अपनी भूमिका और हित सुरक्षित करने तक ही सीमित नहीं है। इस तरह की योजनाओं की सरसरी पड़ताल से उनका समता और लोकतंत्र विरोधी चरित्र स्पष्ट हो जाता है। ऐसी योजनाओं से, एक तरफ, विषमता को व्यवस्थित रूप दिया जाता है और, दूसरी तरफ, जनता को सामंती दौर की तरह प्रजा बनाए रखने की व्यवस्था की जाती है। कहना न होगा कि विषमता कायम करने में समाजवाद का खुला उल्लंघन है और जनता को (नागरिक नहीं) प्रजा बनाए रखने में लोकतंत्र का। 
समाजवाद और लोकतंत्र संविधान के तीन मूलभूत मूल्यों में से दो हैं। कांग्रेस के साथ जुटने वाले सचेत नागरिक सांप्रदायिक शक्तियों के बरक्स धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की बात करते वक्त संविधान का वास्ता देते हैं। खास कर तब जब सांप्रदायिक शक्तियां अपना नंगा नाच दिखाती हैं। लेकिन संविधान के दो मूल्यों को गंवा कर तीसरे को बचाने की दुहाई देना पाखंड बन जाता है। यही कारण है कि वे धर्मनिरपेक्षता की नहीं, कांग्रेस की रक्षा करते नजर आते हैं। ऐसे पाखंड से समाज में सांप्रदायिकता और बढ़ती है। कहने का आशय है कि नवउदारवाद के पक्ष में संविधान का उल्लंघन केवल सरकारें ही नहीं करतीं, उनके सलाहकार सचेत नागरिक भी करते हैं।   
किशन पटनायक की आशा के विपरीत सचेत नागरिकों ने 2004 के चुनाव के नतीजों से उदारीकरण को बचाने की सीख ली और कांग्रेस को 2009 में फिर से जिता कर ले आए। कांग्रेसियों के साथ संगत करते हुए उन्होंने चुनाव के बाद ही यह ‘सिद्ध’ करना शुरू कर दिया था कि 2004 का परिणाम नई आर्थिक नीतियों के खिलाफ जनादेश नहीं, ‘त्याग की मूर्ति’ सोनिया गांधी के करिश्मे का कमाल है। हालांकि 2004 के आम चुनाव के बाद होने वाले मध्यावधि व विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पराजित होती रही, लेकिन सचेत नागरिक सोनिया गांधी के करिश्मे का मिथक गढ़ते रहे। इतना ही नहीं, सोनिया गांधी के साथ राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनाने का ‘करिश्माई’ कारनामा करने में वे आज तक जुटे हैं। 
पिछले दो सालों में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के तहत नागरिक समाज और उसके कुछ खास एक्टिवस्टिों ने कांग्रेस पर हमला बोला। लेकिन उस हमले में नवउदारवाद के खिलाफ कुछ नहीं कहा गया। जो भारतीय और वैश्विक पूंजीवादी आर्थिक संस्थाएं और कारपोरेट घराने कांग्रेस (और भाजपा) के साथ हैं, उन्होंने भ्रष्टाचार हटाने और विदेशों से काला धन वापस लाने का हल्ला मचाने वालों का भी पूरा साथ दिया। यह अकारण नहीं है कि ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की राख से पैदा’ होने वाली आम आदमी पार्टी का भ्रष्टाचार और काले धन को लेकर कारपोरेट पूंजीवाद के अभिन्न अंग एनजीओ और कारपोरेट घरानों से कोई सवाल या शिकायत नहीं हैं। गोया भ्रष्टाचार और काला धन ऐसी ताली है जो एक ही हाथ से बजती हो!    ष्   

नवउदारवाद का नंगा नाच

2002 में गुजरात में सांप्रदायिकता का नंगा नाच चला। गुजरात में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सांप्रदायिकता की लहर पर सवार होकर चुनाव जीते। सांप्रदायिकता की लहर को गुजराती गौरव की भावना में ढाल कर वे उसके अगले दो चुनाव जीत चुके हैं। लेकिन 2004 में राष्ट्रीय स्तर पर जो जनादेश आया उसमें भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। जैसा कि किशन जी ने कहा है, वह जनादेश नई आर्थिक नीतियों के भी खिलाफ था। लेकिन सोनिया गांधी और उनके सलाहकारों की सरपरस्ती में उस जनादेश के विरुद्ध पिछले दस सालों से नवउदारवाद का नंगा नाच देश में चल रहा है। एक तरफ किसानों, आदिवासियों, मजदूरों, कारीगरों, दुकानदारों, छोटे व्यापारियों व कर्मचारियों से लेकर बेरोजगार नौजवानों तक नवउदारवाद की ध्वंसलीला और दूसरी तरफ देश के संसाधनों की लूट से मालामाल कारपोरेट हाउस, नेता, नौकरशाह और मध्यवर्ग की छोटी-बड़ी सोने की लंकाएं नवउदारवाद के नाच का स्वयं प्रमाण हैं। शिक्षा जैसा गंभीर और संवेदनशील विषय भी नवउदारवाद की भेंट चढ़ चुका है। हर शहर में कुकुरमुत्तों की तरह उगे प्राईवेट कॉलिज, और विश्वविद्यालय देखे जा सकते हैं। विदेशी विश्वविद्यालय आने वाले हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के विश्वविद्यालयों को नकलची लोग नष्ट करने में लगे हैं।
शिक्षा में नवउदारवादी पैठ की एक बानगी देखी जा सकती है। पिछले दिनों हम सड़क के रास्ते पंजाब के जालंधर शहर जा रहे थे। शहर के पास लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के गेट पर एक बड़ा चमकदार होर्डिंग देखा, जिस पर देश के राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी का चित्र उकेरा गया था और साथ में उनका संदेश लिखा गया था। सवारी में होने के कारण हम राष्ट्रपति महोदय का संदेश नहीं पढ़ पाए। यूनिवर्सिटी के गेट और मुख्य सड़क के पास लगा वह बोर्ड देख कर हमारे नागरिक बोध को अलबत्ता गहरा धक्का लगा। देश के राष्ट्रपति एक प्राईवेट यूनिवर्सिटी का खुलेआम विज्ञापन कर रहे हैं! शहर जाने पर पता चला कि एक बड़े हलवाई ने 2005 में वह यूनिवर्सिटी बनाई है। राष्ट्रपति महोदय उस यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में उपाधियां बांटने आए थे। 
श्री प्रणब मुखर्जी जब से राष्ट्रपति बने हैं शिक्षा की मात्रा के बजाय गुणवत्ता बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। इस संदर्भ में वे बार-बार विदेशी विश्वविद्यालयों का हवाला देते हैं। लेकिन उच्च शिक्षा की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी सरीखी दुकानों में कौन-सी गुणवत्ता उन्हें दिखाई देती है कि वे उनके विज्ञापन तक के लिए अपना इस्तेमाल होने दे रहे हैं? हमारे संवैधानिक प्रमुख की यह कैसी भूमिका है? आजकल हर प्राईवेट यूनिवर्सिटी का मालिक समारोह के बहाने राष्ट्रपति को बुलाने की जुगत में लगा रहता है। स्थानीय और केंद्रीय नेताओं व मंत्रियों को तो बुलाया ही जाता है। इसके लिए पूरा लॉबिंग तंत्र विकसित हो गया है। जल्दी ही जो विदेशी विश्वविद्यालय आने वाले हैं, उनके समारोहों में तो राष्ट्रपति महोदय जाएंगे ही। देशभक्त लोग हमें माफ करें। ऐसे राष्ट्राध्यक्ष को लेकर हमारे भीतर आदर का भाव नहीं रह पाता। 
आपको याद होगा गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ (1957) को लेकर विवाद हुआ था कि मजबूर तवायफ के नृत्य पर नाचने वाले एक शख्स में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की छवि प्रक्ष्ेपित की गई है। उस फिल्म में साहिर लुधियानवी का गीत ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं’ भी नेहरू के नेतृत्व पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। नेहरू-प्रेमियों ने फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। बताते हैं नेहरू जी ने खुद फिल्म देखी और प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया था। यह सही है कि उस दृश्य में नेहरू की छवि आई थी। फिल्म की संरचना में उसका गहन प्रभाव पड़ता है। वहां व्यक्ति नेहरू का नहीं, नेता@प्रधानमंत्री नेहरू से फिल्मकार का आशय था। 
ध्यान दें, उसी दौर में ‘अंधेरे में’ कविता लिखी गई जो हमारे अंतर्बाह्य यथार्थ की बुरी और भयानक खबरें लेकर आती है। अगर ‘अंधेरे में’ कविता को चाक्षुस माध्यम में प्रस्तुत किया जाए तो फिल्म बनाने वाला उस दौर के बड़े नेताओं की झलक दिखा सकता है। ‘प्यासा’ और ‘अंधेरे में’ कविता में प्रस्तुत किया गया यथार्थ अंधेरे के आवरण में लिपटा है। लेकिन नवउदारवाद के हमाम में कुछ भी पोशीदा नहीं रहा है। राष्ट्राध्यक्ष के चित्र और संदेश शिक्षा को मुनाफे का सौदा बनाने वाली सरकार और मुनाफा कमाने वाले शिक्षा के व्यापारियों के विज्ञापन में इस्तेमाल हो रहे हैं। ‘अंधेरे में’ कविता में कहीं आग लगने और कहीं गोली चलने का जिक्र है। अब ऐसी खबरें आम हो गई हैं। शिक्षा संस्थानों तक में बाऊंसर और पुलिस बल तैनात कर दिए गए हैं। कोई छात्र, कर्मचारी, शिक्षक अगर जरा भी शिक्षा के बाजारीकरण का विरोध करता है तो बाऊंसर और पुलिस वाले उन पर टूट पड़ते हैं। देश की राजधानी में स्थित दिल्ली विश्वविद्यालय में इस तरह की घटनाएं अक्सर होती हैं।

बच्चों के भोजन में जहर

हाल में बिहार के छपरा जिले में धर्मसती गंदमान स्कूल में विषाक्त भोजन खाने से हुई 23 बच्चों की दर्दनाक मौत पर काफी चिंता व्यक्त की गई। लाशों पर भी राजनीति की जाती है, सो वह बच्चों की लाशों पर भी की गई। मामले की जांच हुई और स्कूल के प्रिसिपल को दोषी ठहरा कर गिरफ्तार कर लिया गया है। मध्यान्ह भोजन योजना को सुधारने और सुचारू रूप से चलाने की बाबत अलग-अलग कोनों से कई सुझाव दिए गए। लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि देश के नौनिहाल घर से मनपसंद पौष्टिक नाश्ता करके और दोपहर का खाना लेकर स्कूल जाएं। उसी तरह जैसे नागरिक समाज के बच्चे जाते हैं। एक उम्र तक खाने और मस्ताने की छूट देश के सभी बच्चों को होनी चाहिए। 
हम मध्यान्ह भोजन योजना के भी शुरू से खिलाफ रहे हैं। बच्चे स्कूल शिक्षा हासिल करने के लिए जाने चाहिए, भोजन करने के लिए नहीं। अगर भूख है, कुपोषण है, बच्चे स्कूल नहंी जाते हैं, उनमें सामाजिक सामरस्य बढ़ाना है, तो इसका इलाज स्कूलों में कच्चा-पक्का घटिया भोजन देना नहीं, उनके समग्र शारीरिक-मानसिक विकास के लिए समतामूलक सामजिक-आर्थिक व्यवस्था कायम करना है। 12 लाख स्कूलों में 11 करोड़ बच्चे इस योजना के तहत दोपहर का खाना पाते हैं। पहली से पांचवी कक्षा तक के बच्चों को प्रति भोजन 100 ग्राम खाद्यान्न और 6 से 8 कक्षा तक के बच्चों को 150 ग्राम खाद्यान्न प्रतिभोजन दिया जाता है। यूपीए प्रथम के साझा न्यूनतम कार्यक्रम के तहत शुरू हुई इस योजना को दस साल हो गए हैं। लेकिन बच्चों की भूख और कुपोषण की समस्या में कमी नहीं आई है। सरकारी आंकड़ों से ही इस सच्चाई की पुष्टि होती है। 
यह योजना सुप्रीम कोर्ट के 28 नवंबर 2001 के ऐतिहासिक बताए गए निर्देश पर लागू की गई थी जो उसने पीयूसीएल राजस्थान की एक याचिका पर दिया था। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश उसकी बच्चों की भूख और स्वास्थ्य के प्रति चिंता को दर्शाता है। उस समाज में यह यह बड़ी अच्छी बात है जहां बच्चों पर सबसे कम ध्यान दिया जाता हो। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को सबसे पहले यह देखना चाहिए कि सरकारें संविधान के नीति निर्देशक तत्वों का अनुपालन कर रही हैं या नहीं। यह सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्र भी है और फर्ज भी। अगर सरकारें संविधान के नीति निर्देशों का अनुपालन करती होतीं तो इस निर्देश की जरूरत नहीं पड़ती। सुप्रीम कोर्ट को यह पता ही होगा कि उसके निर्देश के पालन से भूख और कुपोषण की गंभीर समस्या स्थायी रूप से कभी भी दूर नहीं हो पाएगी। 
इस मामले में भी सचेत नागरिक कहेंगे कि भूखे बच्चों को कुछ तो मिल रहा है; कोर्ट के निर्देश के दबाव में सरकारें कुछ तो गरीब बच्चों का भला कर रही हैं। मनरेगा के समर्थन में दिए जाने वाले तर्क से यह अलग नहीं है। कुछ लोग कह सकते हैं कि कतिपय विकसित देशों में भी कहीं-कहीं बच्चों को स्कूलों में भोजन दिया जाता है। यह तर्क भी सही नहीं है। विकसित देशों में बच्चों के पेट की भूख और कुपोषण मिटाने अथवा उन्हें स्कूल आने का लालच देने के लिए भोजन नहीं दिया जाता। भारत में भी ऐसे कुछ स्कूलों में बच्चों को भोजन दिया जाता है जहां अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं। 
जिस नवउदारवादी व्यवस्था को देश के नेता, बुद्धिजीवी और नागरिक समाज एक्टिविस्ट एकजुटता से चला रहे हैं, उसके तहत बच्चों के बीच भी विभाजन और विषमता की गहरी खाइयां खोद दी गई हैं। डॉ. लोहिया का प्रस्ताव है कि दो नागरिकों के बीच की आय@आमदनी का फर्क 10 गुना से ज्यादा नहीं होना चाहिए। अगर हमारा नागरिक समाज बच्चों के प्रति जिम्मेदार और संवेदनशील होता तो कम से कम बच्चों के बीच का अंतर न्यूनतम रखता। सुप्रीम कोर्ट का निर्देश भी बच्चों के बीच समानता कायम करने के मकसद से नहीं, भूखे और कुपोषित बच्चों के प्रति दया भावना से प्रेरित है। जिस देश में कई करोड़ बच्चे कृपा पर पलें, उस देश के नेता और नौजवान महाशक्ति होने या बनने का दावा करते हों तो उसे बेशर्मी ही कहा जा सकता है।      
विभाजन और विषमता से यह सुनिश्चित होता है कि देश का वर्तमान और भविष्य उन्हीं बच्चाों का रहेगा जो भूखे ओर कुपोषित बच्चों की कीमत पर जरूरत से कई गुना ज्यादा खाते हैं। अगर हम अपने बच्चों को उनकी जरूरत और पसंद का खाना सही जगह और सही समय पर नहीं दे सकते तो इस देश को बंद कर देना चाहिए। ऐसे देश को चलाने की कोई जरूरत नहीं है जहां करोड़ों बच्चे भूख, कुपोषण और इसके चलते होने वाली बीमारियों से मर जाते हों; करोड़ों अशिक्षित रह जाते हों; करोड़ों बालमजदूर बनने के लिए अभिशप्त हों; करोड़ों अपराधी बन जाते हों; करोड़ों का यौनशोषण होता हो और लाखों हर साल गुम हो जाते हों।       

सांप्रदायिकता के हमसफर

2004 की चुनावी जीत के बाद सोनिया के सलाहकारों और सेकुलर सिपाहियों ने उन्हें त्याग के अलावा धर्मनिरपेक्षता की देवी भी घोषित कर दिया था; जिनके रहते कभी सांप्रदायिकता सिर नहीं उठाएगी। लेकिन सामने जो मंजर है, उसमें सांप्रदायिकता का नंगा नाच फिर से शुरू हो सकता है। बल्कि उसे शुरू ही मानना चाहिए। सांप्रदायिकता के नंगे नाच का ‘नायक’ मीडिया और नागरिक समाज का भी नायक है। याद दिलाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के विरोध में किए गए अपने पहले धरने में सबसे पहले नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। उनका प्रशंसा-प्रमाणपत्र पाकर आरएसएस और मोदी उनके दिल से शुक्रगुजार हुए थे। आजकल ‘आप’ पार्टी के जो एसएमएस ‘आम लोगों’ को आ रहे हैं, उनमें ‘अन्ना हजारे के साथी अरविंद केजरीवाल’ लिखा आता है। रामदेव ने हरिद्वार में मोदी के सम्मान में संत समागम करके खुद ही कह दिया दिया कि प्रधानमंत्री के लिए उनकी पहली और अंतिम पसंद नरेंद्र मोदी हैं। अरविंद केजरीवाल इन दोनों महानुभावों का ‘इस्तेमाल’ करके@करते हुए नेता बनने चले हैं। मोदी के उभार से त्रस्त अन्ना के समर्थक धर्मनिरपेक्षतावादियों ने उनसे कहलवाया है कि उन्होंने नरेंद्र मोदी को क्लिीन चिट नहीं दी है। गोया नरेंद्र मोदी अन्ना हजारे जैसों की क्लिीन चिट का भूखा बैठा है। दो साल पहले के नरेंद्र मोदी को अन्ना की प्रशंसा की जरूरत थी। अब उसका वार्तालाप अमेरिका और यूरोप से चल रहा है। अमेरिका ने कह दिया हे वे ‘अमेरिकी अभय’ के आवेदन करें। कहने का आशय है कि सांप्रदायिकता के नंगे नाच की अगली प्रस्तुति में इन सभी की संलिप्तता होगी। 
नरेंद्र मोदी के उभार पर धर्मनिरपेक्षतावादी परेशान हैं। कहते हैं मोदी का मिथक गढ़ा जा रहा है। अरे भाई अगर सोनिया गांधी को त्याग की देवी, मनमोहन सिंह को ईमानदारी का देवता और राहुल गांधी को होनहार बिरवान बताने के मिथक जनता पर थोपे जा सकते हैं तो मोदी का मिथक क्यों नहीं चलेगा? कहते हैं मोदी बिना समझे-बूझे हर मुद्दे पर बोलते-बबकारते हैं। मोदी की बोलती से शिकायत करने वालों को सोचना चाहिए कि वाचालता को जंतर-मंतर और रामलीला मैदान से प्रमाणपत्र मिल चुका है। प्रत्येक नागरिक समाज एक्टिविस्ट और अपने फन का माहिर शख्स वहां जाकर जबान साफ करने के लिए उतावला था। वहां थोक में हुई अनर्गल वाचालता को इलैकट्रॉनिक मीडिया ने अपना ‘स्वर’ मिला कर कई गुणा कर दिया। वरना बबकारते तो बाल ठाकरे टाइप नेता भी रहते थे। 
हम यह कहना चाहते हैं कि मोदी इस आंदोलन की राह से होकर राष्ट्रीय सीन पर आया है। उसे रोकने की ताकत सोनिया के सलाहकारों और सेकुलर सिपाहियों में नहीं है। आज की कांग्रेस में भी नहीं है। रोकने से हमारा आशय मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने से नहीं है। न ही वे प्रधानमंत्री बन सकते हैं। ‘हिंदू राष्ट्रवादी’, ‘कुत्ते का पप्पी’, ‘धर्मनिरपेक्षता का बुरका’ जैसी जुमलेबाजी के बावजूद गुजरात के बाहर सांसद का चुनाव जीतना अभी उनके बूते का नहीं है। हमारा आशय मोदी मार्का सांप्रदायिकता को रोकने से है। बुरका वाली बात को ही ले लीजिए। 
जैसे-जैसे आम चुनाव नजदीक आते जाएंगे कांग्रेस और भाजपा के बीच  तू-तू-मैं-मैं और तेज होती जाएगी। शुरूआत को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि पहले से ही काफी नीचे गिर चुका राजनीतिक बहस का स्तर और नीचे गिर सकता है। यह भी अभी से देखा जा सकता है कि दोनों पार्टियों में कारपोरेट पूंजीवाद के समर्थन पर कोई मतभेद नहीं है। अमेरिका के सामने दोनों नतमस्तक हैं। झगड़ा वोटों का है। भाजपा को लगता है कि कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के आच्छद्द में मुसलमानों के वोट मार ले जाती है। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष बना कर कांग्रेस को कड़ी चुनौती दे दी है। मोदी के मुकाबले कांग्रेस की तरफ से लफ्फाजी की कमान कौन सम्हालेगा, अभी तय नहीं हुआ है। वहां अभी फुटकर व्यवस्था चल रही है। कभी कोई, कभी कोई नेता-प्रवक्ता नरेंद्र मोदी के हमलों का जवाब देते हैं। कांग्रेस को शायद लगता है कि ऐसे शख्स का मिल-जुल कर ही मुकाबला किया जा सकता है। नरेंद्र मोदी गजब के लफ्फाज हैं। उनके लिए ईजाद किया गया ‘फेंकू’ शब्द उनकी ‘प्रतिभा’ के सामने कमजोर ठहरता है। आशा करनी चाहिए कि लफ्फाजी का दौर-दौरा जैसे परवान चढ़ेगा, उनके कद का कोई सही शब्द किसी कोने से निकल कर आएगा। 
संघ में सांप्रदायिक तो हर नेता होता है। लेकिन उनमें सांप्रदायिक फासीवादी कोई-कोई हो पाता है। निकट अतीत में लालकृष्ण अडवाणी के बाद नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक फासीवादी के रूप मेंं स्थापित हुए हैं। वैसे भाजपा की धार्मिक शाखा विहिप और उसकी युवा शाखा बजरंग दल के अखड़े में छोटे-छोटे कई सांप्रदायिक फासीवादी जोर करते देखे जा सकते हैं। बड़ा सांप्रदायिक फासीवादी होने के लिए कारनामा भी बड़ा करना होता है। जैसे अडवाणी ने ‘राममंदिर आंदोलन’ चला कर एक 500 साल पुरानी मस्जिद का ध्वंस कराया और उसके आगे-पीछे भड़के दंगों में हजारों निर्दोष लोगों को मरवाया। उसी तरह नरेंद्र मोदी ने ‘गुजरात कांड’ कराया। अडवाणी आज भी राममंदिर आंदोलन की याद करके भावुक हो उठते हैं। उन्हें वह आजादी के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन लगता है। उसी तरह नरेंद्र मोदी गुजरात कांड को अपने सीने पर तमगे-सा पहन कर घूमते हैं। 
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए यह सब करना जरूरी होता है। गुजरात कांड में नरेंद्र मोदी का एक-एक कारनामा अपने पक्ष में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नीयत से परिचालित रहा है। संभावना यही है कि आरएसएस ऐन मौके पर अडवाणी को ही आगे करे। लेकिन नरेंद्र मोदी के कारनामों से वह चकित और काफी खुश हुआ है। जैसे हिटलर के लाखों यहूदियों के सफाए पर गुरुजी (गोलवलकर) स्तंभित और आनंदित हुए थे! बतौर सांप्रदायिक फासीवादी नरेंद्र मोदी की प्रतिभा का कायल होने के चलते ही उसने अडवाणी के विरोध के बावजूद नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाने का फैसला लिया है। आरएसएस को लग गया है कि नवउदारवाद के हमाम में हिंदू राष्ट्र का सपना अभूतपूर्व रूप से जवान हो उठा है। अन्यथा वे युवक जो खाकी निक्कर खुद पहनना तो दूर, घर में वरिष्ठों के पहनने पर नाक-भौं सिकोड़ते हों, मोदी के दीवाने बने हुए हैं। 
धर्मनिरपेक्षता का आवरण ओढ़ कर बच निकलने वाली कांग्रेस को सांप्रदायिक फासीवादी नरेंद्र मोदी ने ठिकाने लगाने की मुहिम छेड़ दी है। उनका पिछले दिनों बहुचर्चित पूना का भाषण उसी मुहिम का हिस्सा है। भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने सलाह दी है कि सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की बहस चला कर भाजपा कांग्रेस के जाल में न फंसे। लेकिन उल्टे कांग्रेस भाजपा के जाल में फंसी नजर आती है। वह खुद कह रही है कि कांग्रेस पोशीदा तौर पर सांप्रदायिक करती है, जो भाजपा की खुली सांप्रदायिकता से बेहतर है। इसे नरेंद्र मोदी का कमाल कहना चाहिए कि उसने कांग्रेस से सच उगलवा लिया।    
नरेंद्र मोदी के बयान पर यह कह कर कि ‘नंगी सांप्रदायिकता से धर्मनिरपेक्षता का बुर्का बेहतर है’, कांग्रेस ने खुद ही अपने को भाजपा की बी टीम स्वीकार कर लिया है। कांग्रेस का बयान बताता है कि धर्मनिरपेक्षता उसके लिए एक आवरण है। यानी भाजपा खुले तौर पर सांप्रदायिकता करती है और कांग्रेस उस पर धर्मनिरपेक्षता का परदा डाले रखती है। इस स्वीकारोक्ति का सीधा अर्थ है कि कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य में सच्ची आस्था नहीं है। नेहरूयुगीन कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक पार्टी थी। लेकिन उनके बाद की कांग्रेस ने सत्ता के लिए कई बार सांप्रदायिक कार्ड खेला है। उसीका नतीजा है कि आज कांग्रेस के नेता खुद कह रहे हैं कि धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस के लिए महज आवरण है। वे इस आवरण के चलते कांग्रेस को भाजपा से बेहतर बता रहे हैं। 
आरएसएस एक सांप्रदायिक संगठन है और भाजपा उसका राजनीतिक मंच है। भाजपा की विचारधारा और नेता आरएसएस से आते हैं। लिहाजा, सांप्रदायिकता भाजपा की राजनीति का मूल आधार है। नरेंद्र मोदी ने ‘धर्मनिरपेक्षता का बुर्का’ कह कर धर्मनिरपेक्ष संविधान के प्रति गहरी हिकारत व्यक्त की है। साथ ही अल्पसंख्यक मुसलमानों के प्रति भी, क्योंकि बुर्का मुस्लिम महिलाओं का लिबास है। कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता क आवरण को ही पर्याप्त बता रही है और उस नाते भाजपा से बेहतर होने का दावा कर रही है। बहस में पड़ी ये दोनों पार्टियां यह भूल रही हैं कि धर्मनिरपेक्षता संविधान का एक मूलभूत मूल्य है और देश की प्रत्येक राजनीतिक पार्टी की उसमें संपूर्ण निष्ठा अनिवार्य है। देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों की निष्ठा धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य में नहीं है, यह समाज और भारतीय राष्ट्र के लिए गंभीर समस्या है। लेकिन न मीडिया, न सुप्रीम कोर्ट, न निर्वाचन आयोग और न ही देश के जागरूक नागरिक इस संवैधानिक विचलन का संज्ञान ले रहे हैं। कुछ महीने पहले नरेंद्र मोदी द्वारा हरिद्वार स्थित बाबा रामदेव के आश्रम में धर्म की राजनीति करने पर हमने सोशलिस्ट पार्टी की ओर निर्वाचन आयोग को एक पत्र लिख कर उसका संज्ञान लेने का निवेदन किया था। लेकिन आज तक उस पत्र का कोई जवाब निर्वाचन आयोग ने नहीं दिया है।
सांप्रदायिकता और नवउदारवाद के कीटाणु एक-दूसरे पर पलते हैं। आपने देखा ही कि सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की बहस के बीच कई क्षेत्रों में एफडीआई का प्रवेश हो गया है। खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश के पहले से हुए निर्णय में ‘कड़े’ प्रावधानों को खत्म कर दिया गया है। नागरिक समाज से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक किसी ने  कहीं से कोई विरोध नहीं किया। यह नवउदारवाद (कांग्रेस) और सांप्रदायिकता (भाजपा) और उलटे (वाइसवरसा) दोनों की जीत है। मुख्यधारा राजनीति और नागरिक समाज का समवेत नवउदारवाद का नाच आगे जारी रहना है। उसमें बीच-बीच में सांप्रदायिकता भी अपना प्रदर्शन करती है तो उनमें किसी को ऐतराज नहीं है।     
कहां किशन पटनायक को आशा थी कि जनादेश की रोशनी में सचेत नागरिक नवउदारवादी शक्तियों को पीछे धकेलते, कहां जनादेश को पीछे धकेल कर नवउदारवाद का वर्चस्व कायम हो चुका है। सांप्रदायिकता के नंगे नाच को जनता रोक देगी, लेकिन पिछले दस सालों से जारी नवउदारवाद के नंगे नाच का वह क्या करे? किशन जी होते तो बुद्धिजीवियों की तरह सचेत नागरिकों से भी निराश होकर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को कसते कि वे अपनी भूमिका ज्यादा गहराई और मुस्तैदी से निभाएं।


Wednesday, July 3, 2013

दिल्ली विश्वविद्याल - पतन की पड़ताल : प्रेम सिंह


(यूं तो भूमंडलीकरण के लगातार हमलों का सबसे ज्यादा असर हमारी शिक्षा व्यवस्था पर ही हुआ है, और सत्ता प्रतिष्ठानों ने हर उस फैसले को अमली जामा पहनाया है, जो छात्रों के हितों की अनदेखी करता रहा है। लेकिन बावजूद इसके समाज के हर तबके से निकलकर कुछ संघर्षशील युवा अपनी साधारण हैसियत में भी विश्वविद्यालय की रौनक बरक़रार रखे हुए थे। इन छात्रों को ना तो दिल्ली की चकाचौंध रोक पाई थी। ना ही केन्द्र सरकार के ग़रीब विरोधी फैसले। अब इन छात्रों की संख्या को कम करने के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय ने चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम शुरू किया है। जो ना केवल छात्र विरोधी है बल्कि संविधान के मूल्यों के भी खिलाफ है। इस ज्वलंत विषय पर डॉ प्रेम सिंह ने इस लेख के जरिए ना केवल अपनी पीड़ा का इज़हार किया है , बल्कि हमारे जैसे युवाओँ को इस तंत्र से लोहा लेने का संबल भी दिया है। )


संकट में संस्थान

दिल्ली विश्वविद्यालय भारत के बड़े और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में से एक है। इसकी स्थापना 1922 में हुई थी। स्थापना के वक्त इसके तहत केवल तीन कॉलिज - सेंट स्टीफेंस कॉलिज (स्थापना 1881), हिंदू कॉलिज (स्थापना 1899) और रामजस कॉलिज (स्थापना 1917 ), दो संकाय - कला और विज्ञान - तथा 750 छात्र थे। तब से अब तक दिविवि ने लंबी यात्रा तय करते हुए देश के अग्रणी विश्वविद्यालय का मुकाम हासिल किया है। आज दिविवि के तहत करीब 80 कॉलिज, 16 संकाय, 86 विभाग हैं, जिनमें करीब डेढ़ लाख नियमित छात्र स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई करते हैं। दिविवि स्कूल आॅफ ओपन लर्र्निंग (एसओल), जिसे पहले स्कूल आॅफ कोरेसपोंडेस कहा जाता था, के माध्यम से करीब तीन लाख छात्रों को पत्राचार से स्नातक और स्नाताकोत्तर की शिक्षा प्रदान करता है। अनौपचारिक शिक्षा ग्रहण करने वाले इन सब छात्रों के लिए पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराए जाने के अलावा अध्यापन की भी व्यवस्था है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यह अकेला विश्वविद्यालय है जो अपने पाठ्यक्रम, अध्यापन और परीक्षा की गुणवत्ता के चलते पूरे देश के छात्रों के आकर्षण का केंद्र है। दिविवि से स्नातक करना सम्मान की बात मानी जाती है और यहां से हासिल की गई डिग्री की देश-विदेश में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा है।  
पिछले कुछ सालों से दिल्ली विश्वविद्यालय दोहरे संकट का सामना कर रहा है। पहला, खुद दिविवि का आंतरिक संकट है, जिसके तहत न केवल उसकी महत्वपूर्ण संस्थाएं (अकादमिक मामलों में सर्वोच्च विद्वत परिषद और निर्णयों के लिए सर्वोच्च कार्यकारी परिषद) अपनी निर्धारित भूमिका और महत्व खोते जा रहे हैं। इसका असर विभागीय परिषदों, विभिन्न संकायों की बैठकों और कॉलिजों की स्टाफ काउंसिलों पर भी पड़ा है। कुलपतियों द्वारा अहम फैसले अलोकतांत्रिक ढंग से, जल्दबाजी में, असहमति का निरादर करते हुए लिए जाते हैं। शिक्षक संगठन डूटा और छात्र संगठन डूसू का दिविवि में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। शिक्षकों और छात्रों के हितों के लिए संघर्ष करने वाले इन संगठनों का भी अवमूल्यन हुआ है। जब समाज के अन्य क्षेत्रों में स्वतंत्र सोच और असहमति के लिए जगह सिकुड़ती है तो लोग विश्वविद्यालयों की तरफ देखते हैं और वहां से प्रेरणा पाते हैं। दिविवि में ऐसा माहौल बन चुका है कि कुलपति ही नहीं, बहुत-से शिक्षक भी विश्वविद्यालय के अर्थ और अवधारणा के प्रति जागरूक प्रतीत नहीं होते। 
दिविवि के इस आंतरिक संकट को न तो नवउदारवादी दुष्प्रभावों के मत्थे मढ़ा जा सकता है, न नेताओं और नौकरशाही के हस्तक्षेप के। यह कहना तसल्ली की बात नहीं मानी जा सकती कि राजनीतिक हस्तक्षेप करके नेता कमजोर लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बिठा देते हैं; मंत्रालय व यूजीसी के नौकरशाह बेजा दखलंदाजी करते हैं; कई बार उन्हें कुलपति बना कर थोप दिया जाता है; और ऊपर से थोपे गए लोग विश्वविद्यालय की संस्थाओं और नियम-कायदों को धता बता कर मनमाने ढंग से सरकार का एजेंडा लागू करते हैं। सीधी बात यह है कि अगर दिविवि का निर्धारित आंतरिक ढांचा हर स्तर पर मजबूत हो तो ऊपर से थोपे गए किसी व्यक्ति की मनमानी ज्यादा देर नहीं चल सकती। शिक्षकों की भूमिका विश्वविद्यालय के आंतरिक ढांचे के अंतर्गत सबसे महत्वपूर्ण होती है। सभी संस्थाओं और गतिविधियों में वे शामिल होते हैं। अगर शिक्षक मजबूत और अपनी भूमिका के प्रति गंभीर होंगे तो आंतरिक ढांचा कमजोर नहीं हो सकता और ऊपर से थोपे गए कमजोर या अवांछित लोग समय काट कर या समय से पहले विदा हो जा सकते हैं। शिक्षकों की मजबूती से सबक लेकर नेता और नौकरशाह अपना रवैया बदलने के लिए बाध्य भी हो सकते हैं। यह तर्क कि कुलपतियों व नौकरशाहों का विरोध करने से शिक्षकों के काम रुक जाते हैं, कतई वाजिब नहीं कहा जा सकता। शिक्षकों का मूलभूत काम अध्यापन है, अगर वही बिगड़ रहा हो तो उनकी अपनी तरक्की और परियोजनाएं लेने का काम आगे बढ़ता भी रहे तो छात्रों को उससे कोई फायदा नहीं होता। यह चर्चा हमने इसलिए की है कि राजनीतिक और नौकरशाही के हस्तक्षेप से पैदा होने वाली विश्वविद्यालय के नियमन संबंधी समस्याओं को ही कुछ विद्वान उच्च शिक्षा का संकट बता देते हैं। 
दिविवि का दूसरा संकट उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और उपलब्धता को लेकर है। अभी तक दिविवि में राष्ट्रीय स्तर पर लागू 10़2़3 के तहत बीए, बीएससी, बीकॉम के आॅनर्स और प्रोग्राम की पढ़ाई होती है। पाठ्यक्रम का स्वरूप ऐसा है कि उत्तीर्ण छात्र विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग सकते हैं अथवा@और स्नातकोत्तर@शोध के लिए आगे पढ़ाई जारी रख सकते हैं। इनमें से कोई न कोई कोर्स पढ़ने के लिए बहुत-से विदेशी छात्र भी दिविवि आते हैं। दिविवि के कुछ कॉलिज मेडिकल, इंजीनियरी (दिविवि के इंजीनियरिंग कॉलिज को कुछ वर्ष पहले अलग कर दिया गया), नर्र्सिंग, होम साइंस, एप्लाइड सांइस, बीएड व बीएलएड, पत्रकारिता आदि व्यावसायिक कोर्स कराते हैं। अलग संकायों में प्रबंधन और लॉ भी पढ़ाए जाते हैं। स्नातक अथवा स्नातकोत्तर पढ़ाई करते हुए भारतीय और विदेशी भाषाओं के सर्टिफिकेट व डिप्लोमा कोर्स भी उपलब्ध हैं। इच्छुक छात्र कुछ भाषाओं में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री भी कर सकते हैं। 
इन कोर्सों की गुणवत्ता और उपलब्धता निरंतर बढ़ती रहे, इसके प्रयास होते रहना जरूरी है। वैसे प्रयासों को ही उच्च शिक्षा में सही सुधार कहा जाएगा। लेकिन नवउदारवादी नीतियों के तहत ‘सुधार’ की वकालत करने वाले उच्च शिक्षा के हर कोर्स को राजगारोन्मुख@बाजारोन्मुख बनाने पर तुले रहते हैं। दूसरे, उनका आग्रह होता है कि दिविवि का पाठ्यक्रम और परीक्षा व्यवस्था ऐसी हो कि यहां के छात्र पढ़ाई के दौरान और पढ़ाई के बाद विदेश, विशेषकर अमेरिका में अपनी पढ़ाई सुभीते से जारी रख सकें। दूसरे शब्दों में, वे नकल को सुधार का नाम देते हैं। दिविवि में तीन साल पहले थोपे गए समेस्टर सिस्टम और इस अकादमिक सत्र से थोपे गए चार साला स्नातक प्रोग्राम (एफवाईयूपी) की यही सच्चाई है। और यही दिविवि में उच्च शिक्षा का असली संकट है।
सेमेस्टर प्रणाली और एफवाईयूपी के तहत उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को ही चोट नहीं पहुंचाई गई है, शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों के बीच व्यवस्थित तरीके से भेदभाव की नींव डाली गई है। एक वाक्य में, यह प्रोग्राम पूरी तरह से छात्र विरोधी है। विशेष तौर पर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को दो साल बाद डिप्लोमा लेकर विश्वविद्यालय से बाहर निकलना होगा। जिस तरह से स्कूल में अलग-अलग स्ट्रीम लेने वाले सभी छात्रों को 11 फाउंडेशन कोर्स अनिवार्य रूप से पढ़ने हैं, हो सकता है उनमें बहुत-से बिना डिप्लोमा के ही बाहर हो जाएं। इस प्रोग्राम के तहत शारीरिक तौर पर विकलांग छात्रों की पढ़ाई बुरी तरह बाधित होगी। कोर्ट ने भी इस बाबत दिविवि को आगाह किया है। उच्च शिक्षा की प्राप्ति के रास्ते में पहले से ही कई तरह की बाधाओं से घिरी विशेष तौर पर गांव-कस्बों की लड़कियों और मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में काफी पिछड़ा है, के लिए उच्च शिक्षा का रास्ता और दुर्गम हो जाएगा। आॅनर्स की डिग्री हासिल करने के इच्छुक छात्रों का एक साल अतिरिक्त लगेगा, जिसका उनके अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। हालांकि उन्हें भी जो ज्ञान मिलेगा वह तीन साला आॅनर्स कोर्स से कमतर होगा। यह प्रोग्राम भेदभाव की नींव पर स्थित है, यह इसीसे स्पष्ट हो जाता है कि एसओएल में पढ़ने वाले करीब 3 लाख छात्रों को इसके लायक नहीं समझा गया है। विद्वत परिषद के पूर्व सदस्य और एसओएल के शिक्षक रहे वीपी जैन ने ठीक ही इन लाखों छात्रों को आधुनिक एकलव्यों की संज्ञा दी है। 
कुलपति का यह कहना कि पहले या दूसरे साल में पढ़ाई छोड़ देने वाले 30 प्रतिशत छात्रों पर रोक लगेगी गैर-जिम्मेदाराना और भ्रामक है। अब दो साल बाद उन्हें अनिवार्य रूप से कॉलिजों से बाहर कर देने की व्यवस्था कर दी गई है। जबकि जरूरत इस बात की है कि दाखिला लेने वाला एक भी छात्र न पढ़ाई छोड़े, न फेल हो।  क्योंकि फेल छात्र नहीं, शिक्षक और संस्थान होते हैं। दरअसल, इस प्रोग्राम का संदेश साफ है - जो कमजोर हैं, वे डिप्लोमा लेकर छोटी नौकरी की तलाश करें ताकि बड़ी नौकरियां बड़े लोगों के बच्चों को मिलती रहें। इस प्रोग्राम से सबसे ज्यादा अन्याय इस साल दाखिला लेने वाले साधारण हैसियत के छात्रों के साथ हुआ है। उनमें और उनके अभिभावकों में असमंजस और अनिश्चितता की स्थिति है कि दिविवि की डिग्री का उनका सपना पूरा होगा या नहीं? 
यह छात्रों के प्रति हद दर्जे की गैरजिम्मेदारी है कि एफवाईयूपी 24 दिसंबर 2012 को विद्वत परिषद की तीन दिन के नोटिस पर बुलाई गई विशेष बैठक में पहली बार रखा गया और पारित हो गया। अगले दिन कार्यकारी परिषद में भी यह औपचारिकता पूरी कर ली गई। विरोध का कोई मूल्य था ही नहीं। विद्वत परिषद और कार्यकारी परिषद के जिन चुने गए सदस्यों ने इस प्रोग्राम का समर्थन किया, वे अगर वैसा न भी करते तब भी वह पारित होता। सूचना के अनुसार उसके कुछ दिन पहले नवंबर में ‘उत्सवप्रिय’ कुलपति ने एफवाईयूपी पर चर्चा करने के लिए विशेष तौर पर बुलाए गए 10 हजार छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों का एक मेला लगाया था! 5 मार्च 2013 को विभिन्न विभागों को 15 दिनों में नया पाठ्यक्रम तैयार करके देने के लिए कहा गया जिसे एक महीना और बढ़ाया गया। उसी तरह से आनन-फाानन में समाज विज्ञान और विज्ञान संकायों की बैठकें आयोजित की गईं और कोर्स कमेटी वगैरह की औपचारिकताएं निभाई गईं। 
इस मामले में सबसे ज्यादा चिंता की बात है कि पाठ्यक्रम आधा-अधूरा है और छात्रों के लिए पाठ्य सामग्री नहीं है; न शिक्षक। पिछले करीब 4 साल से दिविवि में शिक्षकों की नियुक्तियां बंद हैं, जबकि 4 हजार पद खाली पड़े हैं। गोया सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए शिक्षकों की नियुक्तियां रोके रखना जरूरी हो! नए पाठ्यक्रम को पढ़ाने के लिए शिक्षकों को कोई प्रशिक्षण नहीं दिया गया है। कुलपति और उनके समर्थकों की बस एक ही टेक है - ‘अमेरिका में ऐसा होता है’। वे यह भी सुनने और सोचने के लिए तैयार नहीं हैं कि अमेरिका सहित किसी भी पूंजीवादी देश में शिक्षा संबंधी बदलाव जैसा गंभीर काम इस फूहड़ ढंग से करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।   
ऐसे में यह स्वाभाविक है कि विवादास्पद एफवाईयूपी को लेकर पिछले कुछ महीनों से लगातार बहस चल रही है। बहस एकतरफा है, जो इस प्रोग्राम का विरोध करने वाले शिक्षकों, छात्रों, शिक्षाविदों, विद्वानों और नागरिक समाज के गणमान्य व्यक्तियों की तरफ से चलाई जा रही है। प्रोग्राम को लागू करने वाले - दिविवि के कुलपति व उनकी टास्क फोर्स और दोनों मानव संसाधन मंत्री - किसी भी तर्क का जवाब न देकर महज ताकत के ‘तर्क’ से अपने फैसले पर अडिग हैं। राष्ट्रपति, जो दिविवि के विजिटर हैं, और प्रधानमंत्री, जो संसद के सर्वोच्च नेता हैं, पूरे प्रकरण में चुप्पी साधे हुए हैं। जबकि देश के कई प्रतिष्ठित विद्वान उन्हें पत्र लिख चुके हैं और मिल कर यह प्रोग्राम कम से कम इस साल स्थगित करने की प्रार्थना कर चुके हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का यह रुख दर्शाता है कि यूपीए सरकार उच्च शिक्षा में नवउदारवादी एजेंडा लागू करने का निर्णायक फैसला कर चुकी है। सरकार का फैसला यह है कि नवउदारवादी एजेंडे के तहत जिस तरह अर्थव्यवस्था पहले से आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को और मजबूत बनाने के लिए बनाई जाती है, शिक्षा व्यवस्था को भी उसी तरह बनाना है। पिछले दो दशकों में यह काम स्कूली और व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था में काफी तेजी से किया गया है। अब सार्वजनिक क्षेत्र के उच्च शिक्षा संस्थानों की बारी है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में यह एजेंडा अच्छी तरह से रखा गया है। इस प्रोग्राम के हिमायती मानव संसाधन राज्यमंत्री शशि थरूर ने खुद कहा है कि चार साला स्नातक प्रोग्राम नहीं होने के चलते यहां के छात्रों को अमेरिका में दिक्कत का सामना करना पड़ता है। बताने की जरूरत नहीं कि यहां के कौन-से और  कितने छात्र आगे पढ़ने अमेरिका जाते हैं? 
एफवाईयूपी उच्च शिक्षा के नवउदारवादीकरण की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है। जाहिर है, दिल्ली विश्वविद्यालय के बाद इसे अन्य विश्वविद्यालयों में लागू किया जाएगा। कुलपति सरकार का यह काम करा ले गए तो इसमें दिविवि की आंतरिक कमजोरी सबसे बड़ा कारण रही है, जिसका हमने ऊपर जिक्र किया है। जो शिक्षक सोचते  हैं कि वे कुलपति का साथ देकर कांग्रेस और भाजपा को बचा रहे हैं, वे किंचित गंभीरता से सोचेंगे तो पाएंगे कि वास्तव में वे अपने स्वत्व और पेशे की गरिमा को गंवा रहे हैं। हम यह भी कहना चाहेंगे कि इस मामले में अमेरिका का हव्वा ज्यादा नहीं खड़ा करना चाहिए, न ही उसे दोष देना चाहिए। भारत के ज्यादातर मध्य और उच्च मध्यवर्ग के भीतर बैठा अमेरिका सरकारों को यह सब करने की छूट और सहयोग देता है। देश में धड़ल्ले से चल रहा नवसामंतवाद और नवसाम्राज्यवाद का गठजोड़ शून्य में नहीं स्थित है। नवउदारवाद के खिलाफ संघर्ष को कामयाब बनाना है तो भीतर बैठे अमेरिका को विदा करना होगा।

कुल डुबाने वाले कुलपति

एक तरफ, खासकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों के बारे में, स्वायत्तता का तर्क दिया जाता है। लेकिन उसके समानांतर यह धारणा भी चलती है कि कुलपति वही करते हैं जो सरकारें चाहती हैं। किसी विषय पर निर्णय लेने के लिए बनी विश्वविद्यालय की अधिकृत संस्थाओं और निर्धारित प्रावधानों की अनदेखी करना अथवा उनका उल्लंघन करना कुलपतियों के लिए इसीलिए संभव होता है। आम धारणा है कि राज्य विश्वविद्यालयों से लेकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों तक कुलपतियों के चयन में राजनीतिक पैरवी अथवा@और मोटी रकम चलती है। इस तरह से नियुक्त होने वाले कुलपति अपनी ‘सत्ता’ दिखाने और ऊपर के आकाओं को खुश रखने के लिए पद से जुड़ी गरिमा और जिम्मेदारी की परवाह न करते हुए नियम-कायदों का दुरुपयोग करते हैं। 
हम यहां थोड़ी चर्चा इस बात पर करना चाहते हैं कि मंत्री और सरकार के आदेश पर काम करने वाले कुलपतियों में पहले से ही कुछ खास ‘गुण’ विद्यमान होते हैं। बल्कि उनके चयन में वैसे गुणों का निर्णायक योगदान होता है। यह नवउदारवाद का दौर है। भारत के शासक वर्ग की खूबी यह है कि वह संविधान की शपथ खाकर उसकी संकल्पना और विचारधारा के पूरी तरह उलट नवउदारवादी नीतियों को हर क्षेत्र में लागू करता जा रहा है। नवउदारवादी नीतियों को उच्च शिक्षा में लागू करने के लिए सरकारें कोशिश करती हैं कि नवउदारवादी विचारधारा के गुलाम लोग कुलपति नियुक्त किए जाएं। पिछले कुछ वर्षों से तो उनके सामने शर्त रख दी जाती है कि उन्हें नवउदारवादी एजेंडा लागू करना है। 
ऐसे कुलपतियों, जिनके पास अपना कोई सोच और सपना नहीं होता, की कार्यशैली और व्यवहार की विचित्रता देखने लायक होती है। दिविवि के इसके पहले कुलपति, जिन्होंने सेमेस्टर सिस्टम थोपा था, बीज बेच कर किसानों की जान खरीदने वाली मोंसेंटो जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ हेलमेल रखने वाले हैं। उन्हें एप्लाइड सांइस, मैनेजमेंट और वित्तीय अध्ययन से जुड़े विषयों को छोड़ कर, विशेषकर मानविकी और सोशल सांइस के विषय निरर्थक लगते हैं। कुलपति की हैसियत से वे सरेआम कहते थे कि जो विषय बाजार में खड़ा नहीं हो सकता, उसे विश्वविद्यालय में पड़े रहने का अधिकार नहीं है। विद्वत परिषद, कार्यकारी परिषद व यूजीसी को गलत सूचना देने अथवा गुमराह करने में उन्हें कोई नैतिक बाधा नहीं होती थी। उनके अपने शोध पर पाइरेसी का आरोप लगा तो उन्होंने ‘घर की’ जांच समिति बना कर अपने को पाक-साफ सिद्ध कर लिया। आपको याद होगा दिविवि के फिजिक्स विभाग की तरफ से कबाड़ में परमाणु की छड़ें बेची गई थीं जिससे हुई दुर्घटना में एक-दो लोग मारे गए थे और कुछ बुरी तरह घायल हुए थे। सारा मामला सामने आने के बावजूद कुलपति ने काफी दिनों तक पुलिस को यह नहीं बताया कि परमाणुयुक्त कबाड़ बेचने का काम दिविवि ने किया था। पुलिस ने खुद ही कबाड़ के स्रोत का पता लगाया। कबाड़ बेचने के लिए बनी फिजिक्स विभाग की कमेटी और कुलपति उस जानलेवा दुर्घटना के लिए सीधे जिम्मेदार थे। लेकिन नवउदारवादी ‘कवच’ के चलते कुलपति का बाल भी बांका नहीं हुआ।   
अपने कार्यकाल में उन्होंने हिंदी विभाग के दो प्रोफेसरों को यौन उत्पीड़न के आरोप से इसलिए पूरा बचा लिया क्योंकि उन्होंने सेमेस्टर सिस्टम लागू करने में उनका और सरकार का पूरा साथ दिया था। जबकि उसी मामले में आरोपित एक प्रोफेसर को उन्होंने जांच समिति की रपट के परे जाकर बर्खास्त करने का फैसला लिया था। उनके द्वारा बचाए गए दोनों प्रोफेसरों पर दिल्ली हाई कोर्ट में पीड़िता की तरफ से मुकदमा दायर है। वर्तमान कुलपति को पीड़िता ने स्वयं मिल कर यह बताया कि पिछले कुलपति द्वारा बचाए गए प्रोफेसरों पर उसने हाई कोर्ट में केस दायर किया है जो स्वीकृत हो गया है। उसने कुलपति से यह भी प्रार्थना की कि वे आरोपित प्रोफेसरों को नई बनने वाली टीम में न रखें। लेकिन कुलपति ने बिना किसी नैतिक हिचक के दोनों को अपनी टीम में रखा और आज भी दोनों उनके सबसे ज्यादा विश्वास भाजन हैं। यह उल्लेख हमने इसलिए किया है कि जो नवउदारवादी एजेंडा को थोपने में आंख मूंद कर सरकार का सहयोग करते हैं, उन पर नियम-कायदे और नैतिकता के बंधन लागू नहीं होते। बल्कि कपिल सिब्बल जैसे मंत्रियों के वे रातोंरात अत्यंत चहेते हो जाते हैं। 
विचित्रता में वर्तमान कुलपति पिछले कुलपति से काफी आगे हैं। वे कभी ‘मॉडर्न डे विक्रमादित्य’ बन कर दफ्तरों और विभागों में छापामारी करते हैं, कभी दिविवि के चिन्ह हाथी को साक्षात घुमाते हैं, कभी छात्रों और अभिभावकों को इक्ठ्ठा करके रंगारंग शो करते हैं, बाकायदा दरबार लगा कर  तरह-तरह के पद, पदवियां, पुरस्कार, परियोजनाएं आदि बांटते हैं, विश्वविद्यालय के संचालन के लिए बनी निश्चित संस्थाओं के बावजूद अलग से ‘टास्क फोर्स’ रखते हैं, वे डूटा को न मानते हैं न उसके प्रतिनिधियों से मिलते हैं और, मजेदारी यह है, मौका बेमौका अपने भाषणों में गांधी का बेतुका उल्लेख करते हैं। हमें कई विदेशी विश्वविद्यालय के कुलपतियों को सुनने का मौका मिला है। अपने संबोधन में वे हमेशा यथातथ्य बात रखते हैं और किसी चिंतक का सामान्य संबोधन अथवा साक्षात्कार में कभी उल्लेख नहीं करते। पिछले कुलपति की तरह उच्च शिक्षा पर वर्तमान कुलपति के भी ‘मौलिक’ विचार हैं, जो कुलपति बनने से पहले कहीं पढ़ने-सुनने को नहीं मिलते। पिछले कुलपति की तरह ही इनकी अमेरिकापरस्त ‘आधुनिकता’ का एक छोर घोर जातिवाद से बंधा होता है। 
फ्रायड की दमित कुंठाओं के विस्फोट और युंग की अहम प्रतिस्थापन की बलवती चेष्टा के सिद्धांतों के आधार पर इन जैसे महोदयों का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन काफी रोचक हो सकता है। यहां उसका अवसर नहीं है। हालांकि इतना कहा जा सकता है कि सत्तर के दशक के अंत तक भारतीय राजनीति और समाज में समता और स्वतंत्रता के संवैधानिक मूल्य केंद्र में बने रहे। स्वाभाविक है, उस माहौल में विषमता और गुलामी के पक्षधरों की इच्छाएं दमित रह जाती थीं। वे झींकते थे, लेकिन माहौल के दबाव में चुप रहना पड़ता था। समता और स्वतंत्रता की जगह विषमता और गुलामी के दर्शन को केंद्र में ले आने वाले पिछले दो दशकों के नवउदारवादी दौर में ऐसे लोगों की दमित इच्छाएं खुल कर सामने आ गई हैं। उन्हें कोई पद मिल जाए तो अपनी नजरों में बड़े से बड़े विद्वान से महान बन बैठते हैं। उनके साथ जुटने वाले बिलो मीडियोकर लोग भी अपने कुछ न कुछ महान होने का गुमान पाल लेते हैं। यह बड़ी विचित्र टीम बनती है, जो कहती है प्रोफेसर यशपाल, अनिल सदगोपाल, रोमिला थापर आदि कहां के विद्वान हैं?          

बजारवाद का पाठ

अंग्रेजी विभाग के अवकाश प्राप्त शिक्षक प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी ने एफवाईयूपी के समर्थन में ‘टाईम्स आॅफ इंडिया’ में ‘इज डेल्ही यूनिवर्सिटी डाईंग?’ शीर्षक लेख लिख कर  अपने को इस टीम के साथ जोड़ा तो हमें आश्चर्य और अफसोस हुआ। लेख में उनके पास कोई वाजिब तर्क नहीं है। शायद वे भी जानते हैं कि उन्होंने एक भर्ती का लेख लिखा है। फिर भी हम उनके लेख के बहाने कुछ चर्चा करना चाहते हैं। यह प्रोग्राम लागू करने के लिए दिविवि के कुलपति ने धक्काशाई और लॉबिंग का रास्ता अपनाया है। उनकी धक्काशाई और लॉबिंग इसलिए कामयाब हो गई क्योंकि कांग्रेस सरकार, सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा और सेंट स्टीफेंस कॉलिज से पढ़े अथवा वहां पढ़ाने वाले बड़े लोगों की जमात उसमें शामिल है। कुलपति ने अपने समर्थकों की एक टास्क फोर्स भी बनाई हुई है, जिसके सदस्य खुद को इस निर्णय का कर्ता@समर्थक मान कर खुश हैं। वे कुलपति और एफवाईयूपी के बचाव में कहते हैं कि विचारधारा-विशेष के लोग ही इस बदलाव का विरोध कर रहे हैं। यह बात बहुत जोर देकर फैलाई गई। गोया समर्थन करने वालों की कोई विचारधारा नहीं है! एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारधाराएं अलग-अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन संविधान हम सबकी विचारधारा है, जिसमें समाजवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता तीन मूलभूत मूल्य निहित हैं। यह ठीक है कि एफवाईयूपी के समर्थक वामपंथी विचारधारा को नहीं मानते, लेकिन क्या वे संविधान की विचारधारा को भी नहीं मानते? शिक्षा से लेकर सुरक्षा तक, हर क्षेत्र को नवसाम्राजयवादी गुलामी के शिकंजे में डालने वाले इस तरह के फैसले क्या संविधानसम्मत हैं? गांधी और टैगोर जैसे शिक्षा के मौलिक चिंतकों के देश में क्या नवाचार के नाम पर अमेरिका की छिछली नकल करना नौनिहालों के साथ न्याय करना है? शिक्षा जैसे गंभीर व संवेदनशील विषय को लेकर धक्काशाई और लॉबिंग क्या हमारी गिरावट को नहीं दर्शाता है? इन सवालों पर कुलपति के समर्थक नहीं सोचेंगे, लेकिन क्या हरीश त्रिवेदी भी नहीं सोचेंगे?  
हरीश त्रिवेदी अपने लेख में यह तर्क देते हैं कि सेमेस्टर प्रणाली लागू किये जाते वक्त भी इसी तरह का विरोध हुआ था, लेकिन आज सेमेस्टर प्रणाली लागू है और चल रही है। बेहतर होता कि यह तर्क देते वक्त हरीश त्रिवेदी यह भी बताते कि सेमेस्टर प्रणाली लागू होने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम निर्माण, अध्यापन और परीक्षा प्रक्रिया की क्या स्थिति बन गई है? वे हाल में रिटायर हुए हैं और उन्हें सारी हकीकत मालूम है। जैसा कि एफवाईयूूपी लागू करने के लिए किया गया है, सेमेस्टर प्रणाली लागू करते वक्त भी फास्टफूड की तरह पाठ्यक्रम तैयार किए गए थे। उसमें स्नातकोत्तर  पाठ्यक्रम भी शामिल थे जहां पहले सेमेस्टर सिस्टम लागू किया गया। पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया में वरीयता और विषय की विशेषज्ञता को पूरी तरह से दरकिनार करके सारा काम किया गया। छात्रों तक समय से पाठ्यक्रम पहुंचे ही नहीं, न ही वे पुस्तकें जुटा पाए। आज तक स्नातक से लेकर स्नातकोत्तर तक छपा हुआ पाठ्यक्रम उपलब्ध नहीं है, जैसा पहले होता था। (अगर किसी विभाग के पास हो तो कृपया अवश्य बताएं) स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर के परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र बनाने में भी वही रवैया रहता है। परीक्षा विभाग से हटा कर सारा काम विभागों को सौंप दिया गया है। इसके चलते दिल्ली विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रक्रिया की कोई साख नहीं बची है।  
सेमेस्टर प्रणाली लागू होने के बाद से दिविवि में शिक्षण कार्य अंतिम पायदान पर चला गया है। शिक्षकों का ज्यादातर समय कक्षाएं पढ़ाने से इतर कामों में बीतता है। शिक्षकों, जिनके अध्यापन के बल पर दिविवि भारत का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय कहलाया है, पिछले दो कुलपतियों के कार्यकाल में उन्हें नीचा दिखाने की लगातार कोशिशें की जाती रही हैं। इसे अफसोसनाक ही कहा जाएगा कि एफवाईयूपी पर दिविवि के लगभग सभी प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष, डीन, प्रिंसिपल, कॉलिजों के ज्यादातर शिक्षक या तो चुप हैं या उदासीन। डूटा में कांग्रेस और भाजपा के शिक्षक नेता कुलपति के साथ हैं। ऐसा लगता है दिविवि का शिक्षक समुदाय कुलपति की दाब में आकर अपने को मीडियोकर मोड में ढालने को तैयार हो गया है। आशा की जानी चाहिए कि यह स्थिति ज्यादा देर तक नहीं रहेगी।
परीक्षा की हालत यह है कि एक सप्ताह किसी कॉलिज में अतिथि शिक्षक के तौर पर कुछ कक्षाएं पढ़ाने वाले ‘शिक्षक’ बड़ी संख्या में उत्तर-पुस्तिकाएं जांचते हैं। तदर्थ शिक्षक तो जांचते ही हैं। छात्रों को संतुष्ट रखने के लिए विश्वविद्यालय के निर्देश हैं कि सबको खूब अंक दिए जाएं। पिछले तीन-चार सालों से यह हो रहा है। एफवाईयूपी लागू होने के बाद छात्रों के तुष्टिकरण का यह काम और तेजी से होगा। पतन की पड़ताल में अगर और नीचे उतरा जाएगा तो पाठकों को विश्वास करना मुश्किल होगा कि देश के मूद्र्धन्य विश्वविद्यालय का नवउदारवादी नवाचारियों ने क्या हाल बना दिया है? 
दिल्ली विश्वविद्यालय पूरे देश के छात्रों और अभिावकों के आकर्षण का केंद्र इन्हीं तीन प्रमुख कारणों - पाठ्यक्रम, शिक्षण और परीक्षा - से रहता है। सेमेस्टर प्रणाली ने इन तीनों का विध्वंस कर दिया गया है। बचा-खुचा काम एफवाईयूपी कर देगा। यह दरअसल दिविवि को नष्ट करने की मुहिम है। उसके बाद देश के बाकी राजकीय विश्वविद्यालय नष्ट किए जाएंगे ताकि विदेशी विश्वविद्यालय यहां अपनी पैठ बना सकें। बाजारोन्मुख शिक्षा से शुरू होकर यह रास्ता शिक्षा के बाजार तक जाता है। कहने की जरूरत नहीं कि जो छात्र और अभिभावक आज ज्यादा अंक पाकर खुश होते हैं, उन्हें आगे निश्चित ही पछताना पड़ेगा। यह मेहनती और मेधावी छात्रों के साथ भी खुला अन्याय है।    
हरीश त्रिवेदी ने सेमेस्टर प्रणाली के लागू होने का तर्क देते वक्त यह नहीं बताया कि इस प्रणाली के तहत काम दोगुना हो जाने के बावजूद न प्रशासन में, न ही शिक्षण में कोई नियुक्तियां हुई हैं। बल्कि पिछले तीन सालों से दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों और विभागों में नियुक्तियां बंद हैं। ज्यादातर शिक्षण कार्य तदर्थ अध्यापकों द्वारा किया जा रहा है, जिनका बुरी तरह शोषण होता है और शिक्षक नेता उन्हें लेकर अपनी राजनीति चमकाते हैं। हरीश त्रिवेदी ने यह भी नहीं बताया कि उनका अपना विभाग सेमेस्टर प्रणाली का अंत तक विरोध करता रहा। तब वे भी विभाग में थे। लेकिन वे एकाएक रजामंद हो गए और अंग्रेजी विभाग में सेमेस्टर प्रणाली लागू हो गई। नवउदारवादी शब्दावली में इस तरह की पल्टी को ‘एजुकेट’ होना कहा जाता है। 
कोई भी विश्वविद्यालय पाठ्यक्रम, शिक्षण और परीक्षा तक सीमित नहीं होता। उसका एक खास माहौल होता है जिसमें स्वाभाविक खुलापन, बहस मुबाहिसा, रचनात्मक गतिविधियां, खेलकूद, एनसीसी, एनएसएस आदि होते हैं। दिविवि में यह सब खत्म किया जा रहा है। छात्रों और शिक्षकों को जो संगोष्ठी कक्ष आसानी से बिना शुल्क के मिल जाते थे, अब नहीं मिल पाते। साउथ कैंपस में कोई पत्रिकाओं@पुस्तकों की दुकान नहीं है। नॉर्थ कैंपस में एक्टिविटी सेंटर में एक थी, उसे बंद कर दिया गया है। साउथ कैंपस की अपनी चारदीवारी है लेकिन फिर भी वहां चप्पे-चप्पे पर प्राईवेट एजेंसियों के गार्ड तैनात रहते हैं। गेट पर पुलिस चैकी होने के बावजूद एक पुलिस वैन हमेशा अंर खड़ी रहती है। 
शिक्षकों की गाड़ियों को नाके के नीचे से गुजरना होता है। आपसे कोई मिलने आ जाए तो उसे सुरक्षा गार्ड इतना परेशान कर देंगे कि दोबारा मिलने आने का नाम नहीं लेगा। यहां तक कि किसी प्रैस वाले का किसी शिक्षक से मिलने आना भी मना है। गोया कैंपस नहीं, छावनी हो। इस बंदिश पर हमने साउथ कैंपस के डिप्टी रजिस्ट्रार से कुछ दिन पहले लिखित तौर पूछा था। लेकिन उन्होंने उत्तर देना मुनासिब नहीं समझा। अलबत्ता इस बार के आम बजट के वक्त हमसे राय पूछने आने वाले एक टीवी चैनल के पत्रकारों को उन्होंने हमसे मिलने के लिए कैंपस में नहीं आने दिया। कहा कि रजिस्ट्रार साहब के आॅर्डर हैं कि कैंपस में किसी शिक्षक से प्रैस वालों को नहीं मिलने दिया जाए।          
याद किया जा सकता है कि सेमेस्टर प्रणाली के खिलाफ शिक्षकों, कर्मचारियों और छात्रों का एकजुट विरोध हुआ था। उसमें सभी विचारधाराओं के शिक्षक और छात्र सम्मिलित थे। यूपीए सरकार और मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल की ताकत के आगे विरोध सफल नहीं हो पाया। बताया जाता है कि उसी समय एफवाईयूपी लागू करने का फैसला भी कपिल सिब्बल ने कर लिया था और उसे तत्काल लागू करने के लिए वर्तमान कुलपति को नियुक्त किया गया। नए कुलपति ने पहले शिक्षक संगठन डूटा को तोड़ने और निष्प्रभावी बनाने का काम किया। दुर्भाग्य से कुछ शिक्षक नेताओं ने इसमें भूमिका निभाई जिसकी सामान्य शिक्षकों को देर तक तकलीफ उठानी पड़ेगी। 
कुछ दिनों पहले एक वरिष्ठ डूटा एक्टिविस्ट के साथ उन्हीं के कॉलिज में कुलपति की उपस्थिति में धक्कामुक्की हुई। आगे बाउंसरों द्वारा शिक्षकों और छात्रों के साथ बदसलूकी की घटनाएं बढ़ सकती हैं। क्योंकि विश्वविद्यालय के दो-चार कर्मचारियों को छोड़ कर, जो विश्वविद्यालय समुदाय का हिस्सा होने के नाते शिक्षकों और छात्रों को अपना सहयोगी मानते हैं, सारी सिक्योरिटी प्राइवेट कंपनियों के हवाले कर दी गई है। 
एफवाईयूपी विवाद में शिक्षक समुदाय में परस्पर संदेह और विरोध का अस्वस्थ माहौल बना है जिससे उनकी एकजुटता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। छात्र शक्ति के एकजुट विरोध को रोका जा सके, इसके लिए हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड़्डा के सांसद बेटे ने वीसी आॅफिस में बैठ कर लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों की धज्जियां उड़ाते हुए एनएसयूआई को डूसू का चुनाव जिताया।  
दिविवि अपने करीब 80 कॉलेजों के लिए जाना जाता है। इन कॉलिजों की विभिन्न आधारों पर अलग-अलग रेंकिंग हो सकती है लेकिन टीचिंग स्टाफ सभी में कमोबेस अच्छी कोटि का है। इन कॉलिजों के प्रिंसिपलों की विश्वविद्यालय की समस्त गतिविधियों में महत्वपूर्ण  भूमिका होती है। सेमेस्टर लागू करने के वक्त जरूर कुछ प्रिंसिपलों ने कुछ न कुछ विरोध जताया था लेकिन इस मामले में वे सभी कुलपति का अंधानुकरण कर रहे हैं। वे यह ध्यान नहीं रखना चाहते कि ‘आॅल पावरफुल’ कुलपति की गाज कभी उन पर भी गिर सकती है। स्कूल आॅफ ओपन लर्र्निंग (एसओएल) दिविवि का प्रमुख अंग है जिसमें कई लाख छात्रों को पत्राचार से शिक्षा दी जाती है। कुलपति ने पिछले दिनों एक वक्तव्य में एसओएल को ‘भारी रेकेट’ करार दिया। लेकिन वहां के शिक्षकों ने उसका लिखित या मौखिक विरोध नहीं किया। किसी ने यह भी नहीं पूछा कि आप पांच साल साउथ कैंपस के निदेशक रहे, पिछले दो साल से कुलपति हैं तो यह रेकेट आपने क्यों चलने दिया? बहरहाल, अपनी रणनीति में कुलपति हर स्तर पर सफल रहे हैं। उन्हें कांग्रेस के अलावा भाजपा का भी स्वाभाविक समर्थन है। सोचना यहां के शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों को है।   
पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने प्राईमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक की नीति बनाने के लिए अंबानी-बिड़ला कमेटी बनाई थी। वह दुनिया में अपने ढंग का प्रयोग था कि बिना किसी शिक्षाविद को रखे केवल उद्योगपतियों को शिक्षा नीति बनाने का काम दिया गया था। हमने उस समिति की रपट पर ‘शिक्षा के बाजारीकरण की रपट’ शीर्षक से एक विस्तृत समीक्षा लिखी थी। समाजवादी शिक्षक मंच की ओर से वह जनहित में जारी भी की गई थी। तब हमें अंदेशा भी नहीं था कि अगले एक दशक में दिविवि में ही शिक्षा को बाजारीकरण की सूली पर चढ़ा दिया जाएगा। इसके लिए भी दिविवि के शिक्षकों को आत्मालोचन करना होगा। 

एफवाईयूपी और सामाजिक न्याय की राजनीति

एफवाईयूपी पर चलने वाली बहस के कई आयाम हैं। लेकिन यह तथ्य सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है कि यह प्रोग्राम सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा से बाहर करने वाला है। सभी के लिए अनिवार्य फाउंडेशन कोर्स और मल्टीपल एग्जिट - यानी दो साल पर डिप्लोमा, तीन साल पर डिग्री और चार साल पर आॅनर्स की डिग्री देने की व्यवस्था - इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियां और उनके नेता इस प्रोग्राम का सबसे पहले और निर्णायक विरोध करते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यूपीए सरकार सपा और बसपा के समर्थन पर टिकी है। उनमें सपा समाजवादी चिंतक डॉ. लोहिया का नाम लेती है और बसपा सामाजिक न्याय के पुरोधा डॉ. भीमराव अंबेडकर का। दोनों के वोट का आधार क्रमशः पिछड़ा और दलित समाज है, जिस पर खड़े होकर इनके नेता मुसलमानों के वोटों पर धावा बोलते हैं। यह आधार न हो तो अगड़े सवर्ण समाज के वोट, जिन्हें जाति-सम्मेलन आयोजित करके रिझाया जाता है, उनके काम नहीं आ सकते। अगर सपा और बसपा चार साला स्नातक प्रोग्राम का डट कर विरोध कर दें तो हो सकता है यूपीए सरकार इस पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हो जाए।   
अन्य कई क्षेत्रीय पार्टियां हैं जो सामाजिक न्याय को अपनी राजनीति का आधार घोषित करती हैं। बिहार में राजद और जद (यू) तथा तमिलनाडु की क्षेत्रीय पार्टियां भी सामाजिक न्याय की राजनीति करती हैं। उनमें प्रमुख राजनीतिक पार्टी डीएमके अब यूपीए सरकार में शामिल भी नहीं है। लेकिन बिहार और तमिलनाडु से भी इस प्रोग्राम के विरोध में आवाज नहीं उठ रही है। एफवाईयूपी के विरोध के लिए गठित जोइंट एक्शन फ्रंट फॉर डेमोक्रेटिक एजुकेशन और डूटा नेतृत्व की तरफ से सभी पार्टियों के नेताओं@सांसदों से इस मुद्दे पर संपर्क करने की कोशिश की गई जो अभी जारी है। सीताराम येचुरी की पहल पर राज्यसभा के 11 और लोकसभा के 26 सांसदों ने प्रधानमंत्री को भेजी गई पेटीशन पर हस्ताक्षर किए। जद (यू) के अध्यक्ष शरद यादव ने एक साझा प्रैस वार्ता में उपस्थित होकर एफवाईयूपी का विरोध करने वाले संगठनों के प्रति अपना समर्थन जाहिर किया। हालांकि उनके लिए यह कोई गंभीर मुद्दा नहीं है, क्योंकि उसके बाद उन्होंने पलट कर नहीं देखा।
लोजपा नेता रामविलास पासवान ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और अस्वस्थ होने के बावजूद 22 जून 2013 को जंतर-मंतर पर आयोजित प्रतिरोध में शिरकत की। उन्होंने यह घोषणा की कि संसद का सत्र शुरू होने पर वे यह मुद्दा मजबूती से उठाएंगे। पासवान से डूटा के उपाध्यक्ष डॉ. हरीश खन्ना और जोइं्रट एक्शन फ्रंट फॉर डेमोक्रेटिक एजुकेशन के तत्वावधान में यह प्रोग्राम रद्द करवाने की मुहिम में लगे जस्टिस पार्टी के नेता डॉ. उदितराज ने मिल कर समर्थन करने का आग्रह किया था। बहरहाल, मुख्यधारा राजनीति के केवल एक सामाजिक न्यायवादी नेता ने दलित, आदिवासी, पिछड़े छात्र-छात्राओं के कैरियर पर एफवाईयूपी के नकारात्मक प्रभाव को गंभीरता से लिया है। 
कांग्रेस और भाजपा दोनों नवउदारवादी नीतियों को लेकर एकमत हैं। जैसा कि ऊपर बताया गया है, दिविवि में भाजपा के शिक्षक मंच एनडीटीएफ और छात्र मंच एबीवीपी ने कांगेस के साथ मिल कर एफवाईयूपी का समर्थन किया है। भाजपा के दिल्ली प्रदेशाध्यक्ष ने प्रैस को बयान जारी करके अपना समर्थन जाहिर किया। डॉ. उदितराज ने भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेतली से मुलाकात कर एफवाईयूपी के सामाजिक न्याय विरोधी चरित्र के बारे में समझाया कि इसका समर्थन करने से वोट की राजनीति में भाजपा को मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है। शायद वोट की राजनीति की खातिर अरुण जेतली ने एफवाईयूपी को एक साल स्थगित करने के अनुरोध का पत्र मानव संसाधन मंत्री पल्लम राजू को लिखा। हालांकि उसके बाद मुख्य विपक्षी पार्टी ने आगे कोई कार्रवाई नहीं की। जबकि एफवाईयूपी के विरोध का दायरा तब से काफी बढ़ गया है। 
अरुण जेतली ने, भले ही वोटों की खातिर, मंत्री को पत्र लिख दिया लेकिन अधिकांश सामाजिक न्याय की राजनीति के दावेदारों ने उतना भी नहीं किया है। इन पार्टियों के नेताओं से शिक्षा जैसे गंभीर विषय पर किसी गंभीर समीक्षा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। न ही उनसे नवउदारवाद के विरोध की अपेक्षा की जा सकती है। लेकिन क्या उन्हें अपने आधार वोटों की भी फिक्र नहीं है? दरअसल, उनके लिए सामाजिक न्याय का अर्थ जातिवाद और धर्मनिरपेक्षता का कार्ड खेलना है। मनमोहन सिंह जानते हैं कि जातिवाद और धर्मनिरपेक्षता का कार्ड ये नेता एफवाईयूपी लागू होने के बाद भी बखूबी खेलेंगे और केंद्र में कांग्रेस या भाजपा का समर्थन करेंगे। यह लगता नहीं कि कैसे भी दबाव से राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री दखल देकर एफवाईयूपी को रोक देंगे। वे हो सकता है इसे पूरे देश में थोपने के लिए संसद में उसी तरह से पारित करें जैसे भारत-अमेरिका परमाणु करार किया गया था।    

Tuesday, April 23, 2013

फर्जी राजनीति के दौर में - प्रेम सिंह

फर्जी राजनीति का कांग्रेसी घराना

जल्दबाजी में लिखा गया यह ‘समय संवाद’ कुछ ज्यादा तीखा लग सकता है। जिस तरह से नवउदारवाद के भारतीय एजेंटों ने जीवन के हर क्षेत्र पर खुला हमला बोल दिया है और देष के संविधान को ठोकर लगाकर उल्टा षेखी दिखा रहे हैं, वैसे में सच्चाई अथवा तथ्यों को सीधे-सीधे रखना जरूरी हो जाता है। हम यह जानते हैं कि तथ्यों की महज छाया को छू कर विष्लेषण करने की बहुप्रचलित षैली है। उसमें व्यक्ति और पदनाम का पूरा लिहाज रखते हुए विष्लेषण किया जाता है। किसी पर कुछ आक्षेप करना भी पड़े तो इषारों से काम लिया जाता है। लेकिन व्यक्ति जब प्रवृत्ति बन जाएं तो उनका उल्लेख करना पड़ जाता है। ऐसे में नामोल्लेख का बुरा नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी, किसी को लगता है कि उसकी वह प्रवृत्ति नहीं है जिससे उसे जोड़ा गया है तो हम पहले ही माफी मांग लेते हैं।
अपने लेखन में हमारा सरोकार बहुत सीमित है। हम नवउदारवाद की राजनीति व विचारधारा की पहचान और समीक्षा करने तथा उसके बरक्स एक वैकल्पिक राजनीति और विचारधारा के निर्माण की पेषकष तक सीमित रहते हैं। यह अलग और पाठकों के विचारने की बात है कि हम यह काम कितना सही रूप में कर पाते हैं। नवउदारवादियों और छद्म नवउदारवादियों की नजर में हमारा लेखन पूरी तरह निरर्थक हो सकता है। लेकिन जो ऐसा नहीं मानते, उन्हें हमारे लेखन में जो कमी या गलती लगती है, ध्यान दिलाने पर हम उसमें सुधार के लिए हमेषा तैयार हैं।
यह फर्जी राजनीति का दौर है। राजनीति जब देष के संविधान की पटरी से उतर कर किन्हीं इतर निर्देषों पर चलती है तो उसे फर्जी राजनीति कह सकते हैं। फर्जी राजनीति की परिभाषा करने के बजाय उसका सीधे ब्यौरा देने और व्याख्या करने से बात ज्यादा समझ में आएगी। आइए वही करते हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री पिछले दस सालों से सरकार चला रहे हैं। नब्बे के दषक के षुरू में बतौर वित्तमंत्री नई आर्थिक नीतियों की षुरुआत भी उन्होंने की थी। तब से लेकर अब तक नई आर्थिक नीतियां नवउदारवाद के वृहद संस्करण का रूप ले चुकी हैं। कतिपय छोटी वामपंथी (मार्क्सवादी और समाजवादी दोनों) राजनीतिक पार्टियों को छोड़ कर, भारत की ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियां मनमोहन सिंह और उनकी मंडली द्वारा षुरू और संस्कारित की गई नवउदारवादी व्यवस्था को विकल्पहीन मान कर उसका अनुसरण करती हैं। एक व्यक्ति के लिए यह कम उपलब्धि की बात नहीं कही जाएगी, भले ही नवउदारवाद की वैष्विक संस्थाओं और देष में मौजूद निहित स्वार्थ वाली पूंजीवादी षक्तियों से भरपूर मदद मिली हो। यह मनमोहन सिंह की ‘प्रतिबद्धता’ का ही उत्कर्ष है कि वे बतौर प्रधानमंत्री तीसरी पारी खेलने के लिए तैयार नजर आते हैं।  
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि मनमोहन सिंह को भारत की एक भी समस्या की षायद ही जानकारी हो। दरअसल, वे, भला-बुरा जैसा भी है, भारत को जानते ही नहीं हैं। हम भारत के अतीत या मध्यकाल की बात नहीं कर रहे हैं, जिसकी समुचित जानकारी के लिए कई तरह की परतों से होकर गुजरना पड़ता है। हम ठेठ आधुनिक काल की बात कर रहे हैं, जिसमें करीब 200 सालों का उपनिवेषवादी षासन है और उसके खिलाफ भारत के लोगों का संघर्ष है। आजादी के दौर के गांधी युग की बात भी छोड़ दी जाए, मनमोहन सिंह आजादी के बाद के नेहरू युग के बारे में भी नहीं जानते। एक बार संसद में जब नई आर्थिक नीतियों के समर्थन में नेहरू को उद्धृत किया जाने लगा तो चंद्रषेखर ने तल्खी के साथ टोका कि खुली अर्थव्यवस्था के समर्थन में नेहरू को उद्धृत न करें। किसी चीज को जान कर नहीं मानना अलग बात होती है। मनमोहन सिंह ऐसी पूंजीवादी मषीन का नाम है जो विष्व बैंक, आईएमएफ, डब्ल्यूटीओ आदि के आदेषों के अलावा वाकई कुछ नहीं जानते। गोया सब कुछ पहले से फीड किया गया है। तभी उन्हें चिंता होती है कि किसान आत्महत्या क्यों करते हैं, कोई और काम क्यों नहीं कर लेते? किसानों की हालत जानने के लिए वे ‘पिपली लाइव’ फिल्म देखते हैं।
इतना ही नहीं है कि मनमोहन सिंह की भारत के बारे में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक जानकारी लगभग सिफर है, वे किसी मूल्य अथवा नैतिकता के पचड़े में भी नहीं पड़ते हैं। हर्षद मेहता से लेकर 2जी स्पैक्ट्रम और कोयला आवंटन घोटालों तक से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि नैतिकता की नस उनकी मषीनी संरचना में है ही नहीं। जबकि इन सभी घोटालों में नवउदारवाद का प्रधान एजेंट होने के नाते उनकी परोक्ष-अपरोक्ष भूमिका मानी जाएगी। कोयला विभाग सीधा उनके तहत था और ए राजा बार-बार कह चुके हैं कि उन्होंने जो कुछ किया प्रधानमंत्री के कहने पर किया। क्या आप मान सकते हैं कि नवउदारवाद के पारंगत खिलाड़ी को एक कल का मंत्री गुमराह कर सकता है? भले ही भारत के नागरिक समाज और प्रबुद्ध वर्ग को इस पर अचंभा न होता हो, ऐसा षख्स डंके की चोट पर भारत का प्रधानमंत्री है। वे राज्यसभा में झूठ के बल पर आए थे और लोकसभा का चुनाव एक बार लड़े और हार गए। ये हमारा लोकतंत्र चल रहा है!
मनमोहन सिंह को भले ही खुद नहीं लगता हो, लेकिन झूठ से उन्हें कोई गुरेज नहीं है। वे उसे बुरी बात नहीं मानते। इस बाबत हम भारत-अमेरिका परमाणु करार की ओर आपका थोड़ा ध्यान खींचना चाहेंगे। उस प्रकरण में मनमोहन सिंह ने मिथ्यात्व के ‘उदात्तीकरण’ की ऐसी बानगी पेष की, जिसकी मिसाल दुनिया में षायद ही कहीं मिले। प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद की गरिमा जितनी इस सौदे में गिरी, उतनी कभी नहीं गिरी थी। पिछले कुछ अरसे से संसद की गरिमा पर हायतौबा मचाने वालों ने तब चूं तक नहीं की थी। परमाणु करार प्रकरण पर उस समय हमने विस्तार से लिखा था, जो ‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ पुस्तिका में षामिल है। लोकसभा सांसदों को भी हमने उस लेख की प्रति भेजी थी, इस निवेदन के साथ कि अपना मत देने से पहले वह लेख पढ़ लें।   
मनमेाहन सिंह के ऊपर सोनिया गांधी हैं जिनसे किसी जानकारी की अपेक्षा करना  नादानी है। वे देष में प्रधानमंत्री से भी बड़ी ताकत मानी जाती हैं। विदेषी पत्रिकाओं में उनका इस रूप में विरुद छपता है। वे जब से बनी हैं, तभी से कांग्रेस की अध्यक्ष हैं और जब तक उनका बेटा वह जिममेदारी नहीं सम्हाल लेता, बनी रहेंगी। परिवार को जोड़े रखने और फलने-फूलने के लिए सबके ऊपर एक व्यक्ति की सत्ता माननी चाहिए -  सामंत काल का यह मूल्य भारत की ‘आधुनिक’ राजनीति में धड़ल्ले से चलता है। यह भी दुनिया में एक अद्भुत मिसाल है कि देष की सबसे बड़ी पार्टी पूरी तरह से चाटुकारों का जमावड़ा है। सोनिया गांधी का एक बेटा है जिसे पिछले दो दषकों से नेता और देष का प्रधानमंत्री बनाने की कवायद कराई जा रही है। कितने ही कांग्रेसी और विज्ञापन कंपनियां इस परियोजना में लग कर मालामाल होते रहते हैं! 
गांव में जिन दिनों खेती बैलों पर निर्भर रहती थी, जवान होने पर बछड़ों को षरीर व दिमाग दोनों से खेती के काम के लिए तैयार किया जाता था। उस प्रक्रिया में बछड़ों के कंधे पर केवल जूआ रख कर रास्तों और खेतों में चलाया जाता था। उस अवधि में वे हिलावड़ बछड़े कहलाते थे। उसी दौरान उन्हें बधिया भी किया जाता था। बछड़ों की थकान दूर करने और षारीरिक षक्ति बढ़ाने के लिए उन्हें बांस की नाल से घी पिलाया जाता था। कुछ दिनों में बछड़ा बैल बन जाता था और हल, बैलगाड़ी, रहट आदि में जोतने के काम आता था। जो बछड़ा खेती के काम के लिए तैयार नहीं हो पाता था, वह सांड़ बन कर रह जाता था। कांग्रेसी सोनिया गांधी के आदेष पर राहुल गांधी को नेता बनाने पर पिले हैं। बड़ा घराना है - भारत का प्रथम राजनीतिक परिवार! - तो मीडिया घराने भी सब कुछ लाइव दिखाते हैं। लेकिन वे देष की बात छोडिए, इतने सालों बाद कांग्रेस के भी किसी काम के नहीं बन पाए हैं। उनका आगे क्या होगा यह खुद कांग्रेसियों को नहीं मालूम है। कोई बड़ा राजनीतिक पंडित उनके भविष्य के बारे में बता सकता है।
कांग्रेसी जब कहते हैं राहुल जी देष की नस-नस जानते हैं तो उसका अर्थ होता है, वे कुछ नहीं जानते। यह सच्चाई ऐसा कहने वाले कांग्रेसी भी जानते हैं। एक बार राय बरेली में एक कांग्रेसी कार्यकर्ता युवक ने राहुल गांधी से अपना नाम पूछ लिया तो वह भी वे नहीं बता पाए। यह जरूरी नहीं है नेता को हर कार्यकर्ता का नाम पता हो या याद रहे। लेकिन जब देष को, उसकी युवा षक्ति को जानने और दिषा देने के के ऊंचे दावे किए जाते हों तो ऐसे वाकये पोल खोल देते हैं। कांग्रेसी राहुल गांधी को देष का भविष्य बताने और बनाने पर तुले हैं। क्योंकि राहुल गांधी के भविष्य में उनका खुद का भविष्य सुरक्षित है। देष की आजादी के साथ जिस पार्टी का नाम जुड़ा हो, उसका यह हाल है - वह एक फर्जी राजनीतिक पार्टी बन कर हर गई है! 

फर्जी राजनीति का संघी घराना

जहां तक नवउदारवाद की स्वीकृति का मामला है, भारत की मुख्यधारा राजनीति में कोई विपक्ष नहीं है। नवउदारवाद के पक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है ओर दूसरे नंबर की भाजपा है। बाकी के दल कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए और भाजपा की अगुआई वाले एनडीए में षामिल हैं तथा मौका देख कर इन गठबंधनों के बीच आवाजाही करते रहते हैं। उनके इस चलन से कांग्रेस और भाजपा दोनों परेषानी का अनुभव करते हैं। इसीलिए मनमोहन सिंह और लालकृष्ण अडवाणी कहते हैं कि देष में कांग्रेस और भाजपा दो पार्टियां रहनी चाहिए। भाजपा प्रमुख विपक्षी पार्टी इस नाते है कि वह नवउदारवाद के पक्ष में दूसरे नंबर की बड़ी पार्टी है और सांप्रदायिक राजनीति में अव्वल नंबर की। वह आगे आएगी तो कांग्रेस को दूसरे नंबर पर जाना होगा। संघ/भाजपा का मानना है कि वे इस देष के बारे में बखूबी जानते हैं; खास कर उसके ‘महान’ अतीत के बारे में। वे अतीत पर इस कदर मोहित रहते हैं कि आजदी के संघर्ष में हिस्सा लेकर अपना ‘मोहभंग’ करना उन्होंने गवारा नहीं किया! अतीत के प्रेमियों को वर्तमान में ‘कैद’ नहीं होना चाहिए, इसलिए यरवदा जेल से आरएसएस प्रमुख बाला साहेब देवरस ने इंदिरा गांधी को चिठ्ठियां लिखीं कि आरएसएस से प्रतिबंध हटा लिया जाए और उसके स्वयंसेवकों को रिहा कर दिया जाए तो वे ‘राष्ट्रीय उत्थान’ के काम में सरकार के आदेष का पूरी तरह पालन करेंगे।
भाजपा के सक्रिय नेताओं में लालकृष्ण अडवाणी षीर्षस्थ हैं। देष के सामने जो भी समस्याएं हों, भले ही हाहाकार मचा हो, उन्हें केवल संघियों के आत्म-गौरव की फिक्र खाए जाती है। उन्होंने अभी कहा है कि भाजपा के नेता-कार्यकर्ता राममंदिर आंदोलन पर गर्व अनुभव करें। जाहिर है, उस आंदोलन की पूर्णाहूति बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद दंगों में मारे गए निर्दोष नागरिकों पर भी गर्व करना है। उस दोरान जो भाले-बरछे लहराए गए, मुसलमानों को गालियां दी गईं, वे भी सब गर्व करने की बातें हैं। आजकल उनकी नरेंद्र मोदी से रेस चल रही है। षायद वे कहना चाहते हैं कि हिंदुत्ववादी गर्व के मामले में उनका कद/काम मोदी से कहीं बड़ा है। उन्होंने पूरे देष में जो ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ की पुकार लगाई थी, उसके सामने एक प्रांत का गौरव भला कहां ठहरता है! कहना न होगा कि जो राममंदिर आंदोलन पर गर्व नहीं करते, वे अडवाणी के भारत में नहीं आते। पूरा जीवन राजनीति करने के बाद 85 साल के नेता की यह समझ है!
फर्जीपन का रोग इलाकाई क्षत्रपों को भी लग चुका है। मुलायम सिंह अडवाणी के नए प्रषंसक बन कर सामने आए हैं। अपने बेटे को जीते-जी मुख्यमंत्री बना कर भी वे संन्यास लेने के मूड में नहीं हैं। खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं और बाकी रिष्तेदारों को भी ऊंचे ओहदे दिलवाना चाहते हैं। संघ के षत्रुओं की फेहरिस्त में एक समय टॉप पर रहे मुलायम सिंह यह मान बैठे हैं कि अडवाणी प्रधानमंत्री की रेस से बाहर हैं और उनकी कुछ मदद कर सकते हैं। उन्हें षायद जॉर्ज की तरह मुगालता है कि संघ परिवार प्रधानमंत्री के लिए उन्हें आगे कर सकता है। वे भूलते हैं कि संघ परिवार देष के सबसे बड़े यानी ‘हिंदू परिवार’ की राजनीति करता है, न कि मुलायम सिंह की तरह अपने परिवार की।
मुलायम सिंह कहते हैं अडवाणी जी ने विभाजन के चलते बहुत सहा है। देष का विभाजन, जिसमें अडवाणी की पितृसंस्था की भी बड़ी भूमिका थी, एक ऐसी त्रासदी थी जिसकी मिसाल दुनिया में अभी तक नहीं मिलती। विभाजन के दौरान असंख्य लोग तबाह हुए। 10 लाख लोग मारे गए। मनुष्यता की सारी हदें टूट गईं। उस दौरान अडवाणी ने भी बहुत कुछ सहा हो सकता है। इसके लिए उनके प्रति सहानुभूति भी होनी चाहिए। लेकिन सवाल है कि उन्होंने सबक क्या सीखा? एक नेता के नाते वे सांप्रदायिकता की राजनीति को हमेषा के लिए खत्म करने की भूमिका ले सकते थे। लेकिन उन्होंने पूरा जीवन सांप्रदायिकता बढ़ाने में लगा दिया और आज भी वही कर रहे हैं।
अनेक लोगों ने आजादी के संघर्ष और आजादी के बाद भी बहुत सहा है। तभी देष को आजादी मिली, जिसे नवउदारवादियों ने खतरे में डाल दिया है। मुलायम सिंह अडवाणी के दुखों पर द्रवित होते वक्त लोहिया का ही उदाहरण सामने रख लेते, जिन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लाहौर किले में अमानुषिक यातनाएं दी गई थीं। आजादी के बाद वे सबसे ज्यादा बार जेल में डाले जाने वाले नेता थे। जेल जाना लोहिया के राजनीतिक संघर्ष का अविभाज्य हिस्सा था। लिहाजा, उन्होंने कभी इसकी षिकायत नहीं की। लेकिन एक बार उन्हें कहना पड़ा कि नेहरू की पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी में अंग्रेजों की पुलिस को पीछे छोड़ दिया।
अडवाणी आजादी के आंदोलन में हिस्सेदार नहीं थे कि उन्हें कुछ सहना पड़ता। वे सिंध इलाके से सुरक्षित और सुभीते से पाकिस्तान से भारत आए। कराची में वे पहले से आरएसएस के सदस्य थे और 1947 में आरएसएस के सचिव चुने गए थे। तभी आरएसएस की तरफ से उन्हें दंगों का जायजा लेने के लिए राजस्थान भेजा गया था। 1951 में जब जनसंघ का गठन हुआ तो वे उसके सदस्य बन गए। उन्होंने बैठे ठाले की हिंदुत्ववादी राजनीति की है, जिसमें अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ बयान देने के अलावा कुछ करने की जरूरत नहीं होती। ज्यादा कुछ करना हो तो पाकिस्तान की कड़े षब्दों में भर्त्सना कर दो। आगे हम देखेंगे कि यही अडवाणी संघ/भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। 
भाजपा में अडवाणी के बाद अब नरेंद्र मोदी का नाम आता है। नरेंद्र मोदी की चर्चा का बाजार आजकल काफी गरम है। उनका बोलना सुनें तो रामदेव की तरह उनके पास हर मर्ज की दवा है। किसी भी सवाल के जवाब में उन्हें रामदेव की तरह ही सोचने-विचारने के लिए पल भर भी रुकना नहीं पड़ता। वे जताते हैं कि मनमोहन सिंह कुछ नहीं जानते और वे सब कुछ जानते हैं। जाहिर है, जानने से उनका मतलब बोलने से होता है। यानी मनमोहन सिंह कुछ नहीं बोलते तो कुछ नहीं जानते, नरेंद्र मोदी खूब बोलते हैं तो सब कुछ जानते हैं। लेकिन वाचालता उन्हें मनमोहन सिंह से बड़ा नहीं बना देती। मनमोहन सिंह असली फर्जी हैं, जिनके सामने नरेंद्र मोदी, कारपोरेट जगत की लाख अभ्यर्थना करने के बावजूद, हमेषा नकली फर्जी रहेंगे।
कह सकते हैं कि अडवाणी अगर वाजपेयी के बिगड़ैल संस्करण हैं तो नरेंद्र मोदी अडवाणी के। नरेंद्र मोदी पर कुछ विस्तार से चर्चा करते हैं। वे अडवाणी से अलग अपनी एक योग्यता - कारपोरेट घरानों को रिझाने की कवायद - का जम कर प्रदर्षन कर रहे हैं कि कारपोरेट जगत उन्हें अपना उम्मीदवार बना ले। कारपोरेट जगत कभी कच्ची गोली नहीं खेलता। वह पूरी गारंटी चाहेगा कि भाजपा का भविष्य का यह नेता पार्टी को छुटभैये व्यापारियों की हित-पोषक नहीं बनी रहने देगा; नवउदारवादी फैसलों को पूरी तरह और तेजी से लागू करेगा।
मीडिया नरेंद्र मोदी का पूरा साथ दे रहा है। मीडिया की चर्चा में वही षख्स, विचार, घटना रहती है जिसकी नाल नवउदारवाद के साथ जुड़ी हो। भारत का मुख्यधारा मीडिया हर उस षख्स अथवा आंदोलन को सिर पर उठा लेता है, जो परोक्ष-अपरोक्ष तौर पर कारपोरेट पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने और मजबूत बनाने का काम करते हैं। ऐसा करते वक्त भले ही वे सांप्रदायिकता, जातिवाद, परिवारवाद-वंषवाद, क्षेत्रवाद आदि को बढ़ावा देते हों और अंधविष्वास व अपसंस्कृति फैलाते हों। नब्बे के दषक की षुरुआत, जब संविधान की अवहेलना करके देष की अर्थव्यवस्था को कारपोरेट पूंजीवाद के षिकार के लिए खोला गया, मीडिया का यह चरित्र बनने लगा और पिछले एक दषक में परवान चढ़ चुका है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर मोदी के अंध समर्थन तक उसकी यह भूमिका देखी जा सकती है। राजनीति फर्जी होगी तो मीडिया भी फर्जी होता जाएगा।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के एक अगुआ बाबा रामदेव ने हाल में खुल कर भाजपा नेतृत्व को सलाह दी है कि वह मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाए। पिछले दो सालों में देष की जनता यह देख चुकी है कि रामदेव, अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल का, वर्चस्व की आपसी लड़ाई के बावजूद, एक ही घराना है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान तीनों घी-षक्कर थे और आंदोलन की समाप्ती के उपरांत भी तीनों के तार कई तरह से आपस में जुड़े हुए हैं। सभी ने देखा कि गुजरात का चुनाव मोदी ने तीसरी बार आसानी से जीत लिया, लेकिन इन तीनों बड़बोलों में से किसी ने उस चुनाव में मोदी के खिलाफ चुंकार तक नहीं की। स्वाभाविक है कि मीडिया को ये तीनों नरेंद्र मोदी की तरह ही प्यारे हैं। 
मीडिया में मिली तेज उछाल से नरेंद्र मोदी पूरे उत्साह में है। उनका उत्साह और बढ़ जाता है जब यूरोप और अमेरिका को उनमें दूसरा मनमोहन सिंह नजर आने लगता है। वे यूरोपियन यूनियन के कारकूनों के साथ मुलाकात और खान-पान करते हैं। मीडिया सारी घटना को इस तरह परोसता है, मानो वे लोग आधिकारिक तौर पर ‘भारत के भावी प्रधानमंत्री’ से मिलने आए हों। यह सच्चाई जनता की निगाह से छिपा ली जाती है कि वह मुलाकात मोदी और उनके हिमायती गुट द्वारा प्रायोजित थी। साम, दाम, दंड, भेद; छल, कपट, झूठ, फरेब, षड़यंत्र - आरएसएस के हिंदुत्व में सब कुछ चलता है। 
कुछ बुद्धिजीवियों को यह देख कर सदमा लगता है कि दुनिया को लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार, कानून का षासन, सबको समान न्याय आदि का पाठ पढ़ाने वाला अमेरिका और यूरोपियन यूनियन भला नरेंद्र मोदी का समर्थन कैसे कर सकते हैं? पष्चिमी ज्ञान-विज्ञान की परंपरा में पगे ये भले लोग आज भी मानने को तैयार नहीं हैं कि यूरोप और अमेरिका की ये चिंताएं खोखली हैं। मुनाफा और वर्चस्व बनाए रखने के लिए वे एक से बढ़ कर एक तानाषाह और कातिल को अपना समर्थन देते रहे हैं। बस, उनके आर्थिक और सामरिक वर्चस्व को बाकी दुनिया में चुनौती नहीं मिलनी चाहिए। अगर कोई वैसी हिमाकत करता है तो उसे नेस्तनाबूद कर दिया जाता है। हम यह इसलिए कह रहे हैं कि फर्जी राजनीति और आंदोलन को फर्जी मीडिया किस तरह से परोसता है और फर्जी नागरिक समाज किस तरह लौकता है।  
भारत समेत ज्यादातर तीसरी दुनिया के लोगों ने अपने हाल और मुस्तक्विल के बारे में खुद सोचना और फैसले लेना बंद कर दिया है। हमारे सारे फैसले यूरोप और अमेरिका में लिए जाते हैं। भारत में हम केवल अपना धर्म, जाति और इलाका निभाते हुए उन फैसलों के नीचे जीते-मरते हैं। भारत के कारपोरेट घरानों और यूरोप-अमेरिका का नरेंद्र मोदी के समर्थन का मंसूबा साफ है - भारत के सभी राज्य ‘गुजरात मॉडल’ की रोषनी में अपना विकास करें, यानी संविधान को पीछे और कारपोरेट घरानों और यूरोप-अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आगे रख कर चलें। उन्हें इससे एक और फायदा है। कारपोरेट पूंजीवाद जितना बढ़ेगा, हिंसक प्रतिरोध भी उतना ही बढ़ेगा। (क्योंकि कारपोरेट पूंजीवाद के उत्पाद एनजीओ और सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट वास्तवकि राजनीतिक प्रतिरोध की जमीन तैयार नहीं होने देते। उन्होंने मिल कर अब आम आदमी के नाम पर एक राजनीतिक पार्टी ही बना ली है।) हिंसक प्रतिरोध को दबाने के लिए विदेषी कंपनियों का सुरक्षा बलों व खुफिया एजेंसियों को विषेषज्ञता, तकनीक, उपकरण और हथियार बेचने का मुनाफे का सौदा तेज होगा।
कहने की जरूरत नहीं कि नरेंद्र मोदी का बहुप्रचारित ‘गुजरात मॉडल’ हिंदुत्व की प्रयोगषाला में ढल कर निकला है। ‘गुजरात मॉडल’ फैलेगा तो कट्टरपंथ भी फैलेगा। उससे निपटने के लिए भारत की सरकारों को और उपकरणों और हथियारों की जरूरत होगी। कट्टरपंथियों को भी उपकरण और हथियार चाहिए होते हैं। नवसाम्राज्यवादी निजाम वह खुषी-खुषी उपलब्ध कराएगा। कट्टरपंथियों को हथियारों की ऐसी चाट लगा दी गई है कि वे अपने षरीरों को भी हथियार बना लेते हैं। यह पूंजीवादी निजाम दो मजबूत पहियों पर चलता है - बाजार और हथियार। नरेंद्र मोदी दोनों की गारंटी देने के लिए कारपोरेट घरानों और यूरोपी-अमेरिकी नेतृत्व के सामने कठपुतली की तरह नाच रहे हैं। इस कदर कि विदूषक लगने लगे हैं। मनमोहन सिंह को कारपोरेट पूंजीवाद का रोबो (मषीन) कहा जा सकता है तो नरेंद्र मोदी की छवि कारपोरेट पूंजीवाद के विदूषक की बनी  है।
हमने कुछ महीने पहले लिखा था कि आरएसएस एक सोची-समझी रणनीति पर काम कर रहा हो सकता है। नरेंद्र मोदी को वह इसीलिए टिटकारी दिए हुए है कि वह संघ परिवार का भविष्य का राष्ट्रीय नेता है। पिछले 20-25 सालों का नवउदारवादी दौर आरएसएस को सबसे ज्यादा फला है। इस बीच कारपोरेट-सेवी युवाओं की जो फसल तैयार होकर आई है, वह ज्यादातर अंधविष्वासी और सांप्रदायिक है। उसका भारत के संविधान और आजादी के संघर्ष, और सह-अस्त्तिव की विरासत से कोई वास्ता नहीं है। भारत को अमेरिका बनना चाहिए, बल्कि वह जल्दी ही एक दिन बनेगा, ऐसा उसका दृढ़ (अंध)विष्वास है। नरेंद्र मोदी इसी फसल के स्वाभाविक नेता हैं। उनके अभी तक के नेता मनमोहन सिंह उन्हें थके हुए लगने लगे हैं। देष के तेज विकास और महाषक्ति बनने की हवा बांधने वाले ये लोग अपने को ही पूरा देष मानते हैं। यानी सब कुछ उन्हें सबसे पहले अपने लिए चाहिए। नवउदारवाद के तीत बन रहे फर्जी भारत के ये फर्जी नागरिक हैं।  
कहना होगा कि यह युवा बिरादरी अपने आप ऐसी नहीं बन गई है। मनमोहन सिंह के साथ नवउदारवाद और संघ परिवार के साथ संप्रदायवाद के समर्थकों ने मिल कर जो माहौल तैयार किया, यह उसकी फसल है। आपने देखा है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम इनके हसीन सपनों को किस कदर हवा देते थे। यह सही है कि भारत की पूरी युवा आबादी के मुकाबले अभी कारपोरेट-सेवी युवाओं की संख्या काफी कम है। बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, खास कर युवतियों की, जो सांप्रदायिक और अंधविष्वासी नहीं हैं। इसीलिए नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री बनना दूर, अभी गुजरात के बाहर सांसद का चुनाव भी नहीं जीत सकते। लेकिन आरएसएस को विष्वास है, भविष्य में उसकी विचारधारा फैलेगी; तब गठबंधन की मजबूरी नहीं रहेगी; उस समय ‘आदर्ष हिदुत्ववादी’ नरेंद्र मोदी उसके प्रधानमंत्री होंगे। बीच का समय निकालने के लिए, अटल बिहारी वाजेपयी के समय में कट्टर कहे जाने वाले, लालकृष्ण अडवाणी का सहारा लिया जाएगा।
16 साल के प्यार के बाद कहा जा सकता है कि जदयू संघी घराने का ही अविभाज्य अंग है। उसके नेताओं ने रामविलास पासवान, मायावती, ममता, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू, एम करुणानिधि, जे जयललिता आदि की तरह बीच-बीच में संघ को छोड़ा नहीं है। आपने हाल में देखा कि जदयू नेताओं ने दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परिषद की बैठक में धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य पर अपना पाखंडी रवैया एक बार फिर बखूबी दिखाया ताकि मुसलमानों का वोट उनकी झोली से बाहर न जाए। उन्होंने  आरएसएस के स्वयंसेवक और भाजपा के षीर्षस्थ नेता रहे अटल बिहारी को पूरमपूर धर्मनिरपेक्ष बताते हुए, उनके जैसे नेता को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की सलाह भाजपा को दी। यह सब जानते हैं कि संघ परिवार की सांप्रदायिक विचारधारा के अंतर्गत कट्टरता और उदारता की लाइन चलती हैं। वाजपेयी की उदारता सांप्रदायिक विचारधारा की उदारता है, जिसके तहत देष के संविधान के साथ छल करके सत्ता पाई जाती है।
जदयू नेताओं की नजर में अब लालकृष्ण अडवाणी धर्मनिरपेक्ष नेता हो गए हैं। अडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर गठबंधन नहीं छोड़ने की बात करने वाले ये वही नेता हैं जिन्होंने भाजपानीत केंद्र की राजग सरकार में षामिल होते वक्त कहा था कि अगर भाजपा अडवाणी को प्रधानमंत्री बनाती तो वे सरकार में षामिल नहीं होते। उनके लिए अब कट्टर मोदी के मुकाबले अडवाणी उदार हो गए हैं। दरअसल, भाजपा को जदयू नेताओं के मोदी संबंधी परोक्ष-अपरोक्ष हवालों से नाराज न होकर उनका षुक्रगुजार होना चाहिए। जदयू नेतृत्व ने कहा है कि वे मोदी का समर्थन इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि मोदी ने गुजरात दंगों से निपटने के लिए मुस्तैदी से काम नहीं लिया। यह कह कर जदयू नेताओं ने 2002 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए मुसलमानों के राज्य-प्रयोजित नरसंहार और उसे छिपाने के लिए किए गए षड़यंत्रों से मोदी को बरी कर दिया है।
बाबरी मस्जिद ध्वंस के रथी अडवाणी को अपना नेता स्वीकार करने के साथ  जदयू नेताओं ने भाजपा के साथ अपने 16 साल पुराने प्यार का बखान भी किया है। लेकिन उन्हें यह भी कहना चाहिए कि उतने ही सालों से वे मुसलमानों के साथ फ्लर्ट कर रहे हैं। यह सारी कलाबाजी बिहार में मुसलमान वोटों को कब्जे में रखने के लिए की जा रही है। अपने को सेकुलर जताने वाले दलों और नेताओं का हर राज्य और देष के स्तर पर यही रवैया बना हुआ है। सभी ताक में रहते हैं कि चुनाव में मुसलमान उनकी झोली में गिरें। यह न केवल संविधान विरोधी रवैया है, नागरिक के तौर मुसलमानों की तौहीन है। हर सेकुलर पार्टी में सत्ता का सुख भोगने वाले चंद मुसलमान नेता भी पूरे समुदाय की यह दुदर्षा बना कर रख देने में हिस्सेदार बनते हैं। भाजपा सेकुलर दलों के इस रवैये का फायदा उठाकर हिंदू वोट बैंक की राजनीति करती है और हमेषा मुख्य विपक्षी पार्टी बनी रहती है।
हमारा मानना है कि यह दुष्चक्र तभी तोड़ा जा सकता है जब देष के मुसलमान नागरिक कम से कम एक बार आमचुनाव और एक बार सभी विधानसभा चुनावों में वोट नहीं डालने का कड़ा फैसला लें। भारत की राजनीति में उससे बड़ा बदलाव हो सकता है। मुसलमानों के इस ‘सत्याग्रह’ से धर्मनिरपेक्षता के दावेदार और सांप्रदायिकता के झंडाबरदार - दोनों संविधान की ओर लौटने के लिए मजबूर होंगे। और तब देष का संविधान सांप्रदायिकता पर भारी पड़ेगा।

पूंजीवाद के सिर पर स्वराज की टोपी

दिवंगत साथी हरभगवान मेंहदीरत्ता की बहन सत्या ने हमें बताया कि जस्टिस जेएस वर्मा की पत्नी ने उनसे आम आदमी पार्टी की सदस्य बनने का आग्रह किया। सत्या के विचार काफी रेडिकल हैं और वे अपने ढंग की स्त्रीवादी और समाज-सुधारक हैं। राजनीति को समाज से जोड़ कर देखती हैं और उससे भी ज्यादा राजनीति करने वालों के व्यक्तिगत आचरण से। उन्होंने जस्टिस वर्मा की पत्नी को यह कह कर सदस्य बनने से इनकार कर दिया कि उस पार्टी के बनाने वाले एनजीओ चलाने वाले हैं। उनमें समाज के लिए कोई दर्द या दृष्टि होती तो उन्होंने अपने बूते कुछ काम किया होता। 
ये लोग पहले ‘मैं अन्ना हूं’ की टोपी पहनते थे। आजकल ‘मैं आम आदमी हूं’ और ‘मुझे चाहिए स्वराज’ की टोपी लगाए होते हैं। आम आदमी के बारे में हमने पहले आपको बताया था कि उसका गांधी के आखिरी आदमी से कोई लेना-देना नहीं है। मिश्रित और पिछले बीस-पच्चीस सालों की नई आर्थिक नीतियों का लाभ उठाकर मुटाया मध्यवर्ग खुद आम आदमी बन बैठा है। पिछले दिनों केजरीवाल ने दिल्ली में बिजली-पानी के मुद्दे पर अनषन किया था। अखबार में छपी एक दिन की तस्वीर में प्रषांत भूषण ‘मुझे चाहिए स्वराज’ की टोपी लगा कर बैठे थे, जिस पर फोटोग्राफर ने फोकस किया था। षायद यह सोच कर कि बेचारे भले लोग स्वराज के लिए कितनी तकलीफ उठा रहे हैं। वह तस्वीर देख कर हमारे मन में आया कि एक पेषी का कई लाख रुपया लेने वाले, इलाहाबाद में करोड़ों के मकान को कौडियों में अपने नाम लिखवा लेने वाले और दिल्ली व नोएडा में मकान-प्लाट रखने वाले इन महानुभाव को और कितना स्वराज चाहिए? एक ‘समय संवाद’ में हमने इस मंडली के स्वराज का पाखंड रचने के वाकये का जिक्र किया था कि किस तरह से 2007 के आमचुनाव में उन्होंने मनेाहन सिंह, सोनिया गांधी और अडवाणी से स्वराज मांगने के बड़े-बड़े होर्डिंगों से दिल्ली को पाट दिया था।
स्वराज का विचार तिलक युग से षुरू होकर गांधी तक आता है और गांधी उसे आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के विकल्प के रूप में विकसित करते हैं। स्वराज्य के बारे में  गांधी का कहना था कि आजादी के साथ जो मिलने जा रहा है, वह उनके सपनों का स्वराज्य नहीं, इंग्लैंड के संसदीय लोकतंत्र का एक रूप होगा। गांधी को यह तो स्पष्ट था कि उनके सपनों का स्वराज्य फलीभूत होना लगभग नामुमकिन है। लेकिन उस दिषा में उनके प्रयास अंत तक बने रहे ताकि, कम से कम लोगों की सोच में, कुछ हद तक उस विचार की उपस्थिति बनी रहे। उनका प्रयास बिल्कुल व्यर्थ नहीं गया। गांधी का विस्तार कहे जाने वाले लोहिया ने यह कहा कि समाजवाद में गांधीवाद का फिल्टर लगाना होगा। अस्सी के दषक तक भारत की सरकारें भी, भले ही आधे-अधूरे रूप में, गांधी के स्वराज्य से कुछ न कुछ प्रेरणा लेती थीं। पिछले 25 सालों की नवसाम्राज्यवादी घुसपैठ के बावजूद देष और दुनिया में अनेक लोग और संगठन, भले ही वे अलक्षित रहते हों, गांधी के स्वराज्य के विचार से प्रेरणा लेकर काम करते हैं।
 यह बहुत चिंता की बात है कि कुछ एनजीओ वालों ने गांधी के स्वराज्य को कारपोरेट पूंजीवाद की टोपी बना दिया है। हमने कई बार यह उल्लेख किया है कि नवसाम्राज्यवादी व्यवस्था का गांधी को मिटाने का लक्ष्य है। क्योंकि हथियार और बाजार के बल पर चलने वाली इस सभ्यता का मूलभूत विकल्प साहसपूर्वक और सुचिंतित रूप में केवल गांधी ने दिया है। अपना यह लक्ष्य सिद्ध करने के लिए नवउदारवादी व्यवस्था  गांधी को एप्रोप्रिएट करती है और अक्सर विकृत करती है। एप्रोप्रिएषन का उदाहरण संयुक्त राष्ट्र द्वारा गांधी जयंती को अहिंसा दिवस घोषित करने से लेकर गांधी के नाम पर देहाती गरीब परविारों के एक व्यक्ति को साल में 100 दिन अधिकतम 189 रुपये की दिहाड़ी पर काम देने वाले यूपीए सरकार के मनरेगा तक देखा जा सकता है। सरकार की नजर में गांधी गरीबों के भगवान हैं जिन्हें उनके नाम पर योजना बना कर गरीबों को दे दिया गया है? इससे ज्यादा और क्या चाहिए? गांधी को विकृत करने के अनेक उदाहरणों में से एक इन तथाकथित स्वराजवादियों का है। आप देखते हैं, भ्रष्टाचारियों को फांसी देने और उनका मांस गिद्धों-कौओं को खिलाने का बार-बार ऐलान करने वाले अन्ना हजारे को मीडिया में लगातार गांधीवादी लिखा जाता है। ऐसा प्रमादवष नहीं है। यह गांधी को विकृत करने की वह रणनीति है जिसके तहत नवउदारवादी दौर में पली-बढ़ी पीढ़ी को बताया जाता है कि गांधी ऐसा था।        
मेधा पाटकर और अरुणा राय अनषन पर बैठे केजरीवाल को देखने गईं और उन्हें अपना समर्थन दिया। यह एनजीओ घराना है, जिसमें केंद्र और परिधि का अंतर हो सकता है, लेकिन इस पर सब एक मत हैं कि समाजवादी राजनीति और विचारधारा की जरूरत अब नहीं है। मनमोहन सिंह और उनकी मंडली भी यही कहते हैं। अरुणा राय जब कहती हैं कि लोग जाग गए हैं, सवाल पूछते हैं, तो उसका यही अर्थ है कि एनजीओ वालों ने लोगों को जगाया है और सवाल पूछने के लिए तैयार किया है। लेकिन पलट कर उनसे कहा जा सकता है कि एक परिवार के एक सदस्य को साल के 100 दिन धूल-मिट्टी का काम देने का कानून बना कर संविधान प्रदत्त बराबरी के हक पर डाका डाला गया है।
नर्मदा बचाओ आंदोलन और उसकी नेत्री मेधा पाटकर की बड़ी चर्चा रही है। हालांकि जिन बड़े बांधों के खिलाफ वह आंदोलन था, नर्मदा बांध समेत उनके निर्माण पर कोई रोक नहीं लगी है। हरसूद और टिहरी जैसे षहर डूब गए और बड़े-छोटे बांधों की लंबी फेहरिष्त सरकारों के पास है। तसल्ली के लिए हम सभी लोग कहते हैं कि उस आंदोलन से जागरूकता फैली और विस्थापितों की कुछ हद तक सहायता हो पाई। लेकिन यह आंदोलन एनजीओ का सहारा नहीं लेता, और राजनीतिक होता, तो भले ही थोड़ा, लेकिन नवउदारवाद के विरुद्ध निर्णायक फर्क पड़ सकता था।
ऐसा नहीं है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन राजनीतिक हो नहीं पाया। किषन पटनायक के लाख प्रयासों के बावजूद वह होने नहीं दिया गया। कहने की जरूरत नहीं कि राजनीतिक नहीं होने की वजह से वह खुद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में जा कर डूब गया। देख सकते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का सूरज भी डूब चुका है और अन्ना हजारे अलग-अलग जगहों व मुद्दों पर हाथ-पैर मारते घूमते हैं। बीच-बीच में कहते हैं कि जन लोकपाल बनवा कर दम लेंगे। आंदाोलन के पीछे कोई स्वतंत्र विचार नहीं होता, उद्देष्य नहीं होता, तो वह दिग्भ्रमित हो जाता है। अगर विचार और उद्देष्य नवउदारवाद के पेटे में समाने वाले हों तो आंदोलन उसी में डूब जाता है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के साथ यही हुआ है। विष्व बैंक का आदमी कोई वहां नौकरी करके ही नहीं होता। न ही उसका पुरस्कार पाकर, जैसा कि अन्ना हजारे को काफी पहले मिला था, कोई विष्व बैंक का आदमी हो जाता है। अलबत्ता उसकी नवउदारवादी नीतियों और कार्यक्रमों को मानने-चलाने वाला व्यक्ति विष्व बैंक का आदमी होता है। अन्ना हजारे, अरुणा राय, केजरीवाल आदि वही हैं। 
हम आपको बता चुके हैं कि असली झगड़ा सोनिया गांधी की सलाहकार परिषद में रहने और सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह की नजर में ज्यादा प्रभावषाली बनने का था जो बढ़ गया। कांग्रेस में कई वकील हैं। उनमें पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी अग्रणी हैं। प्रषांत भूषण को लगता होगा कि वे इतने नामी वकील है, उन्हें क्यों नहीं ऑफर दिया जाता? अपने पिता की नजीर उनके सामने थी। आप हैरान न हों, षासक वर्ग के दायरे में यह सब सोचना-समझना होता रहता है। इनमें से कुछ लोग कांग्रेस का और कुछ लोग भाजपा/संघ का काम करते ही थे। खबरें हैं कि आम आदमी पार्टी में कुछ लोगों को कांग्रेस ने प्लांट किया है ताकि भाजपा के मध्यवर्ग के वोट खराब किए जा सकें और षीला दीक्षित चौथी बार चुनाव जीत जाएं। ‘अभूतपूर्व’ आंदोलन और ‘नई’ राजनीति के नाम पर यह फर्जीवाड़ा आपके सामने है।  
धन और मीडिया की ताकत के बावजूद अगर मध्यवर्ग मेहनतकषों का अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल नहीं कर पाया तो इस पार्टी के कुछ नेता कांग्रेस में और कुछ भाजपा में चले जा सकते हैं। कुछ, जो वाकई आदर्षवादी भावना से जुड़े हैं, डिप्रैषन या सिनिसिज्म का षिकर हो सकते हैं। यह कहते हुए कि इस देष में, खास कर राजनीति में, कुछ नहीं हो सकता। राजनीति बहुत बुरी होती है, कल तक ये लोग ही चिल्ला-चिल्ला कर कहते थे। ऐसा न हो, पार्टी बिखरे नहीं, इसके लिए दिल्ली का चुनाव लूटने की मुहिम में दिन-रात दौड़-धूप की जा रही है। दिल्ली फतह तो देष फतह!
दिल्ली और देष की दौड़-धूप में कई समाजवादी भी लगे हैं। उन्हें ऐसा सक्रिय पहले कभी नहीं देखा था। साथी राजकुमार जैन अक्सर गुमान से कहते हैं कि समाजवादी पर किसी के रुतबे का रौब गालिब नहीं होता। हो सकता है जब समाजवादी आजाद देष में जेल को अपना घर मानते थे, ऐसी कोई भावना रही हो। लेकिन इस मामले में इधर की तस्वीर बड़ी निराषाजनक है। कांग्रेस और भाजपा छोड़िए, कुछ समाजवादी केजरीवाल के कारिंदे बने घूम रहे हैं। उनकी इस विनम्रता का कारण यही हो सकता है कि उन्होंने रामदेव की संगत में ‘राष्ट्रीय स्वाभिमान’ का ऐसा पाठ पढ़ा है कि उनका अपना स्वाभिमान षून्य हो गया है! 
कांग्रेस और भाजपा के चुनावी पंडित गणित लगा रहे हैं कि आम आदमी पार्टी किसका नुकसान करेगी। दोनों पार्टियां अपना नुकसान न होने और दूसरी का नुकसान होने का कयास लगा कर कभी खुष होती हैं, कभी डरती हैं। आप देखेंगे कि विधानसभा चुनाव में यह ‘नई’ राजनीति करने वाली नई पार्टी कांग्रेस और भाजपा के असंतुष्टों को टिकट देगी। जिन्हें बसपा का टिकट नहीं मिलेगा, वे भी कुछ ले-देकर वहीं से टिकट जुगाड़ सकते हैं।
यह फर्जी राजीनीति में ही हो सकता है कि कोई राजनीतिक पार्टी पंजीकरण के पहले ही आगामी आमचुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान करे। कांग्रेस और भाजपा भी यह नहीं कर पाती हैं। जाहिर है, लोकतंत्र का यह मजाक धनबल के बूते ही किया जा सकता है। मजाक को प्रचारित करने के लिए पूरा मीडिया हाजिर है। यह नहीं भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, जिसकी राख से यह पार्टी पैदा हुई बताई जाती है, में बड़ी संख्या में राजनीति-द्वेषी, घोर प्रतिक्रियावादी और सांप्रदायिक तत्व षामिल थे। वे टोपियों के पीछे छिप कर अपना काम करेंगे। हमारे जो साथी आम आदमी पार्टी में मौजूद कतिपय प्रगतिषील और धर्मनिरपेक्ष साथियों का हवाला देकर संबंध बनाए रखना चाहते हैं, वे थोड़ा रुक कर सोच लें कि मध्यवर्ग के नए नायक बनने चले ये लोग कितने प्रगतिषील और धर्मनिरपेक्ष रह गए हैं या आगे रह जाएंगे? वह पार्टी लोकतंत्र और राजनीति को क्या नई राह दिखाएगी जो अन्ना हजारे, रामदेव और केजरीवाल के संबंध तक जनता को साफ बताने को तैयार नहीं है। जनता को इतना ‘टेक इट फॉर ग्रांटेड’ तो वे बुरे नेता और उनकी पार्टियां भी नहीं लेती जिन्हें राजनीति से बेदखल करने के दावे ठोंके जा रहे हैं।  
    गंभीर और परिवर्तनकारी राजनीति के युगानुसार कुछ सूत्र होते हैं। वे अलग-अलग विचारधारात्मक समूह के अलग-अलग और कुछ समान हो सकते हैं। गांधी ने राजनीति को समाज और सभ्यता से अलग न मान कर, उस लिहाज से उठने वाले एक कदम को भी पर्याप्त माना। अंबेडकर ने दलित समाज को षिक्षित होने, संगठित होने और संघर्ष करने को कहा। लोहिया ने जेल, फावड़ा और वोट का सूत्र दिया। समाजवादी जनपरिषद में विचारधारा, संगठन, संघर्ष, रचनात्मक कार्य और चुनाव के पांच सूत्र अपनाए गए थे। आम आदमी पार्टी का अगर कोई सूत्र है तो वह चुनाव लूटना हो सकता है। जाहिर है, ऐसी राजनीति कांग्रेस और भाजपा से अलग नहीं हो सकती।  
यह देष की फर्जी राजनीति का परिदृष्य है। फर्जी राजनीति का एका इतना जबरदस्त है कि गठबंधन सरकार चलाने में न वाजपेयी को परेषानी हुई, न मनमोहन सिंह को है। बल्कि मनमोहन सिंह तो अल्पसंख्यक सरकार चला रहे हैं, जिसे उत्तर प्रदेष में एक-दूसरे के खून के प्यासे मुलायम और मायावती का बाहर से समर्थन है। कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि इस फर्जी राजनीति को भारत के नागरिक समाज का अनुमोदन है। कांग्रेस और भाजपा से अलग कोई गठबंधन या तो बनेगा नहीं, बन गया तो चलेगा नहीं। यही नागरिक समाज और मीडिया उसे गिरा देंगे।
फर्जी राजनीति का ठाठ यह है कि उसका न राजनीति में कोई विपक्ष है, न नागरिक समाज में। पिछले दिनों जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुआ, वह इसलिए नहीं था कि यह फर्जी राजनीति बदलनी चाहिए, बल्कि इसलिए था कि भारत का ‘महान’ मध्यवर्ग यह जताना चाहता है कि उसकी नैतिकता मर नहीं गई है। षुरू में उसने मनमोहन सिंह की ईमानदारी की छाया में अपने को भुलाए रखा और आर्थिक सुधारों की मलाई खाता रहा। क्योंकि वैसी कोई छाया थी ही नहीं, तो उसे झटका लगा और वह चारों तरफ से नैतिक-नैतिक चिल्लाते हुए दौड़ पड़ा। हाल में नागरिक समाज दिल्ली में हुए दो बलात्कार के मामलों को लेकर हद दरजे तक उत्तेजित हुआ। एक संवेदनषील समाज को ऐसे जघन्य कृत्यों पर आंदोलित होना ही चाहिए। लेकिन उसका फर्जीपना पहली नजर में ही पकड़ में आ जाता है। वह सरकार को समाज से बाहर मानता है और अपने को भी। वह यह सोचने को तैयार नहीं है कि जिस सरकार ने पिछले 25 सालों से संविधान की परवाह नहीं की, उससे कानून व्यवस्था की सही पालना की अपेक्षा नागरिक समाज किस तर्क से करता है? जब सरकार संविधान की मर्यादाओं को तोड़ती है तो यह नागरिक समाज चुप रहता है, क्योंकि उसमें उसका फायदा है। जब कानून-व्यवस्था टूटती है तो बौखलाता है, क्योंकि उसे अपनी सोने की लंका खतरे में नजर आती है।
फर्जी नागरिक समाज की फर्जी राजनीति और फर्जी राजनीति का फर्जी नागरिक समाज। कहने का आषय यह है कि जब फुलफ्लेजेड फर्जी राजनीति चलेगी तो जीवन के सभी क्षेत्रों में फर्जीवाड़ा न हो, यह संभव नहीं है। उदाहरण देने लगें तो पूरा पुराण तैयार हो जाएगा। हमारे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रतीकों में भी फर्जीवाड़े की घुसपैठ हो चुकी है, यह एक उदाहरण से बताना चाहेंगे। फिल्म अभिनेता आमिर खान सरकार और कंपनियों के एक से प्रिय हैं। उनका विरुद भी विदेषी पत्रिकाओं में आ चुका है। वे अमिताभ बच्चन के नक्षे कदम पर हैं - माल भी बनाओ और नाम भी कमाओ। आज बच्चों के हक में ‘कुपोषण भारत छोड़ो’ का विज्ञापन करने वाले आमिर खान ने कोकाकोला का विज्ञापन करना तब भी नहीं छोड़ा था जब कोक-पेप्सी में बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदेह तत्व होने की सच्चाई सामने आई थी। उल्टा वे कंपनी के पक्ष में विज्ञापनबाजी पर उतर आए थे।
भारत छोड़ो आंदोलन आजादी के संघर्ष का विषिष्ट और निर्णायक पड़ाव है। उससे प्रेरणा लेकर नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ पिछले बीस सालों से नारा लगाया जाता है - विदेषी कंपनियां भारत छोड़ो। ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में पड़े अकालों में कई लाख भारतीय मारे गए। अब भारत में अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां लूट मचाए हुए हैं। बच्चों के कुपोषण का संबंध इन कंपनियों की लूट और उस लूट के हिस्सेदार आमिर खान जैसे लोगों से है। नवउदारवादी समाज सुधारकों और देषभक्तों में गजब का उत्साह होता है। आमिर खान और सरकार भारत छोड़ो आंदोलन की थाती को हजम करके ही नहीं रुक जाते। ‘सत्यमेव जयते’ जैसे राष्ट्रीय वचन को भी हजम कर जाते हैं। यह प्रोग्राम करके, बताया जाता है, आमिर खान ने कंपनियों से करोड़ों रुपया कमाया। अब वे कमाई की किसी और जुगत में लगे होंगे। इन फर्जी समाज सुधारकों और देषभक्तों का संसद में भी स्वागत होता है और नागरिक समाज में भी। भले लोग कहते हैं, देखो है तो कलाकार लेकिन समाज और देष के लिए कितना ऊंचा भाव रखता है!
आप कहेंगे कि हमने फर्जी राजनीति और उसके अनुमोदक फर्जी नागरिक समाज का दर्षन तो खूब करा दिया, अब उसे बदलने का ‘दर्षन’ भी कुछ बताएं। दरअसल, हर ‘समय संवाद’ के अंत में आगे के रास्ते का सवाल खड़ा हो जाता है। हम एक बार फिर डॉ. लोहिया के हवाले से कहना चाहते हैं कि राजनीतिक मानस के निर्माण का अधूरा छूटा काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए। इसके लिए जरूरी है कि सच्ची प्रेरणा रखने वाले लोग एनजीओ नहीं, राजनीति में जाएं। उसके लिए जरूरी नहीं है कि हमेषा नई पार्टी बनाई जाए या किसी क्रांतिकारी पार्टी में ही षामिल हुआ जाए। प्रेरणा अगर सच्ची है तो स्थापित दलों में रह कर भी परिवर्तन की राजनीति की जा सकती है। नजरिया अगर राजनीतिक है तो बिना किसी राजनीतिक पार्टी में रहे भी परिवर्तन की राजनीति में सहायक हुआ जा सकता है। क्योंकि राजनीतिक नजरिया होगा तो राजनीति और नागरिक समाज में चल रहे फर्जीवाड़े की पहचान होगी। तब लोग भी पहचानेंगे और अपने और देष के संविधान के हक में नवउदावादियों के खिलाफ उठ खड़े होंगे।    

23 अप्रैल 2013

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...