Tuesday, April 23, 2013

फर्जी राजनीति के दौर में - प्रेम सिंह

फर्जी राजनीति का कांग्रेसी घराना

जल्दबाजी में लिखा गया यह ‘समय संवाद’ कुछ ज्यादा तीखा लग सकता है। जिस तरह से नवउदारवाद के भारतीय एजेंटों ने जीवन के हर क्षेत्र पर खुला हमला बोल दिया है और देष के संविधान को ठोकर लगाकर उल्टा षेखी दिखा रहे हैं, वैसे में सच्चाई अथवा तथ्यों को सीधे-सीधे रखना जरूरी हो जाता है। हम यह जानते हैं कि तथ्यों की महज छाया को छू कर विष्लेषण करने की बहुप्रचलित षैली है। उसमें व्यक्ति और पदनाम का पूरा लिहाज रखते हुए विष्लेषण किया जाता है। किसी पर कुछ आक्षेप करना भी पड़े तो इषारों से काम लिया जाता है। लेकिन व्यक्ति जब प्रवृत्ति बन जाएं तो उनका उल्लेख करना पड़ जाता है। ऐसे में नामोल्लेख का बुरा नहीं माना जाना चाहिए। फिर भी, किसी को लगता है कि उसकी वह प्रवृत्ति नहीं है जिससे उसे जोड़ा गया है तो हम पहले ही माफी मांग लेते हैं।
अपने लेखन में हमारा सरोकार बहुत सीमित है। हम नवउदारवाद की राजनीति व विचारधारा की पहचान और समीक्षा करने तथा उसके बरक्स एक वैकल्पिक राजनीति और विचारधारा के निर्माण की पेषकष तक सीमित रहते हैं। यह अलग और पाठकों के विचारने की बात है कि हम यह काम कितना सही रूप में कर पाते हैं। नवउदारवादियों और छद्म नवउदारवादियों की नजर में हमारा लेखन पूरी तरह निरर्थक हो सकता है। लेकिन जो ऐसा नहीं मानते, उन्हें हमारे लेखन में जो कमी या गलती लगती है, ध्यान दिलाने पर हम उसमें सुधार के लिए हमेषा तैयार हैं।
यह फर्जी राजनीति का दौर है। राजनीति जब देष के संविधान की पटरी से उतर कर किन्हीं इतर निर्देषों पर चलती है तो उसे फर्जी राजनीति कह सकते हैं। फर्जी राजनीति की परिभाषा करने के बजाय उसका सीधे ब्यौरा देने और व्याख्या करने से बात ज्यादा समझ में आएगी। आइए वही करते हैं। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री पिछले दस सालों से सरकार चला रहे हैं। नब्बे के दषक के षुरू में बतौर वित्तमंत्री नई आर्थिक नीतियों की षुरुआत भी उन्होंने की थी। तब से लेकर अब तक नई आर्थिक नीतियां नवउदारवाद के वृहद संस्करण का रूप ले चुकी हैं। कतिपय छोटी वामपंथी (मार्क्सवादी और समाजवादी दोनों) राजनीतिक पार्टियों को छोड़ कर, भारत की ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियां मनमोहन सिंह और उनकी मंडली द्वारा षुरू और संस्कारित की गई नवउदारवादी व्यवस्था को विकल्पहीन मान कर उसका अनुसरण करती हैं। एक व्यक्ति के लिए यह कम उपलब्धि की बात नहीं कही जाएगी, भले ही नवउदारवाद की वैष्विक संस्थाओं और देष में मौजूद निहित स्वार्थ वाली पूंजीवादी षक्तियों से भरपूर मदद मिली हो। यह मनमोहन सिंह की ‘प्रतिबद्धता’ का ही उत्कर्ष है कि वे बतौर प्रधानमंत्री तीसरी पारी खेलने के लिए तैयार नजर आते हैं।  
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि मनमोहन सिंह को भारत की एक भी समस्या की षायद ही जानकारी हो। दरअसल, वे, भला-बुरा जैसा भी है, भारत को जानते ही नहीं हैं। हम भारत के अतीत या मध्यकाल की बात नहीं कर रहे हैं, जिसकी समुचित जानकारी के लिए कई तरह की परतों से होकर गुजरना पड़ता है। हम ठेठ आधुनिक काल की बात कर रहे हैं, जिसमें करीब 200 सालों का उपनिवेषवादी षासन है और उसके खिलाफ भारत के लोगों का संघर्ष है। आजादी के दौर के गांधी युग की बात भी छोड़ दी जाए, मनमोहन सिंह आजादी के बाद के नेहरू युग के बारे में भी नहीं जानते। एक बार संसद में जब नई आर्थिक नीतियों के समर्थन में नेहरू को उद्धृत किया जाने लगा तो चंद्रषेखर ने तल्खी के साथ टोका कि खुली अर्थव्यवस्था के समर्थन में नेहरू को उद्धृत न करें। किसी चीज को जान कर नहीं मानना अलग बात होती है। मनमोहन सिंह ऐसी पूंजीवादी मषीन का नाम है जो विष्व बैंक, आईएमएफ, डब्ल्यूटीओ आदि के आदेषों के अलावा वाकई कुछ नहीं जानते। गोया सब कुछ पहले से फीड किया गया है। तभी उन्हें चिंता होती है कि किसान आत्महत्या क्यों करते हैं, कोई और काम क्यों नहीं कर लेते? किसानों की हालत जानने के लिए वे ‘पिपली लाइव’ फिल्म देखते हैं।
इतना ही नहीं है कि मनमोहन सिंह की भारत के बारे में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक जानकारी लगभग सिफर है, वे किसी मूल्य अथवा नैतिकता के पचड़े में भी नहीं पड़ते हैं। हर्षद मेहता से लेकर 2जी स्पैक्ट्रम और कोयला आवंटन घोटालों तक से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता है। क्योंकि नैतिकता की नस उनकी मषीनी संरचना में है ही नहीं। जबकि इन सभी घोटालों में नवउदारवाद का प्रधान एजेंट होने के नाते उनकी परोक्ष-अपरोक्ष भूमिका मानी जाएगी। कोयला विभाग सीधा उनके तहत था और ए राजा बार-बार कह चुके हैं कि उन्होंने जो कुछ किया प्रधानमंत्री के कहने पर किया। क्या आप मान सकते हैं कि नवउदारवाद के पारंगत खिलाड़ी को एक कल का मंत्री गुमराह कर सकता है? भले ही भारत के नागरिक समाज और प्रबुद्ध वर्ग को इस पर अचंभा न होता हो, ऐसा षख्स डंके की चोट पर भारत का प्रधानमंत्री है। वे राज्यसभा में झूठ के बल पर आए थे और लोकसभा का चुनाव एक बार लड़े और हार गए। ये हमारा लोकतंत्र चल रहा है!
मनमोहन सिंह को भले ही खुद नहीं लगता हो, लेकिन झूठ से उन्हें कोई गुरेज नहीं है। वे उसे बुरी बात नहीं मानते। इस बाबत हम भारत-अमेरिका परमाणु करार की ओर आपका थोड़ा ध्यान खींचना चाहेंगे। उस प्रकरण में मनमोहन सिंह ने मिथ्यात्व के ‘उदात्तीकरण’ की ऐसी बानगी पेष की, जिसकी मिसाल दुनिया में षायद ही कहीं मिले। प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद की गरिमा जितनी इस सौदे में गिरी, उतनी कभी नहीं गिरी थी। पिछले कुछ अरसे से संसद की गरिमा पर हायतौबा मचाने वालों ने तब चूं तक नहीं की थी। परमाणु करार प्रकरण पर उस समय हमने विस्तार से लिखा था, जो ‘मिलिए हुकुम के गुलाम से’ पुस्तिका में षामिल है। लोकसभा सांसदों को भी हमने उस लेख की प्रति भेजी थी, इस निवेदन के साथ कि अपना मत देने से पहले वह लेख पढ़ लें।   
मनमेाहन सिंह के ऊपर सोनिया गांधी हैं जिनसे किसी जानकारी की अपेक्षा करना  नादानी है। वे देष में प्रधानमंत्री से भी बड़ी ताकत मानी जाती हैं। विदेषी पत्रिकाओं में उनका इस रूप में विरुद छपता है। वे जब से बनी हैं, तभी से कांग्रेस की अध्यक्ष हैं और जब तक उनका बेटा वह जिममेदारी नहीं सम्हाल लेता, बनी रहेंगी। परिवार को जोड़े रखने और फलने-फूलने के लिए सबके ऊपर एक व्यक्ति की सत्ता माननी चाहिए -  सामंत काल का यह मूल्य भारत की ‘आधुनिक’ राजनीति में धड़ल्ले से चलता है। यह भी दुनिया में एक अद्भुत मिसाल है कि देष की सबसे बड़ी पार्टी पूरी तरह से चाटुकारों का जमावड़ा है। सोनिया गांधी का एक बेटा है जिसे पिछले दो दषकों से नेता और देष का प्रधानमंत्री बनाने की कवायद कराई जा रही है। कितने ही कांग्रेसी और विज्ञापन कंपनियां इस परियोजना में लग कर मालामाल होते रहते हैं! 
गांव में जिन दिनों खेती बैलों पर निर्भर रहती थी, जवान होने पर बछड़ों को षरीर व दिमाग दोनों से खेती के काम के लिए तैयार किया जाता था। उस प्रक्रिया में बछड़ों के कंधे पर केवल जूआ रख कर रास्तों और खेतों में चलाया जाता था। उस अवधि में वे हिलावड़ बछड़े कहलाते थे। उसी दौरान उन्हें बधिया भी किया जाता था। बछड़ों की थकान दूर करने और षारीरिक षक्ति बढ़ाने के लिए उन्हें बांस की नाल से घी पिलाया जाता था। कुछ दिनों में बछड़ा बैल बन जाता था और हल, बैलगाड़ी, रहट आदि में जोतने के काम आता था। जो बछड़ा खेती के काम के लिए तैयार नहीं हो पाता था, वह सांड़ बन कर रह जाता था। कांग्रेसी सोनिया गांधी के आदेष पर राहुल गांधी को नेता बनाने पर पिले हैं। बड़ा घराना है - भारत का प्रथम राजनीतिक परिवार! - तो मीडिया घराने भी सब कुछ लाइव दिखाते हैं। लेकिन वे देष की बात छोडिए, इतने सालों बाद कांग्रेस के भी किसी काम के नहीं बन पाए हैं। उनका आगे क्या होगा यह खुद कांग्रेसियों को नहीं मालूम है। कोई बड़ा राजनीतिक पंडित उनके भविष्य के बारे में बता सकता है।
कांग्रेसी जब कहते हैं राहुल जी देष की नस-नस जानते हैं तो उसका अर्थ होता है, वे कुछ नहीं जानते। यह सच्चाई ऐसा कहने वाले कांग्रेसी भी जानते हैं। एक बार राय बरेली में एक कांग्रेसी कार्यकर्ता युवक ने राहुल गांधी से अपना नाम पूछ लिया तो वह भी वे नहीं बता पाए। यह जरूरी नहीं है नेता को हर कार्यकर्ता का नाम पता हो या याद रहे। लेकिन जब देष को, उसकी युवा षक्ति को जानने और दिषा देने के के ऊंचे दावे किए जाते हों तो ऐसे वाकये पोल खोल देते हैं। कांग्रेसी राहुल गांधी को देष का भविष्य बताने और बनाने पर तुले हैं। क्योंकि राहुल गांधी के भविष्य में उनका खुद का भविष्य सुरक्षित है। देष की आजादी के साथ जिस पार्टी का नाम जुड़ा हो, उसका यह हाल है - वह एक फर्जी राजनीतिक पार्टी बन कर हर गई है! 

फर्जी राजनीति का संघी घराना

जहां तक नवउदारवाद की स्वीकृति का मामला है, भारत की मुख्यधारा राजनीति में कोई विपक्ष नहीं है। नवउदारवाद के पक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है ओर दूसरे नंबर की भाजपा है। बाकी के दल कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए और भाजपा की अगुआई वाले एनडीए में षामिल हैं तथा मौका देख कर इन गठबंधनों के बीच आवाजाही करते रहते हैं। उनके इस चलन से कांग्रेस और भाजपा दोनों परेषानी का अनुभव करते हैं। इसीलिए मनमोहन सिंह और लालकृष्ण अडवाणी कहते हैं कि देष में कांग्रेस और भाजपा दो पार्टियां रहनी चाहिए। भाजपा प्रमुख विपक्षी पार्टी इस नाते है कि वह नवउदारवाद के पक्ष में दूसरे नंबर की बड़ी पार्टी है और सांप्रदायिक राजनीति में अव्वल नंबर की। वह आगे आएगी तो कांग्रेस को दूसरे नंबर पर जाना होगा। संघ/भाजपा का मानना है कि वे इस देष के बारे में बखूबी जानते हैं; खास कर उसके ‘महान’ अतीत के बारे में। वे अतीत पर इस कदर मोहित रहते हैं कि आजदी के संघर्ष में हिस्सा लेकर अपना ‘मोहभंग’ करना उन्होंने गवारा नहीं किया! अतीत के प्रेमियों को वर्तमान में ‘कैद’ नहीं होना चाहिए, इसलिए यरवदा जेल से आरएसएस प्रमुख बाला साहेब देवरस ने इंदिरा गांधी को चिठ्ठियां लिखीं कि आरएसएस से प्रतिबंध हटा लिया जाए और उसके स्वयंसेवकों को रिहा कर दिया जाए तो वे ‘राष्ट्रीय उत्थान’ के काम में सरकार के आदेष का पूरी तरह पालन करेंगे।
भाजपा के सक्रिय नेताओं में लालकृष्ण अडवाणी षीर्षस्थ हैं। देष के सामने जो भी समस्याएं हों, भले ही हाहाकार मचा हो, उन्हें केवल संघियों के आत्म-गौरव की फिक्र खाए जाती है। उन्होंने अभी कहा है कि भाजपा के नेता-कार्यकर्ता राममंदिर आंदोलन पर गर्व अनुभव करें। जाहिर है, उस आंदोलन की पूर्णाहूति बाबरी मस्जिद के ध्वंस और उसके बाद दंगों में मारे गए निर्दोष नागरिकों पर भी गर्व करना है। उस दोरान जो भाले-बरछे लहराए गए, मुसलमानों को गालियां दी गईं, वे भी सब गर्व करने की बातें हैं। आजकल उनकी नरेंद्र मोदी से रेस चल रही है। षायद वे कहना चाहते हैं कि हिंदुत्ववादी गर्व के मामले में उनका कद/काम मोदी से कहीं बड़ा है। उन्होंने पूरे देष में जो ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ की पुकार लगाई थी, उसके सामने एक प्रांत का गौरव भला कहां ठहरता है! कहना न होगा कि जो राममंदिर आंदोलन पर गर्व नहीं करते, वे अडवाणी के भारत में नहीं आते। पूरा जीवन राजनीति करने के बाद 85 साल के नेता की यह समझ है!
फर्जीपन का रोग इलाकाई क्षत्रपों को भी लग चुका है। मुलायम सिंह अडवाणी के नए प्रषंसक बन कर सामने आए हैं। अपने बेटे को जीते-जी मुख्यमंत्री बना कर भी वे संन्यास लेने के मूड में नहीं हैं। खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं और बाकी रिष्तेदारों को भी ऊंचे ओहदे दिलवाना चाहते हैं। संघ के षत्रुओं की फेहरिस्त में एक समय टॉप पर रहे मुलायम सिंह यह मान बैठे हैं कि अडवाणी प्रधानमंत्री की रेस से बाहर हैं और उनकी कुछ मदद कर सकते हैं। उन्हें षायद जॉर्ज की तरह मुगालता है कि संघ परिवार प्रधानमंत्री के लिए उन्हें आगे कर सकता है। वे भूलते हैं कि संघ परिवार देष के सबसे बड़े यानी ‘हिंदू परिवार’ की राजनीति करता है, न कि मुलायम सिंह की तरह अपने परिवार की।
मुलायम सिंह कहते हैं अडवाणी जी ने विभाजन के चलते बहुत सहा है। देष का विभाजन, जिसमें अडवाणी की पितृसंस्था की भी बड़ी भूमिका थी, एक ऐसी त्रासदी थी जिसकी मिसाल दुनिया में अभी तक नहीं मिलती। विभाजन के दौरान असंख्य लोग तबाह हुए। 10 लाख लोग मारे गए। मनुष्यता की सारी हदें टूट गईं। उस दौरान अडवाणी ने भी बहुत कुछ सहा हो सकता है। इसके लिए उनके प्रति सहानुभूति भी होनी चाहिए। लेकिन सवाल है कि उन्होंने सबक क्या सीखा? एक नेता के नाते वे सांप्रदायिकता की राजनीति को हमेषा के लिए खत्म करने की भूमिका ले सकते थे। लेकिन उन्होंने पूरा जीवन सांप्रदायिकता बढ़ाने में लगा दिया और आज भी वही कर रहे हैं।
अनेक लोगों ने आजादी के संघर्ष और आजादी के बाद भी बहुत सहा है। तभी देष को आजादी मिली, जिसे नवउदारवादियों ने खतरे में डाल दिया है। मुलायम सिंह अडवाणी के दुखों पर द्रवित होते वक्त लोहिया का ही उदाहरण सामने रख लेते, जिन्हें भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान लाहौर किले में अमानुषिक यातनाएं दी गई थीं। आजादी के बाद वे सबसे ज्यादा बार जेल में डाले जाने वाले नेता थे। जेल जाना लोहिया के राजनीतिक संघर्ष का अविभाज्य हिस्सा था। लिहाजा, उन्होंने कभी इसकी षिकायत नहीं की। लेकिन एक बार उन्हें कहना पड़ा कि नेहरू की पुलिस ने उनके साथ बदसलूकी में अंग्रेजों की पुलिस को पीछे छोड़ दिया।
अडवाणी आजादी के आंदोलन में हिस्सेदार नहीं थे कि उन्हें कुछ सहना पड़ता। वे सिंध इलाके से सुरक्षित और सुभीते से पाकिस्तान से भारत आए। कराची में वे पहले से आरएसएस के सदस्य थे और 1947 में आरएसएस के सचिव चुने गए थे। तभी आरएसएस की तरफ से उन्हें दंगों का जायजा लेने के लिए राजस्थान भेजा गया था। 1951 में जब जनसंघ का गठन हुआ तो वे उसके सदस्य बन गए। उन्होंने बैठे ठाले की हिंदुत्ववादी राजनीति की है, जिसमें अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ बयान देने के अलावा कुछ करने की जरूरत नहीं होती। ज्यादा कुछ करना हो तो पाकिस्तान की कड़े षब्दों में भर्त्सना कर दो। आगे हम देखेंगे कि यही अडवाणी संघ/भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। 
भाजपा में अडवाणी के बाद अब नरेंद्र मोदी का नाम आता है। नरेंद्र मोदी की चर्चा का बाजार आजकल काफी गरम है। उनका बोलना सुनें तो रामदेव की तरह उनके पास हर मर्ज की दवा है। किसी भी सवाल के जवाब में उन्हें रामदेव की तरह ही सोचने-विचारने के लिए पल भर भी रुकना नहीं पड़ता। वे जताते हैं कि मनमोहन सिंह कुछ नहीं जानते और वे सब कुछ जानते हैं। जाहिर है, जानने से उनका मतलब बोलने से होता है। यानी मनमोहन सिंह कुछ नहीं बोलते तो कुछ नहीं जानते, नरेंद्र मोदी खूब बोलते हैं तो सब कुछ जानते हैं। लेकिन वाचालता उन्हें मनमोहन सिंह से बड़ा नहीं बना देती। मनमोहन सिंह असली फर्जी हैं, जिनके सामने नरेंद्र मोदी, कारपोरेट जगत की लाख अभ्यर्थना करने के बावजूद, हमेषा नकली फर्जी रहेंगे।
कह सकते हैं कि अडवाणी अगर वाजपेयी के बिगड़ैल संस्करण हैं तो नरेंद्र मोदी अडवाणी के। नरेंद्र मोदी पर कुछ विस्तार से चर्चा करते हैं। वे अडवाणी से अलग अपनी एक योग्यता - कारपोरेट घरानों को रिझाने की कवायद - का जम कर प्रदर्षन कर रहे हैं कि कारपोरेट जगत उन्हें अपना उम्मीदवार बना ले। कारपोरेट जगत कभी कच्ची गोली नहीं खेलता। वह पूरी गारंटी चाहेगा कि भाजपा का भविष्य का यह नेता पार्टी को छुटभैये व्यापारियों की हित-पोषक नहीं बनी रहने देगा; नवउदारवादी फैसलों को पूरी तरह और तेजी से लागू करेगा।
मीडिया नरेंद्र मोदी का पूरा साथ दे रहा है। मीडिया की चर्चा में वही षख्स, विचार, घटना रहती है जिसकी नाल नवउदारवाद के साथ जुड़ी हो। भारत का मुख्यधारा मीडिया हर उस षख्स अथवा आंदोलन को सिर पर उठा लेता है, जो परोक्ष-अपरोक्ष तौर पर कारपोरेट पूंजीवादी व्यवस्था को बचाने और मजबूत बनाने का काम करते हैं। ऐसा करते वक्त भले ही वे सांप्रदायिकता, जातिवाद, परिवारवाद-वंषवाद, क्षेत्रवाद आदि को बढ़ावा देते हों और अंधविष्वास व अपसंस्कृति फैलाते हों। नब्बे के दषक की षुरुआत, जब संविधान की अवहेलना करके देष की अर्थव्यवस्था को कारपोरेट पूंजीवाद के षिकार के लिए खोला गया, मीडिया का यह चरित्र बनने लगा और पिछले एक दषक में परवान चढ़ चुका है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर मोदी के अंध समर्थन तक उसकी यह भूमिका देखी जा सकती है। राजनीति फर्जी होगी तो मीडिया भी फर्जी होता जाएगा।
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के एक अगुआ बाबा रामदेव ने हाल में खुल कर भाजपा नेतृत्व को सलाह दी है कि वह मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाए। पिछले दो सालों में देष की जनता यह देख चुकी है कि रामदेव, अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल का, वर्चस्व की आपसी लड़ाई के बावजूद, एक ही घराना है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान तीनों घी-षक्कर थे और आंदोलन की समाप्ती के उपरांत भी तीनों के तार कई तरह से आपस में जुड़े हुए हैं। सभी ने देखा कि गुजरात का चुनाव मोदी ने तीसरी बार आसानी से जीत लिया, लेकिन इन तीनों बड़बोलों में से किसी ने उस चुनाव में मोदी के खिलाफ चुंकार तक नहीं की। स्वाभाविक है कि मीडिया को ये तीनों नरेंद्र मोदी की तरह ही प्यारे हैं। 
मीडिया में मिली तेज उछाल से नरेंद्र मोदी पूरे उत्साह में है। उनका उत्साह और बढ़ जाता है जब यूरोप और अमेरिका को उनमें दूसरा मनमोहन सिंह नजर आने लगता है। वे यूरोपियन यूनियन के कारकूनों के साथ मुलाकात और खान-पान करते हैं। मीडिया सारी घटना को इस तरह परोसता है, मानो वे लोग आधिकारिक तौर पर ‘भारत के भावी प्रधानमंत्री’ से मिलने आए हों। यह सच्चाई जनता की निगाह से छिपा ली जाती है कि वह मुलाकात मोदी और उनके हिमायती गुट द्वारा प्रायोजित थी। साम, दाम, दंड, भेद; छल, कपट, झूठ, फरेब, षड़यंत्र - आरएसएस के हिंदुत्व में सब कुछ चलता है। 
कुछ बुद्धिजीवियों को यह देख कर सदमा लगता है कि दुनिया को लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, मानवाधिकार, कानून का षासन, सबको समान न्याय आदि का पाठ पढ़ाने वाला अमेरिका और यूरोपियन यूनियन भला नरेंद्र मोदी का समर्थन कैसे कर सकते हैं? पष्चिमी ज्ञान-विज्ञान की परंपरा में पगे ये भले लोग आज भी मानने को तैयार नहीं हैं कि यूरोप और अमेरिका की ये चिंताएं खोखली हैं। मुनाफा और वर्चस्व बनाए रखने के लिए वे एक से बढ़ कर एक तानाषाह और कातिल को अपना समर्थन देते रहे हैं। बस, उनके आर्थिक और सामरिक वर्चस्व को बाकी दुनिया में चुनौती नहीं मिलनी चाहिए। अगर कोई वैसी हिमाकत करता है तो उसे नेस्तनाबूद कर दिया जाता है। हम यह इसलिए कह रहे हैं कि फर्जी राजनीति और आंदोलन को फर्जी मीडिया किस तरह से परोसता है और फर्जी नागरिक समाज किस तरह लौकता है।  
भारत समेत ज्यादातर तीसरी दुनिया के लोगों ने अपने हाल और मुस्तक्विल के बारे में खुद सोचना और फैसले लेना बंद कर दिया है। हमारे सारे फैसले यूरोप और अमेरिका में लिए जाते हैं। भारत में हम केवल अपना धर्म, जाति और इलाका निभाते हुए उन फैसलों के नीचे जीते-मरते हैं। भारत के कारपोरेट घरानों और यूरोप-अमेरिका का नरेंद्र मोदी के समर्थन का मंसूबा साफ है - भारत के सभी राज्य ‘गुजरात मॉडल’ की रोषनी में अपना विकास करें, यानी संविधान को पीछे और कारपोरेट घरानों और यूरोप-अमेरिका की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आगे रख कर चलें। उन्हें इससे एक और फायदा है। कारपोरेट पूंजीवाद जितना बढ़ेगा, हिंसक प्रतिरोध भी उतना ही बढ़ेगा। (क्योंकि कारपोरेट पूंजीवाद के उत्पाद एनजीओ और सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट वास्तवकि राजनीतिक प्रतिरोध की जमीन तैयार नहीं होने देते। उन्होंने मिल कर अब आम आदमी के नाम पर एक राजनीतिक पार्टी ही बना ली है।) हिंसक प्रतिरोध को दबाने के लिए विदेषी कंपनियों का सुरक्षा बलों व खुफिया एजेंसियों को विषेषज्ञता, तकनीक, उपकरण और हथियार बेचने का मुनाफे का सौदा तेज होगा।
कहने की जरूरत नहीं कि नरेंद्र मोदी का बहुप्रचारित ‘गुजरात मॉडल’ हिंदुत्व की प्रयोगषाला में ढल कर निकला है। ‘गुजरात मॉडल’ फैलेगा तो कट्टरपंथ भी फैलेगा। उससे निपटने के लिए भारत की सरकारों को और उपकरणों और हथियारों की जरूरत होगी। कट्टरपंथियों को भी उपकरण और हथियार चाहिए होते हैं। नवसाम्राज्यवादी निजाम वह खुषी-खुषी उपलब्ध कराएगा। कट्टरपंथियों को हथियारों की ऐसी चाट लगा दी गई है कि वे अपने षरीरों को भी हथियार बना लेते हैं। यह पूंजीवादी निजाम दो मजबूत पहियों पर चलता है - बाजार और हथियार। नरेंद्र मोदी दोनों की गारंटी देने के लिए कारपोरेट घरानों और यूरोपी-अमेरिकी नेतृत्व के सामने कठपुतली की तरह नाच रहे हैं। इस कदर कि विदूषक लगने लगे हैं। मनमोहन सिंह को कारपोरेट पूंजीवाद का रोबो (मषीन) कहा जा सकता है तो नरेंद्र मोदी की छवि कारपोरेट पूंजीवाद के विदूषक की बनी  है।
हमने कुछ महीने पहले लिखा था कि आरएसएस एक सोची-समझी रणनीति पर काम कर रहा हो सकता है। नरेंद्र मोदी को वह इसीलिए टिटकारी दिए हुए है कि वह संघ परिवार का भविष्य का राष्ट्रीय नेता है। पिछले 20-25 सालों का नवउदारवादी दौर आरएसएस को सबसे ज्यादा फला है। इस बीच कारपोरेट-सेवी युवाओं की जो फसल तैयार होकर आई है, वह ज्यादातर अंधविष्वासी और सांप्रदायिक है। उसका भारत के संविधान और आजादी के संघर्ष, और सह-अस्त्तिव की विरासत से कोई वास्ता नहीं है। भारत को अमेरिका बनना चाहिए, बल्कि वह जल्दी ही एक दिन बनेगा, ऐसा उसका दृढ़ (अंध)विष्वास है। नरेंद्र मोदी इसी फसल के स्वाभाविक नेता हैं। उनके अभी तक के नेता मनमोहन सिंह उन्हें थके हुए लगने लगे हैं। देष के तेज विकास और महाषक्ति बनने की हवा बांधने वाले ये लोग अपने को ही पूरा देष मानते हैं। यानी सब कुछ उन्हें सबसे पहले अपने लिए चाहिए। नवउदारवाद के तीत बन रहे फर्जी भारत के ये फर्जी नागरिक हैं।  
कहना होगा कि यह युवा बिरादरी अपने आप ऐसी नहीं बन गई है। मनमोहन सिंह के साथ नवउदारवाद और संघ परिवार के साथ संप्रदायवाद के समर्थकों ने मिल कर जो माहौल तैयार किया, यह उसकी फसल है। आपने देखा है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम इनके हसीन सपनों को किस कदर हवा देते थे। यह सही है कि भारत की पूरी युवा आबादी के मुकाबले अभी कारपोरेट-सेवी युवाओं की संख्या काफी कम है। बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, खास कर युवतियों की, जो सांप्रदायिक और अंधविष्वासी नहीं हैं। इसीलिए नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री बनना दूर, अभी गुजरात के बाहर सांसद का चुनाव भी नहीं जीत सकते। लेकिन आरएसएस को विष्वास है, भविष्य में उसकी विचारधारा फैलेगी; तब गठबंधन की मजबूरी नहीं रहेगी; उस समय ‘आदर्ष हिदुत्ववादी’ नरेंद्र मोदी उसके प्रधानमंत्री होंगे। बीच का समय निकालने के लिए, अटल बिहारी वाजेपयी के समय में कट्टर कहे जाने वाले, लालकृष्ण अडवाणी का सहारा लिया जाएगा।
16 साल के प्यार के बाद कहा जा सकता है कि जदयू संघी घराने का ही अविभाज्य अंग है। उसके नेताओं ने रामविलास पासवान, मायावती, ममता, नवीन पटनायक, चंद्रबाबू नायडू, एम करुणानिधि, जे जयललिता आदि की तरह बीच-बीच में संघ को छोड़ा नहीं है। आपने हाल में देखा कि जदयू नेताओं ने दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय परिषद की बैठक में धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्य पर अपना पाखंडी रवैया एक बार फिर बखूबी दिखाया ताकि मुसलमानों का वोट उनकी झोली से बाहर न जाए। उन्होंने  आरएसएस के स्वयंसेवक और भाजपा के षीर्षस्थ नेता रहे अटल बिहारी को पूरमपूर धर्मनिरपेक्ष बताते हुए, उनके जैसे नेता को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की सलाह भाजपा को दी। यह सब जानते हैं कि संघ परिवार की सांप्रदायिक विचारधारा के अंतर्गत कट्टरता और उदारता की लाइन चलती हैं। वाजपेयी की उदारता सांप्रदायिक विचारधारा की उदारता है, जिसके तहत देष के संविधान के साथ छल करके सत्ता पाई जाती है।
जदयू नेताओं की नजर में अब लालकृष्ण अडवाणी धर्मनिरपेक्ष नेता हो गए हैं। अडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने पर गठबंधन नहीं छोड़ने की बात करने वाले ये वही नेता हैं जिन्होंने भाजपानीत केंद्र की राजग सरकार में षामिल होते वक्त कहा था कि अगर भाजपा अडवाणी को प्रधानमंत्री बनाती तो वे सरकार में षामिल नहीं होते। उनके लिए अब कट्टर मोदी के मुकाबले अडवाणी उदार हो गए हैं। दरअसल, भाजपा को जदयू नेताओं के मोदी संबंधी परोक्ष-अपरोक्ष हवालों से नाराज न होकर उनका षुक्रगुजार होना चाहिए। जदयू नेतृत्व ने कहा है कि वे मोदी का समर्थन इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि मोदी ने गुजरात दंगों से निपटने के लिए मुस्तैदी से काम नहीं लिया। यह कह कर जदयू नेताओं ने 2002 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए मुसलमानों के राज्य-प्रयोजित नरसंहार और उसे छिपाने के लिए किए गए षड़यंत्रों से मोदी को बरी कर दिया है।
बाबरी मस्जिद ध्वंस के रथी अडवाणी को अपना नेता स्वीकार करने के साथ  जदयू नेताओं ने भाजपा के साथ अपने 16 साल पुराने प्यार का बखान भी किया है। लेकिन उन्हें यह भी कहना चाहिए कि उतने ही सालों से वे मुसलमानों के साथ फ्लर्ट कर रहे हैं। यह सारी कलाबाजी बिहार में मुसलमान वोटों को कब्जे में रखने के लिए की जा रही है। अपने को सेकुलर जताने वाले दलों और नेताओं का हर राज्य और देष के स्तर पर यही रवैया बना हुआ है। सभी ताक में रहते हैं कि चुनाव में मुसलमान उनकी झोली में गिरें। यह न केवल संविधान विरोधी रवैया है, नागरिक के तौर मुसलमानों की तौहीन है। हर सेकुलर पार्टी में सत्ता का सुख भोगने वाले चंद मुसलमान नेता भी पूरे समुदाय की यह दुदर्षा बना कर रख देने में हिस्सेदार बनते हैं। भाजपा सेकुलर दलों के इस रवैये का फायदा उठाकर हिंदू वोट बैंक की राजनीति करती है और हमेषा मुख्य विपक्षी पार्टी बनी रहती है।
हमारा मानना है कि यह दुष्चक्र तभी तोड़ा जा सकता है जब देष के मुसलमान नागरिक कम से कम एक बार आमचुनाव और एक बार सभी विधानसभा चुनावों में वोट नहीं डालने का कड़ा फैसला लें। भारत की राजनीति में उससे बड़ा बदलाव हो सकता है। मुसलमानों के इस ‘सत्याग्रह’ से धर्मनिरपेक्षता के दावेदार और सांप्रदायिकता के झंडाबरदार - दोनों संविधान की ओर लौटने के लिए मजबूर होंगे। और तब देष का संविधान सांप्रदायिकता पर भारी पड़ेगा।

पूंजीवाद के सिर पर स्वराज की टोपी

दिवंगत साथी हरभगवान मेंहदीरत्ता की बहन सत्या ने हमें बताया कि जस्टिस जेएस वर्मा की पत्नी ने उनसे आम आदमी पार्टी की सदस्य बनने का आग्रह किया। सत्या के विचार काफी रेडिकल हैं और वे अपने ढंग की स्त्रीवादी और समाज-सुधारक हैं। राजनीति को समाज से जोड़ कर देखती हैं और उससे भी ज्यादा राजनीति करने वालों के व्यक्तिगत आचरण से। उन्होंने जस्टिस वर्मा की पत्नी को यह कह कर सदस्य बनने से इनकार कर दिया कि उस पार्टी के बनाने वाले एनजीओ चलाने वाले हैं। उनमें समाज के लिए कोई दर्द या दृष्टि होती तो उन्होंने अपने बूते कुछ काम किया होता। 
ये लोग पहले ‘मैं अन्ना हूं’ की टोपी पहनते थे। आजकल ‘मैं आम आदमी हूं’ और ‘मुझे चाहिए स्वराज’ की टोपी लगाए होते हैं। आम आदमी के बारे में हमने पहले आपको बताया था कि उसका गांधी के आखिरी आदमी से कोई लेना-देना नहीं है। मिश्रित और पिछले बीस-पच्चीस सालों की नई आर्थिक नीतियों का लाभ उठाकर मुटाया मध्यवर्ग खुद आम आदमी बन बैठा है। पिछले दिनों केजरीवाल ने दिल्ली में बिजली-पानी के मुद्दे पर अनषन किया था। अखबार में छपी एक दिन की तस्वीर में प्रषांत भूषण ‘मुझे चाहिए स्वराज’ की टोपी लगा कर बैठे थे, जिस पर फोटोग्राफर ने फोकस किया था। षायद यह सोच कर कि बेचारे भले लोग स्वराज के लिए कितनी तकलीफ उठा रहे हैं। वह तस्वीर देख कर हमारे मन में आया कि एक पेषी का कई लाख रुपया लेने वाले, इलाहाबाद में करोड़ों के मकान को कौडियों में अपने नाम लिखवा लेने वाले और दिल्ली व नोएडा में मकान-प्लाट रखने वाले इन महानुभाव को और कितना स्वराज चाहिए? एक ‘समय संवाद’ में हमने इस मंडली के स्वराज का पाखंड रचने के वाकये का जिक्र किया था कि किस तरह से 2007 के आमचुनाव में उन्होंने मनेाहन सिंह, सोनिया गांधी और अडवाणी से स्वराज मांगने के बड़े-बड़े होर्डिंगों से दिल्ली को पाट दिया था।
स्वराज का विचार तिलक युग से षुरू होकर गांधी तक आता है और गांधी उसे आधुनिक औद्योगिक सभ्यता के विकल्प के रूप में विकसित करते हैं। स्वराज्य के बारे में  गांधी का कहना था कि आजादी के साथ जो मिलने जा रहा है, वह उनके सपनों का स्वराज्य नहीं, इंग्लैंड के संसदीय लोकतंत्र का एक रूप होगा। गांधी को यह तो स्पष्ट था कि उनके सपनों का स्वराज्य फलीभूत होना लगभग नामुमकिन है। लेकिन उस दिषा में उनके प्रयास अंत तक बने रहे ताकि, कम से कम लोगों की सोच में, कुछ हद तक उस विचार की उपस्थिति बनी रहे। उनका प्रयास बिल्कुल व्यर्थ नहीं गया। गांधी का विस्तार कहे जाने वाले लोहिया ने यह कहा कि समाजवाद में गांधीवाद का फिल्टर लगाना होगा। अस्सी के दषक तक भारत की सरकारें भी, भले ही आधे-अधूरे रूप में, गांधी के स्वराज्य से कुछ न कुछ प्रेरणा लेती थीं। पिछले 25 सालों की नवसाम्राज्यवादी घुसपैठ के बावजूद देष और दुनिया में अनेक लोग और संगठन, भले ही वे अलक्षित रहते हों, गांधी के स्वराज्य के विचार से प्रेरणा लेकर काम करते हैं।
 यह बहुत चिंता की बात है कि कुछ एनजीओ वालों ने गांधी के स्वराज्य को कारपोरेट पूंजीवाद की टोपी बना दिया है। हमने कई बार यह उल्लेख किया है कि नवसाम्राज्यवादी व्यवस्था का गांधी को मिटाने का लक्ष्य है। क्योंकि हथियार और बाजार के बल पर चलने वाली इस सभ्यता का मूलभूत विकल्प साहसपूर्वक और सुचिंतित रूप में केवल गांधी ने दिया है। अपना यह लक्ष्य सिद्ध करने के लिए नवउदारवादी व्यवस्था  गांधी को एप्रोप्रिएट करती है और अक्सर विकृत करती है। एप्रोप्रिएषन का उदाहरण संयुक्त राष्ट्र द्वारा गांधी जयंती को अहिंसा दिवस घोषित करने से लेकर गांधी के नाम पर देहाती गरीब परविारों के एक व्यक्ति को साल में 100 दिन अधिकतम 189 रुपये की दिहाड़ी पर काम देने वाले यूपीए सरकार के मनरेगा तक देखा जा सकता है। सरकार की नजर में गांधी गरीबों के भगवान हैं जिन्हें उनके नाम पर योजना बना कर गरीबों को दे दिया गया है? इससे ज्यादा और क्या चाहिए? गांधी को विकृत करने के अनेक उदाहरणों में से एक इन तथाकथित स्वराजवादियों का है। आप देखते हैं, भ्रष्टाचारियों को फांसी देने और उनका मांस गिद्धों-कौओं को खिलाने का बार-बार ऐलान करने वाले अन्ना हजारे को मीडिया में लगातार गांधीवादी लिखा जाता है। ऐसा प्रमादवष नहीं है। यह गांधी को विकृत करने की वह रणनीति है जिसके तहत नवउदारवादी दौर में पली-बढ़ी पीढ़ी को बताया जाता है कि गांधी ऐसा था।        
मेधा पाटकर और अरुणा राय अनषन पर बैठे केजरीवाल को देखने गईं और उन्हें अपना समर्थन दिया। यह एनजीओ घराना है, जिसमें केंद्र और परिधि का अंतर हो सकता है, लेकिन इस पर सब एक मत हैं कि समाजवादी राजनीति और विचारधारा की जरूरत अब नहीं है। मनमोहन सिंह और उनकी मंडली भी यही कहते हैं। अरुणा राय जब कहती हैं कि लोग जाग गए हैं, सवाल पूछते हैं, तो उसका यही अर्थ है कि एनजीओ वालों ने लोगों को जगाया है और सवाल पूछने के लिए तैयार किया है। लेकिन पलट कर उनसे कहा जा सकता है कि एक परिवार के एक सदस्य को साल के 100 दिन धूल-मिट्टी का काम देने का कानून बना कर संविधान प्रदत्त बराबरी के हक पर डाका डाला गया है।
नर्मदा बचाओ आंदोलन और उसकी नेत्री मेधा पाटकर की बड़ी चर्चा रही है। हालांकि जिन बड़े बांधों के खिलाफ वह आंदोलन था, नर्मदा बांध समेत उनके निर्माण पर कोई रोक नहीं लगी है। हरसूद और टिहरी जैसे षहर डूब गए और बड़े-छोटे बांधों की लंबी फेहरिष्त सरकारों के पास है। तसल्ली के लिए हम सभी लोग कहते हैं कि उस आंदोलन से जागरूकता फैली और विस्थापितों की कुछ हद तक सहायता हो पाई। लेकिन यह आंदोलन एनजीओ का सहारा नहीं लेता, और राजनीतिक होता, तो भले ही थोड़ा, लेकिन नवउदारवाद के विरुद्ध निर्णायक फर्क पड़ सकता था।
ऐसा नहीं है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन राजनीतिक हो नहीं पाया। किषन पटनायक के लाख प्रयासों के बावजूद वह होने नहीं दिया गया। कहने की जरूरत नहीं कि राजनीतिक नहीं होने की वजह से वह खुद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में जा कर डूब गया। देख सकते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का सूरज भी डूब चुका है और अन्ना हजारे अलग-अलग जगहों व मुद्दों पर हाथ-पैर मारते घूमते हैं। बीच-बीच में कहते हैं कि जन लोकपाल बनवा कर दम लेंगे। आंदाोलन के पीछे कोई स्वतंत्र विचार नहीं होता, उद्देष्य नहीं होता, तो वह दिग्भ्रमित हो जाता है। अगर विचार और उद्देष्य नवउदारवाद के पेटे में समाने वाले हों तो आंदोलन उसी में डूब जाता है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के साथ यही हुआ है। विष्व बैंक का आदमी कोई वहां नौकरी करके ही नहीं होता। न ही उसका पुरस्कार पाकर, जैसा कि अन्ना हजारे को काफी पहले मिला था, कोई विष्व बैंक का आदमी हो जाता है। अलबत्ता उसकी नवउदारवादी नीतियों और कार्यक्रमों को मानने-चलाने वाला व्यक्ति विष्व बैंक का आदमी होता है। अन्ना हजारे, अरुणा राय, केजरीवाल आदि वही हैं। 
हम आपको बता चुके हैं कि असली झगड़ा सोनिया गांधी की सलाहकार परिषद में रहने और सोनिया गांधी-मनमोहन सिंह की नजर में ज्यादा प्रभावषाली बनने का था जो बढ़ गया। कांग्रेस में कई वकील हैं। उनमें पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी अग्रणी हैं। प्रषांत भूषण को लगता होगा कि वे इतने नामी वकील है, उन्हें क्यों नहीं ऑफर दिया जाता? अपने पिता की नजीर उनके सामने थी। आप हैरान न हों, षासक वर्ग के दायरे में यह सब सोचना-समझना होता रहता है। इनमें से कुछ लोग कांग्रेस का और कुछ लोग भाजपा/संघ का काम करते ही थे। खबरें हैं कि आम आदमी पार्टी में कुछ लोगों को कांग्रेस ने प्लांट किया है ताकि भाजपा के मध्यवर्ग के वोट खराब किए जा सकें और षीला दीक्षित चौथी बार चुनाव जीत जाएं। ‘अभूतपूर्व’ आंदोलन और ‘नई’ राजनीति के नाम पर यह फर्जीवाड़ा आपके सामने है।  
धन और मीडिया की ताकत के बावजूद अगर मध्यवर्ग मेहनतकषों का अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल नहीं कर पाया तो इस पार्टी के कुछ नेता कांग्रेस में और कुछ भाजपा में चले जा सकते हैं। कुछ, जो वाकई आदर्षवादी भावना से जुड़े हैं, डिप्रैषन या सिनिसिज्म का षिकर हो सकते हैं। यह कहते हुए कि इस देष में, खास कर राजनीति में, कुछ नहीं हो सकता। राजनीति बहुत बुरी होती है, कल तक ये लोग ही चिल्ला-चिल्ला कर कहते थे। ऐसा न हो, पार्टी बिखरे नहीं, इसके लिए दिल्ली का चुनाव लूटने की मुहिम में दिन-रात दौड़-धूप की जा रही है। दिल्ली फतह तो देष फतह!
दिल्ली और देष की दौड़-धूप में कई समाजवादी भी लगे हैं। उन्हें ऐसा सक्रिय पहले कभी नहीं देखा था। साथी राजकुमार जैन अक्सर गुमान से कहते हैं कि समाजवादी पर किसी के रुतबे का रौब गालिब नहीं होता। हो सकता है जब समाजवादी आजाद देष में जेल को अपना घर मानते थे, ऐसी कोई भावना रही हो। लेकिन इस मामले में इधर की तस्वीर बड़ी निराषाजनक है। कांग्रेस और भाजपा छोड़िए, कुछ समाजवादी केजरीवाल के कारिंदे बने घूम रहे हैं। उनकी इस विनम्रता का कारण यही हो सकता है कि उन्होंने रामदेव की संगत में ‘राष्ट्रीय स्वाभिमान’ का ऐसा पाठ पढ़ा है कि उनका अपना स्वाभिमान षून्य हो गया है! 
कांग्रेस और भाजपा के चुनावी पंडित गणित लगा रहे हैं कि आम आदमी पार्टी किसका नुकसान करेगी। दोनों पार्टियां अपना नुकसान न होने और दूसरी का नुकसान होने का कयास लगा कर कभी खुष होती हैं, कभी डरती हैं। आप देखेंगे कि विधानसभा चुनाव में यह ‘नई’ राजनीति करने वाली नई पार्टी कांग्रेस और भाजपा के असंतुष्टों को टिकट देगी। जिन्हें बसपा का टिकट नहीं मिलेगा, वे भी कुछ ले-देकर वहीं से टिकट जुगाड़ सकते हैं।
यह फर्जी राजीनीति में ही हो सकता है कि कोई राजनीतिक पार्टी पंजीकरण के पहले ही आगामी आमचुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान करे। कांग्रेस और भाजपा भी यह नहीं कर पाती हैं। जाहिर है, लोकतंत्र का यह मजाक धनबल के बूते ही किया जा सकता है। मजाक को प्रचारित करने के लिए पूरा मीडिया हाजिर है। यह नहीं भूलना चाहिए कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, जिसकी राख से यह पार्टी पैदा हुई बताई जाती है, में बड़ी संख्या में राजनीति-द्वेषी, घोर प्रतिक्रियावादी और सांप्रदायिक तत्व षामिल थे। वे टोपियों के पीछे छिप कर अपना काम करेंगे। हमारे जो साथी आम आदमी पार्टी में मौजूद कतिपय प्रगतिषील और धर्मनिरपेक्ष साथियों का हवाला देकर संबंध बनाए रखना चाहते हैं, वे थोड़ा रुक कर सोच लें कि मध्यवर्ग के नए नायक बनने चले ये लोग कितने प्रगतिषील और धर्मनिरपेक्ष रह गए हैं या आगे रह जाएंगे? वह पार्टी लोकतंत्र और राजनीति को क्या नई राह दिखाएगी जो अन्ना हजारे, रामदेव और केजरीवाल के संबंध तक जनता को साफ बताने को तैयार नहीं है। जनता को इतना ‘टेक इट फॉर ग्रांटेड’ तो वे बुरे नेता और उनकी पार्टियां भी नहीं लेती जिन्हें राजनीति से बेदखल करने के दावे ठोंके जा रहे हैं।  
    गंभीर और परिवर्तनकारी राजनीति के युगानुसार कुछ सूत्र होते हैं। वे अलग-अलग विचारधारात्मक समूह के अलग-अलग और कुछ समान हो सकते हैं। गांधी ने राजनीति को समाज और सभ्यता से अलग न मान कर, उस लिहाज से उठने वाले एक कदम को भी पर्याप्त माना। अंबेडकर ने दलित समाज को षिक्षित होने, संगठित होने और संघर्ष करने को कहा। लोहिया ने जेल, फावड़ा और वोट का सूत्र दिया। समाजवादी जनपरिषद में विचारधारा, संगठन, संघर्ष, रचनात्मक कार्य और चुनाव के पांच सूत्र अपनाए गए थे। आम आदमी पार्टी का अगर कोई सूत्र है तो वह चुनाव लूटना हो सकता है। जाहिर है, ऐसी राजनीति कांग्रेस और भाजपा से अलग नहीं हो सकती।  
यह देष की फर्जी राजनीति का परिदृष्य है। फर्जी राजनीति का एका इतना जबरदस्त है कि गठबंधन सरकार चलाने में न वाजपेयी को परेषानी हुई, न मनमोहन सिंह को है। बल्कि मनमोहन सिंह तो अल्पसंख्यक सरकार चला रहे हैं, जिसे उत्तर प्रदेष में एक-दूसरे के खून के प्यासे मुलायम और मायावती का बाहर से समर्थन है। कहने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि इस फर्जी राजनीति को भारत के नागरिक समाज का अनुमोदन है। कांग्रेस और भाजपा से अलग कोई गठबंधन या तो बनेगा नहीं, बन गया तो चलेगा नहीं। यही नागरिक समाज और मीडिया उसे गिरा देंगे।
फर्जी राजनीति का ठाठ यह है कि उसका न राजनीति में कोई विपक्ष है, न नागरिक समाज में। पिछले दिनों जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुआ, वह इसलिए नहीं था कि यह फर्जी राजनीति बदलनी चाहिए, बल्कि इसलिए था कि भारत का ‘महान’ मध्यवर्ग यह जताना चाहता है कि उसकी नैतिकता मर नहीं गई है। षुरू में उसने मनमोहन सिंह की ईमानदारी की छाया में अपने को भुलाए रखा और आर्थिक सुधारों की मलाई खाता रहा। क्योंकि वैसी कोई छाया थी ही नहीं, तो उसे झटका लगा और वह चारों तरफ से नैतिक-नैतिक चिल्लाते हुए दौड़ पड़ा। हाल में नागरिक समाज दिल्ली में हुए दो बलात्कार के मामलों को लेकर हद दरजे तक उत्तेजित हुआ। एक संवेदनषील समाज को ऐसे जघन्य कृत्यों पर आंदोलित होना ही चाहिए। लेकिन उसका फर्जीपना पहली नजर में ही पकड़ में आ जाता है। वह सरकार को समाज से बाहर मानता है और अपने को भी। वह यह सोचने को तैयार नहीं है कि जिस सरकार ने पिछले 25 सालों से संविधान की परवाह नहीं की, उससे कानून व्यवस्था की सही पालना की अपेक्षा नागरिक समाज किस तर्क से करता है? जब सरकार संविधान की मर्यादाओं को तोड़ती है तो यह नागरिक समाज चुप रहता है, क्योंकि उसमें उसका फायदा है। जब कानून-व्यवस्था टूटती है तो बौखलाता है, क्योंकि उसे अपनी सोने की लंका खतरे में नजर आती है।
फर्जी नागरिक समाज की फर्जी राजनीति और फर्जी राजनीति का फर्जी नागरिक समाज। कहने का आषय यह है कि जब फुलफ्लेजेड फर्जी राजनीति चलेगी तो जीवन के सभी क्षेत्रों में फर्जीवाड़ा न हो, यह संभव नहीं है। उदाहरण देने लगें तो पूरा पुराण तैयार हो जाएगा। हमारे राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रतीकों में भी फर्जीवाड़े की घुसपैठ हो चुकी है, यह एक उदाहरण से बताना चाहेंगे। फिल्म अभिनेता आमिर खान सरकार और कंपनियों के एक से प्रिय हैं। उनका विरुद भी विदेषी पत्रिकाओं में आ चुका है। वे अमिताभ बच्चन के नक्षे कदम पर हैं - माल भी बनाओ और नाम भी कमाओ। आज बच्चों के हक में ‘कुपोषण भारत छोड़ो’ का विज्ञापन करने वाले आमिर खान ने कोकाकोला का विज्ञापन करना तब भी नहीं छोड़ा था जब कोक-पेप्सी में बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदेह तत्व होने की सच्चाई सामने आई थी। उल्टा वे कंपनी के पक्ष में विज्ञापनबाजी पर उतर आए थे।
भारत छोड़ो आंदोलन आजादी के संघर्ष का विषिष्ट और निर्णायक पड़ाव है। उससे प्रेरणा लेकर नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ पिछले बीस सालों से नारा लगाया जाता है - विदेषी कंपनियां भारत छोड़ो। ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में पड़े अकालों में कई लाख भारतीय मारे गए। अब भारत में अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां लूट मचाए हुए हैं। बच्चों के कुपोषण का संबंध इन कंपनियों की लूट और उस लूट के हिस्सेदार आमिर खान जैसे लोगों से है। नवउदारवादी समाज सुधारकों और देषभक्तों में गजब का उत्साह होता है। आमिर खान और सरकार भारत छोड़ो आंदोलन की थाती को हजम करके ही नहीं रुक जाते। ‘सत्यमेव जयते’ जैसे राष्ट्रीय वचन को भी हजम कर जाते हैं। यह प्रोग्राम करके, बताया जाता है, आमिर खान ने कंपनियों से करोड़ों रुपया कमाया। अब वे कमाई की किसी और जुगत में लगे होंगे। इन फर्जी समाज सुधारकों और देषभक्तों का संसद में भी स्वागत होता है और नागरिक समाज में भी। भले लोग कहते हैं, देखो है तो कलाकार लेकिन समाज और देष के लिए कितना ऊंचा भाव रखता है!
आप कहेंगे कि हमने फर्जी राजनीति और उसके अनुमोदक फर्जी नागरिक समाज का दर्षन तो खूब करा दिया, अब उसे बदलने का ‘दर्षन’ भी कुछ बताएं। दरअसल, हर ‘समय संवाद’ के अंत में आगे के रास्ते का सवाल खड़ा हो जाता है। हम एक बार फिर डॉ. लोहिया के हवाले से कहना चाहते हैं कि राजनीतिक मानस के निर्माण का अधूरा छूटा काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए। इसके लिए जरूरी है कि सच्ची प्रेरणा रखने वाले लोग एनजीओ नहीं, राजनीति में जाएं। उसके लिए जरूरी नहीं है कि हमेषा नई पार्टी बनाई जाए या किसी क्रांतिकारी पार्टी में ही षामिल हुआ जाए। प्रेरणा अगर सच्ची है तो स्थापित दलों में रह कर भी परिवर्तन की राजनीति की जा सकती है। नजरिया अगर राजनीतिक है तो बिना किसी राजनीतिक पार्टी में रहे भी परिवर्तन की राजनीति में सहायक हुआ जा सकता है। क्योंकि राजनीतिक नजरिया होगा तो राजनीति और नागरिक समाज में चल रहे फर्जीवाड़े की पहचान होगी। तब लोग भी पहचानेंगे और अपने और देष के संविधान के हक में नवउदावादियों के खिलाफ उठ खड़े होंगे।    

23 अप्रैल 2013

Sunday, February 3, 2013

संविधान पर भारी सांप्रदायिकता - प्रेम सिंह

( गुजरात को लक्षित कर जो नगाड़े बज रहे हैं, वो हमारे कानों में ही नहीं आत्मा पर भी चोट करते हैं। अगर साम्प्रादियकता को स्वीकार करने की इतनी ही मजबूरी है तो फिर हमें संविधान को खारिज कर देना चाहिए। ये सही है कि मोहब्बत की क़िताब पल पल का हिसाब करके नहीं लिखी जाती। लेकिन सवाल जब प्राण तत्व का हो तो उसके बिना जिया भी नहीं जा सकता। बुद्घिजीवीयों ने तो सुर अभी से ही बदलने शुरू कर दिए है। नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की संघ परिवार ने जो धुन तैयार की है, मीडिया उसके कोरस में गा रही है। ऐसे में डॉ प्रेम सिंह का ये लेख निश्चय ही हमारे जैसे लोगों की हौसला अफ्जाई करती है। )
भूलने के विरुद्ध
नरेंद्र मोदी के समर्थक और प्रशंसक पिछले कई सालों से दबाव बना रहे हैं कि गुजरात में २००२ में जो हुआ उसे भूल जाना चाहिए; गुजरात नरसंहार की बात अब मोदी के संदर्भ में नहीं करनी चाहिए; पीछे छूट चुके २००२ की बातें भुला कर आगे देखना चाहिए; मोदी ने कुछ भी गलत नहीं किया था; उन्हें बदमान किया गया है; मोदी के रूप में देश को एक ऐसा काबिल नेता मिल गया है जिसे देश का प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए। मोदी के पक्ष में जितनी तेजी और तरीकों से यह गुट काम कर रहा है, उतनी तेजी मोदी के पक्ष में आरएसएस में भी नहीं देखने को मिलती। भाजपा में तो नहीं ही मिलती। मोदी के प्रशंसकों में उनके छवि निर्माण के लिए नियुक्त उनकी जनसंपर्क (पीआर) टीम और विकास के अंधे कोरे नवउदारवादी ही नहीं है। ऐसे विद्वान, पत्रकार, संपादक और राजनीतिक टिप्पणीकार भी काफी संख्या में शामिल हैं जो सांप्रदायिक नहीं माने जाते और कभी-कभी संविधान और गरीबों की बात भी कर लेते हैं। कई ख्नमॉडरेट हिंदुओंज् ने फरवरी-मार्च २००२ के नरसंहार के वक्त ही मोदी का परोक्ष बचाव शुरू कर दिया था। ख्नगांधीवादीज् और ख्नसमाज सुधारकज् अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के जंतर-मंतर पर हुए पहले धरने पर सबसे पहले नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की थी। उनकी टीम में शामिल खास पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, लेखकों, जनांदोलनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भी मोदी का प्रशंसक माना जाए या नहीं, यह अपने-अपने सोचने और तय करने की बात है। पिछले दिनों ख्नगली के शेरज् बाल ठाकरे के निधन पर उनकी प्रशंसा में कसीदे पढ़ने वाली हस्तियां, जिनमें कलाकारों से लेकर उद्योगपति तक शामिल हैं, ख्नराष्ट्र के शेरज् मोदी की प्रशंसा में पीछे रहने वाले नहीं है।
मोदी का महिमामंडन योजनाबद्ध ढंग से सोशल और मुख्यधारा मीडिया के चतुराईपूर्ण इस्तेमाल से हुआ है। टीवी, प्रिंट मीडिया, पत्रिकाएं, ब्लॉग, ट्वीटर, फेसबुक नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में लंबे समय से लगे हैं। सार्वजनिक मंचों, सरकारी व गैर-सरकारी बैठकों में मोदी का गुणगान होता है। इस हल्ले में २००२ के कृत्य की निंदा करने वाले जल्दी ही हाशिए पर चले गए और प्रशंसक आगे आ गए हैं। नरसंहार के वक्त गुजरात के बाहर हुई व्यापक स्तर पर निंदा का स्थान व्यापक स्तर पर प्रशंसा ने ले लिया है। ऐसा नहीं है कि मोदी के विरोध में बोलने और लिखने वाले लोग नहीं हैं, अब उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। मोदी के प्रशंसकों का पलड़ा उनसे कहीं भारी है।
मोदी के प्रशंसकों से हालांकि पूछा जा सकता है कि अगर मोदी ने सब ठीक किया था, जैसा कि वे कहते हैं, और उन्हें बदनाम किया गया है, तो फिर भूलने की बात करने की जरूरत कहां से पैदा होती है? उन्हें भूलने की बात किए बगैर मोदी का समर्थन करना चाहिए। अगर मोदी को ख्ननिहित स्वार्थोंज् ने बदनाम किया है, जैसा कि मोदी समेत उनके पार्टी के नेता और समर्थक कहते हैं, तो उन्हें बदनाम करने वालों की परवाह नहीं होनी चाहिए। न ही उनके द्वारा की जाने वाली बदनामी की। जाहिर है, भूलने के पक्षधर उन सारे तथ्यों और सबूतों को आंख बंद करके भी अनदेखा नहीं कर पाते, जो सत्ता का भरसक दुरुपयोग करने के बावजूद मोदी मिटा नहीं पाए। जनहित याचिकाओं के चलते गुजरात कांड में सुप्रीम कोर्ट का सीमित हस्तक्षेप तो २००४ में हुआ। सांप्रदायिक फासीवादी वैसे भी हाई कोर्ट-सुप्रीम कोर्ट की परवाह कहां करते हैं? बाबरी मस्जिद ढहाने का कृत्य सुप्रीम कोर्ट में उसे नुकसान न होने देने का हलफनामा देकर किया गया था। बहरहाल, मोदी के प्रशंसकों के गुट से इतना आग्रह तो किया ही जा सकता है कि भूलने से पहले यह याद कर लेना उचित होगा कि हम क्या भूलने की बात कर रहे हैं?
गुजरात नरसंहार - २७ फरवरी २००२ को गोधरा में और उसके बाद कई हफ्तों तक पूरे गुजरात में - के वक्त लिखे गए लेखों, जो ख्नगुजरात के सबकज् पुस्तिका में अलग से प्रकाशित हैं, के बाद हमने इस प्रकरण पर विशेष कुछ नहीं लिखा है। यहां भी हम कुछ नया नहीं लिखने जा रहे हैं। मोदी के समर्थन की परिघटना को कुछ पुरानी और नई घटनाओं के संदर्भ में देखना चाहते हैं ताकि उन्हें प्रधानमंत्री चाहने वालों की फैंटेसी की हकीकत समझी जा सके। 
नरेंद्र मोदी वर्ष २००२ में उनके नेतृत्व में हुए राज्य प्रायोजित मुसलमानों के नरसंहार के कारनामे के बाद चर्चा में आने से पहले आरएसएस के बाहर ज्यादा नहीं जाने जाते थे। वहां उनकी कट्टरता की छवि थी, जिसका जिक्र खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने २००१ में उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने के पार्टी के निर्णय के वक्त किया था। मोदी को यह ख्नश्रेयज् जाता है कि उन्होंने संघ की विचारधारा को राममंदिर आंदोलन और बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद बची-खुची ख्नउदारज् लाइन से उतार कर मजबूती के साथ कट्टरता की लाइन पर चढ़ा दिया। गुजरात में कट्टर हिंदुत्व का प्रयोग काफी अरसे से चल रहा था। २७ फरवरी २००२ को साबरमती एक्सप्रैस जब गोधरा स्टेशन पर रुकी, आगे चली और कुछ किलोमीटर बाद फिर रुकी और उसके एस ६ डिब्बे में आग लगा कर ५८ कारसेवकों को जिंदा जला दिया गया, तो मोदी ने कट्टरता की लाइन को हरी झंडी दिखा दी। हिंदुत्व की गुजराती प्रयोगशाला में संविधान का धर्मनिरपेक्ष मूल्य धू-धू करके जलने लगा।
यह महज ख्नक्रिया की प्रतिक्रियाज्, जैसा कि मोदी ने उस समय कहा था, होती तो ५८ मुसलमानों को मार कर पूरी हो जानी चाहिए थी। कुदरत का नियम अपने अनुशासन के दायरे से बाहर नहीं जाता। लेकिन वैसा था नहीं। बहुसंख्या के बल पर राज्य की सरपरस्ती में गुजराती हिंदुओं ने बच्चों, बूढ़ों, औरतों समेत हजार से ज्यादा मुसलमानों को खुल कर सरेआम मौत के घाट उतारा और उनकी संपत्तियों की लूटपाट की। २० हजार घर और दुकानें लूटे और जलाए गए। ३६० पूजास्थल तोड़े गए। डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को कैंपों में शरण लेनी पड़ी। पढ़े-लिखे मध्यवर्ग से लेकर आदिवासियों तक उसमें शामिल थे। मोदी खुद, उनके चहेते नेता और कुछ पुलिस व अन्य अधिकारी नरसंहार में संलिप्त थे। 
गोधरा का नरसंहार को लेकर काफी ख्नराजनीतिज् हुई है। वह पूर्वनियोजित था या हालात बिगड़ने का नतीजा या दुघर्टना - इस पर जस्टिस डी.एस. तेवतिया और उनके साथियों की रपट, गुजरात सरकार द्वारा गठित जस्टिस जी.टी. नानावती आयोग की रपट, फासट ट्रेक कोर्ट के जज पी. आर. पटेल का फैसला, केंद्र सरकार द्वारा गठित जस्टिस यू.सी. बनर्जी आयोग की रपट (इस आयोग के गठन को कोर्ट ने अवैध करार दिया था) और जस्टिस वी.आर. कृष्णा अय्यर, जस्टिस पी.बी. सामंत, जस्टिस एच. सुरेश, नागरिक अधिकार वकील के.जी. कन्नाबिरन, सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा राय, विद्वान तनिका सरकार, घनश्याम ख्नााह और के.एस. सुब्रमण्यम द्वारा तैयार कंसर्ड सिटीजंस ट्रिब्युनल (सीसीटी) की रपट में अलग-अलग दावे और निष्कर्ष हैं। उस घटना के लिए ३१ लोगों को निचली अदालत से सजा हो चुकी है। उनमें ११ को मृत्युदंड और २० को आजीवन कारावास की सजा मिली है। ६३ आरोपियों को अदालत ने बरी किया है। सजा पाने वाले सभी अपराधी मुसलमान हैं। जाहिर है, कोर्ट ने यह स्वीकार किया है कि डिब्बे में आग मुसलमानों ने लगाई थी।
लेकिन गोधरा मामले में किसी ने यह देखने की कोशिश नहीं की कि अगर बाकी गुजरात गोधरा की प्रतिक्रया था तो गोधरा बाकी गुजरात की प्रतिक्रिया हो सकता है। गोधरा के बारे में हम यह कहना चाहते हैं, जो हमने उस वक्त भी कहा था, कि उसे अकारण और निरपेक्ष कार्रवाई न मान कर संघ की देशव्यापी सांप्रदायिक मुहिम की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। घटना के पिछले पंद्रह सालों से संघ संप्रदाय के नेता राम मंदिर आंदोलन के नाम पर खुलेआम गाली-गलोज की भाषा में भाषणों, कैसटों, पेंफ्लेटों, पुस्तिकाओं और इलैक्ट्रिॉनिक मीडिया में परिचर्चाओं के जरिए अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों का मानमर्दन करने में जुटे हुए थे। संघ की इस लंबी सांप्रदायिक मुहिम ने देश के सामाजिक सौहार्द का माहौल गहरे तक विषाक्त कर दिया था। १९९२ में बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ और देश में बड़े पैमाने पर दंगे हुए जिसमें हजारों लोग मारे गए और तबाह हुए। यह सिलसिला चलता रहा और उसके फलस्वरूप प्रधानमंत्री बने अटल बिहारी वाजपेयी और गृहमंत्री-उपप्रधानमंत्री बने लालकृष्ण अडवाणी ने अपने सुनियोजित भड़काऊ बयानों से माहौल को बिगाड़ने में भूमिका अदा की। गुजरात को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाया गया। 
गोधरा की घटना के बारे में ८ मार्च के अंग्रेजी दैनिक ख्नटाइम्स आॅफ इंडियाज् में छपी अमरीकी अखबार ख्नवाशिंगटन पोस्टज् की खबर पर ध्यान देने की जरूरत है। ख्नवाशिंगटन पोस्टज् लिखता है कि ५८ लोगों को जिंदा जला दिए जाने की गुजरात ट्रेन-ट्रैजडी मुसलमान नौजवानों के पहले से घात लगा कर आक्रमण करने के कारण नहीं हुई। इस ट्रैजडी का कारण हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा झगड़ा उकसाना था जो काबू के बाहर हो गया। ख्नपोस्टज् लिखता हःै ख्नख्नदो दिनों तक साबरमती एक्सप्रेस उत्तर भारत के आर-पार रुकती-चलती गंतव्य की ओर जाती रही। एस ५ और एस ६ बोगियों में बैठे कुछ हिंदू कार्यकर्ता उपद्रवियों (हुलिगंस) जैसी हरकतें कर रहे थे। उन्होंने मुसलमान महिलाओं के सिर के आँचल खींच कर उतार दिए। उन्होंने चार सदस्यों के एक परिवार को ख्नश्रीराम-श्रीरामज् भजने से इनकार करने पर मध्यरात्री को बोगी से उतार दिया। कार्यकर्ताओं ने हर स्टेशन पर चाय और नाश्ते के पैसे नहीं दिए।ज्ज् ख्नपोस्टज् ने अपने ६ मार्च, २००२ के संस्करण में लिखा था कि २७ फरवरी को जब ट्रेन गोधरा रुकी तो वहाँ उपद्रवियों की पिछले स्टेशन से की जा रही हरकतों की जानकारी पहुँच गई थी। ट्रेन यात्रियों, प्रत्यक्षदर्शियों, पुलिस और रेलवे अधिकारियों से की गई मुलाकातों से यह लगता है कि ट्रेन में जो आग लगाई गई, वह मुसलमानों द्वारा पहले से घात लगाकर की जाने वाली आगजनी नहीं थी।
ख्नपोस्टज् ने गोधरा के एक पुलिस अधिकारी का हवाला देते हुए लिखा ख्नख्नदोनों पक्षों का ही दोष था। उकसाया गया था और उसकी प्रतिक्रिया ज्यादा हुई, लेकिन किसी ने भी यह सोचा तक नहीं था कि यह सब इतनी बड़ी ट्रैजडी का रूप ले लेगा।ज्ज् ख्नपोस्टज् ने आगे लिखा कि ख्नख्नगोधरा के डीएसपी बीके नानावटी ने यह कहा बताते हैं कि जाँच-पड़ताल से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस दावे का कोई प्रमाण नहीं मिलता कि ट्रेन पर हमला ख्नआतंकवादीज् आक्रमण था; वह पूर्वनियोजित नहीं था। यह तो अचानक उकसावे के कारण पैदा हुई घटना थी।ज्ज् ख्नपोस्टज् आगे लिखता है, ख्नख्नजैसे ही ट्रेन गोधरा पर रुकी, उपद्रव होने के सारे कारण बन चुके थे। ट्रेन कार्यकर्ताओं की हरकतों के कारण पाँच घंटा लेट हो गई थी, क्योंकि कार्यकर्ताओं की हरकतों की वजह से ट्रेन को कई बार रास्ते में रुकने को बाध्य होना पड़ा। गोधरा स्टेशन के ख्नवेंडरज् यह तय कर चुके थे कि वे अपने को उपद्रवियों का शिकार नहीं होने देंगे। उधर विश्व हिंदू परिषद के सदस्य भी ख्नकार्रवाई के लिए प्रस्तुतज् थे। ट्रेन के डिब्बों के फाटकों के नजदीक उन्होंने रेल लाइनों के बगल से पत्थर जमा कर उनका ढेर लगा रखा था। जब हिंदुओं ने चाय और नाश्ते के पैसे चुकाने से इनकार किया तो कई मुसलमान नौजवान ट्रेन के भीतर कूद पड़े और जब ट्रेन चल पड़ी तो उन्होंने जंजीर खींच दी। साबरमती एक्सप्रेस स्टेशन से आठ मील दूर एक मुसलमान मुहल्ले में सीत्कार करती हुई रुकी। झगड़ा शुरू हुआ और मुहल्ले के सैंकड़ों लोग इक्ट्ठा हो गए।ज्ज् ख्नपोस्टज् के अनुसार पुलिस और रेल अधिकारियों का कहना था कि वे यह नहीं जानते कि किसने पहले पत्थर फेंकने शुरू किए।
ख्नख्नलेकिन अधिकारियों का खयाल है कि दस मिनट बाद एक या उससे अधिक मुसलमानों ने एक गद्दे पर ज्वलनशील पदार्थ डाल कर उसे एस ५ और एस ६ बोगियों के बीच प्रज्वलित कर दिया। कुछ मिनटों बाद एस ५ बोगी की दूसरी तरफ एक अन्य स्थान पर आग दिखाई पड़ी। कुछ ही क्षणों में बोगियाँ आग की लपटों में घिर गईं। पुलिस अधिकारियों ने यह कहा बताते हैं कि उन्हें इस बात का ठीक पता नहीं है कि दूसरी आग कैसे लगी। नानावटी ने कहा कि यह संभव है कि मुसलमानों ने दूसरी आग लगाई हो या यह भी संभव है कि हिंदुओं ने आग का जवाब आग से देने की नीयत से बिना सोचे-समझे कि उनका अपना डिब्बा मिट्टी के तेल और खाना  पकाने की गैस से भरा है, दूसरी आग लगाई हो; ख्नख्नयह दुर्घटना भी हो सकती है।ज्ज्
मोदी के प्रशंसक कह सकते हैं कि यह विदेशी अखबार की रपट है जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। लेकिन मोदी के इन्हीं समर्थकों ने ब्लॉग ख्नदि वल्र्ड लाउड्स नरेंद्र मोदी ः एक्सर्ट्प्स फ्राम टाईम, ब्रुकिंग एंड इकॉनॉमिस्टज् पर उनकी विदेशी मीडिया में प्रकाशित प्रशंसाएं चस्पा की हुई हैं। ऐसा करते वक्त उन्हें जरूर आशा होगी कि जिस तरह से अंततः इंग्लैंड ने मोदी को स्वीकार कर लिया है, अमेरिका भी जल्दी ही उन्हें अपना लेगा। दुनिया में अनेक तानाशाहियों को कायम करने और आगे बढ़ाने वाला अमेरिका अपने सही मौके पर मोदी का स्वीकृति-तिलक क्यों नहीं कर देगा! हमें ख्नटाईमज् मैगजीन के हवाले से ही पता चला कि नरेंद्र मोदी ख्नाादी-शुदा हैं और अपनी पत्नी को छोड़े हुए है। लेकिन यह तथ्य समर्थकों ने ब्लॉग पर नहीं डाला है।   
उस समय की भाजपा नीत केंद्र सरकार समेत पूरा संघ संप्रदाय यह ख्नसिद्धज् करने में लग गया था कि इस घटना के लिए खुद मुसलमान, जो आतंकवादी होते हैं; और सेकुलर खेमा, जिसने गोधरा कांड की निंदा नहीं की, जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने नरसंहार पर मुख्यमंत्री और राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा किया, लेकिन ख्नउदारज् वाजपेयी ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। मोदी को हटाने की बात दूर, उनकी हौसला अफजायी की गई। नरसंहार पर मोदी को ख्नराजधर्मज् निभाने की नसीहत देने वाले प्रधानमंत्री वाजपेयी ने गोवा के पणजी शहर में हुई भाजपा की बैठक मेंं गोधरा कांड करने वालों तक ही अपनी चिंता को सीमित करते हुए सारा दोष मुसलमानों पर डाल दिया। यह कहते हुए कि गोधरा न होता तो गुजरात नहीं होता। गोधरा क्यों हुआ, इस पर औरों की तरह देश के प्रधानमंत्री ने भी ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा। जैसा कि ऊपर कहा गया है, मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी गोधरा नरसंहार को मुस्लिम आतंकवादियों की पूर्व-नियोजित करतूत बताया। वे अपराधियों की पहचान और सजा हो जाने के बाद आज भी वैसा ही प्रचार करते हैं। यह सही है कि देश में लश्करे तोएबा और आईएसआई जैसे पाकिस्तानी संगठन अपना जाल फैलाते हैं। गुजरात के नरसंहार के बाद गांधी नगर में अक्षरधाम मंदिर पर आतंकवादी हमला हुआ। नरेंद्र मोदी और प्रवीन तोगड़िया को निशाना बनाने का प्लाट उजागर हुआ। बाकी देश में भी कई आतंकवादी हमले गोधरा के पहले और बाद में हो चुके हैं। लेकिन उसकी रोकथाम की जिम्मेदारी भाजपा समेत सभी राजनीतिक पार्टियों की है। भाजपा और उसके नेता सांप्रदायिकता के सहारे राजनीति करेंगे तो दुनिया के हिंसक हालातों के चलते हिंदू-मुस्लिम समेत देश के सभी नागरिक असुरक्षित रहेंगे।   
गोधरा के बाद हुए नरसंहार के पक्ष में मोदी समर्थकों के दो मुख्य तर्क चलते हैं। पहला तो यही कि गोधरा के अपराधियों पर उसकी सारी जिम्मेदारी आती है। दूसरा यह कि कांग्रेस शासित अन्य राज्यों और केंद्र में कई बार ऐसा हो चुका है; गुजरात में ही कांग्रेसी राज में लंबे समय तक हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़के रहे; फिर मोदी को ही क्यों बदनाम किया जाता है और प्रधानमंत्री बनने से रोका जाता है? मोदी के बचाव में १९८४ में हुए सिखों के नरसंहार का हवाला सबसे ज्यादा दिया जाता है। हालांकि मोदी के प्रशंसकों से पूछा जा सकता है कि जिन राजीव गांधी का वे हवाला देते हैं, उन्हें दंगों के बाद अभूतपूर्व बहुमत से उन्होंने ही जिताया था। तब उन्हें मुसलमानों से भी ज्यादा अल्पसंख्यक सिखों की पीड़ा का खयाल नहीं आया। आरएसएस ने उस चुनाव में राजीव गांधी का खुल कर साथ दिया था। कारण साफ था - राजीव गांधी की जीत में हिंदू गौरव की जीत तो थी ही, अमेरिकी सपना पूरा होने की दिशा में भी रास्ता खुलता हुआ नजर आ रहा था। राजीव गांधी ने उन्हें निराश नहीं किया। मोदी पूरे हिंदुत्वी राजीव गांधी ही हैं, जो अमेरिका का प्रमाणपत्र पाने के लिए अपने समर्थकों के साथ दिन-रात एक किए हुए हैं।
कहने का आशय है कि देश के संविधान में आस्था रखते हुए उसके मुताबिक शासन चलाना होता है। सभ्य समाज में इसका कोई विकल्प नहीं है। लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री ने ऐसा नहीं किया। उनके पहले कुछ अन्य नेताओं ने भी ऐसा नहीं किया था, यह तर्क स्वीकार्य नहीं हो सकता। लिहाजा, हम गुजरात के दोनों नरसंहारों को भूलने के विरुद्ध हैं। इसमें कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए कि अगर मनुष्य अपने किए पर पछताता है तो उसके किए को भुलाने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन एक अकेले मनुष्य और एक नेता में फर्क होता है। मारे गए और तबाह हुए लोगों की जो भी पीड़ाएं रही हों, मोदी ने संविधान के प्रति अपराध किया, यह सच्चाई दर्ज रहनी चाहिए। उसे भुलाने का अधिकार उन लोगों (मोदी के प्रशंसकों) को नहीं दिया जा सकता जो खुद संविधान के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं।  
गुजरात कांड में जान और माल की भयानक तबाही के साथ औरतों के सामूहिक बलात्कार और फिर जिंदा जला देने की घटनाएं भी बड़े पैमाने पर हुईं। सिटीजंस इनिशिएटिव, अमदाबाद की ओर से महिलाओं के एक पेनल ने एक रपट जारी की। इस रपट में बलात्कार की शिकार या प्रत्यक्षदर्शी औरतों की गवाहियों (टेस्टीमोनियल्स) का संकलन किया गया है। इस रपट के कुछ हिस्से - तीन गवाहियाँ - १८ अप्रैल के ख्नहिंदुस्तान टाइम्सज् में ख्नमाई डॉटर वाज लाइक ए फ्लावरज् (मेरी बेटी फूल की मानिंद थी) शीर्षक से प्रकाशित हुए।
ख्नहिंदुस्तान टाइम्सज् में प्रकाशित तीनों गवाहियों का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है ः
ज् सामूहिक बलात्कार (नाबालिग लड़कियों सहित) को प्रत्यक्ष देखना, नरोदा पटिया, अमदाबाद, फरवरी २८ ः ख्नख्नहमें गंगोत्री सोसायटी से जबरन बाहर निकाला गया। उसके बाद भीड़ ने जलते हुए टायर लेकर हमारा पीछा किया। उसी दौरान उन्होंने बहुत-सी लड़कियों के साथ बलात्कार किया। हमने आठ-दस बलात्कार अपनी आँखों से देखे। हमने उन्हें सोलह साल की मेहरुन्निसा को निर्वसन करते देखा। वे लोग अपने कपड़े उतार रह थे और लड़कियों को इशारा कर रहे थे। उसके बाद उन्होंने वहीं सड़क पर उनके साथ बलात्कार किया। . . . बलात्कार के बाद लड़कियों को जला दिया गया। अब कोई साक्ष्य नहीं बचा है।ज्ज् (स्रोत ः कुलसुम बीवी, शाह-ए-आलम कैंप, २७ मार्च)
ख्नख्नमैंने गुड्डु चारा को फरजाना के साथ बलात्कार करते हुए देखा। फरजाना की उम्र तेरह साल थी। वह हुसैन नगर की रहने वाली थी। उन्होंने फरजाना के पेट में सरिया घोंप दिया। बाद में उसे जला दिया गया। बारह साल की नूरजहां के साथ भी बलात्कार किया गया। बलात्कारियों में गुड्डु, सुरेश, नरेश चारा और हरिया थे। राज्य परिवहन विभाग में काम करने वाले भवानी सिंह को भी मैंने पाँच आदमियों और एक लड़के की हत्या करते हुए देखा।ज्ज् (स्रोत ः अजहरुद्दीन, १३ साल, उसने बलात्कार के दृश्य उस समय देखे जब वह गंगोत्री सोसायटी की छत पर छिपा हुआ था। चारा बस्ती जवान नगर के बिलकुल पीछे स्थित है।)
चारा नगर और कुबेर नगर से आई भीड़ ने शाम छह बजे के करीब लोगों को जलाना शुरू कर दिया। भीड़ ने मेरी तेईस साल की बेटी सहित सभी लड़कियों को निवर्सन कर दिया और उनके साथ बलात्कार किया। मेरी बेटी की शादी तय हो चुकी थी। मेरे परिवार के सात सदस्यों को जला दिया गया। उनमें मेरी चालीस साल की पत्नी, अठारह, चैदह और सात साल के बेटे और दो, चार और बाईस साल की बेटियाँ शामिल थीं। बाद में सिविल अस्पताल में दम तोड़ देने वाली मेरी सबसे बड़ी बेटी ने बताया कि जिन्होंने उसके साथ बलात्कार किया वे निक्कर पहने हुए थे। उन्होंने उसके सिर पर प्रहार किया और फिर जला दिया। अस्सी प्रतिशत जली हालत में उसकी मौत हो गई। (स्रोत ः अब्दुल उस्मान, सिटीजंस इनिशिएटिव, अमदाबाद द्वारा रिकॉर्ड किया गया।)
ज् बलात्कार के बाद बची सुल्तानी का बयान, गाँव एराल, कल्लोल तालुका, पंचमहल, २८ फरवरी ः ख्नख्नहम करीब चालीस लोग २८ फरवरी की दोपहर बाद हिंसक भीड़ से बचने के लिए एक टैंपो में कल्लोल की तरफ भागे। मेरे पति फिरोज टैंपो चला रहे थे। कल्लोल के बिल्कुल बाहर एक मारुति कार ने सड़क पर रास्ता रोका हुआ था। भीड़ इंतजार में लेटी हुई थी। फिरोज को टैंपो मोड़ना पड़ा और वह उलट गया। जैसे ही हम बाहर आए उन्होंने हमें मारना शुरू कर दिया। लोग चारों तरफ भागे। हम कुछ लोग नदी की तरफ भागे। मैं पीछे रह गई क्योंकि मैंने अपने बेटे फैजान को उठाया हुआ था। भीड़ के लोगों ने मुझे पीछे से पकड़ कर जमीन पर पटक दिया। फैजान मेरी गोद से गिर गया और और रोने लगा। उन लोगों ने मेरे कपड़े उतार कर मुझे निवर्सन कर दिया। उन्होंने एक के बाद एक मेरे साथ बलात्कार किया। पूरे समय मैं अपने बच्चे का रोना सुनती रही। तीन बलात्कारियों के बाद में गिनती भूल गई। उसके बाद तेज धार हथियार से उन्होंने मेरा पैर काट डाला और मुझे उसी हालत में छोड़ कर चले गए। (स्रोत ः सुल्तानी, कल्लोल कैंप, पंचमहल, ३० मार्च। इस मामले में डीएसपी को लिखित स्टेटमेंट देने के बावजूद अभी तक एफआईआर नहीं लिखी गई है। सुल्तानी ने देलोल गाँव के जीतू शाह और रामनाथ गाँव के अशोक पटेल के नाम भी लिए हैं।)
ज् माँ द्वारा अपनी बेटी के बलात्कार का विवरण, गाँव एराल, कल्लोल तालुका, पंचमहल, ३ मार्च ः ख्नख्नमेरे अवकाश-प्राप्त शिक्षक ससुर ने २८ फरवरी को बाकी मुसलमानों के साथ गाँव छोड़ कर कल्लोल जाने से इनकार कर दिया। उन्हें विश्वास था कि हमें कोई नुकसान नहीं पहुँचाएगा। मेरे परिवार के १३ सदस्यों ने २८ फरवरी से लोगों के घरों और खेतों में शरण ले रखी थी। जिस झोंपड़ी में हम छिपे थे, ३ मार्च को दोपहर बाद उस पर हमला हुआ। हम अलग-अलग दिशाओं में भागे और खेतों में छिप गए। लेकिन भीड़ ने हम में से कुछ को पकड़ लिया। . . . हमला होने पर मैंने अपने परिवार के लोगों को जान बख्शने के लिए चिल्लाते सुना। मैंने अपने गाँव के दो लोगों गनो बरिया और सुनील को अपनी बेटी शबाना को खींच कर ले जाते देखा। वह उन लोगों से उसे छोड़ देने के लिए चिल्ला रही थी। . . . अपनी इज्जत की भीख माँगती रुकैया, सुहाना, शबाना की आवाजें साफ सुनी जा सकती थीं। मेरा दिमाग भय और उत्तेजना से भर गया था। मैं अपनी बेटी की इज्जत और जान बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकी। . . . मेरी बेटी फूल की मानिंद थी। अभी तो उसे जीवन जीना था। उन्होंने उसके साथ ऐसा क्यों किया? ये कैसे लोग हैं? राक्षसों ने मेरी बेटी के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। कुछ समय के बाद भीड़ कह रही थी, ख्नइनके टुकड़े-टुकड़े कर दो, कोई भी सबूत बचे नहीं।ज् मैंने देखा कि आग लगा दी गई है। . . .ज्ज् (स्रोत ः मदीना मुस्तफा इस्माइल शेख, कल्लोल कैंप, पंचमहल्स, ३० माच २००र्२)
यह सब हमें नहीं भूलना चाहिए ताकि आगे ऐसा न हो। यह सही है कि किसी व्यक्ति या समाज को अतीत का बंदी नहीं होना चाहिए। अतीत का बंदी होकर वर्तमान में नहीं जिया जा सकता। जो जीने की कोशिश करते हैं वे सामान्य नहीं रह पाते और यदि उनके पास सत्ता आ जाए तो मनुष्यताञ्चमानव सभ्यता को क्षतिग्रस्त और विकृत कर सकते हैं। अतीत से प्रेरणा और सबक लेकर वर्तमान में जीते हुए भविष्य में कदम रखना ही सामान्यतः सही माना जाता है। जो मोदी के नेतृत्व में राज्य प्रायोजित नरसंहार को भूलने की बात पिछले दस सालों से कर रहे हैं, उन्हें इस पर विचार कर लेना चाहिए।  
गुजराती गौरव का तिलस्म
मोदी की यह बड़ी कामयाबी है कि उन्होंने नरसंहार के बाद से गुजराती गौरव का एक तिलस्म रचा हुआ है। उस तिलस्म के तहत पूरा गुजरात उनके इशारों पर नाच रहा है। मोदी का रचा यह गुजराती गौरव मोदी का बंधक है। उन्होंने हिंदुत्व के गौरव को गुजराती गौरव बना कर पेश किया है। मोदी ने गुजरातियों के जेहन में उतार दिया है कि मेरे साथ नहीं रहोगे तो हत्या, लूट, बलात्कार करने वाले कहलाओगे। आइए इस परिघटना पर थोड़ी चर्चा करें। 
मोदी ने नरसंहार के दस महीने बाद हुआ विधानसभा चुनाव जीता। ख्नजो आग मेरे सीने में जली है, वही तुम्हारे सीने में भी जली हुई हैज् जैसे जुमलों से मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़काए रख कर और फिर दूसरा और अब तीसरा चुनाव भी जीता। हमारा इस बीच अलग-अलग समय पर तीन-चार बार गुजरात जाना हुआ। जैसा कि देश के दूसरे हिस्सों से जाने वाले सभी का अनुभव है, हमारा भी रहा कि गुजरात में ज्यादातर लोग मोदी के मुस्लिम-मर्दन से अकड़े हुए मिलते हैं। लेकिन मामला उतना भर नहीं है। महज उतना होता तो अकड़ अब तक ढीली पड़ चुकी होती।
गोधरा कांड के बाद से नरोदा पटिया के फैसले तक, एक के बाद एक सबूत मोदी की संलिप्तता और षड़यंत्र के आते रहे हैं। ध्यान देने की जरूरत है कि मोदी ने जितने इंटरव्यू और वक्तव्य इस मामले में दिए हैं, वे सब गुजरातियों को संबोधित हैं। उनके साक्षात्कारों और वक्तव्यों का संदेश है कि वे (मोदी) निर्दोष हैं तो वे गुजराती भी निर्दोष हैं, जिन्होंने हत्या, लूट और बलात्कार में हिस्सा लिया। मोदी में सारे गुजराती और सारे गुजरातियों में मोदी समाहित हैं। ख्नतहलकाज् पत्रिका में बाबू बजरंगियों के मुंह से नरेंद्र मोदी ही बोल रहे थे। यह सही है, जैसा कि मोदी और उनके समर्थक कहते हैं, कि झूठी मुठभेड़  अन्य राज्यों में भी खूब होती हैं। लेकिन गुजरात की झूठी मुठभेड़ों (विशेष संदर्भ शोहराबुद्दीन शेख मामला और इशरत जहां मामला) को अंजाम देने वाले पुलिस अधिकारियों और नेताओं के भीतर मोदी बैठे थे। नरेंद्र मोदी नहीं होते तो बाबू बजरंगी जैसों की हिम्मत नहीं होती कि वे इतनी शान से मनुष्यता के प्रति किए गए अपराध का विज्ञापन करें। न ही डी.जी. वनजारा जैसे पुलिस अधिकारियों और अमित शाह जैसे नेताओं की वह करने की हिम्मत होती जो उन्होंने किया। न ही मायाबेन कोडनानी, जिन्हें २८ फरवरी २००२ को नरोदा पटिया में ९७ मुसलमानों, जिनमें ३६ महिलाएं और ३५ बच्चे थे, की हत्या के लिए १० साल बाद २८ साल की जेल हुई है, राज्य की स्त्री एवं बाल विकास मंत्री बनतीं। 
एक और बात की ओर हम आपका ध्यान दिलाना चाहते हैं कि इस नरसंहार और उसका गौरव मनाने में मोदी और उनके गर्वीले गुजरातियों ने गांधी को भी लात लगाई है। गांधी के चिंतन और कामों में अहिंसा और हिंदू-मुस्लिम एकता केंद्रीय हैं। इन दोनों को तोड़ कर उन्होंने गांधी को अपने साथ गुजराती गौरव में जोड़ लिया है। वही सलूक सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ किया गया है। पटेल ने गांधी की हत्या होने पर आरएसएस पर आरोप और प्रतिबंध लगाया था। मोदी और उनके गर्वीले गुजरातियों ने सरदार को भी अपने में मिला लिया है। इसी अर्थ में उद्योगपति अंबानी ने ख्नवाइब्रेंट गुजरातज् जमावड़े में मोदी को गांधी और पटेल सरीखा बताया है!
समर्थकों को राजनीतिक बचपना देखने लायक है। मोदी बिना सलाह और संवाद के सरकार चलाते हैं। न उनका कोई दोस्त है, न किसी के प्रति उनके मन में आदर है। सांप्रदायिक फासीवाद के साथ तानाशाही, जितनी वे चला सकते हैं, के मिश्रण का नाम नरेंद्र मोदी की हुकूमत है। मोदी को राजनीतिक सहयोगी नहीं, अनुचर चाहिए। वैसे ही प्रशासक। गुजरात के वरिष्ठ नेताओं को उन्होंने नेपथ्य में धकेल दिया है। हरेन पंड्या की हत्या में उनकी पत्नी ने मोदी का हाथ मानते हुए उन्हें उस समय अपने घर से वापस कर दिया था जब वे अफसोस जताने आए थे। वे थोड़ा भी विरोध करने वालों को दुश्मन मानते हैं। मोदी पिछले १० सालों से जिस शैली में गुजरात का शासन चला रहे है, क्या प्रशंसक मानते हैं कि उसमें देश भी चलाया जा सकता है?  
मोदी के समर्थक उन्हें माफ कर देने की बात नहीं कहते; न ही मोदी ने कभी वैसी पेशकश की है; समर्थक चाहते हैं मोदी बतौर प्रधानमंत्री देश को गुजरात जैसा खुशहाल और प्रशासन-क्षम बनाने की योग्यता रखते हैं, जो और किसी में नही है। इस बीच एक सवाल सबने पूछा है कि मोदी माफी क्यों नहीं मांग लेते? सभी जानते हैं राजनीति में माफी दिल से नहीं मांगी जाती। वह वोटों के लिए मांगी जाती है। जैसे कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने १९८४ के नरसंहार के २५ साल बाद सिखों से मांगी। इस नसीहत के साथ कि उस नरसंहार की घटना को भूल जाना चाहिए। इस तरह की माफी से न पीड़ाएं कम होती हैं, न आगे कट्टरता पर रोक लगती है। राजनीति में माफी कई बार समय की नदी के बह कर समुद्र में गिर जाने के बाद मांगी जाती है। जैसे कि पिछले दिनों इंग्लैंड की महारानी ने जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए भारत से माफी मांगी। पछतावा, प्रायश्चित, माफी का जीवन में बड़ा अहम स्थान होता है, जो मनुष्य के जीवन को सुधारता और निखारता है; कई बार उसे उदात्त बना देता है। लेकिन राजनीति में यह सब और नीचे गिरने का खेल होता है। मोदी माफी मांग भी लेते तो उसका कम से कम पीड़ितों के लिए कोई महत्व नहीं होना था।
मोदी का माफी नहीं मांगना उनकी गुजराती गौरव की राजनीति से जुड़ा हुआ है। माफी मांगते ही उनका तार गुजराती गौरव से कट जाता। अभी उन्हें वह तार जोड़े रखना है। जब तक दिल्ली न पहुंच जाएं। तीसरा चुनाव जीतने पर उन्होंने जो उड़ती-सी माफी मांगी है, वह मुसलमानों से नहीं है। उन्होंने कहा है, ख्नख्नकिसी वक्त मैंने किसी को दुख पहुंचाया हो या कोई गलती की हो, उसके लिए मैं ६ करोड़ गुजरातियों से माफी मांगता हूं।ज्ज् अगर मामला एकाध का दिल दुखाने या गलती करने का है तो ६ करोड़ से माफी क्यों? जाहिर है, उन्हें गुजराती गौरव की ज्वाला को जलाए रखना है। हालांकि १० साल के लंबी अवधि के बाद यह भी हो सकता है कि खुद मोदी उस गुजराती गौरव के बंधक बन जाएं जिसे उन्होंने अपना बंधक बनाया हुआ है। देश का प्रधानमंत्री पद तो छोड़िए, गुजरात के बाहर कोई उन्हें पूछे ही नहीं। हो यह भी सकता है कि खुद उनकी पार्टी उन्हें गुजराती गौरव के बंधन में तब तक कैद रखे जब तक वे उसी में छटपटा कर शेष नहीं हो जाते! 
गुजराती गौरव के तिलस्म को थोड़ा और खोला जा सकता है। मोदी और उनके समर्थक यह संकेत देते हैं कि मोदी और वे चाहते तो एक भी मुसलमान नहीं बचता? मोदी ने ख्ननई दुनियाज् को दिए इंटरव्यू में हिंदुओं को अपना गुस्सा निकाल लेने देने के अधिकारियों को दिए संदेश को झूठ बताते हुए कहा कि यह सोचो कितने मुसलमान बचा लिए गए। अगर योजनाबद्ध तरीके से मारा जाता तो आज कौन बचा होता? यह पूछा जाने पर कि क्या भारत, पाकिस्तान और बंगला देश को एक हो जाना चाहिए तो मोदी ने कहा है कि तुम लोगों के मुंह में पानी आ रहा है कि तीनों देशों के मुसलमान मिल कर भारत में तनाव पैदा करें।
भारत में कई धर्मों के लोग रहते हैं। लेकिन वे नागरिक भी हैं; बल्कि राजनेता के लिए पहले नागरिक हैं, यह सोच ही मोदी की नहीं है। लेकिन समर्थक हैं कि उन्हें अपरिहार्य रूप से देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं। जाहिर है, वे आर्थिक रूप से ख्नाक्तिशाली मध्यवर्ग, जो पिछले करीब तीन दशकों में फला-फूला है, को ही देश मानते हैं। मध्यवर्ग को और ख्नाक्तिशाली बनाते जाने के लिए उन्हें मोदी चाहिए। मध्यवर्ग फैलेगा और ख्नाक्तिशाली बनेगा तो आबादी के किसी न किसी समूह का सफाया होगा। रेड इंडियनों से लेकर यहूदियों के सफाए तक की नजीरें इस आधुनिक सभ्यता के पास हैं। मनमोहन सिंह नवउदारवाद में तो अडिग हैं, लेकिन अभी तक अढ़ाई-तीन लाख किसानों की ही आत्महत्याएं करवा पाए हैं। इस तरह से तो जगह खाली होने में बड़ा समय लगेगा। एक झटके में काम तमाम होना चाहिए। मोदी आएंगे तो मुसलमानों का काम तमाम करेंगे! 
भारत का मध्यवर्ग समृद्ध और साक्षर तो हो गया है, उसका छिछोरापन नहीं जाता। खास कर महिलाओं पर, जो कुछ स्वतंत्र और सजीली होती हैं, हल्की टिप्पणियां करना ज्यादातर की आदत में ख्नाुमार है। मोदी ने हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान मंडी में ख्नाशि थरूर की पत्नी के बारे में अशोभनीय टिप्पणी की। कोई संदर्भ भी नहीं था। लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनाने वालों को उसमें कुछ भी गलत नहीं लगता। भारत में यह सामान्य प्रवृत्ति है कि जो गरीब और पिछड़ी पृष्ठभूमि से आते हैं, अंग्रेजीदां लोगों से चिढ़ते हैं। अगर किसी की पत्नी भी अंग्रेजीदां हो तो उस पर पहले भड़ास निकालते हैं। मंडी के अपने भाषण में मोदी ने वही किया।
ऐसे लोगों की दशा बड़ी खराब होती है - चिढ़ेंगे भी और पिछलग्गू भी बनेंगे। अभी मोदी मुख्यमंत्री हैं और उन पर गुजराती गौरव का नशा है। वे उद्योगपतियों द्वारा की जाने वाली प्रशंसा की बौछार का मजा ले रहे हैं। उद्योगपति जानते हैं मोदी को उनका हुक्म बजाना ही है। वे जब तक उनका हुक्म बजाएंगे, यानी सत्ता में रहेंगे, तब तक उद्योगपति उनकी तारीफ करेंगे। जिस दिन सत्ता से बाहर हो जाएंगे, पहचानेंगे भी नहीं।    
मोदी पर दोषारोपणों में अतियां और राजीनति हो सकती है; उन्हें लगाने वालों की अपनी साख नहीं हो सकती है - वे चाहे कांग्रेसी हों, क्षेत्रीय क्षत्रप हों, या एनजीओ वाले; लेकिन मोदी के समर्थकों की मुहिम पूरी तरह तथ्यों से आंख चुरा कर प्रत्यारोप लगाने और गुमराह करने वाली है। यह सही है कि एनजीओ वालों के धन के स्रोत संदिग्ध और विवादास्पद होते हैं। लेकिन मोदी समर्थकों का उन्हें कटघरे में खड़ा करने का मुंह नहीं है। जब आपको नवउदारवाद मंजूर है तो एनजीओ उस व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। मोदी के समर्थकों से समाजवाद के समर्थन की उम्मीद नहीं की जा सकती; लेकिन क्या मोदी की अंधभक्ति करते हुए वे संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की परवाह करते हैं? यह भी छोड़िए, क्या वे न्यूनतम नागरिक मूल्यों और तकाजों में यकीन करते हैं? अगर करते हैं तो मोदी के प्रशंसक कैसे हो सकते हैं? हत्याओं और षड़यंत्रों के बल पर कुछ समय के लिए एक राज्य की सरकार चलाई जा सकती है, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय में कोरा षड़यंत्र नहीं चल सकता। उद्योगपति और नौकरशाह ही सबसे पहले ऐतराज उठा देंगे। केवल फायदा पहुंचा कर सबको खुश नहीं रखा जा सकता, क्योंकि फायदा सबको नहीं पहुंचाया जा सकता। हैरत और अफसोस होता है कि जो शख्स अपने नागरिकों को बांट कर देखता है, उसे देश की बागडोर देने के लिए लोगों ने घोड़े खोले हुए हैं।
मोदी के प्रशंसकों का उत्साह देखने लायक है, जो आगे भी बना रहना है। इसके निश्चित कारण हैं। आधारभूत कारण तो यही है कि आगे गांधी के नहीं, मनमोहन-मोदी के सपनों का भारत बनना है, जिसकी दिशा पिछले करीब तीन दशकों में निर्णायक रूप से तय हो चुकी है। मोदी के युवा प्रशंसक इसी नवउदारवादी दौर की उपज हैं। मुख्यधारा और सोशल मीडिया दोनों उनके हाथ में हैं। इसके चलते उस विशाल युवा शक्ति का वजूद और आवाज प्रभावी नहीं हो सकते, जिसका इस दौरान बड़े पैमाने पर बाह्यीकरण (एक्सक्लूजन) हुआ है। इस युवा शक्ति की कोई राजनीतिक पार्टी देश में नहीं है। जैसे उनका श्रम सस्ते में खरीदा जाता है, वैसे ही वोट भी ले लिया जाता है। उनके ऊपर प्रशंसकों द्वारा मोदी थोप दिया जाना है। दूसरा महत्वपूर्ण और प्रकट कारण है - देश में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की राजनीति का पराभव। इसके चलते देश की राजनीति के केंद्र में भारतीय संविधान के निर्देश न रह कर, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आदेश आ गए है। तीसरा तात्कालिक कारण पिछले दो साल में हुआ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन है, जो भ्रष्टाचार का तो कुछ नहीं कर पाया, उसके सूरमाओं ने मोदी की ख्नजयगाथाज् को आसमान पर पहुंचा दिया है। (इसके विस्तृत अध्ययन के लिए हमारी जल्दी प्रकाशित होने वाली पुस्तक ख्नभ्रष्टाचार विरोध ः विभ्रम और यथार्थज् देखी जा सकती है जिसमें भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर समानांतर रूप से लिखे गए हमारे करीब एक दर्जन लेख संकलित हैं।) अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, श्रीश्री रविशंकर, किरण बेदी, चेतन भगत, अरविंद केजरीवाल जैसे एनजीओ और धर्म का धंधा करने वालों ने युवाओं को सपना दिखाया है कि वे उन्हें भ्रष्टाचार रहित नवउदारवादी भारत बना कर देंगे। इस गारंटी के साथ कि उसमें हिंदू, अगड़ा और पुरुष वर्चस्व कायम रहेगा।
चैथा कारण तीसरे से जुड़ा है। जबकि जरूरत मोदीञ्चसांप्रदायिकता के एकजुट और निर्णायक विरोध की है, कई माक्र्सवादी-समाजवादी-गांधीवादी नेता, बुद्धिजीवी, पत्रकार और जनांदोलनकारी अपने इन नए नेताओं को मोदीञ्चसांप्रदायिकता विरोधी बनाने के फेर में न घर के रहे हैं, न घाट के। उनमें कुछ ख्नभ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की राखज् से पैदा होने वाली राजनीतिक पार्टी में शामिल हो गए हैं और नवउदारवाद के प्रतिरोध की धारा और ताकत को तोड़ने में लगे हैं। उनकी ख्ननई राजनीतिज् पूंजीवाद के नए रूप नवउदारवाद, जिसे कारपोरेट पूंजीवाद व नवसाम्राजयवाद भी कहा जाता है, की मुख्यधारा में जगह बनाने की कवायद है। जाहिर है, उसके विचारधारात्मक और आर्थिक स्रोत नवउदारवाद में निहित हैं। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि केजरीवाल के कुछ लोग कट-पेस्ट करके उसे ख्ननया समाजवादज् बताने लगें। कट-पेस्ट कला के माहिर ऐसे लोग कांग्रेस और राहुल गांधी को भी कभी वामपंथी, कभी समाजवादी, कभी गांधीवादी आदि बताने लगते हैं। ख्ननई राजनीतिज् की नई दुकान नहीं चलने पर उनकी घर वापसी हो सकती है। लेकिन उससे मोदी के प्रशंसकों का उत्साह कम होने नहीं जा रहा है।        
विकास की मरीचिका
मोदी की पीआर टीम ने उनकी प्रशंसा और समर्थन का सर्वप्रमुख आधार उनके द्वारा किए गए गुजरात के विकास को बनाया है। २००८ में नैनो कार के निर्माण के लिए टाटा कंपनी को गुजरात बुलाने की सफलता को विकास के उद्यम में उनकी सबसे बड़ी जीत बताया जाता है। जाहिर है, अमीरों के विकास की जो मुहिम नवउदारवाद के तहत चल रही है, मोदी उसमें मनमोहन सिंह के महत्वपूर्ण साथी हैं। सभी जानते हैं कि गुजरात मोदी को वहां मुख्यमंत्री बनाए जाने के पहले से उद्योग और व्यापार में कुछ अन्य राज्यों के साथ आगे रहा है। पता चलता है कि मोदी के समय में गुजरात की विकास दर अधिकतम १२ प्रतिशत हुई है, जबकि १९९२-९३ में वह १६.७५ प्रतिशत थी। नवउदारवादी दौर में कारपोरेट घरानों को लूट की खुली छूट देकर उच्च और मध्यवर्ग को और अमीर बनाया जाता है। ऐसे में किसानों, आदिवासियों, दलितों, मजदूरों, कारीगरों, लघु उद्यमियों, दुकानदारों और उनके बेटे-बेटियों को कीमत चुकानी ही पड़ती है, जो गुजरात में भी चुकाई जा रही है। ऊंची विकास दर कुपोषण, अशिक्षा और बेरोजगारी कम नहीं करती। गुजरात में भी वही स्थिति है।
महिलाओं में कुपोषण पर मोदी महिलाओं द्वारा ख्नडाइट्रिगज् की बात करके हवा में उड़ाने की कोशिश करते हैं, लेकिन क्या गुजरात में कुपोषित बच्चे भी डाइटिंग करते हैं! २०११ की मानव विकास रपट में बताया गया है कि गुजरात में भूख और कुपोषण की समस्या देश के अन्य बड़े राज्यों से ज्यादा है। गुजरात में लगभग ४५ प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं। उत्तर प्रदेश से ज्यादा बच्चे गुजरात में भूखे पेट सोते हैं। मोदी के शासन काल में शिशु और मां की मृत्यु दर अन्य राज्यों से ज्यादा है। गुजरात में लाइफ एक्सपेक्टेंसी राष्ट्रीय औसत (६६ साल) से दो साल कम है। मोदी के २००१ में गुजरात का शासन सम्हालते वक्त साक्षरता में गुजरात का सत्रहवां स्थान था, जो अब अठारहवां हो गया है।
मोदी के शासन में मुसलमानों के विकास का तर्क भी दिया जाता है। मुसलमानों के लिए केंद्र की १५ योजनाओं को लागू करने से मोदी ने यह कह कर इनकार कर दिया कि इससे राष्ट्र के सामाजिक तानेबाने में तनाव पैदा होगा। केंद्र की मुसलमान छात्रों के लिए निर्धारित ५३ हजार छात्रवृत्तियों को भी मोदी ने लागू करने से इनकार कर दिया। भूख, गरीबी, शिक्षा, रोजगार के पैरामीटर पर सुरक्षा के मामले में विकास दर का लाभ मुसलमानों को नहीं मिला है। सच्चर कमेटी की रपट में बताया गया है कि गुजरात में मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति राष्ट्रीय औसत से पिछड़ी है। गुजरात में शहरी गरीबी का अनुपात राष्ट्रीय अनुपात लगभग २१ प्रतिशत के मुकाबले १८ प्रतिशत है, लेकिन उनमें (शहरी गरीबों में) मुसलमान ४२.४ प्रतिशत हैं। राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत ३९.९ प्रतिशत है।  
हाल में हुए गुजरात विधानसभा चुनावों में कई लेखों और रपटों में आंकड़ों और तथ्यों के साथ बताया गया कि गुजरात का विकास एक मिथक है जिसे मोदी और उनकी पीआर टीम ने सुनियोजित ढंग से खड़ा किया है। इस ख्नमिथकज् को आगे रख कर उन्होंने मोदी के समर्थन की मुहिम चलाई हुई है। मोदी के प्रशंसक जानकर यह सब कर रहे हैं। उनका संविधान से तो वास्ता है ही नहीं, भविष्य से भी वास्ता नहीं है। वे विकसित भारत देखना चाहते हैं और उसे सांप्रदायिकता के साथ पाने में कोई बुराई नहीं देखते। उनके अवचेतन में यह इच्छा पल रही हो सकती है कि जब विकास संभव नहीं हो पाएगा तो सफाया होगा। आत्महत्याएं कारगर रास्ता नहीं हैं; मुसलमानों को साफ करने से वह हो सकता है। सच्चर कमेटी ने बता ही दिया है कि कि मुसलमान दलितों से भी पिछड़े हैं। जिस तरह की घृणा गुजरात में हिंदुत्व की प्रयोगशाला में ढल कर आई है, उसे मोदी पूरे भारत पर लागू करेंगे!
दरअसल, भारत में विकास एक मरीचिका बना हुआ है जो हाथ नहीं आती, लेकिन जिसे पाने की लालसा में सबसे गरीब से लेकर सबसे अमीर तक दिन-रात जुटा रहता है। मोदी ने पिछले दिनों गुजरात में देश-विदेश के पूंजीपतियों का जमावड़ा किया। निवेशकों ने मोदी पर प्रशंसा की बौछार की। मोदी और मीडिया ने जमावड़े को इस तरह प्रोजेक्ट किया मानो उन्हें मिला जनादेश पूंजीपतियों को जुटाने और उनकी प्रशंसा पाने के लिए था। जमावड़े का संदेश भी साफ तौर पर प्रसारित किया गया कि पूंजीपतियों को ही जनता की सेवा करनी है; जो नेता जितने पूंजीपति जुटा सकता है, वह उतना ही बड़ा जनता का सेवक है। कांग्रेस ने इस ख्नचुनौतीज् को तुरंत स्वीकारा और हिटलर का हवाला देकर कोपोरेट जगत को दक्षिणपंथियों के साथ ख्नफ्लर्टज् नहीं करने की सलाह दी। कांग्रेस ने तुलना का आदर्श विदेशी निवेश ही रखा है और बताया है कि महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक निवेश के मामले में गुजरात से आगे हैं।
अगर होड़ का पैमाना विदेशी निवेश है तो कल गुजरात आगे निकल सकता है। क्योंकि मोदी को पूंजीवादी विकास के स्वरूप और रास्ते में जरा भी संदेह नहीं है। बाकी पिछड़े नेता कहीं न कहीं हिचक जाते हैं। सोशल इंजीनियरी का यह नया सोपान है कि गरीब और पिछड़ी पृष्ठभूमि का नेता नवउदारवाद की पूरमपूर वकालत कर रहा है। इसमें केवल उसकी आरएसएस की ट्रेनिंग का ही योगदान नहीं है, पिछले तीन दशकों से जारी नवउदारवाद के पुरोधाओं की भी भूमिका है। वणिक पूंजीवाद की जगह कारपोरेट पूंजीवाद का पाठ उसे राजीव गांधियों-मनमोहन सिंहों और नवउदारवाद के अंधसमर्थक बुद्धिजीवियों ने पढ़ाया है। ख्नविकास पुरुषज् नरेंद्र मोदी मनमोहन सिंह के शुरू से प्रिय रहे हैं।
इस बार के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने अपने भाषण में गुजरात में अल्पसख्यकों को पूरी तरह सुरक्षित बताया। इस शख्स का दिमाग कैसे चलता है, इस पर शोध की जरूरत है। क्या वे कहना चाहते हैं कि २००२ का गुजरात, जो मोदी को मिला था, अविकसित था इसीलिए इतने मुसलमान मारे गए? क्या उनका आशय है कि अब, जबकि गुजरात नवउदारवादी रास्ते पर विकसित हो चुका है, नरसंहार या दंगे नहीं होंगे? क्या वे यह विश्वास व्यक्त कर रहे हैं कि २००२ में मुसलमानों की हत्या और लूटपाट करने वाला अब ख्नमोटाज् हो चुका मध्यवर्ग वैसा नहीं करेगा? क्या मनमोहन सिंह कहना चाहते हैं कि मारे गए मुसलमान विकास की कीमत हैं; जैसे कि किसानों की आत्महत्याएं और अपने जल, जंगल, जमीन को बचाने के लिए लड़ने वालों की पुलिस फायरिंग में मौतें विकास की कीमत हैं? प्रधानमंत्री के इस बयान का हवाला हमने यह कहने के लिए दिया है कि मनमोहन सिंह और मोदी एक ही हैं।    
दलित भी नरेंद्र मोदी के प्रशंसक हो सकते हैं। क्योंकि वे दलित मुसलमानों और ईसाइयों को आरक्षण मिलने का स्वाभाविक और निर्णायक विरोध करेंगे तथा निजी क्षेत्र में दलितों के आरक्षण का समर्थन। गुजरात नरसंहार के बाद वहां १० महीने बाद हुए विधानसभा चुनावों में अकेले मायावती ने मोदी के समर्थन में चुनाव प्रचार करने की ख्नहिम्मतज् दिखाई थी। गुजरात में वे बसपा का ज्यादा प्रचार-प्रसार करती भी नहीं दिखतीं। मोदी बाकी नेताओं की तरह कारपोरेट घरानों को गुजरात सौंपने का आतुर हैं; आर्थिक रूप से मजबूत मध्यवर्ग को और मजबूत बनाते जाने का उनका भी संकल्प है; इस प्रक्रिया में तबाह होने को अभिशप्त दलितों-आदिवासियों को उन्होंने हिंदुत्व का ख्नसुरापानज् करा दिया है; वे भी कहते हैं ख्नमेरे पास मोदी हैज्। पिछड़े नेताओं में यह काम केवल उन्होंने किया है। मायावती को हिंदुत्ववादी राजनीति में शुरू से ही अपना सुनहरा भविष्य दिखाई देता है। वे वाकई दूरदृष्टि वाली नेता है! 
मोदी के प्रशसंक कोई तर्क सुनने को तैयार नहीं हैं। संविधान और उसमें निहित समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का तो कतई नहीं। वे इस ख्नसच्चाईज् में पूरे पगे हैं कि देश संविधान से नहीं, बाजार से चलता है। पहले ही काफी देर हो चुकी है, अब भारत को बाजार का कहार बनने में जरा भी देरी नहीं करनी चाहिए। सांप्रदायिकता का उसमें रोल है, यह उन्होंने स्वीकार किया है। इसीलिए उन्हें मनमोहन के बाद या साथ मोदी चाहिए। हमारा आग्रह है कि मोदी के प्रशंसकों को थोड़ी हिम्मत और दिखानी चाहिए - संविधान को नकारने की। मनमोहन सिंह ने एक बार फिर हाल में कहा कि ख्नसमाजवादज् जैसी पुरानी विचारधारा की बात करना बेमानी है। कारपोरेट पूंजीवाद में निश्चित ही मनमोहन सिंह की विशेषज्ञता सबसे ज्यादा है। मोदी उनके प्रिय हैं, लेकिन उनके सामने बच्चे हैं। मोदी की विशेषज्ञता सांप्रदायिक फासीवाद में है। प्रशंसकों को यह दबाव बनाना चाहिए कि मनमोहन सिंह यानी कांग्रेस और मोदी यानी भाजपा मिल कर प्रस्ताव लाएं कि संविधान की प्रस्तावना में पूंजीवाद कायम करने का लक्ष्य लिखा जाए और उसकी प्राप्ति में  कारपोरेट घरानों का अहम जिम्मा तय किया जाए। वह लक्ष्य सांप्रदायकिता, जातिवाद, क्षेत्रवाद-भाषावाद या इन सभी को मिल कर हासिल करने में कोई संवैधानिक अड़चन नहीं हो। मोदी के प्रशंसक दोगलेपन से काम न लें। जो चाहते हैं, उसे उसी रूप में कहें। तब उनसे कोई जिरह नहीं करेगा।
मोदी से नहीं लड़ पाने के दो कारण स्पष्ट हैं। भाजपा से इतर राजनीतिक नेताओं और पार्टियों का मुसलमानों को वोट बैंक मानना और पूरी मुख्यधारा राजनीति का पूंजीवादपरस्त होना। अगर भारत में सांप्रदायिक फासीवाद रोकना है तो नवउदारवाद रोकना होगा। इसके लिए नेताओं में संवैधानिक और सैद्धांतिक प्रतिबद्धता चाहिए। सामान्य प्रवृत्तियां, मसलन, संप्रदायवाद, धर्मनिरपेक्षतावाद, उदारवाद आदि व्यक्तियों और संगठनों का औसत रूप होती हैं। धर्मनिरपेक्षतावादियों की अगर व्यक्ति अथवा संगठन के रूप में भूमिका अल्पकालिक सोच और लक्ष्य से परिचालित होगी तो दीर्घकालिक फायदा नहीं हासिल किया जा सकता। नेताओं से लेकर बुद्धिजीवियों, जनांदोलनकारियों, नागरिक समाज एक्टिविस्टों तक अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं, जो अल्पकालिक सोच और लक्ष्य से परिचालित हैं। धर्मनिरपेक्षता के ज्यादातर फुलटाइमर एनजीओ वाले तो होते ही हैं, वे कांग्रेस की गोद में भी बैठे होते हैं। अन्ना हजारे की प्रशंसा पर नरेंद्र मोदी ने उन्हें चेताया था कि उन्हें बदनाम करने वाले लोग उन्हें (अन्ना को) गुमराह करने की कोशिश करेंगे। अन्ना हजारे ने गुजरात कांड पर न उस समय, न वर्तमान में कभी टिप्पणी की। उनकी प्रशंसा ने बता दिया कि वे उस समय भी मोदी के साथ थे और आज भी हैं। उनके  सहयात्री बाबा रामदेव गुजरात जाकर मोदी की प्रशंसा करके आए हैं। हमने इन महानुभावों का जिक्र इसलिए नहीं किया है कि हमें उनसे धर्मनिरेपक्षता के लिए कोई उम्मीद है। जिक्र इसलिए किया है कि अरविंद केजरीवाल की बिसात पर धर्मनिरपेक्षता के बड़े-बड़े दावेदार इन दोनों की छत्रछाया में ख्नक्रांतिज् कर चुके हैं। 
आप कहेंगे कि मोदी पर चर्चा है और आरएसएस पर चोट बहुत कम हो रही है। धर्म की उदार धारा को भी सांप्रदायिकता का पोषण करने वाली मानने वाले ख्नवैज्ञानिकज् धर्मनिरपेक्षतावादियों को यह बहुत नाइंसाफी लगेगी। आइए थोड़ी संघ की बात करें। जैसा कि हर संगठन में होता है, संघ की भी अपनी अंदरूनी राजनीति होती है। उसकी राजनीतिक भुजा भाजपा में यह आंतरिक राजनीती ज्यादा होती है। दावेदारी अगर प्रधानमंत्री पद की हो तो अंतर्कलह होना स्वाभाविक है। नरेंद्र मोदी के विरोधी उनके ख्नउत्थानज् से परेशान रहते हैं और भरसक उसे अनुशासित करने की कोशिश करते हैं। प्रशंसकों की नजर में मोदी भले ही विश्व स्तरीय नेता बन चुके हों, भाजपा हाईकमान की नजर में वे राष्ट्रीय नेता नहीं हैं। अगर क्षेत्रीय क्षत्रप राष्ट्रीय बनने का मंसूबा पालेंगे तो राष्ट्रीय नेता कहां जाएंगे? कल्याण सिंह के सिर बाबरी मस्जिद गिराने का सेहरा है, लेकिन उसे पहन कर जब वे राष्ट्रीय बनने चले तो क्षेत्र के भी नहीं रहे।    
नवउदारवाद आरएसएस को खूब फला है। वरना हालत यह हो चली थी कि संघी घरों के लड़के-लड़कियां न खुद निक्कर पहनने को तैयार थे, न पिताओं का रोजाना निक्कर पहनना पसंद करते थे। नवउदारवाद ने उसे एक पूरी फसल दी है जो टैक्नोलोजी और प्रबंधन पढ़ती है और उसके अलावा कुछ नहीं जानती। या वह सब जानती है जो मीडिया उसे बताता है। नई शक्ति से भर कर आरएसएस हालातों को तौल रहा है। अगर मोदी के नाम पर एनडीए घटकों की ओर से कुछ विरोध होगा तो अडवाणी को आगे किया जाएगा और अगर मोदी के प्रशंसकों का स्वर बुलंद रहेगा तो वह मोदी पर दांव लगा सकता है। हालांकि यह चिंता आरएसएस को भी होगी (भले वह खुद भाजपा के संगठनात्मक मामलों में अपनी चलाता है) कि नरेंद्र मोदी भाजपा के आंतरिक लोकतंत्र को ध्वस्त कर देंगे। संघ-भाजपा के लिए वह बड़ा और दूरगामी नुकसान होगा।
वैसे तो यह हम किसी न किसी रूप में राजनीति में सक्रिय लोगों का कसूर है कि मोदी का नाम देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए प्रमुखता से चल रहा है, लेकिन कांग्रेस का कसूर सीधे है। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की जिद मोदी को फायदा पहुंचाएगी। इतनी कवायद और खर्च के बावजूद राहुल गांधी देश के युवाओं की पसंद नहीं है। जिनकी पसंद हैं, वे चाटुकार और भाड़े के हैं। वे गडकरी की टक्कर के भी नहीं हैं। कांग्रेसियों को मलाई चाभने के लिए राहुल गांधी पसंद हैं, लेकिन देश के सामने वैसी कोई मजबूरी नहीं है। बेहतर होगा कि सोनिया उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बना दें और प्रधानमंत्री के लिए किसी अन्य नेता को आगे करें। प्रणब मुखर्जी को रायसीना हिल भेज कर सोनिया गांधी ने मोदी के लिए मैदान खाली छोड़ दिया है।
ऐसे में, जबकि देश में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति गतिरोध का शिकार ही नहीं है, थकी हुई भी है, क्या आरएसएस से ही गुहार लगाई जाए कि वह सांप्रदायिकता की मोदी की कट्टर लाइन को रोक कर सांप्रदायिकता की वाजपेयी वाली उदार लाइन को आगे बढ़ाए? वह वाजपेयी से ज्यादा उदार चेहरे का निर्माण करे, जैसा कि पिछले दिनों अडवाणी ने अपने को दिखाने की कोशिश की थी? संघ की कट्टर कोख से निकल कर आया मोदी संघ की पहली पसंद बनता है तो उससे राष्ट्र और समाज का बहुत बुरा होगा। 
मोदी के प्रशंसक जितना भी कामयाब हों, अनेक भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्य और धर्म की उदार धारा को आगे रखकर सांप्रदायिकता को संविधान पर भारी न पड़ने देने का संघर्ष जारी रखेंगे।     

२६ जनवरी २०१३

Thursday, January 3, 2013

मुअनजोदड़ो-अतीत के पार झांकने की सार्थक कोशिश


(ओम थानवी की पुस्तक मुअनजोदड़ो हिन्दी में यात्रा संस्मरणों के खजाने को और समृद्ध करती है । पूरी किताब बेहद ही रोचक और जानकारियों से लबरेज है। हिन्दुस्तान की सभ्यता और संस्कति में रुचि रखने वालों के लिए ये एक जरूरी क़िताब है। )

मैं इतिहास का विद्यार्थी कभी नहीं रहा। उसे मैंने अकादेमिक रूप से तभी तक पढ़ा जब तक पढ़ना जरूरी था। लेकिन साहित्य संस्कृति और समाज को जानने समझने की ललक हमेशा बनी रही।  कोर्स से इतर किताबों से चिपकने की आदत कब लगी याद नहीं। बचपन में किताबें कम उपलब्ध थी, लेकिन जो भी हाथ लगती बिना पढ़े नहीं चूकता। यूं तो मनपसंद लेखकों का कुछ भी पढ़ना अच्छा लगता है। लेकिन फनी·ार नाथ रेणु के रिपोर्ताज और यात्रा संस्मरण की बात ही कुछ और है। रेणु जी के रिपोर्ताजों ने लेखनी के नए आयाम गढ़े थे, पर  गुजरते वक्त के साथ हिन्दी में इस विद्या की बेहद कमी महसूस हुई। जिन्होंने काम किया वे पाठकों के साथ संबंध नहीं सृजित कर पाए।
यात्रा वृत्तांत जब तक पाठकों के साथ लय स्थापित ना कर पाए उसके साथ सफर नहीं किया जा सकता, फिर चाहे वो कितनी भी सार्थक विषय पर क्यों ना लिखी गई हो। हमारे देश में इतिहास को इस नजरिए से देखने - लिखने का चलन बहुत ही कम है। 'मुअनजोदड़ो' एक ऐसी क़िताब है जिसके जरिए ओम थानवी ने बेहद ही सरल शब्दों में सिंधु घाटी सभ्यता के अनसुलझे सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश की है। मुअनजोदड़ो के टीले की खुदाई के बाद हम वि·ा सभ्यता की पहली पंक्ति में आ खड़े हुए।  इस शहर की खोज ने हमारे अतित को प्राचीनत्तम बताया, और यहां खुदाई में मिली वस्तुओं ने हमें संस्कृति और कला के लिहाज से दुनिया में सर्वोच्च स्थान दिया।
असल मुअनजोदड़े को देखकर लिखना और पढ़ना दोनों एक संवेदनशील एहसास है। ये शहर की बसावट को देखकर और अतित के सन्नाटे को सुनकर लिखने वाला काम भर नहीं था। इसे इतिहास की किताबों के स्थापित मान्यताओं से सेंसर भी किया जाना था। लिहाजा कई जगहों पर थानवी जी कठिनाई में नज़र आते हैं । इस किताब में मुअनजोदड़ों शहर का विवरण पढ़ते पढ़ते मन भींग गया। एक बारगी तो ये मन से निकल गया कि अब वहां कोई नहीं रहता। बिल्कुल ऐसा लगता है, जैसे किसी आबादी वाले शहर की बात हो रही है। शायद मुअनजोदड़ो की वो सभ्यता आज भी हर संवेदनशील हिन्दुस्तानी के दिल में जीवित है। वो शहर थमा नहीं है , अपनी गरिमामय उपस्थिति से आज भी हमारा और हमारे पूरखों का मान बढ़ा रहा है। उस शहर के सन्नाटे को सुना जा सकता है। रसोईघर की दीवार से टिककर बैठा जा सकता है। और आंगन पार कर कमरे में दाखिल हुआ जा सकता है। ये किताब मन को झकझोरती है। किताब खरीदने में देरी हो गई इसे पहले ही पढ़नी चाहिए थी। लेकिन जब पढ़ने बैठा तो एक सांस में पढ़ गया। जब पूरी किताब खत्म की तो लगा कि मुअनजोदड़ो को इतिहास की बोझिल किताबों से निकालने की कोशिश में ओम थानवी पूरी तरह सफल रहे। उन्होंने अतित की खिड़की से झांक कर देखा और उसे कागज पर उकेरा।  नतीजा एक पढ़ने लायक जरूरी  किताब हाथ में आ गई।

Wednesday, November 28, 2012

विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा - प्रेम सिंह


(नव उदारवाद और सांप्रदायिकता के खतरे से जो लोग लगातार आगाह कर रहे हैं उनमें डॉ प्रेम सिंह का नाम अग्रणी हैं। डॉ प्रेम सिंह का ये लेख आम आदमी पार्टी को लेकर गहराए धुंध साफ करता है। जिसमें समाजवादी से लेकर वामपंथी बुद्धिजीवी भी भ्रमित हो गए हैं।  भ्रष्टाचार हटाओ की गंगा में डुबकी लगाकर जिन्होंने पूरे देश के जन आंदोलनों को दिग्भ्रमित किया है। प्रेम सिंह की कलम उनसे कुछ वाजिब सवाल कर रही है। हमारा मानना है कि, अब जब एनजीओबाजों ने राजनीतिक चोला पहन लिया है तो ये हमारी राजनीति पर अब तक का सबसे गंभीर हमला है। )

ऐसा माना जा रहा था कि बेतहाशा बढ़ती मंहगाई और बेरोजगारी तथा 2014 में होने वाले आमचुनाव के डर से नवउदारवाद के रास्ते पर यूपीए सरकार के कदम कुछ ठिठकेंगे। चैतरफा लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों से भी सरकार डरेगी। व्यक्तिगत तौर मनमोहन सिंह की ईमानदारी का मिथक टूटने का भी सरकार पर कुछ दबाव बनेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पिछले दिनों उनकी सरकार ने बहादुराना अंदाज में, खुद अपनी पीठ ठोंकते हुए, नवउदारवादी सुधारों की रफ्तार तेज कर दी और इस तरह चुनाव के एक-दो साल पहले नवउदारवादी सुधारों को स्थगित रखने की अभी तक बनी रही बाधा को पार कर लिया। पिछले साल नवंबर में संसद में किए गए अपने वादे को तोड़ते हुए खुदरा व्यापार में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के साल भर से स्थगित फैसले को लागू करने की एकतरफा घोषणा के साथ सरकार ने बीमा, पेंशन और नागरिक उड्डयन क्षेत्र में भी विदेशी निवेश को स्वीकृति प्रदान की।

पैट्रोल और गैस के दामों में भारी वृद्धि के साथ इन घोषणाओं से सरकार ने कारपोरेट जगत और नवउदारवादी सुधारों के पैरोकारों को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि वह अमीरोन्मुख ग्रोथ की अपनी टेक पर पूरी तरह कायम है। वह गरीबों द्वारा बनाई गई अमीरों की अमीरों के लिए सरकार है। उसने यह भी एक बार फिर से घोषित किया है कि ग्रोथ बढ़ाने के लिए विदेशी निवेश ही एकमात्र संजीवनी है। हर संदेश का एक प्रतिसंदेश होता है। वह नवउदारवादी नीतियों से बदहाल जनता के लिए है कि सरकार अब उसकी चुनावी परवाह भी नहीं करने जा रही है। नवउदारवादी निजाम के पिछले दो दशकों में यह सरकार का निस्संदेह बड़ा जनता विरोधी हौसला है जो उसने दिखाया है। देश में 4 करोड़ खुदरा व्यापारी हैं जिन पर उनके 20 से 25 करोड़ परिवारजनों का भार है। हर हौसले के पीछे अंदरूनी या बाहरी ताकत होती है। सरकार का बढ़ा हुआ हौसला वैश्विक पूंजीवादी ताकतों की देन है।

मनमोहन सिंह जब कहते हैं कि अब कदम पीछे नहीं हटाए जा सकते। यह उनकी मजबूरी का इजहार नहीं है कि रास्ते का चुनाव एक बार हो गया तो उस पर चलना ही होगा। ऐसा नहीं है कि वे चुनाव की गलती से नवउदारवादी रास्ते पर चले गए थे और अब उस पर चलना मजबूरी बन गया है; मजबूरी में उन्हें ये सब निर्णय लेने पड़े हैं। ऐसा होता तो आगे कभी नवउदारवादी नीतियों में बदलाव की आशा बनती। मनमोहन सिंह शुरू से नवउदारवादी रास्ते को ही विकास और सब कुछ का एकमात्र और स्वाभाविक रास्ता मानते हैं। तभी उन्होंने एक बार फिर कहा है कि अगर उन्हें जाना है तो इस रास्ते पर अडिग रह कर लड़ते हुए जाएंगे। अन्यथा रोबो की तरह लगने वाले मनमोहन सिंह नवउदारवाद के बचाव में अत्यंत संजीदा हो जाते है - ‘कुर्बान हो जाएंगे, लेकिन पीछे नहीं हटेंगे!’

मनमोहन सिंह की इस प्रतिभा और जज्बे की पहचान सोनिया गांधी ने बखूबी की है। उन्हें यह साफ पता लग गया कि यही बंदा काम का है जो इस रास्ते पर लाखों के बोल सह कर और लाखों को गारत करके भी पीछे नहीं हट सकता। क्योंकि उनकी खुद की तरह वह कोई और रास्ता जानता ही नहीं है। मामला केवल मनमोहन सिंह को आगे रख कर राहुल गांधी के लिए रास्ता बनाने भर का नहीं है। इस काम के लिए कांग्रेस में चाटुकार नेताओं की कमी नहीं है। लेकिन कांग्रेस का अन्य कोई भी नेता वह नहीं कर सकता था जो मनमोहन सिंह ने किया। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की सम्मिलित प्रतिभा ने कांग्रेस के इतिहास और विचारधारा को धो-पोंछ कर उसे एक ‘कारपोरेट पार्टी’ में तब्दील कर दिया है। इसीलिए मनमोहन सिंह के बाद राहुल गांधी चाहिए, जिसके जिस्म में मनमोहन सिंह का दिमाग पैदा करने की कवायद लंबे समय से की जा रही है।

लेकिन मनमोहन सिंह का कमाल कांग्रेस के कायापलट तक सीमित ही नहीं है; उन्होंने भारत की पूरी राजनीति को कारपोरेट रास्ते पर डाल दिया है। मनमोहन सिंह ने जो नवउदारवादी ‘ब्रह्मफांस’ फेंका है, उसमें सब फंसे हैं। उसकी काट आज किसी के पास नहीं है ताकि मानव सभ्यता को पूंजीवादी बर्बरता से मुक्त किया जा सके। मनमोहन सिंह ललकार कर पूछते हैं किसी के पास है तो बताओ? ऐसा नहीं है कि लोग लड़ नहीं रहे हैं या आगे नहीं लड़ेंगे। लेकिन हर बार जीत मनमोहन सिंह की ही होती है। किसी भी तरह ‘साइनिंग इंडिया’ की चकाचैंध में पलने वाले इस अंधे युग में पलीता नहीं नहीं लग पाता। नरेंद्र मोदी हों या राहुल गांधी या बीच में कुछ समय के लिए कोई क्षेत्रीय क्षत्रप, अभी जीत मनमोहन सिंह की ही होनी है।

जो कहते हैं मनमोहन सिंह अभी तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं, उन्हें अपनी धारणा पर फिर से विचार करना चाहिए। भारत की राजनीति की धुरी को संविधान से उखाड़ कर पूंजीवाद की वैश्विक शक्तियों की उन संस्थाओं, जिन्होंने पूरी दुनिया पर शिकंजा कसा हुआ है, के आदेशों@मूल्यों पर जमा देने में उनकी युगांतरकारी भूमिका है। मुख्यधारा राजनीति में उनकी आलोचना करने वाले नेता दरअसल उन्हीं के आज्ञाकारी बच्चे हैं। उन्हें अभी तक का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री कहते न थकने वाले अडवाणी और हमेशा उनकी ‘मेंटर’ को निशाना बनाने वाले नरेंद्र मोदी समेत।

उनकी यह युगांतरकारी भूमिका तभी सफलीभूत हो सकती थी जब वे भारत की कांग्रेसेतर राजनीति को भी अपने पीछे लामबंद करने के साथ बुद्धिजीवियों को भी काबू में कर पाते। ऐसा उन्होंने किया है। मनमोहन सिंह के राज में बुद्धिजीवियों की हालत का क्या कहिए! जिधर देखो मनमोहन सिंह का दिमाग ही चलता नजर आता है। किसी भी समाज के सबसे प्रखर बौद्धिक शिक्षा और शोध के संस्थानों में होते हैं। भारत के विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों और शोध संस्थनों तक मनमोहन सिंह की खुली हवा चल रही है। भारत के बुद्धिजीवियों के संदर्भ में किशन पटनायक ने जिसे ‘गुलाम दिमाग का छेद’ कहा था, वह बढ़ कर बड़ा गड्ढा बन गया है।

नवउदारवादी और प्रच्छन्न नवउदारवादी बुद्धिजीवी तो मनमोहन सिंह के सच्चे बच्चे ठहरे, अपने को नवउदारवाद विरोधी कहने वाले बुद्धिजीवियों के दिमाग का दिवाला निकलता जा रहा है। घूम-फिर कर उनका विश्लेषण पूंजीवाद का विश्लेषण होता है और तर्क भी पूंजीवाद के समर्थन में होते हैं। कारपोरेट पूंजीवाद की हर शै में विकास का दर्शन करने वाले माक्र्सवादियों, गांधीवादियों और समाजवादियों की कमी नहीं है। ज्योति बसु यह पुराना मंत्र देकर गए कि पूंजीवाद के बिना समाजवाद नहीं लाया जा सकता। उनके उत्तराधिकारी बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अमेरिकी कूटनीतिज्ञों के सामने अपनी पीड़ा का इजहार किया कि कई तरह के दबावों के कारण वे ऊंची पूंजीवादी उड़ान नहीं भर पाते हैं। सिंदूर-नंदीग्राम प्रकरण के वक्त प्रकाश करात ने विरोधियों को विकास विरोधी कह कर लताड़ लगाई थी।

भाजपाई मनमोहन सिंह के मनभाए साथी बने हुए हैं। ‘शाइनिंग इंडिया’ की पुकार सबसे पहले उन्होंने ही दी थी। पिछले दिनों ‘इंडियन एक्सप्रैस’ के स्तंभ लेखक सुधींद्र कुलकर्णी ने एक मोबाइल के विज्ञापन-गीत - ‘जो मेरा है वो तेरा है’ - को समाजवाद के विचार का सुंदर वाहक बताया। वे वहीं नहीं रुके। उन्होंने उसे गांधी से भी जोड़ा। आप कहेंगे संघी और गांधी ... ? नवउदारवाद का यही कमाल है। उन्हीं दिनों उनकी ‘म्युजिक आॅफ दि स्पीनिंग व्हील ः महात्मा गांधीज मेनीफेस्टो फॉर दि इंटरनेट एज’ किताब आई जिसका दिल्ली और बंगलुरू में भव्य विमोचन समारोह हुआ। समारोह में परमाणु ऊर्जा के पैरोकार पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम सहित उद्योग, न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और राजनीति जगत की कई हस्तियों ने हिस्सा लिया। नवउदारवाद की बड़ी विभूतियों आजकल बढ़चढ़ कर गांधी-प्रेम का प्रदर्शन करती हैं। ध्यान दिला दें कुलकर्णी साहब भाजपा के सिद्धांतकारों में से एक हैं, जिसके कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में पट्टी पढ़ाई जाती है कि वे ऋषियों-मुनियों की धरोहर के वारिस हैं। गुलाम दिमाग कितनी तरह के पाखंड करता है!

भारत के नागरिक समाज में मनमोहन सिंह के बच्चों की भरमार है। खुद मनमोहन सिंह और उनकी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की धूम है। लेकिन उन्हें रत्ती भर परवाह नहीं है। वे जानते हैं आरोप लगाने वाले उनके ही दूध पीते बच्चे हैं। भारत माता के स्तनों में तो पूंजीवाद ने दूध की बूंद छोड़ी नहीं है। भारत माता के बच्चे बिलखते हैं और ये चिल्लाते हैं। भारत के नागरिक समाज को गुस्सा बहुत आता है लेकिन उसे कभी ग्लानि नहीं होती। मनमोहन सिंह से ज्यादा कौन जानता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की सारी फूफां के बावजूद उसमें शामिल होने वालों ने रत्ती भर भ्रष्टाचार करना बंद नहीं किया है। वे जानते हैं केवल नेता, नौकरशाह, उद्योगपति, दलाल और माफिया नहीं, हर दफ्तर के बाबू और चपरासी तक भ्रष्टाचार का बाजार पहले की तरह गरम है। पहले की तरह सरकार की गरीबों के लिए बनाई योजनाओं का ज्यादातर पैसा अफसर और बाबू खा जाते हैं।

मनमोहन सिंह जानते हैं उनसे कोई मुक्त होना नहीं चाहता। सब उनके मोहताज हैं। वरना जिस देश में पिछले पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोध की भावनाएं हिलोरें ले रही हों, जन लोकपाल कानून जब बनेगा तब बनेगा, आंदोलन में शामिल नागरिक समाज को कम से कम अपना भ्रष्टाचार बंद कर देना चाहिए था। उससे गरीब जनता को निश्चित ही राहत मिलती। आप कहेंगे कि भावना की क्या बात? जब जन लोकपाल कानून बन जाएगा, अपने आप भ्रष्टाचार होना बंद हो जाएगा। नागरिक समाज भी बंद कर देगा। यह भ्रष्ट सरकार कानून बनाए तो!

लेकिन भावना उतनी बुरी नहीं होती। राष्ट्रीय भावना भी नहीं। भावना में निस्संदेह एक ताकत होती है। किशन पटनायक ने अपने ‘प्रबल आर्थिक राष्ट्रवाद का समाधान’ लेख में कहा है कि अपनी खदानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देना सही है या गलत, इस पर बहस करने वाला उनकी रक्षा नहीं कर पाएगा। सवाल यह उठाया जा रहा था कि केवल भावनाओं में बह कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का विरोध करना ठीक नहीं है। अभी लोग समझ नहीं रहे हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने बहुत गहराई में जाकर नुकसान किया है। अपने वर्ग-स्वार्थ के लिए इसने भावना की ताकत को नष्ट कर दिया है। यह सही है कि इस आंदोलन के केंद्र में खाया-पिया और कुछ हद तक अघाया मध्य वर्ग है। लेकिन शुरू से ही वह जन-भावना का शिकार करने की नीयत से परिचालित है। उसके वर्ग-स्वार्थ की सिद्धि में नवउदारवाद की मार से तबाह जन-सामान्य शामिल हो जाए तो उसका काम पूरा हो जाएगा। इसके लिए अब उसने अपनी राजनीतिक पार्टी बना ली है जिस पर हम थोड़ा आगे विचार करेंगे।

चाहते मनमोहन सिंह भी हैं कि पूंजीवाद का काम बिना भ्रष्टाचार के चले। लेकिन पिछली तीन-चार शताब्दियों का उसका इतिहास बेईमानी और भ्रष्टाचार का इतिहास रहा है। जब अमेरिका में लीमैन ब्रदर्स और गोल्डमैन फैक्स बैंक दिवालिया हुए तो पता चला कि उसके बड़े अफसर किस कदर भ्रष्टाचार में डूबे थे। उपनिवेशवादी दौर के प्रमाण हैं कि उपनिवेशों में आने वाले यूरोपीय मालामाल होकर अपने देश वापस जाते थे। उपनिवेशवादियों ने भ्रष्टाचार की चाट साहब लोगों ने स्थानीय अमले को भी अच्छी तरह लगा दी थी। भारतेंदु ने कहा था ‘‘चूरन साहब लोग जो खाता पूरा हिंद हजम कर जाता।’’ अंग्रेज बहादुर के वारिस अगर हिंद हजम कर रहे हैं तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है। यह व्यवस्था छोटे और मेहनत करने वाले लोगों के शोषण और बड़े और मेहनत नहीं करने वाले वाले लोगों की बेईमानी पर चलती और पलती है। सभी जानते हैं देश में कानूनों की कमी नहीं है और न ही जन लोकपाल कानून बनने से भ्रष्टाचार खत्म होने वाला है। इस व्यवस्था के समर्थक ही कह सकते हैं कि इसे मिटाए बिना भ्रष्टाचार मिटाना है।

यह सही है कि सरकार के नवउदारवादी सुधार तेज करने के निर्णय के पीछे मुख्यतः कारपोरेट पूंजीवाद की वैश्विक शक्तियां हैं। मनमोहन सिंह भारत में उन शक्तियों के स्वाभाविक और सफल एजेंट हैं। इसलिए उन्हें अमेरिकी दबाव और खुदरा व्यापारियों की तबाही के आरोप सनसनी फैलाने वाले लगते हैं। लोग समझते नहीं, लेकिन वे यही कहना चाहते हैं कि अमेरिकी दबाव कब नहीं रहा और पिछले 25 सालों में गरीबों की तबाही कब नहीं हुई? वे कहते हैं कि उनके आर्थिक सुधारों की शुरुआत करने से लेकर आज तक ये आरोप लगाए जाते रहे हैं। न वे पहले रुके, न अब रुकेंगे। हाय-तौबा करने की जरूरत नहीं है। उससे कुछ नहीं होने वाला है। अमीरोन्मुख ग्रोथ बढ़ाने के लिए गरीबों को मंहगाई और बेरोजगारी की मार झेलनी होगी। उन्हें प्रतिरोध करना छोड़ कर मंहगाई और बेरोजगारी में जीने की आदत डाल लेनी चाहिए। मनमोहन सिंह को आश्चर्य होता है कि 20 साल से ज्यादा गुजर जाने के बावजूद लोगों को यह आदत नहीं पड़ी है। उन्हें यह आदत डालनी ही होगी। कम से कम तब जब तक उनका सफाया नहीं हो जाता!

मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार की प्राथमिकता मंहगाई और बेरोजगारी रोकना नहीं, उसके चलते होने वाले प्रतिरोध का दमन करना बन गई है। संसाधनों की मिल्कियत कंपनियों को सौंपने और खुदरा समेत विभिन्न क्षेत्रों में कंपनियों को न्यौतने के फैसलों के विरोध का दंड कड़ा होता है। मनमोहन सिंह जब कहते हैं, उन्हें जाना है तो लड़ते हुए जाएंगे, तो उनकी लड़ाई को कोरा लोकतांत्रिक समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उनके दिमाग में अपनी लड़ाई में सुरक्षा बलों को शामिल रखने की बात होती है। देश के कई हिस्सों में जो हालात बने हुए हैं वे बताते हैं कि देश को पुलिस स्टेट बनाने में उन्हें कोई हिचक नहीं है।

सरकार के खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के फैसले की समीक्षा हम यहां नहीं करने जा रहे हैं। उसके लिए हमारा ‘खुदरा में विदेशी निवेश ः नवउदारवाद के बढ़ते कदम’ (‘युवा संवाद’, फरवरी 2012) ‘समय संवाद’ देखा जा सकता है। हम यह कहना चाहते हैं कि खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सीनाजोरी फैसले के पीछे भले ही और निश्चित ही वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था और उसे चलाने वाली संस्थाओं@शक्तियों का हाथ है, लेकिन उसका एक बड़ा कारण घरेलू भी है। यह फैसला मनमोहन सिांह और उनकी सरकार ने इसलिए बेधड़क होकर लिया है, क्योंकि पिछले दो साल से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने नवउदारवाद के वास्तविक विरोध के समस्त प्रयासों को पीछे धकेल दिया या धूमिल कर दिया है।

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नेता अब राजनीतिक पार्टी बना रहे हैं। वह पार्टी, जैसा कि हमने पहले भी कहा है, चुनावों में कांग्रेस और भाजपा का नहीं, बल्कि नवउदारवाद की वास्तविक विरोधी और समाजवाद की समर्थक छोटी पार्टियों, जनांदोलनकारी संगठनों@समूहों और लोगों का विरोध करेगी। महज संयोग नहीं है कि कांग्रेस का हाथ भी आम आदमी के साथ है और नई पार्टी बनाने वाले भी ‘मैं आम आदमी हूं’’ लिखी टोपी पहनते हैं। चलते-चलते पता चला है कि उन्होंने पार्टी का नाम भी आम आदमी पार्टी रखा है। मनमोहन सिंह के ये बच्चे उनकी उनकी सहूलियत के लिए उनकी जमात को ही नहीं, एजेंडे को भी आगे बढ़ाएंगे। 

कौन है आम आदमी?

हम हर बार सोचते हैं कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर नहीं लिखेंगे। लेकिन ऐसी बाध्यता महसूस होती है कि इस परिघटना का साथ-साथ कुछ न कुछ विश्लेषण होना चाहिए। गंभीर विश्लेषण और मूल्यांकन बाद में विद्वान करेंगे ही। आम आदमी पार्टी के बारे में पांच-सात सूत्रात्मक बातों के अलावा हमें कुछ नहीं कहना है। पहली यह कि नवगठित पार्टी छोटी पार्टियों, मसलन समाजवादी जन परिषद (सजप) और जनांदोलनों, मसलन जनांदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) में तोड़-फोड़ करने में कामयाब हुई है। जाहिर है, इस दिशा में आगे भी काम जारी रहेगा। दूसरी यह कि अन्ना हजारे से इस पार्टी का अलगाव नहीं है। पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने उन्हें अपना गुरु बताया है और अन्ना ने पार्टी के ‘अच्छे’ उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने का भरोसा दिया है। पूरे आंदोलन में सक्रिय रहने वाली मेधा पाटकर कहती हैं कि आरोप लगाने से कुछ नहीं होगा, भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने की जरूरत है। यानी वे यह बता रही हैं कि अलग पार्टी बनाने का फैसला करने वाले महज आरोप लगाने वाले हैं और उसमें शामिल नहीं होने वाले भ्रष्टाचार को जड़मूल से मिटाने वाले। लेकिन वह काम बिना राजनीति के और पूंजीवादी व्यवस्था को बदले बगैर नहीं हो सकता। इस काम के लिए उनसे बार-बार कहा गया लेकिन उन्हें वह रास्ता पसंद नहीं है। उन्हें देखना चाहिए कि वे वाया अन्ना, केजरीवाल की पार्टी में शामिल हो गई हैं।

जो लोग अपने को अन्ना के साथ मान कर पार्टी से अलग मान रहे हैं, वे खुद अपने को मुगालते में रखने की कोशिश करते हैं। पार्टी न अन्ना से अलग है, न रामदेव से और न दोनों की मानसिकता से। मनमोहन सिंह से अलग तो है ही नहीं।

तीसरी बात हम यह कहना चाहते हैं कि इस पार्टी के निर्माण की पूरी रणनीति कपट से भरी रही है। संप्रदायवादियों और आरक्षण विरोधियों को पूरा भरोसा दिलाने के बाद अब धर्मनिरपेक्षतावादियों और सामाजिक न्यायवादियों को अपने लपेटे में लेने की कोशिश की जाएगी। चुनावी जीत के लिए जरूरी मुसलमानों को वोट बैंक बनाने की भी कोई जुगत रची जाएगी। कहने की जरूरत नहीं कि कपटपूर्ण रणनीति से निकली पार्टी का नाम  भी कपट से भरा है, जिस पर हम आगे विचार करेंगे। यहांं यह बताना चाहते हैं कि इस पूरे खेल में कपट-क्रीड़ा के साथ एक-दूसरे को इस्तेमाल करने का खेल भी चल रहा है। बानगी के लिए अन्ना और केजरीवाल के बीच की लप्प-झप्प देखी जा सकती है। अन्ना ने केजरीवाल से अपना और आईएसी का नाम इस्तेमाल करने से मना किया है। यह बात उन्हें तब ख्याल नहीं आई जब केजरीवाल उन्हें ‘मसीहा’ बना रहे थे।

अन्ना भी एनजीओ की पैदावार हैं और केजरीवाल भी। बाकी जीवन व्यापारों की तरह एनजीओ व्यापार भी स्थैतिक यानी ठहरा हुआ नहीं होता। लिहाजा, अन्ना के एनजीओ व व्यक्तित्व और केजरीवालों के एनजीओ व व्यक्तित्व में समय के अंतराल के चलते काफी फर्क है। लोहिया का शब्द लें तो नए एनजीओबाज लोमड़ वृत्ति के हैं। उसके सामने अन्ना जैसा कच्छप गति वाला व्यक्ति इस्तेमाल होने को अभिशप्त है। अन्ना के समय में मीडिया क्रांति नहीं हुई थी। लोग बताते हैं कि उन्हें फोटो वगैरह खिंचवाने के लिए मीडिया वालों का काफी इंतजार करना पड़ता था। कई बार निराशा भी हाथ लगती थी। मीडिया में प्रसिद्धि की उनकी भूख का केजरीवाल ने बखूबी इस्तेमाल किया है। अभी दोनों में और टीम के बाकी प्रमुख लोगों में एक-दूसरे को इस्तेमाल करने के दावपेंच देखने मिलेंगे। एक-दूसरे को इस्तेमाल करने का खेल इसकी जरा भी शर्म किए बगैर चलेगा कि ये सभी महाशय पूंजीवादी साम्राज्यवाद के समग्र खेल में इस्तेमाल हो रहे हैं। आप कह सकते हैं फिर भला मनमोहन सिंह को ही क्यों शर्म आनी चाहिए!

चैथी बात यह कि ‘यूथ फॉर इक्वैलिटी’ में विश्वास करने वाली पार्टी यह भली-भांति जानती है कि भारत में युवा शक्ति का मतलब अगड़ी सवर्ण जातियों के युवा होते हैं। इस पार्टी का दारोमदार उन्हीं पर है और रहेगा। सुना है पार्टी की स्थापना के मौके पर तलवार वगैरह भांजी गई हैं। पांचवी बात यह कि समाजवादियों ने एक बार फिर अपनी ‘जात’ दिखा दी है। अभी तक वे संघियों और कांग्रेसियों के पिछलग्गू थे, अब एनजीओबाजों के भी हो गए हैं। किशन पटनायक को गुरु धारण करने वाले केजरीवाल के शिष्य बन गए हैं। मामला यहीं नहीं रुकता। जो वरिष्ठ समाजवादी लोहिया को ही पहला, अकेला और अंतिम गुरु मानते रहे और दूसरों को चरका देते रहे, उन्होंने भी केजरीवाल को राजनीतिक गुरु मानने में परेशानी नहीं हुई। मेधा पाटकर ने अन्ना को गुरु कबूल किया है तो वे केजरीवाल की गुरुबहन हो गईं। आजकल के गुरु लोग अपनी सुरक्षा का निजी इंतजाम रखते हैं। भारतीय किसान यूनियन ने खुद आगे बढ़ कर यह जिम्मेदारी उठा ली है।

छठी बात यह है कि इस पार्टी के बनाने में वे सभी शामिल हैं जो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल और उसके समर्थक थे। क्योंकि यह पार्टी, जैसा कि कुलदीप नैयर ने उसकी तारीफ में कहा है, ‘आंदोलन की राख से उठी है’। अति वामपंथियों से लेकर अति गांधीवादियों तक ने अन्ना की टोपी पहन ली थी। उनमें सामान्य कार्यकर्ता, बड़े नेता और बुद्धिजीवी शामिल थे। आज भी अपने को अल्ट्रा माक्र्सवादी जताने वाले कई साथी केजरीवाल के ‘पोल खोल’ कार्यक्रम पर उन्हें सलाम बजाते और उनके आंदोलन में नैतिक आभा कम न हो जाए, इस पर चिंतित होते देखे जा सकते हैं। यहां हम थोड़ा बताना चाहेंगे कि हमने बिल्कुल शुरू में आगाह किया था कि कम से कम ऐसे राजनीतिक संगठनों और लोगों को इस आंदोलन का हिस्सा नहीं होना चाहिए जो समाजवादी विचारधारा और व्यवस्था में विश्वास करते हों। लेकिन जब एबी बद्र्धन और वृंदा करात जैसे अनुभवी नेता रामलीला मैदान जा पहुंचे तो बाकी की क्या बिसात थी। राजनैतिक डर उन्हें उस आंदोलन में खींच ले गया जिसमें उमा भारती से लेकर गडकरी तक, चैटाला से लेकर शरद यादव तक शिरकत करने पहुंचे। बाद में तो सबके लिए खुला खेल फर्रुखाबादी हो गया।

उनमें यह डर नहीं पैदा होता अगर उन्होंने समाजवाद की किताबी से ज्यादा जमीनी राजनीति की होती। वे विवेकानंद से लेकर अंबेडकर तक को अपने शास्त्र में फिट करने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके शास्त्र से कोई स्वतंत्र संवाद किया जा सकता है, जैसा कि भारत में आचार्य नरेंद्र देव, जेपी और लोहिया ने किया, यह उन्हें बरदाश्त नहीं है। उन्हें चीन का ‘मार्केट सोशलिज्म’ मंजूर है, लेकिन ‘देशी समाजवाद’ की बात करने के बावजूद भारतीय समाजवादी चिंतकों को बाहर रखते हैं। दरअसल, यह डर हमेशा बने रहना है; उसी तरह जैसे शास्त्र को प्रमाण मानने वाला ब्राह्मण हमेशा डरा रहता है और रक्षा के लिए बार-बार देवताओं के पास भागता है।

सातवीं बात यह है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में नवउदारवाद के खिलाफ वास्तवकि संघर्ष को निरस्त करने की राजनीति पहले से निहित थी। उसे ही तेज करने के लिए नई पार्टी बनाई गई है। लिहाजा, कुछ भले लोगों का यह अफसोस जताना वाजिब नहीं है कि राजनीति जैसी गंदी चीज में इन अच्छे लोगों को नहीं पड़ना चाहिए। आठवीं बात यह कि एनजीओ वालों को धन देकर काम कराने की आदत होती है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में यह काम खूब हुआ है। पार्टी में भी होगा। एक वाकया बताते हैं। हम लोग सितंबर के अंतिम सप्ताह में जंतर मंतर पर एफडीआई के खिलाफ क्रमिक भूख हड़ताल पर थे। 23 सितंबर को वहां केजरीवाल का कार्यक्रम था। सुबह दस बजे से कुछ युवक और अधेड़ तिरंगा लेकर एक कोने से दूसरे कोने तक चक्कर लगाने लगे। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे इक्कीस सौ रुपया की दिहाड़ी पर हरियाणा से आए हैं।

जैसा कि अक्सर होता है, जंतर मंतर पर पूरा दिन और कुछ देर के लिए होने वाले कई कार्यक्रम थे। केजरीवाल के समर्थकों द्वारा बजाए गए डीजे की तेज आवाज ने सभी को परेशान करके रख दिया था। देशभक्ति के फिल्मी गीत बार-बार बजाए जा रहे थे। पुलिस का एक वरिष्ठ कांस्टेबल हमारे पास आया कि हम उन्हें तेज आवाज में डीजे बजाने से रोकें, क्योंकि वे उसके कहने से नहीं मान रहे हैं। डीजे पूरा दिन लगातार बजता रहा। शाम के वक्त केजरीवाल आए और उनका भाषण शुरू हुआ तो उनके समर्थकों ने हमसे आदेश के स्वर में माइक व भाषण बंद करने को कहा। सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उन्हें डपटा तो वे आंखें दिखाने लगे। हमने खुद उन्हें समझा कर वहां से हटाया।

नौवीं बात है कि कांग्रेस और भाजपा का चेहरा काफी बिगड़ गया है। क्षेत्रीय दलों के नेताओं में एक भी ‘अंतरराष्ट्रीय’ केंडे का नहीं है। पूंजीवादी साम्राज्यवाद के नेटवर्क से जुड़े अपने अधीनस्थ देशों में साफ-सुथरे चेहरों की पार्टी, जो लोकतंत्र की सबसे ज्यादा बात करे, अमेरिका की अभिलाषा होती है। जो देश उसके नेटवर्क में फंसने से इनकार करते हैं वहां वह खुद हमला करके अपने माफिक नेता बिठा देता है। पार्टी का पंजीकरण हुए बिना ही अगले आम चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार लड़ाने की घोषणा बताती है कि नई पार्टी के लिए धन की कोई समस्या नहीं होगी।

दसवीं और अंतिम बात यह कि यह सब प्रदर्शन - ‘मैं अन्ना हूं’, ‘मैं केजरीवाल हूं’, ‘मैं आम आदमी हूं’ - हद दरजे का बचकानापन है। मुक्तिबोध ने भारत के मध्य वर्ग की इस प्रवृत्ति को ‘दुखों के दागों को तमगे-सा पहना’ कह कर अभिव्यक्त किया है। कपट, इस्तेमाल-वृत्ति और लफ्फाजी से भरे आंदोलन से कोई जेनुइन राजनीतिक पार्टी नहीं निकल सकती है।

पार्टी को एक तरफ छोड़ कर ‘आम आदमी’ पर थोड़ी चर्चा करते हैं जिसकी दावेदारी में कांग्रेस और भाजपा नई पार्टी के साथ उलझे हैं। लाखों-करोड़ों में खेलने वाले लोग जब ‘मैं आम आदमी हूं’ की टोपी लगाते हैं तो उसका पहला और सीधा अर्थ गरीबों के उपहास में निकलता है। अगर लाखों की मासिक तनख्वा और फोर्ड फाउंडेशन जैसी पूंजीवाद की जमी हुई संस्थाओं से करोड़ों का फंड पाने वाले लोग अपने को आम आदमी कहें, तो यह गरीबों के सिवाय अपमान के कुछ नहीं है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर जो अकूत खर्चा किया गया है, वह दरअसल इस पार्टी के निर्माण पर किया गया खर्च है। आम आदमी से अगर मुराद गरीबों से है, जैसे कि दावे हो रहे हैं, तो कोई उन्हें इतना धन देने वाला नहीं है कि वे अपनी पार्टी धन की धुरी पर खड़ी कर सकें। गरीबों की किसी भी पार्टी को याराना पूंजीवाद का यार याराना मीडिया दिन-रात तो क्या, कुछ सेकेंड तक नहीं देगा। लिहाजा, यह स्पष्ट है कि आम आदमी का अर्थ गरीब आदमी नहीं है - न कांग्रेस के लिए, न आम आदमी की टोपी पहनने वालों के लिए।

‘आम आदमी’ की अवधारणा पर थोड़ा गंभीरता से सोचने की जरूरत है। आजादी के संघर्ष के दौर में और आजादी के बाद आम आदमी को लेकर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में काफी चर्चा रही है जिसका साहित्य और कला की बहसों पर भी असर पड़ा है। साहित्य में आम आदमी की पक्षधरता के प्रगतिवादियों के अतिशय आग्रह से खीज कर एक बार हिंदी के ‘व्यक्तिवादी’ साहित्यकार अज्ञेय ने कहा कि ‘आम आदमी आम आदमी ... आम आदमी क्या होता है?’ उनका तर्क था कि साहित्यकार के लिए सभी लोग विशिष्ट होते हैं। राजनीति से लेकर साहित्य तक जब आम आदमी की जोरों पर चर्चा शुरू हुई थी, उसी वक्त आम आदमी का अर्थ भी तय हो गया था। उस अर्थ में गांधी का आखिरी आदमी कहीं नहीं था। आम आदमी की पक्षधरता और महत्ता की जो बातें हुईं, वे शुरू से ही ‘मेहनत-मजदूरी’ करने वाले गरीब लोगों के लिए नहीं थीं।

सब टीवी पर एक सीरियल ‘आरके लक्ष्मण की दुनिया’ आता है। उसका उपशीर्षक होता है ‘आम आदमी के खट्टे मीठे अनुभव’। यह सीरियल उस आम आदमी की तस्वीर पेश करता है जो आम आदमी की अवधारणा में निहित रही है। ये आम आदमी ज्यादातर नौकरीपेशा हैं, साफ-सुथरी और सुरक्षित हाउसिंग सोसायटी के फ्लैट में रहते हैं, मोटे-ताजे सजे-धजे होते हैं, स्कूटर-कार आदि वाहन रखते हैं, आमदनी बहुत नहीं होती लेकिन खाने-पीने, बच्चों की पढ़ाई लिखाई, सैर-सपाटा-पिकनिक, बच्चों का कैरियर आदि ठीक से संपन्न हो जाते हैं।

मध्य वर्ग ने आम आदमी की अवधारणा में अपने को ही फिट करके उसकी वकालत और मजबूती में सारे प्रयास किए हैं और आज भी वही करता है। आम आदमी मध्यवर्गीय अवधारणा है। उसका गरीब अथवा गरीबी से संबंध हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मध्य वर्ग को अपने केंद्र में लेकर चलने वाली आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का यह वायदा रहा है कि वह किसी को भी गरीब नहीं रहने देगी। दूसरे शब्दों में, जो गरीब हैं, उन्हें होना ही नहीं चाहिए। भारत का यह ‘महान’ मध्य वर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह सब कुछ अपने लिए चाहता हैं, लेकिन गरीबों का नेता होने की अपनी भूमिका को छोड़ना नहीं चाहता। इस पाखंड ने भारत की गरीब और आधुनिकता में पिछड़ी जनता को अपार जिल्लत और दुख दिया है।

भारत का मध्य वर्ग मुख्यतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनता है। यही कारण है कि इस आंदोलन और उससे निकली पार्टी का वर्णाधार अगड़ी सवर्ण जातियां हैं, जिनका साथ दबंग पिछड़ी जातियां देती हैं। इसी आधार पर पार्टी के नेताओं ने युवकों का आह्वान किया है कि वे जातिवादी नेताओं को छोड़ कर आगे आएं और मध्य वर्ग नाम की नई जाति में शामिल हों। यहां उनकी जात भी ऊंची होगी और वर्ग-स्वार्थ भी बराबर सधेगा।

राजनीति में विदेशी निवेश

आम आदमी पार्टी का बनना अचानक या अस्वाभाविक घटना नहीं है। किशन पटनायक ने एक जगह आक्रोश में कहा है कि जब देश मेंं विदेशी धन से सब हो रहा है, पेड़ तक विदेशी धन से लग रहे हैं, तो अमुक क्षेत्र में विदेशी निवेश क्यों नहीं होगा? आज वे होते तो कहते कि विदेशी धन से चलने वाले एनजीओ जब समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति, मानवाधिकार, नागरिक अधिकार, लोकतंत्र सुधार@संवद्र्धन आदि का काम बड़े पैमाने पर करते हैं तो राजनीति क्यों नहीं करेंगे? एनजीओ पूंजीवादी व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं जो उसके विरोध की राजनीतिक संभावनाओं को खत्म करते हैं। वे बताते हैं कि पूंजीवादी व्यवस्था अपने में पूर्ण और अंतिम हैं। अगर किसी समाज में समस्याएं हैं तो वहां के निवासी एनजीओ बना कर धन ले सकते हैं और उन समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। उसके लिए पूंजीवादी व्यवस्था का विरोध करने की जरूरत नहीं है।

देश में जब सब क्षेत्रों में धड़ाधड़ एनजीओ काम कर रहे हैं तो राजनीति भी अपने हाथ में लेने की कोशिश करेंगे ही। आखिर सोनिया गांधी की राष्ट्रीय सलाहकार समिति (नैक) में कितने एनजीओ वालों को खपाया जा सकता है? सुनते हैं, केजरीवाल नैक में शामिल होना चाहते थे, लेकिन वहां जमे उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उनका रास्ता रोक दिया। आखिर आदमी केवल प्रवृत्ति नहीं होता; उसकी अपनी भी कुछ फितरत होती है। मनमोहन सिंह का यह बच्चा रूठ कर कुछ उच्छ्रंखल हो गया है। उच्छ्रंखलता ज्यादा न बढ़े, इसके लिए कतिपय पालतू बच्चे पार्टी में शामिल हो गए हैं। यह उनका अपना निर्णय है या खुद मनमोहन सिंह मंडली ने उन्हें वहां भेजा है, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है।

एनजीओ द्वारा कार्यकर्ताओं को हड़पने की समस्या पहले भी रही है। फर्क इतना आया है कि एनजीओं के जाल में पुराने लोग भी फंसने लगे हैं। यह स्थिति नवउदारवादी व्यवस्था की मजबूती की दिशा में एक और बढ़ा हुआ कदम है। इस बीच घटित एक वाकये को रुपक के रूप में पढ़ा जा सकता है। 1995 में बनी राजनीतिक पार्टी समाजवादी जन परिषद (सजप) के वरिष्ठ नेता सुनील एक प्रखर विचारक और प्रतिबद्ध समाजवादी कार्यकर्ता हैं। जेएनयू से अर्थशास्त्र में एमए करने के बाद से वे पूर्णकालिक राजनीतिक काम कर रहे हैं। किशन पटनायक द्वारा शुरू की गई ‘सामयिक वार्ता’ का समता संगठन और बाद में सजप के साथ घनिष्ठ संबंध रहा है। किशन जी के रहते ही यह पत्रिका अनियमित होने लगी थी जिसकी उन्हें सर्वोपरि चिंता थी।

उनके बाद पत्रिका के संपादक बने साथी ने उसे अपना प्राथमिक काम नहीं बनाया। जबकि संपादकी की जिम्मेदारी लेने वाले किसी भी साथी को उसे अपना प्राथमिक काम स्वीकार करके ही वैसा करना चाहिए था। इस दौरान पत्रिका की नियमितता पूरी तरह भंग हो गई। अब पिछले दो-तीन महीने से सुनील उसे केसला-इटारसी से निकालने और फिर से जमाने की कोशिश कर रहे हैं। सुनील राजनीति करने वाले थे और संपादक बने साथी फोर्ड फाउंडेशन से संबद्ध हैं। अब सुनील पत्रिका निकाल रहे हैं और राजनीति करने का काम किशन जी के बाद संपादक बने साथी ने सम्हाल लिया है। सजप के भीतर यह फेर-बदल होता तो उतनी परेशानी की बात नहीं थी। उनका मन बड़ा है! वे  केजरीवाल की नई पार्टी की राजनीति कर रहे हैं। कह सकते हैं, जो जहां का होता है, अंततः वहीं जाता है। लेकिन इस नाटक में बड़ी मशक्कत से खड़े किए गए एक संगठन और उससे जुड़े नवउदारवाद विरोधी संघर्ष का काफी नुकसान हुआ है। कहना न होगा कि इससे किशन पटनायक की प्रतिष्ठा को भी धक्का लगा है। आप समझ गए होंगे हम साथी योगेंद्र यादव की बात कर रहे हैं। हमने इस प्रसंग को रूपक के बतौर रखा है, जिसमें सुनील और योगेंद्र व्यक्ति नहीं, दो प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं।

साम्राज्यवाद की सगुणता के कई रूप हैं। विदेशी धन उनमें शायद मूलभूत है। पूरी दुनिया में बिछा बहुराष्ट्रीय कंपनियों और एनजीओ का फंदा उसीसे मजबूती से जुड़ा है।  विदेशी धन, चाहे कर्ज में आया हो चाहे खैरात में, वह खलनायक है जो हमारे संसाधनों, श्रम और राजगार को ही नहीं लूटता, स्वावलंबन और स्वाभिमान का खजाना भी लूट लेता है। उसके बाद कितना भी तिरंगा लहराया जाए, देशभक्ति के गीत गाए जाएं, न स्वावलंबन बहाल होता है न स्वाभिमान। केवल एक झूठी तसल्ली रह जाती है। सोवियत संघ के विघटित होने के बाद यह प्रकाश में आया कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को वहां से कितना धन मिलता था। उस समय गुरुवर विश्वनाथ त्रिपाठी ने हमें बगैर पूछे ही कहा कि ‘क्या हुआ, धन क्रांति करने के लिए लिया था।’ सवाल है कि अगर लिया था तो क्रांति का क्या हुआ? एक दौर के प्रचंड समाजवादी जॉर्ज फर्नांडीज पर आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने सोशलिस्ट इंटरनेशनल से धन लिया। वे भी सोचते होंगे कि उन्होंने धन समाजवादी क्रांति करने के पवित्र उद्देश्य के लिए लिया है। आज वे कहां हैं बताने की जरूरत नहीं। विदेशी धन का यह फंदा काटना ही होगा।   

नई पार्टी ने स्वराज लाने की बात कही है। लेकिन वह झांसा ही है। एनजीओ वाले कैसे और कैसा स्वराज लाते हैं उसका जिक्र हमने ‘भ्रष्टाचार विरोध ः विभ्रम और यथार्थ’ शीर्षक ‘समय संवाद’ में किया है जो अब इसी नाम से प्रकाशित पुस्तिका में उपलब्ध है। अब दोनों ही बातें हैं। नुकसान की भी और फायदे की भी। फायदे की बात पर ध्यान देना चाहिए। जो इस नवउदारवादी प्रवाह में शामिल नहीं हुए, उनकी समझ और रास्ता अब ज्यादा साफ होंगे। जो शामिल हुए, लेकिन लौट आए, यह अफसोस करना छोड़ दें कि कितनी बड़ी ऊर्जा बेकार चली गई! ऊर्जा कभी बेकार नहीं जाती। वह जिस काम के लिए पैदा हुई थी, वह काम काफी कुछ कर चुकी है और आगे करेगी। साथी अपना काम इस बार ज्यादा ध्यान से करें। उनके पास यह ताकत कम नहीं है कि वे बदलाव नहीं कर पा रहे हैं तो कम से कम देश की बदहाल आबादी के साथ धोखाधड़ी नहीं कर रहे हैं।

लोग राजनीति को कहते हैं, हमारा मानना है कि मानव जीवन ही संभावनाओं का खेल है। यह भी हो सकता है मोहभंग हो और नई पार्टी से कुछ लोग बाहर आएं। जीवन में सीख की बड़ी भूमिका होती है। उससे नवउदारवाद विरोधी आंदोलन को निश्चित ही ज्यादा बल मिलेगा।



26 नवंबर 2012

1857 का विद्रोह, ‘झंडा सलामी गीत’ और राष्ट्रीयता का विचार- प्रेम सिंह

(ये लेख डॉ प्रेम सिंह ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 167वीं वर्षगांठ पर जारी किया था, सबको पढ़ना चाहिए। पता चलेगा कि राष्ट्रीयता की भावना को...